मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

राष्‍ट्रपति भवन व संसद भवन की जमीन का मुआवजा मांगा

नई दिल्ली। 
जिस जगह पर राष्ट्रपति भवन संपदा, संसद भवन व अन्य सरकारी दफ्तर बने हैं, उस जमीन का मुआवजा किसानों को न मिलने के दावे वाली याचिका पर हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है. याचिका में कहा गया है कि मालचा गांव के किसानों से वर्ष 1911-12 में उस वक्त जमीन का अधिग्रहण किया गया था, जब कोलकाता से बदल कर नई दिल्ली को राजधानी बनाया गया था. किसानों की तरफ से एडवोकेट डा. सूरत सिंह का कहना है कि मुआवजा राशि 2217 रुपए दस आना और ग्यारह पैसा दी जानी थी जो नहीं दी गई.
न्यायमूर्ति बीडी अहमद व आईएस मेहता की बेंच के समक्ष पेश मामले में उप राज्यपाल, भूमि एवं वन विभाग, शहरी विकास मंत्रालय को भी नोटिस जारी कर 23 मार्च तक जवाब मांगा है. किसानों की तरफ से एडवोकेट डा. सूरत सिंह ने अपनी जिरह में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को चुनौती देते हुए कहा कि वर्ष 1911-12 के दरमियान मालचा गांव के करीब 150 किसानों की 1700 एकड़ जमीन अधिगृहीत की गई थी.
कहा गया कि इसी जमीन पर राष्ट्रपति भवन संपदा, संसद भवन व अन्य सरकारी दफ्तर बनाए गए. बेंच को बताया गया कि नए भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के मुताबिक अगर फैसला पांच साल या इससे पहले हुआ है और मुआवजा या जमीन का कब्जा नहीं लिया गया है तो माना जाएगा कि जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया समाप्त हो चुकी है. कहा गया कि यह कानून एक जनवरी 2014 से प्रभावी हुआ है.
यह भी बताया गया कि वर्ष 1911-12 के आदेश संख्या 30 के जरिए मालचा गांव की 1700 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई थी. सज्जन सिंह व अन्य की याचिका के अनुसार भुगतान रजिस्टर में दर्ज उनके पूर्वज शादी को जमीन के बदले 2217 रुपए, दस आना व ग्यारह पैसा मुआवजा मिलना था, जो कि अदा नहीं किया गया. याचिका में मांग है कि उनको मुआवजा दिलवाया जाए. 
-एजेंसी

बुधवार, 24 दिसंबर 2014

रेप केस: उपमन्‍यु के घर फरारी का नोटिस चस्‍पा -एक पत्र ने भी किया अफवाहों का बाजार गर्म

पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु पर एमबीए की एक छात्रा के साथ बलात्‍कार किये जाने के आरोप में कल पुलिस ने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए कोर्ट से सीआरपीसी की धारा 82 के तहत कार्यवाही करा ली है। पुलिस ने कल ही उपमन्‍यु के घर पर उसकी फरारी संबंधी सूचना का नोटिस भी चस्‍पा कर दिया है।
पीड़िता के अधिवक्‍ता प्रदीप राजपूत द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार रेप के आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु के फरार हो जाने तथा पुलिस की गिरफ्त में न आने पर कल इस मामले की आई. ओ. महिला सब इंस्‍पेक्‍टर रीना ने संबंधित न्‍यायालय से सीआरपीसी की धारा 82 के तहत कार्यवाही किये जाने की अनुमति लेकर आरोपी के घर उसका नोटिस चस्‍पा कर दिया।
इस प्रक्रिया के बाद भी यदि उपमन्‍यु पुलिस अथवा कोर्ट के समक्ष हाजिर नहीं होता है तो पुलिस उसे फरार मानते हुए सीआरपीसी की धारा 83 के तहत उसकी चल-अचल संपत्‍ति कुर्क करने का आदेश ले सकती है।
सामान्‍य तौर पर 82 के बाद 83 की कार्यवाही करने के लिए पुलिस 30 दिन का समय लेती है किंतु यह समय निर्धारित नहीं है। यदि पुलिस को ऐसा लगता है कि आरोपी इस बीच में अपनी चल-अचल संपत्‍ति बेच सकता है तो वह 83 की कार्यवाही करने का आदेश कभी भी लेकर उसकी चल-अचल संपत्‍ति कुर्क कर सकती है।
उल्‍लेखनीय है कि उपमन्‍यु के खिलाफ न्‍यायालय ने गैर जमानती वारंट (NBW) पहले से जारी किया हुआ है।
चूंकि यह मामला यूपी जर्नलिस्‍ट एसोसिएशन के प्रदेश उपाध्‍यक्ष, ब्रज प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष, मथुरा की छावनी परिषद् के पूर्व उपाध्‍यक्ष का तमगा प्राप्‍त तथा अधिवक्‍ता सहित बसपा की टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ चुके एक प्रभावशाली पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु से ताल्‍लुक रहता है लिहाजा तरह-तरह की अफवाहों का बाजार भी इस बीच गर्म है।
पहले इस आशय की अफवाह उड़ी की भारी-भरकम रकम देकर उपमन्‍यु ने पीड़िता के परिवार से समझौता कर लिया है, और अब कल से एक नई अफवाह यह उड़ी कि इस मामले की तफ्तीश (जांच) को डीजीपी ने गैर जनपद (फिरोजाबाद) स्‍थानांतरित कर दिया है।
हद तो तब हो गई जब तफ्तीश चेंज होने के संबंध में पुलिस महानिदेशक उत्‍तर प्रदेश के कार्यालय से जारी दर्शाया हुआ डीजीपी आनंद लाल बनर्जी के तथाकथित हस्‍ताक्षरयुक्‍त वाला एक पत्र भी सोशल मीडिया पर तैरने लगा।
आगरा परिक्षेत्र की पुलिस उपमहानिरीक्षक श्रीमती लक्ष्‍मी सिंह के नाम से संबोधित इस पत्र में लिखा है कि हनुमान नगर निवासी सेना के पूर्व सूबेदार त्रिभुवन उपमन्‍यु के संलग्‍न पत्र का अवलोकन करें जो माननीय मुख्‍यमंत्री के कार्यालय से मुकद्दमा अपराध संख्‍या 944/2014 धारा 376 व 506 के संबंध में प्रेषित है और निष्‍पक्ष विवेचना गुण-दोष के आधार पर जनपद फिरोजाबाद से कराये जाने के संबंध में है।
पत्र में यह भी लिखा है कि उपरोक्‍त प्रकरण वादी के बताये गये तथ्‍यों के अनुसार संदिग्‍ध प्रतीत हो रहा है।
जांच स्‍थानांतरित करने के लिए जिन सज्‍जन पूर्व सूबेदार त्रिभुवन उपमन्‍यु के नाम का उल्‍लेख उक्‍त पत्र में किया गया है, बताया जाता है कि वह आरोपी पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु के सगे भाई हैं।
इस संबंध में जानकारी की गई तो पता लगा कि प्रथम तो प्रतिवादी पक्ष के किसी प्रार्थना पत्र पर जांच स्‍थानांतरित करने का कोई प्रावधान नहीं है और दूसरे इसी पत्र में यह भी लिखा है कि उपरोक्‍त प्रकरण वादी के बताये गये तथ्‍यों के अनुसार संदिग्‍ध प्रतीत हो रहा है  जबकि विरोधाभासी है क्‍योंकि इस मामले में पीड़िता खुद 'वादी' है।
इस सबके अलावा पत्र में डीआईजी को उनके व्‍यक्‍तिगत नाम से संबोधित किया जाना, बिना जांच के ही एक संगीन अपराध को संदिग्‍ध बताया जाना तथा पत्र की तारीख 22 को काटकर हाथ से 18 किया जाना आदि तमाम ऐसे कारण हैं जो पत्र को किसी सुनियोजित साजिश का हिस्‍सा साबित करते हैं।
हालांकि इस पत्र के आधार पर कल पूरे दिन अफवाहों का बाजार तो गर्म रहा ही, साथ ही यह दावा करने वालों की भी खासी संख्‍या सामने आती रही जिन्‍होंने कहा कि उनकी डीआईजी से बात हो चुकी है और उन्‍होंने जांच फिरोजाबाद स्‍थानांतरित किये जाने की पुष्‍टि कर दी है।
इतना सब-कुछ हो जाने तथा सोशल मीडिया पर भी प्रसारित होने के बावजूद आश्‍चर्यजनक रूप से पुलिस इस मामले में चुप्‍पी साधे रही जबकि यह एक संगीन साइबर क्राइम की श्रेणी में आता है।
इस तरह पुलिस विभाग के गोपनीय पत्र का मजमून तैयार करके उसे प्रसारित करना तथा उसके लिए प्रदेश के डीजीपी कार्यालय तथा डीजीपी के नाम व हस्‍ताक्षरों का इस्‍तेमाल करना अपने आप में बड़ी साजिश की ओर इशारा करता है परंतु पुलिस ने ऐसा करने वाले का पता तक लगाना जरूरी नहीं समझा।
यूं तो इस रेप केस को लेकर पुलिस के कुछ आला अधिकारियों का रवैया शुरू से काफी लचीला रहा है परंतु अब ऐसे किसी पत्र को प्रसारित करने के मामले में भी पूरी तरह उदासीन बने रहना साइबर क्राइम को बढ़ावा देने से कम नहीं माना जा सकता।
जो भी हो, अब देखना यह है कि पुलिस इस मामले में आरोपी पत्रकार को गिरफ्त में ले पाती है अथवा ऐसी तरह-तरह की अफवाहों के बीच उसे कोर्ट में सरेंडर करने का मौका देती है ताकि सांप मर जाए और लाठी भी सही सलामत रहे।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

