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बुधवार, 24 दिसंबर 2025
डालमिया बाग के बाद अब वृंदावन की सनसिटी अनंतम का बड़ा कारनामा: MVDA, वन विभाग सहित 9 को नोटिस
अभी बहुत समय नहीं बीता जब वृंदावन के छटीकरा रोड स्थित डालमिया बाग का मामला NGT से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था। सुप्रीम कोर्ट ने उसमें बेहद सख्त रुख अपनाते हुए न केवल करोड़ों रुपए का जुर्माना ठोका बल्कि अनेक शर्तों के साथ ऐसा आदेश पारित किया, जिसके कारण आज 'गुरू कृपा तपोवन' के नाम से प्रस्तावित पूरा हाउसिंग प्रोजेक्ट खटाई में पड़ चुका है।लेकिन लगता है कि रियल एस्टेट के कारोबार में सक्रिय माफिया न तो किसी आदेश-निर्देश से कोई सीख लेता है और न अदालतों के रुख की परवाह करता है। आखिर बात करोड़ों के नहीं, अरबों के लाभ की जो है।
तभी तो अब वृंदावन के ही छटीकरा रोड पर सुनरख बांगर में सनसिटी अनंतम को डेवलप करने वाले समूह ने ऐसा कारनामा कर दिखाया है जिसकी कल्पना तक कोई आसानी से नहीं कर सकता। ऐसे में एक सवाल यह जरूर उठता है कि कैसे कोई रियल एस्टेट ग्रुप इतना दुस्साहस कर पाता है, और कौन हैं जो किसी समूह को इतना हौसला देते हैं कि वह सुप्रीम कोर्ट के आदेश-निर्देश से पेश नजीर को अहमियत देना आवश्यक नहीं समझता। जवाब साफ है। रियल एस्टेट के कारोबार में सक्रिय माफिया को इस दुस्साहस के लिए सबसे अधिक प्रोत्साहन विकास प्राधिकरण से मिलता है जिसे कृष्ण की नगरी में मथुरा वृंदावन विकास प्राधिकरण यानी MVDA कहते हैं।
इसके बाद नंबर आता है प्रदूषण विभाग और वन विभाग का। हालांकि सनसिटी अनंतम के केस में उत्तर प्रदेश प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड (UPPCB) ने CTE अर्थात Consent to Establish अस्वीकृत करने की सिफारिश की है, बावजूद इसके रियल एस्टेट माफिया गैरकानूनी तौर पर अपना काम कर रहा है।
दिल्ली-आगरा रोड पर नेशनल हाईवे नंबर 19 के किनारे अनुमानित 400 एकड़ से अधिक में बनाई जा रही इस टाउनशिप की भव्यता का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि यहां मात्र 240 वर्गगज में बने एक विला की शुरूआती कीमत 6 करोड़ रुपए से ज्यादा रखी गई है।
बहरहाल, अब NGT की Principal Bench ने इससे संबद्ध मूल आवेदन संख्या 649/2025 की सुनवाई करते हुए सूचीबद्ध किया है और उत्तर प्रदेश सरकार, उत्तर प्रदेश प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड, राज्य पर्यावरण प्रभाव आंकलन प्राधिकरण (SEIAA-UP) पर्यावरण विभाग, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC), केंद्रीय भू जल प्राधिकरण (CGWA), प्रभागीय वन अधिकारी वन विभाग मथुरा, MVDA (मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण, जिलाधिकारी मथुरा तथा एमएस सनसिटी हाईटेक प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता आशुतोष सिंह को नोटिस देकर जवाब तलब किया है।
दरअसल, ताज ट्रपेजियम जोन (TTZ) के अंतर्गत आने वाले सनसिटी अनंतम प्रोजेक्ट को लेकर दायर याचिका पर NGT में 18 दिसंबर को हुई सुनवाई के बीच याचिकाकर्ता के अधिवक्ता एन के गोस्वामी ने पीठ को अवगत कराया कि अब तक इस प्रोजेक्ट के लिए कोई वैधानिक अनुमति ली ही नहीं गई है। प्रोजेक्ट के लिए न तो Consent to Establish है, न Conset to Operate (CTO) है और न कार्यशील सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) है।
यहां सीवेज को मध्ययुगीन प्रथा की तरह टैंकरों के जरिए आसपास के इलाकों में निस्तारित कराया जा रहा है जो पर्यावरण की दृष्टि से तो अनुचित है ही, स्वास्थ्य के नजरिए से भी हानिकारक है और इसका प्रभाव लोगों पर पड़ रहा है। अधिवक्ता एन के गोस्वामी ने इसे पीठ के समक्ष कानून के शासन को 'कार्डियक अरेस्ट' की संज्ञा देते हुए गंभीर प्रश्न खड़ा किया।
यही नहीं, विद्वान अधिवक्ता ने पीठ के सामने सेटेलाइट इमेज पेश करते हुए यह जानकारी भी दी कि सनसिटी अनंतम के लिए बिना किसी अनुमति के 400 से अधिक दरख्तों को काटा गया है। ये संख्या इससे अधिक भी हो सकती है।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने इस दौरान MVDA को कठघरे में खड़ा करते हुए पीठ को बताया कि जब उत्तर प्रदेश प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड जैसी संस्थाएं इस प्रोजेक्ट के लिए एनओसी को खारिज करने की संस्तुति कर चुकी हैं तब जून 2025 में ही MVDA द्वारा सनसिटी अनंतम के लिए लाइसेंस प्रदान कर दिया गया और निजी प्रतिवादियों को लाभ पहुंचाने के लिए जमीन के अधिग्रहण की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गई, जो अब भी जारी है।
