शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

भारत में न्यायपालिका समेत हर स्तर पर व्यापक भ्रष्टाचार

वॉशिंगटन। 
अमेरिकी कांग्रेस की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में न्यायपालिका समेत सरकार के हर स्तर पर व्यापक भ्रष्टाचार है। अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन कैरी द्वारा जारी इस वाषिर्क रिपोर्ट (कंट्री रिपोर्ट्स ऑन ह्यूमन राइट्स प्रेक्टिसेज) में कहा गया, "भ्रष्टाचार व्यापक स्तर पर है।" इस रिपोर्ट के अनुसार, हालांकि आधिकारिक स्तर पर भ्रष्टाचार होने पर कानून आपराधिक दंड देता है लेकिन भारत सरकार ने कानून को प्रभावी ढंग से लागू नहीं किया और अधिकारी छूट का फायदा उठा कर भ्रष्ट कामों में लिप्त हो जाते हैं। रिपोर्ट में कहा गया कि सरकार के हर स्तर पर भ्रष्टाचार मौजूद है। सीबीआई ने जनवरी से नवंबर माह के बीच में भ्रष्टाचार के 583 मामले दर्ज किए हैं।
इसमें कहा गया है कि केंद्रीय सतर्कता आयोग को वर्ष 2012 में 7,224 मामले मिले। 5,528 मामले वर्ष 2012 के थे और बाकी 1,696 मामले 2011 से बचे थे। आयोग ने 5,720 मामलों पर कार्रवाई की सिफारिश की थी।
-एजेंसी

बुधवार, 26 फ़रवरी 2014

ओपिनियन पोल की खुली पोल: पैसे लेकर किए जाते हैं सर्वे

ओपिनियन पोल फिक्स होते हैं। पोल करवाने वाले अपने मनमुताबिक नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं। यह खुलासा किया है एक टीवी चैनल के स्टिंग ऑपरेशन ने। चैनल का दावा है कि सी-फोर समेत देश की 11 नामी ओपिनियन पोल कंपनियां इस तरह का फर्जी काम कर रही हैं। इस ऑपरेशन के बाद इंडिया टुडे समूह ने सी-वोटर के साथ करार निलंबित कर दिया है। हालांकि, नीलसन इकलौती ऐसी कंपनी है, जिसने पैसे लेकर नतीजे बदलने से इनकार कर दिया।
न्यूज चैनल ने 'ऑपरेशन प्राइम मिनिस्टर' नामक स्टिंग ऑपरेशन में दावा किया है कि अखबारों, वेबसाइट्स और न्यूज चैनल्स पर दिखाए जाने वाले ओपिनियन पोल्स सही नहीं होते। इस ऑपरेशन के दौरान चैनल के रिपोर्टर्स ने सी-वोटर, क्यूआरएस, ऑकटेल और एमएमआर जैसी 11 कंपनियों से संपर्क किया। स्टिंग ऑपरेशन में दिखाया गया है कि कंपनियों के अधिकारी पैसे लेकर आंकड़ों को इधर-उधर करने को राजी हो गए हैं। ये कंपनियां मार्जिन ऑफ एरर के नाम पर आंकड़ों में घालमेल करती हैं। पैसे का लेन-देन भी पारदर्शी नहीं है। काला धन बनाया जा रहा है। चैनल के एडिटर-इन-चीफ विनोद कापड़ी का कहना है कि 4 अक्टूबर 2013 को चुनाव आयोग ने ओपिनियन पोल पर राजनीतिक दलों से उनकी राय मांगी थी।
उसके बाद ही हमने इन सर्वे की सच्चाई का पता लगाने के बारे में सोचा। इंडिया टुडे समूह ने तोड़ा सी-वोटर का साथ: स्टिंग ऑपरेशन का असर भी तुरंत दिखा। इंडिया टुडे समूह ने सी-वोटर के साथ करार निलंबित कर दिया है। सी-वोटर को कारण बताओ नोटिस भी जारी किया है।
वहीं सी-वोटर के यशवंत देशमुख ने कहा कि 'यह मेरी 20 सालों की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचाने और छवि खराब करने की कोशिश की गई है। यदि चैनल ने बातचीत की पूरी स्क्रिप्ट नहीं दिखाई तो हम उनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही पर करेंगे।'
'ऑपरेशन प्राइम मिनिस्टर' के दस अहम निष्कर्ष
1. पैसे लेकर सर्वे कंपनी दो रिपोर्ट देती है। एक वास्तविक, दूसरी मनचाही।
2. मार्जिन ऑफ एरर (घट-बढ़ की संभावना) के सहारे आंकड़ों में की जाती है गड़बड़ी। (उदाहरण के लिए 40 से 60 सीटें मिल रही हैं तो वे दिखाएंगे 60 सीटें)
3. पैसे लेकर बढ़ाते-घटाते हैं पार्टियों की सीटें। प्रभावित करते हैं जनमत।
4. चुनावों में पैसे बांटकर डमी कैंडीडेट खड़े करने का किया दावा।
5. एक कंपनी का दावा: फर्जी आंकड़ों पर बना था दिल्ली में आप को 48 सीटों वाला सर्वे।
6. हर बड़ी कंपनी से जुड़ी है दो से ज्यादा छद्म कंपनियां।
7. सभी सर्वे कंपनियां ब्लैक मनी लेने को तैयार। आधा कैश, आधा चेक से लेते हैं पैसा।
8. सी-वोटर जैसी बड़ी कंपनियां छोटी कंपनियों से जुटाती हैं आंकड़े।
9. एक बार आंकड़े जुटाकर मनमुताबिक निकाल सकते हैं कई निष्कर्ष।
10. एमएमआर का दावा, हर्षवर्धन को सीएम प्रत्याशी नहीं बनाते तो बनती भाजपा की सरकार।
-एजेंसी

