लखनऊ। उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सरकार द्वारा शुरू की गई ‘समाजवादी पेंशन योजना’ के तहत करीब 11 अरब रुपए के घपले का पता लगा है।अब तक प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रदेश भर में ऐसे 4.50 लाख अपात्रों की पहचान की गई है जिन्हें ये पेंशन दी जा रही थी। इसके अलावा पेंशन धारकों में मृतकों के नाम शामिल होने का भी खुलासा हुआ है।गौरतलब है कि समाजवादी पेंशन योजना के लाभार्थियों को तिमाही किस्त के तौर पर 1500 रुपये उनके बैंक अकाउंट में भेजे जाते हैं।‘समाजवादी पेंशन योजना’ साल 2014-15 में अखिलेश यादव के नेतृत्व वाली तत्कालीन समाजवादी पार्टी सरकार द्वारा शुरू की गई थी। यह अखिलेश सरकार की महत्वाकांक्षी योजना थी।हालांकि इन अपात्र लाभार्थियों से अब पैसे की रिकवरी होगी या फिर इनके खिलाफ अन्य कोई कार्यवाही अमल में लाई जाएगी, इसका फिलहाल पता नहीं लग पाया है किंतु इतना तय है कि जल्द ही मृत व्यक्तियों और अपात्रों को योजना का लाभ पहुंचाने वाले अफसरों के खिलाफ कार्यवाही की तैयारी हो चुकी है।गड़बड़ी सामने आते ही ‘समाजवादी पेंशन योजना’ पर रोक लगाने के बाद अपात्रों की पहचान करने के निर्देश दिए थे।एक महीने की जगह 20 महीने में तैयार हुई रिपोर्टसमाजवादी पेंशन योजना में धांधली की शिकायत मिलने के बाद प्रमुख सचिव समाज कल्याण ने मई 2017 में जांच कर एक महीने में रिपोर्ट तलब की थी, लेकिन यह रिपोर्ट अब जाकर तैयार हुई है। अब ऐसे अधिकारियों की भी सूची तैयार हो रही है, जिनके जिलों में सबसे ज्यादा अपात्र पाए गए हैं।दरअसल, ‘समाजवादी पेंशन योजना’ शुरू करने का उद्देश्य गरीबी की रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के बीच बचत को प्रोत्साहित करना और उन्हें वित्तीय सहायता प्रदान करना बताया गया था।ये थे मापदंड समाजवादी पेंशन योजना के तहत आवदेन के लिए उक्त मापदंड निर्धारित किए गए थे:1-गरीबी रेखा से नीचे रहने वाला कोई भी परिवार इस योजना के लिए पात्र हो सकता था।2- ऐसे परिवार का उत्तर प्रदेश निवासी होना जरूरी था।3- उत्तर प्रदेश में निवास संबंधी एक वैध सबूत की आवश्यकता थी।मुख्य लाभार्थी का या तो भारतीय स्टेट बैंक या किसी अन्य राष्ट्रीयकृत बैंकों में एक खाता आवश्यक था।पात्रों की पेंशन पर ग्रहण नहींनिदेशक समाज कल्याण जगदीश प्रसाद के अनुसार समाजवादी पेंशन योजना की जगह कोई नई पेंशन योजना लागू की जा सकती है। उल्लेखनीय है कि समाजवादी पेंशन योजना के तहत प्रदेश के 75 जिलों में 54 लाख लाभार्थियों को लाभ पहुंचाया जा रहा था। अपात्रों के चयन की शिकायत मिलने के बाद शासन स्तर से जांच करवाई गई। इसमें साढ़े 4 लाख से अधिक ऐसे अपात्र व्यक्तियों की पहचान हुई, जिन्हें सरकारी नियमों को ताक पर रखकर योजना का लाभ दिया जा रहा था।अब जाकर राज्य सरकार तथा प्रमुख सचिव को इस घपले की पूरी रिपोर्ट सौंपी गई है। बताया जाता है कि शासन से निर्देश मिलने पर आगे की कार्यवाही होगी।विभाग के अधिकारियों का कहना है कि इस योजना के पात्र लाभार्थियों को किसी अन्य योजना से जोड़ने के लिए ग्राम्य विकास विभाग द्वारा सर्वे कराया गया है ताकि 60 साल से कम उम्र वाले व्यक्तियों को पेंशन योजना से लाभान्वित किया जा सके।समाज कल्याण विभाग के मंत्री रमापति शास्त्री ने कहा कि 4.50 लाख अपात्र सरकार के 10.80 अरब रुपये हड़प गए। योजना के नाम पर हुई गड़बड़ी की रिपोर्ट मिल गई है। जल्द ही मुख्यमंत्री के साथ बैठक कर कोई अहम फैसला लिया जाएगा। पात्र लाभार्थियों के लिए सरकार जल्द ही नई स्कीम लाने की तैयारी में है। मृत व्यक्तियों को योजना का पात्र दिखाकर सरकारी धन का दुरुपयोग करने वाले अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्यवाही होगी।-Legend News
पांच राज्यों के इन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने भाजपा की झोली से तीन राज्य एक साथ झटक लिए। इन तीन में से दो राज्य तो ऐसे थे जहां भाजपा पिछले 15 सालों तक लगातार सत्ता में रही। राजस्थान जरूर अकेला ऐसा राज्य है जहां हर चुनाव के बाद सत्ता बदल देने की रिवायत चली आ रही है, लिहाजा इन चुनावों में भी वहां यही हुआ। तेलंगाना और मिजोरम के नतीजों में ऐसा कुछ अप्रत्याशित नहीं है, जिसकी चर्चा जरूरी हो।मिजोरम में कांग्रेस का गढ़ ढहा जरूर किंतु राजस्थान, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ जैसे महत्वपूर्ण राज्यों की जीत ने उसकी चर्चा को निरर्थक बना दिया।किसकी जय, किसकी विजय हर चुनाव के बाद कुछ बातें प्रमुखता से दोहराई जाती हैं। जैसे कि यह लोकतंत्र की जीत है…जनता की जीत है।किंतु क्या वाकई कभी किसी चुनाव में आज तक जनता जीत पाई है, क्या लोकतंत्र सही मायनों में विजयी हुआ है ?15 अगस्त 1947 की रात के बाद से लेकर आज तक क्या वाकई कभी जनता ने कोई अपना प्रतिनिधि चुना है। देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू से लेकर वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र दामोदर दास मोदी तक के चुनाव में क्या जनता की कोई प्रत्यक्ष भूमिका रही है।प्रधानमंत्री तो दूर, क्या जनता कभी किसी सूबे के मुख्यमंत्री का चुनाव अपनी पसंद से कर पाई है।कहने को कह सकते हैं कि प्रधानमंत्री का चयन संसदीय दल और मुख्यमंत्री का चयन विधायक दल की सर्वसम्मति से होता है किंतु यह कितना सच है इससे शायद ही कोई अनभिज्ञ हो।चुनाव से पहले या चुनाव के बाद, नेता का चुनाव पार्टी आलाकमान ही तय करते आए हैं। जन प्रतिनिधि तो मात्र अंगूठा निशानी हैं। यानी आपके द्वारा चुना गया प्रतिनिधि तत्काल प्रभाव से गुलामों की उस फेहरिस्त का हिस्सा बन जाता है, जिसका काम मात्र हाथ उठाकर हाजिरी लगाने का होता है न कि मत व्यक्त करने का।