मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

कुमार मंगलम बिड़ला के खिलाफ FIR

नई दिल्ली 
कोयला घोटाले में सीबीआई ने देश के बड़े उद्योगपति कुमार मंगलम बिड़ला के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। सीबीआई ने सरकारी कंपनी नाल्को, हिंडाल्को और एक पूर्व कोयला सचिव समेत 14 एफआईआर दर्ज की है। सीबीआई दिल्ली, कोलकाता, भुवनेश्वर और मुंबई में छापेमारी कर रही है, हालांकि अभी तक कुमार मंगलम बिड़ला का पक्ष नहीं मिला है। समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक सीबीआई ने कोयला आवंटन घोटाले में कुमार मंगलम बिड़ला के खिलाफ ताजा मामला दर्ज किया है। साथ ही पूर्व कोयला सचिव पीसी पारिख पर भी नया मामला दर्ज किया गया है। इस संबंध में हैदराबाद, कोलकाता और मुम्बई में छापेमारी जारी है। सीबीआई ने हिंडाल्को कंपनी पर भी एफआईआर की है। हिंडाल्को कुमार मंगलम बिड़ला की ही कंपनी है। कुमार मंगलम कंपनी के चेयरमैन हैं।
-एजेंसी

शनिवार, 12 अक्टूबर 2013

एक सरकारी पाती, जिसने राजनीति में 'फैलिन' ला दिया

लखनऊ 
उत्तर प्रदेश सरकार के एक पत्र से बवाल खड़ा हो गया है। यह कोई मामूली चिट्ठी नहीं है। इसके जरिए सोमनाथ मंदिर की तरह अयोध्या में राममंदिर के पुनर्निमाण पर चर्चा के लिए फैजाबाद के जिला मजिस्ट्रेट व वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों की एक बैठक बुलाई गई है। इस चिट्ठी से राजनीतिक हलकों में भूचाल आ गया है।
राज्य सरकार के सचिव सतीश चंद्र द्वारा जारी इस पत्र में डीजीपी व अन्य वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों से सोमवार शाम को उपस्थित होने के लिए कहा गया है। प्रिंसिपल सेक्रेट्री (गृह) के कार्यालय में बुलाई गई इस बैठक में सोमनाथ मंदिर की तर्ज पर अयोध्या में राम मंदिर के पुनर्निमाण के लिए संसद में कानून बनाने पर चर्चा करने की बात कही गई है।
प्रिंसिपल सेक्रेट्री (गृह) आर. एम. श्रीवास्तव को छोड़कर जिन अधिकारियों को बैठक में बुलाया गया है उनका सीधा संबंध जिले की कानून-व्यवस्था से है लेकिन बैठक के विषय ने सबके कान खड़े कर दिए हैं। श्री रामजन्मभूमि का उल्लेख विवादित स्थल के तौर पर संघ परिवार ही करता है। साथ ही सोमनाथ का उल्लेख भी संशय पैदा करता है क्योंकि भाजपा और संघ परिवार अपने अभियान का बचाव यह कहते हुए करते रहे हैं कि आजादी के बाद सोमनाथ में शिव मंदिर के पुनर्निमाण के लिए सरकार का समर्थन रहा। साथ ही वीएचपी लंबे समय से अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिए कानून बनाए जाने की मांग करती रही है।
एक अखबार के अनुसार जब इस बैठक की अध्यक्षता करने वाले प्रिंसिपल सेक्रेट्री (गृह) श्रीवास्तव से संपर्क करने की कोशिश की गई तो उन्होंने मामले को दबाते हुए कहा कि बैठक वीएचपी के ताजा मंदिर अभियान पर चर्चा के लिए बुलाई गई थी। श्रीवास्तव ने कहा कि वीएचपी ने संकल्प दिवस मनाने की योजना बनाई है जिसमें उसके कार्यकर्ता राम मंदिर निर्माण की शपथ लेंगे। जहां तक सोमनाथ के उल्लेख की बात है तो इस पर श्रीवास्तव ने कहा कि वीएचपी इससे पहले सोमनाथ में संकल्प दिवस मना चुकी है और इसीलिए लगता है कि सोमनाथ का जिक्र किया गया है।

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

मानव अंगों की तस्‍करी भी करता है आसाराम!