इससे साफ जाहिर है कि राज्य की जिस मशीनरी पर प्रोजेक्ट को कानूनी प्रक्रिया से पूरा कराने की जिम्मदारी है, वही निजी स्वार्थ में गैरकानूनी काम करने वालों को संरक्षण दे रही है। यहां यदि ये कहें कि रियल एस्टेट माफिया और अधिकारियों के बीच गहरी सांठगांठ से ही यह संभव है, तो कुछ गलत नहीं होगा। इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 13 मार्च 2026 की तारीख तय की गई है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
रविवार, 21 दिसंबर 2025
MVDA की मोटी रिश्वत का जरिया बने वैध कॉलोनियों में चल रहे अवैध निर्माण कार्य और ग्रीन बेल्ट पर कब्जा
उत्तर प्रदेश में जिन सरकारी विभागों को 'भ्रष्टाचार का पर्याय' माना जाता है, उनमें विकास प्राधिकरण का नाम प्रमुखता से लिया जा सकता है। संभवत: इसीलिए आम आदमी की भाषा में इसे 'विनाश प्राधिकरण' कहते हैं। प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली बीजेपी की सरकार बनने के बाद भ्रष्टाचार को लेकर 'जीरो टॉलरेंस' की नीति अख्तियार करने का एलान किया गया। 2017 में पहली बार सीएम की कुर्सी पर काबिज हुए योगी आदित्यनाथ ने 25 मार्च 2022 को दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। अब 2027 की पहली तिमाही में फिर से यूपी के विधानसभा चुनाव होने हैं।
इस दौरान गोरक्ष पीठाधीश्वर महंत अवैद्यनाथ के उत्तराधिकारी योगी आदित्यानाथ ने उत्तर प्रदेश को 'उत्तम प्रदेश' बनाने के प्रयास में कोई कसर नहीं छोड़ी, बावजूद इसके भ्रष्टाचार को लेकर 'जीरो टॉलरेंस' की उनकी नीति विकास प्राधिकरण जैसे विभाग में कतई प्रभावी दिखाई नहीं देती।
रिस्क अधिक तो रिश्वत भी अधिक
सच्चाई तो यह है कि तमाम सरकारी विभागों के अधिकारी और कर्मचारियों ने योगीराज की इस नीति को बड़ी चालाकी से अपने पक्ष में करके रिश्वत के रेट बढ़ा दिए हैं। इन विभागों में साफ-साफ कहा जाता है कि अब रिस्क अधिक है इसलिए काम कराने के पैसे भी अधिक देने होंगे। विकास प्राधिकरण इन विभागों में सबसे ऊपर आता है।
वैसे तो कहीं भी और किसी भी अवैध निर्माण को पहले चुपचाप होते देखना, फिर मौका मिलते ही उसे भुना लेना विकास प्राधिकरण के अधिकारियों की पुरानी फितरत है, लेकिन अब स्थिति यहां तक जा पहुंच चुकी है कि 'वैध कॉलोनियों' में किए जा रहे 'अवैध निर्माण' को भी विभाग ने 'दुधारू गाय' बना लिया है।
भरपूर भ्रष्टाचार के लिए अपनाई गई विकास प्राधिकरण की इस नई नीति का ही नतीजा है कि आज अप्रूव्ड और स्थापित पॉश कॉलोनियों में भी लोग बेखौफ होकर अवैध निर्माण कर रहे हैं, जिससे न सिर्फ इन कॉलोनियों की सुंदरता नष्ट हो रही है बल्कि सड़कें संकरी और पार्क आदि नष्ट-भ्रष्ट हो चुके हैं। अधिकांश ग्रीन बेल्ट पर प्रभावशाली लोगों ने कब्जा कर लिया है। शर्मनाक बात यह है कि अवैध निर्माण करने वालों और ग्रीन बेल्ट कब्जाने वालों में सत्ता से जुड़े लोग, डॉक्टर, इंजीनियर, बड़े-बड़े उद्योगपति, कारोबारी, व्यापारी और यहां तक कि खुद को समाजसेवी कहने वाले भी शामिल हैं।
श्री राधापुरम एस्टेट बना सबसे बड़ा उदाहरण
खबर के साथ दिखाए गए चित्र भगवान श्रीकृष्ण की पावन जन्मस्थली मथुरा में स्थित पॉश कॉलोनी 'श्री राधापुरम एस्टेट' के हैं। नेशनल हाईवे नंबर-19 के किनारे बसी इस कॉलोनी में दो कमरे के एक मकान की कीमत आज ढाई करोड़ रुपए से अधिक है, जिसे खरीद पाना सामान्य जन के लिए आसान नहीं है।
मशहूर रियल स्टेट कारोबारी 'श्री ग्रुप' द्वारा 50 एकड़ से अधिक जमीन पर विकसित की गई यह कॉलोनी शुरूआत में इसलिए चर्चा का विषय थी कि यहां बनाए गए सभी मकान रूप-रंग में समान थे और चारों ओर दर्जनों बेहतरीन पार्कों के अलावा ग्रीन बेल्ट के तौर पर काफी हिस्सा छोड़ा गया था।