गुलामी की परंपरा ऐसा इसलिए कि फिरंगियों की दासता से मुक्ति मिलने के बावजूद हम आज तक गुलामी की परंपरा से मुक्त नहीं हो पाए। शरीर से भले ही हमें मुक्ति मिल गई हो परंतु मानसिक दासता हमारी रग-रग का हिस्सा है।लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व मतदान भी हर स्तर पर गुलामी की छाया में संपन्न होता रहा है और हम उसी दास परंपरा का जश्न मनाते आ रहे हैं।कोई कांग्रेस का गुलाम है तो कोई भाजपा का, कोई सपा का पिठ्ठू है तो कोई बसपा का। किसी ने जाने-अनजाने राष्ट्रीय लोकदल की दासता स्वीकार कर रखी है तो किसी ने अपना मन-मस्तिष्क एक खास नेता के लिए गिरवी रख दिया है।देखा जाए तो सवा सौ करोड़ की आबादी किसी न किसी रूप में, किसी न किसी नेता या दल की जड़ खरीद गुलाम बनकर रह गई है। उसकी सोचने-समझने की शक्ति इतनी क्षीण हो चुकी है कि वह अब इस दासता से मुक्ति का मार्ग तक तलाशना भूल गई है।क्या याद आता है पिछले 70 वर्षों में हुआ ऐसा कोई चुनाव जिस पर दलगत राजनीति हावी न रही हो या जिसने सही अर्थों में जनता को अपना नेता चुनने का अधिकार दिया हो।देश का सबसे पहला जुमला था वो, जब कहा गया था कि लोकतंत्र में जनता द्वारा जनता के लिए जनता की सरकार का चुनाव किया जाता है।हकीकत यह है कि स्वतंत्र भारत में हमेशा गुलामों द्वारा गुलामों के लिए गुलामों की सरकार चुनी गई है। देश या प्रदेश, हर जगह यही होता आया है।हो भी क्यों न, जब हमारी अपनी कोई सोच ही नहीं है। हमारी प्रतिबद्धता किसी न किसी पार्टी या व्यक्ति के लिए है, राष्ट्र के लिए नहीं।राष्ट्र के लिए प्रतिबद्धता दलगत राजनीति की मोहताज नहीं होती और इस देश की जनता दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सोचना ही नहीं चाहती।यूं भी कहा जाता है कि भीड़ का कोई दिमाग नहीं होता, इसलिए भीड़चाल और भेड़चाल में कोई फर्क नहीं होता। दोनों उसी राह को पकड़ लेती हैं जो उन्हें दिखा दी जाती है।वर्तमान भारत भीड़तंत्र से संचालित है, लोकतंत्र से नहीं और इसीलिए न लोक बचा है और न तंत्र।चुनाव इस भीड़तंत्र को बनाए रखने की वो रस्म अदायगी है जिसके जरिए राजनीतिक दल अपने-अपने गुलामों की गणना करते रहते हैं।अगर यह सच न होता तो स्वतंत्र भारत साल-दर-साल तरक्की की सीढ़ियां चढ़ रहा होता और आज उस मुकाम पर जा पहुंचता जहां दुनिया के तमाम दूसरे मुल्क हमसे सीख लेते दिखाई पड़ते।क्या कुछ बदल पाएगा जिन तीन राज्यों की जीत पर कांग्रेस आज फूली नहीं समा रही और भाजपा अपनी हार की समीक्षा कर रही है, उन राज्यों में क्या अब ऐसा कुछ होने जा रहा है जो आमूल-चूल परिवर्तन का वाहक बनेगा।क्या पंद्रह-पंद्रह वर्षों के शासनकाल में भाजपा अपने शासित राज्यों से गरीबी, भुखमरी, भय, भ्रष्टाचार, अनाचार, व्यभिचार, बेरोजगारी जैसी समस्याएं समाप्त कर पाई।क्या कांग्रेस ने अपने पूर्ववर्ती कार्यकाल में इन समस्याओं का समाधान कर दिया था और भाजपा ने आते ही इन्हें पुनर्जीवित कर डाला।क्या देश पर कांग्रेस के लंबे शासनकाल में आम जनता की सुनवाई होती थी, और क्या आज भी आम जनता की सुनवाई बेरोकटोक होती है।ये ऐसे यक्ष प्रश्न हैं जिनका उत्तर या तो किसी के पास है ही नहीं या कोई देना नहीं चाहता क्योंकि उत्तर के नाम पर आंकड़े हैं तथा आंकड़ों की भाषा सिर्फ और सिर्फ आंकड़ों के बाजीगरों को ही समझ में आती है। संभवत: इसीलिए किसी भी समस्या का आज तक मुकम्मल समाधान नहीं हो पाया।धरातल पर देखने जाएं तो पता लगता है कि नौकरशाहों की मानसिकता में आज तक कोई बदलाव नहीं आया। वो परतंत्र भारत में भी खुद को शासक समझते थे और आज भी शासक ही बने हुए हैं। कहने को वो जनसेवक हैं किंतु जनता से उन्हें बदबू आती है। विशिष्टता उनके खून में इस कदर रच-बस चुकी है कि शिष्टता कहीं रह ही नहीं गई।जिस तरह सड़क पर रेंगने वाला गया-गुजरा व्यक्ति भी नेता बनते ही अतिविशिष्ट की श्रेणी को प्राप्त कर लेता है उसी प्रकार जनसामान्य के बीच से नौकरशाही पाने वाला भी स्वयं को जनसामान्य का भाग्यविधाता समझ बैठता है।यही कारण है कि सत्ताएं भले ही बदल जाएं लेकिन बदलाव किसी स्तर पर नहीं होता। न पुलिसिया कार्यशैली बदलती है और न प्रशासनिक ढर्रे में कोई बदलाव आता है।सत्ता के साथ अधिकारियों के चेहरे बेशक बदलते हैं परंतु उनके चाल- चरित्र और आचार-व्यवहार जस के तस रहते हैं। जनता के पास यदि दलगत राजनीति का कोई विकल्प नहीं है तो सत्ताधीशों के पास भी नौकरशाही का फिलहाल कोई विकल्प नहीं है।दिखाई चाहे यह देता है कि देश की दशा और दिशा नेता तय करते हैं किंतु कड़वा सच यह है कि देश की नियति नौकरशाह निर्धारित करते हैं। हर सरकार की नीति और नीयत का निर्धारण नौकरशाही के क्रिया-कलापों पर निर्भर करता है। नौकरशाही उसे जिस रूप में पेश कर दे, उसी रूप में उसका प्रतिफल सामने आता है। नौकरशाही में विकल्प हीनता और निरंकुशता का ही परिणाम है कि केंद्र से लेकर तमाम राज्यों की सरकारों को एक ओर जहां अदालतों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं वहीं दूसरी ओर जनता का विश्वास जीतने में परेशानी हो रही है।समाधान क्या इन हालातों में एक अहम सवाल यह खड़ा होना स्वाभाविक है कि क्या 70 सालों से रटे-रटाए ढर्रे पर चल रही इस व्यवस्था को बदलने का कोई रास्ता है भी और क्या ऐसा कोई समाधान मिल सकता है जिसके माध्यम से हम लोकतांत्रिक व्यवस्था के उच्च मानदण्ड स्थापित कर सकें तथा सही मायनों में जनता द्वारा जनता के लिए जनता की सरकार चुनने का मार्ग प्रशस्त कर पाएं।इसका एकमात्र उपाय है “राइट टू रिकाल”। जिस दिन जनता को यह अधिकार प्राप्त हो गया, उस दिन निश्चित ही एक ऐसे बड़े परिवर्तन की राह खुल जाएगी जिससे देश और देशवासियों का भाग्योदय संभव है।