गुरुवार, 10 सितंबर 2020

मुकुट मुखारबिंद मंदिर घोटाला: SIT रिपोर्ट दबाने के लिए भाजपा नेता के माध्‍यम से दी गई 50 लाख रुपए की मोटी रिश्‍वत, जानिए… फिर भी सच कैसे आया सामने?

 


नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) के आदेश पर की गई यूपी SIT की जांच को मुकुट मुखारबिंद मंदिर के घोटालेबाजों ने 50 लाख रुपए की रिश्‍वत देकर दबाने का प्रयास किया था किंतु फिर भी वो अपने मकसद में सफल नहीं हुए, आखिर क्‍यों ?

इस सवाल का जवाब जानने से पहले ये जान लें कि करीब-करीब 100 करोड़ रुपए के इस घोटाले की नींव कब रखी गई और इसके पीछे कितने शातिर दिमाग काम कर रहे थे।
कैसे हुआ खुलासा
गोवर्धन स्‍थित मुकुट मुखारबिंद मंदिर में करोड़ों रुपए के घोटाले का खुलासा सबसे पहले दसविसा (गोवर्धन) निवासी राधारमन और प्रभुदयाल शर्मा ने किया। उन्‍होंने मंदिर के रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी पर ठेकेदारों की मिलीभगत से करोड़ों रुपए की हेराफेरी करने का आरोप लगाया था।
एनजीओ ने प्रेस कांफ्रेस करके लगाए गंभीर आरोप
इसके बाद 13 मई 2018 को इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन नामक NGO ने बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करके मंदिर की संपत्ति में करोड़ों रुपए का घोटाला मंदिर के रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी द्वारा ही अपने गुर्गों के साथ मिलकर किए जाने की जानकारी दी।
उन्‍होंने बताया कि अपर सिविल जज प्रथम मथुरा के आदेश से मुकुट मुखारबिंद मंदिर के रिसीवर नियुक्‍त किए गए रमाकांत गोस्‍वामी ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर करोड़ों रुपए की संपत्ति हड़प ली है।
इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्‍ति में बताया गया कि वर्ष 2010 में रमाकांत गोस्‍वामी ने न्‍यायालय के समक्ष इस आशय का एक प्रस्‍ताव रखा कि मुकुट मुखारबिंद मंदिर का प्रबंधतंत्र मंदिर के पैसों से एक अस्‍पताल बनवाना चाहता है।
रमाकांत गोस्‍वामी का यह प्रस्‍ताव न्‍यायालय के पीठासीन अधिकारी को “इतना पसंद आया” कि उन्‍होंने न सिर्फ मंदिर के पैसों से अस्‍पताल बनवाने का प्रस्‍ताव स्‍वीकार कर लिया बल्‍कि रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी को ही उसके लिए आवश्‍यक जमीन खरीदने के अधिकार भी सौंप दिए।
रमाकांत गोस्‍वामी भी यही चाहते थे इसलिए उन्‍होंने तत्‍काल एक जमीन का इकरार नामा पहले तो मात्र 40 लाख रुपयों में अपने खास मित्रों के नाम करवाया और फिर 4 महीने बाद ही उसी जमीन को उसके असली मालिक से 2 करोड़ 30 लाख रुपए में मंदिर के नाम खरीद लिया।
कारनामे को अंजाम तक पहुंचाने के लिए रमाकांत गोस्‍वामी ने अपने मित्रों को द्वितीय पक्ष दिखा दिया जबकि जमीन के असली मालिक को प्रथम पक्ष बताया।
इस तरह सिर्फ चार महीने के अंतराल में मंदिर को बड़ी चालाकी के साथ करीब एक करोड़ 90 लाख रुपए का चूना लगा दिया गया।
रमाकांत गोस्‍वामी यहीं नहीं रुके, इसके बाद उन्‍होंने मंदिर को विस्‍तार देने की आड़ में 5 अगस्‍त 2011 को अपने मित्रों से ‘खास महल’ नामक एक संपत्ति 2 करोड़ 70 लाख रुपयों में खरीद ली।
वर्ष 2011 में अपनी साजिश सफल हो जाने पर रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी के हौसले बुलंद हो गए अत: उन्‍होंने वर्ष 2014-15 में फिर मंदिर की ढाई करोड़ रुपयों से अधिक की धनराशि का गबन किया। इसी प्रकार वर्ष 2015-16 में पौने चार करोड़ का, 16-17 में पौने छ: करोड़ रुपयों का घोटाला किया गया।
इतना सब हो जाने पर भी कोई कार्यवाही होते न देख इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन ने 05 जून 2018 को तहसील दिवस में एक शिकायती पत्र दिया, जिसके बाद जिलाधिकारी ने समस्‍त प्रकरण की जांच एसडीएम गोवर्धन नागेन्‍द्र कुमार सिंह के हवाले कर दी। इस जांच में एनजीओ द्वारा रमाकांत गोस्‍वामी पर लगाए गए सभी आरोप प्रथम दृष्‍टया सही पाये गए हैं।
गौरतलब है कि इन्‍हीं घोटालों की शिकायत इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन ने एनजीटी में भी की थी, जिसके बाद एनजीटी ने एसआईटी का गठन कर जांच कराने के आदेश दिए थे।
चारों ओर से खुद को फंसता देख रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी ने एक ओर जहां बड़े-बड़े विज्ञापन देकर मीडिया को चुप रखने की कोशिश की वहीं दूसरी ओर अपने राजनीतिक रसूखों के बल पर SIT की जांच को प्रभावित करने का प्रयास किया।
दी गई 50 लाख रुपयों की रिश्‍वत
घोटालेबाजों ने लगभग चार महीने पहले इसके लिए मथुरा में भाजपा के एक ऐसे पदाधिकारी से संपर्क किया जिसके गहरे संबंध और यहां तक कि रिश्‍तेदारी भी प्रदेश स्‍तरीय पदाधिकारी से है।
बताया जाता है कि एसआईटी की जांच को प्रभावित करने तथा उसे ठंडे बस्‍ते में डलवाने के लिए 50 लाख रुपए लखनऊ जाकर दिए गए और उसके बाद न सिर्फ यह मान लिया गया कि सब-कुछ समाप्‍त हो गया है बल्‍कि सार्वजनिक तौर पर इसका ढिंढोरा भी पीटा गया।
फिर भी सच कैसे आया सामने
इतना करने के बावजूद घोटालेबाज अपने मकसद में इसलिए कामयाब नहीं हुए और इसलिए अंतत: एसआईटी को अपनी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करनी पड़ी क्‍योंकि गोवर्धन के ही दसबिसा निवासी हरीबाबू शर्मा पुत्र मोहन लाल शर्मा ने गत दिनों इलाहाबाइ हाईकोर्ट में एक याचिका डालने की पूरी तैयारी कर उसमें प्रिंसिपल सेक्रेट्री (होम) उत्तर प्रदेश तथा डीआईजी (एसआईटी) लखनऊ को भी पार्टी बनाने के मकसद से अपने वकील सत्‍येन्‍द्र नारायाण सिंह के जरिए याचिका की कॉपी भेज दी।
दरअसल, हरीबाबू ऐसा करने के लिए तब मजबूर हुए जब उन्‍हें आरटीआई के माध्‍यम से यह जानकारी मिली कि जांच एजेंसी अपना काम पूरा करके रिपोर्ट शासन को दे चुकी है।
ये पता लगने के बाद हरीबाबू को यकीन हो गया कि घोटालेबाजों द्वारा किया गया दावा सही था कि वह एसआईटी की जांच को ठंडे बस्‍ते में डलवा चुके हैं।
अब जबकि हरीबाबू द्वारा प्रिंसिपल सेक्रेट्री (होम) उत्तर प्रदेश तथा डीआईजी (एसआईटी) को पार्टी बनाने की सूचना मिली तो हड़कंप मचना स्‍वाभाविक था लिहाजा तुरंत शासन स्‍तर से एक ओर जहां एसआईटी की जांच रिपोर्ट को सामने रख दिया गया वहीं दूसरी ओर 11 आरोपियों के खिलाफ एफआईआर कराने के आदेश भी कर दिए गए।
इस संबंध में पूछे जाने पर हरीबाबू शर्मा ने बताया कि एसआईटी की जांच रिपोर्ट के आधार पर एफआईआर दर्ज कर लिए जाने के बाद भी वह न्‍यायालय के माध्‍यम से मुकुट मुखारबिंद और दानघाटी मंदिर में हुए उन घोटालों को सामने लाने की लड़ाई लड़ते रहेंगे जो अभी दबे हुए हैं और जिन्‍हें इस गिरोह ने अंजाम दिया है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

