सोमवार, 24 फ़रवरी 2020

ये हैं डॉक्‍टर गौरव ग्रोवर IPS…नाम तो सुन ही लिया होगा ?

मथुरा। ये हैं डॉक्‍टर गौरव ग्रोवर… युवा IPS गौरव ग्रोवर…नाम तो सुन ही लिया होगा। डॉ. गौरव ग्रोवर को जिन परिस्‍थितियों में इस विश्‍वप्रसिद्ध धार्मिक जनपद के वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक का पदभार सौंपा गया है, न तो वह परिस्‍थितियां सामान्‍य हैं और न उनके पूर्ववर्ती पुलिस कप्‍तान शलभ माथुर का तबादला रूटीन ट्रांसफर-पोस्‍टिंग का हिस्‍सा था।
इन हालातों में गौरव ग्रोवर के सामने पूरे प्रदेश की न सही, लेकिन मथुरा जनपद की ‘खाकी’ पर लगे दागों का सच सामने लाने की चुनौती तो है ही।
एक ऐसी चुनौती जिस पर योगीराज श्रीकृष्‍ण की नगरी के लोगों का भरोसा भी टिका है।
माना कि मथुरा और आगरा से लेकर लखनऊ तक मचे हंगामे के बाद शलभ माथुर को यहां से रवाना कर दिया गया किंतु अभी वो तमाम पुलिस अधिकारी यहीं मौजूद हैं जिनके कारण पूरे महकमे को शर्मिंदगी उठानी पड़ रही है।
इसके अलावा अनेक ऐसे प्रश्‍न भी अपनी जगह खड़े हैं, जिनका उत्तर न मिला तो कानून-व्‍यवस्‍था से लोगों का विश्‍वास पूरी तरह उठ जाएगा।
डॉ. गौरव ग्रोवर कल पहली बार स्‍थानीय ‘मीडिया’ से मुख़ातिब हुए। इस अपनी पहली औपचारिक प्रेस वार्ता में उन्‍होंने जो कुछ कहा, वह सब-कुछ हर अधिकारी कहता है। लेकिन उन्‍होंने वो नहीं कहा, जिसे मथुरा की जनता सुनना चाहती थी। जिसकी उसे अपेक्षा थी।
नवागत वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक ने उस सनसनीखेज वारदात का जिक्र तक नहीं किया, जिसमें मथुरा पुलिस पर न सिर्फ 40 लाख रुपए से अधिक की बड़ी रकम हड़प जाने का आरोप लगा है बल्‍कि चार अपहरणकर्ताओं को बिना कोई कानूनी कार्यवाही किए रिश्‍वत लेकर छोड़ देने का भी संगीन आरोप है।
आईजी ए. सतीश गणेश की जांच के बाद मशहूर ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. निर्विकल्‍प अग्रवाल के अपहरण और उनसे 52 लाख रुपए की फिरौती वसूलने का यह मामला भले ही थाना हाईवे पुलिस ने अपनी ओर से पूरे दो महीने बाद दर्ज कर लिया हो परंतु नतीजा अब तक शून्‍य है।
चारों नामजद बदमाशों के खिलाफ भारी-भरकम इनाम घोषित कर दिए जाने के बावजूद, वह फिलहाल पुलिस की पकड़ से दूर हैं।
विभागीय कार्यवाही के नाम पर हुआ है तो मात्र इतना कि थाना हाईवे के तत्‍कालीन प्रभारी और डॉ. निर्विकल्‍प अपहरण व फिरौती कांड के वादी इंस्‍पेक्‍टर जगदंबा सिंह को निलंबित कर दिया गया और सीओ रिफाइनरी को हटा दिया गया जबकि इस पूरे खेल में कई अन्‍य पुलिस अधिकारियों की भूमिका भी सामने आ चुकी है।
अपहरण और फिरौती के बाबत डॉ. निर्विकल्‍प की स्‍वीकारोक्‍ति के आधार पर लिखी गई एफआईआर बताती है कि पूरा खेल कितनी प्‍लानिंग के साथ किया गया।
इस प्‍लानिंग का पता लगाए बिना सच सामने आना मुश्‍किल होगा क्‍योंकि डॉ. निर्विकल्‍प ने बेशक 52 लाख रुपए की फिरौती देना स्‍वीकार किया है परंतु पुलिस ने कुछ स्‍वीकार नहीं किया।
आईजी की जांच रिपोर्ट बताती है कि मथुरा पुलिस ने अपने बयानों में सिर्फ दो बातें स्‍वीकार की हैं। पहली ये कि उसे डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण और उनसे फिरौती वसूलने की जानकारी थी तथा दूसरी ये कि अपहरणकर्ता चार बदमाशों में से एक बदमाश को वह मेरठ से पकड़ कर लाई थी, जिसे डॉ. द्वारा एफआईआर कराने से इंकार करने के कारण छोड़ दिया गया।
मथुरा पुलिस ने अपने उच्‍चाधिकारियों को न तो ये बताया कि पकड़े गए बदमाश से उसने क्‍या बरामद किया, और न यह जानकारी दी कि पूरे घटनाक्रम में किस-किस की कितनी तथा क्‍या भूमिका रही।
ऐसे में सबसे महत्‍वपूर्ण सवाल यह हो जाता है कि पुलिस की जांच चल भी रही है या नहीं, और चल रही है तो किस दिशा में चल रही है ?