सामान्य तौर पर यह मात्र एक अधिकार प्रतीत होता है परंतु यही वो सबसे बड़ा जरिया है जिससे नेताओं की देश व देशवासियों के प्रति जिम्मेदारी तय की जा सकती है। जिससे जनता पांच साल बाद खुद को ठगा हुआ महसूस करने से निजात पा सकती है और नेताओं को जब चाहे उनकी औकात बता सकती है। हालांकि यह अकेला उपाय काफी नहीं है।इसके साथ कुछ ऐसे और उपाय भी करने होंगे जिनसे राजनीति शत-प्रतिशत लाभ का व्यवसाय न बनी रहे और राजनेताओं की जवाबदेही भी निर्धारित हो।उदाहरण के लिए उनके वेतन-भत्तों की वर्तमान व्यवस्था, सुख-सुविधा और सुरक्षा के मानक, चारों ओर फैलने वाली व्यावसायिक गतिविधियां तथा उनके साथ-साथ उनके परिजनों की भी आमदनी के विभिन्न ज्ञात एवं अज्ञात स्त्रोतों का आकलन।कुछ ऐसी ही व्यवस्था नौकरशाहों के लिए भी लागू हो जिससे वो अपने-अपने राजनीतिक आकाओं की शह पर मनमानी न कर सकें और नेताओं की बजाय जनता के प्रति लॉयल्टी साबित करें।यदि ऐसा होता है तो अब तक एक-दूसरे की पूरक बनी हुई विधायिका व कार्यपालिका का गठजोड़ टूटेगा और इन्हें जनता के प्रति अपनी जिम्मेदारी का अहसास होगा।और यदि ऐसा कुछ नहीं होता तथा जर्जर हो चुकी व्यवस्थाओं का यही प्रारूप कायम रहता है तो निश्चित जानिए कि सरकारें बदलने का सिलसिला तो जारी रहेगा परंतु देश कभी नहीं बदल सकेगा।शारीरिक तौर पर स्वतंत्रता दुनिया को दिखाई देती रहेगी किंतु मानसिक स्वतंत्रता कभी हासिल नहीं हो पाएगी।हजारों साल से चला आ रहा गुलामी का सिलसिला यदि तोड़ना है तो आमजन को उस मानसिक गुलामी से मुक्ति पानी होगी जिसके तहत वह कठपुतली की तरह नेताओं की डोर से बंधा है। दलगत राजनीति के हाथ का खिलौना बना अपने ही द्वारा संसद अथवा विधानसभा में पहुंचाए गए लोगों को माई-बाप समझता है। उनके एक इशारे पर जान देने और जान लेने के लिए आमादा रहता है।मतपत्र पर ठप्पा लगाने की व्यवस्था गुजरे जमाने की बात हो चुकी हो तो क्या, मशीन का बटन भी अपने-अपने नेता और अपने-अपने दल के कहने पर लगाता है। वो भी बिना यह सोचे-समझे कि उस दल का प्रत्याशी संसद या विधानसभा में बैठने की योग्यता रखता है या नहीं। उसका सामान्य ज्ञान, जनसामान्य जितना है भी या नहीं।बरगलाने के लिए कहा जाता है कि देश ने बहुत तरक्की की है और हर युग में की है परंतु सच्चाई यह नहीं है। सच्चाई यह है कि सवा सौ करोड़ की आबादी वाला मुल्क आजतक पाकिस्तान जैसे पिद्दीभर देश से निपटने की पर्याप्त ताकत नहीं रखता। आतंकवादियों को सही अर्थों में मुंहतोड़ जवाब नहीं दे पाता और सेना की आधी से अधिक ताकत को अपने ही घर की सुरक्षा करने में जाया कर रहा है।आंखें खोलकर देखेंगे तो साफ-साफ पता लगेगा कि इन सारी समस्याओं की जड़ में वही रटी-रटाई व्यवस्थाएं हैं जिन्हें बड़े गर्व के साथ हम लोकतंत्र के स्तंभ कहते हैं।हर व्यवस्था को समय और परिस्थितियों के अनुरूप तब्दीली की दरकार होती है। भारत की वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था बड़ी शिद्दत के साथ बदलाव का इंतजार कर रही है। एक ऐसी व्यवस्था जिससे सही अर्थों में लोकतंत्र गौरवान्वित हो और गौरवान्वित हों वो लोग जिनके लिए यह व्यवस्था कायम की गई थी।ऐसी किसी व्यवस्था के लिए सबसे पहले देश व देशवासियों को अंग्रेजों से मिली शारीरिक स्वतंत्रता का लबादा अपने शरीर से उतार फेंकना होगा और मानसिक स्वतंत्रता अपनानी होगी ताकि हम अपने लिए न सिर्फ सही प्रतिनिधि बल्कि सही नेतृत्व भी चुन सकें।-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण की पुरजोर मांग के बीच इस आशय का प्रचार भी किया जा रहा है कि देश का मुसलमान आशंकित है, वह भयभीत है और इसके लिए हिंदुओं की कथित उन्मादी सोच जिम्मेदार है।अब सवाल यह उठता है कि मुसलमानों के आशंकित या भयभीत होने का प्रचार कर कौन रहा है ? यह प्रचार मुसलमानों के ही नुमाइंदे बनकर टीवी की नियमित बहसों में भाग लेने वाले वो लोग कर रहे हैं जो न सिर्फ प्रधानमंत्री तक के लिए खुलेआम अपशब्दों का इस्तेमाल करते हैं बल्कि बाबर को अपना पूर्वज बताते हुए बहुसंख्यकों को मंदिर बना लेने की चुनौती एक चेतावनी के रूप में देते हैं।‘आज तक’ की एक ऐसी ही डिबेट में मशहूर टीवी एंकर रोहित सरदाना को मुसलमानों के नुमाइंदे और सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद पराचा से कहना पड़ा कि अधिकांश मुसलमान तो कहते हैं हमें बहुसंख्यकों से नहीं, उन मीडिया पैनेलिस्ट मुसलमानों से डर लगता है जो अपनी-अपनी दुकान चलाने के लिए राष्ट्रीय टीवी चैनल्स पर बैठकर वैमनस्यता फैलाने का काम करते हैं।कौन था बाबरबाबर के बारे में इतिहास जितनी जानकारी देता है उसके मुताबिक वह मध्य एशिया के समरकंद राज्य की एक बहुत छोटी सी जागीर फरगना में पैदा हुआ। 14 फरवरी 1483 ई. को जन्मे बाबर का ताल्लुक सीधे तौर पर तैमूर से था।बाबर का पिता उमर शेख मिर्जा तैमूर का वंशज था जबकि उसकी मां मंगोल चंगेज़ ख़ां के वंशज ख़ान यूनस की पुत्री थी। यूं देखा जाए तो बाबर की नसों में तुर्कों के साथ मंगोलों का भी रक्त था किंतु उसने काबुल पर अधिकार कर स्वयं को मुग़ल घोषित कर दिया। और इस तरह वह भारत में एक मुगल शासक बतौर प्रचलित रहा।बाबर को बाप से विरासत में मिली थी शराब की लत बाबर के पिता उमर शेख को शराब पीने का बड़ा शौक था। अक्सर वह बाबर को भी इसको चखने का न्यौता देता था। साथ ही उसे कबूतर पालने का भी बड़ा चाव था। माना जाता है कि कबूतरों को दाना देते हुए एक हौज में गिर जाने से उसकी मृत्यु हुई थी। पिता की मृत्यु के समय बाबर की आयु केवल बारह वर्ष की थी। शराब की लत और तैमूरवंश उसे अपने पिता से विरासत में मिले किंतु वह खुद को कभी तैमूरवंशी कहलाना पसंद नहीं करता था।