फतवा थोपा नहीं जा सकता

नई दिल्ली। 
सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय द्वारा संचालित शरियत अदालतों में हस्तक्षेप करने के प्रति अपनी आशंका जताते हुए कहा कि मुस्लिम धर्मगुरूओं द्वारा जारी फतवा लोगों पर थोपा नहीं जा सकता। कोर्ट ने यह व्यवस्था देते हुए सरकार से कहा कि वह ऎसे व्यक्तियों को संरक्षण दे, जिन्हें ऎसे फतवों का पालन नहीं करने पर परेशान किया जाता है। जस्टिस सीके प्रसाद की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा कि फतवा स्वीकार करना या नहीं करना लोगों की इच्छा पर निर्भर करता है।
अदालत ने कहा कि दारूल कजा और दारूल-इफ्ता जैसी संस्थाओं का संचालन धार्मिक मसला है और अदालतों को सिर्फ उसी स्थिति में हस्तक्षेप करना चाहिए, जब उनके फैसले से किसी के अधिकारों का उल्लंघन हो रहा हो। जजों ने कहा कि हम लोगों को उनकी परेशानियों से संरक्षण दे सकते हैं। जब एक पुजारी दशहरे की तारीख देता है तो वह किसी को उसी दिन त्यौहार मनाने के लिये बाध्य नहीं कर सकता। यदि कोई आपको बाध्य करता है तो हम आपको संरक्षण दे सकते हैं। अधिवक्ता विश्वलोचन मदन ने शरियत अदालतों की संवैधानिक वैधानिकता को चुनौती देते हुए जनहित याचिका में कहा था कि ये देश में कथित रूप से समानांतर न्यायिक प्रणाली चला रहे हैं।
अदालत ने कहा कि धर्मगुरूओं द्वारा फतवा जारी करने या पंडितों द्वारा भविष्यवाणी करने से किसी कानून का उल्लंघन नहीं होता है इसलिए अदालतों को इसमें हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए। उन्होंने सवाल किया कि कौन सा कानून फतवा जारी करने का अधिकार देता है और कौन सा कानून पंडित को जन्मपत्री बनाने का अधिकार देता है!
अदालत सिर्फ यही कह सकती है कि यदि किसी को फतवा के कारण परेशान किया जा रहा है तो सरकार लोगों को संरक्षण देगी। कोर्ट ने कहा कि ये राजनीतिक और धार्मिक मुद्दे हैं और हम इसमें पडना नहीं चाहते हैं। अखिल भारतीय पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा कि फतवा लोगों के लिए बाध्यकारी नहीं है और यह सिर्फ मुफ्ती की राय है तथा उसे इसे लागू कराने का कोई अधिकार नहीं है। बोर्ड की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचन्द्रन ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति की इच्छा के खिलाफ उस पर फतवा लागू किया जाता है तो वह ऎसी स्थिति में अदालत जा सकता है।
-एजेंसी

