मंगलवार, 26 मई 2020

डूबने के कगार पर ‘नयति’, वेंटिलेटर‍ तक पहुंचा ‘नीरा राडिया’ का मल्टी सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल

28 फरवरी 2016 को नयति हॉस्‍पिटल का उद्घाटन करते उद्योगपति रतन टाटा, साथ हैं चेयरपरसन नीरा राडिया
बहुत दिन नहीं हुए जब देश के प्रमुख उद्योगपति रतन टाटा ने ”2G स्‍पैक्‍ट्रम” घोटाला फेम और ”पनामा लीक्‍स” चर्चित महिला लाइजनर ”नीरा राडिया” के हॉस्‍पिटल ‘नयति’ का मथुरा में भव्‍य उद्घाटन किया था।

राष्‍ट्रीय राजमार्ग नंबर- 2 के किनारे बने इस हॉस्‍पिटल के प्रमोटर्स में चार्टर्ड एकाउंटेंट दीनानाथ चतुर्वेदी के पुत्र राजेश चतुर्वेदी का नाम भी शामिल है। दीनानाथ चतुर्वेदी मूल रूप से मथुरा के ही निवासी हैं।


अब बताते हैं कि खोटी नीयत के चलते ‘नयति’ ही अपनी ‘नियति’ के करीब है और वेंटिलेटर‍ पर पहुंच चुका है।
रविवार 28 फरवरी 2016 को नयति के उद्घाटन समारोह में पद्म विभूषण रतन टाटा ने कहा था कि इसके पीछे व्यक्तिगत बलिदान के साथ समाज सेवा का एक जुनून है और सच्ची चाहत है।
नयति हेल्थकेयर की चेयरपरसन नीरा राडिया ने भी कहा था कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के लोगों को उनके क्षेत्र में ही विश्वस्तरीय स्वास्थ्य देखभाल की सुविधा प्रदान करने का अवसर हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
हमारा उद्देश्य छोटे शहरों में मरीजों को उपचार की सुविधा प्रदान कर आम लोगों पर बीमारी की वजह से पड़ने वाले शारीरिक, भावनात्मक और आर्थिक बोझ को कम करना है।
नयति द्वारा विधिवत् काम शुरू कर देने के बाद पता लगा कि मथुरा के लोगों की सेवा करने तथा उन्‍हें अत्‍याधुनिक सुविधाएं मुहैया कराने के प्रचार सहित खोले गए इस हॉस्‍पिटल में चिकित्‍सा काफी महंगी है और जनसामान्‍य के लिए तो वहां उपचार कराना संभव ही नहीं है।
देखते-देखते नयति से ऐसी खबरें भी बाहर आने लगीं कि वहां लोगों से पैसे वसूलने के लिए वो सारे हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, जिनके लिए दूसरे मशहूर अस्‍पताल पहले से बदनाम हैं।
मसलन मरीज की नाजुक स्‍थिति का हवाला देकर मोटी रकम जमा करा लेना, विशेषज्ञ चिकित्‍सकों की आड़ में मनमानी फीस वसूलना, पैसा जमा करने में जरा सी भी देरी हो जाने पर मरीज व उसके परिजनों के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग करना तथा कैजुअलिटी हो जाने पर पूरा बिल वसूल किए बिना ‘लाश’ तक पर कब्‍जा कर लेना आदि।
मात्र चार साल में नयति और उसकी खोटी नीयत एक-दूसरे के पूरक बन गए, नतीजतन आए दिन झगड़े होना और बात पुलिस-प्रशासन तक पहुंचना आम बात हो गई।
हालांकि ऊंची पहुंच और मथुरा से लेकर लखनऊ और दिल्‍ली तक शासन एवं प्रशासन में गहरी पैठ होने के कारण पीड़ितों को हर बार मुंह की खानी पड़ी।
नीरा राडिया के हाईप्रोफाइल स्‍टेटस का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रमुख मीडिया संस्‍थान भी उसके या नयति के खिलाफ एक शब्‍द लिखने अथवा बोलने की हिमाकत नहीं करते।
मौके-बेमौके प्रमुख अखबारों में नयति के छपने वाले बड़े-बड़े विज्ञापन और उसकी प्रशंसा में लिखे जाने वाले समाचार यह समझाने के लिए काफी हैं कि कोई ऐरा-गैरा तो क्‍या, विशिष्‍ट कहलाने वाले लोग भी नयति की शान में गुस्‍ताखी करने वाला समाचार नहीं छपवा सकते।
बेशक कुछ मीडियाकर्मी समय-समय पर नयति के कारनामों को उजाकर करने की हिम्‍मत दिखाते रहे हैं किंतु उन्‍हें उसकी कीमत कभी लीगल नोटिस के जरिए तो कभी ब्‍लैकमेलर प्रचारित करके चुकानी पड़ी है।
मीडिया को साधने वाले नयति के जनसंपर्क विभाग की बात करें तो हर विवाद में हॉस्‍पिटल प्रशासन ही सही होता है और शिकायतकर्ता तथा पीड़ितों के परिजन गलत। शायद ही कभी किसी मामले में नयति के प्रबंधतंत्र ने ये स्‍वीकार किया हो कि चूक उनसे भी हो सकती है।
बहरहाल, हाल ही में नयति के अमानवीय आचरण से जुड़े ऐसे दो मामले फिर सामने आए हैं जिनमें मरीजों को जान गंवानी पड़ी है किंतु नयति ने इन दोनों मामलों में भी खुद को सही ठहराते हुए सारा दोष पीड़ित परिजनों के सिर थोप दिया है।
हॉस्‍पिटल से जुड़े अत्‍यंत भरोसमंद सूत्रों का कहना है कि सेवा की आड़ में मनमानी करने के नयति के रवैए की एक बड़ी वजह उसका जहाज डूबने की नौबत आना है।
सूत्रों के अनुसार नयति अब अपना ही बोझ ढो पाने में खुद को असहाय महसूस कर रहा है। कई बड़े डॉक्‍टर पिछले कुछ समय के अंदर नयति छोड़कर जा चुके हैं। स्‍टाफ को समय से वेतन न मिलना तथा तय वेतन में से कटौती करना आम बात हो गई है।
पांच साल से भी कम समय में ‘नयति’ की यह ‘नियति’ बताती है कि नीरा राडिया और उसके लोग चाहे कैसे भी दावे करें परंतु आम आदमी उसकी नीयत पहचान चुका है। यही कारण है कि किसी मरीज के ठीक होने का समाचार जहां नयति के प्रशासन को प्रेस विज्ञप्‍ति भेजकर छपवाना पड़ता है वहीं विवाद होने पर साम, दाम दण्‍ड भेद की नीति अपनाकर समाचारों को छपने से रोकना पड़ जाता है।
आगे आने वाले समय में नयति किस गति को प्राप्‍त होगा, इस बात को यदि ‘नियति’ पर छोड़ दिया जाए तो जरूरी है कि उसकी शुरूआत से लेकर अब तक उसके हर क्रिया-कलाप को जांच के दायरे में लाया जाए और पता किया जाए कि आखिर क्‍यों अत्‍याधुनिक उपकरणों से सुसज्‍जित कृष्‍ण की नगरी के इस हॉस्‍पिटल में जितने लोगों को जीवनदान नहीं मिला, उससे अधिक लोगों को अकाल मौत प्राप्‍त हुई?
नयति की स्‍थापना से लेकर अब तक वहां हुई मौतों का आंकड़ां यदि देखा जाए तो बहुत सी बातें खुद-ब-खुद साफ हो जाती हैं।
इस सबके बावजूद चूंकि कानूनी पहलुओं के लिए सबूतों की दरकार होती है इसलिए जरूरी है कि नयति के कारनामों की जांच किसी केंद्रीय एजेंसी से कराने की पुरजोर मांग ब्रजवासियों के स्‍तर से की जाए अन्‍यथा यदि नीरा राडिया का जहाज डूब भी गया तो चार वर्ष से अधिक समय में किए गए उसके कृत्‍यों का हिसाब अधूरा रह जाएगा।
ब्रजवासियों को चाहिए कि बाकायदा अभियान चलाकर नयति की नीयत सार्वजनिक करें और विभिन्‍न कारणों से आवाज उठाने में असमर्थ रहे लोगों को न्‍याय दिलाएं ताकि फिर कोई नीरा राडिया कृष्‍ण की नगरी के नागरिकों की भावनाओं का इतनी बेहरहमी के साथ दोहन न कर सके।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

