शुक्रवार, 8 मई 2020

बहुत कुछ कहता है ‘कोरोना वॉरियर्स’ पत्रकार पंकज कुलश्रेष्‍ठ का ‘बलिदान’, श्रद्धांजलि देकर काम न चलाएं


Says a lot 'Corona Warriors' journalist Pankaj Kulshreshtha's 'sacrifice'

लगभग ढाई दशक से दैनिक जागरण में सेवारत और फिलहाल उप समाचार संपादक के तौर पर कार्यरत पत्रकार पंकज कुलश्रेष्‍ठ का कल देर शाम निधन हो गया। दैनिक जागरण के आगरा संस्‍करण में चौथे पन्‍ने पर छपे दो कॉलम वाले छोटे से समाचार के मुताबिक उनके कोरोना संक्रमित होने की पुष्‍टि 4 मई को हुई।
पंकज कुलश्रेष्‍ठ ‘मथुरा’ में भी करीब 8 साल दैनिक जागरण के ‘ब्‍यूरो चीफ’ रहे लिहाजा कृष्‍ण नगरी के लिए उनका नाम भली प्रकार जाना पहचाना था। यही कारण रहा कि दैनिक जागरण के मथुरा संस्‍करण में भले ही उनके निधन की खबर अगले दिन यानि ‘आज भी नहीं छपी’ और एक अन्‍य प्रमुख अखबार ने छापी भी तो कोरोना से मरने वालों की संख्‍या के साथ, बिना किसी परिचय के ढाई लाइन लिखकर। इस तरह दो प्रमुख अखबारों ने अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर ली और तीसरे ने इतना भी जरूरी नहीं समझा, किंतु मथुरा में विभिन्‍न माध्‍यमों से कल ही उनके निधन की सूचना सोशल मीडिया पर तैरने लगी थी।
यूं तो किसी भी पत्रकार का असमय जाना पत्रकार जगत को कभी नहीं चौंकाता क्‍योंकि पत्रकारिता का पेशा ही ऐसा है किंतु पंकज की मृत्‍यु जिन परिस्‍थितियों में हुई है, वो न सिर्फ ‘पत्रकारिता’ बल्‍कि बड़े-बड़े मीडिया संस्‍थानों और शासन-प्रशासन सहित पत्रकारों के उन तथाकथित संगठनों पर भी सवाल खड़े करती है जिनके पदाधिकारी विशुद्ध राजनेताओं की तरह आचरण करते हुए पत्रकारों के हितों की हिमायत का ढकोसला करते हैं।
आज भी बहुत कम लोग इस कड़वे सच से वाकिफ होंगे कि पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्‍तंभ सिर्फ ‘कहा जाता है’, क्‍योंकि उसे ऐसे कोई संवैधानिक अधिकार प्राप्‍त नहीं हैं जैसे बाकी तीनों स्‍तंभों न्‍यायपालिका, विधायिका तथा कार्यपालिका को प्राप्‍त हैं।
देश ने पत्रकारों को पिछले 70 वर्षों से लोकतंत्र के ‘चौथे स्‍तंभ’ का ‘तथाकथित सम्‍मान’ एक झुनझुने की तरह थमा रखा है जिसे बजा-बजाकर वह यदा-कदा खुश हो लेते हैं। मजे की बात ये है कि वह झुनझुना भी ‘पत्रकारों’ के हाथ में न होकर मीडिया संस्‍थानों के हाथ में है जो किसी नजरिए से पत्रकार नहीं कहे जा सकते। वो ठीक उसी प्रकार विशुद्ध व्‍यापारी व उद्योगपति हैं जिस प्रकार कोई दूसरा व्‍यापारी अथवा उद्योगपति होता है और जिसके लिए उसके कारिंदे ‘कामगार’ होते हैं।
यदि ऐसा नहीं होता तो दिवतिया आयोग, शिंदे आयोग, पालेकर आयोग, बछावत आयोग, मणिसाना आयोग और उसके बाद मजीठिया वेतन आयोग तक की सिफारिशें यूं जाया नहीं होतीं और तमाम बातों का स्‍वत: संज्ञान लेने वाला सर्वोच्‍च न्‍यायालय भी तमाशबीन बना न बैठा होता।
क्‍या कहती हैं इन आयोगों की सिफारिशें और सुप्रीम कोर्ट के आदेश-निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने 7 फरवरी 2014 को अखबारों एवं समाचार एजेंसियों को मजीठिया आयोग की सिफारिशें लागू करने का आदेश दिया और कहा कि वे अपने कर्मचारियों को संशोधित पे स्केल के हिसाब से भुगतान करें।
न्यायालय के आदेश के अनुसार यह वेतन आयोग 11 नवंबर 2011 से लागू होना था, जब इसे सरकार ने पेश किया था और 11 नवंबर 2011 से मार्च 2014 के बीच बकाया वेतन भी पत्रकारों को एक साल के अंदर चार बराबर किस्तों में दिया जाना था।
आयोग की सिफारिशों के अनुसार अप्रैल 2014 से नया वेतन लागू होना चाहिए था। तत्कालीन चीफ जस्टिस पी. सतशिवम और जस्टिस रंजन गोगोई तथा जस्टिस एसके सिंह की बेंच ने इस आयोग की सिफारिशों को चुनौती देने वाली याचिकाएं खारिज कर दीं।
बेंच ने आयोग की सिफारिशों को वैध ठहराया और कहा कि सिफारिशें उचित विचार-विमर्श पर आधारित हैं इसलिए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत इसमें हस्तक्षेप करने का कोई वैध आधार नहीं है।
बहरहाल, तमाम अखबारों के प्रबंधन मजीठिया आयोग के विधान, काम के तरीके, प्रक्रियाओं और सिफारिशों से नाखुश थे। इनका मानना था कि अगर इन सिफारिशों को पूरी तरह माना गया तो वेतन में एकदम से 80 से 100 फीसदी तक इजाफा करना पड़ सकता है और जिस कारण छोटे और कमजोर समूहों व कंपनियों पर तालाबंदी का अंदेशा बढ़ा सकता है। दलील यह भी थी कि अन्य उद्योगों की तुलना में प्रिंट मीडिया में गैर-पत्रकार कर्मचारियों को वैसे भी ज्यादा वेतन दिया जा रहा है। अगर सिफारिशें लागू की गईं तो वेतन में अंतर का यह दायरा और बढ़ जाएगा। हालांकि सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इनमें से किसी दलील को तवज्जो नहीं दी। साथ ही कहा कि यह केंद्र सरकार का विशेषाधिकार है कि वह सिफारिशों को मंजूर करे या खारिज़ कर दे। कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर सरकार ने कुछ सिफारिशें मंजूर नहीं कीं तो यह पूरी रिपोर्ट को खारिज़ करने का आधार नहीं है। इसके बाद मीडिया संस्‍थानों की रिव्यू पिटीशन भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज़ कर दी।
