जब मेड़ (बाड़) ही खेत को खाने लगे तो उस खेत का फिर खुदा भी भला नहीं कर सकता। फिलहाल यह बात उत्तर प्रदेश की सरकारी जमीनों पर पूरी तरह सही साबित हो रही है। जिला मुख्यालयों में बैठे 'सरकार' कहलाने वाले जिन 'अफसरान' पर बेशकीमती सरकारी जमीनों को 'माफिया' के कब्जे से बचाकर रखने की जिम्मेदारी है, वही उन जमीनों पर उनका अवैध कब्जा करा रहे हैं। कहीं यह कब्जा 'लैंड एक्सचेंज' की आड़ में कराया जा रहा है तो कहीं आमदनी बढ़ाने के सरकारी फरमान के बहाने। विकास प्राधिकरण और नगर निगम सहित विभिन्न विभागों में बैठे इन अधिकारियों के दुस्साहस का अंदाज इस बात से लगा सकते हैं कि वह सीएम योगी के आदेश-निर्देशों को भी 'ताक' पर रख देते हैं।
सीएम योगी आए दिन यह कहते सुने जा सकते हैं कि सरकारी जमीन पर माफिया का कब्जा कतई स्वीकार नहीं है, लिहाजा अधिकारीगण ऐसी जमीनों को चिन्हित कर उन्हें माफिया के कब्जे से मुक्त कराएं और उनका उपयोग इस तरह करें कि वह संबंधित विभाग की आमदनी का जरिया बन सकें।
संभवत: अधिकारीगण जानते हैं कि योगी आदित्यनाथ की तरह पहले भी कितने मुख्यमंत्री उन्हें ऐसे मौखिक आदेश-निर्देश देते रहे हैं, और उन्हें कितनी 'गंभीरता' से लेना है। अधिकारी किसी हद तक सही सोचते हैं क्योंकि माफिया के खिलाफ सख्त तेवर अख्तियार करने वाले योगी जी ने शायद ही कभी किसी ऐसे मामले पर कार्रवाई करके कोई नजीर पेश की हो।
वैसे तो उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों का हाल कमोबेश एक जैसा है किंतु धार्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण योगीराज भगवान श्रीकृष्ण की पावन जन्मस्थली मथुरा और क्रीड़ा स्थली वृंदावन में तो 'अंधे पीसें कुत्ते खाएं' की कहावत पूरी तरह चरितार्थ हो रही है। यहां सैकड़ों करोड़ की सरकारी जमीन पर एक लंबे समय से माफिया न सिर्फ काबिज है बल्कि उसने इस जमीन का सौदा तक कर दिया है।
घोर आश्चर्य इस बात का है कि इन जमीनों पर माफिया के काबिज होने और उन्हें खुर्द-बुर्द किए जाने की पूरी जानकारी संबंधित विभागों को भी है, बावजूद इसके वह उसे कब्जामुक्त कराने की बजाय येन-केन-प्रकारेण माफिया की मुराद पूरी करने में लगे हैं। वो ऐसा क्यों कर रहे हैं, इसे एक सामान्य बुद्धि वाला व्यक्ति भी समझता है लेकिन वह कर कुछ नहीं पाता क्योंकि सवाल सरकार कहलाने वाले अफसरान से टकराने का है। हालांकि इस सबके बावजूद कुछ लोग कोर्ट-कचहरी तक शिकायत लेकर जाते हैं परंतु वहां तारीख पर तारीख मिलने की परंपरा कोई तात्कालिक लाभ दिलाने में आड़े आती है। जब तक अदालतें किसी नतीजे पर पहुंचती हैं, तब तक इतनी देर हो चुकी होती है कि पहले सारा नक्शा और फिर सारा खेल पलट जाता है।
सैकड़ों करोड़ की सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे का सबसे ज्वलंत उदाहरण वृंदावन की सन सिटी अनंतम से जुड़ा है, जहां जिला प्रशासन ने लैंड एक्सचेंज की आड़ लेकर मथुरा-वृंदावन नगर निगम की बेशकीमती सरकारी जमीन को माफिया के हवाले कर दिया है जबकि इसके लिए लैंड एक्सचेंज की प्रक्रिया आज तक पूरी नहीं हो सकी है।
आज स्थिति यह है कि अपनी ही जमीन को कॉलोनाइजर की शक्ल में सक्रिय भूमाफिया के कब्जे से मुक्त कराने के लिए मथुरा-वृंदावन नगर निगम चिट्ठी-चिट्ठी खेल रहा है, और माफिया उसके जवाब में लिख रहा है कि अधिकारियों एवं विभाग की सहमति से उसके पक्ष में जमीन का विनिमय कई वर्ष पहले प्रक्रिया में है।
नीचे देखें चिट्ठी-चिट्ठी के खेल का पुख्ता सबूत-
गौरतलब है कि वृंदावन में छटीकरा रोड पर सन सिटी अनंतम के नाम से सैकड़ों एकड़ में निर्माणाधीन टाउनशिप के अंदर मथुरा-वृंदावन नगर निगम ने अपनी जमीन पर अवैध कब्जा किया जाना स्वीकार करते हुए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण को पत्र लिखा कि उसकी जमीन कब्जामुक्त कराई जाए।
विकास प्राधिकरण ने सन सिटी अनंतम को इससे अवगत कराते हुए जमीन से तुरंत कब्जा हटाने तथा अवैध निर्माण ध्वस्त करने की बात लिखी किंतु उसके जवाब में मालिकानों की ओर से लिख दिया गया कि उनके पक्ष में लैंड एक्सचेंज की प्रक्रिया काफी पहले से प्रक्रिया में है। प्रक्रिया पूरी होने तक कोई निर्माण कार्य नहीं कराया जाएगा। आज स्थिति यह है कि सन सिटी अनंतम सैकड़ों करोड़ की सरकारी जमीन पर न केवल कब्जा किए हुए है बल्कि उसने अवैध निर्माण कराने के साथ-साथ उसका सौदा भी कर दिया है।
इतना ही नहीं, अफसरों की मेहरबानी के चलते उसने आस-पास के ग्रामीणों की जमीन और उनके खेत भी अपनी मर्जी के मुताबिक खरीदने या हथियाने शुरू कर दिए हैं जिससे क्षेत्रीय लोगों में भारी आक्रोश पनप रहा है।
प्रदेश में 2027 के चुनाव सिर पर हैं। ऐसे में समय रहते अगर इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया और सैकड़ों करोड़ की सरकारी जमीन को माफिया के कब्जे से मुक्त कराकर इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों को सबक नहीं सिखाया गया तो यह मामला योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा की सरकार के लिए बड़ा सिरदर्द साबित हो सकता है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
