मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014

कहां से आए इतने चील, गिद्ध और कौए ?

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष) 
ऐसा लगता है जैसे इस देश पर प्रेतों का साया हो। इंसानों से कहीं अधिक चील, गिद्ध और कौए मंडरा रहे हों। आम इंसान इनकी शक्‍ति व सामर्थ्‍य के सामने बेबस सा हो गया है। वह इनकी हरकतों को चुपचाप देखते रहने पर मजबूर है जबकि यह उसकी आत्‍मा तक को कचोट रहे हैं।
इंसानी शक्‍ल अख्‍़तियार किए आखिर कहां से आये इतने चील, गिद्ध और कौए? कहां से आई इनमें इतनी शक्‍ति व इतना सामर्थ्‍य? इतनी प्रेत आत्‍माएं कब और कैसे एकत्र हो गईं?
सवाल बहुत से हैं लेकिन जवाब किसी का नहीं। जिन्‍हें जवाब देना है या जिनके ऊपर जवाबदेही है, वही सबसे बड़े सवाल बनकर आ खड़े हुए हैं।
गीता में भगवान श्रीकृष्‍ण ने कहा है कि आत्‍मा अजर और अमर है। उसे ना कोई अस्‍त्र-शस्‍त्र नुकसान पहुंचा सकता है और ना अग्‍नि जला सकती है। आत्‍मा कभी नहीं मरती। वह तो सिर्फ उसी प्रकार अपना चोला बदलती है जिस प्रकार इंसान वस्‍त्र बदलता है।
सब जानते हैं कि इंसानों की बढ़ती भीड़ ने जंगल और जंगली पशु एवं  पक्षियों के अस्‍तित्‍व पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगा दिया है। जंगल जितनी तेजी से खत्‍म हो रहे हैं, इंसान उतनी ही तेजी से बढ़ रहे हैं।
तो क्‍या हिंसक जंगली जानवर अब इंसानों का चोला पहन कर पैदा हो रहे हैं?
क्‍या इसीलिए इंसान से दिखने वाले जीवों में जंगली पशु-पक्षियों सी हिंसक प्रवृत्‍ति नजर आती है?
क्‍या यही वजह है कि आकाश में भी अब चील, गिद्ध और कौए जैसे मांसाहारी पक्षी दूर-दूर तक दिखाई नहीं देते?
यदि गीता में कहे गए श्रीकृष्‍ण के वचनों पर भरोसा करें तो सच्‍चाई यही लगती है।
हां! जो हिंसक आत्‍माएं अतृप्‍त रह जाती हैं और भटकने को बाध्‍य हैं, वह प्रेत योनि को प्राप्‍त कर आमजन की सुख-शांति नष्‍ट करती रहती हैं। उनका साया इंसानों को तरह-तरह से प्रताड़ित करता रहता है।
भारत के मामले में यह बात इसलिए अधिक उचित प्रतीत होती है क्‍योंकि यह दुनिया के उन मुल्‍कों में सबसे ऊपर है जहां जनसंख्‍या अनियंत्रित है और उसे नियंत्रित करने का कोई प्रयास किसी स्‍तर पर नहीं किया जा रहा। यह उन देशों में भी सबसे ऊपर है जहां जंगलात की बर्बादी तथा कंक्रीट के जंगली विस्‍तार को रोकने का कोई उपाय किसी स्‍तर पर नहीं किया जा रहा।
प्रकृति के इस असंतुलन से इंसानों की शक्‍ल में हिंसक जीव-जंतु पैदा हो रहे हैं और हिंसक जीव-जंतुओं को इंसान अपना निवाला बना रहा है। इंसानों की शक्‍ल लेकर पैदा होने वाले हिंसक जीव-जंतुओं की मौलिक प्रवृत्‍ति उनसे जानवरों सरीखे काम करा रही है और जानवरों को अपनी ज़िंदगी बचाना मुश्‍किल हो रहा है।  
प्रकृति के असंतुलन से उपजी विकृतियों का ही परिणाम है कि कभी केदारनाथ का सैलाब हजारों लोगों की ज़िंदगी छीन लेता है तो कभी भारी बारिश एवं चक्रवात अनगिनित लोगों की ज़िंदगी उजाड़ देता है।
गीता के श्‍लोकों पर भरोसा करें तो बढ़ते आतंकवाद व नक्‍सलवाद की भी यही वजह है अन्‍यथा कोई इंसान कैसे इतना हिंसक, इतना दयारहित हो सकता है जो बिना किसी कारण एकसाथ अनेक निर्दोष लोगों की जान ले डाले। कैसे कोई इतना सेंसलैस हो सकता है कि अपनी ही बहन-बेटियों की इज्‍ज़त अपनी हवस मिटाने के लिए तार-तार कर दे। कैसे कोई किसी राह चलती महिला पर झपट्टा मारकर उसे अपनी हवस मिटाने के लिए उठा ले जा सकता है, लेकिन हो यही रहा है। इसलिए हो रहा है कि जानवरों में किसी रिश्‍ते-नाते का कोई मतलब नहीं होता। जानवर अपनी ही संतति से शारीरिक संबंध स्‍थापित करते हैं। जानवर ही शारीरिक संबंध बनाने के लिए विपरीत सेक्‍स की इच्‍छा-अनिच्‍छा को महत्‍व नहीं देते।
दूसरी ओर माननीयों का तमगा प्राप्‍त हमारे जनप्रतिनिधि संविधान के मंदिर में बैठकर अपने ही साथियों पर हमलावर हो जाते हैं। कहने को यह देश दुनिया का सबसे विशाल लोकतंत्र है लेकिन कुर्सी की खातिर लोकतंत्र को खूंटी पर टांग दिया जाता है। वर्चस्‍व के लिए जंगली जानवरों सा व्‍यवहार करना कोई नई बात नहीं रह गई है। आज संसद में पैपर स्‍प्रे का इस्‍तेमाल किया गया, कल किसी घातक रसायन हथियार का भी प्रयोग किया जा सकता है। हो सकता है कि कभी कोई माननीय, मनोज वाजपेयी अभिनीत फिल्‍म 'शूल' के क्‍लाईमेक्‍स को साकार कर दे अथवा पूरी संसद को ही ब्‍लास्‍ट करके उड़ा दे।
तेलंगाना पर संसद में किए गए उपद्रव के बाद यह तो पता लग ही चुका है कि संसद के अंदर प्रवेश के लिए माननीयों को चैक करने का कोई नियम नहीं है। वह चाहें तो असलाह भी अंदर ले जा सकते हैं।
इन हालातों में इंसानी शक्‍लो-सूरत वाले कौन से माननीय कब अपनी मौलिक प्रवृत्‍ति का प्रदर्शन करने को हथियारों के साथ प्रवेश कर जाएं और कब देश को एक नया काला अध्‍याय लिखने को मजबूर कर दें, कहना मुश्‍किल है।
कहना तो यह भी मुश्‍किल है कि कंक्रीट के जंगल में विशाल एवं आलीशान बंगलों के अंदर निवास करने वाला कौन सा हिसंक परंतु माननीय जीव कब अपनी हवस मिटाने पर आमादा हो जाए। कुछ भी कहना मुश्‍किल है।
यह भी कि कहीं संसद पर मंडरा रहा प्रेतों का साया, उन्‍हीं अतृप्‍त माननीयों का हो जिनकी आत्‍माएं मनमाफिक कुर्सी पाने से पूर्व ही दुनिया से चल बसी हों और वही संसद की शांति भंग करने के लिए जिम्‍मेदार हों।
जो भी हो, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि आज तमाम लोग जो इंसान जैसे दिखाई देते हैं जरूरी नहीं कि वाकई इंसान ही हों। यह भी हो सकता है कि वह इंसान की शक्‍ल में भेड़िये हों और इसीलिए हर वक्‍त अपनी धूर्त चालों से अपना मकसद पूरा करने की जुगत भिड़ाते रहते हों।