सोमवार, 18 मई 2020

पत्रकारिता और पत्रकारों को समर्पित है यह आर्टिकल क्‍योंकि…

This article is dedicated to journalism and journalists because ...


अधिकांशत: पत्रकारों का एक बड़ा वर्ग इस बात से क्षुब्‍ध रहता है कि सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के अधीन कार्यरत जिला सूचना अधिकारी उन्‍हें तरजीह नहीं देते।
वो पत्रकारों के बीच न सिर्फ भेदभाव बरतते हैं बल्‍कि उन्‍हें बड़े और छोटे में विभक्‍त करते हैं। सतही तौर पर देखें तो उनकी यह पीड़ा जायज लगती है परंतु हकीकत कुछ और है।
हकीकत जानने के लिए पत्रकारों को एक ओर जहां पहले अपने अधिकार और कर्तव्‍य जानने होंगे वहीं दूसरी ओर ‘जिला सूचना अधिकारी’ के पद की वास्‍तविकता और सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के औचित्‍य को भी समझना होगा।
सबसे पहले तो पत्रकारों को अपने दिमाग से यह निकालना होगा कि जिला सूचना अधिकारी, कोई उनके ऊपर बैठा सरकारी अधिकारी है। सच तो यह है कि जिला सूचना अधिकारी उनसे है, वो जिला सूचना अधिकारी से नहीं हैं।
जिला सूचना अधिकारी देशभर में जिलाधिकारी के पीआरओ की भूमिका निभाते हैं इसलिए वो ‘यथा राजा तथा प्रजा’ की कहावत को ही चरितार्थ करते हैं। उनसे इससे अधिक की अपेक्षा की भी नहीं जा सकती।
इसके अलावा पत्रकारों को उस दौर की रटी-रटाई पत्रकारिता से बाहर निकलना होगा जिसमें सूचना अधिकारी ही उसके पास सूचना का एकमात्र स्‍त्रोत हुआ करता था। आज हर पल विभिन्न माध्‍यमों से खबरें तैरती रहती हैं। जिला सूचना अधिकारी आपको उनमें से कोई सूचना देने के लिए अधिकृत भी नहीं है। यदि आप उनमें से विश्‍वसनीय खबरों का संकलन कर पाते हैं तो सूचना विभाग चलकर आपके पास आएगा, आपको सूचना विभाग का मुंह देखने की कभी जरूरत महसूस नहीं होगी।
जहां तक सवाल पत्रकारों को मान्‍यता देने अथवा दिलाने का है तो उसका लोभ भी पत्रकारों को छोड़ देना चाहिए क्‍योंकि आज खुद सूचना विभाग ही मान्‍यता का मोहताज है। जनसामान्‍य तो जानता तक नहीं कि जिले में कोई सूचना विभाग भी होता है और वो पत्रकारों को मान्‍यता दिलाता है। आम आदमी के लिए हर वो व्‍यक्‍ति पत्रकार के रूप में मान्‍य है जो उनके बीच काम करता है और उनकी समस्‍याओं को अपने माध्‍यम से उठाता है।
वो समय भी बीत गया जब सूचना विभाग अखबारों की कटिंग चिपकाकर ऊपर तक फाइल भेजा करता था। आज सूचना विभाग जब तक किसी कटिंग पर निशान लगाने की सोचता है, तब तक तो सोशल मीडिया के माध्‍यम से वो खबर शासन के हर वर्ग तक पहुंच चुकी होती है।
सोशल मीडिया के जमाने में सूचना एवं जनसंपर्क विभाग और उसके अधीनस्‍थ कार्यरत जिला सूचना अधिकारी आउट डेटेड हो चुके हैं। जब तक उसे सरकार अपडेट नहीं करती तब तक उसका होना या न होना कोई मायने नहीं रखता। इनफेक्‍ट सूचना अधिकारी का पद औचित्‍यहीन हो गया है।
और हां, जो पत्रकार किसी सरकारी विभाग अथवा सरकार के अधिकारी से कोई मान-सम्‍मान पाने की अपेक्षा रखते हों तो उन्‍हें समझ लेना चाहिए कि सम्‍मान कभी किसी को भीख में नहीं मिलता।
सच तो यह है कि सूचना विभाग ही नहीं, प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया भी अपना महत्‍व खो चुकी है। आज तक उसके दायरे में न इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया है और न वेब मीडिया या सोशल मीडिया।
जिस प्रिंट मीडिया के लिए उसका महत्‍व है, वो भी वेब मीडिया के बिना आज अधूरा है इसलिए प्रेस काउंसिल एक ऐसी अपूर्ण संस्‍था बनकर रह गई है जो सिर्फ अधिकार और कर्तव्‍यों की लकीर पीट रही है।
यूं भी यदि किसी पत्रकार पर कोई हमला होता है, या उसका किसी के द्वारा उत्‍पीड़न किया जाता है तो प्रेस काउंसिल के पास कोई दंडात्‍मक कार्यवाही करने का अधिकार पहले से नहीं है। उसके पास अधिकतम अधिकार संस्‍तुति करने का है, जिसे मानना या न मानना संबधित विभाग के अधिकारियों पर निर्भर करता है। और यदि पत्रकार न्‍यायालय की शरण में चला जाता है तो प्रेस काउंसिल के पास दखल देने का उतना अधिकार भी नहीं रह जाता।
आज से ठीक तीन साल पहले प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के तत्‍कालीन अध्‍यक्ष न्यायमूर्ति सीके प्रसाद ने कहा था कि सभी प्रकार की मीडिया को इस वैधानिक निकाय के दायरे में लाना चाहिए किंतु आज तक कुछ नहीं हुआ। इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया ने अपनी एक स्‍वयंभू संस्‍था का गठन किया हुआ है और वेब मीडिया के लिए तो डोमेन नेम तक अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर रजिस्‍टर्ड होता है। ऐसे में सूचना विभाग का उसके लिए कोई अर्थ नहीं रह जाता।
इन परिस्‍थितियों में पत्रकारों को यदि मांग ही करनी है तो इस बात की करनी चाहिए कि सरकार या तो सूचना एवं जनसंपर्क विभाग को अपडेट करे या फिर उसे समाप्‍त कर दे।
इस आर्टिकल के साथ लगाया गया इजिप्‍ट के एक पेंटर का पत्रकारों एवं पत्रकारिता को रेखांकित एवं परिभाषित करता हुआ चित्र संभव है कि बहुत से पत्रकारों को समझ में न आए, लेकिन कोशिश जरूर कीजिए क्‍योंकि यदि समझ में आ गया तो अधिकारियों को आपसे शिकायत होगी, आपको अधिकारियों से नहीं।
– सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी





मंगलवार, 12 मई 2020

इनसे मिलिए… ये हैं मथुरा की ‘लॉकडाउन’ सांसद ‘हेमा जी’, परेशान हैं मदद कीजिए प्‍लीज!

इनसे मिलिए…. ये हैं फिल्‍मी दुनिया में ‘स्‍वप्‍न सुंदरी’ का खिताब प्राप्‍त ‘अभिनेत्री’ हेमा मालिनी। अपने ‘सौभाग्‍य’ और जनता के ‘दुर्भाग्‍यवश’ ये कृष्‍ण की नगरी मथुरा से ‘सांसद भी’ हैं। इनके सामने बैठे हैं महाराष्‍ट्र के राज्‍यपाल महामहिम भगत सिंह कोश्‍यारी जी।
लगातार दूसरी बार मोदी जी की मेहरबानी और कृष्‍ण की नगरी के लोगों की कृपा से लोकसभा पहुंचीं हेमा जी इन दिनों मुंबई स्‍थित अपने ‘घर’ में ‘लॉकडाउन’ हैं।
वैसे उनका एक घर वृंदावन (मथुरा) की ‘ओमेक्‍स सिटी’ में भी है लेकिन रहती वो जुहू (मुंबई) में ही हैं। यूं भी ओमेक्‍स सिटी का घर ‘दान की बछिया’ सरीखा है, इसलिए उसे जाने दीजिए।
यूं भी हेमा जी ने दूसरी बार चुनाव मैदान में उतरने से पहले ही कह दिया था कि ये उनका मथुरा से आखिरी चुनाव है इसलिए कोई ये नहीं कह सकता कि उन्‍होंने किसी को धोखे में रखा। अथवा मथुरा की जनता को गुमराह किया। अब जनता ही गुमराह हो जाए तो इसके लिए हेमा जी कहां कसूरवार हैं।
बात की धनी हेमा जी ने मथुरा जिले की सीमा में घर बनाने का वादा किया था, वो निभा दिया। सुख-दुख में “साथ रहने” का आश्‍वासन तो शायद उन्‍होंने कभी दिया नहीं था लिहाजा उसकी चर्चा अब क्‍यों।
दरअसल, लॉकडाउन में निठल्ले बैठे कुछ ‘विपक्षी दल’ टाइप के लोग ऐसी शिकायत कर रहे थे कि लॉकडाउन के दो टर्म पूरे हो गए और तीसरा भी पूरा होने को आया किंतु हमारी सांसद कहीं दिखाई नहीं दे रहीं।
विपक्षी टाइप के लोगों (चाहे वो अपनी पार्टी के ही क्‍यों न हों) का तो काम ही है मीन-मेख निकालना इसलिए निकालने लगे। लेकिन हेमा जी ठहरी दया की मूर्ति और करुणावतार, लिहाजा सहन नहीं हुए बेबुनियाद आरोप। जा बैठीं तुरंत महाराष्‍ट्र के राज्‍यपाल महोदय के सामने और कहने लगीं, मेरे मथुरा की जनता बहुत परेशान है। उनकी परेशानी मैंने ‘देखी तो नहीं है’ लेकिन ‘सुनी’ अवश्‍य है।
महामहिम जरा विचार कीजिए कि जिसे मात्र सुनकर ही मैं ”मुंबई से मुंबई तक” दौड़ी चली आई, उसे देख रहे और भोग रहे लोगों का क्‍या हाल होगा। कुछ कीजिए न।
खुद हेमा जी के शब्‍दों में बहुत से लोगों ने उन्‍हें फोन करके अपनी परेशानी बताई और पूछा कि उन्‍हें अगर मथुरा जाना है तो कैसे जाएं ?
माफ कीजिए, हेमा जी को कोई सपना नहीं आया था कि उनके संसदीय क्षेत्र से भी कुछ लोग महाराष्‍ट्र में रहते हैं और घर जाने के लिए परेशान हैं। वो भाजपा के वीआईपी कोटे से सांसद हुई हैं, कोई ऐरी-गैरी सांसद नहीं हैं जो खुद पता कर लें कि क्षेत्र के लोग किसी परेशानी में तो नहीं हैं।
पता करें भी क्‍यों, आज के जमाने में तो कोई वार्ड मेंबर या पार्षद नहीं पूछता क्षेत्र की जनता का हाल, फिर वो तो विशिष्‍ट सांसद हैं।
बहरहाल, अपने संसदीय क्षेत्र की जनता का दुख सुनकर हेमा जी इतनी द्रवित हो उठीं कि ‘लॉकडाउन की परवाह किए बिना और ‘मुंह पर मास्‍क’ भी लगाने की सुध-बुध न रखते हुए सीधे गवर्नर हाउस जा पहुंची। मास्‍क लगा लेतीं तो उनकी मुस्‍कुराहट का क्‍या होता। कैसे पता लगता कि आमलोगों का खास दुख भी वो कैसे हंसते-हंसते कटवा देती हैं।
राज्‍यपाल भगत सिंह कोश्‍यारी से मुस्‍कुराते हुए उन्‍होंने न सिर्फ महाराष्‍ट्र में रह रहे मथुरा के लोगों का दुख व्‍यक्‍त किया बल्‍कि मथुरा के अस्‍पतालों में एक गर्भवती महिला के साथ हुए दुर्व्‍यवहार का भी जिक्र किया। यकीन न हो तो नीचे स्‍वयं सुन लें अपने कानों से और हेमा जी के मुखारबिंद से