सोमवार, 7 सितंबर 2020

मथुरा में बहुत मशहूर है एक और खेल, क्या इस खेल का भी खुलासा करेगी पुलिस?


मेट्रो सिटीज दिल्‍ली, मुंबई, कलकत्‍ता, चेन्‍नई सहित देश के तमाम दूसरे महानगरों तथा नगरों के साथ तरक्‍की की दौड़ में विश्‍व का नामचीन धार्मिक शहर मथुरा बेशक काफी पिछड़ा हुआ प्रतीत होता हो, बेशक यहां अभी तरक्‍की को परिभाषित करने वाली अनेक सुविधाओं का अभाव हो, बेशक देश-दुनिया के साथ तरक्‍की के लिए कदम ताल मिलाने में इसे लंबा समय लगे, लेकिन एक क्षेत्र ऐसा है जिसमें कृष्‍ण की यह नगरी अन्‍य दूसरे महानगरों एवं नगरों से किसी तरह पीछे नहीं हैं। सच तो यह है कि वह बहुत से नगरों एवं महानगरों से इस क्षेत्र में काफी आगे है।

जी हां! चाहे आपको आसानी से यकीन आये या ना आए, चाहे आपका मुंह आश्‍चर्य से एकबार को खुले का खुला रह जाए लेकिन सच्‍चाई यही है कि विश्‍व की धार्मिक, सांस्‍कृतिक, आध्‍यात्‍मिक एवं साहित्‍यिक विरासत को दरकिनार कर यह शहर उस दिशा में करवट ले चुका है जिसके बारे में सोचना तक आम आदमी के लिए किसी महापाप से कम नहीं है।

यहां हम बात कर रहे हैं पैसे वालों के एक शौक, या कहें एक ऐसे खेल की जिसे ”वाइफ स्‍वेपिंग” और ”कपल स्‍वेपिंग” कहा जाता है। पैसे वालों का इसलिए कि मध्‍यम वर्गीय लोगों की तो औकात से ही बाहर है इस खेल में शामिल होना।

इस खेल के तहत पैसे वाले परिवारों से संबंध रखने वाले कपल, कम से कम छ: कपल का एक ग्रुप बनाते हैं और यह ग्रुप फिर वाइफ स्‍वेपिंग करता है। वाइफ स्‍वेपिंग के तहत न्‍यूड एवं सेमी न्‍यूड ग्रुप डांस से लेकर ग्रुप सेक्‍स तक सब-कुछ शामिल होता है।

इसके लिए सबकी सहमति से शहर के किसी बाहरी हिस्‍से में अच्‍छे होटल का हॉल तथा कमरे बुक कराये जाते हैं, जहां ग्रुप के सदस्‍य कपल पूर्व निर्धारित दिन व समय पर अपनी-अपनी गाड़ियों से पहुंचते हैं। इस खेल में शामिल होने के लिए जितना जरूरी है एक अदद कपल का होना, उतना ही जरूरी है एक गाड़ी का होना। खेल की शुरूआत ड्रिंक या ड्रग्‍स से होती है, और उसके बाद जैसे-जैसे सुरूर चढ़ता जाता है, खेल शुरू होने लगता है।

खेल की शुरूआत के लिए ग्रुप के सभी सदस्‍य हॉल की बत्‍तियां बुझाकर एक टेबिल पर अपनी-अपनी गाड़ियों की चाभियां रख देते हैं और फिर अंधेरे में ही ग्रुप के पुरुष सदस्‍य किसी एक गाड़ी की चाभी उठाते हैं। जिसके हाथ में जिसकी गाड़ी की चाभी आ जाती है, वह उस सदस्‍य की बीबी के साथ खेल खेलने को अधिकृत हो जाता है। ठीक इसी प्रकार उसकी बीबी के साथ वह सदस्‍य खेल खेलने का अधिकारी हो जाता है जिसकी चाभी उसके हाथ लगी है।

चाभियों की अदला-बदली के साथ यह सदस्‍य अपने पार्टनर को होटल में ही पहले से बुक्‍ड कमरों में ले जाते हैं और फिर वहां स्‍वछंद सेक्‍स का यह खेल शुरू हो जाता है।

इससे भी आगे इस खेल में कुछ लोग हॉल के अंदर ही एक-दूसरे की पत्‍नियों को लेकर सब-कुछ करने को स्‍वतंत्र होते हैं जबकि कुछ लोग दो-दो और तीन-तीन की संख्‍या में ग्रुप सेक्‍स करते हैं।

जाहिर है कि इस सारे खेल का राजदार और हिस्‍सेदार वह होटल मालिक भी होता है जिसके यहां खेल खेला जाता है। उसे इसके लिए अच्‍छी-खासी रकम मिलती है, वो अलग।

बताया जाता है कि मथुरा के नवधनाढ्यों को इस खेल की लत उस क्‍लब कल्‍चर से लगी है जो कथित तौर पर समाज सेवा के कार्य करते हैं अथवा समाज सेवा करने का दावा करते हैं।

इनके अलावा कुछ लोगों ने पर्सनल क्‍लब या ग्रुप भी बना लिए हैं और उनकी आड़ में विभिन्‍न कार्यक्रमों का आयोजन करते रहते हैं। जिनका असल मकसद उनके बीच से छांटकर ‘वाइफ स्‍वेपिंग’ अथवा ‘कपल’ स्‍वेपिंग के लिए एक अलग ग्रुप बनाना होता है।

विश्‍वस्‍त सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार पिछले कुछ समय के अंदर इस धार्मिक शहर के विशेष वर्ग में हुईं आकस्‍मिक युवा संदिग्‍ध मौंतों के पीछे यही खेल रहा है क्‍योंकि इसके आफ्टर इफेक्‍ट अंतत: ऐसे ही परिणाम निकालते हैं।