करीब 750 मकानों वाली इस कॉलोनी में आज की स्थिति यह है कि 25 प्रतिशत मकान ही अपने मूल स्वरूप में बचे हैं। 75 प्रतिशत मकानों का पूरा नक्शा ही बदल दिया गया है। कुछ मकान तो पूरी तरह ध्वस्त करके दोबारा खड़े किए जा चुके हैं, और यह सिलसिला लगातार जारी है। लेकिन न कोई रोकने वाला है और न टोकने वाला। नक्शा पास कराए बिना अधिकांश मकानों का निर्माण दो और तीन मंजिल तक जा पहुंचा है क्योंकि सबकी मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण यानी MVDA से 'सेटिंग' हो जाती है।
योगी सरकार की भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति का श्री राधापुरम एस्टेट में किस कदर मजाक उड़ाया जा रहा है, इसका अंदाज बड़े पैमाने पर हुए अवैध निर्माण तथा ग्रीन बेल्ट के बड़े हिस्से पर कब्जे से लगाया जा सकता है। कुछ मकान मालिकों की मनमानी का आलम तो यह है कि उन्होंने बेखौफ होकर ग्रीन बेल्ट में अपने दरवाजे निकाल लिए हैं। किसी ने पूरा प्लेटफॉर्म बना लिया है, तो किसी ने टिन शेड डालकर कब्जा कर लिया है। ये लोग उसे पूरी तरह अपने मकान का हिस्सा मानकर उस पर काबिज हो चुके हैं।
हालांकि कॉलोनी का संचालन करने वाली सोसायटी के नवनिर्वाचित पदाधिकारियों ने पहली बार ऐसे कुछ तत्वों को नोटिस देकर उनसे जवाब-तलब किया है, किंतु लगता नहीं कि उसका कोई बड़ा असर होगा। उसकी वजह यह बताई जाती है कि अवैध निर्माण करने वाले तथा ग्रीन बेल्ट कब्जाने वालों में वो सफेदपोश माफिया भी शामिल हैं, जिनका जिक्र ऊपर किया जा चुका है।
रही-सही कसर तब पूरी हो जाती है जब शिकायत किए जाने पर MVDA नोटिस-नोटिस खेलकर ''बड़ा खेल'' कर देता है और शिकायत की आड़ में सुविधा शुल्कर बढ़ाकर आंखें मूंद कर बैठ जाता है। दरअसल, करोड़ों की जमीन पर काबिज होने की कीमत का लाखों में सौदा करके रिश्वत लेने वाले और देने वाले, दोनों ही खुश रहते हैं।
पूर्व में कॉलोनी का संचालन कर रहे पदाधिकारियों ने इस ओर कभी ध्यान तक देना जरूरी नहीं समझा। फिर चाहे कोई मकान का नक्शा बदल ले, बहुमंजिला निर्माण करा ले, पार्कों पर कब्जा कर ले या उन्हें बर्बाद कर दे, सोसायटी के पदाधिकारियों का इससे कोई लेना-देना नहीं था।
यही कारण रहा कि शहर की सर्वाधिक पॉश कॉलोनियों में शुमार 'श्री राधापुरम एस्टेट' के अधिकांश निवासी अवैध कब्जे को अपना अधिकार समझ बैठे। जिसका नतीजा आज सामने है।
ये बात अलग है कि उनकी इस मनमानी का पूरा लाभ विकास प्राधिकरण लगातार उठा रहा है। नवधनाढ्यों की यह कॉलोनी आज MVDA के अधिकारी एवं कर्मचारियों के लिए मोटी रिश्वत का माध्यम बन चुकी है।
बात चाहे मकान का नक्शा बदलने की हो या फिर उसे रीसेल करने की। हर हाल में विकास प्राधिकरण के अधिकारियों की बन आती है। वो मौका मुआयना करने के बाद खुद ही बता देते हैं कि गैर कानूनी कार्य को किस तरह 'कानूनी जामा' पहनाना है और उसकी कीमत कितनी होगी।
इस पूरी प्रक्रिया में सरकार को लगने वाले चूने का 'लेखा-जोखा' आंक कर सौदेबाजी की जाती है ताकि दोनों पक्ष अपने-अपने हिसाब से खुद को विजेता समझ सकें।
योगी सरकार की भ्रष्टाचार को लेकर अपनाई गई 'जीरो टॉलरेंस' नीति को भुनाने में अपनाई जा रही यह ट्रिक सिर्फ एक कॉलोनी तक सीमित नहीं है। ब्रज की दूसरी दर्जनों कॉलोनियों में भी इसी ट्रिक से अवैध निर्माण कराया जा रहा है और इससे मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के अधिकारी तथा कर्मचारी अपनी तिजोरियां भर रहे हैं। यदि योगी सरकार अब भी इस तरफ ध्यान दे तो एक ओर जहां अच्छी-खासी वेल डेवलप कॉलोनियां बदसूरत होने से बच सकती हैं वहीं दूसरी ओर वैध व व्यवस्थित तरीके से निर्माण कराकर सरकारी खजाना भी भरा जा सकता है। अन्यथा भ्रष्टाचार रोकने के लिए बनी 'जीरो टॉलरेंस' नीति इसी तरह सरकारी अधिकारी और कर्मचारियों के लिए वरदान साबित होती रहेगी, साथ ही विकास की बजाय विनाश का कारण भी बनेगी।
-Legend News
बुधवार, 17 दिसंबर 2025
कई गंभीर सवाल खड़े करता है मथुरा में सैकड़ों वकीलों के चैंबर पर चला प्रशासन का बुलडोजर
