मंगलवार, 22 अक्टूबर 2019

अपने इन हत्‍यारों को तू कभी क्षमा मत करना मां!

तारीख 20, महीना मार्च, दिन सोमवार, सन् 2017
ये वो दिन है, जब नैनीताल हाई कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। अपने इस फैसले में हाई कोर्ट ने जनमानस से मां का दर्जा प्राप्‍त गंगा और यमुना नदी को वैधानिक व्यक्ति का दर्जा देते हुए लिखा था- इन दोनों नदियों को क्षति पहुंचाना अब किसी इंसान को नुकसान पहुंचाने जैसा माना जाएगा।
ऐसे में आईपीसी के तहत आपराधिक केस चलेगा और आरोपी को उसी तरह सजा सुनाई जाएगी जिस तरह किसी व्‍यक्‍ति को क्षति पहुंचाने पर सुनाई जाती है।
अपने फैसले में हाई कोर्ट ने गंगा-यमुना के साथ-साथ इनकी सहायक नदियों, उपनदियों, समस्त जल धाराओं और यहां तक कि पानी के उनसे जुड़े समस्‍त प्राकृतिक स्रोतों को भी वैधानिक व्यक्ति का दर्जा देने को कहा।
न्यायमूर्ति राजीव शर्मा व न्यायमूर्ति आलोक सिंह की खंडपीठ ने यूपी और उत्तराखंड की परिसंपत्तियों के बंटवारे से संबंधित एक जनहित याचिका का निस्‍तारण करते हुए यह आदेश दिया। यह याचिका देहरादून निवासी मोहम्मद सलीम ने दायर की थी।
हाई कोर्ट के आदेश में यह भी निहित था कि गंगा-यमुना को दिए गए अधिकार का उपयोग 3 सदस्यीय एक समिति करेगी। यानी यह समिति इन नदियों को क्षति पहुंचाए जाने से संबंधित सभी मुकदमों की पैरवी करेगी।
इस समिति में उत्तराखंड के मुख्य सचिव, नैनीताल हाई कोर्ट के महाधिवक्ता और नमामि गंगे प्राधिकरण के महानिदेशक शामिल किए गए।
अदालत ने 20 मार्च के अपने इस आदेश में स्पष्ट किया था कि ये तीनों अधिकारी आगे से गंगा के प्रति जवाबदेह भी होंगे।
तारीख 28, महीना अप्रैल, दिन शुक्रवार, सन् 2017
नैनीताल हाई कोर्ट से ‘मानव’ दर्जा मिलने के बाद इस दिन पहली बार गंगा नदी को नोटिस जारी किया। हाई कोर्ट ने ऋषिकेश में प्रस्तावित कूड़ा निस्तारण ग्राउंड (ट्रेंचिंग ग्राउंड) को लेकर गंगा का पक्ष जानना चाहा।
हालांकि इस आदेश को उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जिसके बाद जुलाई 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने गंगा-यमुना को जीवित इंसान का दर्जा देने संबंधी फैसला रद्द कर दिया जबकि नैनीताल हाई कोर्ट ने आदेश किसी जल्‍दबाजी या भावावेश में नहीं सुनाया था।
न्यूजीलैंड की नदी बनी नजीर
याचिकाकर्ता मोहम्मद सलीम की ओर से वरिष्ठ वकील एम सी पंत ने गंगा-यमुना की खराब दशा बताते हुए कोर्ट के समक्ष न्यूजीलैंड में नदी को जीवित प्राणी का दर्जा देने का उदाहरण पेश किया था। उनकी दलील पर कोर्ट ने गंगा-यमुना को भी जीवित प्राणी का दर्जा देने के निर्देश दिए।
पंत का कहना था कि कोर्ट के पास किसी को भी वैधानिक व्यक्ति का दर्जा देने के अधिकार हैं और इसी आधार पर गंगा-यमुना को यह दर्जा दिया गया।
दरअसल, इस आदेश से पहले नैनीताल हाई कोर्ट प्रदूषण एवं पर्यावरण से जुड़े कई मामलों में एक के बाद एक कई फैसले दे चुका था किन्‍तु उत्तराखंड सरकार ने उन्‍हें गंभीरता से नहीं लिया।
न्‍यायालय ने देखा कि नदियों और जंगलों के संरक्षण की जो योजनाएं चल रही हैं, वो सब कागजी हैं, सरकारें उन पर कोई अमल नहीं करतीं वरना देश की प्रमुख नदियां कब की साफ हो चुकी होतीं।
अमेरिका में भी कुछ नदियों को कानूनी अधिकार, रिवर एक्ट भी मौजूद
अमेरिका में भी कुछ नदियों को कानूनी अधिकार प्राप्‍त हैं और इसके लिए बाकायदा वाइल्ड रिवर एक्ट नाम का एक क़ानून भी बनाया गया है। इस कानून के मुताबिक नदियों को निर्बाध बहने का अधिकार है लिहाजा उन्हें अपने निरंतर बहाव को बचाए रखने का भी अधिकार है।
भारत की बात
अगर बात भारत की करें तो इस देश के लिए गंगा और यमुना महज नदी नहीं हैं। ये यहां की संस्कृति का पर्याय हैं। एक विशाल आबादी के लिए जीवनदायिनी हैं और आस्था का केंद्र भी हैं, इसलिए आवश्यक केवल यह नहीं है कि नदियों के अविरल प्रवाह की चिंता की जाए, बल्‍कि इन्‍हें सहेजने के पर्याप्‍त इंतजाम भी हों क्‍योंकि ऐसा किए बिना नदियों के ही नहीं, इस देश के भी धार्मिक, सांस्कृतिक एवं प्राकृतिक महत्व को बचाए रखना मुश्किल होगा।
यमुना की दुर्दशा
उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिला अंतर्गत यमुनोत्री में समुद्र तल से 10804 फीट ऊंची बंदरपूंछ नामक चोटी यमुना नदी का उद्गम स्‍थल है। 1,376 कि. मी. लंबी यमुना नदी के प्रमुख तीर्थ स्‍थलों में उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले में स्‍थित विश्राम घाट का बड़ा धार्मिक महत्‍व है।
सूर्यपुत्री यमुना का विश्राम घाट पर अपने भाई और मृत्‍यु के देवता यमराज के साथ देशभर में एकमात्र मंदिर है।
ऐसी मान्‍यता है कि यमद्वितिया (भाईदूज) के दिन विश्राम घाट पर यमुना में स्‍नान और उसके बाद यमुना व धर्मराज (यम-यमुना) मंदिर के दर्शन करने वालों को यमफांस (बार-बार जन्‍म और मृत्‍यु का बंधन) से मुक्‍ति प्राप्‍त होती है।
इसी मान्‍यता के तहत यमद्वितिया के दिन देशभर से विश्राम घाट पर यमुना में डुबकी लगाने हजारों श्रद्धालु प्रतिवर्ष आते हैं।
ऐसे में यह सवाल उठना स्‍वाभाविक है कि पतित पावनी की संज्ञा प्राप्‍त कृष्‍ण की पटरानी कहलाने वाली कालिंदी (यमुना) क्‍या अपने धार्मिक महत्‍व को पूरा कर पा रही है ?
यमुना की दुर्दशा को लेकर सन् 1998 में इलाहाबाद हाई कोर्ट के अंदर एक याचिका डाली गई। हाई कोर्ट ने इस याचिका की गंभीरता के मद्देनजर इसी वर्ष तमाम आदेश-निर्देश जारी किए।
इन आदेश-निर्देशों के तहत जो दो सबसे महत्‍वपूर्ण थे, उनमें पहला था- श्रीकृष्‍ण जन्‍मभूमि से बमुश्‍किल 500 मीटर की दूरी पर संचालित हो रही उस पशु वधशाला को पूरी तरह बंद करना जिसका रक्‍त नाले-नालियों के माध्‍यम से सीधा यमुना में जाकर गिरता था, और दूसरा शहर से दूर एक अत्‍याधुनिक पशु वधशाला का निर्माण कराना।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने अपने आदेश-निर्देशों का अनुपालन सुनिश्‍चित करने के लिए मथुरा के एडीएम (प्रशासन) को जहां नोडल अधिकारी नियुक्‍त कर उसे न्‍यायिक अधिकार प्रदान किए जिससे वो यमुना प्रदूषण से जुड़े उच्‍च अधिकारियों से भी जवाब तलब कर आवश्‍यक कार्यवाही कर सकें वहीं एक 5 सदस्‍यीय मॉनीटरिंग कमेटी का गठन भी किया। इस कमेटी के अध्‍यक्ष ए. डी. गिरी बनाए गए। सचिव का पद इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय के ही सीनियर एडवोकेट दिलीप गुप्‍ता को दिया गया। कमेटी के पदेन सदस्‍यों में यमुना एक्‍शन प्‍लान के प्रोजेक्‍ट मैनेजर और मथुरा के डीएम व एसएसपी को रखा गया।
वर्ष 2005 में ए. डी. गिरि की मृत्‍यु के बाद इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय ने यमुना की सुधि लेना ही लगभग बंद कर दिया। उच्‍च न्‍यायालय की इस मामले में उदासीनता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि ए. डी. गिरी की मृत्‍यु से रिक्‍त हुए मॉनीटरिंग कमेटी के अध्‍यक्ष का पद अब तक नहीं भरा गया जबकि इस बावत प्रार्थना पत्र वर्ष 2007 से न्‍यायालय में लंबित है।
इसी प्रकार नोडल अधिकारी के रूप में अधिकार प्राप्‍त एडीएम (प्रशासन) मथुरा के पद पर जो भी अधिकारी आया, उसने कभी न तो अपने अधिकारों को जानना जरूरी समझा और न कर्तव्‍य को नतीजतन यमुना की प्रदूषण मुक्‍ति के लिए दिए गए उच्‍च न्‍यायालय के आदेश-निर्देश आज 21 साल बाद भी धूल फांक रहे हैं।
जिस पशु वधशाला में कभी प्रतिदिन गिनती के पशु काटे जाते थे आज उसके आसपास अनगिनत पशुओं का अवैध कटान बेराकटोक जारी है क्‍योंकि अब उस क्षेत्र के अधिकांश घर भी पशु वधशाला में तब्‍दील हो चुके हैं। जिला प्रशासन एक दिन के लिए भी न तो पशुओं के अवैध कटान पर लगाम लगा पाया और न शहर से दूर अत्‍याधुनिक Cattle slaughterhouse बनवा पाया। बनवाना तो दूर जिला प्रशासन 21 वर्षों में उसके लिए स्‍थान तक चिन्‍हित नहीं कर सका। एक मर्तबा नेशनल हाईवे के निकट कस्‍बा फरह अंतर्गत चुरमुरा में जमीन चिन्‍हित की भी गई थी परंतु क्षेत्रीय नागरिकों के भारी विरोध ने प्रशासन को अपने कदम खींचने पर मजबूर कर दिया।