बुधवार, 12 फ़रवरी 2014

मोदी उवाच और मथुरा की उम्‍मीदवारी का कलह?


(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष) अपने विशाल आकार के कारण भारत की राजनीति में यूं तो उत्‍तर प्रदेश ने हमेशा ही अपनी महत्‍ता बनाकर रखी है और हमेशा ही ऐसा माना जाता रहा है कि दिल्‍ली पर काबिज होने का रास्‍ता उत्‍तर प्रदेश से होकर जाता है लेकिन इस बार उत्‍तर प्रदेश की विशेष अहमियत है।

अहमियत की वजह है इस बड़े राज्‍य में उन दोनों बड़ी पार्टियों की एक लंबे समय से लगातार दुर्गति होना, जो राष्‍ट्रीय पार्टियां कहलाती हैं और जिनके बीच दिल्‍ली पर काबिज़ होने की असली जंग लड़ी जानी है।
तमाम राजनीतिक विशेषज्ञ भी यह मानते हैं कि उत्‍तर प्रदेश से 40 सीटें जीत लेने वाला राजनीतिक दल किंग नहीं तो किंगमेकर ज़रूर बनेगा और 50 से अधिक सीटें जीत ले जाने वाले के सिर ताज होगा।
चूंकि उत्‍तर प्रदेश में सपा व बसपा जैसी पार्टियों का अपना-अपना जनाधार है और राष्‍ट्रीय लोकदल भी किसी न किसी बैसाखी के सहारे कुछ सैंध लगा लेता है इसलिए कांग्रेस व भाजपा के लिए यह बड़ी चुनौती बन चुका है। यूपी फतह करना हर राजनीतिक दल के लिए टेढ़ी खीर है।
यहां यह समझ लेना और भी ज़रूरी है कि जिस तरह दिल्‍ली पर काबिज़ होने का रास्‍ता यूपी से होकर जाता है, उसी तरह यूपी में झंडा फहराने का रास्‍ता प्रशस्‍त होता है ब्रजमंडल की सीटों पर फतह प्राप्‍त करके।
ब्रजमंडल में मथुरा का एक विशेष स्‍थान है क्‍योंकि मथुरा को श्रीकृष्‍ण की जन्‍मभूमि का गौरव प्राप्‍त है। विश्‍व में मथुरा का धार्मिक स्‍वरूप उसे एक अलग पहचान दिलाता है।
यही वह पहचान है जिसकी वजह से भारतीय जनता पार्टी के लिए मथुरा काफी अहमियत रखता है और मथुरा की सीट पर विजय हासिल किए बिना यूपी में बड़ी सफलता हासिल करना मुश्‍किल है।
कांग्रेस की चर्चा करना यहां इसलिए बेमानी है क्‍योंकि उसने रालोद से लगभग तय हो चुके चुनाव पूर्व गठबंधन के तहत मथुरा को उसके खाते में डाल दिया है लिहाजा कांग्रेस यहां अपना उम्‍मीदवार खड़ा नहीं करेगी। पिछले लोकसभा चुनावों में भाजपा यह गलती कर चुकी है और उसका खामियाजा अब तक भुगत रही है।
इन हालातों में अब सबसे बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि भाजपा ऐसा कौन सा चेहरा मथुरा से उतारने जा रही है जो न केवल उसकी स्‍थानीय इकाई को स्‍वीकार हो बल्‍कि सिटिंग सांसद और रालोद के युवराज जयंत चौधरी को शिकस्‍त देने का माद्दा रखता हो।
सर्वविदित है कि कृष्‍ण की जन्‍मभूमि का गौरव प्राप्‍त मथुरा जनपद के भाजपाई जबर्दस्‍त अंतर्कलह के शिकार हैं। गुटबाजी और अंतर्कलह के चलते मथुरा में उम्‍मीदवारी का चयन करना पार्टी के लिए कभी आसान नहीं रहा। चौधरी तेजवीर सिंह की हार के बाद यह काम ज्‍यादा मुश्‍किल हो गया और इसीलिए 2009 के लोकसभा चुनावों में मथुरा की सीट पार्टी को रालोद के लिए छोड़नी पड़ी।
फिलहाल यह कहा जा सकता है कि भाजपा को मथुरा में अपना वजूद नए सिरे से कायम करना होगा और उसके लिए कोई ऐसा उम्‍मीदवार सामने लाना होगा जो पार्टी के लिए लगभग बंजर हो चुकी ब्रजभूमि को फिर से उर्वरा बना सके।
पार्टी सूत्रों के हवाले से मिल रही खबरों पर भरोसा करें तो संभावित उम्‍मीदवारों की सूची में सबसे ऊपर नाम चल रहा है पूर्व में तीन बार सांसद रह चुके चौधरी तेजवीर सिंह का। लेकिन तेजवीर सिंह का सर्वाधिक विरोध पार्टी के स्‍तर पर ही किया जा रहा है, और वो भी सजातीय नेताओं द्वारा। चूंकि टिकट पाने की दौड़ में दूसरे जाट नेता भी हैं इसलिए खेमेबंदी अधिक है।
चौधरी तेजवीर सिंह के विरोध का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि उनके बावत सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर एक बैनर बनाकर चस्‍पा किया गया है। इस बैनर की हैडिंग है- ''मथुरा के पूर्व सांसद चौधरी तेजवीर सिंह के ऊपर जनता के गंभीर आरोप''।
इस बैनर में लिखा है कि मथुरा लोकसभा से 3 बार सांसद बनने के बावजूद तेजवीर सिंह ने जनता के लिए 3 काम नहीं किए जबकि अपने लिए 300 काम किए।
तेजवीर सिंह पर क्रमबद्ध तरीके से लगाये गये आरोपों के अनुसार सांसद बनने से पूर्व वह मात्र 100 गज जमीन पर बने मकान में रहते थे जबकि आज 36000 स्‍क्‍वायरफीट में बने आलीशान बंगले के मालिक हैं।