हद कर दी आपने हुड्डा साहब, एक वकील की फीस 6 करोड़

चंडीगढ़। 
हरियाणा में भूपिंदर सिंह हुड्डा की अगुवाई वाली पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने 6 करोड़ रुपये से ज्यादा की फीस पर सीनियर वकील केटीएस तुलसी की सेवाएं लीं। हरियाणा सरकार ने तुलसी की सेवा ऐसे समय में ली, जब उस पर 82,000 करोड़ रुपये का बकाया था। इस बात का खुलासा एक व्यापक पड़ताल से हुआ है। हरियाणा के एडवोकेट जनरल ऑफिस में 200 से ज्यादा लॉ ऑफिसर थे, इसके बावजूद राज्य सरकार ने मारुति सुजुकी के मानेसर प्लांट में हुई हिंसा के दोषियों के खिलाफ ट्रायल में केटीएस तुलसी को स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर नियुक्त किया गया। तुलसी की नियुक्ति जुलाई 2012 में की गई।
500 से ज्यादा डॉक्युमेंट्स का आंकलन करके पता लगाया गया कि हुड्डा ने तुलसी के फीस शेड्यूल को सेटल किए बगैर उनकी नियुक्ति की। 'भारी भरकम खर्च' को देखते हुए नौकरशाहों ने तुलसी की सेवाएं बंद करने की सलाह भी दी, लेकिन उनकी सेवाएं बनाए रखी गईं। हुड्डा सरकार ने बिना किसी देरी के न केवल तुलसी को 5.5 करोड़ रुपये का भुगतान किया, बल्कि विधानसभा चुनावों से पहले उनके लंबित बिलों का भुगतान करने की भी कोशिश की। केटीएस तुलसी के पेंडिंग बिल्स करीब 65 लाख रुपये के थे।
हालांकि, अब मनोहर लाल खट्टर की अगुवाई वाली बीजेपी सरकार ने तत्काल प्रभाव से तुलसी की सर्विसेज बंद करने और लंबित बिलों की जांच करने का फैसला किया है। राज्य सरकार तुलसी की जगह पर 'रीजनबल फीस' लेने वाले एक सीनियर क्रिमिनल लॉयर को इंगेज करेगी। तुलसी की सर्विसेज लेने के तीन महीने से ज्यादा समय के बाद उनके फीस शेड्यूल (इसमें उनके तीन सहायक वकील भी थे) को फाइनल किया गया।
हालांकि, राज्य के एडवोकेट जनरल हवा सिंह हुड्डा ने 24 अगस्त 2012 को सरकार से कहा था कि फीस शेड्यूल को पहले से तय किया जाए। उन्होंने कहा था कि अगर पहले से फीस तय नहीं की गई, तो इसे स्वीकार करना कठिन हो जाता है। तत्कालीन एडवोकेट जनरल ने राज्य को यह भी सलाह दी थी कि तुलसी से सुनवाई की प्रभावी तरीकों के फीस बिल देने को कहा जाए।
तत्कालीन मुख्यमंत्री ने तुलसी और उनके तीन सहायक वकीलों के फीस शेड्यूल को एक ही दिन मंजूरी दी है। तुलसी पर किए जाने वाले खर्च का मामला एक आरटीआई से सामने आया है। गुड़गांव के रहने वाले एक शख्स ने जनवरी 2013 में सूचना के अधिकार के तहत तुलसी और उनके जूनियर पर किए गए खर्च का ब्योरा मांगा था। मई 2013 में गृह सचिव ने ऑफिशल फाइल पर एक नोट लिखा, जिसमें भारी खर्च बचाने के लिए यह केस पब्लिक प्रॉसीक्यूटर्स को देने की बात कही गई थी।