यूं कहने के लिए यमुना की प्रदूषण मुक्‍ति को आए दिन सभी सरकारी विभागों की बैठकें होती हैं, इन बैठकों में कागजी घोड़े दौड़ाए जाते हैं, जवाब-तलब करने की औपचारिकता भी निभाई जाती है परंतु ठोस कार्यवाही कभी नहीं की जाती।
इस बाबत श्रीकृष्‍ण जन्‍मभूमि के OSD और यमुना प्रदूषण के मुद्दे पर लंबे समय से बारीक नजर रखने वाले विजय बहादुर सिंह का कहना है कि लगभग हर दिन वह पुलिस व प्रशासन के आला अधिकारियों को दरेसी रोड क्षेत्र में हो रहे अवैध पशु कटान की लिखित व मौखिक जानकारी देते हैं लेकिन किसी अधिकारी के कान पर जूं नहीं रेंगती।
विजय बहादुर सिंह ने बताया कि कल यानि 20 अक्‍टूबर की सुबह ही क्षेत्र में अवैध पशु कटान होने की जानकारी उन्‍होंने अधिकारियों को दी थी। जिसके बाद पहले तो इलाका पुलिस ने अवैध पशु कटान करने वालों को ही शिकायत किए जाने की सूचना दे दी, और फिर यह कह कर पल्‍ला झाड़ लिया कि शिकायत झूठी पायी गई।
कुछ देर बाद जब पुन: खुलेआम पड़े पशुओं के अवशेष तथा घरों में लटके हुए मीट की फोटो अधिकारियों को उपलब्‍ध कराई गईं तब करीब आठ घंटे बाद कार्यवाही अमल में लाई जा सकी।
इतने विलंब से उठाए गए कदम का परिणाम यह निकला कि जहां से सैकड़ों किलो मीट बरामद किया जा सकता था, वहां से मात्र दस किलो मीट बरामद हुआ।
दुख की बात यह है कि अवैध पशु कटान करने वालों के दरवाजे तोड़कर मीट बरामद करने वाली पुलिस को एक भी आरोपी मौके पर नहीं मिला।
विजय बहादुर सिंह का कहना है कि आज सुबह फिर उन्‍होंने उसी क्षेत्र के एक होटल में तीन बोरा मीट सप्‍लाई किए जाने की जानकारी फूड इंस्‍पेक्‍टर को दी लेकिन फूड इंस्‍पेक्‍टर ने यह कहते हुए दो टूक जवाब दे दिया कि वह अपने उच्‍च अधिकारियों के कहने पर ही कानूनी कार्यवाही करेंगे।
श्रीकृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली में प्रशासन का यह रुख तो तब है जबकि केंद्र से लेकर प्रदेश तक और राज्‍य से लेकर जिले तक में भगवाध्‍वज फहरा रहा है।
विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक स्‍थल मथुरा की कुल पांच विधानसभा सीटों में से चार पर भाजपा के विधायक काबिज हैं। इन चार विधायकों में से भी दो योगी सरकार के कद्दावर मंत्री बने बैठे हैं। ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा तो प्रदेश सरकार के प्रवक्‍ता भी हैं।
2014 से लगातार यहां की जनता ने प्रसिद्ध सिने अभिनेत्री और भाजपा नेत्री हेमा मालिनी को संसद में बैठने का अवसर दिया है।
जिला पंचायत के अध्‍यक्ष पद को कबीना मंत्री और छाता क्षेत्र के विधायक चौधरी लक्ष्‍मीनारायण की पत्‍नी ममता चौधरी सुशोभित कर रही हैं।
पहली बार अस्‍तित्‍व में आए मथुरा-वृंदावन नगर निगम के महापौर भी भाजपा के डॉ. मुकेश आर्यबंधु हैं।
आश्‍चर्य की बात यह है कि इतना सबकुछ होने के बावजूद यहां न तो पशुओं का अवैध कटान रुक पा रहा है और न यमुना की दुर्दशा सुधारने के कोई प्रयास हो रहे हैं।
एक रिपोर्ट के अनुसार यमुना में 80 फीसदी प्रदूषण दिल्ली के 22 किलोमीटर के दायरे में होता है। इसका अर्थ यह हुआ कि दिल्‍ली से आगे जो कुछ दिखाई दे रहा है, वह सिर्फ और सिर्फ नाले-नालियों तथा सीवर लाइनों की गंदगी है। यमुना जल का उससे दूर-दूर तक कोई वास्‍ता नहीं रहा।
दिल्‍ली से मथुरा की दूरी 150 किलोमीटर है और इस 150 किलोमीटर क्षेत्र में दिखाई देने वाली यमुना पूरी तरह मर चुकी है। जाहिर है कि इससे आगे 50 किलोमीटर दूर आगरा में भी यमुना के नाम पर गंदगी ही बहती दिखाई देती है।
मथुरा के 19 और वृंदावन के सभी 18 नालों का गंदा पानी सीधे यमुना में गिर रहा है। ये बात अलग है कि कागजों में उसी प्रकार ये सभी 37 नाले-नालियां टैप किए जा चुके हैं जिस प्रकार दरेसी रोड की पशु वधशाला सील की हुई है।
इन हालातों में पूछा जा सकता है कि क्या एक नदी की बेरहम हत्या करने वालों को कहीं से कोई सजा मिलेगी या देश की अदालतें, सरकार तथा जनमानस सब तमाशबीन बने रहेंगे और यमुना मात्र एक अतीत, इतिहास अथवा किंवदंती बनकर रह जायेगी?
अफसोस कि इनमें से किसी प्रश्न का उत्तर देने वाला आज कोई सामने नहीं।
सामने है तो वही यमुना जिसे मां का दर्जा प्राप्‍त है और जो मृतप्राय होकर भी जीवन-मरण के बंधन से मुक्‍ति का मार्ग दिखाती है।
ऐसी पतित पावनी यमुना से अब सिर्फ यही प्रार्थना की जा सकती है कि हे मां! तू कुछ भी करना परंतु अपने इन हत्‍यारों को कभी क्षमा मत करना, क्‍योंकि ये क्षमा के लायक नहीं हैं। ये तेरी दया के पात्र भी नहीं हैं।
नैनीताल हाई कोर्ट के आदेश भले ही सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिए हों परंतु देश की बड़ी आबादी के लिए तू आज भी मां है, तेरी बूंद-बूंद में जीवन है, तू जीवन दायिनी है, जीवित है इसलिए तेरी दुर्दशा करने वाला हर व्‍यक्‍ति सजा का हकदार है। उसे सजा मिलनी ही चाहिए। फिर चाहे वह न्‍यायपालिका से जुड़ा हो या कार्यपालिका से, विधायिका से जुड़ा हो अथवा जनसामान्‍य ही क्‍यों न हो। तेरे गुनहगार बचने तो नहीं चाहिए।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

केतु काल में कांग्रेस: जरूरत है महामृत्‍युंजय के जाप की, लेकिन कांग्रेसी हैं कि तुलसी-गंगाजल हाथ में लेकर खड़े हैं

ज्योतिष के अनुसार सूक्ष्‍म में समझें तो किसी की कुंडली पर केतु का प्रभाव अथवा केतु काल या अशुभ केतु होने से उसके सामने जीवन-मरण का संकट उत्‍पन्‍न हो जाता है। उसे बड़ी सर्जरी की जरूरत होती है अन्‍यथा उसके जीवन पर बन आती है।
वैसे कुंडली का अशुभ ‘केतु’ पितृ दोष का सूचक भी होता है, जिसके बहुत गहरे प्रभाव पड़ते हैं। इन प्रभावों का अध्‍ययन और उपचार खुद कांग्रेस ही कर सकती है।
कांग्रेस की दिशा एवं दशा पर गौर करें तो साफ पता लगता है कि उसका केतु काल मनमोहन सरकार के दूसरे टर्म में ही प्रारंभ हो गया था, और 2019 आते-आते उसके प्रभाव स्‍पष्‍ट दिखाई देने लगे थे।
केत छुड़ावै खेत
कहते हैं जब कुंडली में केतु का अंतर आता है तब बड़े परिवर्तन की दरकार होती है। जो इस बात को समझते हुए परिस्‍थितियों के अनुरूप खुद को ढालकर आगे का मार्ग पकड़ लेते हैं वो सफल हो जाते हैं परंतु जो परिवर्तन के लिए तैयार नहीं होते वो उसके दुष्‍परिणाम भोगने को अभिशप्त होते हैं।
2019 के चुनाव परिणाम बताते हैं कि कांग्रेस ने केतु काल के दोष निवारण का कोई प्रबंध नहीं किया। उसने परिस्‍थितिजन्‍य परिवर्तन की बजाय लकीर पीटते रहने का मार्ग चुना, नतीजतन वह आज उस मुकाम पर आकर खड़ी हो गई है जहां महामृत्‍युंजय जैसे मंत्र की आवश्‍यकता है।
राहुल गांधी पलायन के रास्‍ते पर हैं और कांग्रेसी राह भटक रहे हैं, बावजूद इसके कांग्रेस पार्टी है कि समझने को तैयार ही नहीं।
आत्‍मघाती कदम
केतु काल के शुरूआती दौर की बात न भी की जाए तो पिछले दिनों सबसे सीनियर कांग्रेसी नेता जयराम रमेश ने कहा कि केंद्र सरकार के हर कदम को गलत ठहराना आत्‍मघाती साबित हो रहा है। अच्‍छे कार्यों का सकारात्‍मक संदेश देने में कोई हर्ज नहीं है।
उसी समय शशि थरूर ने भी यही कहा कि सरकार के प्रत्‍येक क्रिया-कलाप की सिर्फ और सिर्फ निंदा करना उचित नहीं। जनभावना के अनुरूप कल्‍याणकारी कार्यों के लिए सरकार को प्रोत्‍साहित करना भी विपक्ष की भूमिका का हिस्‍सा है।
कांग्रेस ने अपने इन दोनों नेताओं की सलाह को मानना तो दूर, उन्‍हें परोक्ष और अपरोक्ष रूप से यह बता दिया कि पार्टी के प्रति आपकी निष्‍ठा संदिग्‍ध प्रतीत हो रही है।
दो दिन पहले सलमान खुर्शीद ने एक अंग्रेजी अखबार को दिए अपने इंटरव्‍यू में कहा कि देश का मिज़ाज बदल गया है। देश के सोचने का तरीका बदल चुका है और इस बदले मिज़ाज का पता लगाकर ही समस्या का समाधान निकाला जा सकता है।
