बुधवार, 25 सितंबर 2019

मथुरा में हजारों Hyundai कार उपभाेक्‍ताओं के साथ धोखा, न डीलर का पता है और न डीलरशिप का

मथुरा। भारत के कार बाजार में दूसरे नंबर पर स्‍थापित दक्षिण कोरिया की मशहूर वाहन निर्माता कंपनी Hyundai के हजारों उपभोक्‍ताओं को बड़े सुनियोजित तरीके से धोखा दिया जा रहा है लेकिन न कोई देखने वाला है और न सुनने वाला।
यह धोखा मथुरा के नेशनल हाईवे पर नवादा में स्‍थित Shiel Hyundai के नाम से संचालित उस एकमात्र शोरूम पर मिल रहा है जिसके केयरटेकर इन दिनों आगरा निवासी ट्रांसपोर्टर एवं सुपारी व्‍यवसायी संजीव अग्रवाल बने हुए हैं।
मथुरा में Hyundai उपभोक्‍ताओं एवं ग्राहकों के साथ इस धोखे की शुरूआत यूं तो पिछले वर्ष ही तब हो गई थी जब स्‍थानीय डीलर राजीव रतन ने Hyundai के अपने शोरूम का गुपचुप सौदा संजीव अग्रवाल के साथ कर लिया था किंतु दोबारा यह धोखाधड़ी अब फिर बड़े रूप में सामने आई है।
दरअसल, चार दिन पूर्व प्रसिद्ध मिठाई विक्रेता ब्रजवासी ग्रुप के मालिक सतीश ब्रजवासी के पौत्र यश अग्रवाल तथा नरसी विलेज निवासी पंकज अग्रवाल ने Shiel Hyundai के डीलर राजीव रतन और उनके बेटे ऋषि रतन के खिलाफ थाना गोविंदनगर मथुरा में 25 लाख रुपयों की धोखाधड़ी का एक मामला दर्ज कराया।
संजीव अग्रवाल को किस बात का डर
इस बारे में बात करने के लिए Shiel Hyundai मथुरा पर संपर्क किया गया तो बात संजीव अग्रवाल से हुईं। संजीव अग्रवाल ने यह तो स्‍वीकार किया कि Shiel Hyundai की डीलरशिप अब भी राजीव रतन के नाम है, लेकिन वह इस बात का कोई जवाब नहीं दे सके कि वह किस हैसियत से Shiel Hyundai का संचालन कर रहे हैं।
संजीव अग्रवाल ने साफ कहा कि वह मोबाइल फोन पर कोई बात नहीं करना चाहते क्‍योंकि उनकी बात रिकॉर्ड की जा सकती है।
संजीव अग्रवाल का डर स्‍पष्‍ट कर रहा था कि मथुरा में Hyundai की डीलरशिप को लेकर कुछ न कुछ ऐसा है जिसे छिपाया जाना जरूरी है।
40 प्रतिशत की हिस्‍सेदारी, लेकिन डीलरशिप अब भी राजीव रतन के नाम
संजीव अग्रवाल की बातों पर संदेह होने के बाद जब और जानकारी की गई तो Shiel Hyundai से जुड़े सूत्रों ने बताया कि राजीव रतन ने संजीव अग्रवाल के साथ उस हिस्‍से में 40 प्रतिशत की साझेदारी तो की है जो कभी उनके छोटे भाई संजीव रतन के पास हुआ करता था परंतु डीलरशिप अब भी उनके नाम है क्‍योंकि कंपनी ने उनके द्वारा डीलरशिप ट्रांसफर करने का प्रस्‍ताव पूरी तरह ठुकरा दिया।
बिल्‍डिंग का भी सौदा
सूत्रों का यह भी कहना है कि संजीव अग्रवाल के नाम 40 प्रतिशत की पार्टनरशिप न सिर्फ मथुरा बल्‍कि एटा Shiel Hyundai में भी मय शोरूम के हुई है यानी व्‍यापार के साथ-साथ बिल्‍डिंग का भी सौदा किया गया है।
बताया जाता है कि 40 प्रतिशत की पार्टनरशिप भी मात्र दो महीने पहले तब मजबूरी में की गई जब Hyundai कंपनी ने डीलरशिप ट्रांसफर करने से साफ इंकार कर दिया।
सूत्रों के मुताबिक लगभग 20 करोड़ रुपया संजीव अग्रवाल द्वारा जो राजीव रतन को दिया गया था, उसमें डीलरशिप ट्रांसफर कराना शामिल था परंतु Hyundai कंपनी इसके लिए तैयार नहीं हुई क्‍योंकि कोई भी प्रतिष्‍ठित कंपनी अपने डीलर को ऐसा कोई अधिकार नहीं देती जिससे वो डीलरशिप ट्रांसफर करा सके।
आपराधिक केस दायर करा सकती है Hyundai
कोई भी ऐसा कृत्‍य कंपनी की शर्तों का उल्‍लंघन है और कंपनी इसके लिए न केवल डीलरशिप टर्मिनेट करती है बल्‍कि आपराधिक केस भी दायर करा सकती है।
डीलर अगर अपनी डीलरशिप छोड़ना चाहता है तो ज्‍यादा से ज्‍यादा इतना कर सकता है कि इस क्षेत्र के किसी अनुभवी व्‍यक्‍ति का नाम कंपनी को रिकमेंड कर दे किंतु अंतिम निर्णय कंपनी का ही होता है।
कंपनी यदि अपनी सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद उस व्‍यक्‍ति को उपयुक्‍त समझती है तो पहले वाली डीलरशिप को समाप्‍त कर नए सिरे से डीलरशिप अलॉट करेगी, न कि पुरानी डीलरशिप के साथ उसका कोई संबंध रखने की इजाजत देगी।
हजारों उपभोक्‍ताओं का क्‍या ?
ऐसे में सवाल यह खड़ा होता है कि जब राजीव रतन और संजीव रतन दोनों ने Shiel Hyundai से नाता तोड़ लिया है और कंपनी ने संजीव अग्रवाल के नाम डीलरशिप ट्रांसफर करने का प्रस्‍ताव ठुकरा दिया है तो यहां हजारों की संख्‍या में मौजूद उन उपभोक्‍ताओं का क्‍या, जो अब तक Shiel Hyundai को मथुरा का अधिकृत डीलर समझकर अपनी गाड़ियों की सर्विस, बीमा, रिपेयरिंग आदि करवा रहे हैं।
Shiel Hyundai के शोरूम पर मौजूद संजीव अग्रवाल कहते हैं कि वो मालिक यानी डीलर नहीं हैं और राजीव रतन व संजीव रतन पहले ही मथुरा आना तक छोड़ चुके हैं, राजीव रतन के पुत्र ऋषि रतन जो पहले Shiel Hyundai का पूरा कारोबार संभालते थे, वो भी यहां नहीं झांकते, तो फिर डीलरशिप किसके भरोसे चल रही है।
पुराने स्‍टाफ को नौकरी से निकाला
यह भी पता लगा है कि Shiel Hyundai के केयरटेकर संजीव अग्रवाल ने डीलरशिप पर अपना पूरा आधिपत्‍य जमाने के लिए उन अधिकांश पुराने कर्मचारियों को निकाल बाहर किया है जिन्‍हें कंपनी ने समय-समय पर ट्रेनिंग दी थी और वो कंपनी तथा डीलर के प्रति वफादार थे।
नए ग्राहक भी होंगे धोखाधड़ी के शिकार
इन हालातों में पुराने उपभोक्‍ताओं के अलावा ऐसे नए ग्राहकों के साथ भी Shiel Hyundai पर धोखाधड़ी किए जाने की पूरी संभावना है जो मथुरा की डीलरशिप को अधिकृत समझ रहे हैं।
आज की तारीख में Shiel Hyundai पर इन बातों के लिए भी कोई जवाबदेह नहीं है कि जो पार्ट या इंजन आयल आदि सर्विस के दौरान गाड़ियों में इस्‍तेमाल किया जा रहा है वह कितना GENUINE है।
सूत्रों का कहना है उपभोक्‍ता और ग्राहकों सहित Hyundai कंपनी की आंखों में धूल झोंकने का यह काम Hyundai के ही कुछ अधिकारियों की मिलीभगत से किया जा रहा है। वो लोग Shiel Hyundai की असलियत अपने उच्‍च अधिकारियों तक पहुंचने ही नहीं दे रहे जिससे कंपनी की डीलरशिप सहित उसका भरोसा दांव पर लग चुका है।
बताया जाता है कि मंदी के इस दौर में भी Hyundai की डीलरशिप लेने को तमाम लोग तैयार हैं क्‍योंकि Hyundai की ब्रांड वेल्‍यू काफी अच्‍छी है। संभवत: इसीलिए संजीव अग्रवाल करोड़ों रुपया लगाने के बावजूद बिना मालिकाना हक के Shiel Hyundai का संचालन कर रहे हैं।
Shiel Hyundai के भविष्‍य का आगे चलकर क्‍या होगा, यह तो देर-सवेर पता लग ही जाएगा परंतु फिलहाल Hyundai के हजारों उपभोक्‍ताओं और उन लोगों के साथ एक साजिश के तहत धोखाधड़ी हो रही है जो इस ब्रांड तथा Shiel Hyundai पर भरोसा करते हैं और उसी भरोसे के साथ आंख बंद करके Shiel Hyundai पहुंचते हैं।
Shiel Hyundai के शोरूम का नक्‍शा भी विवादों में