मुझे ठीक-ठीक दिन, महीना या साल तो याद नहीं पर इतना जरूर याद है कि सन् 1998 के बाद की बात होगी। संभवत: 1999 से 2000 के बीच की। आसाराम बापू शायद पहली बार मथुरा आए थे और वृंदावन में टीबी सेनोटोरियम के सामने उनका भव्‍य पण्‍डाल लगा था। अपनी कथा शुरू करने से पहले उन्‍होंने एक प्रेस कांफ्रेस वृंदावन के छटीकरा रोड पर स्‍थित नंदनवन में बुलाई। उस समय तक मैं भी पीसी अटेंड करने जाया करता था।
मैंने आसाराम बापू से पूछा कि आप अपने अनुयायियों को क्‍या संदेश देते हैं, क्‍या बताते हैं?
आसाराम का जवाब था- मैं लोगों को भौतिकता की अंधी दौड़ से मुक्‍त होने का मार्ग बताता हूं।
मैंने प्रतिप्रश्‍न किया- आप स्‍वयं सारी भौतिक सुविधाएं इस्‍तेमाल करते हैं, फिर अपने अनुयायियों को कैसे भौतिकता की अंधी दौड़ से मुक्‍ति का मार्ग बता सकते हैं?
इस पर उनका उत्‍तर बड़ा चालाकी भरा था। वह बोले- मैं भौतिक सुविधाओं का 'उपयोग' करता हूं जबकि बाकी लोग उनका 'उपभोग' करते हैं।
सच कहूं तो उनके इस चालाकी भरे जवाब में मुझे पत्रकारिता को चुनौती देने और अपना थोथा अहम् प्रदर्शित करने जैसा आभास हुआ लिहाजा मैंने अगला प्रश्‍न थोड़ा तीखा पर सटीक किया।
मेरा प्रश्‍न था- एक शराबी, किसी दूसरे शराबी को यह कैसे समझा सकता है कि वह उसका 'उपयोग' कर रहा है जबकि सामने वाला उसका 'उपभोग' करता है?
प्रश्‍न तीखा था इसलिए असर करना स्‍वाभाविक था, नतीजतन तथाकथित संत आसाराम प्रेस वार्ता से उठ खड़े हुए और बाकी की जिम्‍मेदारी अपने प्रमुख सेवादारों पर छोड़ दी।
मेरे द्वारा पूछे गए प्रश्‍न का जवाब तो किसी ने नहीं दिया अलबत्‍ता जमकर हंगामा जरूर हुआ।
बाद में आसाराम के कुछ ब्‍यूरोक्रेट शिष्‍य मेरे ऑफिस आए और यह समझाने की कोशिश की कि बापू से टकराव की जगह यदि सामंजस्‍य बनाकर चलूंगा तो फायदे में रहूंगा।
बहरहाल, उनकी यह सलाह न मेरे काम आनी थी और न आई।
आज इस घटना का ज़िक्र इसलिए कर रहा हूं क्‍योंकि वृंदावन में भी आसाराम बापू का एक आश्रम है और यहां का भी एक वृद्ध समाजसेवी, आसाराम की अंधभक्‍ति का शिकार हुआ है। इस वृद्ध की बातों पर भरोसा करें तो आसाराम का जंजाल सिर्फ यौन उत्‍पीड़न, ज़मीन कब्‍जाने आदि तक सीमित नहीं है। उसके कई और ऐसे कारनामे हैं जिनसे यदि परदा उठ जाता है तो ऐसी बातें सामने आयेंगी जो किसी को भी दांतों तले उंगली दबाने पर मजबूर कर सकती हैं। 
वृंदावनवासी जो व्‍यक्‍ति आसाराम का शिकार बना है, उसे लोग लालबाबा कहकर पुकारते हैं। लालबाबा नामक इस शख्‍स की पत्‍नी आसाराम के साबरमती (गुजरात) आश्रम से तब आधे घंटे के अंदर लापता हो गई जब कुछ लोगों के कहने पर वह अपनी पत्‍नी का इलाज कराने उसे वहां ले गया था। लालबाबा का कहना है कि आसाराम के कहने पर ही मैंने अपनी पत्‍नी को अलग उनके महिला आश्रम में ठहराया था लेकिन उसके बाद उसका कोई पता नहीं लगा।
मूल रूप से राजस्‍थान के निवासी और हार्डवेयर व्‍यवसाई लालबाबा ने कुछ वर्षों पूर्व समाजसेवा करना शुरू कर दिया था और तभी से वृंदावनवासी हो गए।
लालबाबा का पुत्र अपने परिवार सहित उत्‍तम नगर (दिल्‍ली) में रहता है।
चार वर्षों से लालबाबा और उनका परिवार पुलिस, प्रशासन, महिला आयोग आदि के चक्‍कर काट रहा है लेकिन कहीं से उसे राहत नहीं मिली है।
लालबाबा के अनुसार जिस वक्‍त उनकी पत्‍नी गायब हुई थी, तब उसकी उम्र करीब 52 साल थी इसलिए मैंने उनसे यह जानना चाहा कि उनकी पत्‍नी को गायब कराने के पीछे आसाराम या उनके सेवादारों की मंशा क्‍या हो सकती है?
इस प्रश्‍न के जवाब में लालबाबा ने चौंकाने वाली जानकारी दी। उनका कहना था कि एक लंबे समय तक मैं खुद भी इस प्रश्‍न से जूझता रहा कि एक 52 साल की महिला को गायब करने के पीछे क्‍या उद्देश्‍य हो सकता है।
बहुत प्रयास करने पर कुछ लोगों से पता लगा कि आसाराम का नेटवर्क मानव अंगों की तस्‍करी के जघन्‍य आपराधिक कारोबार से भी जुड़ा है। अब तक उनके विभिन्‍न आश्रमों तथा गुरूकुलों से गायब बच्‍चे, लड़कियां तथा महिला-पुरुषों के लापता होने की असली वजह तांत्रिक क्रियाओं के लिए बलि न होकर उनके अंगों को निकालने के लिए हत्‍याएं कर देना रहा है।
लालबाबा के कथन में यदि थोड़ी भी सच्‍चाई है तो यह दुराचार अथवा दूसरे आपराधिक कृत्‍यों से कहीं बहुत बड़ा मामला है और इसकी सच्‍चाई सामने आना अत्‍यंत जरूरी है।
फिलहाल लालबाबा दिल्‍ली के उत्‍तम नगर में अपने पुत्र के साथ रह रहे हैं और कई चैनलों पर उनकी पत्‍नी के चार साल पहले आसाराम आश्रम से गायब होने की कहानी बताई जा चुकी है लेकिन लालबाबा उस कहानी से संतुष्‍ट नहीं हैं।
लालबाबा इसलिए संतुष्‍ट नहीं हैं क्‍योंकि किसी भी मीडिया पर्सन ने उनकी बात को समझने का प्रयास नहीं किया। किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि लालबाबा क्‍या बताना चाहते हैं।
सभी का फोकस आसाराम की तथाकथित हवस तक सीमित है, कोई यह नहीं जानना चाहता कि 52 साल की किसी औरत को गायब करने का मकसद क्‍या हो सकता है।
लालबाबा ने इन चार सालों में जो कुछ पता किया और जितना कुछ जाना, एकबार उस पर भी गौर करना क्‍या जरूरी नहीं। हो सकता है कि आसाराम का एक और रूप सामने आये।