सलमान खुर्शीद ने कहा कि देश में और देश की सोच में ऐसे क्या परिवर्तन आए कि हम सिकुड़ कर इतने छोटे हो गए, यह हमें समझना होगा। हमें समझना होगा कि इतने शानदार नेताओं की इतनी शानदार पार्टी का यह हाल क्यों हो गया।
सलमान खुर्शीद के राहुल गांधी पर दिए बयान से कांग्रेस नेता राशिद अल्वी इतने खफा हो गए कि उन्होंने इशारों-इशारों में खुर्शीद को घर (कांग्रेस पार्टी) में आग लगाने वाला और पार्टी का दुश्मन तक बता दिया। बावजूद इसके सलमान खुर्शीद ने राहुल गांधी के अध्यक्ष पद से इस्तीफे पर दिए गए अपने बयान को दोहराते हुए कहा कि ऐसे वक्त में जब देश का मिज़ाज बदल गया है, राहुल का ‘छोड़ जाना’ कांग्रेस के लिए बड़ी मुसीबत है।
सलमान खुर्शीद के सुर में सुर मिलाते हुए पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव ज्योतिरादित्य सिंधिया ने दोहराया कि कांग्रेस को आत्म-अवलोकन की जरूरत है। वर्तमान में कांग्रेस की जो स्थिति है, उसमें आत्‍मचिंतन ही एकमात्र उपचार है। उन्होंने स्‍पष्‍ट कहा कि कांग्रेस फिलहाल महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनाव में जीत दर्ज नहीं करा पाएगी।
यही बात कांग्रेस के महाराष्‍ट्र में कद्दावर नेता संजय निरुपम ने भी कही। हालांकि उनकी नाराजगी के अन्‍य कारण भी थे।
संजय निरुपम ने तो पार्टी छोड़ने की धमकी देते हुए यहां तक कह दिया कि कांग्रेस में राहुल गांधी के वफादारों को इरादतन निशाना बनाया जा रहा है ताकि उनका राजनीतिक भविष्‍य चौपट किया जा सके।
संजय निरुपम से पहले हरियाणा कांग्रेस के प्रदेश अध्‍यक्ष अशोक तंवर ने अपने पद से इस्‍तीफा देते हुए यही आरोप लगाए थे। उन्‍होंने सीधे सीधे पार्टी हाईकमान यानी सोनिया गांधी पर निशाना साधते हुए कहा कि धीरे-धीरे उन सभी का सफाया करने की साजिश रची जा रही है जो राहुल गांधी की टीम में थे।
अशोक तंवर के अनुसार अभी बहुत सी राजनीतिक हत्याएं होना बाकी है। मैं अकेला नहीं हूं, बहुत लंबी लाइन है।
राशिद अल्‍वी ने संजय निरुपम और अशोक तंवर दोनों पर निशाना साधा। उन्होंने कहा कि कोई महाराष्ट्र से बोल रहा है तो हरियाणा से बोल रहा है। ऐसा लग रहा है कि हमें बाहर के दुश्मनों की जरूरत ही नहीं रह गई है। घर को आग लग गई, घर के ही चिराग से।
राहुल बनाम प्रियंका
कांग्रेस के तमाम नेताओं की बयानबाजी यह इशारा करती है कि कहीं न कहीं पार्टी के अंदर राहुल बनाम प्रियंका चल रहा है।
याद कीजिए कि 2019 के लोकसभा चुनावों से ठीक पहले जब प्रियंका गांधी को अचानक कांग्रेस में बड़ा पद देते हुए बड़ी जिम्‍मेदारी भी सौंपी गई थी तब इसे गेम चेंजर बताया गया था। कोई प्रियंका गांधी वाड्रा में इंदिरा गांधी की छवि देख रहा था तो कोई उन्‍हें कांग्रेस के लिए तारनहार घोषित करने पर आमादा था।
इस सबसे परे पार्टी के कुछ बड़े नेता दीवार पर लिखी उस इबारत को पढ़ पाने में सफल रहे थे, जो राहुल-प्रियंका की कथित जुगलबंदी के पीछे से नजर आ रही थी। ये नेता बहन-भाई के दर्शनीय प्रेम पर संदेह के बादल महसूस कर रहे थे परंतु नतीजों के इंतजार में थे।
नतीजे आए तो बहुत कुछ अपने आप सामने आ गया। अटकलों के दौर व किंतु-परंतु के बीच राहुल गांधी ने अंतत: पलायन का मार्ग चुना जिससे एकबार फिर पार्टी की कमान सोनिया गांधी के हाथों में आ गई।
इधर भाई राहुल गांधी के पलायन से ठीक विपरीत प्रियंका की सक्रियता में इजाफा हो गया। उन्‍होंने न तो राहुल की तरह अपने पद से इस्‍तीफा देने की पेशकश की और न हार के लिए जिम्‍मेदारी ओढ़ी। सोनिया गांधी ने भी एक समय बाद राहुल गांधी को लेकर प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया।
जाहिर है कि इतना सबकुछ केवल इत्तिफाकन नहीं हुआ होगा। इसके पीछे कोई योजना जरूर काम कर रही थी। शायद इसी योजना की ओर इशारा करते हुए जहां संजय निरुपम और अशोक तंवर जैसे नेता खुलकर बोल रहे हैं वहीं सलमान खुर्शीद तथा ज्‍योतिरादित्‍य सिधिंया पॉलिश्ड तरीके से बता रहे हैं।
सलमान खुर्शीद और ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया का यह कहना कहां गलत है कि हमें देश का मिज़ाज समझना होगा। हमें आत्‍मचिंतन और आत्‍मावलोकन करना होगा।
सलमान खुर्शीद को संभवत: यह भान भी था कि उनके कहे पर हंगामा होगा और उनकी पार्टी के प्रति निष्‍ठा को लेकर सवाल उठाए जाएंगे, इसीलिए उन्‍होंने लगेहाथ यह कह दिया कि वो कांग्रेस छोड़कर कहीं जाने वाले नहीं हैं। वह कांग्रेसी हैं और कांग्रेसी ही रहेंगे।
किसी के भी दुर्दिनों की एक विशेषता यह होती है कि वह अपने हितैषियों को पहचान नहीं पाता। वह अपने और पराये के भेद को समझने में सक्षम नहीं रहता। इस स्‍थिति‍ को कोई मतिभ्रष्‍ट होना कहता है तो कोई ग्रहों का प्रभाव बताता है।
कांग्रेस के संदर्भ में लक्षण देखकर निष्‍कर्ष निकाला जाए तो दोनों बातें सही प्रतीत होती हैं।
तभी तो यह हाल है कि इस स्‍थिति‍ में जब पार्टी के लिए मृत-संजीवनी कहे जाने वाले महामृत्‍युंजय मंत्र का जाप करने की जरूरत है तब पार्टी के कुछ बड़े नेता तुलसी-गंगाजल हाथ में लेकर खड़े हैं।
उन्‍हें इंतजार है उस आखिरी हिचकी का जिसके बाद तुलसी-गंगाजल डालकर अपना धर्म व कर्म पूरा करते हुए शेष सांसें भी थम जाने की दुहाई दे सकें। बता सकें कि मृत देह से चिपके रहने का कोई औचित्‍य नहीं।
जो भी हो, लेकिन कांग्रेस का यह हाल देश और देशवासी दोनों के लिए नुकसानदेह है।
उस लोकतंत्र के लिए नुकसानदेह है जिसे अब तक कायम रखने के लिए कई बलिदान दिए गए। लोकतंत्र के लिए एक परिपक्‍व व मजबूत विपक्ष का होना अत्‍यन्‍त आवश्‍यक है। परिपक्‍व व मजबूत विपक्ष नहीं रहेगा तो लोकतंत्र पर खतरा मंडराने लगेगा।
कांग्रेस की समस्‍या यह है कि वह विपक्ष की भूमिका स्‍वीकार नहीं कर पा रही। निजी स्‍वार्थों से उठकर वह यह भी नहीं सोच पा रही कि विपक्ष की भूमिका निभाना भी देशहित में उतना ही महत्‍वपूर्ण है जितना सत्ता में रहकर सरकार चलाना।
यदि वह अपनी इस जिम्‍मेदारी का निर्वहन नहीं करती तो देश व देशवासियों की गुनाहगार कही जाएगी। उसका गौरवशाली अतीत इतिहास में दफन हो जाएगा और आने वाली पीढ़ी उसके स्‍वर्णिम काल को भुला बैठेगी।
खतरा यह भी है कि आगे आने वाले समय में उसका उल्‍लेख एक ऐसे गुनाहगार के तौर पर किया जाने लगे जिसने विपक्षी दल का अपना धर्म न निभाकर निजी स्‍वार्थों को तरजीह दी और उसके नेता उन्‍हीं स्‍वार्थों की पूर्ति के लिए परस्‍पर लड़ते रहे।
यदि ऐसा हुआ तो तय जानिए कि ये देश कभी नेहरू-गांधी के इन वारिसों को माफ नहीं करेगा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बुधवार, 2 अक्टूबर 2019

आखिर सच साबित हुआ गांधी का डर, अब गांधी डर भी रहे हैं और डरा भी रहे हैं



Gandhi's fear finally proved to be true, now Gandhi is also afraid and is scared


कहते हैं मोहन दास करमचंद गांधी यानी महात्‍मा गांधी के मन में एक डर बहुत अंदर तक समाया हुआ था। उन्‍हें डर था कि लोग उन्‍हें ईश्‍वर न बना दें, उनकी मूर्तियां स्‍थापित न कर दें।
गांधी ने एक-एक चिट्ठी के जवाब में लिखा भी था कि ”मैं कोई चमत्कार नहीं करता। मेरे अंदर उसी प्रकार ईश्वर का एक अंश है, जिस प्रकार जीवमात्र में होता है। मुझमें कोई ईश्वरत्व नहीं है। मुझे ईश्‍वर मत बनाइए”।
उन्होंने लिखा कि अगर कोई कौवा बरगद के पेड़ पर बैठ जाए और पेड़ गिर पड़े तो वो कौवे के वजन से नहीं गिरता। हां, कौवे को ये मुगालता हो सकता है कि उसके वजन से पेड़ गिरा है लेकिन मुझे ऐसा कोई मुगालता नहीं है। मुझे अपने बारे में कोई ग़लतफ़हमी नहीं है।
अब बात अपनी, अपने दौर की
मैं स्‍वतंत्र भारत के उस दौर की पैदाइश हूं जिसने गांधी को नहीं देखा, सिर्फ ऐसे ही किस्‍से-कहानियों में सुना है, कुछ किताबों में पढ़ा है और उन्‍हीं से जाना है। आंखों देखी और कानों सुनी में बहुत फर्क होता है, यह बात सर्वमान्‍य है।
इस तरह मैं कह सकता हूं कि मैं गांधी को नहीं जानता, लेकिन मैं यह भी कह सकता हूं कि गांधीवादी न मुझे जानते हैं और न गांधी को।