क्या कहती है बाबर की आत्मकथाबाबर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक ए बाबरी’ में लिखा कि उसका पहला शिक्षक शेख मजीद बेग एक बड़ा अय्याश था इसलिए बहुत गुलाम रखता था। उसने अपने दूसरे शिक्षक कुलीबेग के बारे में लिखा कि वह न नमाज पढ़ता था और न रोजा रखता था, वह बहुत कठोर भी था। तीसरे शिक्षक पीर अली दोस्तगोई के बारे में उसने लिखा कि वह बेहद हंसोड़- ठिठोलिया और बदकारी में माहिर था।अय्याश था बाबर “बाबर बताता है कि वह अपने शिक्षकों की करतूतों को बिल्कुल पसंद नहीं करता था परन्तु असल में उसने उनके कई सारे अवगुणों को अपना लिया था। बाबर ने अपनी आत्मकथा में यहां तक लिखा है कि वह समलैंगिक था और जब महज 16-17 साल का था, तब उसको बाबुरी नामक एक किशोर के साथ प्रेम हो गया था।बाबुरी के प्रति आसक्त बाबर ने आशिकी पर शेर भी लिखे थे। बाबर ने बाबुरी का जिक्र करते हुए बाबर ने बाबरनामा में लिखा है कि एक बार आगरा की गली में हमने उसे देखा परंतु हम उससे आंखें नहीं मिला पाये क्योंकि तब हम बादशाह बन चुके थे।बाबर के यह किस्से साबित करते हैं कि वह कितना अय्याश किस्म का व्यक्ति था।छल-कपट का आदी रहा बाबरबाबर ने अपने जीवन में छल और कपट का भरपूर इस्तेमाल किया। उसने समरकंद को जीतने का प्रयास तीन बार किया पर वह कामयाब नहीं हो सका। जल्दी ही उसने कपट तथा चतुराई से 1504 में काबुल पर कब्जा कर लिया।भारत पर नजर काबुल पर काबिज होने के बाद बाबर ने भारत की ओर ध्यान दिया, जो उसके जीवन की बड़े लंबे समय से लालसा थी। बाबर के भारत आक्रमण का मूल कारण भारत की राजनीतिक परिस्थितियों से भी अधिक स्वयं उसकी दयनीय तथा असहाय अवस्था थी। वह काबुल के उत्तर अथवा पश्चिम में संघर्ष करने की अवस्था में नहीं रहा था और इसलिए भारत की धन संपत्ति लूटना चाहता था। इसके लिए उसने अपने पूर्वजों महमूद गजनवी तथा मोहम्मद गौरी का हवाला देकर भारत को तैमूरिया वंश का क्षेत्र बताया था।3000 से भी अधिक निर्दोषों को माराबाबर की कट्टरता और क्रूरता को इसी से समझा जा सकता है कि उसने अपने पहले आक्रमण में ही बाजौर के सीधे-सादे 3000 से भी अधिक निर्दोष लोगों की हत्या कर दी थी। वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि बाजौर वाले विद्रोही स्वभाव के थे। यहां तक कहा जाता है कि उसने इस युद्ध के दौरान एक पुश्ते पर आदमियों के सिरों को काटकर उसका स्तंभ बनवा दिया था। ऐसे ही नृशंस अत्याचार उसने ‘भेरा’ पर आक्रमण करके भी किये।गुरुनानक ने देखे थे बाबर के अत्याचारबाबर द्वारा किए गए तीसरे-चौथे व पांचवें आक्रमण जो सैयदपुर व लाहौर तथा पानीपत से जुड़े हैं, को गुरुनानक ने अपनी आंखों से देखा था। बाबर के इन वीभत्स अत्याचारों को गुरुनानक ने पाप की बारात और बाबर को यमराज की संज्ञा दी थी। इन आक्रमणों के वक्त बाबर ने किसी के बारे में नहीं सोचा। उसने रास्ते में मिले बूढ़े, बच्चे और औरतें का बड़ी बेरहमी से कत्ल किया। वह किसी भी कीमत पर भारत की धन-संपदा को लूटकर अपने साथ ले जाना चाहता था।रामजन्म भूमि विवाद का जनकबाबर ने मुसलमानों की हमदर्दी पाने के लिए हिन्दुओं का नरसंहार करने के साथ-साथ अनेक मंदिरों को नष्ट किया। इसी कड़ी में बाबर की आज्ञा से मीर बाकी ने अयोध्या स्थित राम जन्मभूमि पर निर्मित प्रसिद्ध मंदिर को नष्ट कर मस्जिद बनवाई थी। यही नहीं, ग्वालियर के निकट उरवा में अनेक जैन मंदिरों को भी बाबर ने नष्ट कराया था।यह कहना गलत नहीं होगा कि क्रूर बाबर का भारत पर आक्रमण हर तरह से महमूद गजनवी या मोहम्मद गौरी जैसा ही था और उन्हीं की तरह उसने अपने हितों के खातिर हिन्दुओं का कत्लेआम व उनकी आस्था को नष्ट-भ्रष्ट करने का काम किया।कुल मिलाकर निष्कर्ष यही निकलता है कि बाबर एक विदेशी आक्रांता था और उसका एकमात्र मकसद भारत के वैभव को समाप्त करना तथा उसकी धन-संपदा को लूटकर ले जाना रहा।वर्तमान हालातों का जिम्मेदार कौन ?ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि राम मंदिर निर्माण के लिए आज जो स्थिति-परिस्थिति बनी है, उसका जिम्मेदार वाकई कौन है ?नि: संदेह राम मंदिर का मुद्दा राजनीति से प्रेरित रहा है किंतु राम को राजनीति के केंद्र में लाने का काम उन कठमुल्लाओं ने किया जो कौमपरस्ती की आड़ लेकर बाबर को अपना पूर्वज घोषित करने से नहीं सकुचाये। वो हर मंच से बड़ी बेशर्मी के साथ बाबर के ऐसे कुकृत्यों की हिमायत करने में लगे रहे जिन्हें उनका खुदा भी जायज नहीं ठहराता।आज के दौर से यदि आकलन करें तो बाबर की मानसिकता सीधे तौर पर आईएसआईएस के सरगना बगदादी, अफगानिस्तान के तालिबान या लश्करे तैयबा के आतंकी सरगना ओसामा बिन लादेन से मेल खाती है।बगदादी, लादेन और तालिबान ने भी अपनी कट्टर सोच के चलते एक ओर जहां लाखों निर्दोष लोगों का कत्ल किया वहीं दूसरी ओर तमाम ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासतों को नेस्तनाबूद कर डाला।हो सकता है कि राम मंदिर के निर्माण की मांग या उसका विरोध करने के पीछे भाजपा, कांग्रेस, शिव सेना, सपा-बसपा या अन्य दलों के भी अपने-अपने राजनीतिक हित जुड़े हों परंतु इसमें कोई दो राय नहीं कि राम मंदिर को राजनीति के केंद्र में लाने का काम सीधे तौर पर बाबर परस्तों ने किया है।जिस सुप्रीम कोर्ट का हवाला देकर बाबर परस्त आज कहते हैं कि मंदिर निर्माण की यह मांग नाजायज है, वह यह भूल जाते हैं सुप्रीम कोर्ट ही नमाज के लिए मस्जिद की अनिवार्यता का मुद्दा पूरी तरह खारिज कर चुका है।अब जबकि नमाज के लिए न तो मस्जिद अनिवार्य है और न बाबर किसी भारतीय मुसलमानों का पूर्वज है, फिर उसकी हिमायत में खड़े होना और उसके द्वारा मंदिर तोड़कर बनाई गई मस्जिद की पैरवी करना किस तरह जायज है।सच तो यह है कि कोई भी सच्चा मुसलमान यदि मात्र 1400 साल पूर्व हुए इस्लाम के प्रवर्तक पैगंबर साहब की जन्मस्थली पर सवाल खड़े करना बर्दाश्त नहीं कर सकता, उसी तरह हिंदू भी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की जन्मस्थली को लेकर लगातार उठाए जा रहे सवालों से आहत हैं।