मीडिया हाउसेस की चालबाजी से धूल फांक रहे आदेश-निर्देश
न्यायपालिका के इतने सख्त आदेश-निर्देशों के बावजूद मीडिया संस्थान इसे लागू नहीं कर रहे। 6 साल से ये आदेश-निर्देश धूल फांक रहे हैं क्‍योंकि सिफारिशें लागू न करने के इनके पास अनेक हथकंडे जो हैं।
मसलन उनके खिलाफ कोर्ट में जाने वाले पत्रकारों का शोषण, कंपनी को छोटी यूनिटों में बांटना, कम आय दिखाना, कर्मचारियों से कांट्रैक्ट साइन करवाना कि उन्हें आयोग की सिफारिशें नहीं चाहिए। हालांकि मीडिया संस्‍थानों द्वारा किए जा रहे इस शोषण की पीछे एक ही बड़ा कारण है, और वो कारण है पत्रकारों में एकजुटता कमी।
मीडिया संस्‍थानों के मालिक यहां फंसा रहे पेंच
दैनिक जागरण, राजस्थान पत्रिका, दैनिक भास्कर, हिन्‍दुस्‍तान व अन्य बड़े अखबारों के प्रबंधन ने अपने कर्मचारियों से एक फॉर्म पर इस आशय के साइन ले लिए कि उन्हें मजीठिया आयोग की सिफारिशें नहीं चाहिए। वे कंपनी प्रदत्त वेतन एवं सुविधाओं से संतुष्ट हैं। कंपनी उनकी सुख-सुविधा का ध्यान रखती है। समय से उन्हें प्रमोशन मिलता है, अच्छा इंक्रीमेंट लगता है, बच्चे अगर हैं तो उनकी पढ़ाई-लिखाई, स्वास्थ्य-चिकित्सा, उनकी बेहतरी का पूरा ख्याल कंपनी रखती है।
कौन नहीं जानता कि मीडिया संस्‍थानों के सारे हथकंडे पूरी तरह झूठ पर आधारित हैं।
मीडिया संस्‍थानों के झूठ का सबसे बड़ा उदाहरण है पंकज कुलश्रेष्‍ठ का उनके संस्‍थान दैनिक जागरण में पद। 25 वर्षों से एक ही संस्‍थान में सेवारत पंकज कुलश्रेष्‍ठ अब भी उप समाचार संपादक थे जिसकी हैसियत कोई भी मीडियाकर्मी अच्‍छी तरह समझता है।
चूंकि इसी से जुड़ी हैं वेतन, इंक्रीमेंट, स्वास्थ्य, चिकित्सा, बच्‍चों की पढ़ाई लिखाई आदि की सुविधाएं, इसलिए समझा जा सकता है कि पंकज कुलश्रेष्‍ठ ढाई दशक बाद भी संस्‍थान में क्‍या हैसियत रखते थे।
आज भी बड़े-बड़े अखबारों में ‘उप-संपादक’ का भी मासिक वेतनमान इतना नहीं है जिसमें वह अपने परिवार का ठीक तरह भरण-पोषण कर सके। जिलों में ब्‍यूरो चीफ के पदों को सुशोभित करने वाले पत्रकारों का भी वेतन सम्‍मानजनक नहीं होता।
और यदि बात करें जिले के स्‍टाफ और तहसील आदि में कार्यरत पत्रकारों की तो उनका ‘मानदेय’ बताने तक में शर्म आती है। उनके लिए वेतन तो कल्‍पना से परे की बात है।
यही नहीं, आज के दौर में जहां चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को भी वेतन के साथ आवश्‍यक भत्‍ते और अवकाश प्राप्‍ति के उपरांत पेंशन मिलना तय है वहां किसी पत्रकार के लिए कोई ऐसा प्रावधान नहीं है।
सरकारी कर्मचारी की मृत्‍यु के बाद भी उसके परिवार को पेंशन का एक भाग मिलता है परंतु पत्रकारों के परिवार उनकी मौत के बाद भगवान भरोसे जिंदा रहने की जद्दोजहद में लगे रहने पर मजबूर हैं।
माना कि राजनीति के गलियारों में जिस तरह लुटियंस जोन है, उसी प्रकार मीडिया में भी एक क्रीमी लेयर है और उस लेयर का एक-एक पत्रकार नेताओं की भांति ही सैकड़ों करोड़ रुपए का मालिक बना बैठा है परंतु वो उंगलियों पर गिने जाने लायक हैं। बाकी तो सारा धान बाईस पसेरी बिकता है।
प्रिंट हो या इलेक्‍ट्रॉनिक मीडिया, सब अपने मुलाजिमों का खून चूसने में पीछे नहीं रहते। हाथ में लगे ‘LOGO’ को किसी के भी मुंह में ठूंस देने का रुतबा हासिल करने वाले बड़े-बड़े न्यूज़ चैनल्‍स के स्‍ट्रिंगर की दयनीय दशा किसी से नहीं छिपी।
हजारों करोड़ रुपए की पूंजी वाले उनके संस्‍थान उन्‍हें कई बार आंशिक मानदेय देने की बजाय LOGO पकड़ाने के बदले उनसे उलटी वसूली कर लेते हैं। फिर वो उसकी भरपाई के लिए क्‍या कुछ नहीं करते।
शोषण-शोषण और खालिस शोषण का जितना घिनौना खेल मीडिया हाउस पत्रकारों के साथ खेलते हैं, उतना शायद ही किसी दूसरे क्षेत्र में खेला जाता होगा।
पत्रकारों के साथ दशकों से खेले जा रहे इस खेल से नेतानगरी भली प्रकार परिचित है और इसीलिए उसकी नजर में कोई पत्रकार ‘कोरोना वॉरियर्स’ भी नहीं है। अपनी जान देकर भी नहीं।
कोरोना वॉरियर्स की श्रेणी में पत्रकारों को शामिल कर लिया गया तो संभवत: शासन-प्रशासन की दुविधा बढ़ जाएगी। उन्‍हें दूसरे कोरोना वॉरियर्स की तरह मान-सम्‍मान एवं कानूनी अधिकारों के साथ मुआवजा भी देना पड़ सकता है।
आगरा मंडल ही नहीं, शायद समूचे उत्तर प्रदेश में कोरोना से जान गंवाने वाले पंकज कुलश्रेष्‍ठ शायद पहले पत्रकार होंगे लेकिन कोरोना संक्रमित पत्रकारों की संख्‍या अच्‍छी-खासी हो सकती है।
न करे भगवान कि कल किसी और को अपना कर्तव्‍य निभाते-निभाते जान से हाथ धोने पड़ जाएं, तो भी क्‍या पत्रकार इसी गति को प्राप्‍त होते रहेंगे।
पंकज कुलश्रेष्‍ठ का बलिदान ऐसे कई सवाल पीछे छोड़ गया है। यदि समय रहते इनके जवाब नहीं मांगे गए तो पत्रकारों की मौत सिर्फ एक आंकड़ा बनकर रह जाएगी क्‍योंकि उसकी गिनती कोरोना वॉरियर्स में नहीं, कोरोना संक्रमित लाशों के साथ होगी।
पत्रकारों की दशा और दिशा पर किसी अनाम शायर द्वारा लिखा गया यह शेर इस दौर में बड़ा सार्थक प्रतीत होता है कि-
‘बड़ा महीन है ये अखबार का मुलाजिम भी, खुद में खबर है मगर दूसरों की छापता है’
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