सफेदपोशों की काली जमात के बीच SSP साहिबा

मथुरा। 
ड्यूटी की खातिर हर वक्‍त 'खाक' में मिलने की प्रेरणा देने वाली 'खाकी वर्दी' को अपने बदन पर सजाकर रौब गांठने वाले पुलिस अफसर ही जब उसकी इज्‍जत से खिलवाड़ करने पर आमादा हो जाएं तो उसका इकबाल कायम कैसे रहेगा और कैसे कानून का राज स्‍थापित होगा?  
यह प्रश्‍न यूं तो कोई नए नहीं हैं, और हर उस घटना के बाद उठते हैं जिसमें पुलिस की भूमिका संदिग्‍ध प्रतीत होती है परंतु जहां जिले की कमान संभाले बैठे पुलिस कप्‍तान की ही भूमिका साफ-साफ पक्षपाती प्रतीत होती हो, वहां ऐसे किसी प्रश्‍न की अहमियत काफी बढ़ जाती है।
यह अहमियत तब और बढ़ जाती है जब मामला बलात्‍कार जैसे घृणित आपराधिक कृत्‍य का हो तथा आरोपी एक तथाकथित पत्रकार या यूं कहें कि हाईप्रोफाइल 'लाइजनर' हो जबकि पुलिस की कमान महिला पुलिस अधिकारी के हाथ में हो।
कमलकांत उपमन्‍यु पर बलात्‍कार का आरोप लगने के बाद कहने को तो कई ऐसे सफेदपोश लोग उसके पक्ष में सक्रिय हो गये जो किसी न किसी रूप में उसके रैकेट का हिस्‍सा हैं, परंतु इसमें सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण भूमिका यदि कोई अदा कर रहा है तो वह हैं जिले की महिला पुलिस कप्‍तान मंजिल सैनी।
बेशक मंजिल सैनी तक पहुंचने व उनसे रूबरू होकर सवाल-जवाब करने की हिमाकत हर कोई नहीं कर सकता लेकिन जानना सब चाहते हैं कि आखिर कमलकांत उपमन्‍यु से उनका ऐसा कौन सा रिश्‍ता है, जिसे निभाने के लिए उन्‍होंने न केवल अपने बदन पर सजी खाकी वर्दी की इज्‍जत से खिलवाड़ करने में हिचक नहीं दिखाई बल्‍कि एक सामर्थ्‍यवान महिला होने के बावजूद एक लड़की के प्रति होने वाली स्‍वाभाविक संवेदना को भी महसूस नहीं किया।
3 दिसंबर को पीड़ित लड़की द्वारा पहली बार पुलिस को अपना प्रार्थना पत्र सौंपे जाने से लेकर अब तक 19 दिन गुजर गए लेकिन अब तक कप्‍तान साहिबा नित-नये तरीके निकालकर आरोपी पत्रकार को बचने और पीड़िता व उसके परिवार पर समझौते के लिए दबाव बनाने का पूरा मौका दे रही हैं।
देखा जाए तो इस तरह वह खुद एक आपराधिक कृत्‍य की भागीदार बन रही हैं और आगे जाकर उन्‍हें इसके लिए सक्षम व्‍यक्‍ति के सामने जवाब देना पड़ सकता है लेकिन फिलहाल तो उपमन्‍यु के प्रति उनकी अतिरिक्‍त सहानुभूति, उनकी ड्यूटी एवं कानून से परे जा चुकी है।
आम जनता की बात यदि छोड़ भी दें तो उनके अपने महकमे और यहां तक कि प्रशासनिक अधिकारियों के बीच भी उनकी आरोपी को लेकर बरती जा रही यह अतिरिक्‍त सहानुभति खासी चर्चा का विषय है।
आश्‍चर्य की बात है कि न्‍यूज़ चैनल आजतक की टीम द्वारा अपने कार्यक्रम 'वारदात' के लिए जब उनसे इस बावत बातचीत की गई तो वह आरोपी पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु के प्रति सम्‍मानजनक व आदरसूचक शब्‍दों का इस्‍तेमाल करती नजर आईं।
यही कारण है कि 19 दिन बाद तक एक ओर जहां आरोपी पत्रकार पुलिस की पकड़ से दूर है वहीं दूसरी ओर सारी जरूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद भी आरोपी के गुर्गे लगातार पीड़िता व उसके परिवार पर समझौते के लिए दबाव बनाने तथा उन्‍हें लोभ-लालच देकर बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं।