दरअसल, पुलिस की जांच की ‘दिशा’ ही इस संगीन वारदात की ‘दशा’ तय करेगी क्‍योंकि बदमाशों को पकड़ लेने भर से इसका खुलासा होने वाला नहीं है। इसका पूरा खुलासा तभी हो पाएगा जब फिरौती की पूरी रकम बरामद करने के साथ-साथ खाकी की संलिप्‍तता का भी ईमानदारी से खुलासा किया जाए और बदमाशों के साथ-साथ अधिकारी भी जेल भेजे जा सकें।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020

डॉ. निर्विकल्‍प अपहरण कांड: एक नहीं दो डॉक्‍टर का हुआ था अपहरण, दोनों से वसूली गई फिरौती, साथी डॉ. ही मास्‍टर माइंड

मथुरा। शहर के मशहूर ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. निर्विकल्‍प अग्रवाल के अपहरण से जुड़े सनसनीखेज खुलासे ने लोगों के होश उड़ा दिए हैं।
दरअसल, डॉ. निर्विकल्‍प का अपहरण करने से कुछ दिन पहले इन्‍हीं बदमाशों ने एक अन्‍य प्रसिद्ध डॉक्‍टर को अगवा कर उनसे एक करोड़ रुपए की फिरौती वसूली थी।
चौंकाने वाली बात यह है कि दोनों डॉक्‍टर के अपहरण में इनके ही साथी एक ऐसे डॉक्‍टर का नाम सामने आया है, जो न केवल पूरे घटनाक्रम का सूत्रधार है बल्‍कि रहनुमा भी बना हुआ है।
बताया जाता है कि डॉ. निर्विकल्‍प के चारों नामजद अपहरणकर्ता पूरे समय जिस पांचवें शख्‍स से फोन पर संपर्क में थे, वह पांचवां शख्‍स ही मास्‍टरमाइंड डॉक्‍टर है जिसने एक-एक करके दोनों डॉक्‍टर के अपहरण का प्‍लॉट तैयार किया था।
चूंकि फिलहाल चारों नामजद आरोपी पुलिस की पकड़ से दूर हैं इसलिए पूरी सच्‍चाई सामने आना मुश्‍किल है, लेकिन पुलिस यदि उनकी पुरानी ‘कॉल डिटेल’ पर भी काम कर ले तो उसे बड़ी उपलब्‍धि हासिल हो सकती है।
इस केस का एक सर्वाधिक रोचक पहलू यह है कि अपहृत किए गए दोनों डॉक्‍टर तथा अपहरण के सूत्रधार डॉक्‍टर सहित एक नामजद बदमाश का संबंध भी गेटबंद पॉश कॉलोनी ‘राधापुरम एस्‍टेट’ से ही जुड़ रहा है।
गौरतलब है कि डॉ. निर्विकल्‍प अपने परिवार सहित राधापुरम एस्‍टेट में रहते हैं जबकि इनसे पूर्व जिस डॉक्‍टर को अगवा कर बदमाश एक करोड़ रुपए की फिरौती वसूलने में सफल रहे थे, वो भी राधापुरम एस्‍टेट के ही निवासी हैं।
इसके अलावा इन दोनों डॉक्‍टरों को अगवा कराने वाले डॉक्‍टर साहब भी राधापुरम एस्‍टेट में ही रह रहे हैं।
इसमें एक इत्तेफाक यह भी जुड़ रहा है कि तीनों डॉक्‍टर नेशनल हाईवे अथवा उसके लिंक रोड पर प्रेक्‍टिस करते हैं। यानी इनके चिकित्‍सा संस्‍थान भी उसी एक दायरे में हैं, जहां घटना स्‍थल है।
कुल मिलाकर इन डॉक्‍टर्स के घर ही नहीं, व्‍यावसायिक ठिकाने भी हाईवे थाना क्षेत्र में आते हैं।
उल्‍लेखनीय है कि डॉ. निर्विकल्‍प की फिरौती जिस स्‍थान पर वसूली गई और जिसका पुलिस ने बाकायदा अपनी एफआईआर में जिक्र भी किया है, वह ”सिटी हॉस्‍पीटल” भी नेशनल हाईवे की सर्विस रोड पर है तथा हाईवे थाना क्षेत्र में पड़ता है।
अब यदि बात करें नामजद बदमाशों की तो 11 फरवरी 2020 की रात हाईवे थाना पुलिस द्वारा लिखाए गए डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण मामले का एक नामजद अभियुक्‍त अनूप पुत्र जगदीश निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा, काफी समय तक राधापुरम एस्‍टेट में किराए पर रहा था। यहां रहकर उसने कॉलोनी के कई लोगों से अपने अच्‍छे ताल्लुकात बना लिए थे।
यहां से निकलने के बाद भी अनूप गणेशरा रोड स्‍थित एक अन्‍य कॉलोनी में रहने लगा, जिससे उसका राधापुरम एस्‍टेट तक आना-जाना लगा रहता था।
अपहरण कराने के पीछे की कहानी
कुछ दिनों के अंतराल पर दो नामचीन डॉक्‍टरों का उनके ही किसी साथी डॉक्‍टर द्वारा अपहरण कराकर मोटी फिरौती वसूलने की कहानी भी किसी फिल्‍मी पटकथा जैसी है।
इस कहानी के अनुसार डॉ. निर्विकल्‍प का अपहरण कराने से पहले जिस डॉक्‍टर का अपहरण कराकर फिरौती वसूली गई थी, उन डॉक्‍टर और मास्‍टरमाइंड डॉक्‍टर के बीच पूर्व में व्‍यावसायिक रिश्‍ते थे।
इन रिश्‍तों में दरार आई तो कुछ हिसाब-किताब बाकी रह गया। पहले राजी-खुशी हिसाब करने के प्रयास हुए लेकिन जब बात नहीं बनी तो टेढ़ी उंगली से चार गुना घी निकाल लिया गया।
बताया जाता है कि इस मामले में बड़े आराम से फिरौती हजम हो गई इसलिए बदमाशों के मुंह भी खून लग चुका था।
बदमाशों ने अपनी आदत के मुताबिक अब अपहरण कराने वाले डॉक्‍टर से कोई दूसरा मुर्गा बताने को दबाव बनाना शुरू कर दिया।
मास्‍टरमाइंड डॉक्‍टर को डॉ. निर्विकल्‍प की कमजोरी पता थी, और वह यह भी जानता था डॉ. निर्विकल्‍प दूसरे डॉक्‍टर्स की अपेक्षा काफी सज्‍जन व्‍यक्‍ति हैं।
डॉ. निर्विकल्‍प की इसी कमजोरी का लाभ उठाकर उनके साथी डॉक्‍टर ने उन्‍हें टारगेट बनवाया और इसमें भी सफलता हाथ लगी।