ये जड़ों की ओर लौटने का न सही, “सिंहावलोकन” का समय जरूर है

Definitely This time of "overview"

ये जड़ों की ओर लौटने का न सही, लेकिन जड़ों की ओर मुड़कर देखते हुए आगे बढ़ने का समय जरूर है। ‘सिंहावलोकन’ का समय है।
माना कि ‘लॉकडाउन’ बहुत से लोगों को परेशान कर रहा है क्‍योंकि उन्‍हें लगता है यह थोपा गया है, परंतु सही अर्थों में महसूस करेंगे तो पता लगेगा कि यह प्रकृति प्रदत्त एक ऐसा अवसर भी है जो भौतिकता की अंधी दौड़ से मुक्‍ति का मार्ग दिखा रहा है।
मात्र 21 दिनों के लॉकडाउन ने इतना अहसास तो कराया है कि समय के साथ कदमताल मिलाना जितना आवश्‍यक है, उससे कहीं ज्‍यादा आवश्‍यक है रफ्तार को नियंत्रित करने की कला जानना क्‍योंकि सधे हुए कदमों से चलकर ही मंजिल हासिल की जा सकती है। बहुत अधिक सुस्‍ती यदि मुकाम पाने में बाधक बनती है तो अनावश्‍यक तेजी भी लड़खड़ाकर गिर जाने का कारण बन जाती है।
इन दिनों तमाम लोग श्‍मशान वैराग्‍य अथवा चिता ज्ञान की अनुभूति कर रहे हैं। उन्‍हें अचानक जीवन क्षणभंगुर लगने लगा है। लेकिन कौन नहीं जानता कि ये दोनों भाव भी क्षणभंगुर हैं, अस्‍थायी हैं।
अपने प्रियजनों की चिता को अग्‍नि के हवाले करते वक्‍त मन में आने वाले भाव श्‍मशान छोड़ते ही तिरोहित हो जाते हैं। मरघट से घर तक की दूरी तय करते ही वैराग्‍य और ज्ञान साथ छोड़ जाते हैं।
कोराना से उपजे विश्‍वव्‍यापी संकट का फिलहाल कोई देश उपचार नहीं ढूंढ़ पाया है, सिवाय इसके कि साफ-सफाई के साथ रहें। लॉकडाउन का आनंद उठाते हुए एक निर्धारित सामाजिक दूरी बनाए रखें ताकि वायरस का संभावित प्रवेश रोका जा सके।
इस व्‍यवस्‍था पर राजनीति करने वालों की बात यदि न की जाए तो सारी दुनिया एकराय है। वैज्ञानिकों से लेकर डॉक्‍टरों तक की यही राय है कि इस महामारी की चपेट में आने से बचाव का एकमात्र कारगर उपाय लॉकडाउन और सोशल डिस्‍टेंसिंग ही है। कोई वैक्‍सीन, कोई दवाई या कोई दूसरे उपाय जब सामने आएंगे, तब आएंगे परंतु अभी कोई विकल्‍प नहीं है।
यही स्‍थिति हम भारतीयों को जड़ों की ओर देखने का अवसर दे रही है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ नि:संदेह सनातन धर्म का मूल संस्कार तथा विचारधारा है और इसीलिए यह वाक्य भारतीय संसद के प्रवेश कक्ष में भी अंकित है-
अयं निजः परोवैति गणना लघुचेतसाम् | उदारचरितानांतु वसुधैव कुटुम्बकम्
अर्थात् यह अपना बन्धु है और यह अपना बन्धु नहीं है, इस तरह की गणना छोटे चित्त वाले लोग करते हैं। उदार हृदय वाले लोगों के लिए तो सम्पूर्ण धरती ही परिवार है।
परंतु यहां विचारणीय यह है कि जिनकी संस्‍कृति और संस्‍कार ही बहुत ‘उथले’ हैं, उन्‍हें हमारी संस्‍कृति एवं संस्‍कारों की गहराइयों का ज्ञान इतनी आसानी से होगा भी कैसे।
किसी डूबते हुए प्राणी का जीवन बचाने के लिए अत्‍यंत आवश्‍यक है कि बचाने की कोशिश करने वाला पहले अपने प्राणों की रक्षा करे। वह स्‍वयं बचा रहेगा तो डूबने वाले को भी उबार लेगा अन्‍यथा डूबने वाला तो हमेशा आत्‍मरक्षा में बचाने वाले को अपनी ओर खींचता ही है।
विश्‍व के सबसे प्राचीन धर्म (सनातन), सबसे प्राचीन संस्‍कृति और सबसे प्राचीन परंपराओं के वाहक भारतीय यदि सही अर्थों में ‘महोपनिषद्’ अध्याय 4 के श्‍लोक 71 को सार्थक करना चाहते हैं तो सर्वप्रथम उन्‍हें अपनी जड़ों की ओर मुड़कर देखना होगा। ‘सिंहावलोकन’ करना होगा ताकि जड़ों से इतने न कट जाएं कि जुड़ने का कोई उपाय ही शेष न रहे। आगे बढ़ें, तरक्‍की करें, मुकाम हासिल करें और टारगेट अचीव करें किंतु जड़ों से कटने की भूल कतई न करें।
आज लॉकडाउन थोपा हुआ है तो क्‍या, उसका आनंद उठाएं, साथ ही प्रण करें कि ‘जान है तो जहान है’ के मंत्र को अपनाते हुए वसुधैव कुटुम्बकम् को एकबार फिर भारत की भूमि से सार्थक करेंगे और भारत के गौरवशाली अतीत को माध्‍यम बनाकर विश्‍व का मार्ग प्रशस्‍त करेंगे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 4 अप्रैल 2020