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2013

जेल से ही डायलॉग डिलीवर कर रहे हैं सजायाफ्ता लालू यादव

रांची।  चारा घोटाले में सजायाफ्ता राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव जेल से ही राजनीति कर रहे हैं। लालू जेल से ही मोबाइल का इस्तेमाल कर दल का संचालन कर रहे हैं। जेल में लालू यादव के पास तीन अलग-अलग मोबाइल फोन हैं, जिनमें से एक में 3जी सुविधा भी है।
खुफिया विभाग ने इससे संबंधित एक रिपोर्ट झारखंड सरकार को भेजी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि लालू जेल में खुलेआम मोबाइल का इस्तेमाल कर रहे हैं। वह वहीं से ही पार्टी कार्यकर्ताओं को निर्देश देते हैं।
इस रिपोर्ट की एक प्रति गृह विभाग को भी सौंपी गई है।
लालू यादव अभी बिरसा मुंडा जेल में बंद हैं। उन्हें चारा घोटाला मामले में पांच साल की सजा सुनाई गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक जेल प्रशासन को भी जेल नियमों के उल्लंघन की जानकारी है। इसमें एक जेल अधिकारी की भूमिका को भी संदिग्ध बताया गया है लेकिन अभी इस पर सभी चुप्पी साधे बैठे हैं।
जेल में जैमर भी है, लेकिन लालू की सुविधा के लिए इसे बंद कर दिया गया है।
-एजेंसी