कानून-व्यवस्था की सबसे ताकतवर रूप में स्थापित एक इकाई अधिवक्ता ही यदि कानून-व्यवस्था के रखवालों से पीड़ित दिखाई दे तो इससे कई गंभीर सवाल खड़े हो जाना लाजिमी है, क्योंकि सामान्य तौर पर किसी काले कोट वाले के खिलाफ कोई कदम उठाने से पहले पुलिस अथवा प्रशासनिक अधिकारी 36 बार सोचते हैं। और यदि मामला पूरे अधिवक्ता समाज से जुड़ा हो, तो पुलिस प्रशासन के लिए सिरदर्द से कम नहीं होता। बीते शनिवार-रविवार की रात कलक्ट्रेट परिसर मथुरा में एसपी सिटी कार्यालय के पीछे जिला प्रशासन ने वकीलों के करीब 200 चैंबर बुलडोजर से ध्वस्त कर दिए। वकीलों को इसकी जानकारी रविवार सुबह हुई। उम्मीद के मुताबिक वकीलों ने प्रशासन पर एक ओर जहां बिना किसी पूर्व सूचना अथवा नोटिस के ध्वस्तीकरण की कार्रवाई किए जाने का आरोप लगाया वहीं दूसरी ओर आज यानी सोमवार से बार एसोसिएशन ने बेमियादी हड़ताल का भी एलान कर दिया। बार एसोसिएशन मथुरा अब इस लड़ाई को कहां तक लेकर जाएगी और उसके द्वारा घोषित बेमियादी हड़ताल कितने दिन चलेगी, ये तो आने वाला वक्त ही बताएगा। अलबत्ता इस पूरे प्रकरण पर गौर करें तो कुछ महत्वपूर्ण सवाल स्वत: खड़े हो जाते हैं। ये वो सवाल हैं जिन पर इस सम्मानजनक पेशे से जुड़े लोगों को न केवल गंभीरता पूर्वक विचार करना होगा बल्कि सच कहें तो अपने गिरेबान में भी झांकना होगा।
यहां सबसे पहला सवाल तो यही खड़ा होता है कि क्या कोई प्रशासनिक अधिकारी जिलाधिकारी के संज्ञान में लाए बिना वकीलों के सैकड़ों चैंबर पर रातों-रात बुलडोजर चलाने की हिमाकत कर सकता है?
हालांकि दैनिक जागरण में छपी खबर के मुताबिक जिलाधिकारी कहते हैं कि उन्हें वकीलों के चैंबर ध्वस्त किए जाने की कोई जानकारी नहीं है क्योंकि वह जिला मुख्यालय से बाहर गए हुए हैं।
जिलाधिकारी की बात सही है तो ये जांच का विषय हो सकता है, किंतु दूसरा बड़ा सवाल तब खड़ा होता है जब वकीलों का ही एक वर्ग यह कहता है कि कहीं भी और कभी भी चैंबर बना लेना किसी भी नजरिए से उचित नहीं है।
लीजेंड न्यूज़ ने जब इस पूरे प्रकरण की सच्चाई जानने का प्रयास किया तो बहुत चौंकाने वाली बातें सामने आईं।
दरअसल, बहुत से वकीलों ने स्वीकार किया कि बिना डीएम की जानकारी के यह संभव ही नहीं है कि उनका कोई अधीनस्थ अधिकारी इतना बड़ा कदम उठा सके।
वो तो यहां तक कहते हैं कि रातों-रात वकीलों के चैंबर ध्वस्त कराने में वकीलों के ही उस प्रभावशाली गुट का हाथ है जिसके निजी हित जिला प्रशासन से पूरे होते हैं।
समाज में वकालत के पेशे की साख बनाकर रखने वाले अधिकांश वकील मानते हैं कि अब बहुत से ऐसे तत्व इस पेशे से जुड़ गए हैं जिनके लिए काला कोट और बार एसोसिएशन की सदस्यता सिर्फ एक आड़ का काम करती है। उनका मूल व्यवसाय विवादित जमीनों की खरीद-फरोख्त करना और फिर उसके लिए कानून के चोगे का दुरुपयोग करना है।
चूंकि इन तत्वों के लिए खुद को शो-ऑफ करना बेहद जरूरी होता है इसलिए वो महंगी-महंगी गाड़ियों में बिना किसी जरूरी काम के भी कलक्ट्रेट आते हैं और चैंबर पर इस तरह बैठते हैं जैसे वह बड़े प्रैक्टिशनर वकील हों और हर रोज अदालत में उनकी मौजूदगी अहमियत रखती हो।
बताया जाता है कि मथुरा में अब ऐसे तत्वों की तादाद इतनी ज्यादा हो गई है कि इनका गुट नामचीन प्रैक्टिशनर वकीलों पर भी हावी है और वो इनके सामने पड़ने से भी कतराते हैं। जाहिर है कि ऐसे में हर निर्णय इन तत्वों के प्रभाव में जाता है, जबकि तमाम वकील इनसे इत्तेफाक नहीं रखते।
नामचीन प्रैक्टिशनर वकीलों की मानें तो सैकड़ों चैंबर ध्वस्त कराने और फिर उनके विरोध में खड़े दिखाई देने के पीछे एक कारण जनवरी में प्रस्तावित बार एसोसिएशन मथुरा के चुनाव भी हैं। इन चुनावों में अब आम चुनावों की तरह जाति तथा धर्म का प्रभाव इस कदर हावी हो चुका है कि वकीलों का हित चाहने वालों का चुनकर आना लगभग समाप्त हो गया है।
कहा जा रहा है कि ये सारा खेल प्रशासन को बरगलाकर निजी हित साधने तथा चुनावी दांव-पेंच के लिए खेला गया है ताकि गुटबाजी को और हवा दी जा सके, उसे और सुर्ख किया जा सके।
बहरहाल, यदि यही हाल रहा तो इसका खामियाजा समूचे अधिवक्ता समाज को भुगतना होगा। साथ ही एक सम्मानजनक पेशे की साख भी दिन-प्रतिदिन प्रभावित होगी।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि यह घटनाक्रम बार एसोसिएशन मथुरा के साथ-साथ प्रैक्टिशनर वकीलों के लिए भी किसी परीक्षा की घड़ी से कम नहीं है। देखना यह होगा कि इस परीक्षा से वो कैसे निपटते हैं और क्या इससे कोई सबक लेकर बड़ी लकीर खींचने का काम करते हैं।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