तबलीगी से लेकर अल्ट्रा ऑर्थोडॉक्स तक के कट्टरपंथियों की हरकत से सारी दुनिया परेशान


भारत और पाकिस्तान में कोरोना वायरस के खिलाफ मजबूती से खड़े स्वास्थ्यकर्मियों और पुलिसकर्मियों के साथ तबलीगी जमात के कट्टरपंथी समर्थकों की बदसलूकी की घटनाएं सामने आ रही हैं।
इनकी वजह से भारत में कोरोना वायरस के मामले तेजी से बढ़े हैं। इन्होंने नियमों का उल्लंघन कर न सिर्फ जमघट लगाया, बल्कि उनकी जांच कर रहे मेडिकल स्टाफ के साथ बदतमीजी भी कर रहे हैं। दुनिया में ये अकेले कट्टरपंथी नहीं हैं जो कोरोना के खिलाफ लड़ाई को कमजोर कर रहे हैं, इजरायल में भी अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स समुदाय भी धार्मिक नेताओं की बात मानकर सरकारी गाइडलाइन की अवहेलना करते रहे हैं और नतीजा यह है कि उस समुदाय के आम से लेकर खास सभी कोरोना के चपेटे में हैं।
इजरायल का बनेई ब्राक इलाका कोरोना का केंद्र बन गया। यहां कट्टरपंथी धड़े ने दिशा-निर्देशों को दरकिनार करते हुए दुकानें खोल रखी थीं जिससे निपटने में स्थानीय प्रशासन को एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ा। अब सेना जल्द ही स्थानीय प्रशासन की मदद को सड़क पर उतरने वाली है। विशेषज्ञों का मानना है कि 40 प्रतिशत आबादी पहले ही संक्रमित हो चुकी है।
दरअसल, यह दिक्कत इसलिए आ रही है कि क्योंकि अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स समुदाय अपने धर्म गुरुओं की बातों का अंधा-अनुसरण कर रहे हैं। इजरायल का अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स समुदाय भीड़भाड़ वाले पिछड़े इलाकों में रहता है जहां वायरस तेजी से फैला है। छोटी जगहों में एक साथ कई लोग जमा होते हैं और प्रार्थना में हिस्सा लेते हैं। हिब्रू यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर एच लेविने कहते हैं, ‘मैं बेहद चिंतित हूं क्योंकि हमने अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स कम्युनिटी में तेजी से संक्रमण फैलते देखा है और इजरायल की आबादी में भी।’
इजरायल में सेक्युलर और अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स एक दूसरे को संदेह से देखते हैं और उनके बीच हमेशा ही तनाव की स्थिति रहती है । यहां के स्वास्थ्य मंत्री याकोव लित्जमैन भी अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स सोसायटी से आते हैं और कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं। वह हाल के सप्ताह में धार्मिक सभाओं में भीड़ पर बैन लगाने से इंकार करते रहे हैं। और वे खुद नियमों की अनदेखी करके प्रार्थना में हिस्सा लेते रहे हैं।
जब इजरायल में स्कूल, ऑफिस और इंटरनेशनल एयरपोर्ट बंद हो रहे थे लित्जमैन इसका विरोध कर रहे थे। वह इस भीड़ में अकेले नहीं हैं। उनके जैसे अल्ट्रा ऑर्थोडॉक्स समुदाय के और भी नेता है जो मानते हैं कि धार्मिक सभाओं को बंद करना वायरस से ज्यादा खतरनाक है।
-एजेंसियां

रविवार, 29 मार्च 2020

कोरोना वायरस से अधिक वायरल होते ‘दानवीर’ और ‘कर्मवीर’