सूत्रों की मानें तो विगत माह एक प्रसिद्ध होटल मालिक की शादी-शुदा बहिन इसी खेल में अपनी जान दे चुकी है। उसकी मौत को हालांकि इसलिए आत्‍महत्‍या प्रचारित किया गया क्‍योंकि उसने अपने मायके में जान दी थी परंतु सूत्रों की मानें तो इसके पीछे का असली कारण वाइफ स्‍वेपिंग का खेल ही था।

इसके अलावा कुछ समय पहले एक बिल्‍डर के युवा पुत्र की संदिग्‍ध मौत हो या एक अन्‍य  बड़े व्‍यवसाई के अधेड़ उम्र पुत्र की होटल के कमरे में हुई मौत का मामला हो, सबके पीछे यही खेल बताया जाता है।

जिन परिवारों में यह मौतें हुई हैं, वह दबी जुबान से इतना तो स्‍वीकार करते हैं कि अवैध संबंध इन मौतों का कारण बने हैं, लेकिन सीधे-सीधे वाइफ स्‍वेपिंग के खेल में संलिप्‍तता स्‍वीकार नहीं करते।

चूंकि इस खेल के परिणाम स्‍वरूप एचआईवी एड्स तथा आज के दौर की कोराना जैसी संक्रामक बीमारियां भी तोहफे में मिलने की पूरी संभावना रहती है इसलिए इसके परिणाम तो किसी न किसी स्‍तर पर जाकर घातक होने ही होते हैं। ऐसी स्‍थिति में पति-पत्‍नी एक-दूसरे को दोषी ठहराने का प्रयास करते हैं और इसके फलस्‍वरूप गृहक्‍लेश बढ़ जाता है। रोज-रोज के गृहक्‍लेश का नतीजा फिर किसी अनहोनी के रूप में सामने आता है।

इस खेल से जुड़े लोगों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार धार्मिक शहर मथुरा में यूं तो इस खेल की शुरूआत हुए कई साल हो चुके हैं, लेकिन पिछले करीब पांच सालों से इसमें काफी तेजी आई है। पांच सालों में मथुरा के अंदर इस खेल के कई ग्रुप बने हैं और इसी कारण सो-कॉल्‍ड सभ्रांत परिवारों में कई जवान संदिग्‍ध मौतें भी हुई हैं।

आजतक ऐसी किसी मौत का मामला पुलिस के पास न पहुंचने की वजह से पुलिस ने उसमें कोई रुचि नहीं ली क्‍योंकि यूं भी मामला पैसे वालों से जुड़ा होता है।

यही कारण है वाइफ स्‍वेपिंग का यह खेल धर्म की इस नगरी में न केवल बदस्‍तूर जारी है बल्‍कि दिन-प्रतिदिन परवान चढ़ रहा है।

एक-दो नहीं, अनेक अपराधों का रास्‍ता बनाने वाला यह खेल यदि इसी प्रकार फलता-फूलता रहा और पुलिस व प्रशासन के बड़े अधिकारियों ने इस ओर अपनी निगाहें केंद्रित न कीं तो आने वाले समय में कृष्‍ण की नगरी के लिए यह ऐसा कलंक साबित होगा जिससे पीछा छुड़ाना मुश्‍किल हो जायेगा।

मुश्‍किल इसलिए कि मथुरा से दिल्‍ली बहुत दूर नहीं है। दिल्‍ली का कचरा अगर यमुना में बहकर आ रहा है तो दिल्‍ली का कल्‍चर भी सड़क के रास्‍ते मथुरा को प्रदूषित कर ही रहा है।

-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ 

रविवार, 9 अगस्त 2020

क्‍या कहती हैं ‘टीपू’ और ‘पप्‍पू’ के बारे में ‘बाबा नास्त्रेदमस’ की भविष्‍यवाणियां?


सुना है कि मशहूर फ्रांसीसी भविष्‍यवक्‍ता ‘बाबा नास्त्रेदमस’ 16वीं सदी के उत्तरार्ध में ही बोल गए थे कि भारत एक और ‘टीपू’ को जन्‍म देगा।
20वीं सदी के विदाकाल से ठीक पहले जन्‍मा यह ‘सॉफ्ट लायन’ कुलभूषण अक्‍ल के मामले में अपने हमउम्र उस ‘चंपू’ से लगातार प्रतिस्‍पर्धा करेगा, जिसे राजनीति जगत में लोग ‘पप्‍पू’ उपनाम से संबोधित करेंगे।
‘बाबा नास्त्रेदमस’ की भविष्‍यवाणी पर भरोसा करें तो राजनीति में समकालीन ये ‘टीपू’ और ‘पप्‍पू’ अपने-अपने कुल के ऐसे ‘चिराग’ साबित होंगे जिनसे कोई ‘जिन्‍न’ भी सौ कोस दूर भागेगा क्‍योंकि इनकी काबिलियत ही ऐसी होगी।
मसलन ये जिस थाली में खाएंगे उसी में छेद करने के आदी होंगे और जिस पेड़ की डाल पर बैठेंगे, उस पर तब तक आरी चलाते रहेंगे जब तक कि डाल टूटकर धराशायी न हो जाए।
मुगलिया सल्‍तनत के कुछ खास किरदारों से प्रभावित ये ‘टीपू’ और ‘पप्‍पू’ अपनी फितरत से राजनीतिक जगत को तब तक चौंकाते रहेंगे जब तक कि अपनी-अपनी पार्टी और परिवार को अदृश्‍य साबित न कर लें।
विलायत से पढ़-लिखकर राजनीतिक विरासत को संभालने वाले ये ‘टीपू’ और ‘पप्‍पू’ अक्‍सर सार्वजनिक रूप से अपनी नायाब अक्‍ल का नमूना पेश करने में पीछे नहीं रहेंगे ताकि कोई उन्‍हें विस्‍मृत न कर सके।
जनता के साथ-साथ उनके जन्‍मदाता भी यह न भूल सकें कि उन्‍होंने किन नमूनों को जन्‍म दिया है।
‘बाबा नास्त्रेदमस’ का तो यहां तक कहना है कि उनके बाद वाली पीढ़ियां इस बात पर आसानी से भरोसा नहीं करेंगी कि अक्‍ल के अंधे लेकिन गांठ के पूरे ऐसे-ऐसे कालीदासों ने कभी किसी राज्‍य पर और पार्टी पर आधिपत्‍य कायम किया था।
उन्‍हें उस दौर की जनता पर भी आश्‍चर्य होगा जो उन्‍हें न सिर्फ ढोती रही बल्‍कि उनकी जय-जयकार भी करती रही। वो भी तब जबकि जनता की आंखों के सामने दोनों ने एक-दो बार नहीं बार-बार खुद को खुदगर्ज साबित किया। किसी ने बाप-चाचाओं से भरे-पूरे परिवार को बर्फ में लगा दिया तो किसी ने परिवार का इतना ‘नियोजन’ कर डाला कि ‘परिवार ही पार्टी’ बनकर रह गया।
चूंकि ‘बाबा नास्त्रेदमस’ अपनी समस्‍त भविष्‍यवाणियां सांकेतिक भाषा में करके गए हैं इसलिए मजबूरी में यहां भी सब-कुछ संकेतों में ही समझाया जा रहा है। शायद हमारी तरह ‘बाबा नास्त्रेदमस’ भी जानते होंगे कि 2022 आते-आते तत्‍कालीन जनता सब समझ जाएगी। वो ये भी समझ जाएगी कि विरासत से राजयोग लिखने का समय सदियों पहले बीत गया। अब तो जो मिलेगा, रामजी की कृपा और जनता रूपी जनार्दन के मताधिकार से मिलेगा।
टीपू और पप्‍पू की सबसे बड़ी उलझन यही है, उन्‍हें समझ में नहीं आ रहा कि वो …मेरा पिया घर आया ओ रामजी, गाएं या फिर अपनी-अपनी पार्टी के लिए इसी प्रकार राम-नाम सत्‍य बुलवाने का बंदोबस्‍त करते रहें।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुक्रवार, 10 जुलाई 2020

सारे सवाल बेमानी: सवाल सिर्फ एक, क्‍या पुलिस का ज़मीर जाग गया है ?