वह हर रोज लोगों के बीच एक नई अफवाह फैलाते हैं। कभी कहते हैं इतनी रकम लेकर पीड़िता के पिता ने समझौता कर लिया है और कभी कहते हैं कि आरोपी पत्रकार उपमन्‍यु, रेप पीड़िता से शादी करने जा रहा है।
ताज्‍जुब तो तब होता है जब इन अफवाहों की मौखिक पुष्‍टि खुद को बुद्धि का पुतला मानने वाले पत्रकार भी करते हैं और अपने आप को कानून का विशेषज्ञ समझने वाले परंतु उपमन्‍यु छाप कुछ अधिवक्‍ता भी। उपमन्‍यु के दरबारी बहुत से नेता भी इसमें शामिल हैं।
उन्‍हें यह तक नहीं पता कि अब यह केस जिस मुकाम पर जा पहुंचा है, वहां सुलह-समझौते का फिलहाल कोई रास्‍ता नहीं बचा। जो संकरा सा और बेहद जटिल रास्‍ता बचा भी है तो उसके लिए आरोपी पत्रकार उपमन्‍यु को पहले कोर्ट में ट्रायल फेस करना होगा। जाहिर है कि इसके लिए पहले या तो उसकी गिरफ्तारी होगी या फिर उसे न्‍यायालय में समर्पण करना होगा।
कुल मिलाकर अब उपमन्‍यु के लिए अपने स्‍तर पर अथवा अपने रैकेट का हिस्‍सा रहे तथाकथित उद्योगपतियों, बिल्‍डरों, पत्रकारों, नेताओं, शिक्षा माफियाओं व सफेदपोशों के स्‍तर से निपटा पाना संभव नहीं रहा।
संभव है तो यह कि वह अब उसी अंदाज में इस केस का सामना करे जिस अंदाज में ''आजतक'' के कैमरे का किया था।
उसके गुर्गे और उसके यहां इकठ्ठी होने वाली सफेदपोश चापलूसों की जमात को भी यह बात अब समझ लेनी चाहिए कि जुडीशियरी की दलाली करके, अधिकारियों के साथ बैठकर चाय-नाश्‍ता करके, पैसे के बल पर समाजसेवी का ठप्‍पा लगाकर तथा अपने पेशेगत कर्म का सौदा करके बेशक वह काफी समय से कानून को चकमा देते आ रहे हैं किंतु अब उनके चेहरों से भी नकाब उतरने का समय शुरू हो चुका है।
2014 की विदाई और 2015 का आगमन उनके अब तक के कारनामों का लेखा-जोखा सामने लाने को तैयार है।
बस देखना यह है कि किसका हिसाब-किताब पहले सामने आता है और किसका नंबर बाद में लगता है।
मंजिल सैनी तो आज या कल इस जनपद से रुखसत होंगी ही, और हर अधिकारी मंजिल सैनी हो नहीं सकता।
निश्‍चित ही अब इस जनपद में आने वाले अधिकारी तथाकथित सभ्रांत और सफेदपोशों की जमात का हिस्‍सा बनने से पहले एक बार सोचने पर मजबूर जरूर होंगे।
वह जरूर जानना चाहेंगे कि कुछ खास लोग एक जगह एकत्र होकर क्‍यों उनके जैसे पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों को चाय-नाश्‍ते के साथ मिठाई सर्व करते हैं और क्‍यों फिर चुपके से उनकी क्‍लिपिंग बनवा लेते हैं।
ऐसी क्‍लिपिंग जो आज सोशल मीडिया का हिस्‍सा बनकर कई अधिकारियों एवं सफेदपोशों के बीच नापाक रिश्‍ते का सच तो सामने ला ही रही है, साथ ही तमाम उसी तरह के सवाल भी खड़े कर रही है जिस तरह के सवाल बलात्‍कार के आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु, एसएसपी मंजिल सैनी सहित उन लोगों को लेकर उठ रहे हैं जिन्‍हें एक गरीब परिवार की पढ़ी-लिखी लड़की का दर्द कतई महसूस नहीं हुआ लेकिन आरोपी का सच सामने आने की चिंता पहले दिन से सताने लगी थी।
बहरहाल, तमाम दबावों के बाद भी कानून काफी हद तक अपना काम कर चुका है और लोगों में इस आशय का संदेश देने में सफल रहा है कि सफेदपोशों की काली जमात का सच भी देर-सबेर सामने जरूर आयेगा।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष  