पुलिस तक बात पहुंची कैसे
दो डॉक्‍टर्स का अपहरण कर इत्‍मीनान से मोटी रकम हड़पने वाले बदमाशों के हाथ तो जैसे कोई खजाना लग गया था। उन्‍होंने अपना इस्‍तेमाल करने वाले डॉक्‍टर साहब का पीछा इसके बाद भी नहीं छोड़ा।
व्‍यावसायिक रिश्‍तों का हिसाब बदमाशों के जरिए कराने वाले डॉक्‍टर के लिए अब ये बदमाश ही मुसीबत बन चुके थे लिहाजा डॉक्‍टर साहब ने इसका भी रास्‍ता निकाला।
काम आए पुलिस और मास्‍टरमाइंड डॉक्‍टर के गहरे संबंध
पुलिस के ही सूत्र बताते हैं कि दो डॉक्‍टरों का अपहरण कराकर अच्‍छी-खासी फिरौती दिलवाने वाले डॉक्‍टर के पुलिस, और विशेषकर इलाका पुलिस से बहुत मधुर संबंध रहते हैं।
इसे यूं भी समझ सकते हैं कि पुलिस से गहरी पैठ बनाकर रखने वालों में टॉप पर इस डॉक्‍टर का नाम शामिल है क्‍योंकि दोनों के हित एक-दूसरे से जुड़े हैं।
बस, इन्‍हीं संबंधों को फायदा उठाकर डॉक्‍टर ने इलाका पुलिस के जरिए ही आगरा में बैठे अधिकारियों तक डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण और फिरौती की बात पहुंचवाई।
सच तो यह है कि मास्‍टरमाइंड डॉक्‍टर को मालूम था कि डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण और लाखों रुपए की फिरौती के बंदरबांट में कुछ पुलिसकर्मी खाली हाथ रह गए हैं इसलिए वह उच्‍च अधिकारियों तक बात पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ने वाले।
बताते हैं कि डॉ. और इन पुलिसकर्मियों को इस बात का भी इल्‍म था कि मथुरा पुलिस के अधिकारियों एवं आगरा में बैठे उच्‍च पुलिस अधिकारियों की बन नहीं रही इसलिए आगरा में बैठे अधिकारी मामले की गंभीरता को समझने में पूरी रुचि लेंगे।
डॉ. निर्विकल्‍प ने किसी को नहीं बताई अपने अपहरण की बात
पुलिस के ही सूत्र बताते हैं कि डॉ. निर्विकल्‍प ने अपने किसी साथी या आईएमए के पदाधिकारी को भी अपने अपहरण की बात नहीं बताई क्‍योंकि वह तो किसी भी तरह इसे भूल जाना चाहते थे। तब भी नहीं जब बदमाशों ने उन्‍हें फिर से फोन करना शुरू कर दिया था।
डॉक्‍टर निर्विकल्‍प यदि इतनी हिम्‍मत कर लेते तो सबसे पहले पुलिस को ही बताते क्‍योंकि उन्‍हें अपहरण कराने वाले अपने साथी डॉक्‍टर तथा पुलिस के बीच की ट्यूनिंग का कुछ पता नहीं था।
आईएमए के किसी पदाधिकारी डॉक्‍टर के माध्‍यम से डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण की बात पुलिस तक पहुंचने की कहानी में इसलिए दम नहीं है क्‍योंकि जब डॉक्‍टर निर्विकल्‍प ही अपने साथ हुई घटना के बारे में पुलिस को नहीं बताना चाहते थे तो उनकी मर्जी के बिना आईएमए का कोई पदाधिकारी पुलिस को उनके साथ हुई घटना की जानकारी क्‍यों देगा।
अगर ये मान भी लिया जाए कि डॉ. निर्विकल्‍प ने दोस्‍ती या निजी संबंधों की खातिर आईएमए के किसी पदाधिकारी को जानकारी दी तो एसोसिएशन का जिम्‍मेदार पदाधिकारी होने के नाते वह पहले यह बात आईएमए के ही प्लेटफार्म पर रखते। फिर आईएमए जो भी निर्णय लेती, सभी के हित में ही लेती।
पहले भी खेल करते रहे हैं मथुरा के कुछ डॉक्‍टर
अपनी जान छुड़ाने को साथी डॉक्‍टरों से चौथ वसूली कराने का मथुरा के कुछ डॉक्‍टर्स का खेल पुराना है।
मशहूर फिजीशियन डॉ. उमेश माहेश्‍वरी के अपहरण का किस्‍सा जिन्‍हें मालूम है, वो भली-भांति जानते हैं कि उसमें मथुरा के दो पुलिस अधिकारी दिल्‍ली में बंद एक कुख्‍यात बदमाश से पूछताछ करने गए थे।
उस बदमाश ने तब स्‍पष्‍ट कहा था कि डॉ. उमेश माहेश्‍वरी के अपहरण से तो उसका कोई लेना-देना नहीं है अलबत्ता वो मथुरा के अन्‍य कई डॉक्‍टर्स से बराबर चौथ वसूली करता रहता है। बाहर होता है तो खुद वसूली करने जाता है, और अंदर होने पर अपने किसी गुर्गे को भेजता है।
उस बदमाश ने मथुरा पुलिस को बाकायदा कैमरे के सामने बताया कि वह कृष्‍णा नगर के एक नर्सिंगहोम संचालक डॉक्‍टर से नियमति तौर पर वसूली करता है।
उसने यह भी बताया कि इस नर्सिंग होम संचालक ने कई बार उसे दूसरे डॉक्‍टर्स को भी निशाना बनवाया है, और खुद मध्‍यस्‍थता करके अच्‍छे पैसे दिलवाए हैं।
इस कुख्‍यात गैंगेस्‍टर ने तब इस बात का भी खुलासा किया था कि कोड वर्ड्स के रूप में वह उधार की रकम चुकाने को कहता है जिससे किसी को कोई शक न हो।
तब उस बदमाश के गैंग ने इस नर्सिंग होम संचालक डॉक्‍टर के माध्‍यम से करीब एक दर्जन डॉक्‍टरों को निशाना बनाया था।
इस बदमाश की हत्‍या हो जाने के बाद कुछ समय के लिए यह सिलसिला थमा किंतु अब लगता है कि उसके गैंग को पुराना घर दिखा दिया गया है।
जहां तक सवाल है डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण और फिरौती के केस को पुलिस द्वारा अपनी ओर से दर्ज कर लेने का, तो उसमें कुछ होता दिखाई नहीं दे रहा।