रविवार, 5 अक्टूबर 2025
वो सरकारी विभाग, जहां दम तोड़ देती है योगी बाबा की भ्रष्टाचार को लेकर बनी जीरो टॉलरेंस नीति
दैनिक जागरण के आगरा एडिशन की संपादकीय में 2 अक्टूबर गांधी जयंती को 'यह कैसी कार्यशैली' शीर्षक से एक महिला का दर्द लिखा है। दरअसल, इस महिला ने लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए) से नीलामी में सवा करोड़ रुपए मूल्य का एक भूखंड खरीदकर वहां अपना घर बनवाया। प्राधिकरण से ही नीलाम भूखंड पर बने इस घर को हाल ही में लखनऊ विकास प्राधिकरण ने ध्वस्त कर दिया। शिकायत के बाद जांच होने पर एलडीए ने माना कि लेआउट परिवर्तन के दौरान गलती से यह भूखंड 'मिसिंग' में दर्ज हो गया, जिसके कारण मकान के ध्वस्तीकरण की कार्रवाई हुई। नीलामी में सवा करोड़ का प्लॉट खरीदने के बाद महिला ने उस पर मकान कितनी मुश्किलों से और और कैसे-कैसे पैसे का इंतजाम करके बनवाया होगा, इसका अंदाज कोई भी लगा सकता है। लेकिन भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे सरकारी संरक्षण प्राप्त विकास प्राधिकरण के अधिकारी अब उस महिला को 'फ्लैट' ऑफर कर रहे हैं। जरा सोचिए कि यह हाल तो प्रदेश की राजधानी के उस विकास प्राधिकरण का है जहां स्वयं मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अपने पूरे मंत्रिमंडल और सभी बड़े अफसरों के साथ बैठते हैं।
यह भी सोचिए कि जब लखनऊ विकास प्राधिकरण का यह आलम है तो प्रदेश के उन शहरों की डेवलपमेंट अथॉर्टीज का क्या हाल होगा, जहां से लखनऊ तक आवाज पहुंचाना भी आसान काम नहीं है।
सीएम योगी अपने पहले कार्यकाल से यह कहते चले आ रहे हैं कि भ्रष्टाचार पर उनकी सरकार कोई कंप्रोमाइज नहीं करेगी और इसे लेकर उनकी नीति हमेशा जीरो टॉलरेंस की रहेगी।
ऐसे में इस तरह के सवाल उठना स्वाभाविक है कि योगी सरकार की इतनी सख्ती और स्वयं योगी आदित्यनाथ की बेदाग छवि के बावजूद विकास प्राधिकरण के भ्रष्ट अधिकारियों एवं कर्मचारियों की पूंछ सीधी क्यों नहीं होती?
क्यों प्रदेशभर के विकास प्राधिकरण भ्रष्टाचार का पर्याय बने हुए हैं और क्यों उनके मन में योगी सरकार अथवा योगी आदित्यनाथ का कोई खौफ नहीं है?
इन प्रश्नों का एक ही उत्तर है कि योगी सरकार ने जिस तरह का अभियान कानून-व्यवस्था पर फोकस करके सामाजिक अपराधियों के खिलाफ चलाया, वैसा कोई अभियान भ्रष्टाचारियों के खिलाफ आज तक कभी नहीं चलाया गया। कभी-कभार किसी अधिकारी पर कोई कार्रवाई हुई भी है तो वह भ्रष्टाचारियों के मन में भय व्याप्त करने के लिए अपर्याप्त रही। और अगर बात करें विशेष तौर पर प्रदेश के सर्वाधिक भ्रष्ट विभाग विकास प्राधिकरण की तो उसका कोई अधिकारी शायद ही कभी कार्रवाई के भी दायरे में आया हो। यही कारण है कि विकास प्राधिकरण के आगे शहरों के नाम भले ही बदल जाते हैं परंतु उसकी भ्रष्ट कार्यशैली कहीं नहीं बदलती। वह हर जगह एक जैसी पायी जाती है।
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण, अंधेर नगरी-चौपट राजा
देश ही नहीं, दुनिया में अपनी विशिष्ट धार्मिक पहचान रखने वाली योगीराज भगवान श्रीकृष्ण की पावन जन्मस्थली और क्रीड़ास्थली मथुरा-वृंदावन के विकास प्राधिकरण का हाल जानकर तो ऐसा लगता है जैसे यहां अंधेर नगरी-चौपट राजा की कहावत चरितार्थ हो रही हो।
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण को यदि भ्रष्ट अधिकारियों का पसंदीदा स्थान कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी।
वृंदावन का डालमिया बाग घोटाला है सबसे बड़ा उदाहरण
पिछले साल इन्हीं दिनों वृंदावन स्थित डालमिया बाग पर गुरुकृपा तपोवन के नाम से एक कॉलानी डेवलप करने के लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण में नक्शा मूव किया गया, लेकिन अप्रूवल से पहले ही भूमाफिया ने जमकर उसका फर्जी प्रचार किया और प्लॉट बुक करने शुरू कर दिए। माफिया ने इस नक्शे के आवेदन की आड़ में अनुमानत: एक हजार करोड़ रुपया एकत्र कर लिया परंतु विकास प्राधिकरण तमाशा देखता रहा।
चूंकि भूमाफिया ने कॉलोनी डेवलेव करने की जल्दी में डालमिया बाग के साढ़े चार सौ से अधिक हरे वृक्ष रातों-रात काट डाले इसलिए यह मामला पहले एनजीटी और फिर सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा।