आपने सुन लिया होगा कि हेमा जी ने इस दौरान महाराष्‍ट्र के गवर्नर से महाराष्‍ट्र की भी बात की और देश से लेकर विदेशों तक में फैले मथुरा के लोगों को वापस भेजने का इंतजाम करने की बात कही।
हेमा जी को लगा कि उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ इसके लिए उपयुक्‍त नहीं रहेंगे क्‍योंकि उनसे फिलहाल मुलाकात कर पाना संभव नहीं होता। मुलाकात नहीं होती तो फोटो नहीं खिंचता, फोटो नहीं खिंचता तो न्‍यूज़ नहीं बनती। फोन पर वार्तालाप करने की बात कहकर न्‍यूज़ छपवाने में से वो वजन नहीं पड़ता जो सीधे गवर्नर साहब के साथ फोटो खिंचवाकर स्‍टेटमेंट जारी करने से पड़ा।
अब योगी जी को भी पता लग गया कि वो अकेले अपनी यूपी के मजदूरों को लेकर हलकान नहीं हुए जा रहे, मुंबई में लॉकडाउन हेमा जी भी उनके साथ कंधे से कंधा मिलाकर लगी हुई हैं। योगी जी अगर हेमा जी की एक आवाज पर मथुरा में होली खेलने आ सकते हैं तो क्‍या हेमा जी उनके लिए जुहू से गवर्नर हाउस नहीं जा सकतीं।
वो ये जानते हुए भी गईं कि अब उन्‍हें मथुरा से तीसरा चुनाव नहीं लड़ना। जुहू से गवर्नर हाउस कितने किलोमीटर दूर है, इसका अंदाज यदि विपक्षी टाइप के पार्टीजनों को होता तो वो ऐसी-वैसी बे-सिरपैर की बातें न करते। लॉकडाउन तोड़कर उतने किलोमीटर निकलना इतना आसान समझते तो निकलके दिखाओ न। हेमा जी पर उंगली मत उठाओ।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

शुक्रवार, 8 मई 2020

बहुत कुछ कहता है ‘कोरोना वॉरियर्स’ पत्रकार पंकज कुलश्रेष्‍ठ का ‘बलिदान’, श्रद्धांजलि देकर काम न चलाएं


Says a lot 'Corona Warriors' journalist Pankaj Kulshreshtha's 'sacrifice'