मंगलवार, 25 फ़रवरी 2014

फ़र्जी़ राजनीतिक पार्टियां भी वसूल रही हैं करोड़ों का चंदा

आम चुनाव से पहले सियासत की दुनिया से जुड़ा एक बड़ा खुलासा हुआ है. पता चला है कि हमारे देश में सैकड़ों ऐसे राजनीतिक दल हैं जिन्हें मोटा चंदा मिलता है जबकि वे चुनाव भी नहीं लड़ते. एक आरटीआई के जरिये मिले जवाब से इसका खुलासा हुआ है. एक अंग्रेजी अखबार ने चुनाव आयोग से सूचना लेने के बाद यह खबर दी है. खबर के मुताबिक देश में कई ऐसी पार्टियां हैं जो चुनाव नहीं लड़तीं लेकिन उन्हें एक लाख से लेकर पांच करोड़ रुपये तक का चंदा मिला है. ये पार्टियां दिल्‍ली-एनसीआर से लेकर मुंबई तक फैली हुई हैं.
अखबार ने बताया है कि इटानगर की एक इवेंट मैनेजमेंट कंपनी फीनिक्स राइजिंग ने दिल्ली की एक पार्टी को 15 लाख रुपये का चंदा दिया है. इस पार्टी का नाम है नेशनल यूथ पार्टी. इसी तरह एक और पार्टी है फोरम फॉर प्रेसिडेंशियल डेमोक्रेसी और यह मुंबई स्थित है. इसे वहीं के नेप्च्‍यून रिजॉर्ट्स एंड डेवलपर्स ने 1.5 लाख रुपये का चंदा दिया है.
चुनाव आयोग के पास इस वक्‍त देश भर के 1600 राजनीतिक दलों का बकायदा रजिस्‍ट्रेशन है और इनमें से ज्यादातर चुनाव नहीं लड़तीं. लेकिन इनमें से ज्यादातर को चंदा मिलता है. ये चंदा देती हैं छोटी कंपनियां. चंदे की राशि होती है 11,000 रुपये से 5 करोड़ रुपये तक.
क्‍यों मिल रहा है चंदा?
इस सवाल का जवाब थोड़ा मुश्किल है. जब अखबार ने फोरम फॉर प्रेसिडेंशियल डेमोक्रेसी के सचिव से इस बाबत पूछा तो उसने कहा कि वह चुनाव लड़ना चाहते हैं और इसलिए चंदा ले रहे हैं. चुनाव आयोग के एक अधिकारी ने बताया कि इनके चंदा लेने का कारण यह है कि इससे उन्हें इनकम टैक्स में छूट मिलती है. ज्यादातर छोटी पार्टियों के कर्ताधर्ताओं ने बताया कि वे मौजूदा सिस्टम को बदल देना चाहती हैं, इसलिए उन्होंने पार्टी बनाई है और चंदा ले रही हैं.
हैरानी की बात है कि इन पार्टियों को चंदा दूरदराज के शहरों से भी मिल रहा है. अहमदाबाद की एक कंपनी झावेरी एंड कंपनी एक्सपोर्ट्स ने फरीदाबाद की पार्टी राष्ट्रीय विकास पार्टी दो करोड़ रुपये का चंदा दिया. इस पार्टी को कई जगहों से चंदा मिला है. ऐसा ही एक अजीबोगरीब मामला है गुवाहाटी की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट का. इसे बेंगलुरू और मुंबई की दो कंपनियों ने चंदा दिया है.
-एजेंसी