एफआईआर दर्ज हुए एक सप्‍ताह से ऊपर का समय बीत गया लेकिन पुलिस किसी स्‍थानीय नामजद तक भी नहीं पहुंच सकी है जबकि यही पुलिस पूर्व में मेरठ निवासी एक बदमाश को तत्‍काल उठा लाई थी।
पुलिस ने अब तक किया है तो सिर्फ इतना कि चारों नामजद आरोपियों पर पचास-पचास हजार का ईनाम घोषित कर दिया है।
कल को यदि इनमें से कोई पुलिस के हत्‍थे चढ़ भी जाता है तो कौन गवाही देगा और कहां से सबूत मिलेंगे। थोड़े-बहुत रुपए बरामद दिखाकर किसी को जेल भेजा गया तो उसे जमानत मिलने में कोई असुविधा नहीं होगी।
डॉ. निर्विकल्‍प कुछ बोलने से रहे, क्‍योंकि उन्‍हें कुछ बोलना ही नहीं है। जिन डॉक्‍टर साहब को पुलिस तक बात पहुंचाने का श्रेय दिया जा रहा है, वह बोलने क्‍यों लगे।
पुलिस की इसे खोलने में पहले ही कोई रुचि नहीं है। बदमाश अपना जुर्म कबूल कर लें, यह हो नहीं सकता।
ऐसे में होगा तो केवल इतना कि इस तरह की कहानियां आगे भी दोहराई जाती रहेंगी। कुछ अंतराल के बाद कोई तीसरा डॉक्‍टर बदमाशों का, या यूं कहें कि अपने ही हमपेशा का शिकार बनेगा। और यह सिलसिला तब तक नहीं थमेगा, जब तक खुद डॉक्‍टर आगे आकर इसे रोकने का प्रयास नहीं करते।
जब तक वो अपने बीच मौजूद ऐसे तत्‍वों को चिन्‍हित कर उनके खिलाफ कठोर कदम नहीं उठाते।
आईएमए हो या नर्सिंग होम ऐसोसिएशन, अथवा डॉक्‍टरों की कोई अन्‍य संस्‍था हो, सबको सोचना होगा कि कोई भी संस्‍था मात्र जिंदाबाद-मुर्दाबाद करने के लिए नहीं होती।
उसे खड़ा करने के पीछे जो उद्देश्‍य होते हैं, उनमें ऐसे डॉक्‍टर्स पर भी कार्यवाही करने का मकसद निहित होता है जो किसी भी तरह इस पवित्र पेशे को अपनी आपराधिक प्रवृत्ति से कलंकित करने का काम करते हैं।
– सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

रविवार, 16 फ़रवरी 2020

डॉ. निर्विकल्‍प अपहरण कांड: खेल खतम… पैसा हजम… जनता बजाए ताली

मथुरा। मशहूर ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. निर्विकल्‍प अग्रवाल के अपहरण कांड में आखिर पुलिस ने वही किया, जिसका अंदेशा था।
मथुरा और आगरा से लखनऊ तक इस अपहरण कांड को लेकर हो रही पुलिस की फजीहत के बीच हाईवे थाना पुलिस ने गत 11 फरवरी 2020 की रात 10 बजकर 53 मिनट पर आईपीसी की धारा 364 A के तहत एक एफआईआर दर्ज कर उच्‍च अधिकारियों को यह संदेश दिया है कि ”तुम्‍हारी भी जै-जै हमारी भी जै-जै, न तुम जीते न हम हारे”





पुलिस द्वारा दर्ज की गई इस एफआईआर के मुताबिक हाईवे थाना क्षेत्र की गेटबंद पॉश कालॉनी राधापुरम एस्‍टेट निवासी डॉ. निर्विकल्‍प का अपहरण 10 दिसंबर 2019 को रात करीब 8 बजे थाना क्षेत्र के ही गोवर्धन फ्लाईओवर से तब कर लिया गया था जब वो महोली रोड अपने क्‍लीनिक से घर लौट रहे थे।
थाना प्रभारी इंस्‍पेक्‍टर जगदंबा सिंह की ओर से दर्ज कराई गई इस एफआईआर में सनी मलिक पुत्र देवेन्‍द्र मलिक निवासी न्‍यू सैनिक विहार कॉलानी थाना कंकरखेड़ा मेरठ, महेश पुत्र रघुनाथ निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा, अनूप पुत्र जगदीश निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा तथा नीतेश उर्फ रीगल पुत्र नामालूम निवासी भोपाल मध्‍यप्रदेश (हाल निवासी दिल्‍ली एनसीआर) को नामजद किया है।
पुलिस द्वारा एफआईआर में दर्ज घटनाक्रम पर भरोसा करें तो 10 दिसंबर 2019 की रात करीब 8 बजे हुई इस वारदात का पता बीट सूचना के जरिए हाईवे थाना प्रभारी को 11 फरवरी 2020 को दोपहर के वक्‍त लगा।
डॉ. निर्विकल्‍प का अपहरण कर उनसे 52 लाख रुपए की फिरौती वसूलने का मामला बीट के माध्‍यम से संज्ञान में आते ही ”उच्‍च अधिकारियों को अवगत कराकर” प्रभारी इंस्‍पेक्‍टर जगदंबा सिंह अपने साथ सर्विलांस सेल प्रभारी निरीक्षक जसबीर सिंह, एसओजी प्रभारी सुल्‍तान सिंह आदि के साथ डॉ. निर्विकल्‍प के राधापुरम एस्‍टेट स्‍थित निवास पर पहुंचे।
पुलिस का दावा है कि डॉ. निर्विकल्‍प ने पुलिस को पूरे घटनाक्रम से अवगत कराते हुए जानकारी दी कि बदमाशों ने उनके ही मोबाइल फोन से उनकी पत्‍नी भावना को फोन करके 52 लाख रुपए की फिरौती लेकर घटना स्‍थल से बमुश्‍किल 100 मीटर दूर स्‍थित सिटी हॉस्‍पीटल के पास मुक्‍त कर दिया।
पुलिस की एफआईआर बताती है कि अब भी ”उक्‍त अज्ञात बदमाश” डॉ. निर्विकल्‍प को फोन करके 50 लाख रुपए और मांग रहे हैं। हालांकि नामजद एफआईआर के ब्‍यौरे में ”उक्‍त अज्ञात बदमाश” लिखा जाना भी समझ से परे है।
एफआईआर का ब्‍यौरा कहता है कि डॉ. निर्विकल्‍प के माता-पिता की काफी समय पहले आगरा में हत्‍या कर दी गई थी, जिस कारण डॉ. दंपत्ति बहुत डरे रहते हैं और इसलिए उन्‍होंने अपने साथ हुई वारदात का पुलिस से जिक्र नहीं किया।