लगभग ढाई दशक से दैनिक जागरण में सेवारत और फिलहाल उप समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत पत्रकार पंकज कुलश्रेष्‍ठ का कल देर शाम निधन हो गया। दैनिक जागरण के आगरा संस्‍करण में चौथे पन्‍ने पर छपे दो कॉलम वाले छोटे से समाचार के मुताबिक उनके कोरोना संक्रमित होने की पुष्‍टि 4 मई को हुई।
पंकज कुलश्रेष्‍ठ ‘मथुरा’ में भी करीब 8 साल दैनिक जागरण के ‘ब्‍यूरो चीफ’ रहे लिहाजा कृष्‍ण नगरी के लिए उनका नाम भली प्रकार जाना पहचाना था। यही कारण रहा कि दैनिक जागरण के मथुरा संस्‍करण में भले ही उनके निधन की खबर अगले दिन यानि ‘आज भी नहीं छपी’ और एक अन्‍य प्रमुख अखबार ने छापी भी तो कोरोना से मरने वालों की संख्‍या के साथ, बिना किसी परिचय के ढाई लाइन लिखकर। इस तरह दो प्रमुख अखबारों ने अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर ली और तीसरे ने इतना भी जरूरी नहीं समझा, किंतु मथुरा में विभिन्‍न माध्‍यमों से कल ही उनके निधन की सूचना सोशल मीडिया पर तैरने लगी थी।
यूं तो किसी भी पत्रकार का असमय जाना पत्रकार जगत को कभी नहीं चौंकाता क्‍योंकि पत्रकारिता का पेशा ही ऐसा है किंतु पंकज की मृत्‍यु जिन परिस्‍थितियों में हुई है, वो न सिर्फ ‘पत्रकारिता’ बल्‍कि बड़े-बड़े मीडिया संस्‍थानों और शासन-प्रशासन सहित पत्रकारों के उन तथाकथित संगठनों पर भी सवाल खड़े करती है जिनके पदाधिकारी विशुद्ध राजनेताओं की तरह आचरण करते हुए पत्रकारों के हितों की हिमायत का ढकोसला करते हैं।
आज भी बहुत कम लोग इस कड़वे सच से वाकिफ होंगे कि पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्‍तंभ सिर्फ ‘कहा जाता है’, क्‍योंकि उसे ऐसे कोई संवैधानिक अधिकार प्राप्‍त नहीं हैं जैसे बाकी तीनों स्‍तंभों न्‍यायपालिका, विधायिका तथा कार्यपालिका को प्राप्‍त हैं।
देश ने पत्रकारों को पिछले 70 वर्षों से लोकतंत्र के ‘चौथे स्‍तंभ’ का ‘तथाकथित सम्‍मान’ एक झुनझुने की तरह थमा रखा है जिसे बजा-बजाकर वह यदा-कदा खुश हो लेते हैं। मजे की बात ये है कि वह झुनझुना भी ‘पत्रकारों’ के हाथ में न होकर मीडिया संस्‍थानों के हाथ में है जो किसी नजरिए से पत्रकार नहीं कहे जा सकते। वो ठीक उसी प्रकार विशुद्ध व्‍यापारी व उद्योगपति हैं जिस प्रकार कोई दूसरा व्‍यापारी अथवा उद्योगपति होता है और जिसके लिए उसके कारिंदे ‘कामगार’ होते हैं।
यदि ऐसा नहीं होता तो दिवतिया आयोग, शिंदे आयोग, पालेकर आयोग, बछावत आयोग, मणिसाना आयोग और उसके बाद मजीठिया वेतन आयोग तक की सिफारिशें यूं जाया नहीं होतीं और तमाम बातों का स्‍वत: संज्ञान लेने वाला सर्वोच्‍च न्‍यायालय भी तमाशबीन बना न बैठा होता।
क्‍या कहती हैं इन आयोगों की सिफारिशें और सुप्रीम कोर्ट के आदेश-निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने 7 फरवरी 2014 को अखबारों एवं समाचार एजेंसियों को मजीठिया आयोग की सिफारिशें लागू करने का आदेश दिया और कहा कि वे अपने कर्मचारियों को संशोधित पे स्केल के हिसाब से भुगतान करें।
न्यायालय के आदेश के अनुसार यह वेतन आयोग 11 नवंबर 2011 से लागू होना था, जब इसे सरकार ने पेश किया था और 11 नवंबर 2011 से मार्च 2014 के बीच बकाया वेतन भी पत्रकारों को एक साल के अंदर चार बराबर किस्तों में दिया जाना था।
आयोग की सिफारिशों के अनुसार अप्रैल 2014 से नया वेतन लागू होना चाहिए था। तत्कालीन चीफ जस्टिस पी. सतशिवम और जस्टिस रंजन गोगोई तथा जस्टिस एसके सिंह की बेंच ने इस आयोग की सिफारिशों को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर दीं।
बेंच ने आयोग की सिफारिशों को वैध ठहराया और कहा कि सिफारिशें उचित विचार-विमर्श पर आधारित हैं इसलिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इसमें हस्तक्षेप करने का कोई वैध आधार नहीं है।
बहरहाल, तमाम अखबारों के प्रबंधन मजीठिया आयोग के विधान, काम के तरीके, प्रक्रियाओं और सिफारिशों से नाखुश थे। इनका मानना था कि अगर इन सिफारिशों को पूरी तरह माना गया तो वेतन में एकदम से 80 से 100 फीसदी तक इजाफा करना पड़ सकता है और जिस कारण छोटे और कमजोर समूहों व कंपनियों पर तालाबंदी का अंदेशा बढ़ा सकता है। दलील यह भी थी कि अन्य उद्योगों की तुलना में प्रिंट मीडिया में गैर-पत्रकार कर्मचारियों को वैसे भी ज्यादा वेतन दिया जा रहा है। अगर सिफारिशें लागू की गईं तो वेतन में अंतर का यह दायरा और बढ़ जाएगा। हालांकि सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इनमें से किसी दलील को तवज्जो नहीं दी। साथ ही कहा कि यह केंद्र सरकार का विशेषाधिकार है कि वह सिफारिशों को मंजूर करे या खारिज़ कर दे। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर सरकार ने कुछ सिफारिशें मंजूर नहीं कीं तो यह पूरी रिपोर्ट को खारिज़ करने का आधार नहीं है। इसके बाद मीडिया संस्‍थानों की रिव्यू पिटीशन भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज़ कर दी।
मीडिया हाउसेस की चालबाजी से धूल फांक रहे आदेश-निर्देश