सांसद बनने से पहले वह मारुति 800 कार में चला करते थे परंतु आज उनके पास टाटा सफारी व होंडा सिटी जैसी कई लग्‍ज़री गाड़ियां हैं।
सांसद बनने से पूर्व वह मात्र कुछ लाख की संपत्‍ति के मालिक थे परंतु आज अरबों में खेल रहे हैं।
सांसद बनने से पहले चौधरी तेजवीर सिंह का कोई खास व्‍यापार नहीं था लेकिन अब एक बहुत बड़े कॉलेज, पेट्रोल पंप तथा गैस एजेंसी के संचालक हैं और जयपुर में काफी बड़ा रेजीडेंसी प्रोजेक्‍ट खड़ा कर रहे हैं।
बैनर मैं जनता से पूछा गया है कि 15 सालों से राजनीति में निष्‍क्रिय रहे ऐसे पूर्व सांसद तेजवीर सिंह को क्‍या इस बार लोकसभा प्रत्‍याशी बनाया जाना चाहिए?
बैनर में ही दूसरा सवाल भाजपा हाईकमान से किया गया है कि जनता के बीच एक फ्लॉप सांसद की छवि वाले चौधरी तेजवीर सिंह को फिर एक बार उम्‍मीदवार बनाने की सोचकर भी क्‍या वह गलती नहीं कर रहे ?
लीजेण्‍ड न्‍यूज़ ने अपने स्‍तर से जब इस बैनर को फेसबुक पर चस्‍पा करने वालों की जानकारी की तो पता लगा कि इसके पीछे पार्टी के ही लोग हैं, न कि कोई विपक्षी दल।
चौधरी तेजवीर सिंह से इस बैनर की असलियत पूछने पर उन्‍होंने कहा कि उम्‍मीदवार की घोषणा हो जाने से पहले मैं किसी विवाद का हिस्‍सा नहीं बनना चाहता इसलिए बैनर में लगाये गये आरोपों का जवाब नहीं दे रहा। समय आने पर सभी आरोपों का जवाब दूंगा।
उन्‍होंने कहा कि आपने पूछा है इसलिए आपको बता देता हूं कि बैनर के माध्‍यम से लगाये गये आरोपों में कोई सच्‍चाई नहीं है और लगभग सभी आरोप बेबुनियाद हैं। मेरी संपत्‍ति के बावत भी जो जानकारी दी गई है, वह झूठ का पुलिंदा है।
पूर्व सांसद तेजवीर सिंह से जब यह पूछा गया कि पार्टी में स्‍थानीय स्‍तर पर व्‍याप्‍त अंतर्कलह व गुटबाजी के चलते हाईकमान द्वारा किसी बाहरी प्रत्‍याशी को मथुरा से खड़ा करना आपको स्‍वीकार होगा, तो उनका जवाब था कि बेहतर होगा पार्टी किसी स्‍थानीय कार्यकर्ता को उम्‍मीदवार बनाए।
बाहरी व्‍यक्‍ति की उम्‍मीदवारी पर उनका कहना था कि मुझे आजतक जो कुछ प्राप्‍त है, वह पार्टी का ही दिया हुआ है इसलिए पार्टी का हर निर्णय मान्‍य है। मैं पार्टी का अनुशासित सिपाही हूं और जीवनभर पार्टी के प्रति समर्पित रहूंगा।
उल्‍लेखनीय है कि तेजवीर सिंह सहित मथुरा की उम्‍मीदवारी के लिए जिन नामों की चर्चा होती रही है उनमें स्‍थानीय स्‍तर से राजेश चौधरी, चौधरी प्रणतपाल, रविकांत गर्ग व एस. के. शर्मा आदि हैं जबकि बाहरी नेताओं में भाजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष राजनाथ सिंह के साढू भाई और पेशे से चार्टर्ड एकाउंटेंट अरुण सिंह, प्रख्‍यात सिने अभिनेत्री हेमा मालिनी तथा अभिनेता सनी देओल का नाम प्रमुख हैं। हेमा मालिनी तो कह भी चुकी हैं कि यदि पार्टी मुझे यहां से चुनाव लड़ने का मौका देती है तो मैं यह मौका गंवाउंगी नहीं।
बहरहाल, बात चाहे किसी स्‍थानीय व्‍यक्‍ति को उतारने की हो या बाहरी को लेकिन मथुरा के लिए उम्‍मीदवार का चयन करना आसान नहीं है। स्‍थानीय के चयन में अंतर्कलह व गुटबाजी बड़ा कारण है तो बाहरी के चयन में पार्टी के आम कार्यकर्ता सहित जनभावना आड़े आती है। बाहरी नेताओं को लेकर मथुरा की जनता का अनुभव बहुत कसैला रहा है। बात चाहे कभी हरियाणा से यहां आकर चुनाव जीतने वाले मनीराम बागड़ी की हो या फिर भगवा वस्‍त्रधारी महामंडलेश्‍वर सच्‍चिदानंद हरिसाक्षी की। रही सही कसर पूरी कर दी वर्तमान सांसद और रालोद के युवराज जयंत चौधरी ने। आमजन पूरे पांच साल अपने इस प्रतिनिधि की शक्‍ल देखने तक को तरसता रहा, समस्‍याओं के समाधान की बात तो करे कौन।
ब्रजवासियों के लिए मां समान पूज्‍यनीय जिस यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने का वायदा करके जयंत चौधरी ने रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज की, उस यमुना की दुर्दशा को लेकर वह कभी मुखर नहीं हुए।
भाजपा के लिए उनकी यह निष्‍क्रियता भी परेशानी का कारण होगी क्‍योंकि पिछले चुनाव में जयंत को भाजपा का ही समर्थन प्राप्‍त था।
कुल मिलाकर निष्‍कर्ष यही निकलता है कि मथुरा में मोदी फैक्‍टर से कहीं अधिक उम्‍मीदवारी का चयन भाजपा को पुनर्जीवत करने या ना कर पाने में बड़ी भूमिका निभायेगा।
देखना यह है कि भाजपा इस इधर कुंआ और उधर खाई वाली स्‍थिति से कैसे उबरती है और कौन सा ऐसा चेहरा सामने लाती है जो मोदी के लिए दिल्‍ली की दूरी कम करने में सहायक हो सके।

शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़....

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़। जुल्‍म की छांव में दम लेने पर मजबूर हैं हम।।
और कुछ देर सितम सह लें, तड़प लें, रो लें। अपने अजदाद की मीरास है माज़ूर हैं हम ।।
जिस्‍म पर कैद है जज्‍ब़ात पे ज़ंजीरें हैं। फ़िक्र महबूस है गुफ़तार पे ताज़ीरें हैं।।
लेकिन अब ज़ुल्‍म की मियाद के दिन थोड़े हैं। इक ज़रा सब्र कि फ़रियाद के दिन थोड़े हैं।।

प्रसिद्ध पाकिस्‍तानी शायर फ़ैज अहमद फ़ैज ने सन् 1951 के दौरान ये लाइनें तब लिखीं थीं जब उन्‍हें लियाकत अली खां की सरकार का तख्‍ता पलट करने की साजिश के जुर्म में  गिरफ्तार कर लिया गया था।
फ़ैज साहब की दर्द में डूबी पर उम्‍मीद से भरीं ये लाइनें आज इसलिए याद आ रही हैं क्‍योंकि भारत लोकतंत्र का एक और चुनावी उत्‍सव मनाने जा रहा है। चुनावों के मद्देनजर समूची राजनीतिक जमात यह साबित करने पर आमादा है कि देश तथा देशवासियों का भाग्‍य सिर्फ और सिर्फ उनके हाथों में सुरक्षित है।
एक हफ्ता भी नहीं बीता जब दिल्‍ली में अल्‍पसंख्‍यकों के लिए आयोजित कार्यक्रम के दौरान एक मुस्‍लिम युवक को सुरक्षाकर्मी इसलिए मुंह बंद करके उठा ले गए क्‍योंकि  कुछ मुद्दों को लेकर वह सीधा प्रधानमंत्री से मुखातिब हुआ था।
इस कार्यक्रम में न सिर्फ प्रधानमंत्री, बल्‍कि सोनिया गांधी एवं फारुक अब्‍दुल्‍ला भी मंचासीन थे।
एक हफ्ता भी नहीं बीता जब राहुल गांधी ने एक टीवी चैनल को दिए अपने पहले इंटरव्‍यू में सिख दंगों पर माफी मांगने से इसलिए इंकार कर दिया क्‍योंकि वह उस समय बहुत छोटे थे। वह भूल गए कि अघोषित ही सही, पर वह प्रधानमंत्री पद के लिए कांग्रेसी उम्‍मीदवार हैं। भूल गए कि वह उसी कांग्रेसी विरासत के फिलहाल एकमात्र वारिस हैं जिसके कुछ नेताओं की 84 के सिख नरसंहार में संलिप्‍तता को उन्‍होंने स्‍वीकार किया।
आश्‍चर्यनजक रूप से वह यह तक भूल गए कि यदि कांग्रेस की महान विरासत के वह वारिस हैं और मौके-बेमौके अपने परिवार के बलिदान को कैश करने में लगे रहते हैं तो फिर उनके पापों का बोझ ढोने से इंकार कैसे कर सकते हैं।
इधर चुनावी दौर में भाजपा भी यह साबित करने पर तुली है कि देश व देशवासियों के लिए एकमात्र विकल्‍प है। यह वही भाजपा है जिसने अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में खुद को कांग्रेसी संस्‍कृति का वाहक बनकर अपनी मौलिकता खो दी थी और उसी के परिणाम स्‍वरूप दोबारा सत्‍ता का शिखर छूने को तरस गई।
शायद यही कारण है कि आज 'मोदी ही भाजपा और भाजपा ही मोदी' का नारा फ़िज़ा में गूंज रहा है क्‍योंकि बाकी भाजपाइयों पर आसानी से भरोसा कर पाना मुश्‍किल है, यह बात भाजपा भली प्रकार जान व समझ रही है।
सवाल यह नहीं है कि सत्‍ता किसके हाथों में जाए और कौन उसके सोपान पर प्रतिष्‍ठापित हो, सवाल यह है कि क्‍या इसी व्‍यवस्‍था का नाम लोकतंत्र है और क्‍या सामंतवाद की परिभाषा इससे इतर है?
जहां अपने ही देश के किसी नेता से कोई इसलिए सवाल नहीं पूछ सकता क्‍योंकि वह प्रधानमंत्री के पद पर काबिज है और इसलिए उसे मुंह बंद करके बाहर ले जाया जाता है कि वह 'सो कॉल्‍ड' 'प्रोटोकॉल' को फॉलो नहीं कर रहा?