हाईवे थाना प्रभारी जगदंबा सिंह की ओर से लिखाई गई एफआईआर के अनुसार नामजद चारों बदमाशों की जानकारी भी उन्‍हें डॉ. से न मिलकर सर्विलांस प्रभारी तथा एसओजी प्रभारी से मिली। इन दोनों अधिकारियों को बदमाशों के बावत सूचना उनके मुखबिर तथा गोपनीय सूत्रों ने दी।
पुलिस की एफआईआर पर भरोसा करें तो डॉ. द्वारा कोई सहयोग न किए जाने के बावजूद सर्विलांस प्रभारी तथा एसओजी प्रभारी को चंद घंटों के अंदर डॉ. से 52 लाख रुपए फिरौती वसूलने वाले चारों बदमाशों की पूरी कुंडली हाथ लग गई, लेकिन यह पता नहीं लगा कि अब जो बदमाश डॉ. से फोन पर फिर 50 लाख रुपए की मांग कर रहे हैं, वह ज्ञात हैं अथवा अज्ञात।
डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण और उन्‍हें 52 लाख रुपए फिरौती लेकर मुक्‍त करने की घटना पर हाईवे थाना प्रभारी की ओर से एफआईआर दर्ज कराने की जानकारी आज लोगों को उस समय हुई, जब उन्‍होंने सुबह के अखबार पढ़े।
आगरा से प्रकाशित सभी प्रमुख अखबारों के समाचारों से लोगों को यह भी ज्ञात हुआ कि इस प्रकरण में एफआईआर लिखाने वाले प्रभारी निरीक्षक जगदंबा सिंह को ही अब निलंबित कर दिया गया है जबकि सीओ रिफाइरी को हटाकर उनके स्‍थान पर सीओ गोवर्धन को रिफाइनरी सर्किल का अतिरिक्‍त प्रभार सौंपा गया है। अब पता लगा है कि आई जी ने चारों नामजद आरोपियों पर 50-50 हजार रुपए के ईनाम की भी घोषणा कर दी है।
आईजी ए सतीश गणेश कर रहे हैं विभागीय जांच
गौरतलब है कि इस मामले की जांच करीब एक सप्‍ताह पूर्व से आईजी ए सतीश गणेश कर रहे हैं। आईजी ने इसमें मथुरा पुलिस के आधा दर्जन से अधिक पुलिस अधिकारियों को तलब कर उनके बयान भी दर्ज कराए थे, साथ ही इसे लेकर आगरा जोन के एडीजी अजय आनंद समय-समय पर आगरा के मीडिया को अपना वर्जन देते रहे।
बताया जाता है कि मथुरा के पुलिस अधिकारियों ने अपने बयानों में बदमाशों द्वारा डॉक्‍टर का अपहरण कर फिरौती वसूले जाने की जानकारी आईजी को दी थी।
मथुरा पुलिस पर आरोप
11 फरवरी 2020 को हाईवे थाना पुलिस द्वारा लिखाई गई एफआईआर से पहले मथुरा पुलिस पर जो आरोप लग रहे थे उनके अनुसार घटना के तत्‍काल बाद पुलिस को डॉ. के अपहरण और फिरौती का पता ही नहीं लग चुका था, बल्‍कि बदमाश भी उसकी गिरफ्त में आ चुके थे।
इलाका पुलिस ने बदमाशों से फिरौती के पूरे 52 लाख रुपए बरामद कर उसका बंदरबांट कर लिया क्‍योंकि डॉ. दंपत्ति एफआईआर कराने को तैयार नहीं थे।
डॉ. दंपत्ति को संतुष्‍ट करने के लिए पुलिस ने उन्‍हें फिरौती की उतनी रकम लौटा दी जितनी उन्‍होंने इनकम टैक्‍स के झमेले में न पड़ने के कारण बताई।
पहले छपी खबरों में बताया गया कि पुलिस इस तरह फिरौती की रकम में से लगभग 40 लाख रुपए तथा बदमाशों को छोड़ने के एवज में मिले कई लाख रुपयों को भी हजम कर गई।
कुल मिलाकर देखा जाए तो सारा खेल इन्‍हीं लाखों रुपयों को लेकर शुरू हुआ था और अब भी उन्‍हीं पर टिका है।
खेल खतम… पैसा हजम
दरअसल, पैसा तो जहां ठिकाने लगना था वो लग गया, अब लकीर पीटी जा रही है क्‍योंकि डॉक्‍टर अब भी सामने आने को तैयार नहीं है। न वो फिरौती की रकम के लिए कोई क्‍लेम कर रहा है।
पुलिस को डॉक्‍टर ने अब तक जो भी बयान दिए हैं, उनसे मुकर जाना लाजिमी है क्‍योंकि वह किसी पचड़े में पड़ना ही नहीं चाहता।
इन हालातों में पुलिस एफआई दर्ज करके सिर्फ और सिर्फ खानापूरी ही कर रही है क्‍योंकि बदमाशों को गिरफ्त में लेने का उसके पास कोई आधार नहीं है।
अब एफआईआर क्‍यों
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल सिर्फ एक यह रह जाता है कि पुलिस को इस खानापूरी की जरूरत क्‍यों पड़ी।
इसके बारे में विभागीय सूत्र बताते हैं कि आईजी ए सतीश गणेश ने अपनी जांच पूरी करके रिपोर्ट लखनऊ भेज दी थी लिहाजा कुछ न कुछ तो करना था।
एक पक्ष यह भी
इस पूरे घटनाक्रम का एक पक्ष यह भी सामने आ रहा है कि उच्‍च पुलिस अधिकारियों के बीच सामंजस्‍य का अभाव तथा ईगो प्रॉब्‍लम देखते हुए लखनऊ से सारा मामला रफा-दफा करने के मौखिक आदेश दिए गए जिससे खाकी को बदनामी से बचाया जा सके।
लखनऊ में बैठे आला अधिकारी भी यह जानते और समझते हैं कि डकारे गए लाखों रुपए अब पुलिस से निकलवा पाना संभव नहीं है इसलिए किसी तरह इतना किया जाए कि शर्मिंदगी न झेलनी पड़े।
पुलिस के भरोसेमंद सूत्र बताते हैं कि लखनऊ से मिले मौखिक आदेश-निर्देशों के अनुपालन में आगरा और मथुरा पुलिस ने यह कदम उठाया है। ये बात अलग है कि इसके दूरगामी परिणाम न पुलिस के हित में होंगे और न डॉक्‍टर के हित में। इससे सिर्फ हित पूरा होगा तो बदमाशों का ही होगा। आज डॉ. निर्विकल्‍प को निशाने पर लिया है तो कल किसी और को लिया जाएगा।