मामला देश की सर्वोच्च अदालत की चौखट पर पहुंचा तो सरकार के कानों पर भी जूं रेंगनी प्रारंभ हुई, नतीजतन तत्कालीन कमिश्नर आगरा मंडल ऋतु माहेश्वरी ने भी मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (एमवीडीए) की भूमिका का पता लगाने के लिए एक कमेटी का गठन कर जांच रिपोर्ट पेश करने को कहा।
बहरहाल, चोर-चोर मौसेरे भाई की कहावत फिर सच साबित हुई और मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के किसी अधिकारी का कुछ नहीं बिगड़ा। ये बात अलग है कि सुप्रीम कोर्ट के सख्त फैसले ने एक ओर जहां भूमाफिया की पूरी प्लानिंग चौपट कर दी वहीं विकास प्राधिकरण (एमवीडीए) के अधिकारियों की हसरतों पर पानी फेर दिया क्योंकि इस प्रोजेक्ट के डेवलपर, एमवीडीए के अधिकारियों की दुधारू गाय साबित हो रहे थे। यदि सब-कुछ वैसे ही चलता रहता जैसे एमवीडीए के अधिकारी और भूमाफिया चाह रहे थे तो भूमाफिया जहां अरबों कमाते वहीं कई अधिकारी करोड़ों कमा ले गए होते।
जो भी हो, मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के लिए न तो गुरुकृपा तपोवन कोई पहला प्रोजेक्ट था और न अंतिम। दुनिया के आकर्षण का केंद्र मथुरा नगरी में जाने कितने डेवलपर हर रोज विकास प्राधिकरण के चक्कर काटने को मजबूर हैं। कोई अवैध निर्माण के लिए चक्कर काट रहा है तो कोई वैध काम कराने के लिए क्योंकि काम कैसा भी हो, विकास प्राधिकरण की चौखट चूमे बिना कुछ भी संभव नहीं हो सकता।
बड़े-बड़े करोड़पति और अरबपति दो के चार और सात के सोलह इनकी कृपा के बिना नहीं कर सकते। इनकी नजर बनी रहे तो शहर के बीचों-बीच अवैध बहुमंजिला इमारत खड़ी की जा सकती है और ये यदि नजर फेर लें तो वैध इमारत को भी मिट्टी में मिला सकते हैं।
लखनऊ की उस महिला का वैध मकान इसका सबसे बड़ा सबूत है। जमीन चाहे प्राधिकरण से ही क्यों न खरीदी हो, प्राधिकरण के अधिकारियों को चढ़ावा चढ़ाए बिना लेआउट आसानी से परिवर्तन हो सकता है और भूखंड ''मिसिंग'' शो करके मकान पर बुलडोजर भी चल सकता है।
रही बात योगी बाबा के जीरो टॉलरेंस की तो उसकी जद में अब तक विकास प्राधिकरण आता दिखाई नहीं देता। क्या प्रदेश की राजधानी लखनऊ और क्या कृष्ण की जन्मभूमि मथुरा, सबका हाल समान है। नक्कारखाने में तूती की आवाज वैसे भी सुनाई कहां देती है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शुक्रवार, 19 सितंबर 2025
...तो मनमोहन सिंह के कार्यकाल में दिया गया लोकतंत्र के सबसे कलंकित कारनामे को अंजाम!
भारत को 1990 के दशक से ठीक पहले से लेकर इस साल 22 अप्रैल को पहलगाम हमले तक आतंकवाद ने जितने जख्म दिए हैं, उसके घाव भले ही कम हो जाएं, निशान कभी नहीं मिट पाएंगे। फिर, जब कोई ये कह दे कि इस दौरान कोई ऐसी भी सरकार आई, जिसने इन सब के लिए जिम्मेदार आतंकवादी सरगनाओं को न सिर्फ 'अहिंसा का महात्मा' माना, बल्कि दुश्मन पाकिस्तान से बातचीत के लिए 'शांतिदूत' भी बना डाला तो फिर इस लोकतांत्रिक व्यवस्था पर ग्रहण लग सकता है। दरअसल, हम अपनी ओर से यह सब नहीं कह रहे हैं। यह दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल एक आतंकवादी सरगना के हलफनामे का हिस्सा है, जो न सिर्फ अनगिनत आतंकी वारदातों का आरोपी है, बल्कि आतंकवाद को बढ़ावा देने के लिए उम्रकैद की सजा भी काट रहा है।
लोकतंत्र का सबसे कलंकित कारनामा
हम देश की राजनीति के अब तक के सबसे स्याह दौर में से एक जिस समय की बात कर रहे हैं, वह है पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार का कार्यकाल। पूर्व पीएम और आतंकवादी यासीन मलिक के हाथ मिलाने वाली तस्वीर वर्षों से सोशल मीडिया को कलंकित करती रही है लेकिन 25 अगस्त 2025 को उसने दिल्ली हाई कोर्ट में जो हलफनामा दिया है, वह देश की राजनीति का अब तक का सबसे कलंकित कारनामा बन गया है। इसमें सजायाफ्ता आतंकी यासीन मलिक ने दावा किया है कि वह न सिर्फ तत्कालीन यूपीए सरकार के कहने पर पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा (LeT) के सरगना हाफिज सईद से मिला, बल्कि वापस आकर प्रधानमंत्री आवास में जाकर इसके बारे में तत्कालीन पीएम को बताया भी और पूर्व पीएम ने इसके लिए उसकी शान में कसीदे पढ़ना शुरू कर दिया।