मुझे न जानने से आशय, उन करोड़ों आम लोगों से है जो गांधी के दौर में पैदा नहीं हुए और जिनके लिए गांधी सिर्फ उनसे जुड़े तमाम किस्‍से-कहानियों तक ही सीमित हैं।
गांधी को जानते होते तो उनकी मूर्तियां स्‍थापित करके उन्‍हें ईश्‍वर न बनाते। गांधी-जयंती पर इन मूर्तियों को फूल-मालाएं न चढ़ाते। आखिर सच साबित हुआ गांधी का डर, अब गांधी डर भी रहे हैं और डरा भी रहे हैं।
डर इसलिए रहे हैं क्‍योंकि मूर्तियां कम होने की बजाय बढ़ रही हैं, और डरा इसलिए रहे हैं कि इन मूर्तियों का इस्‍तेमाल राजनीतिक हथियार के रूप में हो रहा है।
लोग गांधी की कथनी को गांधीवादियों की करनी में देखना चाहते हैं, मात्र किस्‍से-कहानियों में सुनना या मूर्तियों के रूप में देखना नहीं चाहते लेकिन हो यही रहा है क्‍योंकि गांधीवाद आज पहले से कहीं अधिक बिकाऊ है।
गांधी से जुड़े किस्‍से-कहानियों पर लौटें तो उन्‍हें सत्‍य व अहिंसा का पुजारी, यहां तक कि इनका प्रतीक माना जाता रहा किंतु उनके सामने ही सत्‍य और अहिंसा दोनों का जनाज़ा उठ गया।
जिस स्‍वतंत्रता का सपना देखते-देखते अनगिनत लोगों ने अपने जीवन की आहुति दे डाली और कितने लोग सलाखों के पीछे रहे, उसी स्‍वतंत्रता का सपना तब पूरा हुआ जब निजी स्‍वार्थों की पूर्ति के लिए सत्‍य को खूंटी पर टांगकर देश का जबरन विभाजन करा दिया। अहिंसा को ताक पर रखकर हिंसा का ऐसा नंगा नाच किया गया, जिसकी इतिहास में कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलती।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि गांधी की आंखों के सामने उनके सत्‍य और अहिंसा ने दम तोड़ दिया। गांधी खुद तो हिंसा का शिकार उसके बाद हुए किंतु गांधीवाद उनके सामने ही मर चुका था।
गांधी को यह डर तो था कि लोग उनकी मूर्तियां स्‍थापित करके उन्‍हें ईश्‍वर न बना दें किंतु उन्‍होंने यह कभी नहीं सोचा था कि लोग गांधीवाद को हथियार बनाकर हर रोज उनकी हत्‍या करेंगे। सत्‍य के पुजारी की मूर्तियां भी झूठे गांधीवाद को न सिर्फ देखने के लिए अभिशप्‍त होंगी बल्‍कि उनके हाथों फूल-मालाएं भी ग्रहण करने पर मजबूर होंगी।
गांधी से जुड़े अनेक किस्‍से-कहानियों के बीच उन्‍हें जोड़कर कही जाने वाली यह कहावत भी संभवत: इसीलिए बहुत प्रचलित है कि ”मजबूरी का नाम महात्‍मा गांधी” ।
यह कहावत कब, क्‍यूं और कैसे वजूद में आई इसके बारे में तो कोई ठोस जानकारी उपलब्‍ध नहीं है परंतु वो सबकुछ उपलब्‍ध है जो गांधी को उनके डर से हर दिन रूबरू करा रहा है।
मुंह में राम, और बगल में छुरी रखकर ”वैष्‍णव जन तो तेने कहिए…का राग अलापते हुए पल-पल अहसास कराया जा रहा है कि गांधी केवल किस्‍से कहानियों में अच्‍छे लगते हैं, मूर्तियों में जंचते हैं लेकिन अमल में नहीं लाए जा सकते।
अमल में लाए जा सकते तो न देश का विभाजन होता और न गांधी की हत्‍या होती।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

मंदी के इस दौर में भी खूब फल-फूल रहा है यूपी का तबादला उद्योग

UP's transfer industry is flourishing even in this phase of recessionविश्‍वव्‍यापी आर्थिक मंदी के इस दौर में जब देश के बड़े-बड़े उद्योग धंधों की दम निकली पड़ी है और उन्‍हें खड़ा रखने के लिए केंद्र सरकार को लगातार प्राणवायु मुहैया करानी पड़ रही है, तब भी यूपी का तबादला उद्योग न सिर्फ पूरे दम-खम के साथ खड़ा दिखाई दे रहा है बल्‍कि अच्‍छा-खासा फल-फूल भी रहा है।
वैसे तो तबादलों को उद्योग का दर्जा दिलाने में काफी पहले ही हमारे राजनेता सफल हो गए थे लिहाजा सरकारें बेशक बदलती रहीं किंतु तबादला उद्योग कभी बंद नहीं हुआ। वर्ष 2017 में यूपी पर योगी आदित्‍यनाथ के नेतृत्‍व वाली सरकार काबिज होने के बाद लोगों को कुछ ऐसी उम्‍मीद बंधी कि शायद अब भ्रष्‍टाचार की बुनियाद माना जाने वाला तबादला उद्योग जरूर प्रभावित होगा।
योगी सरकार ने अपने शुरूआती कुछ महीनों तक इसके संकेत भी दिए कि वह अधिकारियों को ताश के पत्तों की तरह फेंटने की बजाय यथास्‍थिति बनाए रखेंगे और जो जहां है, उससे वहीं बेहतर काम लेंगे क्‍योंकि ब्‍यूरोक्रेसी हवा के रुख को पहचान कर नतीजे देती है।
किंतु जल्‍दी ही पहले तुरुप के इक्‍कों में फेर-बदल किया गया, और फिर बादशाह-बेगम व गुलामों की हैसियत वाले भी इधर से उधर किये जाने लगे।
आज जबकि योगी आदित्‍यनाथ की सरकार को यूपी की कमान संभाले हुए ढाई वर्ष अर्थात आधा कार्यकाल बीत चुका है तब पता लग रहा है कि योगीराज में भी तबादलों का खेल उसी प्रकार खेला जा रहा है, जिस प्रकार सूबे की पूर्ववर्ती सरकारें खेलती रही थीं।
योगी सरकार में शीघ्र ही तबादला उद्योग ढर्रे पर आ जाने के पीछे भी वही कारण बताए जा रहे हैं जो अखिलेश या मायाराज में बताए जाते थे। यानी…
कलयुग नहीं ये करयुग है, यहाँ दिन को दे और रात ले।
क्या खूब सौदा नकद है, इस हाथ दे उस हाथ ले।।
अब स्‍थिति यह है कि शायद ही किसी जिले में कोई अधिकारी टिक पाता हो। तबादला उद्योग के गतिमान रहने से अधिकारियों के स्‍थायित्‍व की समयाविधि ”महीनों में” सिमट कर रह गई है।
ये आदान-प्रदान किस स्‍तर पर हो रहा है और कौन कर रहा है, इसे जानना भी कोई रॉकेट साइंस नहीं है परंतु इसमें कोई दो राय नहीं कि सबके सब ‘अनभिज्ञ’ बने रहते हैं।
सरकार से ही जुड़े सूत्रों का स्‍पष्‍ट कहना है कि भ्रष्‍टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात करने वाले योगी आदित्‍यनाथ की सरकार में आज प्रदेश, मंडल व जिलों में तैनाती का रेट फिक्‍स है।
हो सकता है ट्रांसफर-पोस्‍टिंग के लिए निर्धारित दामों की लिस्‍ट योगी आदित्‍यनाथ की नजरों के सामने न आ पायी हो परंतु भ्रष्‍ट और भ्रष्‍टतम अधिकारियों की अच्‍छे-अच्‍छे पदों पर तैनाती यह समझने के लिए काफी है कि तबादला उद्योग पूरी रफ्तार से चल रहा है।
यदि इतने से भी किसी कारणवश बात समझ में नहीं आ रही हो तो बहुत जल्‍दी-जल्‍दी तबादले स्‍पष्‍ट बता देते हैं कि दाल में कुछ काला नहीं है, पूरी की पूरी दाल काली है।
दरअसल, तबादला उद्योग एक ऐसा उद्योग है जो ऊपर से चलता है तो बहुत जल्‍दी नीचे तक अपनी जड़ें जमा लेता है।
बात चाहे पुलिस की हो अथवा प्रशासन की, आला अधिकारी अपनी भरपाई करने के लिए वही रास्‍ता अपने मातहतों के लिए खोल देते हैं जिस रास्‍ते पर चलकर वह वहां तक पहुंचते हैं।
यदि किसी जिले में डीएम और एसएसपी अथवा एसपी कुछ महीनों के मेहमान होते हैं तो उस जिले में उनके अधीनस्‍थ भी महीनों के हिसाब से ‘चार्ज’ पाते हैं।
चूंकि जिले के प्रभार का रेट वहां मौजूद आमदनी के अतिरिक्‍त स्‍त्रोतों और उसकी भोगौलिक एवं आर्थिक स्‍थिति के अनुरूप निर्धारित रहता है इसलिए हर जिले में सर्किल, थाने-कोतवाली सहित प्रशासनिक हलकों के दाम भी उसी के हिसाब से तय होते हैं।
कहने के लिए पिछले दिनों बुलंदशहर के SSP एन कोलांची को थानेदारों की तैनाती में अनियमितता बररतने पर निलंबित कर दिया गया।
फिर प्रयागराज (इलाहाबाद) के एसएसपी अतुल शर्मा को निलंबित कर दिया।
अपर मुख्य सचिव गृह अवनीश अवस्थी के अनुसार बुलंदशहर में दो थाने ऐसे थे जहां एसएसपी एन. कोलांची ने सात दिन से भी कम समय के लिए उपनिरीक्षकों को चार्ज दिया। एक थाना ऐसा था जहां का चार्ज मात्र 33 दिन में छीन लिया गया।
इतना ही नहीं, कोलांची ने दो ऐसे उप निरीक्षकों को चार्ज दे दिया जिन्‍हें पूर्व में Condemned entry (परनिंदा प्रविष्टि) दी जा चुकी थी।
अपर मुख्य सचिव गृह अवनीश अवस्‍थी की बात सच मानी जाए तो फिर प्रदेश के तमाम उन अन्‍य जिलों का क्‍या, जहां अयोग्‍य उपनिरीक्षकों-निरीक्षकों तथा उपाधीक्षकों को लगातार चार्ज पर रखा जा रहा है।
इसी प्रकार प्रयागराज (इलाहाबाद) के एसएसपी अतुल शर्मा को प्रदेश के डीजीपी ओपी सिंह ने अपनी रिपोर्ट में बाकायदा ‘निकम्‍मा’ अधिकारी घोषित किया है।
ऐसे में यह सवाल स्‍वाभाविक है कि एक निकम्‍मा अधिकारी प्रयागराज जैसे बड़े व महत्‍वपूर्ण जिले का चार्ज कैसे पा गया ?