यूं तो पुलिस की हर मुठभेड़ न सिर्फ शक के दायरे में रहती है बल्‍कि उसके साथ तमाम सवाल भी खड़े हो जाते हैं।
संभवत: इसीलिए पुलिस एनकाउंटर के दौरान हुई हर मौत की निष्पक्ष, प्रभावी और स्वतंत्र जांच के लिए कुछ नियम निर्धारित किए गए हैं।
जैसे पूरे घटनाक्रम की एक स्वतंत्र जांच सीआईडी से या दूसरे पुलिस स्टेशन की टीम से किसी एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की निगरानी में कराना।
यह वरिष्ठ पुलिस अधिकारी, उस एनकाउंटर में शामिल सबसे उच्च अधिकारी से भी एक रैंक ऊपर का होना।
इसके अलावा धारा 176 के अंतर्गत पुलिस फ़ायरिंग में हुई प्रत्‍येक मौत की मजिस्ट्रियल जांच भी जरूरी है। जिसकी एक रिपोर्ट न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास भेजी जाती है।
ऐसे में कानपुर शूटआउट के सरगना विकास दुबे की पुलिस एनकाउंटर में मौत पर सवाल उठना सामान्‍य सी बात है, इसलिए यहां सवाल एनकाउंटर पर न उठाकर इस बात पर किया जाना चाहिए कि क्‍या कानपुर कांड के बाद वाकई पुलिस का ज़मीर जाग गया है ?
अथवा ये सभी एनकाउंटर आठ पुलिसकर्मियों की शहादत से उपजा कोई ऐसा तात्‍कालिक क्रोध है, जिसका गुबार कुछ दिनों बाद स्‍वत: बैठ जाएगा।
यही एकमात्र सवाल ऐसा है जिसमें पुलिस की कार्यशैली पर उठने वाले सभी सवालों के जवाब निहित हैं।
इसी सवाल में निहित है कि कैसे कोई विकास दुबे पुलिस की नाक के नीचे फल-फूलकर इतना दुस्‍साहसी हो जाता है कि उसके अंदर खाकी का कोई खौफ नहीं रह जाता। यहां तक कि वह पुलिस पर पूरी प्‍लानिंग के साथ हमला करने से भी नहीं चूकता।
कैसे वो कानून-व्‍यवस्‍था और शासन-प्रशासन से इतर अपनी एक ऐसी समानांतर सत्ता कायम कर लेता है कि आमलोग भी न्‍याय की गुहार उसके दरबार पर जाकर लगाने लग जाते हैं।
इसमें कोई दो राय नहीं कि पुलिस की एक बड़ी समस्‍या राजनीति का अपराधीकरण या अपराधियों का राजनीतिकरण हो जाना है, परंतु इसका यह कतई मतलब नहीं कि पुलिस अपने कर्तव्‍य से इस कदर विमुख हो जाए कि उसका अस्‍तित्‍व ही तक दांव पर लगता दिखाई दे।
विकास दुबे ने 2/3 जुलाई की मध्‍य रात्रि में दरिंदगी का जो घिनौना खेल खेला, वो चंद घंटों के अंदर उपजी मनोवृत्ति का परिणाम नहीं था। वह उसे राजनीतिक गलियारों के साथ-साथ पुलिस से भी अनवरत मिलते रहे उस खाद-पानी की परिणिति थी जिसने उसे इंसान से हिंसक जानवर बनाने में मदद की।
घटना वाले दिन से ही यह एकदम साफ था कि पुलिस ने ही पुलिस की मुखबिरी की, क्‍योंकि बिना पूर्व सूचना के इतनी तैयारी के साथ हमला कर पाना संभव ही नहीं था। हालांकि पुलिस को इस बात का पताना लगाने में भी कई दिन लग गए और उसके बाद भी गाज गिरी तो एक एसओ और एक एसआई पर जिन्‍हें निलंबित किया गया है।
रहा सवाल पूरे चौबेपुर थाने के दूसरे पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर करने या सीओ के पत्र को दबाकर बैठ जाने वाले तत्‍कालीन एसएसपी कानपुर के तबादले का तो उसे कार्यवाही नहीं माना जा सकता।
दलगत राजनीति और आदतन सवाल उठाने वालों की बात अगर छोड़ दी जाए तो विकास दुबे और उसके साथियों का पुलिस ने जो हश्र किया, उससे किसी को कोई परेशानी नहीं है।
सच तो यह कि अधिकांश लोग खुश हैं, लेकिन ये खुशी तब अहमियत रखती है जब पुलिस अपने यहां से विपिन तिवारी तथा केके शर्मा जैसों सहित अनंतदेव जैसे आईपीएस अधिकारियों को भी चिन्‍हित कर खाकी पर चिपकी गंदगी साफ करने का बीड़ा उठाए।
बेशक ये काम बहुत कठिन है और इसके लिए राजनीतिक गलियारों में पल रहे सफेदपोश अपराधियों से भी टक्‍कर लेनी पड़ सकती हैं परंतु असंभव कतई नहीं है।
बस आवश्‍यकता है तो इस बात कि पुलिस अपनी इच्‍छाशक्‍ति दृढ़ कर ले और ठान ले कि अपराधी चाहे वर्दी में छिपा हो या समाज में, उसे सहन नहीं किया जाएगा।
ये काम असंभव इसलिए भी नहीं है कि स्‍वच्‍छ छवि वाले राजनेताओं को शायद ही इसमें कोई दिक्‍कत हो, और जिन्‍हें दिक्‍कत है वो हर हाल में पुलिस के लिए सिरदर्द ही साबित होते हैं।
हां, इतना जरूर है कि पुलिस को इसके लिए बाकायदा अभियान चलाकर ऐसी ही एकजुटता का प्रदर्शन करना होगा जैसा कि विकास दुबे के गैंग को नेस्‍तनाबूद करने के लिए दिखाई गई और तय किया गया कि चाहे जैसे भी व जितने भी सवाल उठेंगे, उनका जवाब दे दिया जाएगा।
विकास दुबे व उसके अधिकांश गुर्गे बेशक उसी दुर्गति को प्राप्‍त हुए जिसके वो हकदार थे लेकिन सही न्‍याय तब माना जाएगा जब इसी आत्‍मबल, साहस एवं एकजुटता के साथ खाकी और खद्दर के पीछे छिपे दुर्दांत अपराधियों को भी कठघरे में खड़ा किया जाए क्‍योंकि उनका अपराध किसी भी तरह विकास दुबे व उसके गुर्गों से कम नहीं है।
हकीकत तो यह है कि पर्दे के पीछे ही सही, लेकिन वो सब भी विकास दुबे के गैंग का हिस्‍सा हैं इसलिए ‘विकास दुबे’ तभी सही अर्थों में समाप्‍त होगा, जब वो सब भी अपनी-अपनी नियति को प्राप्‍त होंगे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