जहां तक बात मंदिर के निर्माण में होने वाले विलंब और उस पर की जा रही राजनीति की है तो स्वामी रामदेव का यह कथन सही प्रतीत होता है कि सब्र का बांध अब टूटने लगा है।कौन नहीं जानता कि चूल्हे पर रखा पानी भी एक समय बाद उबल कर बाहर आ जाता है, इसलिए यह प्रश्न मुनासिब नहीं कि सैकड़ों साल यदि इंतजार किया है तो अब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का इंतजार क्यों नहीं।सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का इंतजार तो किया ही जा रहा था परंतु जब सुप्रीम कोर्ट ने ही यह कहते हुए बहुसंख्यकों के धैर्य की परीक्षा लेनी शुरू कर दी कि उसके लिए राम जन्मभूमि का मुद्दा कोई प्राथमिकता नहीं है तो अब सवाल कैसा।न्यायपालिका हो या कार्यपालिका, विधायिका हो या कोई अन्य संस्था, आखिर ये सब लोगों के लिए बनाए गए तंत्र हैं न कि इन तंत्रों के लिए लोग बने हैं। इसीलिए लोकतंत्र में भी लोक पहले आता है और तंत्र बाद में।बेशक आज राजनीतिक परिस्थितियां ऐसी हैं कि कांग्रेस सहित दूसरे विपक्षी दल भी राम मंदिर निर्माण का खुलकर विरोध करने की हिमाकत नहीं कर पा रहे परंतु सुप्रीम कोर्ट ने अपनी एक अदद टिप्पणी से बॉल राजनीतिज्ञों के खेमे में ही डाल दी है। आज यदि राम मंदिर निर्माण का मुद्दा फिर गर्मा रहा है तो उसके लिए अदालतों की तारीख पर तारीख देने की प्रवृत्ति भी कम जिम्मेदार नहीं।राम जन्मभूमि को विवादित बनाए रखने में रुचि लेने वालों को समझना ही होगा कि जब उनके मात्र 1400 साल पुराने धर्म पर सवालिया निशान लगाना उन्हें आहत करता है तो हजारों साल पूर्व जन्म लेने वाले हिंदुओं के आराध्य पर प्रश्न खड़े करना कैसे सहन होगा और कब तक सहन होगा।इतिहास गवाह है कि कोई हिंदू शासक कभी आक्रांता नहीं रहा, हिंदुओं से ज्यादा सहिष्णु कोई हुआ ही नहीं। फिर भी चूल्हे पर रखे हुए पानी के उबलकर बाहर आने का इंतजार करना किसी तरह अक्लमंदी नहीं।गौर करने लायक है डॉ. सैयद रिजवान अहमद की यह टिप्पणी कि राम मंदिर अब तक इसलिए नहीं बना क्योंकि हिंदू जाग्रत नहीं हुआ, जिस दिन हिंदू जाग गया उस दिन राम मंदिर के निर्माण को कोई रोक नहीं पाएगा।डॉ. रिजवान के शब्दों में कहें तो मुस्लिमों की बाबर परस्ती यदि अब भी नहीं छूटी तो ‘न खुदा ही मिला न विसाले सनम’ की कहावत चरितार्थ होकर रहेगी। उसके बाद मोहब्बत का पैगाम कटोरे में लेकर घूमने के अलावा कुछ हाथ नहीं रह जाएगा।कौन नहीं जानता कि पूरी दुनिया में मुस्लिम यदि कहीं सबसे अधिक महफूज हैं तो वह भारत है। सर्व धर्म समभाव के पोषक समूची कायनात में कोई हैं तो वह हिंदू हैं। विश्व के मानवों को कुटुम्ब मानकर वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा में जीने वाले धर्म को यदि बार-बार चेतावनी दी जाएगी और उनके आराध्य के वजूद को चुनौती मिलेगी तो सब्र का बांध टूटना स्वाभाविक है।कोर्ट का फैसला, कानून, अध्यादेश आदि सब तब तक अहमियत रखते हैं जब तक उनमें विश्वास कायम रहता है। जिस दिन इन व्यवस्थाओं पर से विश्वास टूटने लगता है, उस दिन बहुत कुछ टूटने और बिखरने की नौबत आ जाती है।बेहतर होगा कि एक नया इतिहास कायम किया जाए, इतिहास दोहराया न जाए अन्यथा भगवान श्रीकृष्ण ने भी अंत तक महाभारत को रोकने के बहुत प्रयास किए थे। संपूर्ण राज-पाठ की जगह पांडवों के लिए मात्र पांच गांव देने की प्रार्थना की थी लेकिन दुर्योधन नहीं माना।दुर्योधन द्वापर में ही नहीं हुआ था। वह हर युग में होता है, इसलिए आज के दुर्योधनों को पहचानना जरूरी है क्यों कि जरूरी है शांति और सद्भाव। यदि दुर्योधनों की चाल काम आ गई तो शांति की स्थापाना के लिए भी युद्ध आवश्यक हो जाता है।-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
जी हां! यदि आप इस फेस्टिव सीजन यानी में मथुरा से Hyundai की कोई कार खरीदना चाहते हैं तो यह ख़बर आपके लिए ही है।कहीं ऐसा न हो कि आप बड़े उत्साह से अपने अरमानों की गाड़ी घर लेकर आएं और पता चले कि गाड़ी तो घर पहुंच गई किंतु एजेंसी ‘सड़क’ पर आ चुकी है।दरअसल, मथुरा जनपद में Hyundai कारों के एकमात्र डीलर आगरा निवासी राजीव रतन और ऋषि रतन ने कार निर्माता कंपनी को धोखे में रखकर Shiel Hyundai का सौदा किसी अन्य व्यक्ति के नाम कर दिया है जो कंपनी की शर्तों के मुताबिक पूरी तरह अवैध है।बताया जाता है कि फिलहाल डीलरशिप को छिपाए रखने की वजह भी यही है कि कंपनी की आंखों में धूल झोंककर फेस्टिव सीजन का भरपूर लाभ उठा लिया जाए।यही कारण है कि Shiel Hyundai में कार्यरत स्टाफ को भी यह कहकर गुमराह किया जा रहा है कि कंपनी की सहमति से डीलरशिप का सौदा हुआ है जबकि कोई भी मल्टी नेशनल कार कंपनी अपने डीलर को ऐसा करने की इजाजत कभी नहीं देती।गौरतलब है कि फेस्टिव सीजन में लगभग सभी कार कंपनियां अपने उत्पादों पर अच्छी-खासी छूट देती हैं और इसका लाभ ग्राहक के साथ-साथ डीलर को भी प्राप्त होता है।डीलर को इन अवसरों पर कंपनी जो टारगेट देती है, उस टारगेट को अचीव करने का बोनस भी निर्धारित होता है, और यह बोनस डीलर के खाते में जाता है।कंपनी द्वारा दी जाने वाली छूटों में नकद डिस्काउंट के अलावा फ्री सर्विस की संख्या, गारंटी अथवा वारंटी की मियाद बढ़ा देना आदि भी शामिल होता है।इन हालातों में अगर आपने किसी ऐसे डीलर से अपने सपनों की कार खरीदी होगी जिसके अपने भविष्य पर ही प्रश्नचिन्ह लगा हो तो आपको सर्विस से लेकर मेंटीनेंस तक में भारी असुविधा होने की पूरी संभवाना है।वजह एकदम साफ है। प्रथम तो कंपनी कब और किसे डीलर बनाती है, यह उसका अपना निर्णय है। दूसरे जिसे भी वह डीलर बनाती है, जरूरी नहीं कि वह उस गाड़ी पर फेस्टिव सीजन में मिली छूट को गंभीरता से ले जिसे उसने अपने स्तर से बेचा ही नहीं है और जिसका लाभ उससे पहले वाला डीलर उठा चुका है।