दूसरी ओर इस बीच यह जानकारी भी मिल रही है कि नेशनल हाईवे नंबर-2 पर नवादा क्षेत्र में जहां Shiel Hyundai का शोरूम बना है, वह Residential area है। किसी भी Residential area में कानूनन कार के किसी शोरूम का निर्माण नहीं कराया जा सकता।
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने भी इसकी पुष्‍टि करते हुए बताया कि कब और किन परिस्‍थितियों में नवादा के Residential area में कार के शोरूम बना लिए गए, कहना मुश्‍किल है।
विकास प्राधिकरण से इस बारे में एक चौंकाने वाली जानकारी यह मिली कि जिस प्‍लॉट पर Shiel Hyundai का शोरूम आज खड़ा है, उस पर तो रेस्‍टोरेंट के लिए नक्‍शा पास किया गया था।
प्राधिकरण के अधिकारियों ने इस बारे में जांच के उपरांत कार्यवाही करने का भरोसा दिया है।
गौरतलब है कि राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली से ताजनगरी आगरा को जोड़ने वाले नेशनल हाईवे नंबर दो पर स्‍थानीय डेवलपमेंट अथॉरिटी की सांठगांठ से Residential area में ऐसे और भी कई शोरूम स्‍थापित हो चुके हैं जो नियम विरुद्ध हैं किंतु आजतक उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई।
सच तो यह है कि अथॉरिटी से पास नक्‍शे के इतर मामूली सा भी फेरबदल दिखाई देने पर पहुंच जाने वाले विप्रा अधिकारी ऐसे शोरूम्‍स को लेकर अब तक आंखें व कान बंद किए बैठे रहे।
यही कारण है कि राजीव और ऋषि रतन ने Hyundai की अपनी डीलरशिप का सौदा शोरूम सहित किया है क्‍योंकि वह उसकी असलियत जानते हैं, और उन्‍हें मालूम है कि रेस्‍टोरेंट में पास शोरूम कभी भी उनके गले की हड्डी बन सकता है।
बहरहाल, करोड़ों रुपए के इस खेल से फिलहाल तो Hyundai कंपनी के साथ-साथ बैंकें और एजेंसी पर कार्यरत स्‍टाफ भी अनभिज्ञ है। कंपनी और बैंकों को तो जब सच्‍चाई पता लगेगी तब वो देख लेंगे किंतु जिस स्‍टाफ को निकाल बाहर किया गया है, उसका भविष्‍य पूरी तरह अंधकारमय है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

रविवार, 1 सितंबर 2019

BBC की जुबानी, खुद उसकी कहानी: कश्‍मीर पर अपुष्‍ट एवं फर्जी खबरें प्रकाशित करता रहा है BBC

BBC ने हाल में एक रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसके अनुसार कश्मीर के कई लोगों ने सुरक्षाबलों पर मारपीट और उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं।
BBC की रिपोर्ट में उन लोगों के ज़ख्म भी दिखाए गए जिन्‍होंने सुरक्षाबलों द्वारा उन्‍हें कथित तौर पर पीटे जाने की बात कही। हालांकि खुद BBC इन आरोपों की पुष्‍टि नहीं करता।
खुद BBC ने अपनी ही रिपोर्ट में यह लिखा कि वह इन आरोपों की पुष्टि किसी अधिकारी अथवा अधिकृत व्‍यक्‍ति से नहीं कर पाया।जिसका सीधा-सीधा अर्थ यही निकलता है कि BBC ने कश्‍मीर जैसे संवेदनशील मुद्दे पर बहुत जल्‍दबाजी में और अपुष्‍ट खबर को प्रकाशित किया।
पता नहीं BBC को कश्‍मीर पर ऐसी रिपोर्ट प्रकाशित करने की क्‍या जल्‍दी थी जिसके साथ उसे स्‍वयं यह स्‍वीकार करना पड़ा कि उसके अथवा कथित पीड़ितों के आरोपों की सत्‍यता संदिग्‍ध है।
अब सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी ने भी BBC की एक रिपोर्ट पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी है और इस तरह के आरोपों का खंडन किया है।
बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता नलिन कोहली ने अपनी पार्टी की ओर कहा कि “सबसे पहले, मैंने रिपोर्ट देखी नहीं है, मैंने इसके बारे में इंटरनेट पर पढ़ा है।
रिपोर्ट ख़ुद कहती है कि इन दावों की पुष्टि नहीं हो सकी है इसलिए इस पर अभी यकीन कर लेना मुश्किल है।”
हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि अगर ऐसी कोई घटना होती है तो भारत में एक मज़बूत न्यायिक व्यवस्था है और अगर मामला सही हो तो सेना से जुड़े लोगों को भी सज़ाएं हुई हैं।
BBC का यह भी कहना है कि उसने इन आरोपों के बारे में सेना से भी पूछा था। जिसके जवाब में सेना ने कहा कि उसने किसी भी नागरिक के साथ मारपीट नहीं की।
सेना के प्रवक्ता कर्नल अमन आनंद ने कहा था कि ऐसा कोई आरोप उनके संज्ञान में नहीं आया है। उनके मुताबिक, “संभव है कि ये आरोप विरोधी तत्वों की ओर से प्रेरित हों।”
बीजेपी प्रवक्ता नलिन कोहली का भी कुछ ऐसा ही कहना है। उन्होंने कहा कि ये असामान्य नहीं है कि कई बार किसी राजनीतिक दबाव में कई वजह से लोग सुरक्षाबलों के ख़िलाफ़ इस तरह के झूठे दावे करते हैं।
इस पर जब उनसे पूछा गया कि क्या ये आरोप मनगढ़ंत हो सकते हैं? तो उन्होंने कहा कि हां, ये मुमकिन है।
नलिन कोहली ने कहा, “क्योंकि आज जब हम बात कर रहे हैं, ये ख़बर कहीं आई नहीं है।
इसके उलट ये खबर जरूर है कि जम्मू-कश्मीर में अलगाववादियों और आतंकवादियों ने एक दुकानदार की हत्या कर दी क्योंकि उसने कर्फ़्यू हटने के बाद अपनी दुकान खोली थी। दो दिन पहले दो लोगों की निर्मम हत्या कर दी गई और वे लोग मुस्लिम मुस्‍लिम गुज्‍जर (बंजारा) समुदाय से हैं।
इन हरकतों से साफ जाहिर होता है कि सुरक्षबलों पर प्रताड़ना का आरोप वे लोग लगा रहे हैं जो दिखाना चाहते हैं कश्मीर में हालात सामान्य नहीं हो सकते।”
BBC ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया था कि उनके रिपोर्टर समीर हाशमी दक्षिण कश्मीर के जिन गांवों में गए थे वहां लोगों ने रात में छापेमारी, पिटाई और टॉर्चर की एक जैसी दास्तान सुनाईं।
यहां यह जान लेना जरूरी है कि ये वही इलाके हैं जो पिछले कुछ वर्षों में भारत विरोधी चरमपंथ के गढ़ बतौर उभरे हैं।
नलिन कोहली ने कहा कि एक जिम्‍मेदार पार्टी का प्रवक्‍ता होने के नाते वो BBC की रिपोर्ट पर सवाल उठाना नहीं चाहते लेकिन ये ज़रूर कह सकते हैं कि अभी तक जिनकी पुष्टि नहीं हो सकी, उन पर कितना भरोसा किया जाए।
कोहली का मानना है कि ये आरोप पाकिस्तान प्रायोजित चरमपंथ और अलगाववाद से प्रेरित हो सकते हैं।
इस सबके बावजूद जांच 
नलिन कोहली ने कहा कि अगर BBC के रिपोर्टर ने इसे सही जगह और संबंधित लोगों के साथ साझा किया है तो वहां इसे जरूर देखा जाएगा।
लगभग यही बात BBC को भेजे बयान में सेना ने भी कही है कि सभी आरोपों की ‘तुरंत जांच’ की जा रही है।
सेना ने ये भी कहा कि वो “एक पेशेवर संगठन है जो मानवाधिकारों को समझता है और उसकी इज़्ज़त करता है।”
कश्मीर में मानवाधिकार हनन को लेकर कई तरह की रिपोर्टें आती रही हैं, जिन्‍हें भारत सरकार ने हर बार ख़ारिज किया है।
‘कश्मीर भारत का आंतरिक मामला’
बहुत से लोग जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को ख़त्म किए जाने के भारत सरकार के फ़ैसले की आलोचना कर रहे हैं। हालांकि भारत सरकार लगातार इसे अपना आतंरिक मामला बताते हुए आलोचनाओं को ख़ारिज कर रही है।