न्यायपालिका के इतने सख्त आदेश-निर्देशों के बावजूद मीडिया संस्थान इसे लागू नहीं कर रहे। 6 साल से ये आदेश-निर्देश धूल फांक रहे हैं क्‍योंकि सिफारिशें लागू न करने के इनके पास अनेक हथकंडे जो हैं।
मसलन उनके खिलाफ कोर्ट में जाने वाले पत्रकारों का शोषण, कंपनी को छोटी यूनिटों में बांटना, कम आय दिखाना, कर्मचारियों से कांट्रैक्ट साइन करवाना कि उन्हें आयोग की सिफारिशें नहीं चाहिए। हालांकि मीडिया संस्‍थानों द्वारा किए जा रहे इस शोषण की पीछे एक ही बड़ा कारण है, और वो कारण है पत्रकारों में एकजुटता कमी।
मीडिया संस्‍थानों के मालिक यहां फंसा रहे पेंच
दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, हिन्‍दुस्‍तान व अन्य बड़े अखबारों के प्रबंधन ने अपने कर्मचारियों से एक फॉर्म पर इस आशय के साइन ले लिए कि उन्हें मजीठिया आयोग की सिफारिशें नहीं चाहिए। वे कंपनी प्रदत्त वेतन एवं सुविधाओं से संतुष्ट हैं। कंपनी उनकी सुख-सुविधा का ध्यान रखती है। समय से उन्हें प्रमोशन मिलता है, अच्छा इंक्रीमेंट लगता है, बच्चे अगर हैं तो उनकी पढ़ाई-लिखाई, स्वास्थ्य-चिकित्सा, उनकी बेहतरी का पूरा ख्याल कंपनी रखती है।
कौन नहीं जानता कि मीडिया संस्‍थानों के सारे हथकंडे पूरी तरह झूठ पर आधारित हैं।
मीडिया संस्‍थानों के झूठ का सबसे बड़ा उदाहरण है पंकज कुलश्रेष्‍ठ का उनके संस्‍थान दैनिक जागरण में पद। 25 वर्षों से एक ही संस्‍थान में सेवारत पंकज कुलश्रेष्‍ठ अब भी उप समाचार संपादक थे जिसकी हैसियत कोई भी मीडियाकर्मी अच्‍छी तरह समझता है।
चूंकि इसी से जुड़ी हैं वेतन, इंक्रीमेंट, स्वास्थ्य, चिकित्सा, बच्‍चों की पढ़ाई लिखाई आदि की सुविधाएं, इसलिए समझा जा सकता है कि पंकज कुलश्रेष्‍ठ ढाई दशक बाद भी संस्‍थान में क्‍या हैसियत रखते थे।
आज भी बड़े-बड़े अखबारों में ‘उप-संपादक’ का भी मासिक वेतनमान इतना नहीं है जिसमें वह अपने परिवार का ठीक तरह भरण-पोषण कर सके। जिलों में ब्‍यूरो चीफ के पदों को सुशोभित करने वाले पत्रकारों का भी वेतन सम्‍मानजनक नहीं होता।
और यदि बात करें जिले के स्‍टाफ और तहसील आदि में कार्यरत पत्रकारों की तो उनका ‘मानदेय’ बताने तक में शर्म आती है। उनके लिए वेतन तो कल्‍पना से परे की बात है।
यही नहीं, आज के दौर में जहां चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को भी वेतन के साथ आवश्‍यक भत्‍ते और अवकाश प्राप्‍ति के उपरांत पेंशन मिलना तय है वहां किसी पत्रकार के लिए कोई ऐसा प्रावधान नहीं है।
सरकारी कर्मचारी की मृत्‍यु के बाद भी उसके परिवार को पेंशन का एक भाग मिलता है परंतु पत्रकारों के परिवार उनकी मौत के बाद भगवान भरोसे जिंदा रहने की जद्दोजहद में लगे रहने पर मजबूर हैं।
माना कि राजनीति के गलियारों में जिस तरह लुटियंस जोन है, उसी प्रकार मीडिया में भी एक क्रीमी लेयर है और उस लेयर का एक-एक पत्रकार नेताओं की भांति ही सैकड़ों करोड़ रुपए का मालिक बना बैठा है परंतु वो उंगलियों पर गिने जाने लायक हैं। बाकी तो सारा धान बाईस पसेरी बिकता है।
प्रिंट हो या इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया, सब अपने मुलाजिमों का खून चूसने में पीछे नहीं रहते। हाथ में लगे ‘LOGO’ को किसी के भी मुंह में ठूंस देने का रुतबा हासिल करने वाले बड़े-बड़े न्यूज़ चैनल्‍स के स्‍ट्रिंगर की दयनीय दशा किसी से नहीं छिपी।
हजारों करोड़ रुपए की पूंजी वाले उनके संस्‍थान उन्‍हें कई बार आंशिक मानदेय देने की बजाय LOGO पकड़ाने के बदले उनसे उलटी वसूली कर लेते हैं। फिर वो उसकी भरपाई के लिए क्‍या कुछ नहीं करते।
शोषण-शोषण और खालिस शोषण का जितना घिनौना खेल मीडिया हाउस पत्रकारों के साथ खेलते हैं, उतना शायद ही किसी दूसरे क्षेत्र में खेला जाता होगा।
पत्रकारों के साथ दशकों से खेले जा रहे इस खेल से नेतानगरी भली प्रकार परिचित है और इसीलिए उसकी नजर में कोई पत्रकार ‘कोरोना वॉरियर्स’ भी नहीं है। अपनी जान देकर भी नहीं।
कोरोना वॉरियर्स की श्रेणी में पत्रकारों को शामिल कर लिया गया तो संभवत: शासन-प्रशासन की दुविधा बढ़ जाएगी। उन्‍हें दूसरे कोरोना वॉरियर्स की तरह मान-सम्‍मान एवं कानूनी अधिकारों के साथ मुआवजा भी देना पड़ सकता है।
आगरा मंडल ही नहीं, शायद समूचे उत्तर प्रदेश में कोरोना से जान गंवाने वाले पंकज कुलश्रेष्‍ठ शायद पहले पत्रकार होंगे लेकिन कोरोना संक्रमित पत्रकारों की संख्‍या अच्‍छी-खासी हो सकती है।
न करे भगवान कि कल किसी और को अपना कर्तव्‍य निभाते-निभाते जान से हाथ धोने पड़ जाएं, तो भी क्‍या पत्रकार इसी गति को प्राप्‍त होते रहेंगे।
पंकज कुलश्रेष्‍ठ का बलिदान ऐसे कई सवाल पीछे छोड़ गया है। यदि समय रहते इनके जवाब नहीं मांगे गए तो पत्रकारों की मौत सिर्फ एक आंकड़ा बनकर रह जाएगी क्‍योंकि उसकी गिनती कोरोना वॉरियर्स में नहीं, कोरोना संक्रमित लाशों के साथ होगी।
पत्रकारों की दशा और दिशा पर किसी अनाम शायर द्वारा लिखा गया यह शेर इस दौर में बड़ा सार्थक प्रतीत होता है कि-
‘बड़ा महीन है ये अखबार का मुलाजिम भी, खुद में खबर है मगर दूसरों की छापता है’
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