रविवार, 6 अक्टूबर 2013

टेरर फाइनेंस: वशिष्‍ठा कंस्‍ट्रक्‍शंस के खिलाफ कार्यवाही की तैयारी

पटना। बिहार में सड़क निर्माण के क्षेत्र में कार्यरत एक कंपनी द्वारा नक्सलियों को फाइनेंस करने का मामला उजागर हुआ है. उत्तर बिहार का आतंक माने जानेवाले नक्सली संतोष झा गिरोह को वशिष्टा कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड, गुंटूर, आंध्रप्रदेश द्वारा 3.50 करोड़ रुपये फाइनेंस किया गया है. संतोष झा गिरोह के विरुद्ध कार्रवाई में जुटे स्पेशल टास्क फोर्स को कई महत्वपूर्ण साक्ष्य हाथ लगे है.
पुलिस मुख्यालय इन साक्ष्यों के आधार पर ‘टेरर फाइनेंस’ में संलिप्त होने के आरोप में वशिष्टा कंस्ट्रक्शन के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की तैयारी कर रही है. पुलिस मुख्यालय के आलाधिकारी की मानें, तो बिहार में विभिन्न इलाकों में कार्यरत सड़क निर्माण कंपनियों द्वारा रंगदारी मांगे जाने की शिकायत पुलिस प्रशासन को की जाती थी, साथ ही इन कंपनियों द्वारा नक्सलियों को फाइनेंस करने की सूचनाएं भी मिलती रहती थीं, लेकिन

गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013

एक्ट्रेस के साथ रंगरेलियां मनाते पकड़े गए प्रमुख उद्योगपति

हैदराबाद 
साइबर सिटी में पुलिस ने एक हाई प्रोफाइल सेक्स रैकेट का भंडाफोड़ किया है। पुलिस ने छापा मारकर एक उद्योगपति को एक्ट्रेस के साथ रंगरलियां मनाते पकड़ा है। पुलिस ने दोनों को अपनी हिरासत में लिया है। जयराज इस्पात लिमिटेड के डायरेक्टर 60 वर्षीय एसके गोयनका और 22 साल की उभरती हुए टीवी
एक्ट्रेस को फार्चून टावर में छापा मारकर रंगरैलियां मनाते पकड़ा गया है।
हालांकि इस इस सैक्स रैकेट का मुखिया मदन मौके से भागने में कामयाब हो गया। अभिनेत्री के सैक्स रैकेट में शामिल होने की बात सामने आई है।
उल्लेखनीय है कि दक्षिण में सैक्स रैकेट में मामले में पकड़ी जाने वाली यह पहली अभिनेत्री नहीं है। पहले भी कई बार ऎसे मामले सामने आ चुके हैं, जिनमें कई एक्ट्रेसेस को पुलिस ने इस तरह के गोरखधंधे में लिप्तता के चलते पकड़ा है।
-एजेंसी