रविवार, 23 फ़रवरी 2014

निर्मल बाबा पर करोड़ों की कर चोरी का आरोप

नई दिल्‍ली। 
स्वयंभू धार्मिक गुरु ‘निर्मल बाबा’ को मिल रहे ‘दसवंद’ ने उन्हें संकट में डाल दिया है. निर्मल बाबा को 3.5 करोड़ रुपये की कथित सेवाकर चोरी का नोटिस भेजा गया है. दसवंद श्रद्धालु की आय का दसवां हिस्सा है जो (बाबा को) दान में प्राप्त करते हैं. आधिकारिक सूत्रों ने बताया कि केंद्रीय उत्पाद शुल्क विभाग ने इस आधार पर नोटिस जारी किया है कि ‘समागम’ में आने वाले श्रद्धालुओं से एक ‘सेवा’ के लिए दसवंद वसूला जाता है. ‘निर्मल दरबार’ की गतिविधियां जुलाई, 2012 के बाद उत्पाद शुल्क विभाग की नजर में आई. जुलाई, 2012 में और सेवाओं को ‘सेवाकर’ दायरे में लाने के लिए एक  नकारात्मक सूची जारी की गई थी. उन्होंने कहा कि निर्मल बाबा के खिलाफ दसवंद संग्रह को लेकर करीब 3.5 करोड़ रपये का नोटिस दिया गया है. निर्मल दरबार को भेजे गए ई.मेल का कोई जवाब नहीं आया. इसी तरह, फोन किए जाने पर भी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली.
निर्मल दरबार के एक कर्मचारी ने नाम उजागर नहीं करने की शर्त पर बताया, ‘‘हमारे यहां मीडिया से बातचीत करने के लिए कोई व्यक्ति नहीं है. कृपया हमारी वेबसाइट पर दिए गए पते पर ई.मेल भेजें.’’ निर्मल बाबा के वेबसाइट के अनुसार उनके समागम में शामिल होने के लिए प्रति व्यक्ति 3,000 रुपये (कर सहित) पंजीकरण शुल्क का भुगतान करना होता है, जबकि ‘शो’ में शामिल होने का खर्च प्रति व्यक्ति 5,000 रुपये (कर सहित) है.
-एजेंसी