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

BSNL के GM का घर और दफ्तर सील

नोएडा। 
नोएडा में आज एक बार फिर छापेमारी के बाद हड़कंप मच गया। इस बार छापा भारतीय संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) के महाप्रबंधक (जीएम) के घर और कार्यालय में मारा गया है। यह छापेमारी केंद्रीय अन्‍वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की दो विशेष टीम कर रही हैं।
नोएडा के सेक्टर 19 स्थित बीएसएनएल जीएम के ऑफिस में आज सीबीआई की टीम ने छापा मारा। इस दौरान सीबीआई की करीब पांच लोगों की टीम ने ऑफिस के सभी विभागों के कंप्यूटर स्कैन कर डाटा कॉपी कर लिए।
बीसएसएनएल के सूत्रों के मुताबिक सीबीआई टीम खासतौर पर टेंडर संबंधी फाइलों की जांच-पड़ताल कर रही है। सीबीआई टीम को विभाग के कई कामों में घपलेबाजी की आशंका है।
बीएसएनएल महाप्रंबंधक आदेश कुमार गुप्ता के ऑफिस के साथ ही उनके नोएडा सेक्टर-39 स्थित निवास पर भी छापा मारा गया। वहां सीबीआई की दूसरी टीम पहुंची।
सूत्रों के मुताबिक सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारी ने फोन पर सीबीआई टीम को निर्देश दिए हैं कि फाइलों की जांच-पड़ताल के दौरान आदेश कुमार गुप्ता को घर से बाहर बिठाकर रखा जाए। ताकि वह जांच को प्रभावित न कर सकें।
इस बाबत आदेश कुमार गुप्ता को घर के बाहर बैठाकर पूछताछ की जा रही है। जबकि उनके घर पर किसी भी आने-जाने पर रोक लगा दी गई है। मामले पर जब अमर उजाला ने सीबीआई अफसरों बातचीत करनी चाही, तो उन्होंने इसे फाइलों की जांच-पड़ताल संबंधी छापेमारी बताया।

बुधवार, 17 दिसंबर 2014

किशनी से लेकर कृष्‍ण के धाम तक...