नलिन कोहली ने भी दोहराया कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और अनुच्छेद 370 एक अस्थाई प्रावधान था। वो कहते हैं कि इसकी वजह से इलाके में अलगाववाद पनपा और सीमा पार आतंकवाद ने इसे एक संघर्ष वाला इलाका दिखाने की कोशिश की, जबकि असल में ऐसा नहीं है।
नलिन कोहली ने कहा कि अनुच्छेद 370 ने लद्दाख एवं जम्मू- दो बड़े हिस्सों को नज़रअंदाज़ किया और कश्मीर घाटी के लोगों को भी इसकी वजह से काफ़ी कुछ सहना पड़ा। लोग चरमपंथियों द्वारा और चरमपंथ से जुड़ी घटनाओं में मारे गए इसलिए नरेंद्र मोदी सरकार ने इस अनुच्छेद को हटाने का फ़ैसला किया।
आतंकवाद से तंग आ चुके हैं कश्‍मीर के भी लोग
ये भी कहा जा रहा है कि सरकार की कार्यवाही से इलाके के लोगों में आतंकवाद की भावना बढ़ेगी लेकिन बीजेपी के प्रवक्ता का कहना है कि इलाके में ऐसे भी बहुत से लोग हैं जो बंदूक के साए और आतंकवाद के ख़तरे के बीच जीकर तंग आ चुके थे।
नलिन कोहली ने उदाहरण दिया कि, “भारतीय सेना जब अपनी भर्ती करती है तो मुस्लिम बहुल कश्मीर से हज़ारों युवक उसमें हिस्सा लेते हैं। लेकिन जब वो सेना में शामिल हो जाते हैं तो आतंकवादी उन्हें ही उठा लेते हैं और उनकी हत्या कर देते हैं, जैसा औरंगज़ेब के मामले में देखा गया। लेकिन उनकी हत्या के बाद उनके दो भाई भी सेना में शामिल हो गए।”
हिरासत में लिए गए लोगों की संख्‍या भी बढ़ा-चढ़ाकर बताई 
कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद वहां कथित रूप से नेताओं, कारोबारियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं समेत 3,000 लोगों को हिरासत में लिए जाने की ख़बरें आईं।
नलिन कहोली कहते हैं कि एहतियातन हिरासत में लिए गए लोगों से जुड़ी खबरें तथ्यात्मक रूप से ग़लत हैं। उनका कहना है कि हिरासत में लिए गए लोगों की संख्या इससे बहुत कम है।
उन्होंने कहा, “शुरुआत में 600 से 700 लोगों को हिरासत में लिया गया था, अब ये संख्या 300 है. ये बात ग़लत है कि हज़ारों लोगों को हिरासत में लिया गया है।”
“इन घटनाओं से साबित होता है कि लोग विकास चाहते हैं, जिससे उन्हें महरूम रखा गया। वो बंदूक के साए में जीकर तंग आ चुके हैं इसलिए मौजूदा सरकार ने फ़ैसला लिया कि जम्मू और कश्मीर का स्टेटस बदलकर इन्हें केंद्र शासित प्रदेश बनाने से सरकार वहां विकास कर पाएगी, रोज़गार सृजन कर पाएगी.”
क्‍या था BBC की रिपोर्ट में 
BBC ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था- संवैधानिक स्वायत्तता ख़त्म करने के सरकार के फ़ैसले के बाद कश्मीर में तैनात सुरक्षाबलों पर पिटाई और प्रताड़ना के आरोप लग रहे हैं.
कई गाँव वालों ने BBC को बताया है कि उन्हें डंडों और केबल से पीटा गया और बिजली के झटके दिए गए.
BBC रिपोर्टर समीर हाशमी ने दावा किया कि कई गांव वालों ने मुझे अपने घाव दिखाए लेकिन BBC इन आरोपों की पुष्टि अधिकारियों से नहीं कर पाया.
भारतीय सेना ने इन आरोपों को ‘आधारहीन और अप्रमाणित’ बताया है.
अभूतपूर्व पाबंदियों के चलते कश्मीर बीते तीन हफ़्ते से भी ज़्यादा समय से ‘बंद’ की स्थिति में है. पाँच अगस्त को जबसे अनुच्छेद 370 के तहत इस इलाक़े के विशेष दर्ज़े को ख़त्म किया गया है, सूचनाएं बहुत कम आ रही हैं.
इस इलाक़े में दसियों हज़ार अतिरिक्त सुरक्षा बलों को तैनात किया गया है और कथित रूप से सियासी नेताओं, कारोबारी लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं समेत 3000 लोगों को हिरासत में लिए जाने की ख़बरें हैं. कई लोगों को राज्य के बाहर की जेलों में भेजा गया है.
प्रशासन का कहना है कि ये कार्यवाहियां एहतियात के तौर पर और इलाक़े में क़ानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए की गई हैं. जम्मू-कश्मीर मुस्लिम बहुल राज्य है लेकिन अब इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बाँट दिया गया है.
तीन दशक से भी अधिक समय से भारतीय सेना यहां अलगाववादियों से लड़ रही है. भारत पाकिस्तान पर आरोप लगाता है कि वो इलाक़े में चरमपंथियों का समर्थन करके हिंसा को भड़काता है. वहीं पड़ोसी देश पाकिस्तान इन आरोपों से इंकार करता रहा है.
पाकिस्तान का कश्मीर के एक हिस्से पर नियंत्रण है.
पूरे भारत में कई लोगों ने अनुच्छेद 370 को हटाए जाने का स्वागत किया है और इस ‘साहसिक’ फ़ैसले के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ़ की है. इस क़दम को मुख्यधारा के मीडिया में भी व्यापक समर्थन मिला है.
BBC ने इस रिपोर्ट के साथ यह चेतावनी भी लिखी: नीचे दिए गए ब्यौरे कुछ पाठकों को व्यथित कर सकते हैं
मैंने उन दक्षिणी ज़िलों के कम से कम आधा दर्जन गाँवों का दौरा किया, जो पिछले कुछ साल में भारत विरोधी चरमपंथ के गढ़ के रूप में उभरे हैं.
यहां मैंने कई लोगों से रात में छापेमारी, पिटाई और टॉर्चर की एक जैसी दास्तान सुनी.
डॉक्टर और स्वास्थ्य अधिकारी पत्रकारों से किसी भी मरीज़ के बारे में बात करने से बचते हैं चाहे कोई भी बीमारी हो, लेकिन गाँव वालों ने मुझे वो ज़ख़्म दिखाए, जो कथित तौर पर सुरक्षाबलों की पिटाई से हुए थे.
एक गाँव में लोगों ने बताया कि इस फ़ैसले से दिल्ली और कश्मीर के बीच दशकों पुरानी व्यवस्था ख़त्म हो गई, उसके कुछ घंटों बाद ही सेना घर-घर गई थी.
दो भाइयों ने आरोप लगाया कि उन्हें जगाया गया और उन्हें बाहर ले जाया गया जहां गांव के क़रीब एक दर्जन पुरुष इकट्ठा थे.
मुझसे मिलने वाले बाक़ी लोगों की तरह ही वे भी कार्यवाही के डर से अपनी पहचान नहीं बता रहे थे.
उनमें एक ने कहा, “उन्होंने हमारी पिटाई की. हम उनसे पूछ रहे थे कि हमने क्या किया है. आप गाँव वालों से पूछ सकते हैं, अगर हम झूठ बोल रहे हैं या हमने कुछ ग़लत किया है तो. लेकिन वो कुछ भी सुनने को राज़ी नहीं थे, उन्होंने कुछ नहीं कहा, वो केवल हमें पीटते रहे.”
“उन्होंने हमारे शरीर के हर हिस्से पर मारा. हमें लात मारी, डंडों से पीटा, बिजली के झटके दिए, केबल से हमें पीटा. हमें पैरों के पीछे मारा. जब हम बेहोश हो गए तो उन्होंने होश में लाने के लिए बिजली के झटके दिए. जब उन्होंने हमें डंडों से पीटा और हम चीख उठे तो उन्होंने हमारा मुंह कीचड़ से भर दिया.”
“हमने उन्हें बताया कि हम निर्दोष हैं. हमने पूछा कि वो ऐसा क्यों कर रहे हैं? लेकिन उन्होंने हमारी एक न सुनी. मैंने उनसे कहा कि हमें पीटो मत, हमें गोली मार दो. मैं ख़ुदा से मना रहा था कि वो हमें अपने पास बुला ले क्योंकि प्रताड़ना असहनीय थी.”
एक अन्य ग्रामीण युवक ने बताया कि सुरक्षा बल उससे लगातार यही पूछ रहे थे कि “पत्थरबाजों के नाम बताओ”, वे अधिकांश युवाओं और किशोर लड़कों का हवाला दे रहे थे, जो पिछले दशक में कश्मीर घाटी में नागरिक प्रदर्शनों का चेहरा बन चुके हैं.