ये जड़ों की ओर लौटने का न सही, “सिंहावलोकन” का समय जरूर है

Definitely This time of "overview"

ये जड़ों की ओर लौटने का न सही, लेकिन जड़ों की ओर मुड़कर देखते हुए आगे बढ़ने का समय जरूर है। ‘सिंहावलोकन’ का समय है।
माना कि ‘लॉकडाउन’ बहुत से लोगों को परेशान कर रहा है क्‍योंकि उन्‍हें लगता है यह थोपा गया है, परंतु सही अर्थों में महसूस करेंगे तो पता लगेगा कि यह प्रकृति प्रदत्त एक ऐसा अवसर भी है जो भौतिकता की अंधी दौड़ से मुक्‍ति का मार्ग दिखा रहा है।
मात्र 21 दिनों के लॉकडाउन ने इतना अहसास तो कराया है कि समय के साथ कदमताल मिलाना जितना आवश्‍यक है, उससे कहीं ज्‍यादा आवश्‍यक है रफ्तार को नियंत्रित करने की कला जानना क्‍योंकि सधे हुए कदमों से चलकर ही मंजिल हासिल की जा सकती है। बहुत अधिक सुस्‍ती यदि मुकाम पाने में बाधक बनती है तो अनावश्‍यक तेजी भी लड़खड़ाकर गिर जाने का कारण बन जाती है।
इन दिनों तमाम लोग श्‍मशान वैराग्‍य अथवा चिता ज्ञान की अनुभूति कर रहे हैं। उन्‍हें अचानक जीवन क्षणभंगुर लगने लगा है। लेकिन कौन नहीं जानता कि ये दोनों भाव भी क्षणभंगुर हैं, अस्‍थायी हैं।
अपने प्रियजनों की चिता को अग्‍नि के हवाले करते वक्‍त मन में आने वाले भाव श्‍मशान छोड़ते ही तिरोहित हो जाते हैं। मरघट से घर तक की दूरी तय करते ही वैराग्‍य और ज्ञान साथ छोड़ जाते हैं।
कोराना से उपजे विश्‍वव्‍यापी संकट का फिलहाल कोई देश उपचार नहीं ढूंढ़ पाया है, सिवाय इसके कि साफ-सफाई के साथ रहें। लॉकडाउन का आनंद उठाते हुए एक निर्धारित सामाजिक दूरी बनाए रखें ताकि वायरस का संभावित प्रवेश रोका जा सके।
इस व्‍यवस्‍था पर राजनीति करने वालों की बात यदि न की जाए तो सारी दुनिया एकराय है। वैज्ञानिकों से लेकर डॉक्‍टरों तक की यही राय है कि इस महामारी की चपेट में आने से बचाव का एकमात्र कारगर उपाय लॉकडाउन और सोशल डिस्‍टेंसिंग ही है। कोई वैक्‍सीन, कोई दवाई या कोई दूसरे उपाय जब सामने आएंगे, तब आएंगे परंतु अभी कोई विकल्‍प नहीं है।
यही स्‍थिति हम भारतीयों को जड़ों की ओर देखने का अवसर दे रही है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ नि:संदेह सनातन धर्म का मूल संस्कार तथा विचारधारा है और इसीलिए यह वाक्य भारतीय संसद के प्रवेश कक्ष में भी अंकित है-
अयं निजः परोवैति गणना लघुचेतसाम् | उदारचरितानांतु वसुधैव कुटुम्बकम्
अर्थात् यह अपना बन्धु है और यह अपना बन्धु नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त वाले लोग करते हैं। उदार हृदय वाले लोगों के लिए तो सम्पूर्ण धरती ही परिवार है।
परंतु यहां विचारणीय यह है कि जिनकी संस्‍कृति और संस्‍कार ही बहुत ‘उथले’ हैं, उन्‍हें हमारी संस्‍कृति एवं संस्‍कारों की गहराइयों का ज्ञान इतनी आसानी से होगा भी कैसे।
किसी डूबते हुए प्राणी का जीवन बचाने के लिए अत्‍यंत आवश्‍यक है कि बचाने की कोशिश करने वाला पहले अपने प्राणों की रक्षा करे। वह स्‍वयं बचा रहेगा तो डूबने वाले को भी उबार लेगा अन्‍यथा डूबने वाला तो हमेशा आत्‍मरक्षा में बचाने वाले को अपनी ओर खींचता ही है।
विश्‍व के सबसे प्राचीन धर्म (सनातन), सबसे प्राचीन संस्‍कृति और सबसे प्राचीन परंपराओं के वाहक भारतीय यदि सही अर्थों में ‘महोपनिषद्’ अध्याय 4 के श्‍लोक 71 को सार्थक करना चाहते हैं तो सर्वप्रथम उन्‍हें अपनी जड़ों की ओर मुड़कर देखना होगा। ‘सिंहावलोकन’ करना होगा ताकि जड़ों से इतने न कट जाएं कि जुड़ने का कोई उपाय ही शेष न रहे। आगे बढ़ें, तरक्‍की करें, मुकाम हासिल करें और टारगेट अचीव करें किंतु जड़ों से कटने की भूल कतई न करें।
आज लॉकडाउन थोपा हुआ है तो क्‍या, उसका आनंद उठाएं, साथ ही प्रण करें कि ‘जान है तो जहान है’ के मंत्र को अपनाते हुए वसुधैव कुटुम्बकम् को एकबार फिर भारत की भूमि से सार्थक करेंगे और भारत के गौरवशाली अतीत को माध्‍यम बनाकर विश्‍व का मार्ग प्रशस्‍त करेंगे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

तबलीगी से लेकर अल्ट्रा ऑर्थोडॉक्स तक के कट्टरपंथियों की हरकत से सारी दुनिया परेशान


भारत और पाकिस्तान में कोरोना वायरस के खिलाफ मजबूती से खड़े स्वास्थ्यकर्मियों और पुलिसकर्मियों के साथ तबलीगी जमात के कट्टरपंथी समर्थकों की बदसलूकी की घटनाएं सामने आ रही हैं।
इनकी वजह से भारत में कोरोना वायरस के मामले तेजी से बढ़े हैं। इन्होंने नियमों का उल्लंघन कर न सिर्फ जमघट लगाया, बल्कि उनकी जांच कर रहे मेडिकल स्टाफ के साथ बदतमीजी भी कर रहे हैं। दुनिया में ये अकेले कट्टरपंथी नहीं हैं जो कोरोना के खिलाफ लड़ाई को कमजोर कर रहे हैं, इजरायल में भी अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स समुदाय भी धार्मिक नेताओं की बात मानकर सरकारी गाइडलाइन की अवहेलना करते रहे हैं और नतीजा यह है कि उस समुदाय के आम से लेकर खास सभी कोरोना के चपेटे में हैं।
इजरायल का बनेई ब्राक इलाका कोरोना का केंद्र बन गया। यहां कट्टरपंथी धड़े ने दिशा-निर्देशों को दरकिनार करते हुए दुकानें खोल रखी थीं जिससे निपटने में स्थानीय प्रशासन को एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ा। अब सेना जल्द ही स्थानीय प्रशासन की मदद को सड़क पर उतरने वाली है। विशेषज्ञों का मानना है कि 40 प्रतिशत आबादी पहले ही संक्रमित हो चुकी है।
दरअसल, यह दिक्कत इसलिए आ रही है कि क्योंकि अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स समुदाय अपने धर्म गुरुओं की बातों का अंधा-अनुसरण कर रहे हैं। इजरायल का अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स समुदाय भीड़भाड़ वाले पिछड़े इलाकों में रहता है जहां वायरस तेजी से फैला है। छोटी जगहों में एक साथ कई लोग जमा होते हैं और प्रार्थना में हिस्सा लेते हैं। हिब्रू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एच लेविने कहते हैं, ‘मैं बेहद चिंतित हूं क्योंकि हमने अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स कम्युनिटी में तेजी से संक्रमण फैलते देखा है और इजरायल की आबादी में भी।’
इजरायल में सेक्युलर और अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स एक दूसरे को संदेह से देखते हैं और उनके बीच हमेशा ही तनाव की स्थिति रहती है । यहां के स्वास्थ्य मंत्री याकोव लित्जमैन भी अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स सोसायटी से आते हैं और कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। वह हाल के सप्ताह में धार्मिक सभाओं में भीड़ पर बैन लगाने से इंकार करते रहे हैं। और वे खुद नियमों की अनदेखी करके प्रार्थना में हिस्सा लेते रहे हैं।
जब इजरायल में स्कूल, ऑफिस और इंटरनेशनल एयरपोर्ट बंद हो रहे थे लित्जमैन इसका विरोध कर रहे थे। वह इस भीड़ में अकेले नहीं हैं। उनके जैसे अल्ट्रा ऑर्थोडॉक्स समुदाय के और भी नेता है जो मानते हैं कि धार्मिक सभाओं को बंद करना वायरस से ज्यादा खतरनाक है।
-एजेंसियां