रही बात आम जनता की तो उसका क्‍या, वह हमेशा विजेता के पक्ष में ताली बजाने को खड़ी हो जाती है।
अंत में हैदर अली आतिश का ये शेर, और बात खत्‍म-
बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का
जो चीरा तो इक क़तरा-ए-ख़ूँ न निकला
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

मथुरा डाॅक्‍टर अपहरण कांड: फिरौती हड़पने पर मथुरा पुलिस की चुप्‍पी सवालों के घेरे में

मथुरा। गेटबंद पॉश कॉलोनी राधापुरम एस्‍टेट निवासी जिस डॉक्‍टर के कथित अपहरण से मिली फिरौती की बड़ी रकम को चंद घंटों में पुलिस ने ठिकाने लगाकर सारा मामला रफा-दफा कर दिया, उसे लेकर अब तमाम सवाल खड़े हो रहे हैं।
सवाल खड़े करने वालों में खुद पुलिस भी है, डॉक्‍टर बिरादरी भी और आम आदमी भी।
इन सवालों का जवाब जानने से पहले इस ”कथित अपहरण” संबंधी पूरे घटनाक्रम पर एक बार फिर गौर करना जरूरी है।
अब तक सामने आई कहानी के अनुसार, एक मशहूर ऑर्थोपेडिक डॉक्‍टर पिछले माह जब अपने क्‍लीनिक से कार द्वारा लौट रहे थे तब नेशनल हाईवे स्‍थित गोवर्धन चौराहे के फ्लाईओवर पर उन्‍हें एक लग्जरी गाड़ी सवार चार बदमाशों ने ओवरटेक करके कब्‍जे में ले लिया और उन्‍हीं के मोबाइल से उनकी पत्‍नी को फोन करके डॉक्‍टर का अपहरण कर लिए जाने की जानकारी दी।
कहानी के मुताबिक कुछ घंटों के अंदर ही डॉक्‍टर की पत्‍नी से 55 लाख की फिरौती वसूलकर बदमाशों ने डॉक्‍टर को मुक्‍त कर दिया।
अखबारों में छपे इस पूरे घटनाक्रम पर भरोसा किया जाए तो 55 लाख रुपए की बड़ी रकम का मात्र चंद घंटों में डॉक्‍टर की पत्‍नी ने इंतजाम कर लिया और इस दौरान डॉक्‍टर को चारों बदमाश उन्‍हीं की गाड़ी में लेकर नेशनल हाईवे पर ही घूमते रहे।
दिल्‍ली-आगरा नेशनल हाईवे का ये वो हिस्‍सा है जहां दिन-रात पुलिस सक्रिय रहती है क्‍योंकि इस पर अनेक होटल, हॉस्‍पीटल, गेस्‍ट हाउस आदि के अलावा इंडस्‍ट्री एरिया भी पड़ता है।
इसके अलावा घटना स्‍थल से बमुश्‍किल 100 मीटर की दूरी पर शहर कोतवाली की रिपोर्टिंग पुलिस चौकी कृष्‍णानगर तथा हाईवे थाने की भी एक पुलिस चौकी है।
सवाल जो अब पूछे जा रहे हैं
अब इस अपहरण को लेकर उन सवालों को समझिए जिनकी वजह से इसे ‘कथित अपहरण’ कहा जा रहा है।
सवाल नंबर एक: क्‍या वाकई डॉक्‍टर का किडनैप हुआ था, या मामला कुछ ऐसा है जिसे छिपाना डॉक्‍टर दंपत्ति और उसके परिवार की मजबूरी था ?
ये सवाल इसलिए पूछा जा रहा है क्‍योंकि पेशेवर बदमाश यदि किसी का अपहरण करते हैं तो वो अपहृत के परिवार से तत्‍काल संपर्क स्‍थापित करने की गलती नहीं करते। पहले वो अपहृत के परिवार और पुलिस की गतिविधि को भांपते हैं, उसके बाद इत्‍मीनान से अपनी डिमांड रखते हैं।
इस मामले में बताया जा रहा है कि बदमाशों ने मात्र दो-ढाई घंटे में फिरौती की रकम वसूल ली और निकल गए, जोकि संभव नहीं है।
सवाल नंबर दो: क्‍या डॉक्‍टर ने अपने घर पर 55 लाख रुपए की बड़ी रकम पहले से रखी हुई थी, और क्‍या उनके कथित अपहरणकर्ताओं को इस बात का इल्‍म था कि डॉक्‍टर के घर पर इतनी बड़ी रकम है ?
ये सवाल इसलिए महत्‍वपूर्ण हो जाता है कि आज के इस दौर में जब बड़े-बड़े व्‍यापारी और उद्योगपति भी इतना कैश अपने घर पर नहीं रखते तो डॉक्‍टर ने इतना पैसा किसलिए रखा हुआ था।
सवाल नंबर तीन: जब डॉक्‍टर, डॉक्‍टर की पत्‍नी और उसके परिजनों में से भी किसी ने पुलिस को अपहरण की जानकारी नहीं दी तो पुलिस को सूचित किसने किया ?
इस सवाल का जवाब पूरे मामले की परतें खोल सकता है क्‍योंकि पुलिस पर फिरौती की रकम में 40 लाख रुपए हड़प जाने का आरोप लगा है।
समाचारों के अनुसार पुलिस ने चारों अपहरणकर्ताओं को गिरफ्त में लेकर और पूरे 55 लाख रुपए बरामद करके जब डॉक्‍टर दंपत्ति से संपर्क किया तो वो एफआईआर दर्ज कराने पर तैयार नहीं हुए लिहाजा पुलिस ने बिना कोई कार्यवाही किए बदमाशों को रिहा कर दिया।
बताया जाता है कि डॉक्‍टर दंपत्ति के रुख ने ही पुलिस के दोनों हाथों में लड्डू दे दिए और इसीलिए उसने 15 लाख बरामद बताकर वो तो डॉक्‍टर दंपत्ति को थमा दिए तथा शेष 40 लाख की फिरौती का बंटवारा कर लिया।
जानकारी के मुताबिक इसके अलावा पुलिस ने बदमाशों को सुरक्षित रिहा करने की एवज में उनसे भी कुछ रकम हथिया ली।
सवाल नंबर चार: जो पुलिस अपने इलाके में मशहूर डॉक्‍टर के अपहरण और उसकी फिरौती वसूलने तक गहरी नींद में थी, उसे अचानक बदमाशों का पूरा ब्‍यौरा उनकी लोकेशन के साथ कैसे मिल गया कि उसने चारों बदमाशों को फिरौती की रकम ठिकाने लगाने से पहले धर दबोचा ?