चीन से ‘ग्लोबलाइज’ हुआ ‘कोरोना वायरस’ जितनी तेजी के साथ देश में ‘वायरल’ नहीं हो सका, उससे कहीं अधिक गति से अब हमारे ‘दानवीर’ और ‘कर्मवीर’ वायरल हो रहे हैं। सोशल मीडिया इस समय इन ‘दानवीरों’ और ‘कर्मवीरों’ से अटा पड़ा है।
हो भी क्‍यों नहीं, आखिर देश के प्रधानमंत्री ने कोरोना जैसी महामारी से मिलकर लड़ने का आह्वान जो किया था।
आह्वान को गंभीरता से लेते हुए करोड़ों-अरबों में खेलने वाले ‘दानवीर’ भीड़ एकत्र करके सब्‍जी-पूड़ी के पैकेट बांट रहे हैं और लखपतियों का ग्रुप आटा-दाल-तेल की पुड़िया देकर वाहवाही लूट रहा है।
इसी प्रकार ‘कर्मवीरों’ की फौज ‘सेनिटाइजर’ लेकर मोहल्‍ले-मोहल्‍ले और गली-गली घूम रही है। यह फौज ‘मास्‍क’ और ग्‍लव्‍स वितरण भी करती देखी जा सकती है।
चूंकि इस दौर में अलग से किसी फोटोग्राफर या वीडियो मेकर की आवश्‍यकता तो है नहीं, ये सारे काम स्‍मार्टफोन कर देता है इसलिए ‘दानवीरों’ और ‘कर्मवीरों’ को बड़ी राहत हो गई है।
घटना स्‍थल (मेरा मतलब है ‘मौके’) से ही इनके दूत वाट्सएप, फेसबुक, टि्वटर, इंस्‍टाग्राम आदि पर अपने ‘कारनामे’ तमाम ग्रुप में सेंड कर देते हैं जिससे देश-दुनिया उनके इस दुर्लभ गुण से बखूबी परिचित हो सके।
वैसे प्रिंट मीडिया भी इन्‍हें ‘तरजीह’ देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा। वह इन्‍हें चार-छ: कॉलम में न सही तो डबल कॉलम में तो ‘फोटो विद कैप्‍शन’ जगह दे ही देता है।
कुल मिलाकर इस तरह हमारे मौसमी दानवीर और कर्मवीर प्रिंट मीडिया एवं सोशल मीडिया से लेकर इलैक्‍‍‍‍‍‍ट्रॉनिक मीडिया, यहां तक कि वेब मीडिया में भी छाए हुए हैं।
मीडिया से याद आया कि प्रधानमंत्री जी ने राष्‍ट्र के नाम अपने संबोधन में इस वर्ग से भी अनुरोध किया था कि वह संकट की इस घड़ी में साथ दे।
मीडिया की महत्‍ता को रेखांकित करते हुए माननीय प्रधानमंत्री ने ‘जनता कर्फ्यू’ के दौरान जिन लोगों के प्रति घंटे-घड़ियाल, ताली-थाली आदि बजाकर आभार व्‍यक्‍त करने को कहा था, उनमें मीडिया भी शामिल था।
आभार के बोझ तले मीडिया के एक वर्ग यानि इलैक्‍ट्रॉनिक मीडिया ने अपनी जिम्‍मेदारी का परिचय देते हुए प्रवासी मजूदरों के पलायन को इस कदर हाईलाइट किया कि बाकी मजदूरों को उससे बड़ी प्रेरणा मिली, नतीजतन दिल्‍ली से शुरू हुआ यह सिलसिला देखते-देखते देशव्‍यापी हो गया।
प्रधानमंत्री ने संकट की घड़ी में साथ जो मांगा था। ये थोड़े ही कहा था कि साथ किस तरह देना है।
मीडिया में भी प्रिंट मीडिया को प्राथमिकता देनी होगी क्‍योंकि प्रधानमंत्री जी ने भी सबसे पहले प्रिंट मीडिया का जिक्र किया था कि वह फेक न्‍यूज़ को लेकर जनता को आगाह करे और भ्रम की स्‍थिति पैदा न होने दे।
अब समस्‍या यह है कि प्रिंट मीडिया बेचारा खुद भ्रम का शिकार हो गया। भ्रम की स्‍थिति यह हो गई कि लोगों ने अखबार लेना बंद कर दिया इसलिए फिलहाल प्रिंट मीडिया अपने लिए फैले भ्रम को दूर करने में जुटा है।
खुद के लिए खुद के अखबार में विज्ञापन देकर रिक्‍वेस्‍ट करनी पड़ रही है कि ‘कोरोना से दूर रहिए, अखबार से नहीं’।
कर्मवीरों में शुमार ‘मीडिया हाउस’ इसके अलावा एक काम और कर रहे हैं। उन्‍होंने अखबार को काफी ‘स्‍लिम’ कर दिया है। 18-20-22 और 24 पन्‍नों वाले नामचीन अखबार इन दिनों 12 तथा 14 पन्‍नों तक सिमट कर रह गए हैं।
‘राष्‍ट्रहित’ को मद्देनजर रखते हुए हालांकि इन अखबारों की कीमत उतनी ही कायम रखी गई है जितनी कि सामान्‍य दिनों में रहती है। कुल मिलाकर अखबार के पन्‍ने कम हुए हैं, मूल्‍य नहीं। राष्‍ट्रधर्म ऐसे ही निभाया जाता है।
डिस्‍क्‍लेमर: यहां ‘मीडिया’ से तात्‍पर्य मालिकानों से है, न कि पत्रकारों से इसलिए पत्रकारगण ‘मीडिया’ को लेकर कही गई बातें अपने दिल पर ने लें।
बहरहाल, प्रधानमंत्री ने दानवीरों के साथ-साथ जिन कर्मवीरों से सहयोग मांगा था, उनमें मीडिया के अलावा डॉक्‍टर्स और पुलिसकर्मी प्रमुख थे।
उनका जिक्र अगले दिनों में क्‍योंकि लॉकडाउन चालू आहे, आज तो सिर्फ ‘चौथा’ दिन है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

सोमवार, 23 मार्च 2020

कोरोना: लड़ाई को कमजोर करने में लगे हैं लापरवाह और अफवाह फैलाने वाले तत्‍व

देश में कोरोना वायरस के संक्रमण की गति तेज होने लगी है। इस बीच कुछ लोग तमाम अपीलों और सुझावों को नजरअंदाज करते हुए लापरवाही की खौफनाक मिसाल पेश कर रहे हैं। कुछ जगहों पर तो लोगों ने रविवार को जनता कर्फ्यू की अपील की भी धज्जियां उड़ा दीं। आज लॉकडाउन के बीच कई जगह भीड़भाड़ की तस्वीरें आने लगीं हैं। इससे खफा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर अपनी नाराजगी जाहिर की। आज जब Cornavirus से होने वाली Covid-19 महामारी से एकजुट होकर मुकाबला करने का वक्त है तो कुछ संदिग्ध अस्पताल से भाग रहे हैं तो कुछ ट्रेनों से यात्रा कर रहे हैं। कोविड-19 महामारी का दुनियाभर में मच रहे तांडव को देखकर भी लोग संभल नहीं रहे हैं। दुख की बात यह है कि ऐसे लोगों में बॉलिवुड की मशहूर हस्ती से लेकर जाने-माने नेता तक शामिल हैं।
आइए जानते हैं, अब तक सामने आई कुछ ऐसी बातें जो वाकई निराशाजनक हैं…
यूपी के कानपुर में सब्जी मंडी में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी जबकि शहर में 25 मार्च तक लॉकडाउन घोषित है।
दिल्ली से सटे नोएडा की तरफ जाने वाली गाड़ियों की कतार लग गई। आखिर पुलिस वालों को इन्हें रोकने की कोशिश करनी पड़ी।
22 मार्च को जनता कर्फ्यू के बावजूद दिल्ली के आलमी मरकज बंगले वाली मस्जिद में मुसलमानों का हुजूम उमड़ा। लोग एक-दूसरे को गले लगाते दिखे।
खचाखच भरी बस तो ऊपर चढ़े लोग
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद लोगों से अपील कर रहे हैं कि जो जहां हैं वहीं रहें क्योंकि उनकी यात्रा से खुद उन पर और दूसरों पर भी कोरोना के संक्रमण का खतरा बढ़ेगा लेकिन लोग यात्रा करने से नहीं बच रहे। बिहार के दरभंगा जा रही बस जब अंदर से खचाखच भर गई तो लोग ऊपर चढ़कर भी यात्रा करने से बाज नहीं आए।
दरअसल, लॉकडाउन के चलते फैक्ट्रियां समेत तमाम कारोबारी संस्थान बंद है। ऐसे में लोगों के पास काम नहीं बचा और वो गांव लौटने को उतावले हो गए हैं।
मूर्खों ने #covididiots टॉप ट्रेंड करवा दिया
ट्विटर पर ऐसे ही लोगों के लिए गुस्से का इजहार हो रहा है। मूर्खता दिखा रहे लोगों की तस्वीरें और वीडियोज शेयर कर रहे लोगों ने #covididiots टॉप ट्रेंड करवा दिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ऐसे लोगों के प्रति नाराजगी का इजहार किया 