आगरा के एसएसपी बनाए गए जोगेन्‍द्र सिंह को बमुश्‍किल कुछ हफ्ते में हटा दिया गया, फिलहाल वह आगरा में ही जीआरपी के एसपी हैं।
जल्‍द ही अगर उन्‍हें फिर किसी महत्‍वपूर्ण जिले का चार्ज दे दिया जाए तो कोई आश्‍चर्य नहीं।
मतलब तबादला उद्योग के चलते उच्‍च अधिकारियों से लेकर जिलों में बांटे जाने वाले ‘चार्ज’ की योग्‍यता कुछ महीनों, कुछ दिनों और यहां तक कि कुछ घंटों में तय की जा सकती है। बशर्ते कि मनमाफिक चार्ज चाहने वाला मनमुताबिक रकम अदा करने को तैयार हो।
यही कारण है कि एक ओर जहां हर स्‍तर पर ऐसे अकर्मण्‍य और निकम्‍मे लोग चार्ज पर मिल जाएंगे जिनकी आम शौहरत जगजाहिर है, वहीं दूसरी ओर काबिल-जिम्‍मेदार व कर्तव्‍यनिष्‍ठ लोग सम्‍मानजनक पोस्‍टिंग के लिए दर-दर भटकते मिलेंगे।
कहीं-कहीं तो नौबत यहां तक आ जाती है कि मजबूरन कोई अनुशासन को ताक पर रखकर शिकवा-शिकायत करने लगता है तो कोई न्‍यायपालिका की शरण में जा पहुंचता है क्‍योंकि निजी स्‍वार्थों की पूर्ति में लिप्‍त अधिकारी उनके भविष्‍य को अंधकारमय बनाने से भी परहेज नहीं करते।
फिलहाल पूरे प्रदेश में ऐसे एक-दो नहीं, अनेक उदाहरण सामने हैं जहां नाकाबिल लोग तबादला उद्योग से लाभान्‍वित होकर मलाईदार पदों पर जमे हुए हैं जबकि अच्‍छी कार्यशैली वाले अधिकारी एवं कर्मचारियों को कोई मौका नहीं दिया जा रहा।
यदि प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ खुद इस तबादला उद्योग की बारीक समीक्षा करें और जिलों के अंदर आए दिन की जाने वाली उठा-पटक का पता लगाएं तो चौंकाने वाली सच्‍चाई सामने आ सकती है।
आश्‍चर्य तो इस बात पर है कि बुलंदशहर के एसएसपी रहे कोलांची और प्रयागराज के एसएसपी रहे अतुल शर्मा का उदाहरण सामने होने के बावजूद सीएम योगी समूची हांडी के पकने का इंतजार क्‍यों कर रहे हैं।
योगी जी को यह भी समझना होगा कि हर बार चुनाव परिणाम मोदी मैजिक से नहीं मिलने वाले। 2022 में जब यूपी विधानसभा के चुनाव होंगे तब बाकी उपलब्‍धियों के साथ-साथ तबादला उद्योग और उससे प्रभावित हो रही कानून-व्‍यवस्‍था का भी आंकलन जरूर होगा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बुधवार, 25 सितंबर 2019

मथुरा में हजारों Hyundai कार उपभाेक्‍ताओं के साथ धोखा, न डीलर का पता है और न डीलरशिप का

मथुरा। भारत के कार बाजार में दूसरे नंबर पर स्‍थापित दक्षिण कोरिया की मशहूर वाहन निर्माता कंपनी Hyundai के हजारों उपभोक्‍ताओं को बड़े सुनियोजित तरीके से धोखा दिया जा रहा है लेकिन न कोई देखने वाला है और न सुनने वाला।
यह धोखा मथुरा के नेशनल हाईवे पर नवादा में स्‍थित Shiel Hyundai के नाम से संचालित उस एकमात्र शोरूम पर मिल रहा है जिसके केयरटेकर इन दिनों आगरा निवासी ट्रांसपोर्टर एवं सुपारी व्‍यवसायी संजीव अग्रवाल बने हुए हैं।
मथुरा में Hyundai उपभोक्‍ताओं एवं ग्राहकों के साथ इस धोखे की शुरूआत यूं तो पिछले वर्ष ही तब हो गई थी जब स्‍थानीय डीलर राजीव रतन ने Hyundai के अपने शोरूम का गुपचुप सौदा संजीव अग्रवाल के साथ कर लिया था किंतु दोबारा यह धोखाधड़ी अब फिर बड़े रूप में सामने आई है।
दरअसल, चार दिन पूर्व प्रसिद्ध मिठाई विक्रेता ब्रजवासी ग्रुप के मालिक सतीश ब्रजवासी के पौत्र यश अग्रवाल तथा नरसी विलेज निवासी पंकज अग्रवाल ने Shiel Hyundai के डीलर राजीव रतन और उनके बेटे ऋषि रतन के खिलाफ थाना गोविंदनगर मथुरा में 25 लाख रुपयों की धोखाधड़ी का एक मामला दर्ज कराया।
संजीव अग्रवाल को किस बात का डर
इस बारे में बात करने के लिए Shiel Hyundai मथुरा पर संपर्क किया गया तो बात संजीव अग्रवाल से हुईं। संजीव अग्रवाल ने यह तो स्‍वीकार किया कि Shiel Hyundai की डीलरशिप अब भी राजीव रतन के नाम है, लेकिन वह इस बात का कोई जवाब नहीं दे सके कि वह किस हैसियत से Shiel Hyundai का संचालन कर रहे हैं।
संजीव अग्रवाल ने साफ कहा कि वह मोबाइल फोन पर कोई बात नहीं करना चाहते क्‍योंकि उनकी बात रिकॉर्ड की जा सकती है।
संजीव अग्रवाल का डर स्‍पष्‍ट कर रहा था कि मथुरा में Hyundai की डीलरशिप को लेकर कुछ न कुछ ऐसा है जिसे छिपाया जाना जरूरी है।
40 प्रतिशत की हिस्‍सेदारी, लेकिन डीलरशिप अब भी राजीव रतन के नाम
संजीव अग्रवाल की बातों पर संदेह होने के बाद जब और जानकारी की गई तो Shiel Hyundai से जुड़े सूत्रों ने बताया कि राजीव रतन ने संजीव अग्रवाल के साथ उस हिस्‍से में 40 प्रतिशत की साझेदारी तो की है जो कभी उनके छोटे भाई संजीव रतन के पास हुआ करता था परंतु डीलरशिप अब भी उनके नाम है क्‍योंकि कंपनी ने उनके द्वारा डीलरशिप ट्रांसफर करने का प्रस्‍ताव पूरी तरह ठुकरा दिया।
बिल्‍डिंग का भी सौदा
सूत्रों का यह भी कहना है कि संजीव अग्रवाल के नाम 40 प्रतिशत की पार्टनरशिप न सिर्फ मथुरा बल्‍कि एटा Shiel Hyundai में भी मय शोरूम के हुई है यानी व्‍यापार के साथ-साथ बिल्‍डिंग का भी सौदा किया गया है।
बताया जाता है कि 40 प्रतिशत की पार्टनरशिप भी मात्र दो महीने पहले तब मजबूरी में की गई जब Hyundai कंपनी ने डीलरशिप ट्रांसफर करने से साफ इंकार कर दिया।
सूत्रों के मुताबिक लगभग 20 करोड़ रुपया संजीव अग्रवाल द्वारा जो राजीव रतन को दिया गया था, उसमें डीलरशिप ट्रांसफर कराना शामिल था परंतु Hyundai कंपनी इसके लिए तैयार नहीं हुई क्‍योंकि कोई भी प्रतिष्‍ठित कंपनी अपने डीलर को ऐसा कोई अधिकार नहीं देती जिससे वो डीलरशिप ट्रांसफर करा सके।
आपराधिक केस दायर करा सकती है Hyundai
कोई भी ऐसा कृत्‍य कंपनी की शर्तों का उल्‍लंघन है और कंपनी इसके लिए न केवल डीलरशिप टर्मिनेट करती है बल्‍कि आपराधिक केस भी दायर करा सकती है।
डीलर अगर अपनी डीलरशिप छोड़ना चाहता है तो ज्‍यादा से ज्‍यादा इतना कर सकता है कि इस क्षेत्र के किसी अनुभवी व्‍यक्‍ति का नाम कंपनी को रिकमेंड कर दे किंतु अंतिम निर्णय कंपनी का ही होता है।
कंपनी यदि अपनी सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद उस व्‍यक्‍ति को उपयुक्‍त समझती है तो पहले वाली डीलरशिप को समाप्‍त कर नए सिरे से डीलरशिप अलॉट करेगी, न कि पुरानी डीलरशिप के साथ उसका कोई संबंध रखने की इजाजत देगी।
हजारों उपभोक्‍ताओं का क्‍या ?