मंगलवार, 7 जुलाई 2020

ऊपर से नीचे तक “खाकी” के बिक जाने की सनसनीखेज कहानी है कानपुर का शूटआउट, हर जिले में फल-फूल रहा है कोई न कोई “विकास दुबे”


2/3 जुलाई की रात कानपुर में हुआ शूटआउट दरअसल ”खाकी” के ऊपर से नीचे तक बिक जाने की एक ऐसी सनसनीखेज कहानी है जिसके कारण उत्तर प्रदेश के लगभग हर जिले में कोई न कोई ‘विकास दुबे’ फल-फूल रहा है।
इस शूटआउट में दर्जनभर से अधिक वर्दीधारियों का खून बह जाने की वजह से आज भले ही पुलिस एक विकास दुबे के लिए खाक छान रही हो परंतु फाइलें गवाह हैं कि प्रदेश के प्रत्‍येक जिले में ऐसे अपराधियों की सूचियां धूल फांकती रहती हैं और सूचीबद्ध बदमाश निश्‍चिंत होकर अपना ‘विकास’ करते रहते हैं।
सूबे का शायद ही कोई ऐसा जिला होगा जहां इनामी बदमाशों की सूची न बनती हो परंतु इन बदमाशों के खिलाफ कार्यवाही होना तो दूर, इनाम की राशि भी नहीं बढ़ाई जाती नतीजतन वह पुलिस के ‘रडार’ पर भी नहीं आ पाते।
ऐसा इसलिए कि पुलिस में इस तरह का कोई नियम ही नहीं है कि यदि कोई बदमाश एक दशक या उससे भी अधिक समय से फरार है तो उसकी गतिविधियों की समीक्षा कर उसके ऊपर घोषित इनाम की राशि बढ़ाई जा सके।
ये बात अलग है कि विकास दुबे इस मामले में भी अपवाद बना रहा। वह न तो फरार था और न निष्‍क्रिय, बावजूद इसके पुलिस ने उसके ऊपर इनाम की राशि तक बढ़ाना जरूरी नहीं समझा।
ऊपर से नीचे तक बिकती हैं ट्रांसफर-पोस्‍टिंग
पुलिस विभाग में कई दशकों से हर ट्रांसफर-पोस्‍टिंग किसी न किसी स्‍तर से बिकती है, ये कोई छिपी हुई बात नहीं है।
प्रदेश के मुख्‍यमंत्री की कुर्सी पर चाहे योगी आदित्‍यनाथ जैसा साफ-सुथरी छवि वाला गेरुआ वस्‍त्रधारी मुख्‍यमंत्री काबिज हो या पूर्ववर्ती सरकारों के मुखिया, पुलिस विभाग में ये खेल हमेशा जारी रहा है।
योगी आदित्‍यनाथ की बेदाग छवि के बावजूद प्रदेश के तमाम जिलों में दागदार अधिकारियों की तैनाती इस बात की पुष्‍टि करती है कि ट्रांसफर-पोस्‍टिंग में पैसे का खेल किसी न किसी स्‍तर से बदस्‍तूर चल रहा है।
ऊपर से शुरू होने वाली खरीद-फरोख्‍त की यह चेन कोतवाली, थाने व चौकियों तक बनी हुई है लिहाजा अकर्मण्‍य तथा अयोग्य लोग चार्ज पाते रहते हैं और योग्‍य एवं ईमानदार अधिकारी फ्रस्‍टेशन के शिकार होकर तनाव में वर्दी का भार ढोने को बाध्‍य होते हैं। किसी तरह यदि कभी कोई ईमानदार और योग्‍य अधिकारी चार्ज पा भी जाता है तो उसका सारा समय विभाग के ही लोगों से निपटने में बीतता है क्‍योंकि वो उसके काम में कदम-कदम पर न केवल रोड़ा अटकाते हैं बल्‍कि शिकायतों का अंबार खड़ा कर देते हैं जिससे उसकी ऊर्जा का बड़ा हिस्‍सा उसी में खप जाता है। ऐसे अधिकारियों को एक जगह टिक कर काम नहीं करने दिया जाता और एक जिले से दूसरे जिले के बीच फुटबॉल बनाकर रखा जाता है।
चार्ज खरीदने वाले पुलिस अधिकारियों की प्राथमिकता
कौन नहीं जानता कि खरीदकर जोन, रेंज और जिले का चार्ज संभालने वाले आईपीएस अधिकारी हों अथवा सर्किल, कोतवाली, थाना या चौकी का चार्ज हासिल करने वाले पुलिसकर्मी, इन सबकी प्राथमिकता होती है अपने जेब से निकले पैसे को चक्रवर्ती ब्‍याज सहित वसूलने की, न कि कानून-व्‍यवस्‍था बनाने और उसके लिए ईमानदारी पूर्वक ड्यूटी निभाने की। फिर इसके लिए चाहे किसी भी स्‍तर तक गिरना पड़े और किसी भी व्‍यक्‍ति से हाथ मिलाना पड़े।
उच्‍च अधिकारियों की संदिग्‍ध सत्‍यनिष्‍ठा
कानुपर शूटआउट से धीरे-धीरे साफ हो रहा है कि पूरे घटनाक्रम का जिम्मेदार सिर्फ चौबेपुर थाना ही नहीं है, पुलिस के वो आला अधिकारी भी हैं जिन्‍होंने अपने ही अधीनस्‍थ अधिकारियों की शिकवा-शिकायतों के बावजूद थाना प्रभारी के खिलाफ कोई एक्‍शन नहीं लिया और उसे इतना अवसर उपलब्‍ध कराया कि वह महीनों तक कानून को ताक पर रखकर विकास दुबे का हिमायती बना रहा।