हालांकि कंपनी की शर्तों के मुताबिक प्रत्येक डीलर पूर्व में कंपनी द्वारा ग्राहक को दी गई सुविधाएं पूरी करने के लिए बाध्य है किंतु हकीकत में ऐसा होता नहीं है। यहां तक कि एक शहर का डीलर दूसरे शहर से खरीदी गई अपनी ही कंपनी की गाड़ी के ग्राहक को सुविधाएं मुहैया कराने में विशेष रुचि नहीं लेता।डीलर्स की इस हरकत से सभी कार मालिक भली-भांति परिचित होते हैं इसलिए अधिकांश लोग जहां रहते हैं वहीं से कार खरीदने को प्राथमिकता देते हैं।सामान्य तौर पर मथुरा जैसे धार्मिक जनपद में लोग धनतेरस और दीवाली पर नई कार अपने घर लाना चाहते हैं और इसके लिए पहले से तैयारी भी करते हैं। जिन्हें फाइनेंस कराना होता है वह फाइनेंस कराकर रखते हैं और जिन्हें एक्सचेंज ऑफर के तहत शेष धनराशि नकद देकर कार लानी होती है, वह भी पूरी तैयारी रखते हैं।मन पसंद कार के लिए लोग डीलर के पास एडवांस पैसा पहुंचा देते हैं ताकि उन्हें पूर्व निधारित समय पर गाड़ी की डिलीवरी मिल सके।ऐसे में एक स्वाभाविक सवाल यह पैदा होता है कि एडवांस पेमेंट, अच्छा लाभ और आफ्टर सेल भी विभिन्न माध्यमों से कमाई का जरिया लगातार बने रहने के बावजूद मथुरा की डीलरशिप क्यों खतरे में पड़ गई।इस संबंध में जानकारी की तो पता लगा कि ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में किसी भी डीलर के सामने आर्थिक तंगी के हालात सिर्फ तब खड़े होते हैं जब वह उस डीलरशिप से हो रही आमदनी का पैसा दूसरे कारोबार में लगाने लगता है। जैसे कि दूसरी कंपनी की डीलरशिप में या फिर जमीनें आदि को खरीदने में।उल्लेखनीय है कि मथुरा में Hyundai कारों के डीलर राजीव रतन व उनके पुत्र ऋषि रतन पर आगरा में एक अन्य कार कंपनी की भी डीलरशिप है और इन्होंने जमीन आदि में भी पैसा लगाया हुआ है। इसके अलावा पड़ोसी जनपद हाथरस में भी Hyundai की डीलरशिप इन्हीं के पास है।इतना सब होते हुए मथुरा में Hyundai की डीलरशिप से किसी प्रकार का आर्थिक नुकसान मिलने की संभावना नहीं बनती लिहाजा यह अनुमान लगाना आसान है कि पैसा गया कहां होगा।मथुरा में एक मशहूर दुपहिया वाहन के डीलर ने कुछ समय पूर्व ऐसा ही कारनामा किया था और अपने स्तर से सौदा करके करोड़ों रुपए ले लिए थे। कंपनी को जब डीलर के कारनामे का पता लगा तो उसने डीलरशिप टर्मिनेट करके नया डीलर बना लिया लेकिन जिसने पहली डीलरशिप में पैसे लगाए थे, वह फंस गया।प्रत्येक व्यक्ति का पहला सपना भले ही अपना एक घर बनाना होता है परंतु उसका दूसरा सपना एक चार पहिया वाहन भी लेना होता है। चार पहिया वाहनों में मारुति और Hyundai ऐसी कंपनियां हैं जिनकी सर्वाधिक कारें सड़क पर दौड़ती देखी जा सकती हैं।फेस्टिव सीजन में तो इन कंपनी की कारों के लिए लगभग मारामारी जैसी स्थिति पैदा हो जाती है क्योंकि सभी को अपनी पसंद का कलर और मॉडल एक निर्धारित तिथि या दिन चाहिए होता है।अभी धनतेरस में 12 और दीपावली में 14 दिन शेष हैं। यदि आप मथुरा से Hyundai की गाड़ी लेने का मन बना रहे हों तो पहले अच्छी तरह यह पता कर लें कि कहीं आपको आफ्टर सेल सर्विस के लिए दूसरी जगहों पर भटकना न पड़े और आप अपनी गाड़ी का भरपूर लुत्फ उठा सकें।-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
Shiel Hyundai के नाम से मथुरा में Hyundai कारों के एकमात्र डीलर आगरा निवासी राजीव रतन और ऋषि रतन ने कंपनी की आंखों में धूल झोंकते हुए डीलरशिप का सौदा किसी दूसरे को कर दिया है जबकि नियमानुसार ऐसा करना पूरी तरह अवैध बताया जाता है।यही नहीं, Shiel Hyundai ने अपने स्तर से डीलरशिप का सौदा करने की जानकारी उन बैंकों को भी देना जरूरी नहीं समझा जिनमें Shiel Hyundai के एकाउंट हैं और Shiel Hyundai ने वहां से काफी आर्थिक सुविधाएं ले रखी हैं।बताया जाता है कि इस कारनामे को अंजाम देने के लिए Shiel Hyundai ने अपने कर्मचारियों तक को यह कहकर गुमराह किया है कि उन्होंने डीलरशिप का सौदा करने की इजाजत कंपनी से ले ली है।गौरतलब है कि मूल रूप से दक्षिण कोरिया की कार निर्माता कंपनी Hyundai का भारत के कार बाजार में बड़ा दबदबा है और इसलिए मारुति के बाद Hyundai की ही सर्वाधिक कारें सड़क पर देखी जा सकती हैं।क्या कंपनी ऐसी कोई इजाजत देती है ?इस बारे में जानकारी की तो पता लगा कि कोई भी मल्टीनेशनल कंपनी या बड़ी कंपनी डीलर को ये अधिकार नहीं देती कि वह अपने स्तर से डीलरशिप किसी अन्य के नाम ट्रांसफर कर दे अथवा उसमें किसी को पार्टनर बना ले।दिल्ली में ऑटोमोबाइल डीलर एसोसिएशन (फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन) के पदाधिकारी जितेन्द्र नंदा ने बताया कि डीलर द्वारा किया गया कोई भी ऐसा कृत्य कंपनी की शर्तों का उल्लंघन है और कंपनी इसके लिए न केवल डीलरशिप टर्मिनेट करती है बल्कि आपराधिक केस भी दायर करा सकती है।उन्होंने बताया कि डीलर अगर अपनी डीलरशिप छोड़ना चाहता है तो ज्यादा से ज्यादा इतना कर सकता है कि इस क्षेत्र के किसी अनुभवी व्यक्ति का नाम कंपनी को रिकमेंड कर दे किंतु अंतिम निर्णय कंपनी का ही होता है।कंपनी यदि अपनी सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद उस व्यक्ति को उपयुक्त समझती है तो पहले वाली डीलरशिप को समाप्त कर नए सिरे से डीलरशिप अलॉट करेगी, न कि पुरानी डीलरशिप के साथ उसका कोई संबंध रखने की इजाजत देगी।यूं भी Hyundai जैसी विश्व प्रसिद्ध कार निर्माता कंपनी की डीलरशिप पाने को हमेशा कई-कई लोग लाइन में लगे रहते हैं और कंपनी भी हर बार डीलरशिप के लिए पहले से उच्च मानदंड निर्धारित करती है। ऐसे में इस बात का सवाल ही खड़ा नहीं होता कि Hyundai अपने किसी डीलर को डीलरशिप ट्रांसफर करने अथवा उसमें पार्टनरशिप करने की इजाजत दे।