फ़र्जी कौन..अखबार, सरकार या पीके इंस्टीट्यूट

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
कानपुर ब्‍यूरो के हवाले से 'अमर उजाला' के ऑनलाइन संस्‍करण में 'यूपी के 18 तकनीकी कॉलेज मान्यता विहीन' शीर्षक वाला एक समाचार प्रकाशित हुआ। 29 सितंबर की सुबह 8 बजकर 16 मिनट पर अपलोड किये गये इस समाचार के अनुसार 'ऑल इंडिया काउंसिल फॉर टेक्‍नीकल एजुकेशन' (AICTE) ने देश के सभी गैर मान्‍यताप्राप्‍त यानि 'फर्जी' तकनीकी शिक्षण संस्‍थाओं के नाम सार्वजनिक करते हुए अपनी वेबसाइट पर डाल दिए हैं। इन सभी कॉलेजों को 20 जून 2013 से एआईसीटीआई ने अनएप्रूव्ड घोषित किया है।
इस सूची में कुल 328 तकनीकी शिक्षण संस्‍थाओं को फ़र्जी बताया गया है जिनमें से 18 उत्‍तर प्रदेश में संचालित हैं।
यहां चल रहे किसी भी कोर्स की डिग्री मान्य नहीं होगी। 'अमर उजाला' के अनुसार खबर की पुष्टि एआईसीटीई के चेयरमैन शंकर एस मंथा ने की है।
खबर में यह भी लिखा है कि एआईसीटीई तकनीकी शिक्षा के लिए देश की सर्वोच्च नियामक संस्था है। एआईसीटीई समय-समय पर छात्र हित में (मानक के अनुसार) एप्रूव्ड और अनएप्रूव्ड तकनीकी कॉलेजों की लिस्ट जारी करती है। इस संस्था की संस्तुति के बिना कोई भी तकनीकी कॉलेज संचालित नहीं किया जा सकता।
अखबार ने अपने ऑनलाइन संस्‍करण में उत्‍तर प्रदेश के इन सभी 18 गैर मान्‍यताप्राप्‍त तकनीकी शिक्षण संस्‍थाओं की लिस्‍ट भी जारी की है जिनमें 15वें नंबर पर एक नाम है- पीके इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी, मथुरा।
अब इसे इत्‍तेफाक कहें या कुछ और कि आगरा से प्रकाशित अमर उजाला के मथुरा संस्‍करण में 30 सितंबर को 'पीके ग्रुप ऑफ इंस्‍टीट्यूशंस' का हाफ पेज 'जैकेट' विज्ञापन छपता है। यही विज्ञापन इसी दिन आगरा से प्रकाशित अन्‍य प्रमुख अखबारों 'दैनिक जागरण' तथा 'हिंदुस्‍तान' के मथुरा संस्‍करण में भी छपता है। हिंदुस्‍तान में पूरे पेज का 'जैकेट' तथा दैनिक जागरण में 'पेज नंबर दो' पर पूरे पेज का विज्ञापन छापा जाता है।
इस विज्ञापन की विशेषता यह है कि इसमें ऊपर ही लिखा है- अप्रूव्‍ड बाइ "AICTE" एण्‍ड एफीलिएटेड टू UPTU, BTEUP & DBRAU.
साथ ही इस विज्ञापन में पीके इंस्‍टीट्यूट ऑफ टेक्‍नोलॉजी एण्‍ड मैंनेजमेंट, पीके इंस्‍टीट्यूट ऑफ टेक्‍नोलॉजी, पीके पॉलीटेक्‍निक तथा पीके डिग्री कॉलेज की इमारतों के चित्र छपे हैं जिसका मतलब यह है कि ये सभी शिक्षण संस्‍थाएं पीके ग्रुप ऑफ इंस्‍टीट्यूशंस द्वारा ही संचालित की जाती हैं।
इसके अलावा 'पीके ग्रुप ऑफ इंस्‍टीट्यूशंस' के चेयरमैन जे.पी. शर्मा, मैनेजिंग डायरेक्‍टर डॉ. बी.के. उपाध्‍याय का फोटो लगा है। पूरे विज्ञापन में न तो कोई कांटेक्‍ट नंबर है और ना ही कोई मेल आईडी।
हां, 'OUR SHINING STARS' के रूप में कुल 30 छात्र-छात्राओं के फोटोग्राफ्स भी इस विज्ञापन में लगे हैं।
अब यहां बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि हजारों तकनीकी छात्र-छात्राओं के भविष्‍य को प्रभावित करने वाले इस मामले में 'फर्जी' आखिर है कौन?
अमर उजाला जैसे प्रतिष्‍ठित अखबार का कानुपर ब्‍यूरो या वो सरकारी संस्‍था "AICTE" जिसने यूपी के गैर मान्‍यताप्राप्‍त तकनीकी शिक्षण संस्‍थाओं की लिस्‍ट में पीके इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी, मथुरा का नाम शामिल किया है।