सजायाफ्ता आतंकी है यासीन मलिक
यासीन मलिक टेरर फंडिंग केस में तिहाड़ जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहा है। उस पर जनवरी 1990 में श्रीनगर में भारतीय वायुसेना के चार अफसरों की हत्या का भी आरोप है। 1989 के अंत और 1990 की शुरुआत में जम्मू और कश्मीर से कश्मीरी पंडितों को जबरन भगाने की साजिश का भी उसे बहुत बड़ा गुनहगार माना जाता है। यही नहीं, पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबिया सईद के अपहरण में भी उसके शामिल होने का आरोप है, जिसके बदले रिहा किए गए खूंखार आतंकियों ने भारत विरोधी कई आतंकवादी संगठन बना चुके हैं।
आतंकवाद के आका को बनाया शांतिदूत
एफिडेविट में यासीन मलिक ने दावा किया है कि मनमोहन सरकार ने उसे इसी बहाने 2006 में पाकिस्तान भेजा था ताकि वह आतंकवादी सरगनाओं की मदद से पाकिस्तान के साथ शांति प्रक्रिया की पहल करवा सके। इन आतंकवादियों में सबसे प्रमुख हाफिज सईद था जिससे मनमोहन सरकार को उम्मीद थी कि वह पाकिस्तान की सरकार को बातचीत की प्रक्रिया में ला सकता है। हलफनामे में मलिक ने कहा है, जब मैं पाकिस्तान से नई दिल्ली लौटा, स्पेशल डायरेक्टर आईबी वीके जोशी मुझसे होटल में मिले और मुझसे अनुरोध किया कि मैं तुरंत प्रधानमंत्री को इसके बारे में बता दूं। उसने आगे कहा- मैं उसी शाम प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिला, जहां नेशनल सिक्योरिटी एडवाइजर एनके नारायण भी मौजूद थे। मैंने उन्हें मुलाकात के बारे में जानकारी दी और संभावनाओं के बारे में बताया। वहीं पर मुझे उन्होंने (मनमोहन ने) मेरी कोशिशों, वक्त, घैर्य और समर्पण के लिए मेरा आभार जताया।
पीएम की नजर में आतंकी अहिंसा का जनक!
आतंकवादी मलिक ने यहां तक कहा है कि 'जब मैं प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मिला तो उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहचट के कहा, मैं आपको कश्मीर के अहिंसक आंदोलन का जनक मानता हूं। यासीन मलिक को तो उसकी गुनाहों की सजा भारत में मिल रही है और बाकी मामलों में भी न्यायपालिका जरूर अनगिनत बेगुनाहों को न्याय जरूर देगी लेकिन हाफिज सईद जैसे आतंकियों का क्या होगा, जिसे एक सरकार ने शांतिदूत बनाना चाहा तो उसने 26/11 के मुंबई हमले और 22 अप्रैल के पहलगाम हमले जैसा कभी न खत्म होने वाला दर्द दे दिया। न जाने आज भी वह भारत के खिलाफ कौन सी नई साजिश रच रहा होगा?
शुक्रवार, 15 अगस्त 2025
सबूत सहित जानिए: क्या वाकई यूपी के बिजली विभाग ने ऊर्जा मंत्री और योगी सरकार की सुपारी ले रखी है?
क्या वाकई यूपी के बिजली विभाग ने ऊर्जा मंत्री और योगी सरकार की सुपारी ले रखी है? ये सवाल इसलिए क्योंकि बीती 23 जुलाई को ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा ने लखनऊ के शक्ति भवन में हुई समीक्षा बैठक के दौरान अधिकारियों को जमकर फटकारा था। इस समीक्षा बैठक में विभाग के चेयरमैन से लेकर अधिशासी अभियंता स्तर तक के अधिकारी शामिल थे।
ऊर्जा मंत्री ने अधिकारियों से कहा कि आप लोग आंख-कान बंद किए बैठे हैं जबकि जनता बिजली न आने से परेशान है। उन्होंने यहां तक बोला कि हमारी सरकार कोई दुकान नहीं चला रही कि जिसमें हमें सिर्फ वसूली की चिंता हो, हमारे लिए यह एक जनसेवा है और हमें उसी के अनुरूप काम करना होगा। ऊर्जा मंत्री ने अधिकारियों को फील्ड में जाने के निर्देश भी दिए। मंत्री महोदय ने कहा कि आपके गलत आचरण का खामियाजा पूरा प्रदेश भुगत रहा है।
इस समीक्षा बैठक के चार-पांच दिन बाद मंत्री महोदय के एक्स हैंडिल से लिखा गया कि विभाग के कुछ अधिकारी एवं कर्मचारियों ने ऊर्जा मंत्री की ''सुपारी'' ले रखी है। यही नहीं, सोशल साइट पर यह भी लिखा गया कि कुछ अधिकारी और कर्मचारी अराजक तत्वों के साथ मिलकर बिजली विभाग को बदनाम करने में लगे हैं।
गौरतलब है कि यूपी के ऊर्जा मंत्री खुद गुजरात कैडर के एक नौकरशाह रहे हैं और इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के काफी करीबी तथा भरोसेमंद माने जाते हैं। अब जरा अंदाज लगाइए कि पीएम का नजदीकी कोई पूर्व नौकरशाह जब अपने विभागीय अधिकारियों पर इतने संगीन आरोप लगा रहा हो तो उसके मायने कितने गंभीर हो सकते हैं। गंभीर इसलिए भी कि जो व्यक्ति स्वयं नौकरशाह रहा हो, वह नौकरशाहों की सभी कारगुजारियों से भली-भांति परिचित तो होगा ही।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी बोले