कल ही की बात है जब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि आखिर यह विशिष्‍टजन शब्‍द आया कहां से, किसने इसे ईजाद किया। संविधान तो ऐसे किसी शब्‍द का इस्‍तेमाल करने की इजाजत नहीं देता।
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से दो हफ्तों में इस वीवीआईपी कल्‍चर पर जवाब मांगा है लेकिन क्‍या सरकार इसका जवाब देगी?
जिस प्रश्‍न का जवाब सन् 1947 के बाद से लगातार देश की जनता मांग रही है और किसी सरकार ने जवाब नहीं दिया तो दिन गिन रही वर्तमान सरकार से ऐसी उम्‍मीद करना बेमानी है।
बहरहाल, देश की जनता पर चुनावी खुमार चढ़ने लगा है और राजनीतिक दल उसके रंग में पूरी तरह रंग चुके हैं।
62 साल पहले फ़ैज साहब जेल की सलाखों के पीछे से कहते हैं-
अर्सा-ए-दहर की झुलसी हुई वीरानी में। हमको रहना है पर यूँ ही तो नहीं रहना है।।
अजनबी हाथों के बेनाम गराँबार सितम। आज सहना है हमेशा तो नहीं सहना है।।
दिल की बेसूद तड़प जिस्म की मायूस पुकार। चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़।।
बेशक, उनके अपने मुल्‍क पाकिस्‍तान पर फ़ैज साहब की उम्‍मीद खरी नहीं उतरती और पाकिस्‍तान की अवाम आज भी 1951 के हालातों में जीने पर मजबूर है लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि फ़ैज साहब की उम्‍मीद मर चुकी है।
फ़ैज साहब इस दुनिया से भले ही 29 साल पहले कूच कर गए लेकिन उनकी उम्‍मीदें पाकिस्‍तान की अवाम के दिलों में अब भी ज़िंदा हैं क्‍योंकि उम्‍मीदें मरा नहीं करतीं।
भारत के तथाकथित भाग्‍य विधाताओं को भी समझना होगा कि लोकतंत्र के छद्म स्‍वरूप और फिरंगियों की कार्बन कापियों से आमजन बुरी तरह उकता चुका है। वह समझ चुका है कि अब सत्‍ता बदलने से कुछ नहीं होने वाला। अब जरूरत है व्‍यवस्‍था बदलने की।
उस व्‍यवस्‍था को बदलने की जो स्‍वतंत्रता की आड़ में 'एज इट इज' एक्‍सेप्‍ट कर ली गई और जिसके कारण 'गुलामी' यथास्‍थिति को प्राप्‍त है। जिसके कारण कोई अपने ही चुने हुए नुमाइंदों से सवाल पूछने की हिमाकत नहीं कर सकता और जिसके कारण देश की सर्वोच्‍च अदालत को सरकार से यह पूछना पड़ता है कि आखिर यह वीवीआईपी कल्‍चर है क्‍या, कहां से आया है यह जबकि संविधान में तो इसका कहीं कोई उल्‍लेख नहीं है।
अपने मान-अपमान को प्रोटोकॉल के बहाने संसद से जोड़ने वाले और संसद के अंदर बैठकर हर रोज संसद की गरिमा को तार-तार करने वालों को अब यह समझना होगा कि  ''ज़िंदगी किसी मुफ़लिस की क़बा नहीं है जिसमें हर वक्‍त दर्द के पैबंद लगाकर धोखा दिया जाना संभव हो।
 चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़......
चंद रोज बाद होने वाले चुनाव का नतीजा चाहे जो हो लेकिन यह तय है कि इस बार का चुनाव भविष्‍य को रेखांकित जरूर करेगा। केवल आमजन के भविष्‍य को नहीं, उन खास लोगों के भविष्‍य को भी जो सत्‍ता को अपनी बपौती मान बैठे हैं और जिनके लिए आमजन उनके इशारों पर नाचने वाली कठपुतलियों से अधिक कुछ नहीं रहा।
फ़ैज साहब के शब्‍द न तो सलाखों में कैद रहने को बाध्‍य हैं और ना सामंतवादी सोच के गुलाम बने रहने को अभिशप्‍त। वह सीमा के उस पार से भी बिना पासपोर्ट तथा वीजा के अपना सफर तय कर लेते हैं और सीमा के इस पार अपना वजूद कायम रखते हैं।
इसलिए इंतजार कीजिए, कहानी अभी खत्‍म नहीं हुई।