अस्पताल से भाग रहे संदिग्ध
दिल्ली के लोकनयाक जयप्रकाश नारायण (LNGP) अस्पताल से 19 मार्च को कोरोना के छह संदिग्ध भाग गए। उन्हें अगले दिन उनके घरों से ढूंढकर अस्पताल लाया गया। 14 मार्च को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के एक सरकारी अस्पताल से कोरोना वायरस के तीन संदिग्ध बिना सूचना दिए भाग गए। इनमें दो महिलाएं भी शामिल थीं।
ट्रेनों से बेखौफ यात्रा कर रहे कोरोना से संदिग्ध
रेलवे ने बताया कि पिछले दिनों कोरोना वायरस के 12 मरीजों ने रेल यात्रा की। इससे उनके संपर्क में आने वाले लोगों में वायरस फैलने का खतरा पैदा हो गया
रेलवे के मुताबिक ये यात्राएं 13 से 16 मार्च के बीच की गई हैं। रेलवे के मुताबिक आंध्र प्रदेश संपर्क क्रांति ट्रेन में 13 मार्च को यात्रा करने वाले 8 लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं।
जर्मनी-इटली से घूमकर आए, सबको किया संक्रमित
पंजाब के नवांशहर जिला स्थित पठलवा गांव के निवासी बल्‍देव सिंह की लापरवाही ने न केवल उनकी जान ले ली बल्कि परिवार के चार सदस्यों की जान को भी खतरे में डाल दिया। बल्देव अपने साथियों के साथ जर्मनी और इटली गए थे। उन सभी ने देश लौटने के बाद न अपनी जांच करवाई और न ही किसी तरह की सतर्कता बरती। बल्देव का कोविड-19 से 18 मार्च को देहांत हो गया। बल्देव के साथ जर्मनी और इटली गए संत गुरबचन सिंह आनंदपुर साहिब में होला मोहल्ला समारोह में भी शामिल हुए। उनके तीसरे साथी दलजिंदर सिंह विदेश से लौटकर लोगों से खूब घुलते-मिलते रहे। नतीजा है कि गांव के सरपंच भी संक्रमित हो गए हैं।
​​SP नेता रामाकांत यादव
समाजवादी पार्टी के नेता रामाकांत यादव ने तो हद कर दी। उन्होंने कोरोना को केंद्र की मोदी सरकार और बीजेपी की तरफ से उड़ाया गया अफवाह बता दिया।
उन्होंने कहा कि केंद्र एनआरसी, सीएए, एनआरपी, महंगाई जैसे मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए कोरोना का शोशा छोड़ दिया। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर किसी को कोरोना है तो वह उसे गले तक लगाने को तैयार हैं।
उन्होंने कहा, ‘बड़ी शर्म है लगती है कि कोरोना के लिए इमर्जेंसी लगाई जा रही है।’ रामाकांत यादव के खिलाफ उचित धाराएं लगाकर मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।
गायिका कनिका कपूर
बॉलिवुड की पार्श्व गायिका कनिका कपूर की लापरवाही तो बेहद शर्मनाक है। कनिका 9 मार्च को लंदन से मुंबई लौटीं, फिर फ्लाइट से 11 मार्च को लखनऊ गईं। वहां से कानपुर में अपने रिश्तेदार के घर चली गईं। 13 मार्च को दोबारा लखनऊ आईं। वह तीन पार्टियों में गईं, जहां करीब 160 लोग उनके संपर्क में आए थे। सांसद दुष्यंत सिंह भी एक पार्टी में उनके साथ थे जो संसद और राष्ट्रपति भवन गए। कनिका की रिपोर्ट पॉजिटिव पाई गई तो अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां उन्होंने खूब नखरे दिखाए। आखिरकार स्वास्थ्यकर्मियों को उन्हें कहना पड़ा कि वो अस्पताल में खुद को सिलेब्रिटी की तरह नहीं, एक मरीज के तौर पर पेश हों।
फोन पर शेखी बघारता शख्स
एक व्यक्ति ने यह दावा किया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भारत सरकार से खतरनाक कोरोना वायरस के चलते 15 अप्रैल से 15 जून तक देश को पूरी तरह से बंद कर देने की सिफारिश की है। फोन पर शेखी बघारते उसका ऑडियो वॉट्सऐप वायरल हो गया।
आखिरकार, केंद्र सरकार के जनसंपर्क कार्यालय को स्थिति स्पष्ट करनी पड़ी। उसने ट्वीट कर इस दावे को झूठ और फर्जी बताया।
झूठ बोला कि एनएसए लगा
कुछ ऐसे भी लोग हैं जो इस भयावह परिस्थिति में खुद और अपने परिवार की चिंता किए बिना ड्यूटी पर तैनात हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ऐसे ‘कोरोना कमांडर्स’ के प्रति आभार जताने की जगह झूठ फैलाने में जुटे हैं। इन्हीं में एक निकला गुजरात का अभिमन्यु आचार्य। वह 21 मार्च को टोरंटो से आबू धाबी होते हुए भारत लौटा था। उसने दावा किया अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उसकी कोई थर्मल स्क्रीनिंग नहीं हुई थी और उसे सिर्फ एक सेल्फ डेक्लेरेशन फॉर्म भरने को कहा गया था। हालांकि, एयरपोर्ट अथॉरिटी द्वारा शेयर किए गए सीसीटीवी फुटेज में उसका आरोप गलत निकला। अब गुजरात पुलिस ने इस अभिमन्यु के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत मामला दर्ज कर लिया है।
शाहीन बाग की जिद्दी औरतें
कोरोनो वायरस पर दिल्ली में लॉकडनाउन के बावजूद शाहीन बाग की जिद्दी औरतें धरने पर अड़ी हुई हैं। हालांकि उनकी जिद के कारण प्रदर्शनकारियों में मतभेद भी सामने आने लगे हैं। रविवार को जनता कर्फ्यू के दौरान प्रदर्शनकारी दो गुटों में बंट गए थे और उनके बीच मारपीट भी हुई थी। हालांकि, अब वहां से शिफ्टों में धरना देने की खबर आई है।