पुलिस की इस हरकत में यह निहित है कि क्‍या वाकई डॉक्‍टर का अपहरण हुआ या इसके पीछे की पूरी पटकथा पुलिस ने ही बदमाशों के साथ मिलकर लिखी थी ताकि सांप मर जाए और लाठी भी न टूटे।
यदि ऐसा नहीं है तो किसी भी ऐसी संगीन वारदात के बाद हफ्तों-हफ्तों टीम बनाकर अंधेरे में तीर चलाने वाली पुलिस ने कैसे इतनी जल्‍दी चारों बदमाश मय रकम के पकड़ लिए जबकि उनमें से एक बदमाश मेरठ का बताया जाता है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि बदमाशों के साथ सुरक्षित गेम खेलने के लिए कुछ खास पुलिस वालों ने सारा ड्रामा रचा और बड़ी रकम हड़प कर डकार तक नहीं ली।
पुलिस के ही भरोसमंद सूत्रों की मानें तो इस खेल में एक नहीं, दो थानों की पुलिस शामिल रही है और ये दोनों ही थाने नेशनल हाईवे के हैं। इनमें से एक थाने के प्रभारी का मेरठ के बदमाशों से गहरा ताल्‍लुक बताया जाता है।
पुलिस और बदमाशों की जुगलबंदी इस बात से भी जाहिर होती है कि सामान्‍य तौर पर ऐसी किसी वारदात के बाद सीमा विवाद पैदा करके पीड़ित को ‘फुटबॉल’ बना देने वाली पुलिस ने इस मामले में कतई हील-हुज्‍जत न करते हुए घटनास्‍थल हाईवे थाना क्षेत्र में मान लिया जबकि शहर कोतवाली की रिपोर्टिंग चौकी कृष्‍णानगर का भी कुछ क्षेत्र इसमें आता है।
सवाल नंबर पांच: आगरा और लखनऊ में बैठे पुलिस के आला अधिकारियों तक इस अपहरण की बात पहुंचने से पहले डीआईजी/एसएसपी मथुरा को इसकी भनक क्‍यों नहीं लगी ?
गौरतलब है कि पिछले महीने हुई अपहरण और फिरौती की इस बड़ी वारदात का पता आम जनता तथा डॉक्‍टर बिरादरी को भी तब लगा जब 5 फरवरी के प्रमुख अखबारों में यह खबर एडीजी आगरा जोन अजय आनंद के वर्जन सहित छपी।
आश्‍चर्य की बात यह है कि जो खबर छापी गई, वह भी अखबारों के आगरा कार्यालय से छपी थी न कि मथुरा से, और उसके लिए मथुरा के किसी पुलिस अधिकारी का वर्जन तक लेना जरूरी नहीं समझा गया।
और अंतिम सवाल: यदि किसी विशेष कारणवश ऐसा हुआ है तो भी समाचार छप जाने के बाद अब तक मथुरा पुलिस के किसी अधिकारी ने मुंह क्‍यों नहीं खोला ?
जैसा कि एडीजी आगरा जोन अजय आनंद ने कहा, यदि डॉक्‍टर व उसका परिवार अपहरण की एफआईआर दर्ज कराने में रुचि नहीं ले रहा था तो भी इलाका पुलिस को खुद एफआईआर दर्ज कर बदमाशों का चालान करना चाहिए था क्‍योंकि एक बड़ी रकम बरामद की गई थी।
समाचार के अनुसार उच्‍चाधिकारियों द्वारा इस पूरे मामले में मथुरा पुलिस से चार दिन पहले ही जवाब तलब किया जा चुका है, बावजूद इसके मथुरा पुलिस द्वारा न तो कोई कार्यवाही की गई है और न अपनी सफाई में कुछ कहा गया है।
उधर डॉक्‍टर से जुड़े सूत्रों का कहना है कि डॉक्‍टर ने कुछ दिनों पहले ही अपना निजी हॉस्‍पिटल बनाने के लिए कोई बड़ी जमीन महंगे इलाके में खरीदी है।
सूत्रों के मुताबिक इस वारदात का संबंध उस सौदे से भी हो सकता है क्‍योंकि बिना हील-हुज्‍जत आनन-फानन में 55 लाख रुपए की रकम बदमाशों तक कोई यूं ही नहीं पहुंचा सकता।
हो सकता है कि पुलिस को शामिल करने के पीछे भी बदमाशों की कुछ ऐसी ही मंशा रही हो जिससे सेफ गेम खेला जा सके और बाद के लिए कोई कांटा न बचे।
पूर्व में भी होती रही हैं ऐसी वारदातें
विश्‍व प्रसिद्ध इस धार्मिक जनपद में डॉक्‍टर्स के अपहरण और उनसे चौथ वसूली का यह कोई पहला केस नहीं है, और न पहली बार पुलिस तथा बदमाशों की मिलीभगत से रकम एंठने का मामला प्रकाश में आया है।
इससे पहले भी यह सब हुआ है और सीओ स्‍तर के पुलिस अधिकारी जेल भी गए हैं।
कुख्‍यात बदमाशों को मथुरा के डॉक्‍टर बहुत पहले से आकर्षित करते रहे हैं और ऐसे भी मामले सामने आए हैं जब एक डॉक्‍टर ने ही दूसरे डॉक्‍टर की बदमाशों के लिए सुरागरसी अथवा मुखबिरी की है।
जो भी हो लेकिन इस पूरे घटनाक्रम से पर्दा उठना एक ओर जहां इसलिए जरूरी है जिससे पुलिस की छवि और प्रभावित न हो वहीं दूसरी ओर इसलिए भी आवश्‍यक है कि अन्‍य डॉक्‍टर खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
http://legendnews.in/mathura-polices-silence-surrounded-by-questions-on-doctor-kidnapping-and-ransom-case/

शुक्रवार, 31 जनवरी 2020

देशभर के सभी ”संरक्षित” मानसिक रोगियों को समर्पित


जिस तरह भोजन के लिए भूख… सोने के लिए नींद और रोने के लिए भावनाएं या संवेदनाएं होना जरूरी है, उसी तरह आजादी के लिए गुलाम होना भी जरूरी है।
जो गुलाम नहीं है, और फिर भी आजादी की मांग करता है तो निश्‍चित जानिए कि उसका मानसिक संतुलन दुरुस्‍त नहीं है।
अब जरा विचार कीजिए कि भूख होने के बावजूद कोई भोजन नहीं कर पा रहा, नींद आने पर भी सो नहीं पा रहा और भरपूर भावनाओं के बाद भी रो नहीं रहा तो इसका क्‍या मतलब हो सकता है।
इसका सीधा सा मतलब केवल एक है कि वह शारीरिक अथवा मानसिक रूप से बीमार है।
दुनिया की हर पैथी का डॉक्‍टर उसे देखे बिना भी यह बता सकता है कि ये लक्षण किसी न किसी गंभीर बीमारी के हैं। अब बीमारी है तो उसका उपचार आवश्‍यक है।
चूंकि उपचार की पद्धति और प्रक्रियाएं अलग-अलग होती हैं लिहाजा उनका एक्‍शन तथा रिएक्‍शन भी अलग-अलग तरीकों से सामने आता है।
जैसे कि कुछ लोग धरना-प्रदर्शन करके रिएक्‍शन दे रहे हैं तो कुछ लोग लोकतंत्र को खतरे में बताकर दे रहे हैं। कोई हिटलरशाही बता रहा है तो कोई मोदी-शाही कह रहा है।
हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, यह वैज्ञानिक तथ्‍य है। इसलिए उनकी क्रिया पर प्रतिक्रियाएं भी आ रही हैं।
बहरहाल, इस सबके बीच सवाल फिर वहीं खड़ा होता है कि आजादी मांगने या छीनने के लिए पहली शर्त है गुलामी।