Shiel Hyundai से इस बारे में उनका पक्ष जानने की काफी कोशिश की गई किंतु उनकी ओर से कोई कुछ बताने को तैयार नहीं हुआ। Shiel Hyundai पर मौजूद स्टाफ ने बताया कि राजीव रतन और ऋषि रतन दोनों बाहर हैं। हालांकि उन्हें फोन पर सूचित कर दिया गया है।विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार Shiel Hyundai द्वारा किए जा रहे इस कारनामे में ऑटोमोबाइल क्षेत्र से ही जुड़े और दूसरी कार कंपनियों के उन डीलर्स का हाथ है जिनके नीचे फिलहाल किसी कारणवश राजीव रतन और ऋषि रतन दबे हुए हैं।सूत्रों के मुताबिक मथुरा जैसी बड़ी आबादी वाले विश्व विख्यात धार्मिक जिले में Hyundai की एकमात्र डीलरशिप का सौदा करने की वजह राजीव रतन और ऋषी रतन के सामने अचानक आर्थिक तंगी खड़ी हो जाना है।अब सवाल यह उठता है कि अच्छी-खासी संख्या में हर महीने Hyundai कारों के विक्रेता राजीव रतन और ऋषि रतन के सामने अचानक आर्थिक तंगी आ कैसे गई? इसके बारे में उनसे ही जुडे हुए लोग यह बताते हैं कि इसका प्रथम कारण तो पारिवारिक विवाद रहा और दूसरा कारण रहा Shiel Hyundai के पैसे को दूसरे कार्यों में लगा देना। अब ये कार्य कैसे थे और उनमें Shiel Hyundai का पैसा क्यों लगाया गया, इस पर भी कोई मुंह खोलने को तैयार नहीं है।हां, ये लोग दबी जुबान से इतना जरूर बताते हैं कि जिन लोगों ने एक अच्छी-खासी डीलरशिप का सौदा कराया है, उनका मकसद राजीव और ऋषि रतन से किसी भी तरह अपना पैसा निकाल लेना है ताकि सांप मर जाए और लाठी भी न टूटे।रही बात डीलरशिप के सौदे का अधिकार रखने या न रखने की, तो उसके बाद लेने व देने वाले भुगतते रहेंगे। इससे उनके ऊपर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है।Shiel Hyundai के शोरूम का नक्शा भी विवादों में दूसरी ओर इस बीच यह जानकारी भी मिल रही है कि नेशनल हाईवे नंबर-2 पर नवादा क्षेत्र में जहां Shiel Hyundai का शोरूम बना है, वह Residential area है। किसी भी Residential area में कानूनन कार के किसी शोरूम का निर्माण नहीं कराया जा सकता।मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने भी इसकी पुष्टि करते हुए बताया कि कब और किन परिस्थितियों में नवादा के Residential area में कार के शोरूम बना लिए गए, कहना मुश्किल है।विकास प्राधिकरण से इस बारे में एक चौंकाने वाली जानकारी यह मिली कि जिस प्लॉट पर Shiel Hyundai का शोरूम आज खड़ा है, उस पर तो रेस्टोरेंट के लिए नक्शा पास किया गया था।प्राधिकरण के अधिकारियों ने इस बारे में जांच के उपरांत कार्यवाही करने का भरोसा दिया है।गौरतलब है कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से ताजनगरी आगरा को जोड़ने वाले नेशनल हाईवे नंबर दो पर स्थानीय डेवलपमेंट अथॉरिटी की सांठगांठ से Residential area में ऐसे और भी कई शोरूम स्थापित हो चुके हैं जो नियम विरुद्ध हैं किंतु आजतक उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई।सच तो यह है कि अथॉरिटी से पास नक्शे के इतर मामूली सा भी फेरबदल दिखाई देने पर पहुंच जाने वाले विप्रा अधिकारी ऐसे शोरूम्स को लेकर अब तक आंखें व कान बंद किए बैठे रहे।यही कारण है कि राजीव और ऋषि रतन ने Hyundai की अपनी डीलरशिप का सौदा शोरूम सहित किया है क्योंकि वह उसकी असलियत जानते हैं, और उन्हें मालूम है कि रेस्टोरेंट में पास शोरूम कभी भी उनके गले की हड्डी बन सकता है।बहरहाल, करोड़ों रुपए के इस खेल से फिलहाल तो Hyundai कंपनी के साथ-साथ बैंकें और एजेंसी पर कार्यरत स्टाफ भी अनभिज्ञ है। कंपनी और बैंकों को तो जब सच्चाई पता लगेगी तब वो देख लेंगे किंतु स्टाफ को अपना भविष्य अंधकारमय दिखाई देने लगा है।-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
डिसक्लेमर: इस लेख का संबंध किसी जीवित या मृत स्त्री-पुरुष से नहीं है, और न इसका उद्देश्य किसी की भाव-नाओं को आ-हत करना है। यह विशुद्ध रूप से जनहित में #MeToo को समर्पित है लिहाजा इसके समर्पण पर जाएं, समानता पर नहीं। अचानक दीवाली सेल पर कुछ खास हाथ लगने की लालसा में कल दोपहर घर से निकला ही था कि एक कुषाणकालीन मित्र के हत्थे चढ़ गया। पहले तो वह मुझे देखकर पहचानने का प्रयास करते हुए थोड़ा सकुचाया और फिर मेरे होने की पुष्टि करके मुस्कुराया। उसके बाद दहाड़ मारकर चिल्लाते हुए बोला- मैं यहां कोई दीवाली की छूट के लिए नहीं आया, मैं तो तुझे ही तलाशने आया था क्योंकि मुझे पूरा यकीन था कि तू यहीं कहीं पाया जाएगा।भरी जवानी से मैं जानता हूं कि तू दो ही किस्म के मेलों में पाया जा सकता है। पहला दीवाली मेला और दूसरा कुंभ का मेला। कुंभ का मेला 2019 में है इसलिए 2018 में तेरी तलाश पूरी हुई।मुझे एक शब्द बोलने का मौका दिए बिना उसने पूछना शुरू किया- चुंगी के कॉन्वेंट स्कूल में को-एजुकेशन लेते वक्त अपने साथ जो सबसे गोल-मटोल लड़की पढ़ती थी, वह याद है ?मैंने बमुश्किल 40 साल पहले की स्मृतियों को संजोने की कोशिश प्रारंभ की ही थी कि वह फिर शुरू हो गया- याद कर 40 साल पहले 60 किलो की वह सहपाठी पैर फिसल जाने के कारण स्कूल के पास वाले गंदे नाले में गिर गई थी और तूने अपने धवल वस्त्रों की परवाह किए बिना, जान हथेली पर रखकर उस लड़की को नाले से निकाला था। सारे साथी तमाशा देख रहे थे लेकिन तूने उस भारी-भरकम काया को निकालने के लिए नाले में यह सोचे-समझे बिना छलांग लगा दी थी कि उसका वजन तुझे भी साथ लेकर डूब सकता है।कुषाणकालीन मित्र द्वारा इतना कुछ याद दिलाने के बाद मैं स्मृतियों को ठीक से सहेज भी नहीं पाया था कि वह एकबार फिर कंटीन्यू हुआ और बोला- 60 किलो से 200 किलों में बदल चुकी वह काया तुझे जल्द ही Twitter पर #MeToo के तहत लपेटने वाली है।