सोमवार, 27 जनवरी 2014

...तो भाई द्वारा बहन को दिया गया तोहफा है विवादित जमीन

नई दिल्‍ली। 
कांग्रेस उपाध्यक्ष और अगला पीएम बनने की रेस में शामिल राहुल गांधी ने हरियाणा में अपनी वह जमीन बहन प्रियंका गांधी को तोहफे में दे दी थी, जो उनके जीजा रॉबर्ट वॉड्रा के प्लॉट के ठीक बराबर में है। यह मामला करीब छह साल पुराना है। राहुल ने हरियाणा में पलवल जिले के हसनपुर गांव में 3 मार्च 2008 को छह एकड़ जमीन खरीदी थी, जिसके लिए 26.47 लाख रुपए अदा किए गए।
इसी दिन रॉबर्ट वॉड्रा ने हसनपुर में खेती की जमीन खरीदी थी। यह करीब नौ एकड़ थी और इसके लिए उन्होंने 36.90 लाख रुपए चुकाए। 2012 में राहुल ने यह प्रियंका को तोहफे में दे दी।
तोहफे की इस बात का खुलासा ऐसे वक्‍त हुआ है, जब इसी साल हरियाणा में खरीदी गई वॉड्रा की प्रॉपर्टी विवादों में घिर गई थी। यह विवाद रियल एस्टेट की दिग्गज कंपनी डीएलएफ के साथ एक डील को लेकर खड़ा हुआ था।
राहुल गांधी ने 26 जुलाई 2012 को यह जमीन अपनी बहन को तोहफे में दी थी और तीन महीने बाद अक्टूबर में हरियाणा के आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने वॉड्रा के कुछ अन्य प्लॉट का म्यूटेशन रद्द कर दिया।
हुड्डा की अगुवाई वाली हरियाणा की कांग्रेस सरकार ने वॉड्रा और डीएलएफ के बीच हुई डील को 'निजी ट्रांजेक्‍शन' करार दिया था।
यह दिलचस्प है कि हसनपुर की जमीन के लिए एक ही पावर ऑफ अटॉर्नी धारक महेश सिंह नागर के जरिए राहुल गांधी और रॉबर्ट वॉड्रा के लिए दो अलग-अलग सेल डीड तैयार की गई थीं।
12 अगस्‍त 2012 में लोकसभा सचिवालय को सौंपे एक दस्तावेज में राहुल गांधी ने कहा, "मैंने 51 कनाल की खेती की जमीन अपनी बहन ‌प्रियंका गांधी वॉड्रा को दी और इसके लिए पैसे का कोई लेन-देन नहीं हुआ।"
इसमें आगे लिखा है, "क्योंकि यह भाई की तरफ से एक बहन को दिया गया तोहफा है इसलिए कृषि जमीन के ट्रांसफर को लेकर किसी तरह की रकम पर कोई गौर नहीं किया गया।"
सचिवालय में 2013 में दिए गए एक और डिक्‍लेरेशन के मुताबिक राहुल ने गुड़गांव की सिग्नेचर टावर्स-2 में दो कमर्शियल प्रॉपर्टी खरीदीं। अक्टूबर 2010 में 1.44 करोड़ रुपए और 5.36 करोड़ रुपए में इनकी बुकिंग की गई थी।
उन्होंने कुल अब तक दो किस्त जमा कराई हैं। हालांकि, इसमें प्रॉपर्टी का साइज नहीं बताया है। राहुल ने गुड़गांव की प्रॉपर्टी खरीदने से पहले दिल्ली के साकेत स्थित मेट्रोपोलेटिन मॉल अपनी दो दुकान 5.28 करोड़ रुपए में बेच दी। उन्होंने 2006 में ये दुकान खरीदी थीं।
राहुल लोकसभा के उन 20 सांसदों में शामिल हैं, जिन्होंने 15वीं लोकसभा के दौरान इस तरह का हलफनामा देने के बाद अपनी संपत्ति और देनदारी को अपडेट किया। पहले शपथपत्र में उन्होंने हसनपुर की जमीन की जानकारी दी थी।
-एजेंसी

शिकागो की महर्षि यूनिवर्सिटी से 163 वैदिक पंडित लापता

शिकागो। 
उत्तर भारत के गांवों से वैदिक पंडित के रूप में प्रशिक्षित किए जाने के लिए लाए गए कम से कम 163 किशोर अमेरिका में पिछले एक वर्ष से लापता हैं। इन किशोरों को महर्षि महेश योगी द्वारा स्थापित दो संस्थानों द्वारा प्रशिक्षित किया जाना था। शिकागो से प्रकाशित होने वाली साप्ताहिक पत्रिका "हाइ इंडिया" के ताजा अंक में प्रकाशित एक रपट के मुताबिक, 1,050 भारतीय किशोरों को आयोवा के फायरफील्ड स्थित महर्षि वैदिक सिटी और महर्षि यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट लाया गया था, जिनमें से करीब 163 का पिछले एक वर्ष से अता-पता नहीं है। लापता किशोरों में कुछ की उम्र मात्र 19 वर्ष है।
वैदिक सिटी और यूनिवर्सिटी, दोनों संस्थानों को महर्षि महेश योगी के परिवार के लोग चलाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इन संस्थाओं का प्रबंधन करने वालों ने लापता लोगों की तलाश करने की भी जहमत नहीं उठाई है।
यहां तक कि भारतीय मूल के आध्यात्मिक गुरू द्वारा स्थापित अनगिनत शिक्षण केंद्रों में से एक ग्लोबल काउंट्री ऑफ वर्ल्‍ड पीस (जीसीडब्ल्यूपी) को भी "विश्व शांति पेशेवर" कहे जाने वाले इन वैदिक अध्येताओं की दुर्दशा या लापता होने के बारे में कुछ भी नहीं पता है। शिक्षण केंद्र के अधिकारियों ने बताया, ""या तो आव्रजन उद्देश्य के लिए या फिर अपने अमरीकी सपनों को पूरा करने के लिए वे यहां से निकल भागे।""
-एजेंसी

रविवार, 26 जनवरी 2014

उत्‍सव किसका... 'गण' का... या 'तंत्र' का ?