ऐसे में सवाल यह खड़ा होता है कि जब राजीव रतन और संजीव रतन दोनों ने Shiel Hyundai से नाता तोड़ लिया है और कंपनी ने संजीव अग्रवाल के नाम डीलरशिप ट्रांसफर करने का प्रस्‍ताव ठुकरा दिया है तो यहां हजारों की संख्‍या में मौजूद उन उपभोक्‍ताओं का क्‍या, जो अब तक Shiel Hyundai को मथुरा का अधिकृत डीलर समझकर अपनी गाड़ियों की सर्विस, बीमा, रिपेयरिंग आदि करवा रहे हैं।
Shiel Hyundai के शोरूम पर मौजूद संजीव अग्रवाल कहते हैं कि वो मालिक यानी डीलर नहीं हैं और राजीव रतन व संजीव रतन पहले ही मथुरा आना तक छोड़ चुके हैं, राजीव रतन के पुत्र ऋषि रतन जो पहले Shiel Hyundai का पूरा कारोबार संभालते थे, वो भी यहां नहीं झांकते, तो फिर डीलरशिप किसके भरोसे चल रही है।
पुराने स्‍टाफ को नौकरी से निकाला
यह भी पता लगा है कि Shiel Hyundai के केयरटेकर संजीव अग्रवाल ने डीलरशिप पर अपना पूरा आधिपत्‍य जमाने के लिए उन अधिकांश पुराने कर्मचारियों को निकाल बाहर किया है जिन्‍हें कंपनी ने समय-समय पर ट्रेनिंग दी थी और वो कंपनी तथा डीलर के प्रति वफादार थे।
नए ग्राहक भी होंगे धोखाधड़ी के शिकार
इन हालातों में पुराने उपभोक्‍ताओं के अलावा ऐसे नए ग्राहकों के साथ भी Shiel Hyundai पर धोखाधड़ी किए जाने की पूरी संभावना है जो मथुरा की डीलरशिप को अधिकृत समझ रहे हैं।
आज की तारीख में Shiel Hyundai पर इन बातों के लिए भी कोई जवाबदेह नहीं है कि जो पार्ट या इंजन आयल आदि सर्विस के दौरान गाड़ियों में इस्‍तेमाल किया जा रहा है वह कितना GENUINE है।
सूत्रों का कहना है उपभोक्‍ता और ग्राहकों सहित Hyundai कंपनी की आंखों में धूल झोंकने का यह काम Hyundai के ही कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से किया जा रहा है। वो लोग Shiel Hyundai की असलियत अपने उच्‍च अधिकारियों तक पहुंचने ही नहीं दे रहे जिससे कंपनी की डीलरशिप सहित उसका भरोसा दांव पर लग चुका है।
बताया जाता है कि मंदी के इस दौर में भी Hyundai की डीलरशिप लेने को तमाम लोग तैयार हैं क्‍योंकि Hyundai की ब्रांड वेल्‍यू काफी अच्‍छी है। संभवत: इसीलिए संजीव अग्रवाल करोड़ों रुपया लगाने के बावजूद बिना मालिकाना हक के Shiel Hyundai का संचालन कर रहे हैं।
Shiel Hyundai के भविष्‍य का आगे चलकर क्‍या होगा, यह तो देर-सवेर पता लग ही जाएगा परंतु फिलहाल Hyundai के हजारों उपभोक्‍ताओं और उन लोगों के साथ एक साजिश के तहत धोखाधड़ी हो रही है जो इस ब्रांड तथा Shiel Hyundai पर भरोसा करते हैं और उसी भरोसे के साथ आंख बंद करके Shiel Hyundai पहुंचते हैं।
Shiel Hyundai के शोरूम का नक्‍शा भी विवादों में
दूसरी ओर इस बीच यह जानकारी भी मिल रही है कि नेशनल हाईवे नंबर-2 पर नवादा क्षेत्र में जहां Shiel Hyundai का शोरूम बना है, वह Residential area है। किसी भी Residential area में कानूनन कार के किसी शोरूम का निर्माण नहीं कराया जा सकता।
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने भी इसकी पुष्‍टि करते हुए बताया कि कब और किन परिस्‍थितियों में नवादा के Residential area में कार के शोरूम बना लिए गए, कहना मुश्‍किल है।
विकास प्राधिकरण से इस बारे में एक चौंकाने वाली जानकारी यह मिली कि जिस प्‍लॉट पर Shiel Hyundai का शोरूम आज खड़ा है, उस पर तो रेस्‍टोरेंट के लिए नक्‍शा पास किया गया था।
प्राधिकरण के अधिकारियों ने इस बारे में जांच के उपरांत कार्यवाही करने का भरोसा दिया है।
गौरतलब है कि राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली से ताजनगरी आगरा को जोड़ने वाले नेशनल हाईवे नंबर दो पर स्‍थानीय डेवलपमेंट अथॉरिटी की सांठगांठ से Residential area में ऐसे और भी कई शोरूम स्‍थापित हो चुके हैं जो नियम विरुद्ध हैं किंतु आजतक उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई।
सच तो यह है कि अथॉरिटी से पास नक्‍शे के इतर मामूली सा भी फेरबदल दिखाई देने पर पहुंच जाने वाले विप्रा अधिकारी ऐसे शोरूम्‍स को लेकर अब तक आंखें व कान बंद किए बैठे रहे।
यही कारण है कि राजीव और ऋषि रतन ने Hyundai की अपनी डीलरशिप का सौदा शोरूम सहित किया है क्‍योंकि वह उसकी असलियत जानते हैं, और उन्‍हें मालूम है कि रेस्‍टोरेंट में पास शोरूम कभी भी उनके गले की हड्डी बन सकता है।
बहरहाल, करोड़ों रुपए के इस खेल से फिलहाल तो Hyundai कंपनी के साथ-साथ बैंकें और एजेंसी पर कार्यरत स्‍टाफ भी अनभिज्ञ है। कंपनी और बैंकों को तो जब सच्‍चाई पता लगेगी तब वो देख लेंगे किंतु जिस स्‍टाफ को निकाल बाहर किया गया है, उसका भविष्‍य पूरी तरह अंधकारमय है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

रविवार, 1 सितंबर 2019

BBC की जुबानी, खुद उसकी कहानी: कश्‍मीर पर अपुष्‍ट एवं फर्जी खबरें प्रकाशित करता रहा है BBC

BBC ने हाल में एक रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसके अनुसार कश्मीर के कई लोगों ने सुरक्षाबलों पर मारपीट और उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं।
BBC की रिपोर्ट में उन लोगों के ज़ख्म भी दिखाए गए जिन्‍होंने सुरक्षाबलों द्वारा उन्‍हें कथित तौर पर पीटे जाने की बात कही। हालांकि खुद BBC इन आरोपों की पुष्‍टि नहीं करता।
खुद BBC ने अपनी ही रिपोर्ट में यह लिखा कि वह इन आरोपों की पुष्टि किसी अधिकारी अथवा अधिकृत व्‍यक्‍ति से नहीं कर पाया।जिसका सीधा-सीधा अर्थ यही निकलता है कि BBC ने कश्‍मीर जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बहुत जल्‍दबाजी में और अपुष्‍ट खबर को प्रकाशित किया।
पता नहीं BBC को कश्‍मीर पर ऐसी रिपोर्ट प्रकाशित करने की क्‍या जल्‍दी थी जिसके साथ उसे स्‍वयं यह स्‍वीकार करना पड़ा कि उसके अथवा कथित पीड़ितों के आरोपों की सत्‍यता संदिग्‍ध है।
अब सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी ने भी BBC की एक रिपोर्ट पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी है और इस तरह के आरोपों का खंडन किया है।
बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता नलिन कोहली ने अपनी पार्टी की ओर कहा कि “सबसे पहले, मैंने रिपोर्ट देखी नहीं है, मैंने इसके बारे में इंटरनेट पर पढ़ा है।
रिपोर्ट ख़ुद कहती है कि इन दावों की पुष्टि नहीं हो सकी है इसलिए इस पर अभी यकीन कर लेना मुश्किल है।”
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अगर ऐसी कोई घटना होती है तो भारत में एक मज़बूत न्यायिक व्यवस्था है और अगर मामला सही हो तो सेना से जुड़े लोगों को भी सज़ाएं हुई हैं।
BBC का यह भी कहना है कि उसने इन आरोपों के बारे में सेना से भी पूछा था। जिसके जवाब में सेना ने कहा कि उसने किसी भी नागरिक के साथ मारपीट नहीं की।
सेना के प्रवक्ता कर्नल अमन आनंद ने कहा था कि ऐसा कोई आरोप उनके संज्ञान में नहीं आया है। उनके मुताबिक, “संभव है कि ये आरोप विरोधी तत्वों की ओर से प्रेरित हों।”
बीजेपी प्रवक्ता नलिन कोहली का भी कुछ ऐसा ही कहना है। उन्होंने कहा कि ये असामान्य नहीं है कि कई बार किसी राजनीतिक दबाव में कई वजह से लोग सुरक्षाबलों के ख़िलाफ़ इस तरह के झूठे दावे करते हैं।
इस पर जब उनसे पूछा गया कि क्या ये आरोप मनगढ़ंत हो सकते हैं? तो उन्होंने कहा कि हां, ये मुमकिन है।
नलिन कोहली ने कहा, “क्योंकि आज जब हम बात कर रहे हैं, ये ख़बर कहीं आई नहीं है।