उसका कहना है कि नाले में से उसे निकालने का तूने जो उपक्रम किया था, वह दरअसल तेरी बदनीयती का हिस्सा था। तूने 40 साल पहले उसका यौन उत्पीड़न किया था। तूने तब उसके पूरे बदन को अपने हाथों से छुआ जबकि वह काम किसी क्रेन को बुलाकर भी कराया जा सकता था।40 साल पहले के कथित पुण्यकार्य को यौन उत्पीड़न में कन्वर्ट होते देख एकबार तो मेरी सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो गई, फिर जैसे-तैसे खुद को संभाला और अपने मित्र से पूछा- भाई, पहले तू मुझे उसका नाम तो बता दे। मोदी सरकार से भी अधिक ग्रोथ रेट को प्राप्त उस भारी भरकम काया को मैं Twitter पर भी पहचानूंगा कैसे।मेरी दशा और दिशा का अनुमान लगाकर मित्र कहने लगा- ज्यादा बनने की कोशिश मत कर, उसे अपने साथ हुए यौन अपराध का एक-एक पल याद है और तू कहता है कि तुझे उसका नाम तक याद नहीं। बेटा, राष्ट्रीय महिला आयोग का Twitter या whatsapp के थ्रू नोटिस मिलेगा तो सब याद आ जाएगा। उसकी सूरत भी और अपनी सीरत भी।मित्र से यह शॉकिंग समाचार सुनकर मैं सुन्न अवस्था में वहीं से उलटे पैर लौट आया। अभी घर की लॉबी में प्रवेश किया ही था कि पत्नी चहक कर बोली- सुना, वो अपने टीवी वाले संस्कारी बाबूजी भी #MeToo के लपेटे में आ गए हैं। किसी महिला लेखक ने 20 साल पहले उन पर बलात्कार करने का आरोप लगाया है। ऐसा लगता है कि संस्कारी बाबूजी इस झटके को सह नहीं पाए, क्योंकि जवाब में बहकी-बहकी सी बातें कर रहे थे। कुछ-कुछ ऐसे बड़बड़ा रहे थे…हुआ होगा बलात्कार, लेकिन मैंने नहीं किया। मैं न इंकार कर सकता हूं और न इकरार कर रहा हूं।मुझे तो इस उम्र में बाबूजी के इस हाल पर दया आ रही है लेकिन उन्हें #MeToo में लपेटने वाली लेखिका का कहना है कि 20 साल बाद तक उसे ‘मदहोशी’ में हुआ दुष्कर्म जब ‘पूरी तरह याद’ है तो पूरे होशो हवास में उसके साथ दुष्कर्म करने वाले बाबूजी कैसे भूल सकते हैं।संस्कारी बाबूजी की कथित करतूत सुनाते-सुनाते पत्नी जी ने तुरंत यू टर्न लिया और मेरी ओर मुखातिब होकर कहने लगीं- मुझे तो लगता है कि करीब-करीब 25 साल पहले आपने जो घुटनों पर आकर मुझे प्रपोज किया था, उसमें भी आपकी नीयत ठीक नहीं थी। अगले 24 घंटों में दिमाग पर जोर डालकर सोचती हूं कि प्रपोज करने के पीछे आपकी कौन सी कुत्सित चाल थी। उसके बात #MeToo कैंपेन में भाग लेने पर विचार करूंगी।अब मेरा ध्यान पत्नी द्वारा चटखारे ले-लेकर सुनाई जा रही टीवी वाले संस्कारी बाबूजी की कथा या व्यथा पर न होकर अपने मित्र द्वारा सुनाई गई कालातीत दुर-घटना तथा पत्नी द्वारा 25 साल पूर्व की घटना को लेकर दी गई ताजा-ताजा धमकी पर केंद्रित हो गया जिसका बम कभी भी मेरे सिर फूट सकता था।जैसे-तैसे मैंने मंगलवार का मौनव्रत घोषित कर पूरा दिन तो काट लिया किंतु रात में बिस्तर पर #MeToo मेरे सामने पूरी भयावहता के साथ आ खड़ा हुआ। मैंने अपने दिमाग पर बहुत जोर डाला और यह सोचने की कोशिश की कि आखिर इंसानियत के नाते किसी सहपाठी को नाले में से निकालना यौन उत्पीड़न कैसे हो सकता है, किंतु मेरी अंतरात्मा कुछ बताती कि इससे पहले #MeToo बोल पड़ा। कहने लगा- बरखुरदार, नाले में से निकालना यौन उत्पीड़न की वजह नहीं बन सकता यह साबित अब तुम्हें करना है। तुम्हारी सहपाठी तो कह ही रही है कि नाले में से उसे निकालने में तुम्हारी नीयत ठीक नहीं थी। यह बात अलग है कि तब वह तुम्हारी बदनीयत को नहीं समझ पायी किंतु अब उसे सबकुछ साफ-साफ समझ में आ चुका है। उसके नाती-पोतों ने भी इस बात की पुष्टि कर दी है कि वह सही दिशा में जा रही है।#MeToo के भय का साया सुबह अपने मन से झटकने की कोशिश में नित्य की भांति टहलने निकल पड़ा। थोड़ी दूर ही पहुंचा था कि साइकिलिंग कर रहीं पड़ोसी महिला डॉक्टर को जर्मन शेफर्ड डॉग से घिरा देखा। किसी सभ्य व सुसंस्कृत गृहस्वामी का वह इल्लिट्रेट कुत्ता अपने पूरे जबड़े खोलकर महिला डॉक्टर पर भौंक रहा था।महिला डॉक्टर का चूंकि डर के मारे बुरा हाल था लिहाजा वो चिल्ला-चिल्लाकर मुझसे मदद मांगने लगीं। एकबार को मैं पिछले चौबीस घंटों से आ रहे #MeToo के भयानक स्वप्नों को भूलकर महिला डॉक्टर की मदद के लिए आगे बढ़ने लगा किंतु तभी दिल ने दिमाग से काम लेने को कहा। कहीं अंदर से आवाज आई, बेटा पहले 40 साल पहले कमाए गए पुण्य से तो निपट ले जो किसी भी समय #MeToo बोलने वाला है, उसके बाद और पुण्य कमा लेना। इस उम्र में यह नया पुण्य कमाने का प्रयास कब्र तक पीछा नहीं छोड़ेगा। बच्चों से श्राद्ध करवाने की बजाय यदि गंगा में प्रवाहित की गई अस्थियों को ‘सम्मन’ का सामना कराना है तो पचड़े में पड़, वरना चुपचाप खिसक ले।दिमाग ने दिल की दहशत को समझा और यह सोचकर किनारा कर लिया कि डॉक्टर साहिबा को दो-चार इंजेक्शन ही तो लगेंगे, लेकिन मेरे पीछे जो #MeToo लग गया तो समाज इतने इंजेक्शन लगाएगा कि सब सुन्न कर देगा। दिल, दिमाग और शरीर सब। न निगलते बनेगा, और न उगलते।40 साल पहले वाली क्लासमेट की तरह कुछ सालों बाद इन डॉक्टर साहिबा को भी कहीं याद आ गया कि उन्हें जर्मन शेफर्ड से बचाने में मेरी नीयत ठीक नहीं थी तो लेने के देने पड़ जाएंगे। यहां तो गवाह भी मैडम ही हैं और सबूत भी वही हैं।देश में राष्ट्रीय महिला आयोग है, पुरुष आयोग नहीं। पुरुषों के लिए राष्ट्रीय तो क्या, कोई क्षेत्रीय आयोग भी नहीं है। पुरुषों की सुनवाई के लिए बाबा साहब ने संविधान में कोई व्यवस्था नहीं की।क्या पुरुषों के लिए किसी #MeToo की कोई संभावना है, या मी लॉर्ड के सामने खड़े होना ही एकमात्र विकल्प है।जो भी हो, फिलहाल तो पूरे देश में #MeToo का जोर है। टीवी, फिल्म और मीडिया से जुड़े लोग जितना जल्दी हो सके पुराने पुण्यों या यूं कहें कि मन, वचन और कर्म से किए गए पापों का लेखा-जोखा अपने लेखाकार से लगवा लें अन्यथा #MeToo तो सारे हिसाब लगवा ही लेगा। खुदा हाफिज़। जय हिंद। जय भारत।-सुरेन्द्र चतुर्वेदी