परोक्ष रूप से देखें तो इस तरह विकास दुबे या उसके जैसे दूसरे अपराधियों सहित अन्‍य अपराधियों को भी उच्‍च पुलिस अधिकारियों का ही संरक्षण प्राप्‍त था अन्‍यथा ये कैसे संभव है कि एक पांच दर्जन आपराधिक मामलों के आरोपी की गिरफ्तारी के लिए अधिकांश पुलिस बल को आधीरात में बिना हथियारों के भेज दिया गया।
क्‍या इसके लिए एसएसपी कानपुर से ये सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि आखिर उन्‍होंने बिना तैयारी के पुलिस बल को दबिश पर जाने की इजाजत कैसे दे दी।
कार्यवाही मात्र चौबेपुर थाने तक ही सीमित क्‍यों?
इस अक्षम्‍य अपराध में अब तक जो भी और जैसी भी कार्यवाही हुई है, वह सिर्फ चौबेपुर थाने की पुलिस तक सीमित है जबकि स्‍पष्‍ट दिखाई दे रहा है कि एसएसपी से लेकर दूसरे उच्‍च पुलिस अधिकारी भी दूध के धुले नहीं रहे होंगे।
विकास दुबे अपने जरायम पेशे में लगातार सक्रिय था, फिर क्‍यों वह उच्‍च पुलिस अधिकारियों की नजरों में नहीं आया या फिर अधिकारी ही उससे नजरें फेरते रहे।
आज उस पर 25 से 50 हजार और फिर एक लाख से ढाई लाख रुपए का इनाम घोषित करने वाले तब कहां थे जब वह खुलेआम एक ओर जहां समूचे इलाके को बंधक बनाए हुए था वहीं वर्दी की इज्‍जत को भी बार-बार तार-तार कर रहा था।
जांच की आड़ में खेला जाने वाला खेल
पूरे प्रदेश की पुलिस व्‍यवस्‍था पर गहरा सवालिया निशान लगाकर भाग निकलने वाला विकास दुबे घटना से पहले किस-किस पुलिसकर्मी के संपर्क में था, इस बात तक के लिए पुलिस को आज पांच दिन बाद भी जांच पूरी होने का इंतजार है। वो भी तब जबकि इस दौर में यह पता करना घंटों का भी नहीं चंद मिनटों का काम रह गया है।
इसी प्रकार शहीद सीओ देवेन्‍द्र मिश्रा के उस पत्र की सत्‍यता को भी जांच की दरकार है जिसे उन्‍होंने कई महीने पहले चौबेपुर थाने के प्रभारी विनय तिवारी की सत्‍यनिष्‍ठा पर प्रश्‍न उठाते हुए एसएसपी को लिखा था।
आखिर तत्‍कालीन एसएसपी से इस बात की पुष्‍टि करने के लिए भी कितना समय चाहिए, या फिर पहले शहीद सीओ के पत्र की फॉरेंसिक जांच कराने के बाद उनसे पूछा जाएगा कि ये पत्र आपको लिखा गया था अथवा नहीं।
अपने ही विभाग के शहीदों और उनके परिजनों से किया जा रहा यह क्रूर मजाक प्रमाण है इस बात का कि ‘खाकी’ वर्दी में लिपटे अधिकांश लोगों की आत्‍मा किस कदर मर चुकी है और जो चेहरे उसके साथ दिखाई देते हैं वह मात्र मुखौटे हैं।
एक ऐसा खोल बनकर रह गई है खाकी वर्दी जिससे आत्‍ममंथन की उम्‍मीद करना संभवत: बेमानी है। वह जिस तरह घर के अंदर किसी खूंटी पर टंगी रहती है, उसी तरह घर के बाहर एक अदद शरीर पर। ऐसा न होता तो ये कैसे संभव था कि जिस घटना ने आमजन को भी हिलाकर रख दिया, उस घटना के पांच दिन बाद भी हजारों बड़े-छोटे वर्दीधारी बस लकीर पीट रहे हैं।
राजनीतिक दखल की बात
बेशक ये एक कड़वा सच है कि पुलिस में राजनीति और राजनेताओं का दखल जरूरत से ज्‍यादा है परंतु इसके लिए भी काफी हद तक पुलिस का लालच ही जिम्‍मेदार है। पुलिस यदि ड्यूटी को प्राथमिकता दे और अतिरिक्‍त आमदनी के लिए मलाईदार तैनाती का लालच छोड़ दे तो तय है कि राजनेताओं की उसे उंगलियों पर नचाने की मंशा जरूर प्रभावित हो सकती है।
फिर राजनीतिक गलियारों से विकास दुबे जैसों को दिया जा रहा संरक्षण भी बेमानी हो जाता है और खाकी की इज्‍जत तथा उसका इकबाल पूर्ववत कायम कराया जा सकता है।
बस आवश्‍यकता है तो इस बात की कि पुलिस अपनी वर्तमान स्‍थिति पर गंभीरता पूर्वक चिंतन करे और वर्दी की इस ‘दशा’ के लिए जिम्‍मेदार हर उस व्‍यक्‍ति को बेनकाब करने की ठान ले जिसके कारण विकास दुबे जैसा आदतन अपराधी भी उसके ऊपर सुनियोजित तरीके से कहर ढाने में कामयाब रहा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
http://legendnews.in/kanpurs-shootout-is-a-sensational-story-of-khaki-being-sold-from-top-to-bottom/