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
अगर सन्, संवत्, तारीख और कलेण्‍डर की बात करें तो देश आज अपना 65 वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। पर यदि बात करें उपलब्‍धियों की तो साढ़े छ: दशक का कालखण्‍ड बहुत से सवाल खड़े करता है। संभवत: यही वजह है कि आज के दिन भी जब कोई कुछ लिखने या याद करने बैठता है तो उसके हिस्‍से में उपलब्‍धियां इतनी कम आती हैं कि वह न चाहते हुए उदासी का अहसास कराए बिना नहीं रह पाता। वह खुद को गौरवान्‍वित महसूस करना चाहता है और देशवासियों को आशावान रहने का संदेश देना चाहता है परंतु ऐसा भी नहीं कर पाता।
शायद इसीलिए आज के अखबारों में गणतंत्र को लेकर जितने भी लेख समाज के विभिन्‍न वर्गों से आए बुद्धिजीवियों ने लिखे हैं, उनमें गणतंत्र दिवस की खुशी कम और एक किस्‍म की टीस अधिक महसूस होती है।
कहने को एक विशेष वर्ग इसे बुद्धिजीवियों की नकारात्‍मक सोच या उपलब्‍धियों को कम आंकने की प्रवृत्‍ति कहकर खारिज कर सकता है परंतु ऐसा है नहीं।
यूं भी 'शिखर' किसी का हो, वहां से धरातल की सच्‍चाई का अंदाज लगा पाना कठिन होता है और यही दिक्‍कत है हमारे शासक वर्ग की। वह बाढ़ की विभीषिका को भी हेलीकॉप्‍टर में बैठकर देखता है। वह नुकसान का आंकलन आंकड़ों से करता है, न कि नुकसान उठाने वालों के बोझ से।
सत्‍ता के शीर्ष पर किसी न किसी रूप में जमे रहकर जब उपलब्‍धियों को आंका जाता है तो उसमें कहीं न कहीं सत्‍ता का सुख खु़द-ब-खु़द समाहित होता है जबकि ज़मीनी हकीकत उससे कहीं बहुत अधिक तल्‍ख़ होती है।
कड़वा सच यह है कि सारा देश जैसे आधा गिलास भरा और आधा गिलास खाली के तर्क-वितर्क में उलझा है। ईमानदारी से कोई यह कहने को तैयार नहीं कि बेशक आधा गिलास भरा है पर आधा गिलास खाली भी है और खाली गिलास को भरने की जरूरत इसलिए है क्‍योंकि 65 सालों में इसे भर जाना चाहिए था, क्‍योंकि हमारी जरूरत है उसका जल्‍द से जल्‍द भरा जाना।
जब हम बात करते हैं भ्रष्‍टाचार, दुराचार, अनाचार, गरीबी, भुखमरी, अव्‍यवस्‍थाओं एवं कुव्‍यवस्‍थाओं की तो तुलनात्‍मक अध्‍ययन करने लगते हैं दूसरे मुल्‍कों का, उदाहरण देने लगते हैं वहां व्‍याप्‍त समस्‍याओं का लेकिन जब बात आती है तरक्‍की की तो हम अपनी परेशानियों का रोना लेकर बैठ जाते हैं। तब हम तुलनात्‍मक अध्‍ययन करते हैं विपक्षी पार्टियों के कार्यकाल से, उदाहरण देने लगते हैं उनकी ख़ामियों का और यह साबित करने का प्रयास करते हैं कि किस तरह हम अपने प्रतिद्वंदी से हर मायने में श्रेष्‍ठ हैं। प्रतिस्‍पर्धा तो हो रही है लेकिन अच्‍छाई के लिए नहीं, बुराई के लिए।
कौन नहीं जानता कि गणतंत्र दिवस और स्‍वतंत्रता दिवस एक रस्‍म अदायगी बनकर रह गए हैं। इनके आयोजनों में वह खुशी नहीं है जो होनी चाहिए। मन से शायद ही कोई अब इन राष्‍ट्रीय पर्वों को मनाता हो क्‍योंकि गण से तंत्र इतनी दूर हो गया जितना आसमान दूर है ज़मीन से।
2013 में गण ने तंत्र को झकझोरा जरूर और उसी के परिणामस्‍वरूप पांच राज्‍यों के चुनाव परिणामों ने एक कंकड़ उछालकर सत्‍ता की राजनीति में ख़लल डाल दिया लेकिन इतना काफी नहीं है।
काफी होता तो शह और मात के लिए षड्यंत्रों का खेल पूरी शिद्दत से न खेला जाता। 65 सालों की तुलना एक महीने से भी कम समय के शासन से नहीं की जाती। 'सबक सीखने' को 'एंज्‍वाय' नहीं किया जाता।
इस सबके बावजूद गण के पास तंत्र के अधीन रहने के सिवा चारा क्‍या है। तंत्र की खुशी में खुश होने के अतिरिक्‍त वह कर क्‍या सकता है। 2014 के लोकसभा चुनाव सामने हैं। यह भी एक उत्‍सव है। देखना यह है कि इस बार का यह उत्‍सव आने वाले राष्‍ट्रीय पर्वों को एक गिनती बनाए रखता है या फिर सही मायनों में गौरवान्‍वित करने का, खुशी मनाने का अवसर प्रदान करता है। जय हिंद! जय भारत!