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2014

अब 'अम्‍मा' के आश्रम पर भी पड़ा यौन शोषण का साया

तिरूअनंतपुरम। 
आध्यात्मिक नेता माता अमृतानंदमायी विवादों में हैं। अम्मा की एक करीबी ने अपनी पुस्तक में आश्रम में होने वाले यौन शोषण की पूरी कहानी बताई है। हाल ही में प्रकाशित "होली हेल,अ मेमोयर ऑफ फेथ,डिवोशन एंड प्योर मैडनेस" पुस्तक में जी.ट्रेडवेल उर्फ गायत्री ने बताया है कि किस तरह आश्रम में उसका यौन शोषण हुआ था।
गायत्री के मुताबिक आश्रम में रहने वाले वरिष्ठ लोगों के शारीरिक संबंध थे। आश्रम के प्रतिनिधि सुदीप कुमार ने इस बात की पुष्टि की है कि गायत्री दो दशक तक मां अमृतानंदमायी के साथ जुड़ी हुई थी। 1999 में उन्होंने आश्रम छोड़ दिया था। हालांकि कुमार ने पुस्तक के जरिए लगाए गए आरोपों को निराधार बताया है।
बकौल कुमार, आरोप हैरान करने वाले और सामान्य तर्क को चुनौती देने वाले हैं। ऑस्ट्रेलिया मूल की ट्रेडवेल उर्फ गायित्री ने 19 साल की उम्र में मां अमृतानंदमयी के पर्सनल अटेंडेंट के रूप में आश्रम ज्वाइन किया था। आश्रम में रहने के दौरान गायित्री ने देखा के केरल के एक फिशिंग गांव की रहने वाली महिला बहुत बड़ी आध्यात्मिक नेता बन गई। जिनके दुनिया भर में अनुयायी हैं। उनका ट्रस्ट स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में संस्थानों का नेटवर्क चलाता है।
गायित्री का कहना है कि अम्मा की पर्सनल अटेंडेंट के रूप में काम करते हुए वह ईश्वर को जानना चाहती थी। उसने सोचा था कि वह अपने लक्ष्य को हासिल कर सकती है। बकौल गायत्री शुरूआत के दिनों में उसे नहीं भुलाए जाने आध्यात्मिक अनुभव हुए। गायित्री का आरोप है कि अम्मा की मासूमियत और पवित्रता का दिखावा करने के लिए विश्वस्त लोगों की ऎसी टीम थी जो उनका गंदा काम करती थी। इसमें वह भी शामिल थी।
गायत्री के मुताबिक आश्रम में रहने वाले एक व्यक्ति ने उसका यौन शोषण किया था। बार बार यौन शोषण होने से उसका विश्वास खत्म हो गया। अपनी जीवनी में गायित्री ने आश्रम के सदस्यों के बीच होने वाले कथित स्वछंद संभोग के बारे में बताया है। गायित्री का कहना है कि जब आश्रम के कुछ लोग अम्मा के परिवार की संपत्ति को लेकर कुछ बोलते तो उनका विश्वस्त प्रतिनिधि बालू कहता कि संपत्ति अम्मा के पिता के मछली पालन बिजनेस से जुड़ी है।
गायित्री की पुस्तक अमेजन डॉट कॉम पर उपलब्ध है। जब पुस्तक पर आधारित रिपोर्ट सोशल मीडिया पर वायरल हो गई तो सीपीएम के सांसद और पार्टी के दैनिक देशाभिमानी के रेजिडेंट एडिटर(कोçच्च)पी.राजीव ने मामले की रिपोर्ट पर मुख्य धारा के मीडिया की विमुखता की आलोचना की। राजीव ने कहा कि वे दिन चले गए जब लोगों को अंधेरे में रखा जाता था। 