शुक्रवार, 20 मार्च 2020

अंतत: दोषी फांसी पर लटका दिए गए, लेकिन यक्ष प्रश्‍न अब भी कायम

अंतत: आज सुबह साढ़े पांच बजे ‘निर्भया’ के चारों दोषियों को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया, बावजूद इसके यक्ष प्रश्‍न अब भी बना हुआ है। हो सकता है कि इस प्रश्‍न का उत्तर फिलहाल मिले भी नहीं किंतु मिलना है बहुत जरूरी। जरूरी इसलिए है क्‍योंकि इससे एक पेशे की प्रतिष्‍ठा दांव पर लग गई और उसे दांव पर लगाने वालों को कोई अफसोस तक नहीं हुआ। दोषियों को उनकी सजा बेशक मिल गई किंतु उन अपराधियों का क्‍या, जिन्‍होंने एक घिनौने अपराध को अंजाम देने वालों के लिए कानून का मजाक बनाकर रख दिया। अब वह प्रश्‍न भी जान लें जो दोषियों की फांसी के बाद भी अनुत्तरित है।
प्रश्‍न यह है कि एक अत्‍यंत जघन्‍य अपराध को अंजाम देने वाले इन दोषियों के वकीलों को उनकी फीस कौन दे रहा था?
सब जानते हैं कि अत्‍यंत मामूली पारवारिक पृष्‍ठभूमि से आने वाले इन दोषियों की आर्थिक स्‍थिति किसी एक सामान्‍य वकील को भी फीस देने की नहीं है, फिर ‘बाल की खाल’ निकालने वाले वकीलों की फौज इन्‍हें कैसे उपलब्‍ध होती रही, और कौन यह फौज मुहैया कराता रहा ?
सत्र न्‍यायालय से लेकर उच्‍च और उच्‍चतम न्‍यायालय तक जिस तरह वकील इन चारों दोषियों के लिए कानूनी लड़ाई लड़े, वो बहुत कुछ कहती है।
ये लड़ाई एक ओर जहां बताती है कि न्‍याय की देवी की आंखों पर पट्टी बांधने का आशय क्‍या रहा होगा, वहीं इतना भी स्‍पष्‍ट करती है कि जो दिखाई देता है वही अंतिम सत्‍य नहीं होता।
बहरहाल, यक्ष प्रश्‍न एकबार फिर वहीं आकर खड़ा हो जाता है कि निर्भया के दोषियों को फांसी के फंदे से लौटाने की जिद पर अड़े वकीलों को “हायर” किया किसने ?
जिस देश की अधिकांश जेलें भीड़ से सिर्फ इसलिए भरी पड़ी हैं क्‍योंकि तमाम लोगों के पास अपने लिए वकील करने की सामर्थ्‍य नहीं है, उस देश में एक वीभत्‍स अपराध के दोषियों की पैरवी करने के लिए कुछ वकील दिन-रात एक किए रहे तो कैसे ?
यदि कोई ये कहे कि वकील इतना सब-कुछ केवल मानवता के नाम पर, या फिर बिना फीस लिए करते रहे तो ऐसी बात शायद ही किसी के भी गले उतरे।
जाहिर है कि कोई तो है जो एक असहाय लड़की के बलात्‍कारी हत्‍यारों को बचाने की मुहिम चला रहा था, और इस मुहिम का मकसद मात्र इन्‍हें बचाने का प्रयास करना नहीं बल्‍कि कानून-व्‍यवस्‍था पर हमेशा हमेशा के लिए गहरा सवालिया निशान लगवाना था।
संभवत: इसी मकसद की पूर्ति के लिए इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्‍टिस यानी ICJ तक गुहार लगाई गई।
ऐसे में इस प्रश्‍न का उत्तर जरूर मिलना चाहिए कि वकालत के जिस पेशे में निजी संबंधों का भी तरजीह बहुत “रेअर” दी जाती है, उस पेशे से जुड़े एक से एक काबिल लोग एक घृणित अपराध को अंजाम देने वालों के साथ इतनी सिद्दत के साथ कैसे खड़े रहे ? कौन इनके लिए फंडिंग कर रहा था, और क्‍यों?
इन प्रश्‍नों के जवाब मिलना इसलिए भी जरूरी हैं कि यदि इनके सही-सही जवाब मिल जाते हैं, तो देश की बहुत सी समस्‍याओं के जवाब खुद-ब-खुद सामने आ जाएंगे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

समस्‍याओं का रोना रोते रह गए ‘अशोका हाइट्स’ के निवासी, और बात ध्‍वस्‍तीकरण तक जा पहुंची