आगरा से प्रकाशित दैनिक जागरण अखबार के सातवें पृष्‍ठ पर बॉटम में एक खबर छपी है। इस सिंगल कॉलम खबर का शीर्षक है- दुष्‍कर्म के बाद मुकद्दमे का इंतजार, थाने में बैठी किशोरी।
खबर के अनुसार विधवा और गूंगी-बहरी अपनी मां के साथ किशनी थाना क्षेत्र के गांव ढकरोई में रह रही एक पंद्रह वर्षीय किशोरी को गांव के ही 45 वर्षीय सरविंद उर्फ पुलंदर बाथम ने तब अपनी हवस का शिकार बना डाला जब वह शौच के लिए खेत पर गई थी।
मंगलवार सुबह 7 बजे की गई इस वारदात का मुकद्दमा लिखाने थाने पहुंची किशोरी के प्रार्थना पत्र पर पुलिस ने जांच के आदेश दे दिये लेकिन मुकद्दमा दर्ज नहीं किया। मुकद्दमा दर्ज होने के इंतजार में पीड़िता देर शाम तक थाने पर ही बैठी थी।
यहां यह जान लेना जरूरी है कि कस्‍बा किशनी, मैनपुरी जिले का हिस्‍सा है और वहां से सांसद हैं सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के पौत्र तेज प्रताप सिंह यादव। वही तेज प्रताप सिंह यादव जिनका रिश्‍ता कल ही राजद मुखिया लालू प्रसाद यादव की पुत्री राजलक्ष्‍मी के साथ तय हुआ है।
समाजवादी कुनबे के सबसे लाड़ले सदस्‍य की कांस्‍टीट्यूएन्‍सी में पुलिस का यह हाल है तो जाहिर है कि सूबे के अन्‍य जनपदों की पुलिस का इससे अलग कुछ होने से रहा।
फिर कृष्‍ण की नगरी मथुरा में तो समाजवादी पार्टी बदहाल है। यहां से न उसका कोई सांसद है और न विधायक। लाख प्रयास के बावजूद मुलायम के नेतृत्‍व वाला समाजवादी कुनबा यहां अपना खाता तक खोल पाने में कभी सफल नहीं हुआ।
समाजवादी पार्टी के लिए ऐसे सूखाग्रस्‍त क्षेत्र में यदि एमबीए की छात्रा से बलात्‍कार की वारदात का मुकद्दमा तीन दिन तक जांच कराने के बाद लिखा गया, तो इसमें कौन सी बड़ी बात हो गई।
ऊपर से यहां तो लड़की जिस व्‍यक्‍ति के खिलाफ बलात्‍कार के आरोप की तहरीर लेकर गई थी, वह तमाम तमगों से विभूषित था।
वह उत्‍तर प्रदेश जर्नलिस्‍ट एसोसिएशन का प्रदेश उपाध्‍यक्ष, ब्रज प्रेस क्‍लब का अध्‍यक्ष, स्‍थानीय छावनी परिषद् का पूर्व उपाध्‍यक्ष होने के साथ-साथ पत्रकार था... वकील था... और पता नहीं क्‍या-क्‍या था। साथ में बसपा की टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ चुका था।
मथुरा की महिला एसएसपी मंजिल सैनी स्‍वयं उसके निजी कार्यक्रम का हिस्‍सा बनने उसके निवास तक पहुंच चुकी थीं।
उसे समाज के तमाम सफेदपोश सभ्रांत उद्योगपति, व्‍यापारी, नेता, बिल्‍डर, ब्‍यूरोक्रेट्स और पत्रकारों से न केवल चरित्र प्रमाण पत्र प्राप्‍त था बल्‍कि वह उसके दरबार की शोभा बढ़ाया करते थे। उसके यहां हर दिन हाजिरी लगाना बहुत से तथाकथित सभ्रांतजनों का शगल था।
कृष्‍ण का धाम जिन नेताओं के कारण समाजवादी पार्टी की पहचान बना हुआ है, वह भी बलात्‍कार के आरोपी की खुलेआम पैरवी कर रहे थे और एसएसपी से मुलाकात करके बता रहे थे कि पत्रकार को साजिश का शिकार बनाया जा रहा है।
दूसरी पार्टियों का भी कोई नेता उसके खिलाफ मुंह खोलने की जुर्रत नहीं कर सकता था क्‍योंकि सब आये दिन उसके लिए राग दरबारी का गायन करते रहे थे। अधिकांश पत्रकार तो हर दिन उसकी चौखट चूमने ऐसे जाया करते थे जैसे द्वारिकाधीश मंदिर की मंगला या शयन आरती करने बहुत से उनके भक्‍त बेनागा जाते हैं।
इन हालातों में मंजिल सैनी यदि बलात्‍कार के आरोपी को लेकर किसी मंजिल तक फिलहाल नहीं पहुंच पाईं हैं, तो उन्‍हें दोष देना भी किसी साजिश का हिस्‍सा लगता है। एफआईआर तो कोई भी किसी के खिलाफ लिखा सकता है।
मंजिल सैनी ने तो उसके बाद बहुत कुछ करवा दिया। कई दिन बाद ही सही लेकिन पीड़िता का मेडीकल कराया, 161 के बयान कराये, उससे पहले खुद उससे सफाई मांगी, उसके अगले दिन कोर्ट में 164  के बयान कराये।
बाकी रह गई गिरफ्तारी...तो वह होती रहेगी। तब तक आरोपी को पीड़िता और उसके परिजनों से जबरन सुलह-सफाई कराने का अवसर देने में क्‍या हर्ज है।
इसके लिए पीड़िता के परिजनों पर एक नहीं, दो-दो मुकद्दमे कायम किये गये। सुलह-सफाई के लिए वो उपलब्‍ध रहें इसलिए गिरफ्तारी उनकी भी नहीं की गई।
एसएसपी महोदया भी आखिर हैं तो सामाजिक प्राणी, वह भी समाज का हिस्‍सा हैं और इसीलिए मानती हैं कि जो काम समाज के तथाकथित ही सही पर सभ्रांत तत्‍वों द्वारा समझौता करके संपन्‍न करा लिया जाता है, वह कानून नहीं कर पाता।
समझौते के लिए समय की दरकार होती है, इसलिए समय अफरात में दिया जा रहा है। यूं भी उनके पास समय की कमी होती तो वह निजी कार्यक्रमों का हिस्‍सा बनने नहीं जातीं।
रहा सवाल ''आजतक'' जैसे राष्‍ट्रीय चैनल का... तो उसने अपने कार्यक्रम ''वारदात'' में 'कानून का रेप' जैसे शीर्षक वाली सनसनीखेज रिपोर्टिंग करके क्‍या कर लिया। एसएसपी महोदया को न गिरफ्तारी करनी थी, न की।
करें भी क्‍यों...जब किशनी से लेकर कृष्‍ण के धाम तक समाजवादी पुलिस का रवैया आम आरोपियों के लिए एक समान है तो खास आरोपियों के साथ खास व्‍यवहार करना कैसे गुनाह हो सकता है।
मथुरा में बलात्‍कार की शिकार लड़की के 3 तारीख के प्रार्थना पत्र पर 6 तारीख को मुकद्दमा दर्ज करा दिया, 11 तारीख को 161 के बयान तथा मेडीकल करवा दिया, 12 तारीख को 164 के बयान कराकर अपना कर्तव्‍य पूरा कर दिया। उसी दिन पीड़िता के बयानों की कोर्ट से नकल लेने के लिए एप्‍लीकेशन डाल दी। 15 तारीख को नकल हासिल कर ली।
इतना कुछ कर डाला सिवाय एक गिरफ्तारी के, तो इसमें इतनी हायतौबा मचाने वाली क्‍या बात है।
जब लड़की करीब डेढ़ साल तक यौन उत्‍पीड़न सहने के बाद एफआईआर करा सकती है तो पुलिस उसकी जांच के लिए साल-छ: महीने का समय नहीं ले सकती। इसमें गलत क्‍या है।
और फिर बिना जांच के ऐसे कैसे किसी सभ्रांत पत्रकार को गिरफ्तार किया जा सकता है। जांच होती किसलिए है। जांच में कोई आंच आरोपी पर नहीं आई तो पुलिस किसे मुंह दिखायेगी।
तभी तो कृष्‍ण का धाम हो या तेजू भैया की किशनी...बिना जांच के रेप जैसे संगीन आरोप की एफआईआर दर्ज नहीं की जाती।
एक जांच एफआईआर से पहले और एक जांच एफआईआर के बाद...यही है सच्‍चा समाजवाद और इसी को कहते हैं समाजवादी सरकार का इकबाल।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