दरअसल, कहानी तो अब शुरू हो रही है

( लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
2014 के लिए दुंदुभि बज चुकी है, शंखनाद होने को है। राजनीति के बयानवीरों ने शब्‍दों के इतने तीक्ष्‍ण विषवाण छोड़ना शुरू कर दिया है जिन्‍हें सुनकर लगता है कि वह सारी जंग अपने मुंह से ही जीत लेंगे। एक-दूसरे को मर्यादा का पाठ पढ़ाने वाले खुद किसी मर्यादा में रहने को तैयार नहीं हैं। वह कब मर्यादा लांघ जाते हैं, इसका शायद उन्‍हें अहसास तक नहीं होता।
नेताओं ने 'राजनीति' से 'नीति' को कब काटकर अलग कर दिया और कब चुनावी प्रक्रिया को केवल 'राज' पाने का हथियार बना डाला, इसका अंदाज आमजन को लगा ही नहीं। वह तो इस भुलावे में रहा कि 'राजनीति' का नीति व नैतिकता से अब भी कोई वास्‍ता जरूर होगा।
बहरहाल, सवा अरब की आबादी वाले इस मुल्‍क की जनता को हमेशा की तरह यह उम्‍मीद है कि 2014 में कुछ नया होगा। कुछ ऐसा होगा जो आशा की किरण जगायेगा और देश की दशा सुधारने में सहायक होगा।
दरअसल, आम आदमी पार्टी के अचानक हुए उदय ने 2014 के लोकसभा चुनावों को खास बना दिया है। बेशक वह अभी अपने शैशवकाल में है और इसलिए उसके भविष्‍य पर टिप्‍पणी करना बेमानी है परंतु एक काम उसने जो किया है वह यह कि गंदगी से पटे पड़े राजनीति के तालाब में जैसे कंकड़ फेंक दिया हो। गंदगी के बीच बचे हुए थोड़े-बहुत पानी में इस कंकड़ से तरंगें उठने लगीं हैं। आमजन के मन में भी कहीं उम्‍मीद की कोई किरण पैदा हुई है कि हो न हो, बदलाव की शुरूआत यहीं से हो जाए। संभव है आज जो चिंगारी पैदा हुई है, कल वही शोला बनकर भारत के आम नागरिक को स्‍वतंत्रता का सच्‍चा अहसास करा पाए।
इस बीच तेलंगाना को लेकर जिस तरह लोकसभा और राज्‍यसभा में माननीयों ने अपने आचरण का प्रदर्शन किया, उससे एक बात पूरी तरह साफ हो गई कि जनता उनके बावत चाहे जो सोचती रहे लेकिन वह किसी तरह सुधरने को तैयार नहीं हैं। तब भी नहीं, जब आमजन यह मानने लगा हो कि माननीय का तमगा प्राप्‍त यह वर्ग ही हकीकत में देश के माथे पर कलंक बन चुका है और इसका इलाज करना अब जरूरी हो गया है।
इधर सुप्रीम कोर्ट ने जैसे ही राजीव गांधी की हत्‍या के दोषियों की फांसी को उम्रकैद की सजा में तब्‍दील किया, वैसे ही तमिलनाडु की मुख्‍यमंत्री जे. जयलिलता ने 2014 के लिए सबसे बड़ा चुनावी हथियार आजमा डाला। जयललिता ने तीसरे मोर्चे को सीढ़ी बनाकर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर काबिज होने की अपनी इच्‍छा तो पहले ही जाहिर कर दी है, अब उसके लिए हर प्रकार का हथकंडा अपनाने की मंशा से भी अवगत करा दिया है।
जयललिता की इस नई चुनावी बिसात पर कांग्रेस का आगबबूला होना स्‍वाभाविक था और इसीलिए खुद राहुल गांधी तक ने कह डाला कि अगर देश के पूर्व प्रधानमंत्री को न्‍याय नहीं मिल सकता तो आम आदमी न्‍याय की उम्‍मीद कैसे कर सकता है।
राहुल गांधी का दुख तो समझ में आता है लेकिन यह बात उन्‍हें भी समझनी होगी कि जयललिता जो कुछ कर रही हैं, यह उसी घिनौने राजनीतिक खेल का हिस्‍सा है जिसकी शुरूआत कांग्रेस ने खुद की थी।
कांग्रेस का हर निर्णय कुछ इसी तरह की घिनौनी राजनीति के इर्द-गिर्द रहता है। याद कीजिए प्रियंका और सोनिया का नलिनी को लेकर उठाया गया कदम जिससे साफ होता है कि वह भी राजीव के सभी हत्‍यारों को फांसी से बचाना चाहती थीं।
अगर वह वाकई यही चाहती थीं तो आज जयललिता के निर्णय पर इतनी हायतौबा किसलिए। क्‍या इसलिए कि राजीव के हत्‍यारों को माफी दिलवाकर जो श्रेय सोनिया एंड कंपनी खुद लेना चाहती थी, उस पर जयललिता ने एक झटके में न सिर्फ पानी फेर दिया बल्‍कि चुनावी गणित फिट करके उसका पूरा लाभ उठाने की भी रणनीति बना डाली।