उन्होंने कहा कि वो किसी को नहीं जानते, इसके बाद उन्होंने चश्मा, कपड़े और जूते निकालने को कहा.
“जब मैंने अपने कपड़े उतार दिए तो उन्होंने बेदर्दी से मुझे रॉड और डंडों से क़रीब दो घंटे तक पीटा. जब मैं बेहोश हो जाता तो वो मुझे होश में लाने के लिए बिजली के झटके देते.”
उन्होंने बताया, “अगर उन्होंने मेरे साथ फिर ऐसा किया तो मैं कुछ भी कर गुजरूंगा, मैं बंदूक उठा लूंगा. मैं हर रोज़ ये बर्दाश्त नहीं कर सकता.”
युवक ने बताया, ”सैनिकों ने मुझसे कहा कि मैं अपने गाँव में हर-एक को चेता दूं कि अगर किसी ने भी सुरक्षाबलों के ख़िलाफ़ किसी भी प्रदर्शन में हिस्सा लिया तो उन्हें ऐसे ही नतीजे भुगतने पड़ेंगे.”
सभी गाँवों में हमने जितने लोगों से बात की उन सभी का मानना था कि सुरक्षाबलों ने ऐसा गाँव वालों को डराने के लिए किया था ताकि वो प्रदर्शन करने को लेकर डर जाएं.
सेना ने बाकायदा दिया BBC को जवाब 
BBC को भेजे जवाब में भारतीय सेना ने कहा है कि “जैसा आरोप है, उसने किसी भी नागरिक के साथ मारपीट नहीं की।”
सेना के प्रवक्ता कर्नल अमन आनंद ने कहा, “इस किस्म के कोई विशेष आरोप हमारे संज्ञान में नहीं लाए गए हैं। संभव है कि ये आरोप विरोधी तत्वों की ओर से प्रेरित हों।”
उन्होंने कहा, “नागरिकों को बचाने के लिए क़दम उठाए गए थे लेकिन सेना की ओर से की गई कार्यवाही के कारण कोई घायल या हताहत नहीं हुआ है।”
खुद समीर हाशमी लिखते हैं कि हम ऐसे कई गाँवों में गए जहां अधिकांश निवासियों में अलगाववादी और आतंकवादी समूहों के प्रति सहानुभूति थी और उन्होंने उन्हें ‘स्वतंत्रता सेनानी’ बताया।
कश्मीर के इसी इलाक़े में पुलवामा ज़िला है जहां फ़रवरी में हुए एक आत्मघाती हमले में 40 से अधिक भारतीय सैनिक मारे गए थे और इसकी वजह से भारत और पाकिस्तान युद्ध की कगार पर पहुंच गए थे।
ये वही इलाक़ा है जहां कश्मीरी चरमपंथी बुरहान वानी साल 2016 में मारा गया था, जिसके बाद बहुत सारे युवा और आक्रोशित कश्मीरी भारत के ख़िलाफ़ हथियारबंद बग़ावत में शामिल हुए थे.
इस इलाक़े में सेना का एक कैंप है और चरमपंथियों और समर्थकों को पकड़ने के लिए सैनिक नियमित रूप से तलाशी अभियान चलाते हैं लेकिन गाँव वालों का कहना है कि वो दोनों तरफ़ की कार्यवाहियों के बीच अक्सर फँस जाते हैं.
समीर हाशमी के अनुसार एक गाँव में, मैं एक नौजवान से मिला जिसने बताया कि सेना ने उसे धमकी दी थी कि अगर वो चरमपंथियों के ख़िलाफ़ इन्फ़ार्मर नहीं बनता तो उन्हें फंसा दिया जाएगा. उसका आरोप है कि जब उसने इंकार किया तो उनकी इस क़दर पिटाई की गई कि दो हफ़्ते तक वो पीठ के बल सो नहीं सका.
BBC ने अपनी रिपोर्ट में ये भी लिखा 
उन्होंने कहा, “अगर ये जारी रहा तो मेरे सामने अपना घर छोड़ने के अलावा और कोई चारा नहीं बचेगा. वे हमें ऐसे पीटते हैं जैसे हम जानवर हों. वे हमें इंसान नहीं मानते हैं.”
एक अन्य आदमी ने मुझे अपने जख़्म दिखाए और कहा कि उन्हें ज़मीन पर गिरा दिया गया और “15-16 सैनिकों” ने “केबल, बंदूकों, डंडों और शायद लोहे के रॉड” से बुरी तरह पीटा.
“मैं बेहोशी की हालत में पहुंच गया था. उन्होंने मेरी दाढ़ी इतनी ज़ोर से खींची कि मुझे लगा कि मेरे दांत बाहर निकल आएंगे.”
उसने बताया कि इस मारपीट के दौरान मौजूद रहे एक बच्चे ने बाद में उसे बताया कि एक सैनिक ने उनकी दाढ़ी जलाने की कोशिश की लेकिन उन्हें एक दूसरे सैनिक ने रोक दिया.
एक और गांव में मैं एक अन्य नौजवान से मिला जिसने बताया कि दो साल पहले उसका भाई हिज़्बुल मुजाहिदीन में शामिल हो गया था, जो कश्मीर में लड़ने वाले बड़े ग्रुपों में से एक है.
उसने कहा कि हाल ही में एक आर्मी कैंप में उससे पूछताछ की गई. उसका आरोप है कि वहां उन्हें प्रताड़ित किया गया और उसका एक पैर टूट गया.
उसने बताया, “उन्होंने मेरे हाथ और पैरों को बांध दिया और उल्टा लटका दिया. दो घंटे से भी अधिक समय तक उन्होंने मेरी बुरी तरह पिटाई की.”
ये फेक न्‍यूज़ नहीं तो और क्‍या है
BBC की इस पूरी रिपोर्ट पर गौर करें तो बहुत असानी से समझा जा सकता है कि रिपोर्टर पूर्वाग्रह से ग्रसित है और बार-बार अपनी ही रिपोर्ट को संदेह के घेरे में खड़ा कर रहा है.
वह बार-बार लिखता है कि BBC इन आरोपों की पुष्टि अधिकारियों से नहीं कर पाया.
रिपोर्टर यह भी लिखता है कि वो बुरहान वानी के गांव में था जहां उसकी मौत के बाद तमाम युवक भारत के ख़िलाफ़ हथियारबंद बग़ावत में शामिल हुए थे.
संयुक्‍त राष्‍ट्र में भी ब्रिटेन ने किया था पाकिस्‍तान का सहयोग
यहां यह जान लेना भी बहुत जरूरी है कि संयुक्‍त राष्‍ट्र में बीते दिनों जब कश्‍मीर मुद्दे को लेकर चीन की पहल पर एक बंद कमरे में चर्चा की गई थी तब चीन के अतिरिक्‍त ब्रिटेन ही ऐसा दूसरा देश था जिसने भारत को कठघरे में खड़ा करने की असफल कोशिश की.
भारत विरोधी मुहिम का हिस्‍सा है BBC
5 अगस्‍त जिस दिन मोदी सरकार ने कश्‍मीर से अनुच्‍छेद 370 हटाने का ऐलान किया, तब से लेकर अब तक BBC में कश्‍मीर पर जितनी खबरें प्रकाशित हुई हैं, उन्‍हें पढ़ने के बाद कोई भी आसानी से यह पता लगा सकता है कि भारत विरोधी मुहिम का हिमायती ब्रिटिश ब्रॉडकास्टिंग कॉर्पोंरेशन BBC लगातार उन्‍हीं खबरों को प्राथमिकता दे रहा है जनसे कश्‍मीर का घिनौना चेहरा सामने लाया जा सके.
आश्‍चर्य की बात यह है कि विश्‍व का एक बड़ा मीडिया हाउस कश्‍मीर पर अपनी रिर्पार्ट के साथ यह लिखने में कतई लज्‍जा महसूस नहीं करता कि वह अपने आरोपों में पुष्‍टि नहीं कर सकता क्‍योंकि वह किसी अधिकारी से बात नहीं कर सका।
इससे भी बड़े आश्‍चर्य का विषय यह है कि जिन आरोपों की पुष्‍टि खुद BBC रिपोर्टर नहीं कर पाया, उन्‍हीं आरोपों के साथ वह लंबी-चौड़ी रिपार्ट बड़ी बेशर्मी से प्रकाशित कर रहा है।
देखा जाए तो भारत सरकार को BBC के खिलाफ भी उसी तरह कुछ कठोर कदम उठाने चाहिए जिस तरह उसने फेसबुक व टि्वटर जैसे सोशल मीडिया के खिलाफ उठाए थे और कश्‍मीर को लेकर अफवाह फैलाने वालों को बेनकाब किया था।
-Legend News

शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

योगी कभी मोदी नहीं हो सकते, जानिए क्‍यों…

जब से गोरखनाथ पीठ के महंत योगी आदित्‍यनाथ उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री बने हैं, लगभग तभी से अक्‍सर उनकी तुलना प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी से की जाती रही है। मोदी-योगी का नाम लोग कुछ इस अंदाज में लेते हैं जैसे किन्‍हीं सफल संगीतकारों की जोड़ी का नाम साथ-साथ लिया जाता है।
ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्‍या योगी कभी मोदी के स्‍वाभाविक उत्तराधिकारी हो सकते हैं, क्‍या योगी कभी मोदी हो सकते हैं ?