शुक्रवार, 3 जुलाई 2020

पूरे सिस्‍टम पर गहरा सवालिया निशान लगाती है कानपुर की घटना, पुलिस के लिए भी आत्‍मचिंतन का ‘मौका’

पूरे सिस्‍टम पर गहरा सवालिया निशान लगाती है कानपुर की घटना, पुलिस के लिए भी आत्‍मचिंतन का ‘मौका’
कानपुर की वीभत्‍स घटना एक ओर जहां पूरे सिस्‍टम पर गहरा सवालिया निशान लगाती है वहीं दूसरी ओर पुलिस के लिए भी आत्‍मचिंतन का ‘मौका’ दे रही है।
पुलिस के लिए इसे ‘मौका’ इसलिए कहा जा सकता है कि इतने बड़े दुस्‍साहस की ‘पटकथा’ लिखने वाले यदि छूट गए और कार्यवाही सिर्फ अपराधियों तक सीमित रह गई तो ये सिलसिला आगे भी चलता रहेगा।
कौन नहीं जानता कि विकास दुबे जैसे दुर्दांत अपराधी पुलिस, प्रशासन और राजनेताओं के गठजोड़ का ही नतीजा होते हैं। वो इसी तिकड़ी के संरक्षण में पलते और बढ़ते हैं।
विकास दुबे तक पुलिस की दबिश पहुंचने से पहले सूचना कैसे लीक हुई होगी और कैसे उसने पुलिस को घेरकर मारने का फुलप्रूफ प्‍लान तैयार किया होगा, यह जानना बहुत बड़ी बात नहीं है। लेकिन कोई जानने चाहेगा तब जान पाएगा अन्‍यथा हमेशा की तरह सतही कानूनी कार्यवाही करने की लकीर पीट दी जाएगी।
कोई तो भेदिया होगा जिसने विकास दुबे को पुलिस पर हमलावर होने का इतना अवसर दिलाया ताकि वो रास्‍ते में आड़ी जेसीबी खड़ी करके मोर्चेबंदी कर सके।
मथुरा का जवाहरबाग कांड
मथुरा का जवाहरबाग कांड याद हो तो उसमें एक एसपी सिटी और एक एसओ को लगभग इसी तरह पूरी योजना के साथ घेरकर मार डाला गया।
कहने को सीबीआई इस मामले की जांच कर रही है किंतु 2016 से अब तक न रामवृक्ष का पता लगा न जांच आगे बढ़ी।
इन दो पुलिस अधिकारियों को बेरहमी से मार डालने वाला रामवृक्ष यादव नामक अपराधी पूरे ढाई साल तक कलेक्‍ट्रेट में ही सारे पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों की नाक के नीचे एक सरकारी बाग की ढाई सौ एकड़ से अधिक जमीन पर अपने गुर्गों के साथ काबिज रहा लेकिन सब के सब तमाशबीन बने रहे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यदि पुलिस प्रशासन को मजबूर न किया होता तो रामवृक्ष की विषबेल कितनी और फल-फूल चुकी होती, इसका अंदाज लगाया जा सकता है।
डॉ. निर्विकल्‍प अपहरण कांड
बहुत दिन नहीं बीते जब मथुरा में ही डॉक्‍टर निर्विकल्‍प को अगवा कर बदमाशों ने चंद मिनटों के अंदर 52 लाख रुपए की फिरौती वसूल ली। बात खुली तो पता लगा कि उसमें से 40 लाख रुपए की रकम पुलिस हड़प गई थी। एफआर दर्ज हुई, एक इंस्‍पेक्‍टर को निलंबित भी किया गया किंतु उसके बाद नतीजा ढाक के तीन पात है।
जिन उच्‍च पुलिस अधिकारियों की इस अपहरण कांड में संलिप्‍तता का शक था, उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हुई। एक आरोपी और एक सह आरोपी महिला को गिरफ्तार कर पुलिस ने अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर ली।
पुलिस चौकी से करोड़ों की शराब बेच देने का मामला
मथुरा में ही नेशनल हाईवे के थाना कोसी की कोटवन बॉर्डर पुलिस चौकी से लॉकडाउन के दौरान पुलिस द्वारा दो करोड़ रुपए से ऊपर की शराब बेच दी गई लेकिन खानापूरी के अलावा उच्‍च अधिकारियों ने कुछ नहीं किया।
आश्‍चर्य की बात यह है कि ये वो शराब थी जो खुद पुलिस ने ही समय-समय पर शराब तस्‍करों से जब्‍त कर कई लोगों को जेल भेजा था। अब सारा खेल खतम और पैसा हजम। तस्‍कर भी खुश और पुलिस भी। रहा सवाल जांच का तो वह जैसे अब चल रही है, वैसे दस साल बाद भी चलती रहेगी।
छत्ता बाजार का दोहरा हत्‍याकांड
हाल ही में मथुरा के अत्‍यधिक भीड़-भाड़ वाले क्षेत्र छत्‍ता बाजार की गली सेठ भीकचंद के अंदर सुबह-सुबह मोटरसाइकिल सवार बदमाश अंधाधुंध फायरिंग करके दो लोगों की जान ले लेते हैं और तीन लोगों को घायल करके भाग जाते हैं किंतु पुलिस कुछ नहीं कर पाती।
करती है तो केवल इतना कि एक युवक जो क्रॉस केस बनाने के चक्‍कर में जिला अस्‍पताल जा पहुंचा था, उसे गिरफ्तार दिखा देती है और घटना स्‍थल पर पड़ी मिली एक रिवॉल्‍वर को उससे बरामद बताकर उसका चालान कर देती है।
इस दुस्‍साहसिक वारदात को अंजाम देने वाले नामजद और अज्ञात बदमाश आज तक पुलिस की पकड़ से दूर हैं जबकि उसमें मारे गए लोगों की तीन दिन बाद तेरहवीं होने वाली है।
दरअसल पूरे प्रदेश में कहीं भी पुलिस मजामत की घटना हो अथवा कोई ऐसी दुस्‍साहसिक वारदात, ऐसा संभव ही नहीं है कि पुलिस उससे कतई अनजान हो या उसे भनक तक न लगे।
पुलिस ही सूत्रधार
इसे यूं भी कह सकते हैं कि पुलिस ही ऐसी वारदातों की सूत्रधार होती है, कभी पैसे के लालच में तो कभी आपसी द्वेषभाव के कारण।
इसके अलावा एक तीसरा कारण होता है राजनीतिक संरक्षण बने रहने की वो चाहत जिसके बल पर ”चार्ज” चलता रहता है।
किसी के लिए जिले का ”चार्ज” अहमियत रखता है तो किसी के लिए ”सर्किल” का, किसी को थाने के चार्ज की चाहत होती है तो कोई खास चौकी थाना छोड़ना नहीं चाहता। कोई पैसे के लिए अपनों से गद्दारी करने को तत्‍पर रहता है तो कोई हुकुम बजाने के लिए।
जो भी हो, लेकिन एक बात तय है कि बिना भेदिया के इतनी बड़ी तो क्‍या छोटी से छोटी पुलिस पार्टी पर हमला करने की हिमाकत कोई नहीं कर सकता।
विकास दुबे का ‘इतना विकास’ संभव ही इसलिए हो पाया कि उसे पुलिस-प्रशासन और राजनेताओं की तिकड़ी का भरपूर सहयोग प्राप्‍त होता रहा।
जरा विचार कीजिए कि यही हिस्‍ट्रीशीटर गुंडा विकास दुबे थाने के अंदर एक दर्जाप्राप्‍त राज्‍यमंत्री ही हत्‍या कर देता है और इसके खिलाफ अदालत में कोई गवाही तक देने को तैयार नहीं होता, तो इसके मायने क्‍या हैं।
आज चूंकि आठ पुलिसजनों की शहादत हुई है और आधा दर्जन से अधिक गंभीर घायल हैं इसलिए सहानुभूति होना स्‍वाभाविक है, लेकिन क्‍या ये सहानुभति इस बात की गारंटी हो सकती है कि भविष्‍य में ऐसी किसी दुस्‍साहसिक घटना की पुनरावृत्ति नहीं होगी।
क्‍या कोई पुलिस अधिकारी अथवा कर्मचारी दावे के साथ कह सकता है कि जो कुछ हुआ और जिन परिस्‍थितियों में हुआ, उसके लिए पुलिस कतई जिम्‍मेदार नहीं है।
और यदि पुलिस जिम्‍मेदार है तो निश्‍चित ही यह घटना उसे आत्‍मचिंतन का मौका दे रही है ताकि हर पुलिस वाला सोच सके कि कब तक और क्‍यूं।
इसलिए तो नहीं कि ड्यूटी की खातिर खाक में मिलने की प्रेरणा देने वाली खाकी पर ही अब इतनी गर्द जम चुकी है कि उसे कुछ दिखाई नहीं देता, कुछ सुनाई नहीं देता।
दिखता है तो वही जो देखना चाहते हैं, और सुनना भी है वही जो सुनना चाहते हैं।
विकास दुबे जैसों का खेल हमेशा के लिए यदि खत्‍म करना है तो एकबार फिर जहां खाकी का इकबाल बुलंद करना होगा वहीं उसकी मान-मर्यादा को भी और तार-तार होने से बचाना होगा अन्‍यथा आज जो दुस्‍साहस विकास तथा उसके गुर्गों ने किया है, कल कोई और करेगा।
हो सकता है कि तब ये संख्‍या इससे भी अधिक हो।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

मंगलवार, 26 मई 2020

डूबने के कगार पर ‘नयति’, वेंटिलेटर‍ तक पहुंचा ‘नीरा राडिया’ का मल्टी सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल

28 फरवरी 2016 को नयति हॉस्‍पिटल का उद्घाटन करते उद्योगपति रतन टाटा, साथ हैं चेयरपरसन नीरा राडिया
बहुत दिन नहीं हुए जब देश के प्रमुख उद्योगपति रतन टाटा ने ”2G स्‍पैक्‍ट्रम” घोटाला फेम और ”पनामा लीक्‍स” चर्चित महिला लाइजनर ”नीरा राडिया” के हॉस्‍पिटल ‘नयति’ का मथुरा में भव्‍य उद्घाटन किया था।

राष्‍ट्रीय राजमार्ग नंबर- 2 के किनारे बने इस हॉस्‍पिटल के प्रमोटर्स में चार्टर्ड एकाउंटेंट दीनानाथ चतुर्वेदी के पुत्र राजेश चतुर्वेदी का नाम भी शामिल है। दीनानाथ चतुर्वेदी मूल रूप से मथुरा के ही निवासी हैं।


