शुक्रवार, 18 जनवरी 2013

पोर्न क्‍लिप मामला: अब फंसेंगे खबरनवीस !

इसे जल्‍दी से जल्‍दी खबरों को प्रकाशित करने का श्रेय लेने की आपाधापी कहें या सस्‍ती प्रतिस्‍पर्धा का नमूना कि सत्‍यता का पता लगाये बिना मथुरा के एक होटल में पोर्न क्‍लिप बनाये जाने का समाचार लगभग सभी बड़े अखबारों ने प्रमुखता से प्रकाशित कर दिया जबकि मथुरा के होटल में वह क्‍लिप बनी ही नहीं थी।
अखबारों ने मनगढ़ंत कहानी बनाकर यहां तक छाप दिया कि होटल संचालक व उनके भाई को नोएडा पुलिस अरेस्‍ट करके ले गई है।
अब होटल संचालक द्वारा उन सभी अखबारों को लीगल नोटिस भेजने की तैयारी की जा रही है जिन्‍होंने अपने अहम की तुष्‍टि के लिए न सिर्फ पत्रकारिता को कलंकित करने का काम किया बल्‍कि होटल संचालक व उनके भाई का मान-सम्‍मान प्रभावित करने की कोशिश की।
होटल संचालक के भाई भी लंबे समय से इलैक्‍ट्रॉनिक मीडिया से जुड़े हैं और फिलहाल आईबीएन-7 के लिए आगरा में काम करते हैं।

शनिवार, 12 जनवरी 2013

यमुना: नदी नहीं, नाले की कहानी

(कुंभ मेला विशेष)
क्या दिल्ली में कोई ऐसी जगह है जहाँ आपको यमुना का निर्मल पानी दिखाई दे?
क्योंकि जहाँ भी आप जाएंगे, हर जगह यमुना का पानी काला ही नज़र आएगा.

दिल्ली का वज़ीराबाद बैराज एक ऐसी जगह है जहाँ पर आपको इस सवाल का जवाब शायद मिल जाएगा.
यही वो जगह है जहाँ से नदी दिल्ली में प्रवेश करती है और इसी जगह पर बना बैराज यमुना को आगे बढ़ने से रोक देता है.
वज़ीराबाद के एक तरफ यमुना का पानी एकदम साफ़ और दूसरी ओर एक दम काला है.
इसी जगह से नदी का सारा पानी उठा लिया जाता है और जल शोधन संयत्र के लिए भेज दिया जाता है ताकि दिल्ली की जनता को पीने का पानी मिल सके. बस यहीं से इस नदी की बदहाली भी शुरू हो जाती है.
नदी की बदहाली
उत्तर प्रदेश के टिहरी-गढ़वाल जिले में यमुनोत्री से निकलने वाली यमुना उत्तर प्रदेश के प्रयाग में जाकर गंगा नदी में मिल जाती है.
इस बात को मानने से कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि यमुना भारत की सर्वाधिक प्रदूषित नदियों में से एक है.
जल-पुरुष के नाम से प्रसिद्ध रैमन मैगसेसे पुरस्कार से सम्मानित राजेंद्र सिंह कहते हैं, “ये यमुना नदी नहीं, यमुना नाले की कहानी है. जब दिल्ली में 22 किलोमीटर के सफर में ही 18 नाले मिल जाते हैं तो बाकी जगह का हाल क्या होगा. इसमें सबसे बड़ा योगदान औद्योगिक प्रदूषण का है जो साफ़ हो ही नहीं रहा.”

शनिवार, 5 जनवरी 2013

सपा का ऑपरेशन क्‍लीन.. मथुरा से क्‍यों ?

अभी और कई बड़े विकेट गिराने की तैयारी  
लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष
समाजवादी पार्टी ने अपने चारों युवा प्रकोष्‍ठ युवजन सभा, लोहिया वाहिनी, यूथ ब्रिगेड एवं समाजवादी छात्र सभा को अचानक भंग कर दिया। पार्टी ने इन प्रकोष्‍ठों की न सिर्फ कार्यकारिणी भंग की बल्‍कि राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष भी हटा दिये जिस कारण भीषण सर्दी के इस दौर में इन अध्‍यक्षों को पसीने आना स्‍वाभाविक है क्‍योंकि उन्‍हें मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव के अति निकट माना जाता रहा है।
माना भी क्‍यों न जाए, जब वो माननीय मुख्‍यमंत्री के साथ हैलीकॉप्‍टर से उतरते देखे जाते हैं।
पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी ने इन प्रकोष्‍ठों को भंग करते वक्‍त सिर्फ इतना कहा कि राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव की अनुमति से राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव ने युवजन सभा, लोहिया वाहिनी, यूथ ब्रिगेड एवं समाजवादी छात्र सभा की राष्ट्रीय कार्यकारिणियों को अध्यक्ष सहित तत्काल प्रभाव से भंग कर दिया है.
उन्होंने इन प्रकोष्ठों को भंग करने का कोई कारण नहीं बताया.
जाहिर है कि ऐसी स्‍थिति में एक ओर जहां तमाम लोगों के मन में कारण जानने की उत्‍सुकता पैदा हो गई वहीं दूसरी ओर बहुतों के पेट में दर्द उठने लगा है। 
'लीजेण्‍ड न्‍यूज़' ने समाजवादी पार्टी के हित में इस उत्‍सुकता एवं पेट में उठ रही मरोड़ को दूर करने का प्रयास सपा के उच्‍च पदस्‍थ सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के आधार पर किया है।

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

अब ताज़ा सितम ईजाद ना कर, यूँ ज़ुल्म ना कर..