अगर ये दोनों सही हैं तो 'पीके ग्रुप ऑफ इंस्‍टीट्यूशंस' के विज्ञापन में लिखी यह बात कैसे सच हो सकती है कि अप्रूव्‍ड बाइ "AICTE" एण्‍ड एफीलिएटेड टू UPTU, BTEUP & DBRAU.
यहां यह जान लेना भी जरूरी है कि 'पीके इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी' नामक कोई दूसरी शिक्षण संस्‍था मथुरा में संचालित नहीं है।
गौरतलब है कि सभी प्रमुख अखबार अपने यहां विज्ञापनों के संदर्भ में किसी एक पेज पर छोटा सा डिस्‍क्‍लेमर इस आशय का देते हैं कि ''पाठकों को सलाह दी जाती है कि वह किसी विज्ञापन पर प्रतिक्रिया से पहले विज्ञापन में प्रकाशित किसी उत्‍पाद या सेवा के बारे में पूरी तरह उपयुक्‍त जांच-पड़ताल कर लें। यह समाचार पत्र, उत्‍पाद या सेवा की गुणवत्‍ता आदि के विवरण को लेकर विज्ञापनदाता द्वारा किए गये दावे या उल्‍लेख की पुष्‍टि या समर्थन नहीं करता। समाचार पत्र उपरोक्‍त विज्ञापनों के बारे में किसी भी प्रकार से उत्‍तरदायी नहीं होगा''।
ऐसे में अगला प्रश्‍न यह पैदा होता है कि क्‍या विज्ञापनों को लेकर प्रतिष्‍ठित अखबारों की जिम्‍मेदारी मात्र एक डिस्‍क्‍लेमर देने से पूरी हो जाती है। वह भी तब जबकि ठीक एक दिन पहले अमर उजाला छापता है कि 'पीके इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नालॉजी, मथुरा' एक गैर मान्‍यताप्राप्‍त संस्‍था है अर्थात फर्जी इंस्‍टीट्यूट है।
तो क्‍या अमर उजाला, दैनिक जागरण तथा हिंदुस्‍तान जैसे नामचीन व लब्‍ध प्रतिष्‍ठित अखबार खुलेआम 'यलो जर्नलिज्‍म' (पीत पत्रकारिता) पर आमादा हो चुके हैं या फिर इनका सहारा लेकर 'पीके ग्रुप ऑफ इंस्‍टीट्यूशंस' अपनी फर्जी शिक्षण संस्‍थाओं का संचालन जारी रखना चाहता है और अपने यहां पढ़ रहे हजारों छात्रों का भविष्‍य अखबारी विज्ञापनों के झूठ से अंधकारमय कर रहा है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि करोड़ों ही नहीं अरबों रुपये की पूंजी से संचालित नामचीन मीडिया हाउस भी उस कॉकस का हिस्‍सा बन गये हैं जो सरकारी कार्यप्रणाली में बने सूराखों का लाभ उठाकर न केवल देश का भविष्‍य कहलाने वाले स्‍टुडेंट्स का भविष्‍य सुनियोजित षड्यंत्र के साथ चौपट कर रहे हैं बल्‍कि कानून की आंखों में धूल झोंक रहे हैं।
क्‍या वो मीडिया हाउस जो एक दिन पहले जिस 'पीके ग्रुप ऑफ इंस्‍टीट्यूशंस' के फर्जी होने का समाचार छापता है और दूसरे ही दिन उसी का कीमती विज्ञापन छापकर उसके मान्‍यताप्राप्‍त होने के दावे की लगभग पुष्‍टि करता है,  किसी भी मायने में कम अपराधी है?
क्‍या दूसरे वो मीडिया हाउसेस जो बिना कुछ देखे केवल इसलिए ऐसे विज्ञापन छाप देते हैं क्‍योंकि लाखों रुपये मिल रहे हैं, किसी फर्जी संस्‍था द्वारा किए जा रहे आपराधिक कृत्‍य से कम आपराधिक कृत्‍य कर रहे हैं?
सवाल कई हैं लेकिन जवाब देने वाला कोई नहीं। कोई जवाब देगा भी क्‍यों.. जब सब एक दूसरे के पूरक बने हुए हैं।
रहा सवाल उस सरकारी संस्‍था "AICTE" का तो उसने अपनी साइट पर देशभर के गैर मान्‍यताप्राप्‍त टेक्‍नीकल इंस्‍टीट्यूट्स की सूची जारी करके अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर ली, अब अखबार उसे खबर बनाकर संबंधित तकनीकी शिक्षण संस्‍थाओं को कैश कर लें, तो वो क्‍या कर सकती है।
बाकी बचे ऐसी शिक्षण संस्‍थाओं में लाखों रुपये खर्च करके पढ़ने वाले छात्र तो उनके प्रति भी इनमें से कोई जवाबदेह नहीं। न अखबार, न सरकार। फर्जी शिक्षण संस्‍थाओं के संचालक तो जिम्‍मेदार होने क्‍यों लगे।
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