यूपी में महंत योगी आदित्‍यनाथ की सरकार अगले महीने अपने कार्यकाल का आधा समय बिता लेगी।
नि:संदेह व्‍यक्‍तिगत रूप से योगी जी की कार्य के प्रति निष्‍ठा, समर्पण और ईमानदारी पर कोई प्रश्‍नचिन्‍ह नहीं लगा सकता परंतु उनकी कैबिनेट के कई मंत्रियों की न सिर्फ सत्‍यनिष्‍ठा संदेह के घेरे में है बल्‍कि उनकी ईमानदारी पर भी सवालिया निशान लग चुके हैं।
योगी कैबिनेट के विस्‍तार से ठीक पहले कई मंत्रियों का इस्‍तीफा इस ओर इशारा भी करता है, हालांकि वजहें दूसरी भी बताई जा रही हैं।
बहरहाल, वजह चाहे जो हों परंतु इसमें कोई दोराय नहीं कि लाख प्रयासों के बावजूद योगी सरकार प्रदेश की कानून-व्‍यवस्‍था में ऐसा कोई उल्‍लेखनीय सुधार नहीं ला पाई जिससे लोग बेखौफ हुए हों।
दावे-प्रतिदावों की बात न की जाए तो संभवत: योगी आदित्‍यनाथ भी इस सच्‍चाई से अवगत हैं कि प्रदेश की कानून-व्‍यवस्‍था पूरी तरह पटरी पर नहीं आ सकी है। सीएम योगी द्वारा नौकरशाहों को बार-बार चेतावनी देने और पूर्ववर्ती सरकारों की तरह लगातार ट्रांसफर-पोस्‍टिंग किए जाने से स्‍थिति स्‍पष्‍ट हो जाती है।
तो क्‍या योगी आदित्‍यनाथ भी उसी रटे-रटाए ढर्रे पर चल पड़े हैं, जिन पर चलकर मुलायम, माया एवं अखिलेश की सरकारें चला करती थीं और सुशासन कायम करने में नाकाम रहने के कारण सिर्फ तबादलों से तब्‍दीली का अहसास कराने की कोशिश करती रहती थीं।
गौर से देखें तो हाल ही में किए गए तबादले कुछ इसी तरह के संकेत दे रहे हैं।
03 अगस्‍त की रात योगी सरकार ने बुलंदशहर के SSP एन कोलांची को थानेदारों की तैनाती में अनियमितता बररतने पर निलंबित कर दिया। अपर मुख्य सचिव गृह अवनीश अवस्थी ने बताया कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा कानून-व्यवस्था की समीक्षा के दौरान थानेदारों की तैनाती में अनियमितता की बात सामने आई थी।
गोपनीय जांच के दौरान पाया गया कि बुलंदशहर में दो थाने ऐसे थे जहां एसएसपी एन. कोलांची ने थानेदारों को सात दिन से भी कम समय के लिए तैनाती दी। एक थाना ऐसा था जिस पर मात्र 33 दिन में थानेदार को बदल दिया गया। यह डीजीपी की निर्धारित प्रक्रिया के विपरीत था।
इतना ही नहीं, कोलांची ने दो ऐसे थानेदारों को बतौर प्रभारी तैनात कर दिया जिनको पूर्व में परिनिंदा प्रविष्टि दी जा चुकी थी।
अपर मुख्‍य सचिव ने अपनी बात चाहे जितनी चाशनी में लपेट कर रखी हो परंतु इसका निष्‍कर्ष यही निकलता है कि एन. कोलांची रिश्‍वत लेकर थानों का चार्ज बांट रहे थे।
आईपीएस अधिकारी एन. कोलांची की ऐसी कार्यप्रणाली इससे पहले क्‍या योगी सरकार के संज्ञान में नहीं रही होगी, और यदि नहीं रही तो क्‍यों नहीं रही?
यह बड़ा सवाल है, क्‍योंकि कोई अधिकारी रातों-रात भ्रष्‍ट नहीं हो जाता। भ्रष्‍टाचार के बीज उसके अंदर बहुत पहले अंकुरित हो जाते हैं, बाद में शासन-सत्ता के सहयोग का खाद-पानी ही उन्‍हें इस मुकाम तक पहुंचाता है।
मात्र 10-12 घंटों में 6 हत्‍याएं हो जाने पर 19 अगस्‍त को प्रयागराज (इलाहाबाद) के एसएसपी अतुल शर्मा निलंबित कर दिए गए। अतुल शर्मा की कार्यप्रणाली से स्‍वयं योगी आदित्‍यनाथ असंतुष्‍ट थे और पूर्व में उन्‍हें चेतावनी भी दे चुके थे।
आईपीएस अधिकारी अतुल शर्मा को प्रदेश के डीजीपी ओपी सिंह ने अपनी रिपोर्ट में बाकायदा ‘निकम्‍मा’ अधिकारी घोषित किया है। जाहिर है कि अतुल शर्मा भी एकाएक निकम्‍मे नहीं हो गए होंगे, बावजूद इसके उन्‍हें प्रयागराज जैसे बड़े और महत्‍वपूर्ण जिले का प्रभार कैसे सौंप दिया गया।
अब 2010 बैच के आईपीएस अफसर सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज को प्रयागराज का नया एसएसपी बनाया गया है। बिहार के मूल निवासी सत्यार्थ अनिरुद्ध पंकज की कार्यप्रणाली कैसी है, वो कितने काबिल अफसर हैं, इसकी जानकारी किसी भी उस जनपद से ली जा सकती है जहां वो पूर्व में तैनात रहे हैं। शायद ही वो कभी कहीं अपनी विशेष छाप छोड़ पाए हों, तो फिर अब उन्‍हें प्रयागराज क्‍यों भेज दिया गया।
इससे पहले वह धर्मनगरी मथुरा के एसएसपी थे किंतु मात्र 5 महीनों में उन्‍हें मथुरा से एसटीएफ में भेज दिया गया। उनके स्‍थान पर पीएसी से शलभ माथुर को भेजा गया ।
20 अगस्‍त को यानी कल फिर 14 आईपीएस अफसरों का तबादला किया गया है।
03 अगस्‍त से लेकर 20 अगस्‍त तक किए गए ये आईपीएस अधिकारियों के तबादले तो मात्र उदाहरण हैं अन्‍यथा योगीराज आने के बाद कमोबेश यही स्‍थिति न केवल आईपीएस के बल्‍कि आईएएस अधिकारियों के तबादलों में भी रही है।
तो क्‍या मात्र तबादलों से किसी अधिकारी की कार्यक्षमता, योग्‍यता और नेकनीयत बदल जाती है, यदि नहीं तो आखिर सिर्फ तबादले ही क्‍यों ?