इसके उलट ये खबर जरूर है कि जम्मू-कश्मीर में अलगाववादियों और आतंकवादियों ने एक दुकानदार की हत्या कर दी क्योंकि उसने कर्फ़्यू हटने के बाद अपनी दुकान खोली थी। दो दिन पहले दो लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई और वे लोग मुस्लिम मुस्‍लिम गुज्‍जर (बंजारा) समुदाय से हैं।
इन हरकतों से साफ जाहिर होता है कि सुरक्षबलों पर प्रताड़ना का आरोप वे लोग लगा रहे हैं जो दिखाना चाहते हैं कश्मीर में हालात सामान्य नहीं हो सकते।”
BBC ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि उनके रिपोर्टर समीर हाशमी दक्षिण कश्मीर के जिन गांवों में गए थे वहां लोगों ने रात में छापेमारी, पिटाई और टॉर्चर की एक जैसी दास्तान सुनाईं।
यहां यह जान लेना जरूरी है कि ये वही इलाके हैं जो पिछले कुछ वर्षों में भारत विरोधी चरमपंथ के गढ़ बतौर उभरे हैं।
नलिन कोहली ने कहा कि एक जिम्‍मेदार पार्टी का प्रवक्‍ता होने के नाते वो BBC की रिपोर्ट पर सवाल उठाना नहीं चाहते लेकिन ये ज़रूर कह सकते हैं कि अभी तक जिनकी पुष्टि नहीं हो सकी, उन पर कितना भरोसा किया जाए।
कोहली का मानना है कि ये आरोप पाकिस्तान प्रायोजित चरमपंथ और अलगाववाद से प्रेरित हो सकते हैं।
इस सबके बावजूद जांच 
नलिन कोहली ने कहा कि अगर BBC के रिपोर्टर ने इसे सही जगह और संबंधित लोगों के साथ साझा किया है तो वहां इसे जरूर देखा जाएगा।
लगभग यही बात BBC को भेजे बयान में सेना ने भी कही है कि सभी आरोपों की ‘तुरंत जांच’ की जा रही है।
सेना ने ये भी कहा कि वो “एक पेशेवर संगठन है जो मानवाधिकारों को समझता है और उसकी इज़्ज़त करता है।”
कश्मीर में मानवाधिकार हनन को लेकर कई तरह की रिपोर्टें आती रही हैं, जिन्‍हें भारत सरकार ने हर बार ख़ारिज किया है।
‘कश्मीर भारत का आंतरिक मामला’
बहुत से लोग जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को ख़त्म किए जाने के भारत सरकार के फ़ैसले की आलोचना कर रहे हैं। हालांकि भारत सरकार लगातार इसे अपना आतंरिक मामला बताते हुए आलोचनाओं को ख़ारिज कर रही है।
नलिन कोहली ने भी दोहराया कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और अनुच्छेद 370 एक अस्थाई प्रावधान था। वो कहते हैं कि इसकी वजह से इलाके में अलगाववाद पनपा और सीमा पार आतंकवाद ने इसे एक संघर्ष वाला इलाका दिखाने की कोशिश की, जबकि असल में ऐसा नहीं है।
नलिन कोहली ने कहा कि अनुच्छेद 370 ने लद्दाख एवं जम्मू- दो बड़े हिस्सों को नज़रअंदाज़ किया और कश्मीर घाटी के लोगों को भी इसकी वजह से काफ़ी कुछ सहना पड़ा। लोग चरमपंथियों द्वारा और चरमपंथ से जुड़ी घटनाओं में मारे गए इसलिए नरेंद्र मोदी सरकार ने इस अनुच्छेद को हटाने का फ़ैसला किया।
आतंकवाद से तंग आ चुके हैं कश्‍मीर के भी लोग
ये भी कहा जा रहा है कि सरकार की कार्यवाही से इलाके के लोगों में आतंकवाद की भावना बढ़ेगी लेकिन बीजेपी के प्रवक्ता का कहना है कि इलाके में ऐसे भी बहुत से लोग हैं जो बंदूक के साए और आतंकवाद के ख़तरे के बीच जीकर तंग आ चुके थे।
नलिन कोहली ने उदाहरण दिया कि, “भारतीय सेना जब अपनी भर्ती करती है तो मुस्लिम बहुल कश्मीर से हज़ारों युवक उसमें हिस्सा लेते हैं। लेकिन जब वो सेना में शामिल हो जाते हैं तो आतंकवादी उन्हें ही उठा लेते हैं और उनकी हत्या कर देते हैं, जैसा औरंगज़ेब के मामले में देखा गया। लेकिन उनकी हत्या के बाद उनके दो भाई भी सेना में शामिल हो गए।”
हिरासत में लिए गए लोगों की संख्‍या भी बढ़ा-चढ़ाकर बताई 
कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद वहां कथित रूप से नेताओं, कारोबारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं समेत 3,000 लोगों को हिरासत में लिए जाने की ख़बरें आईं।
नलिन कहोली कहते हैं कि एहतियातन हिरासत में लिए गए लोगों से जुड़ी खबरें तथ्यात्मक रूप से ग़लत हैं। उनका कहना है कि हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या इससे बहुत कम है।
उन्होंने कहा, “शुरुआत में 600 से 700 लोगों को हिरासत में लिया गया था, अब ये संख्या 300 है. ये बात ग़लत है कि हज़ारों लोगों को हिरासत में लिया गया है।”
“इन घटनाओं से साबित होता है कि लोग विकास चाहते हैं, जिससे उन्हें महरूम रखा गया। वो बंदूक के साए में जीकर तंग आ चुके हैं इसलिए मौजूदा सरकार ने फ़ैसला लिया कि जम्मू और कश्मीर का स्टेटस बदलकर इन्हें केंद्र शासित प्रदेश बनाने से सरकार वहां विकास कर पाएगी, रोज़गार सृजन कर पाएगी.”
क्‍या था BBC की रिपोर्ट में 
BBC ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था- संवैधानिक स्वायत्तता ख़त्म करने के सरकार के फ़ैसले के बाद कश्मीर में तैनात सुरक्षाबलों पर पिटाई और प्रताड़ना के आरोप लग रहे हैं.
कई गाँव वालों ने BBC को बताया है कि उन्हें डंडों और केबल से पीटा गया और बिजली के झटके दिए गए.
BBC रिपोर्टर समीर हाशमी ने दावा किया कि कई गांव वालों ने मुझे अपने घाव दिखाए लेकिन BBC इन आरोपों की पुष्टि अधिकारियों से नहीं कर पाया.
भारतीय सेना ने इन आरोपों को ‘आधारहीन और अप्रमाणित’ बताया है.
अभूतपूर्व पाबंदियों के चलते कश्मीर बीते तीन हफ़्ते से भी ज़्यादा समय से ‘बंद’ की स्थिति में है. पाँच अगस्त को जबसे अनुच्छेद 370 के तहत इस इलाक़े के विशेष दर्ज़े को ख़त्म किया गया है, सूचनाएं बहुत कम आ रही हैं.
इस इलाक़े में दसियों हज़ार अतिरिक्त सुरक्षा बलों को तैनात किया गया है और कथित रूप से सियासी नेताओं, कारोबारी लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं समेत 3000 लोगों को हिरासत में लिए जाने की ख़बरें हैं. कई लोगों को राज्य के बाहर की जेलों में भेजा गया है.
प्रशासन का कहना है कि ये कार्यवाहियां एहतियात के तौर पर और इलाक़े में क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए की गई हैं. जम्मू-कश्मीर मुस्लिम बहुल राज्य है लेकिन अब इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया गया है.
तीन दशक से भी अधिक समय से भारतीय सेना यहां अलगाववादियों से लड़ रही है. भारत पाकिस्तान पर आरोप लगाता है कि वो इलाक़े में चरमपंथियों का समर्थन करके हिंसा को भड़काता है. वहीं पड़ोसी देश पाकिस्तान इन आरोपों से इंकार करता रहा है.
पाकिस्तान का कश्मीर के एक हिस्से पर नियंत्रण है.
पूरे भारत में कई लोगों ने अनुच्छेद 370 को हटाए जाने का स्वागत किया है और इस ‘साहसिक’ फ़ैसले के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ़ की है. इस क़दम को मुख्यधारा के मीडिया में भी व्यापक समर्थन मिला है.
BBC ने इस रिपोर्ट के साथ यह चेतावनी भी लिखी: नीचे दिए गए ब्यौरे कुछ पाठकों को व्यथित कर सकते हैं
मैंने उन दक्षिणी ज़िलों के कम से कम आधा दर्जन गाँवों का दौरा किया, जो पिछले कुछ साल में भारत विरोधी चरमपंथ के गढ़ के रूप में उभरे हैं.
यहां मैंने कई लोगों से रात में छापेमारी, पिटाई और टॉर्चर की एक जैसी दास्तान सुनी.
डॉक्टर और स्वास्थ्य अधिकारी पत्रकारों से किसी भी मरीज़ के बारे में बात करने से बचते हैं चाहे कोई भी बीमारी हो, लेकिन गाँव वालों ने मुझे वो ज़ख़्म दिखाए, जो कथित तौर पर सुरक्षाबलों की पिटाई से हुए थे.
एक गाँव में लोगों ने बताया कि इस फ़ैसले से दिल्ली और कश्मीर के बीच दशकों पुरानी व्यवस्था ख़त्म हो गई, उसके कुछ घंटों बाद ही सेना घर-घर गई थी.
दो भाइयों ने आरोप लगाया कि उन्हें जगाया गया और उन्हें बाहर ले जाया गया जहां गांव के क़रीब एक दर्जन पुरुष इकट्ठा थे.
मुझसे मिलने वाले बाक़ी लोगों की तरह ही वे भी कार्यवाही के डर से अपनी पहचान नहीं बता रहे थे.