अब बताते हैं कि खोटी नीयत के चलते ‘नयति’ ही अपनी ‘नियति’ के करीब है और वेंटिलेटर‍ पर पहुंच चुका है।
रविवार 28 फरवरी 2016 को नयति के उद्घाटन समारोह में पद्म विभूषण रतन टाटा ने कहा था कि इसके पीछे व्यक्तिगत बलिदान के साथ समाज सेवा का एक जुनून है और सच्ची चाहत है।
नयति हेल्थकेयर की चेयरपरसन नीरा राडिया ने भी कहा था कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों को उनके क्षेत्र में ही विश्वस्तरीय स्वास्थ्य देखभाल की सुविधा प्रदान करने का अवसर हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
हमारा उद्देश्य छोटे शहरों में मरीजों को उपचार की सुविधा प्रदान कर आम लोगों पर बीमारी की वजह से पड़ने वाले शारीरिक, भावनात्मक और आर्थिक बोझ को कम करना है।
नयति द्वारा विधिवत् काम शुरू कर देने के बाद पता लगा कि मथुरा के लोगों की सेवा करने तथा उन्‍हें अत्‍याधुनिक सुविधाएं मुहैया कराने के प्रचार सहित खोले गए इस हॉस्‍पिटल में चिकित्‍सा काफी महंगी है और जनसामान्‍य के लिए तो वहां उपचार कराना संभव ही नहीं है।
देखते-देखते नयति से ऐसी खबरें भी बाहर आने लगीं कि वहां लोगों से पैसे वसूलने के लिए वो सारे हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, जिनके लिए दूसरे मशहूर अस्‍पताल पहले से बदनाम हैं।
मसलन मरीज की नाजुक स्‍थिति का हवाला देकर मोटी रकम जमा करा लेना, विशेषज्ञ चिकित्‍सकों की आड़ में मनमानी फीस वसूलना, पैसा जमा करने में जरा सी भी देरी हो जाने पर मरीज व उसके परिजनों के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग करना तथा कैजुअलिटी हो जाने पर पूरा बिल वसूल किए बिना ‘लाश’ तक पर कब्‍जा कर लेना आदि।
मात्र चार साल में नयति और उसकी खोटी नीयत एक-दूसरे के पूरक बन गए, नतीजतन आए दिन झगड़े होना और बात पुलिस-प्रशासन तक पहुंचना आम बात हो गई।
हालांकि ऊंची पहुंच और मथुरा से लेकर लखनऊ और दिल्‍ली तक शासन एवं प्रशासन में गहरी पैठ होने के कारण पीड़ितों को हर बार मुंह की खानी पड़ी।
नीरा राडिया के हाईप्रोफाइल स्‍टेटस का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रमुख मीडिया संस्‍थान भी उसके या नयति के खिलाफ एक शब्‍द लिखने अथवा बोलने की हिमाकत नहीं करते।
मौके-बेमौके प्रमुख अखबारों में नयति के छपने वाले बड़े-बड़े विज्ञापन और उसकी प्रशंसा में लिखे जाने वाले समाचार यह समझाने के लिए काफी हैं कि कोई ऐरा-गैरा तो क्‍या, विशिष्‍ट कहलाने वाले लोग भी नयति की शान में गुस्‍ताखी करने वाला समाचार नहीं छपवा सकते।
बेशक कुछ मीडियाकर्मी समय-समय पर नयति के कारनामों को उजाकर करने की हिम्‍मत दिखाते रहे हैं किंतु उन्‍हें उसकी कीमत कभी लीगल नोटिस के जरिए तो कभी ब्‍लैकमेलर प्रचारित करके चुकानी पड़ी है।
मीडिया को साधने वाले नयति के जनसंपर्क विभाग की बात करें तो हर विवाद में हॉस्‍पिटल प्रशासन ही सही होता है और शिकायतकर्ता तथा पीड़ितों के परिजन गलत। शायद ही कभी किसी मामले में नयति के प्रबंधतंत्र ने ये स्‍वीकार किया हो कि चूक उनसे भी हो सकती है।
बहरहाल, हाल ही में नयति के अमानवीय आचरण से जुड़े ऐसे दो मामले फिर सामने आए हैं जिनमें मरीजों को जान गंवानी पड़ी है किंतु नयति ने इन दोनों मामलों में भी खुद को सही ठहराते हुए सारा दोष पीड़ित परिजनों के सिर थोप दिया है।
हॉस्‍पिटल से जुड़े अत्‍यंत भरोसमंद सूत्रों का कहना है कि सेवा की आड़ में मनमानी करने के नयति के रवैए की एक बड़ी वजह उसका जहाज डूबने की नौबत आना है।
सूत्रों के अनुसार नयति अब अपना ही बोझ ढो पाने में खुद को असहाय महसूस कर रहा है। कई बड़े डॉक्‍टर पिछले कुछ समय के अंदर नयति छोड़कर जा चुके हैं। स्‍टाफ को समय से वेतन न मिलना तथा तय वेतन में से कटौती करना आम बात हो गई है।
पांच साल से भी कम समय में ‘नयति’ की यह ‘नियति’ बताती है कि नीरा राडिया और उसके लोग चाहे कैसे भी दावे करें परंतु आम आदमी उसकी नीयत पहचान चुका है। यही कारण है कि किसी मरीज के ठीक होने का समाचार जहां नयति के प्रशासन को प्रेस विज्ञप्‍ति भेजकर छपवाना पड़ता है वहीं विवाद होने पर साम, दाम दण्‍ड भेद की नीति अपनाकर समाचारों को छपने से रोकना पड़ जाता है।
आगे आने वाले समय में नयति किस गति को प्राप्‍त होगा, इस बात को यदि ‘नियति’ पर छोड़ दिया जाए तो जरूरी है कि उसकी शुरूआत से लेकर अब तक उसके हर क्रिया-कलाप को जांच के दायरे में लाया जाए और पता किया जाए कि आखिर क्‍यों अत्‍याधुनिक उपकरणों से सुसज्‍जित कृष्‍ण की नगरी के इस हॉस्‍पिटल में जितने लोगों को जीवनदान नहीं मिला, उससे अधिक लोगों को अकाल मौत प्राप्‍त हुई?
नयति की स्‍थापना से लेकर अब तक वहां हुई मौतों का आंकड़ां यदि देखा जाए तो बहुत सी बातें खुद-ब-खुद साफ हो जाती हैं।
इस सबके बावजूद चूंकि कानूनी पहलुओं के लिए सबूतों की दरकार होती है इसलिए जरूरी है कि नयति के कारनामों की जांच किसी केंद्रीय एजेंसी से कराने की पुरजोर मांग ब्रजवासियों के स्‍तर से की जाए अन्‍यथा यदि नीरा राडिया का जहाज डूब भी गया तो चार वर्ष से अधिक समय में किए गए उसके कृत्‍यों का हिसाब अधूरा रह जाएगा।
ब्रजवासियों को चाहिए कि बाकायदा अभियान चलाकर नयति की नीयत सार्वजनिक करें और विभिन्‍न कारणों से आवाज उठाने में असमर्थ रहे लोगों को न्‍याय दिलाएं ताकि फिर कोई नीरा राडिया कृष्‍ण की नगरी के नागरिकों की भावनाओं का इतनी बेहरहमी के साथ दोहन न कर सके।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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