उपमन्‍यु तो मुखौटा, असली चेहरे सामने आना बाकी

मथुरा। 
किसी भी मामले का पूरा सच सामने लाने के लिए उस पर चढ़े मुखौटे का हटना जरूरी होता है। मुखौटे हमेशा सच्‍चाई को छुपाने में बड़ी भूमिका अदा करते हैं। मुखौटों को मोहरा बनाकर खेल खेलने वाले जानते हैं कि यदि एक बार सच्‍चाई सामने आ गई तो वो कहीं के नहीं रहेंगे इसलिए वो मुखौटों को बेनकाब होने से बचाने की कोशिश में अपना सब-कुछ दांव पर लगा देते हैं।
कमलकांत उपमन्‍यु पर बलात्‍कार के आरोप की पुष्‍टि एक लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद संभव है, और इस प्रक्रिया का हिस्‍सा चाहे-अनचाहे पीड़िता को भी बनना होगा। जाहिर है कि इस प्रक्रिया के पूरे होने में समय भी अच्‍छा-खासा जाया होगा किंतु इस बीच एक  बात जरूर खुलकर सामने आ गई कि कमलकांत उपमन्‍यु सिर्फ एक मुखौटा है और उसके पीछे एक-दो नहीं, तमाम चेहरे छिपे हैं। वो चेहरे जिनका सच यदि सामने आ गया तो कमलकांत उपमन्‍यु के अनेक संस्‍करण सामने खड़े दिखाई देंगे।
यही कारण है कि अब ये चेहरे कमलकांत उपमन्‍यु को बचाने के लिए ऐड़ी से चोटी तक का जोर लगा रहे हैं, बिना यह सोचे-समझे कि जिस समाज का वह हिस्‍सा हैं वही समाज उन पर थूक रहा है।
इनमें से कोई बिना उद्योग के उद्योगपति का तमगा प्राप्‍त है तो कोई लगभग अंगूठा टेक होते हुए शिक्षाविद् है, कोई पत्रकारिता की आड़ में मीडिया माफिया है तो कोई राजनीति के चोले में प्रतिष्‍ठा प्राप्‍त गुण्‍डा है। जो सब-कुछ होते हुए कुछ नहीं हैं लिहाजा समाजसेवी का तमगा लगाकर चलते हैं, वो भी इसमें शामिल हैं। पुलिस तथा प्रशासनिक अधिकारी हैं, बिल्‍डर हैं, सत्‍ता के दलाल हैं, भूमाफिया हैं, धर्म की दुकान चलाने वाले तथाकथित साधु-संतों से लेकर कथावाचक तक हैं, और जुडीशियरी को अपनी जेब में रखकर चलने का दावा करने वाले सफेदपोश लाइजनर भी हैं। बहुत लंबी लिस्‍ट है ऐसे लोगों की। यह लिस्‍ट कितनी लंबी हो सकती है, इसका अंदाज उन फोटोग्राफ्स को देखकर लगाया जा सकता है जिन्‍हें कमलकांत उपमन्‍यु ने अपने कार्यालय और सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक व गूगल प्‍लस की वॉल पर सजा रखा है।
नि:संदेह इनमें से कई चेहरे ऐसे भी हैं जिन्‍हें कमलकांत उपमन्‍यु ने अपने साथ खड़ा करके फोटो खिंचवाने पर बाध्‍य कर दिया और कई चेहरे ऐसे भी हैं जिनके लिए उसके साथ फोटो खिंचवाना मजबूरी था परंतु अधिकांश चेहरे उस कॉकस का हिस्‍सा हैं जिसका खुद कमलकांत एक मुखौटा था, या यूं कहें कि एक इकाई भर है।
कमलकांत उपमन्‍यु तो अपनी ही उस हवस का शिकार बन गया जिसे उसने महत्‍वाकांक्षाओं को पूरा करने का माध्‍यम बनाया था। अन्‍यथा वह अकेला नहीं है, एक पूरा रैकेट है जो बहुत लंबे समय से अपने काम को बखूबी अंजाम दे रहा है।
बेशक इस रैकेट के अपने तर्क हैं और इसमें शामिल तत्‍व यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि कमलकांत उपमन्‍यु को साजिश का शिकार बनाया जा रहा है किंतु ऐसे बेहिसाब तर्क हर उस शख्‍स के पास होते हैं जो कानून के शिकंजे में फंस जाता है।
आसाराम बापू हो या कथित संत रामपाल, नित्‍यानंद हो या पत्रकार तरुण तेजपाल...सबके पास अपने पक्ष में कहने को काफी कुछ होता है। यहां तक कि आतंकवादी और नक्‍सली भी अपने पक्ष में अनगिनित तर्क गढ़ लेते हैं और खुद को जायज ठहराने का पूरा प्रयास करते हैं परंतु सच्‍चाई को छिपा पाना संभव नहीं होता।
साम, दाम, दण्‍ड तथा भेद से अपने कर्मों पर पर्दा डालने की कोशिश अंत तक हर आरोपी करता है और यही उपमन्‍यु के मामले में भी किया जा रहा है।
वर्षों से एकत्र ताकत के बल पर यह कोशिश कितने दिन और जारी रहती है, इसका पता तो बाद में ही लगेगा किंतु नजीता बदल पाना अब संभव शायद ही हो क्‍योंकि कानूनी प्रक्रिया एक ठोस मुकाम हासिल कर चुकी है।
ये बात दीगर है कि दुराचार के मामले में 164 के बयान दो दिन पहले ही पूरे हो जाने के बाद आज उनकी नकल आईओ को लेनी थी लेकिन समाचार लिखे जाने तक आईओ नकल लेने कोर्ट नहीं पहुंची जबकि इस बावत प्रार्थना पत्र उसने शुक्रवार के दिन ही लगा दिया था।
पीड़िता के अधिवक्‍ता प्रदीप राजपूत ने बताया कि जब आईओ रीना से ऐसा किये जाने की वजह जानना चाही तो उसने यह कहकर फोन काट दिया कि मैं कुछ कहने अथवा बताने की स्‍थिति में नहीं हूं।
प्रदीप राजपूत ने कहा कि पुलिस का यह व्‍यवहार अप्रत्‍याशित है और वह इसके खिलाफ कोर्ट में अलग से आज शाम को ही प्रार्थना पत्र देंगे ताकि कोर्ट अपने स्‍तर से कार्यवाही आगे बढ़ा सके।
पूरे घटनाक्रम पर प्रदीप राजपूत का भी यही कहना है कि यदि इस मामले की जांच किसी निष्‍पक्ष एजेंसी से कराई जाए तो ऐसे-ऐसे चेहरे बेनकाब होंगे जिन्‍हें अब तक समाज में प्रतिष्‍ठा प्राप्‍त है और जो सभ्रांत होने का लबादा ओढ़े घूम रहे हैं। जो शेर की खाल में भेड़िये तो हैं ही, साथ ही एक कमलकांत उपमन्‍यु के फंसने पर अनेक कमलकांत उपमन्‍यु पैदा करने का माद्दा रखते हैं क्‍योंकि उन्‍हें अपने धंधे को सुचारू रुप से चलाने के लिए किसी न किसी कमलकांत उपमन्‍यु की दरकार हमेशा रहती है।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष
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