उनमें एक ने कहा, “उन्होंने हमारी पिटाई की. हम उनसे पूछ रहे थे कि हमने क्या किया है. आप गाँव वालों से पूछ सकते हैं, अगर हम झूठ बोल रहे हैं या हमने कुछ ग़लत किया है तो. लेकिन वो कुछ भी सुनने को राज़ी नहीं थे, उन्होंने कुछ नहीं कहा, वो केवल हमें पीटते रहे.”
“उन्होंने हमारे शरीर के हर हिस्से पर मारा. हमें लात मारी, डंडों से पीटा, बिजली के झटके दिए, केबल से हमें पीटा. हमें पैरों के पीछे मारा. जब हम बेहोश हो गए तो उन्होंने होश में लाने के लिए बिजली के झटके दिए. जब उन्होंने हमें डंडों से पीटा और हम चीख उठे तो उन्होंने हमारा मुंह कीचड़ से भर दिया.”
“हमने उन्हें बताया कि हम निर्दोष हैं. हमने पूछा कि वो ऐसा क्यों कर रहे हैं? लेकिन उन्होंने हमारी एक न सुनी. मैंने उनसे कहा कि हमें पीटो मत, हमें गोली मार दो. मैं ख़ुदा से मना रहा था कि वो हमें अपने पास बुला ले क्योंकि प्रताड़ना असहनीय थी.”
एक अन्य ग्रामीण युवक ने बताया कि सुरक्षा बल उससे लगातार यही पूछ रहे थे कि “पत्थरबाजों के नाम बताओ”, वे अधिकांश युवाओं और किशोर लड़कों का हवाला दे रहे थे, जो पिछले दशक में कश्मीर घाटी में नागरिक प्रदर्शनों का चेहरा बन चुके हैं.
उन्होंने कहा कि वो किसी को नहीं जानते, इसके बाद उन्होंने चश्मा, कपड़े और जूते निकालने को कहा.
“जब मैंने अपने कपड़े उतार दिए तो उन्होंने बेदर्दी से मुझे रॉड और डंडों से क़रीब दो घंटे तक पीटा. जब मैं बेहोश हो जाता तो वो मुझे होश में लाने के लिए बिजली के झटके देते.”
उन्होंने बताया, “अगर उन्होंने मेरे साथ फिर ऐसा किया तो मैं कुछ भी कर गुजरूंगा, मैं बंदूक उठा लूंगा. मैं हर रोज़ ये बर्दाश्त नहीं कर सकता.”
युवक ने बताया, ”सैनिकों ने मुझसे कहा कि मैं अपने गाँव में हर-एक को चेता दूं कि अगर किसी ने भी सुरक्षाबलों के ख़िलाफ़ किसी भी प्रदर्शन में हिस्सा लिया तो उन्हें ऐसे ही नतीजे भुगतने पड़ेंगे.”
सभी गाँवों में हमने जितने लोगों से बात की उन सभी का मानना था कि सुरक्षाबलों ने ऐसा गाँव वालों को डराने के लिए किया था ताकि वो प्रदर्शन करने को लेकर डर जाएं.
सेना ने बाकायदा दिया BBC को जवाब 
BBC को भेजे जवाब में भारतीय सेना ने कहा है कि “जैसा आरोप है, उसने किसी भी नागरिक के साथ मारपीट नहीं की।”
सेना के प्रवक्ता कर्नल अमन आनंद ने कहा, “इस किस्म के कोई विशेष आरोप हमारे संज्ञान में नहीं लाए गए हैं। संभव है कि ये आरोप विरोधी तत्वों की ओर से प्रेरित हों।”
उन्होंने कहा, “नागरिकों को बचाने के लिए क़दम उठाए गए थे लेकिन सेना की ओर से की गई कार्यवाही के कारण कोई घायल या हताहत नहीं हुआ है।”
खुद समीर हाशमी लिखते हैं कि हम ऐसे कई गाँवों में गए जहां अधिकांश निवासियों में अलगाववादी और आतंकवादी समूहों के प्रति सहानुभूति थी और उन्होंने उन्हें ‘स्वतंत्रता सेनानी’ बताया।
कश्मीर के इसी इलाक़े में पुलवामा ज़िला है जहां फ़रवरी में हुए एक आत्मघाती हमले में 40 से अधिक भारतीय सैनिक मारे गए थे और इसकी वजह से भारत और पाकिस्तान युद्ध की कगार पर पहुंच गए थे।
ये वही इलाक़ा है जहां कश्मीरी चरमपंथी बुरहान वानी साल 2016 में मारा गया था, जिसके बाद बहुत सारे युवा और आक्रोशित कश्मीरी भारत के ख़िलाफ़ हथियारबंद बग़ावत में शामिल हुए थे.
इस इलाक़े में सेना का एक कैंप है और चरमपंथियों और समर्थकों को पकड़ने के लिए सैनिक नियमित रूप से तलाशी अभियान चलाते हैं लेकिन गाँव वालों का कहना है कि वो दोनों तरफ़ की कार्यवाहियों के बीच अक्सर फँस जाते हैं.
समीर हाशमी के अनुसार एक गाँव में, मैं एक नौजवान से मिला जिसने बताया कि सेना ने उसे धमकी दी थी कि अगर वो चरमपंथियों के ख़िलाफ़ इन्फ़ार्मर नहीं बनता तो उन्हें फंसा दिया जाएगा. उसका आरोप है कि जब उसने इंकार किया तो उनकी इस क़दर पिटाई की गई कि दो हफ़्ते तक वो पीठ के बल सो नहीं सका.
BBC ने अपनी रिपोर्ट में ये भी लिखा 
उन्होंने कहा, “अगर ये जारी रहा तो मेरे सामने अपना घर छोड़ने के अलावा और कोई चारा नहीं बचेगा. वे हमें ऐसे पीटते हैं जैसे हम जानवर हों. वे हमें इंसान नहीं मानते हैं.”
एक अन्य आदमी ने मुझे अपने जख़्म दिखाए और कहा कि उन्हें ज़मीन पर गिरा दिया गया और “15-16 सैनिकों” ने “केबल, बंदूकों, डंडों और शायद लोहे के रॉड” से बुरी तरह पीटा.
“मैं बेहोशी की हालत में पहुंच गया था. उन्होंने मेरी दाढ़ी इतनी ज़ोर से खींची कि मुझे लगा कि मेरे दांत बाहर निकल आएंगे.”
उसने बताया कि इस मारपीट के दौरान मौजूद रहे एक बच्चे ने बाद में उसे बताया कि एक सैनिक ने उनकी दाढ़ी जलाने की कोशिश की लेकिन उन्हें एक दूसरे सैनिक ने रोक दिया.
एक और गांव में मैं एक अन्य नौजवान से मिला जिसने बताया कि दो साल पहले उसका भाई हिज़्बुल मुजाहिदीन में शामिल हो गया था, जो कश्मीर में लड़ने वाले बड़े ग्रुपों में से एक है.
उसने कहा कि हाल ही में एक आर्मी कैंप में उससे पूछताछ की गई. उसका आरोप है कि वहां उन्हें प्रताड़ित किया गया और उसका एक पैर टूट गया.
उसने बताया, “उन्होंने मेरे हाथ और पैरों को बांध दिया और उल्टा लटका दिया. दो घंटे से भी अधिक समय तक उन्होंने मेरी बुरी तरह पिटाई की.”
ये फेक न्‍यूज़ नहीं तो और क्‍या है
BBC की इस पूरी रिपोर्ट पर गौर करें तो बहुत असानी से समझा जा सकता है कि रिपोर्टर पूर्वाग्रह से ग्रसित है और बार-बार अपनी ही रिपोर्ट को संदेह के घेरे में खड़ा कर रहा है.
वह बार-बार लिखता है कि BBC इन आरोपों की पुष्टि अधिकारियों से नहीं कर पाया.
रिपोर्टर यह भी लिखता है कि वो बुरहान वानी के गांव में था जहां उसकी मौत के बाद तमाम युवक भारत के ख़िलाफ़ हथियारबंद बग़ावत में शामिल हुए थे.
संयुक्‍त राष्‍ट्र में भी ब्रिटेन ने किया था पाकिस्‍तान का सहयोग
यहां यह जान लेना भी बहुत जरूरी है कि संयुक्‍त राष्‍ट्र में बीते दिनों जब कश्‍मीर मुद्दे को लेकर चीन की पहल पर एक बंद कमरे में चर्चा की गई थी तब चीन के अतिरिक्‍त ब्रिटेन ही ऐसा दूसरा देश था जिसने भारत को कठघरे में खड़ा करने की असफल कोशिश की.
भारत विरोधी मुहिम का हिस्‍सा है BBC
5 अगस्‍त जिस दिन मोदी सरकार ने कश्‍मीर से अनुच्‍छेद 370 हटाने का ऐलान किया, तब से लेकर अब तक BBC में कश्‍मीर पर जितनी खबरें प्रकाशित हुई हैं, उन्‍हें पढ़ने के बाद कोई भी आसानी से यह पता लगा सकता है कि भारत विरोधी मुहिम का हिमायती ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोंरेशन BBC लगातार उन्‍हीं खबरों को प्राथमिकता दे रहा है जनसे कश्‍मीर का घिनौना चेहरा सामने लाया जा सके.
आश्‍चर्य की बात यह है कि विश्‍व का एक बड़ा मीडिया हाउस कश्‍मीर पर अपनी रिर्पार्ट के साथ यह लिखने में कतई लज्‍जा महसूस नहीं करता कि वह अपने आरोपों में पुष्‍टि नहीं कर सकता क्‍योंकि वह किसी अधिकारी से बात नहीं कर सका।
इससे भी बड़े आश्‍चर्य का विषय यह है कि जिन आरोपों की पुष्‍टि खुद BBC रिपोर्टर नहीं कर पाया, उन्‍हीं आरोपों के साथ वह लंबी-चौड़ी रिपार्ट बड़ी बेशर्मी से प्रकाशित कर रहा है।
देखा जाए तो भारत सरकार को BBC के खिलाफ भी उसी तरह कुछ कठोर कदम उठाने चाहिए जिस तरह उसने फेसबुक व टि्वटर जैसे सोशल मीडिया के खिलाफ उठाए थे और कश्‍मीर को लेकर अफवाह फैलाने वालों को बेनकाब किया था।
-Legend News
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