अब जयललिता के दोनों हाथ में लड्डू हैं। केन्‍द्र यदि राजीव के हत्‍यारों को रिहा करने की इजाजत देता है तो उसका चुनावी लाभ अम्‍मा को इसलिए मिलेगा कि उसकी पहल उन्‍होंने की और यदि नहीं देता है तो भी उन्‍हें इसलिए लाभ मिलेगा कि उन्‍होंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की। इसके ठीक उलट कांग्रेस दोनों स्‍थितियों में खाली हाथ रहेगी और यही माना जायेगा कि उसने जो कुछ किया, सिर्फ मजबूरी में किया।
कांग्रेस के पास इस बात का भी कोई जवाब नहीं है कि यदि वह राजीव के हत्‍यारों को माफी देने के पक्ष में नहीं थी तो दस सालों से क्‍या कर रही थी। केंद्र में अपनी सरकार के होते क्‍यों नहीं वह राष्‍ट्रपति से उस पर कोई फैसला करा पाई। दया याचिकाओं पर निर्णय लेने के राष्‍ट्रपति के अधिकार को किसी समय-सीमा में बांधने की बात यदि फिलहाल छोड़ भी दी जाए तो भी क्‍या कांग्रेस को सुप्रीम कोर्ट के रुख से स्‍पष्‍ट नहीं हो रहा था कि वह राजीव गांधी की हत्‍या के दोषियों को राहत दे सकता है।
कांग्रेस अगर चाहती तो सुप्रीम कोर्ट के रुख को भांपकर राष्‍ट्रपति से तत्‍काल कोई फैसला करने का अनुरोध कर सकती थी लेकिन उसने ऐसा कुछ नहीं किया और केवल तमाशबीन बनी रही।
जाहिर है कि उसकी अपनी नीयत भी पूरे मामले को राजनीतिक हानि-लाभ के तराजू में तौलने की थी लेकिन अब बाजी हाथ से निकलती देख हवा का रुख बदलने की कोशिश की जा रही है।
सच तो यह है कि सत्‍ता पर काबिज रहने और काबिज होने के पूरे खेल का न कोई नियम रह गया है, न कोई नीति। जो कुछ है सब अनीति ही अनीति है।
अनीति के इस खेल का अब वो दौर आ गया है जब खिलाड़ी खुद मोहरा बनने लगे हैं। शह और मात के लिए नियमों को ताक पर रखने का ही परिणाम है कि प्‍यादा भी वजीर को चुनौती दे रहा है।
चुनौती तो आमजन के सामने भी है लेकिन वह इस बात से खुश है कि अब तक आग लगाकर दूर से तमाशा देखने वाले, खुद तमाशा बन रहे हैं। जो अब तक मचान पर बैठकर शिकार करते रहे, वह अपनी ही नीतियों का शिकार हो रहे हैं। बकरी को बांधकर शेर को ललचाने की परंपरा घातक होती जा रही है।
बेहतर होगा कि समय रहते राजनीति और चुनावी खेल के नियमों में परिवर्तन कर लिया जाए वर्ना वो दिन दूर नहीं जब शिकारी, शिकार का निवाला बन जायेगा और उसके सारे हथियार धोखा दे जायेंगे।
2014 भले ही पूरी व्‍यवस्‍था को परिवर्तित न कर पाए लेकिन उसके लिए रास्‍ता बनाने का ज़रिया जरूर बनेगा क्‍योंकि 66 सालों की तथाकथित स्‍वतंत्रता से लोगों का भरोसा उठने लगा है और वो समझने लगे हैं कि 15 अगस्‍त 1947 को जो परिवर्तन हुआ था, वह भी एक छलावा था।
उधार के संविधान और उसके आधार पर बने कानून ने सिर्फ सूरतों में रद्दोबदल किया, सीरतों में नहीं लिहाजा आज के शासकों तथा बीते हुए कल के शासकों में कोई फर्क दिखाई नहीं देता।
चूंकि 66 साल एक आदमी की औसत उम्र भी है इसलिए मान लेना चाहिए कि 1947 में फिरंगियों से मिली स्‍वतंत्रता और उनसे विरासत में मिले संविधान प्रदत्‍त अधिकार एवं कर्तव्‍यों की भी मियाद पूरी हो चुकी है।
अब उस नई सोच के हिसाब से संविधान गढ़ना होगा जो स्‍वतंत्रता के साथ-साथ अपने अधिकार एवं कर्तव्‍यों को पहले से कहीं अच्‍छी तरह समझने लगा है और जो राजनीति, राजनेताओं, चुनावी खेल तथा सत्‍ता हथियानों के लिए अपनाये जाने वाले हथकंडों से वाकिफ हो चुका है।
आउटडेटेड हो चुकी स्‍वतंत्रता और बेमानी हो चुकी राजनीति को राजनीतिक दल समय रहते समझ लें तो ठीक अन्‍यथा समय तो सब समझा ही देगा। इंतजार कीजिए.....कहानी अभी खत्‍म नहीं हुई। सच तो यह है कि कहानी यहां से शुरू हो रही है।
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