बुधवार, 22 जनवरी 2014

अफसोस..... मुलायम हैं कि मानते ही नहीं

डॉ. राममनोहर लोहिया के समाजवाद की परिभाषा को परिवारवाद में समाहित कर देने वाले समाजवादी पार्टी के मुखिया मास्‍टर मुलायम सिंह यादव, अब उसे व्‍यक्‍तिवाद तक सीमित करने में लगे हैं। कभी साइकिल से सैफई की गलियों को नापने वाले मुलायम अब अपनी महत्‍वाकांक्षा पूरी करने पर इस कदर आमादा हैं कि उन्‍हें दिन-रात पीएम की कुर्सी के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा। वह जहां जाते हैं, वहीं कहने लगते हैं कि बेटे को तो सीएम बना दिया अब बाप को क्‍या बनाओगे। ऐसा लगता है जैसे मुलायम ने केवल मांगने की आदत डाल ली है और देना पूरी तरह भूल चुके हैं।
कांग्रेस को सहारा देते-देते कांग्रेसी कल्‍चर का रंग उनके ऊपर इस कदर चढ़ा है कि आज वह कांग्रेसियों की ही भाषा बोलते हैं। वही क्‍यों, उनके पुत्र और उत्‍तर प्रदेश जैसे विशाल सूबे के मुखिया अखिलेश भी अब कांग्रेसी जुबान बोलने से परहेज नहीं करते। वह कांग्रेसी रहनुमाओं की तरह प्रदेश की जनता को यह बताने लगे हैं कि उन्‍होंने दिया क्‍या-क्‍या है, यह नहीं गिनाते कि लिया कितना है।
बेशक, सीबीआई के भय से मुक्‍ति की चाहत ने मुलायम के समाजवाद को सांप्रदायिकता की आड़ में कांग्रेस की ढपली बजाने पर मजबूर किया हो परंतु जनता हर समझौते का हिसाब मांगती है।
यही कारण है कि आज कांग्रेस के साथ खड़े होकर पैदा किया गया सांप्रदायिकता के भय का भूत भी काम नहीं आ रहा। अल्‍पसंख्‍यक समुदाय को सारा खेल समझ में आ चुका है। उसे मुलायम के समाजवाद की परिभाषा भी समझ में आ गई है और उसकी सांप्रदायिकता का मतलब भी।
खुद को ठगा हुआ महसूस करने वाला अल्‍पसंख्‍यक समुदाय अब मौकापरस्‍ती के मायने समझाने को 2014 के चुनावों की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा है।
कहते हैं कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती लेकिन जो भरे सावन में अंधा हुआ हो, उसका इलाज भी किया जाए तो क्‍या। उसे तो चारों ओर वोटों की लहलहाती फसल ही दिखाई देगी।
उत्‍तर प्रदेश अपने अब तक के सर्वाधिक बुरे दौर से गुजर रहा है। कानून-व्‍यवस्‍था ही नहीं, सब-कुछ बदहाल है। लगता है जैसे सरकार नाम की कोई चीज है ही नहीं और समाजवादी पार्टी, कोई पार्टी न होकर एक ऐसे परिवार का नाम है जो यूपी को अपनी निजी जागीर तथा जनता को अपना गुलाम समझ बैठा है।
यह तो तय है कि 2014 का लोकसभा चुनाव राजनीति की कोई नई इबारत लिखेगा और राजनीतिज्ञों को नया सबक सिखायेगा लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई आमूल-चूल परिवर्तन होने जा रहा है।
भाजपा अध्‍यक्ष राजनाथ सिंह ने सही कहा है कि जनता अब सत्‍ता नहीं, व्‍यवस्‍था परिवर्तन चाहती है। यदि राजनाथ सिंह या भाजपा ने इसे एक राजनीतिक जुमले की तरह नहीं उछाला है और वाकई उन्‍हें जनआकांक्षा व जनभावना समझ में आ चुकी है तब तो ठीक, अन्‍यथा भाजपा के हाथ सत्‍ता भले ही आ जाए लेकिन जनाधार हासिल नहीं होगा।
फिर वही होगा, जिसका डर आज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सता रहा है। जिस तरह मनमोहन को डर है कि इतिहास उनके प्रति बेरहम न हो जाए, उसी तरह भाजपा के भी इतिहास बन जाने का ही भय पैदा हो जायेगा।
रही बात मुलायम की महत्‍वाकांक्षा और उनके सपनों में समा चुकी पीएम पद की कुर्सी की, तो उसका अहसास उन्‍हें तुरंत हो जायेगा बशर्ते वह परिवार से बाहर झांककर देख लें।
अपने समाजवाद को उन्‍होंने इतना ओछा कर दिया है कि यूपी में सत्‍ता का आधा कार्यकाल पूरा नहीं हुआ और वह बुरी तरह हांफने लगा है।
आश्‍चर्य की बात यह है कि कभी प्राइमरी के मास्‍टर रहे मुलायम सिंह, आज प्रदेश की प्राथमिकता को समझने के लिए तैयार नहीं हैं और देश की कमान संभालने को बेताब हैं। प्रधानमंत्री बनने की चाहत ने उन्‍हें कहीं का नहीं छोड़ा।
समय बीतता जा रहा है, दुंदुभि बजने को है परंतु सत्‍ता मद में चूर मुलायम सिंह समाजवाद को इतना सूक्ष्‍म कर चुके हैं जिसे देख पाने में संभवत: माइक्रोस्‍कोप भी मदद न कर पाए। समाजवाद का उनके द्वारा तैयार किया गया नया कलेवर और उनके द्वारा ही गढ़ी गई नई परिभाषा उनके सपनों को पूरा करने में सबसे बड़ी बाधा है। अफसोस...... इस सब के बाद भी मुलायम हैं कि मानते ही नहीं।   
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