JSR ग्रुप द्वारा मथुरा में गणेशरा रोड पर बनाई गई जिस ‘अशोका हाइट्स’ नामक बहुमंजिला बिल्‍डिंग की शिकायत लेकर आज वहां के निवासी दर-दर भटक रहे हैं, वह सिर्फ घटिया निर्माण या सुरक्षा, पार्किंग, पानी, बिजली, लिफ्ट इत्‍यादि समस्‍याओं तक सीमित नहीं है।
सच तो यह है कि ‘अशोका हाइट्स’ भ्रष्‍टाचार की बुनियाद पर खड़ी उन तमाम इमारतों का एक अदद उदाहरण है जिनके निर्माण में बिल्‍डर के साथ-साथ विकास प्राधिकरण, बैंकें, बिजली विभाग, फायर ब्रिगेड, ग्राम पंचायतें, नगर पालिका तथा नगर निगम जैसे अनेक विभाग संलिप्‍त रहे हैं और सभी ने मिलकर लोगों को लूटा है।
समस्‍याओं का रोना लेकर कभी बिल्‍डर और कभी डीएम के चक्‍कर काटने वाले ‘अशोका हाइट्स’ के निवासियों को तो शायद यह इल्‍म ही नहीं है कि अब उनकी बिल्‍डिंग के एक बड़े हिस्‍से को ध्‍वस्‍त करने की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है।
आज सिंचाई विभाग के अफसर भले ही इस बात को स्‍वीकार कर रहे हों कि ‘अशोका हाईट्स’ के निर्माण में आगरा कैनाल की मथुरा एस्‍केप का काफी हिस्‍सा दबा लिया गया है परंतु वर्षों पहले इसी विभाग के अधिकारी शिकवा-शिकायतों के बावजूद तमाशबीन बने रहे।
तब किसी अधिकारी ने न तो सरकारी जमीन हड़पे जाने का विरोध किया और न अवैध निर्माण रोकने की कोई कोशिश की गई।
बात तत्‍कालीन सिंचाई मंत्री शिवपाल यादव तक भी पुहंची किंतु नतीजा कुछ नहीं निकला। हालांकि शिवपाल यादव ने कहा था सिंचाई विभाग की जमीन कब्‍जाने वाले भूमाफिया बख्‍शे नहीं जायेंगे।
बाद में पता लगा कि उस स्‍तर तक भी JSR ग्रुप ने सेटिंग कर ली और मामला रफा-दफा कराने में सफल रहा जबकि ‘लीजेण्‍ड न्‍यूज़’ ने 26 अक्तूबर 2012 को ही ”ध्‍वस्‍त होंगे अशोका हाइट्स के 90 फ्लैट्स!” शीर्षक से लिखी अपनी खबर में ”भूमाफिया, बिल्‍डर एवं सरकारी मशीनरी के इस गठजोड़ को सामने ला दिया था।
‘लीजेण्‍ड न्‍यूज़’ ने 7 साल पहले ही उजागर किया था कि ‘अशोका हाइट्स’ के पिछले हिस्‍से में बनाये जा रहे करीब 90 फ्लैट्स पूरी तरह अवैध हैं और इनके निर्माण में एक ओर जहां सिंचाई विभाग की जमीन का दुरुपयोग किया गया है वहीं दूसरी ओर ग्राम समाज की जमीन भी घेरी गई है।
इस मामले में जब ”लीजेण्‍ड न्‍यूज़” ने अशोका हाइट्स बनाने वाले ग्रुप JSR हाउसिंग एण्‍ड डेवलेपर्स प्राइवेट लिमिटेड से सफाई मांगी तो ग्रुप के एक हिस्‍सेदार ने स्‍वीकार किया कि पार्टनर्स के बीच असहमति के बावजूद ग्रुप में शामिल कुछ लोगों ने अवैध निर्माण करा दिया।
अवैध निर्माण कराने वाले हिस्‍सेदारों का तर्क था कि एकबार घर की बुकिंग से पैसा हाथ में आ जाने के बाद उसी पैसे के बल पर अधिकारियों से सब-कुछ कराया जा सकता है।
अशोका हाइट्स के अवैध निर्माण को मिले सरकारी संरक्षण का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) की बात तो दूर, फ्लैट्स के बाहर भी इतनी जगह नहीं छोड़ी गई कि किसी हादसे की स्‍थिति में फायर ब्रिगेड की कोई गाड़ी मूव कर सके।
रहा सवाल भूकंपरोधी तकनीक के इस्‍तेमाल और दूसरी उन सुविधाओं का जिनका प्रचार करके लोगों को आकर्षित किया गया तो उनका खुलासा निर्माण के चलते ही हो गया था तब हो गया था जब पता लगा कि सीमेंट तक ”मेजर प्‍लांट” की जगह ”मिनी प्‍लांट” का इस्‍तेमाल किया गया है जिससे केवल रेत के महल ही खड़े किये जा सकते हैं और जिनकी हाइट यहां बसने वालों के लिए मौत की हाइट से कम साबित नहीं होती।
आश्‍चर्य इस बात पर भी है कि विकास प्राधिकरण ने कैसे जिंदा मक्‍खी निगल ली, बैंकें क्‍यों आंख बंद करके फाइनेंस करती रहीं, ग्राम पंचायत तथा फायर ब्रिगेड ने एनओसी किस आधार पर दे दी। लोगों को लूटने का एक सुनियोजित षड्यंत्र इन सभी विभागों की नाक के नीचे रचा गया लेकिन किसी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी।
बेशक इस ‘वेल प्‍लांड’ लूट के लिए वो लोग भी कम जिम्‍मेदार नहीं हैं जो बिल्‍डर्स के झांसे में आकर बिना कुछ देखे उन्‍हें पैसा थमा देते हैं।
इस संदर्भ में भी ‘लीजेण्‍ड न्‍यूज़” ने 21 अक्‍टूबर 2012 को ही एक चेतावनी भरा समाचार इस शीर्षक से लिखा था कि सावधान ! अशोका सिटी व अशोका हाइट्स में मकान तो नहीं ले रहे?’ लेकिन तब खरीदारों ने समाचार पर गौर करना शायद जरूरी नहीं समझा।
आज स्‍थित यह है कि JSR ग्रुप के बैनर तले डैपियर नगर में अशोका टावर, गणेशरा रोड पर अशोका हाइट्स और गोवर्धन चौराहे के निकट नेशनल हाईवे पर अशोका सिटी बनाने वाला ग्रुप पूरी तरह बिखर चुका है। उसके सारे हिस्‍सेदार अपना-अपना पैसा नए बिल्‍डर से लेकर निकल चुके हैं। उनके बीच जो झगड़े थे, वो भी उन्‍होंने आपस में मिल-बैठकर सुलझा लिए हैं।
जिन सरकारी अधिकारियों ने JSR ग्रुप को अवैध निर्माण की खुली छूट दी थी, वो भी कहां से कहां पहुंच चुके हैं।
रह गए हैं तो केवल जगह-जगह धक्‍के खाने पर मजबूर भ्रष्‍टाचार की नींव पर खड़ी की गईं इन इमारतों के वाशिंदे जिनकी आज सुनवाई तक करने को कोई तैयार नहीं है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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