यदि कोई अधिकारी काबिल एवं नेकनीयत है तो वह हर जगह अपनी योग्‍यता साबित करेगा, और यदि वह अकर्मण्‍य या भ्रष्‍ट है तो हर जगह विभाग का सिर नीचा करेगा व वर्दी तथा सरकार पर दाग लगवाएगा।
इन हालातों में पूछा जा सकता है कि किसी अधिकारी को योग्‍यता के पैमाने पर खरा उतरने के बाद भी बार-बार तबादले किसलिए झेलने पड़ते हैं और कुछ अधिकारी सार्वजनिक रूप से भ्रष्‍टाचारी एवं नाकाबिल साबित होने के बावजूद लगातार चार्ज पर क्‍यों बने रहते हैं।
अगर कोई अधिकारी काबिल, ईमानदार, कर्तव्‍यनिष्‍ठ एवं सक्षम है तो उसे हटाया क्‍यों जाता है और नाकाबिल, भ्रष्‍ट तथा निकम्‍मे अधिकारी अच्‍छी तैनाती कैसे पा जाते हैं।
यहां यह कहना कतई अप्रासांगिक होगा कि अधिकारियों की शौहरत से कोई निजाम अपरिचित रह सकता है क्‍योंकि यदि ऐसा है तो इसका सीधा मतलब है कि वह स्‍वयं उस पद के योग्‍य नहीं है।
सर्वविदित है कि पुलिस और प्रशासन के ही नहीं, न्‍याय व्‍यवस्‍था के भी अधिकारियों की शौहरत उनके तैनाती स्‍थल पर उनके चार्ज लेने से पहले पहुंच जाती है। यही कारण है कि अधीनस्‍थ अधिकारी तत्‍काल खुद को उनके अनुरूप ढाल लेते हैं और उसी मोड में काम करने लगते हैं।
योगी आदित्‍यनाथ उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने का भरसक प्रयास क्‍यों न कर रहे हों परंतु नतीजे बहुत अधिक उम्‍मीद नहीं जगाते। आंकड़ों की बाजीगरी को उठाकर एक ओर रख दिया जाए तो बिना दूरबीन के देखा जा सकता है कि ब्‍यूरोक्रेसी पर योगी कभी मजबूत पकड़ बना ही नहीं पाए।
इसी प्रकार उनकी कैबिनेट में आज भी कुछ लोग ऐसे हैं जो भ्रष्‍ट, निकम्‍मे और अयोग्‍य अधिकारियों को संरक्षण दिए हुए हैं। ये अधिकारी उनके संरक्षण में आम जनता तो क्‍या, सभ्रांत लोगों के साथ भी अशिष्‍ट व्‍यवहार करने से नहीं चूकते।
मायाराज से लेकर योगीराज तक में इनकी अच्‍छे-अच्‍छे पदों पर तैनाती यह साबित करने के लिए काफी है कि शासन-सत्ता के अंदर इनकी कितनी गहरी पैठ है।
योगीराज की तुलना में यदि मोदीराज को देखें तो नजारा ठीक उलटा दिखाई देगा। मोदी जी ने अपने चारों ओर ऐसे अधिकारियों का सर्किल बना रखा है जो अपनी ड्यूटी के प्रति किसी भी हद तक जाने को तत्‍पर नजर आते हैं।
सरकार का निर्णय कितना ही जोखिमभरा क्‍यों न हो, वह मोदी जी के कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहते हैं और कठिन से कठिन जिम्‍मेदारी का निर्वाह करने में नहीं हिचकते।
कश्‍मीर से अनुच्‍छेद 370 हटाने के बाद की स्‍थितियों में इन अधिकारियों की कर्मठता इसका ज्‍वलंत उदाहरण है।
बेशक योगी आदित्‍यनाथ की मंशा उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने की रही होगी परंतु धरातल पर देखें तो अभी उसके आसार दूर-दूर तक दिखाई नहीं दे रहे।
योगी जी के पास अब सिर्फ ढाई साल का समय शेष है। इसी दौरान उन्‍हें कोई इतनी बड़ी लकीर खींचनी होगी जिससे आमूल-चूल परिवर्तन की राह नजर आती हो। अन्‍यथा मोदी की तरह योगीराज दोहरा पाना असंभव न सही परंतु कठिन जरूर हो जाएगा।
और हां, तुकबंदी के लिए पार्टीजन योगी-मोदी की तुलना भले ही कर लें परंतु तुलनात्‍मक अध्‍ययन करने बैठेंगे तो पता लगेगा कि योगी का मोदी बनना मुमकिन नहीं है क्‍योंकि योगी जी अब तक जनता को वो फील नहीं करा सके हैं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गोवर्धन के मामले में NGT का सख्‍त रवैया बरकरार: DM और SSP को दो दिन में व्यवस्थाएं दुरुस्‍त करने के निर्देश, सीएम के सचिव व मंडलायुक्‍त से जवाब तलब

मथुरा। गोवर्धन परिक्रमा मार्ग की अव्यवस्थाओं को लेकर आज हुई सुनवाई के दौरान नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने मथुरा के प्रशासन को कड़ी फटकार लगाते हुए कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी से पूर्व संपूर्ण व्‍यवस्‍थाएं दुरुस्‍त कराने का आदेश दिया है।
कोर्ट कमिश्नर के अनुसार गिरिराज परिक्रमा मार्ग में अतिक्रमण पर भी न्यायालय ने जिलाधिकारी मथुरा को कड़ी कार्यवाही करने के आदेश दिए हैं।
गौरतलब है कि गोवर्धन परिक्रमा मार्ग में व्याप्त भयंकर गंदगी सहित अन्य सभी व्यवस्थाएं पूरी तरह ध्वस्त हो जाने को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने गंभीरता से लेते हुए जिलाधिकारी मथुरा सर्वज्ञराम मिश्र, एसएसपी मथुरा शलभ माथुर और एसडीएम गोवर्धन नागेन्‍द्र कुमार सिंह को आज की सुनवाई के लिए तलब किया था।
गिरिराज परिक्रमा संरक्षण संस्थान द्वारा दाखिल याचिका पर आज की सुनवाई के दौरान NGT की पीठ के न्यायाधीश रघुवेन्द्र सिंह राठौड़ व सत्यवान सिंह गब्र्याल ने मथुरा जिला प्रशासन को कड़ी फटकार लगाते हुए जिलाधिकारी सर्वज्ञराम मिश्र से कहा, कोर्ट कमिश्नर की रिपोर्ट से साफ जाहिर है कि मुड़िया पुर्णिमा मेले में साफ सफाई की व्यवस्था सब ज्यादा खराब थी।
न्यायालय में याचिकाकर्ता आनंद गोपाल दास, सत्य प्रकाश मंगल की और से मौजूद वरिष्ठ अधिवक्ता व पर्यावरण विद एम सी मेहता और सार्थक चतुर्वेदी सहित कात्यायनी ने पीठ को बताया कि कल रात तक भी साफ-सफाई की कोई व्यवस्था नहीं थी। उन्‍होंने ठीक एक दिन पुराने छाया चित्र दिखाकर न्यायालय को अवगत कराया कि परिक्रमा मार्ग में साफ-सफाई की अब तक कोई उचित व्यवस्था नहीं की गई है।
इस पर उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से मौजूद वरिष्ठ अधिवक्ता पिंकी आंनद ने कहा कि सफाई व्यवस्था बनाए रखने के लिये भंडारे व डी जे बंद करवा दिए गए हैं। पिंकी आंनद की इस सफाई पर न्यायालय ने उन्‍हें कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि वह जिला अधिकारी को बचाने का प्रयास ना करें। न्‍यायालय ने वहीं मौजूद डीपीआरओ को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि आपको शर्म आनी चाहिए, आप ही की वजह से सब व्यवस्था खराब हुई है, जिसे कि जिला अधिकारी भी बचाने का प्रयास कर रहे हैं।
न्यायालय ने एसडीएम गोवर्धन नागेन्‍द्र कुमार सिंह को भी कड़ी फटकार लगाते हुए पूछा कि भंडारे की परमीशन किस प्रावधान के अंतर्गत दी जा रही है और उनको देते वक्त किन-किन नियमों एवं शर्तों का ध्यान रखा गया है। कोर्ट ने एसडीएम से जब यह पूछा कि पिछली बार कितने भंडारे लगे थे, उनकी सूची है तो वह ऐसी कोई सूची उपलब्‍ध नहीं करा सके। सूची रजिस्टर ना लाने के लिए भी कोर्ट ने एसडीएम को कड़ी फटकार लगाते हुए अगली तारीख पर सभी दस्तावेजों के साथ उपस्थित रहने का आदेश दिया।
इसके अलावा न्यायालय ने जिलाधिकारी मथुरा को दो दिन के अंदर सभी व्यवस्थाएं दुरुस्त करने को कहा है तथा कृष्‍ण जन्म अष्टमी से पूर्व साफ-सफाई पर विशेष ध्यान देने का निर्देश दिया है।
कोर्ट कमिश्नर द्वारा दी गई जानकारी के बाद कोर्ट ने अतिक्रमणकारियों के खिलाफ जिलाधिकारी मथुरा को कड़ी कार्यवाही करने के आदेश दिए।
इसी के साथ वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को न्यायालय ने त्योहार से पूर्व ट्रैफिक व्यवस्था दुरुस्त करने की सख्त हिदायत दी।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता सार्थक चतुर्वेदी ने न्यायालय को अवगत कराया कि गोवर्धन के एक पत्रकार को वहां के एक पुलिस अधिकारी द्वारा इस बात पर धमकाने का प्रयास किया गया कि वो NGT की बहुत खबर लिख रहा है, इस पर न्यायालय ने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक को कड़ी हिदायत देते हुए कहा कि इस तरह की घटना सामने नहीं आनी चाहिए नहीं तो हम कड़ी कार्यवाही करेंगे। न्यायालय ने मामले की अगली तारीख 28 अगस्त तय की है ।