रविवार, 29 मार्च 2020

कोरोना वायरस से अधिक वायरल होते ‘दानवीर’ और ‘कर्मवीर’


चीन से ‘ग्लोबलाइज’ हुआ ‘कोरोना वायरस’ जितनी तेजी के साथ देश में ‘वायरल’ नहीं हो सका, उससे कहीं अधिक गति से अब हमारे ‘दानवीर’ और ‘कर्मवीर’ वायरल हो रहे हैं। सोशल मीडिया इस समय इन ‘दानवीरों’ और ‘कर्मवीरों’ से अटा पड़ा है।
हो भी क्‍यों नहीं, आखिर देश के प्रधानमंत्री ने कोरोना जैसी महामारी से मिलकर लड़ने का आह्वान जो किया था।
आह्वान को गंभीरता से लेते हुए करोड़ों-अरबों में खेलने वाले ‘दानवीर’ भीड़ एकत्र करके सब्‍जी-पूड़ी के पैकेट बांट रहे हैं और लखपतियों का ग्रुप आटा-दाल-तेल की पुड़िया देकर वाहवाही लूट रहा है।
इसी प्रकार ‘कर्मवीरों’ की फौज ‘सेनिटाइजर’ लेकर मोहल्‍ले-मोहल्‍ले और गली-गली घूम रही है। यह फौज ‘मास्‍क’ और ग्‍लव्‍स वितरण भी करती देखी जा सकती है।
चूंकि इस दौर में अलग से किसी फोटोग्राफर या वीडियो मेकर की आवश्‍यकता तो है नहीं, ये सारे काम स्‍मार्टफोन कर देता है इसलिए ‘दानवीरों’ और ‘कर्मवीरों’ को बड़ी राहत हो गई है।
घटना स्‍थल (मेरा मतलब है ‘मौके’) से ही इनके दूत वाट्सएप, फेसबुक, टि्वटर, इंस्‍टाग्राम आदि पर अपने ‘कारनामे’ तमाम ग्रुप में सेंड कर देते हैं जिससे देश-दुनिया उनके इस दुर्लभ गुण से बखूबी परिचित हो सके।
वैसे प्रिंट मीडिया भी इन्‍हें ‘तरजीह’ देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा। वह इन्‍हें चार-छ: कॉलम में न सही तो डबल कॉलम में तो ‘फोटो विद कैप्‍शन’ जगह दे ही देता है।
कुल मिलाकर इस तरह हमारे मौसमी दानवीर और कर्मवीर प्रिंट मीडिया एवं सोशल मीडिया से लेकर इलैक्‍‍‍‍‍‍ट्रॉनिक मीडिया, यहां तक कि वेब मीडिया में भी छाए हुए हैं।
मीडिया से याद आया कि प्रधानमंत्री जी ने राष्‍ट्र के नाम अपने संबोधन में इस वर्ग से भी अनुरोध किया था कि वह संकट की इस घड़ी में साथ दे।
मीडिया की महत्‍ता को रेखांकित करते हुए माननीय प्रधानमंत्री ने ‘जनता कर्फ्यू’ के दौरान जिन लोगों के प्रति घंटे-घड़ियाल, ताली-थाली आदि बजाकर आभार व्‍यक्‍त करने को कहा था, उनमें मीडिया भी शामिल था।
आभार के बोझ तले मीडिया के एक वर्ग यानि इलैक्‍ट्रॉनिक मीडिया ने अपनी जिम्‍मेदारी का परिचय देते हुए प्रवासी मजूदरों के पलायन को इस कदर हाईलाइट किया कि बाकी मजदूरों को उससे बड़ी प्रेरणा मिली, नतीजतन दिल्‍ली से शुरू हुआ यह सिलसिला देखते-देखते देशव्‍यापी हो गया।
प्रधानमंत्री ने संकट की घड़ी में साथ जो मांगा था। ये थोड़े ही कहा था कि साथ किस तरह देना है।
मीडिया में भी प्रिंट मीडिया को प्राथमिकता देनी होगी क्‍योंकि प्रधानमंत्री जी ने भी सबसे पहले प्रिंट मीडिया का जिक्र किया था कि वह फेक न्‍यूज़ को लेकर जनता को आगाह करे और भ्रम की स्‍थिति पैदा न होने दे।
अब समस्‍या यह है कि प्रिंट मीडिया बेचारा खुद भ्रम का शिकार हो गया। भ्रम की स्‍थिति यह हो गई कि लोगों ने अखबार लेना बंद कर दिया इसलिए फिलहाल प्रिंट मीडिया अपने लिए फैले भ्रम को दूर करने में जुटा है।
खुद के लिए खुद के अखबार में विज्ञापन देकर रिक्‍वेस्‍ट करनी पड़ रही है कि ‘कोरोना से दूर रहिए, अखबार से नहीं’।
कर्मवीरों में शुमार ‘मीडिया हाउस’ इसके अलावा एक काम और कर रहे हैं। उन्‍होंने अखबार को काफी ‘स्‍लिम’ कर दिया है। 18-20-22 और 24 पन्‍नों वाले नामचीन अखबार इन दिनों 12 तथा 14 पन्‍नों तक सिमट कर रह गए हैं।
‘राष्‍ट्रहित’ को मद्देनजर रखते हुए हालांकि इन अखबारों की कीमत उतनी ही कायम रखी गई है जितनी कि सामान्‍य दिनों में रहती है। कुल मिलाकर अखबार के पन्‍ने कम हुए हैं, मूल्‍य नहीं। राष्‍ट्रधर्म ऐसे ही निभाया जाता है।
डिस्‍क्‍लेमर: यहां ‘मीडिया’ से तात्‍पर्य मालिकानों से है, न कि पत्रकारों से इसलिए पत्रकारगण ‘मीडिया’ को लेकर कही गई बातें अपने दिल पर ने लें।
बहरहाल, प्रधानमंत्री ने दानवीरों के साथ-साथ जिन कर्मवीरों से सहयोग मांगा था, उनमें मीडिया के अलावा डॉक्‍टर्स और पुलिसकर्मी प्रमुख थे।
उनका जिक्र अगले दिनों में क्‍योंकि लॉकडाउन चालू आहे, आज तो सिर्फ ‘चौथा’ दिन है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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