जिस देश में सीएम से लेकर पीएम तक को और लोअर कोर्ट एवं हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट को भी गरियाने की पूरी छूट प्राप्‍त हो। जहां सजायाफ्ता आतंकियों के पक्ष में न सिर्फ खड़े होने बल्‍कि आधी रात को भी सर्वोच्‍च न्‍यायालय खुलवाने का अधिकार हो। चुनी हुई सरकार को कठघरे में खड़ा करने का अवसर हो और संसद के दोनों सदनों से पारित कानूनों के खिलाफ सड़क पर उतरने से कोई रोक न हो, उस देश में छीन के आजादी लेने का नारा मर्ज को न सही किंतु मरीज को तो पहचान ही रहा है।
माना कि अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता का अधिकार संविधान प्रदत्त है, किंतु हर अधिकार में कुछ कर्तव्‍य भी निहित होते हैं।
भारतीय संविधान के भाग 4(क) अनुच्छेद 51(क) के तहत नागरिकों के मौलिक कर्तव्य कुछ इस प्रकार हैं:
1. प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह संविधान का पालन और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज व राष्ट्र गान का आदर करे।
2. स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे।
3. भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे।
4. देश की रक्षा करे।
5. भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे।
6. हमारी सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका निर्माण करे।
7. प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसका संवर्धन करे।
8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञानार्जन की भावना का विकास करे।
9. सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे।
10. व्यक्तिगत एवं सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे।
11. अभिवावक/ संरक्षक 6 से 14 वर्ष के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा प्रदान करे।


यहां यह गौर करना जरूरी है कि संविधान प्रदत्त अधिकारों का दुरुपयोग करने और छीनकर आजादी लेने की धमकी देने वाले क्‍या अपने इन 11 संवैधानिक कर्तव्‍यों का निर्वहन कर रहे हैं। यदि कर रहे हैं तो कितने कर्तव्‍यों का कर रहे हैं।
रही बात अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता अथवा आजादी की, तो उसकी भी सीमा होती है। सीमा रेखा क्रॉस करते ही स्‍वतंत्रता भी अपराध की श्रेणी में शामिल हो जाती है।
उदाहरण के लिए अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता के नाम पर किसी को गाली तो नहीं दी जा सकती। पहनने की आजादी के अधिकार से कोई निर्वस्‍त्र नहीं घूम सकता क्‍योंकि यह आजादी लोगों को मनमुताबिक लिबास पहनने के लिए है, न कि ‘न पहनने’ के लिए।
बहुत से लोगों को तो थूकने की, मूतने की और हगने की भी आजादी चाहिए। मतलब वो जहां चाहें थूक सकें, जिस स्‍थान पर चाहें लघुशंका निवारण करें और कहीं भी दीर्घशंका से निवृत हो सकें।
इनकी अपनी दलीलें हैं। सड़क पर चलते हुए या किसी वाहन में बैठे-बैठे थूकने वाले की मानें तो वह अपने मुंह से अपने देश की सड़क पर थूक रहा है, इससे आपत्ति कैसी।
यदि उसका थूक किसी दूसरे के ऊपर गिर भी रहा है तो यह उसकी अपनी समस्‍या है, उसे अपना मुंह बचाकर खुद चलना चाहिए।
सरेआम लघुशंका करने वालों को टोकिए तो वह कहेंगे कि सरकार ने हर चार कदम पर मूत्रालय क्‍यों नहीं बनवाए, अब नहीं बनवाए तो हम इसके लिए जिम्‍मेदार थोड़े ही हैं।
खुली हवा में नाली-नाले और नदी-तलाब के किनारे या खेत-खलिहान में ‘निपटने’ वालों को घोर आपत्ति है कि सरकार ‘स्‍वच्‍छ भारत अभियान’ के तहत घर-घर व गांव-गांव शौचालय क्‍यों बनवा रही है।
उनका घर, उनका गांव, उनके खेत और उन्‍हीं के खलिहान… लेकिन उन्‍हीं की स्‍वतंत्रता का हनन। उन्‍हें भी मन मुताबिक मल-मूत्र विसर्जन की आजादी चाहिए। सरकार कौन होती है, उन्‍हें दायरे में बांधने वाली।
दिल्‍ली का शाहीन बाग और लखनऊ का घंटाघर हो या जामिया तथा जेएनयू व एएमयू। यहां प्रदर्शन करने वालों में और खुलेआम थूकने, मूतने एवं हगने की आजादी मांगने वालों में कोई अंतर नहीं है।
अंतर इसलिए नहीं है कि ये सब के सब किसी न किसी स्‍तर पर मानसिक रोगी हैं। इन्‍हें अपने संविधान प्रदत्त अधिकारों का तो ज्ञान है परंतु कर्तव्‍यों का नहीं। अधूरा ज्ञान हमेशा नाश की निशानी होता है। या यूं कहें कि पतन के रास्‍ते पर ले जाता है।
सवा सौ करोड़ से अधिक की आबादी वाले विश्‍व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में मुठ्ठीभर लोगों का मानसिक रूप से विक्षिप्‍त हो जाना कोई आश्‍चर्य नहीं, परंतु आश्‍चर्य तब होता है जब कुछ ऐसे लोग अपने-अपने स्‍वार्थों की पूर्ति के लिए इन्‍हें लगातार बरगलाते रहते हैं, जिन्‍हें आज तक बुद्धिजीवी माना जाता रहा है। जिन्‍हें बड़े-बड़े पुरस्‍कारों से नवाजा गया है।
शायद इसीलिए भारत विश्‍व में अकेला ऐसा देश होगा जहां के नागरिक उस कानून का विरोध कर रहे हैं जो उन्‍हीं के हित में बनाया गया है।
यही नहीं, यह दुनिया का एकमात्र देश होगा जहां के कुछ नागरिक 70 साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी उस बहुमूल्‍य आजादी का अपमान कर रहे हैं जिसे पाने के लिए अनगिनत लोग बलिदान हुए।
ऐसा न होता तो नक्‍सलवाद, उग्रवाद, आतंकवाद भी नहीं होते और न ऐसे युवा होते जो गुलामी का स्‍वाद चखे बिना छीन के आजादी लेने का नारा देकर भी कहते हैं कि देश का लोकतंत्र एवं संविधान खतरे में है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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