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
31 दिसंबर, साल का आखिरी दिन। देश को मिली स्‍वतंत्रता का वो एक और साल जो इतिहास के पन्‍ने तो जरूर काले कर गया पर ऐसा कुछ नहीं कर पाया जिससे देश तथा देशवासी गौरव महसूस करें।
साल 2012 यूं तो तमाम घटनाक्रमों के लिए याद किया जायेगा लेकिन सबसे अधिक याद रहेगा उन धरने व प्रदर्शनों के लिए जिसकी दरकार लंबे समय से महसूस की जा रही थी।
चाहे बात महंगाई व भ्रष्‍टाचार की हो या फिर कानून-व्‍यवस्‍था की लाचारी से उपजे हालातों की, आमजन ने विशिष्‍टजनों को यह अहसास करा दिया कि अब और नहीं।
यह बात अलग है कि सत्‍ता के मद में चूर और अपनी-अपनी मांदों के अंदर से सशस्‍त्र बलों के बूते देश तथा देशवासियों को 'चला' रहे नेतागण अब भी सच्‍चाई समझने की कोशिश नहीं कर रहे।
वह नहीं समझ रहे कि 65 सालों की स्‍वतंत्रता ठीक उसी तरह चुक चुकी है जिस तरह वह खुद चुक गये हैं। 65 सालों का धैर्य अब जवाब देने लगा है क्‍योंकि किसी भी स्‍तर से उम्‍मीद की कोई किरण कहीं दिखाई नहीं दे रही।

रविवार, 30 दिसंबर 2012

अजगरों को दूध पिला रहे हैं हम

देश के वर्तमान हालातों पर कटाक्ष करते हुए पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल वीके सिंह ने कहा कि वर्तमान व्यवस्था काले अजगर की तरह है और हम इसे दूध पिला रहे हैं।
श्री सद्‍गुरु धार्मिक एवं पारमार्थिक ट्रस्ट द्वारा आयोजित कार्यक्रम में जनरल सिंह ने कहा कि हमारा देश युवा है। युवाओं की आबादी 71 फीसदी के लगभग है। जिस तरह पतझड़ के बाद वसंत आता है और पेड़ों पर नई कोंपले फूटती हैं, उसी तरह जब तक युवा आगे नहीं आयेंगे, पुराने लोग नहीं जायेंगे। अत: युवा आगे बढ़कर देश के लिए काम करें।
उन्होंने सवाल किया कि कहीं हम डॉ. अंबेडकर और अन्य शीर्ष नेताओं द्वारा बताए गए मार्ग से भटक तो नहीं गए? उन्होंने कहा कि अब प्रजातंत्र संविधान से हटकर दिखाई दे रहा है। संविधान 'बी द पीपल' के लिए बना था, लेकिन अब संविधान का 'बी द पीपल' खो गया है। उसे वापस लाना होगा।

बुधवार, 26 दिसंबर 2012

वाह समाजवाद: यूपी के 46 में से 36 मंत्री करोड़पति

यूपी में राम मनोहर लोहिया और जय प्रकाश नारायण की अनुयायी सपा की सरकार है। पर क्या आपको पता है कि समाजवाद और गरीबों के प्रति समर्पित इस सरकार में करोड़पति मंत्रियों की संख्‍या कितनी है।
आपको शायद यह जानकर झटका सा लगे कि यूपी की अखिलेश यादव सरकार में 78 फीसदी मंत्री करोड़पति हैं। इनमें खुद युवा सीएम अखिलेश भी शामिल हैं।
यूपी इलेक्शन वॉच और एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स द्वारा संकलित एक रिपोर्ट के अनुसार यूपी सरकार के 46 में 36 मंत्री करोड़पति हैं।
मंत्रियों द्वारा अपनी आय और संपत्ति सम्बन्धी दिये गये शपथ पत्रों के आधार पर ही यह रिपोर्ट तैयार की गई है।

शनिवार, 22 दिसंबर 2012

लफंगे परिंदों से मथुरा के समाजवादी भी परेशान

हालात का अंदाज मथुरा में आयेदिन घटने वाली उन घटनाओं से लगाया जा सकता है जब किसी बड़े नेता या मंत्री के यहां आगमन पर 'लफंगों का तो वर्चस्‍व' कायम रहता है और 'निष्‍ठावान समाजवादी' उनके दीदार तक करने को तरस जाते हैं।
(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
अगस्‍त 2010 में एक हिंदी फिल्‍म रिलीज हुई थी, इस फिल्‍म का नाम था- 'लफंगे परिंदे'। यह फिल्‍म यशराज बैनर की थी और इसका समाजवादी पार्टी से दूर-दूर तक कोई ताल्‍लुक नहीं था। लेकिन ठीक सवा दो साल बाद इस फिल्‍म के 'टाइटिल' ने 'समाजवादी पार्टी' में एक किस्‍म का 'हंगामा' खड़ा कर दिया है।
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