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गोवर्धन की दुर्दशा पर NGT सख्‍त: कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी से पहले तलब किए डीएम, एसएसपी और एसडीएम

गोवर्धन (मथुरा)। गोवर्धन परिक्रमा मार्ग में व्याप्त भयंकर गंदगी सहित अन्य सभी व्यवस्थाएं पूरी तरह ध्वस्त हो जाने को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) ने गंभीरता से लेते हुए जिलाधिकारी मथुरा सर्वज्ञराम मिश्र, एसएसपी मथुरा शलभ माथुर और एसडीएम गोवर्धन नागेन्‍द्र कुमार सिंह को अगली सुनवाई 19 अगस्‍त पर कोर्ट में तलब किया है।
दरअसल, गोवर्धन परिक्रमा संरक्षण संस्थान से जुड़े मामले की आज नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) में तत्काल सुनवाई की गई क्‍योंकि NGT को गोवर्धन की दुर्दशा से प्रसिद्ध पर्यावरणविद और इसी मामले से पूर्व में जुड़े एम सी मेहता ने ई मेल के जरिए अवगत कराया था।
पर्यावरणविद मेहता और इस मामले को देख रहे अधिवक्‍ता सार्थक चतुर्वेदी ने NGT को मथुरा के मीडिया द्वारा की गई समय-समय पर गोवर्धन की बदहाली संबंधी उस रिपोर्टिंग से भी अवगत कराया जिससे जाहिर होता था कि जिला प्रशासन किस कदर इस मामले में लापरवाही बरतते हुए कोर्ट के आदेश-निर्देशों की खुली अवहेलना कर रहा है। गोवर्धन में सभी व्‍यवस्‍थाएं ध्‍वस्‍त हो चुकी हैं जिससे कि वहां के पर्यावरण को भारी नुकसान हो रहा है।
उल्‍लेखनीय है कि पूर्व में इस मामले को पर्यावरणविद एम सी मेहता ही देख रहे थे।
पर्यावरणविद एम सी मेहता की तरफ से मौजूद महक रस्तोगी ने न्यायालय को अवगत कराया, क्योंकि एम सी मेहता न्यायालय में उपस्थित नहीं हो सके इसलिए उन्होंने ई मेल द्वारा इस मामले से जुड़ी ताजा जानकारी न्यायालय को भेजी है तथा न्यायालय से अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही की मांग भी की है ।
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अधिवक्ता पिंकी आनंद को जब याचिकाकर्ता आनंद गोपाल दास व सत्य प्रकाश मंगल के अधिवक्ता सार्थक चतुर्वेदी ने सभी प्रमुख अखबारों की प्रति और अन्‍य मीडिया में प्रसारित खबरों की जानकारी दी तो अधिवक्ता पिंकी आनंद ने कोर्ट से कहा कि मीडिया में तो कुछ भी आ जाता है।
अधिवक्ता पिंकी आनंद की इस दलील पर न्यायाधीश राघवेन्द्र सिंह राठौर ने उन्‍हें कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि फिर क्यों ना वहां की स्थिति आप खुद जाकर देखें। न्यायालय ने इस मामले पर संज्ञान लेते हुए कहा, चूंकि 23 तारीख की जन्माष्टमी है और गोवर्धन में अव्यवस्थाओं का अंबार लगा है इसलिये जिला अधिकारी मथुरा, वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक मथुरा व एसडीम गोवर्धन को 19 अगस्त के लिये तलब किया जाता है। मामले की अगली सुनवाई अब 19 अगस्त को होगी।
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बुधवार, 7 अगस्त 2019

ये हैं रमाकांत गोस्‍वामी…नाम तो सुना ही होगा, अब कारनामे भी सुन लीजिए…

जब न्‍यायिक व्‍यवस्‍था, प्रशासनिक अव्‍यवस्‍था और धार्मिक संस्‍थाओं की कुव्‍यवस्‍थाओं से उपजा कॉकस (Caucus) कोई दुरभि संधि करता है तब रमाकांत गोस्‍वामी जैसे लोग सुर्खियों में आते हैं।
चूंकि इनका उदय ही किसी दुरभि संधि के तहत होता है इसलिए आसानी से इनका बाल बांका नहीं हो पाता।
यही कारण है कि गोवर्धन स्‍थित मुकुट मुखारबिंद मंदिर में करोड़ों रुपए की हेराफेरी करने का आरोप होने बावजूद रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी खुली हवा में सांस ले रहे हैं और यथासंभव सबूतों से भी छेड़छाड़ कर रहे हैं।
रमाकांत गोस्‍वामी के कारनामों की जानकारी देने के लिए 13 मई 2018 को इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन नामक एनजीओ ने बाकायदा एक प्रेस कांफ्रेंस करके बताया कि अपर सिविल जज प्रथम मथुरा के आदेश से गोवर्धन स्‍थित मुकुट मुखारबिंद मंदिर के रिसीवर नियुक्‍त किए गए रमाकांत गोस्‍वामी ने अपने अधिकारों का दुरुपयोग कर करोड़ों रुपए की संपत्ति हड़पी है।
एनजीओ के चेयरमैन रजत नारायण के अनुसार रमाकांत गोस्‍वामी का कारनामा ठीक उसी तरह का है जिस तरह का कारनामा करने पर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा आज तमाम जांच एजेंसियों के चक्‍कर काट रहे हैं।
इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्‍ति में बताया गया कि वर्ष 2010 में रमाकांत गोस्‍वामी ने न्‍यायालय के समक्ष इस आशय का एक प्रस्‍ताव रखा कि मुकुट मुखारबिंद मंदिर का प्रबंधतंत्र मंदिर के पैसों से एक अस्‍पताल बनवाना चाहता है।
रमाकांत गोस्‍वामी का यह प्रस्‍ताव न्‍यायालय के पीठासीन अधिकारी को इतना पसंद आया कि उन्‍होंने न सिर्फ मंदिर के पैसों से अस्‍पताल बनवाने का प्रस्‍ताव स्‍वीकार कर लिया बल्‍कि रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी को ही उसके लिए आवश्‍यक जमीन खरीदने के अधिकार भी सौंप दिए।
रमाकांत गोस्‍वामी यही तो चाहते थे इसलिए उन्‍होंने तत्‍काल एक जमीन का इकरार नामा पहले तो अपने खास मित्रों के नाम मात्र 40 लाख रुपयों में करवाया और फिर मात्र 4 महीने बाद उसी जमीन को उसके असली मालिक से 2 करोड़ 30 लाख रुपए में मंदिर के नाम खरीद लिया।
कारनामे को अंजाम तक पहुंचाने के लिए रमाकांत गोस्‍वामी ने अपने मित्रों को द्वितीय पक्ष दिखा दिया जबकि जमीन के असली मालिक को प्रथम पक्ष बताया।
इस तरह सिर्फ चार महीने के अंतराल में मंदिर को बड़ी चालाकी के साथ करीब एक करोड़ 90 लाख रुपए का चूना लगा दिया गया।
रमाकांत गोस्‍वामी यहीं नहीं रुके, इसके बाद उन्‍होंने मंदिर को विस्‍तार देने की आड़ में 5 अगस्‍त 2011 को अपने मित्रों से ‘खास महल’ नामक एक संपत्ति 2 करोड़ 70 लाख रुपयों में खरीदी।
वर्ष 2011 में अपनी साजिश सफल हो जाने पर रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी के हौसले बुलंद हो गए अत: उन्‍होंने वर्ष 2014-15 में फिर मंदिर की ढाई करोड़ रुपयों से अधिक की धनराशि का गबन किया।
इसी प्रकार वर्ष 2015-16 में पौने चार करोड़ का, 16-17 में पौने छ: करोड़ रुपयों का घोटाला किया गया।
इतना सब हो जाने पर भी कोई कार्यवाही होते न देख इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन ने 05 जून 2018 को तहसील दिवस में एक शिकायती पत्र दिया, जिसके बाद जिलाधिकारी ने समस्‍त प्रकरण की जांच एसडीएम गोवर्धन के हवाले कर दी।
इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन के अध्‍यक्ष ने बताया कि उसके बाद से लेकर अब तक वह इस संबंध में डीएम मथुरा को सात पत्र और लिख चुके हैं किंतु फिलहाल कोई नतीजा सामने नहीं आया।
हां, इतना जरूर हुआ कि एनजीओ के अध्‍यक्ष रजत नारायण ने गत दो दिन पूर्व जब डीएम से मुलाकात की तो उन्‍होंने रजत नारायण को अवगत कराया कि एनजीओ द्वारा रमाकांत गोस्‍वामी पर लगाए गए सभी आरोप एसडीएम की जांच में प्रथम दृष्‍टया सही पाये गए हैं।
गौरतलब है कि इन्‍हीं घोटालों की शिकायत इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन ने एनजीटी में भी की थी, जिसके बाद एनजीटी ने एसआईटी का गठन कर जांच कराने के आदेश दिए थे।
एसआईटी की टीम अपनी जांच के संदर्भ में इन दिनों मथुरा आई हुई है और उसने रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी से पूछताछ भी की है।
रमाकांत गोस्‍वामी ने भी एसआईटी द्वारा उनसे की गई पूछताछ की पुष्‍टि करते हुए बताया कि जांच कमेटी ने उनसे कुछ दस्‍वावेजों की भी मांग की है जिन्‍हें वह आज उपलब्‍ध कराने वाले हैं।
इससे पहले दसविसा (गोवर्धन) निवासी राधारमन और प्रभुदयाल शर्मा ने मंदिर के रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी पर ठेकेदारों की मिलीभगत से करोड़ों रुपए की हेराफेरी करने का आरोप लगाया था।
इन आरोपों की जांच भी एसडीएम गोवर्धन नागेन्‍द्र कुमार सिंह द्वारा की गई और उन्‍होंने प्रथम दृष्‍ट्या रिसीवर रमाकांत गोस्‍वामी पर लगाए गए आरोपों को सही पाया।
गुरूपूर्णिमा पर दिया गया विज्ञापन भी चर्चा में 
इस बीच गुरूपूर्णिमा पर रमाकांत गोस्‍वामी द्वारा आगरा से प्रकाशित एक प्रमुख अखबार को मुकुट मुखारबिंद मंदिर के रिसीवर की हैसियत से पूरे पन्‍ने का मुखपृष्‍ठ कलर विज्ञापन देना भी चर्चित है।
उस विज्ञापन की चर्चा के पीछे रमाकांत गोस्‍वामी की हैसियत है। लोग पूछ रहे हैं कि आखिर उस विज्ञापन का भुगतान अखबार को किस मद से किया गया।
बताया जाता है कि मंदिर के लिए निर्धारित न्‍यायिक व्‍यवस्‍था के अनुसार रिसीवर को मात्र 10 हजार रुपए खर्च करने का अधिकार है। इससे ऊपर के सभी खर्चों के लिए न्‍यायालय की इजाजत लेना जरूरी है।
इन हालातों में सवाल यह उठ रहे हैं कि रमाकांत गोस्‍वामी ने रिसीवर की हैसियत से लाखों रुपए का विज्ञापन कैसे छपवा दिया, और उसका भुगतान किस तरह किया।
रमाकांत गोस्‍वामी का इस विषय में कहना है कि उन्‍होंने तो अखबार को विज्ञापन के एवज में मात्र 5 हजार रुपए का भुगतान किया है।
ज्‍यादा पूछने पर वह यह भी कहते हैं कि उनका अपना अखबार पर कुछ बकाया चला आ रहा था।
रमाकांत गोस्‍वामी का अखबार पर कैसा बकाया हो सकता है और उसे अखबार के मालिकान विज्ञापन की धनराशि में क्‍यों एडजस्‍ट करेंगे, यह बात रमाकांत गोस्‍वामी के अलावा शायद ही किसी अन्‍य को हजम होगी।
शायद इसीलिए रमाकांत गोस्‍वामी यह कहकर पल्‍ला झाड़ लेते हैं कि अखबार ने कैसे इतना बड़ा विज्ञापन 5 हजार रुपए में छापा, यह अखबार ही बता सकता है। मैंने तो 05 हजार रुपए का ही भुगतान किया है।
जांच और लूट साथ-साथ जारी 
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे रोचक पहलू यह है कि एक ओर जहां इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन की शिकायत और एनजीटी के आदेश-निर्देशों पर रमाकांत गोस्‍वामी के खिलाफ जांच चल रही है वहीं रमाकांत गोस्‍वामी रिसीवर की हैसियत से न सिर्फ लगातार अधिकारों का अतिक्रमण कर रहे हैं बल्‍कि मंदिर की धनराशि का मनमाना इस्‍तेमाल भी कर रहे हैं जो एक और किसी बड़े घोटाले की साजिश का हिस्‍सा हो सकता है।
हालांकि इंपीरियल पब्‍लिक फाउंडेशन के अध्‍यक्ष रजत नारायण का कहना है कि वह सारे सबूतों के साथ केंद्रीय सतर्कता आयोग भी गए थे किंतु वहां से बताया गया कि उसके द्वारा केवल केंद्रीय कर्मचारियों से जुड़े मामलों का संज्ञान लिया जा सकता है। निजी संस्‍थाओं का संज्ञान वह नहीं ले सकता। इसके बावजूद रजत नारायण निराश नहीं हैं। वो कहते हैं कि हमारी संस्‍था लगातार इस भ्रष्‍टाचार को सक्षम अधिकारियों के समक्ष उठाती रहेगी जिससे रमाकांत को अविलंब हिरासत में लेकर कठोर कार्यवाही की जा सके और जल्‍द से जल्‍द मुकुट मुखारबिंद मंदिर की संपत्ति को लूटने का सिलसिला बंद हो।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बेचारे ‘खिलाड़ी’ को ‘मदारी’ ने “लॉलीपॉप” दिखाकर बना दिया “बड़े वाला”

व्यंग्य: बेचारे मियां बड़ी हसरतों के साथ झोली उठाकर अमेरिका पहुंचे थे। सोच रहे थे कि ”दे दाता के नाम तुझको अल्‍ला रखे” की तर्ज पर उससे फरियाद करेंगे और झोली भरकर लौट आएंगे।
उन्‍हें शायद इस बात का इल्‍म ही नहीं था कि अमेरिका में उनका वास्‍ता सृष्टि के जिस जीव से पड़ने वाला है, वह राष्‍ट्रपति होने से पहले बहुत स्‍याना व्‍यापारी भी है। वह उनकी तरह खिलाड़ी नहीं है, मदारी है।
मदारी ने खिलाड़ी को दूर एक लॉलीपॉप दिखाई, और कहा कि यदि तुम तालिबान को हमसे समझौता वार्ता की टेबल पर ले आओ तो वह लॉलीपॉप तुम्‍हारी। लॉलीपॉप देखकर मियां इमरान के मुंह में पानी आ गया। लार टपकने लगी।
टपकती लार लेकर अपने मुल्‍क वापस लौटे तो बोले, ऐसा लग रहा है जैसे विश्‍वकप जीतकर आया हूं।
इधर जब भारत को पता लगा कि मदारी ने खिलाड़ी को उंगली के इशारे से लॉलीपॉप दिखा दी है तो भारत के मुखिया ने सबसे पहले मदारी को दो टूक समझाया।
कहा, देखो जनाब…प्रथम तो हम अपने पड़ोसी की तरह टाइमपास नेता नहीं हैं। और दूसरे गुजराती हैं। अगर राजनीति को व्‍यापार समझने की भूल कर रहे हो तो भी जान लो कि व्‍यापार हमारे रग-रग में बसा है। जिस लॉलीपॉप को दिखाकर तुम मियां इमरान से सौदेबाजी करने में लगे हो, वैसी लॉलीपॉप तो हम चाट-चाट कर फेंक देते हैं।
इतना कुछ कहने के बाद भी भारत को कुछ मजा नहीं आया। संतुष्‍टि नहीं मिली, तो उसने सोचा कि क्‍यों न खिलाड़ी और मदारी दोनों को एक जोर का झटका दिया जाए।
बताया जाए कि कुल जमा चार सौ साल की उम्र वाले एक देश और मात्र 70-72 साल के एक मुल्‍क की सोच पर हजारों साल पुराना भारत कितना भारी पड़ सकता है।
भारत ने एक झटके में लॉलीपॉप की डंडी तोड़ी और उसे नाली में फेंक दिया। जैसे कह रहा हो कि लो अब उठा सको तो उठा लो। अब दोनों मिलकर कचरे में ढूंढते रहना लॉलीपॉप को लेकिन लॉलीपॉप मिलने से रही क्‍योंकि जब तक तुम उसे ढूंढने नाली में उतरोगे तब तक वह गलकर बराबर हो लेगी।
भारत की इस चाल को न तो खुद को खुदा समझने वाला मदारी समझ पाया और न उसकी उंगली पर नाचने वाला जमूरा। एक झटके में सारी स्‍यानपत निकाल दी भारत ने। ऊपर से इस्‍लामाबाद में पोस्‍टर और लगवा दिया कि अब पीओके को संभाल सको तो संभालो। वैसे वो है तो हमारा ही, इसलिए लेकर भी हम ही रहेंगे।
अब बेचारा मदारी अपनी सफाई देने में लगा है और खिलाड़ी को उसके देश में लानत झेलनी पड़ रही है। लोग खुलेआम कह रहे हैं कि मियां… तुमसे ना हो पाएगा।
तुम तो सरकारी आवास को बारात घर बनाने और कबाड़ बेचकर जुगाड़ करने के ही लायक हो। कबाड़ बेचकर अपना घर भले ही चला लेना, पर देश यूं न चला करता। उसके लिए चाहिए अच्‍छा-खासा दिमाग, दिमाग तुम्‍हारे पास है नहीं। ऐसे में लॉलीपॉप को दूरबीन से देख तो सकते हो, लेकिन उसका स्‍वाद चखने को नहीं मिलना।
खैर, अब तो न ख़ुदा ही मिला न विसाल-ए-सनम। ऊपर से जलते तवे पर तसरीफ का टोकरा भी रखना पड़ रहा है। जब फुरसत मिले तो किसी कोने में जाकर तसरीफ पर पड़े फफोले चैक कर लेना। फिर बताना कि कितने हैं। मरहम हम भेज देंगे। आहिस्‍ता-आहिस्‍ता मलते रहना तब तक, जब तक कि मियां नवाज शरीफ के बग़लगीर न हो जाओ। खुदा खैर करे।
क्‍योंकि तुम्‍हारे ही लोग अब तो तुम्‍हारे मुंह पर थूककर कहने भी लगे हैं कि तुम्‍हें मदारी ने बड़े वाला बना दिया मियां।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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