ऊर्जा मंत्री की समीक्षा बैठक और एक्स हैंडिल पर लिखी गई उनकी पोस्ट के बीच गत 25 जुलाई को सीएम योगी आदित्यनाथ ने ऊर्जा विभाग की उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा कि प्रदेश में बिजली व्यवस्था अब केवल तकनीकी या प्रशासनिक विषय नहीं, बल्कि जनता के भरोसे और शासन की संवेदनशीलता का पैमाना बन चुकी है।
सीएम योगी ने अफसरों को दो टूक शब्दों में कहा कि ट्रिपिंग, ओवरबिलिंग और अनावश्यक कटौती अब किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं की जाएगी, सुधार करना ही होगा। इसके साथ ही सीएम ने कहा कि लापरवाही अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। मुख्यमंत्री ने ट्रिपिंग की लगातार आ रही शिकायतों पर गहरी नाराजगी जताई और निर्देश दिया कि प्रत्येक फीडर की तकनीकी जांच हो, कमजोर स्थानों की पहचान कर तुरंत सुधार कराया जाए।
मुख्यमंत्री ने ऊर्जा विभाग के अधिकारियों से कहा कि संसाधनों की कोई कमी नहीं है। सरकार ने बिजली उत्पादन, पारेषण और वितरण को मजबूत करने के लिए रिकॉर्ड बजट उपलब्ध कराया है। ऐसे में किसी भी स्तर पर लापरवाही अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी। सभी डिस्कॉम के प्रबंध निदेशकों से उनके क्षेत्रों की आपूर्ति की स्थिति जानने के बाद मुख्यमंत्री ने निर्देश दिया कि हर स्तर पर जवाबदेही तय की जाए।
अचानक नाराज नहीं हुए ऊर्जा मंत्री और मुख्यमंत्री
ऊर्जा मंत्री और मुख्यमंत्री की बिजली विभाग के अधिकारियों को लेकर यह नाराजगी किसी एक दिन की कुव्यवस्था का परिणाम नहीं है। यह लंबे समय से चली आ रही अधिकारियों की लापरवाह कार्यप्रणाली से उपजा आक्रोश है। लेकिन घोर आश्चर्य की बात है कि विभागीय मंत्री तथा मुख्मंत्री की इतनी कठोर टिप्पणियों के बावजूद अधिकारी हैं कि सुधरने का नाम नहीं ले रहे।
कृष्ण की नगरी मथुरा इसका बड़ा उदाहरण
उदाहरण के तौर पर यूपी के अत्यंत महत्वपूर्ण जनपदों में शुमार मथुरा के बिजली अधिकारियों की कार्यशैली देखी जा सकती है।
उल्लेखनीय है कि मथुरा न केवल भाजपा के लिए राजनीतिक दृष्टि से एक अहम जिला है बल्कि धार्मिक नजरिए से भी विश्व पटल पर विशिष्ट स्थान रखता है। यहां प्रतिदिन लाखों श्रद्धालु विभिन्न स्थानों का भ्रमण करने तथा अपने आराध्य के दर्शन करने आते हैं।
योगी सरकार के सबसे पहले कार्यकाल में मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के विधायक पंडित श्रीकांत शर्मा को ही प्रदेश के ऊर्जा मंत्रालय का जिम्मा सौंपा गया था, और तब उन्होंने पूरे पांच साल बहुत अच्छे तरीके से बिजली की व्यवस्था को संभालने का काम किया था। प्रदेश की जनता आज उनके कार्यकाल को याद करती है। लेकिन अब अचानक ऐसा क्या हो गया कि उसी व्यवस्था पर ऊर्जा मंत्री अरविंद शर्मा से लेकर मुख्यमंत्री योगी तक नाराजगी जता रहे हैं।
कहने के लिए तो मथुरा में बिजली विभाग के सुपरिटेंडिंग इंजीनियर से लेकर चीफ इंजीनियर तक तैनात हैं किंतु उनके पास जनता तो छोड़िए, पत्रकारों तथा विधायकों की भी बात न तो सुनने का समय है और न उनके किसी मैसेज का जवाब देने का। सबूत के साथ बानगी देखिए-
ये वो मैसेज हैं जो Legend News की ओर से चीफ इंजीनियर (CE) तथा सुपरिंटेंडेट इंजीनियर (SE) को समय-समय पर भेजे गए। इन वाट्सऐप मैसेज में समय का काफी अंतर होने के बाद भी अधिकारियों की कार्यप्रणाली में कोई अंतर नजर नहीं आता।
मैसेज डिलीवर होने पर भी किसी प्रकार की कोई प्रतिक्रिया न देना इस बात को साबित करता है कि इन अधिकारियों को किसी का कोई खौफ नहीं है। इन्हें योगी सरकार के उन आदेश-निर्देशों की भी परवाह नहीं है जिसके तहत बार-बार कहा जाता है कि हर फोन तथा मैसेज का जवाब देना जरूरी है और तत्काल जवाब न दे पाने की स्थिति में समय मिलने पर संपर्क साधना आवश्यक है।
जाहिर है कि ये और इन जैसे प्रदेश के तमाम अधिकारी आश्वस्त हैं कि उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। यहां तक कि मंत्री और मुख्यमंत्री भी। यदि ऐसा नहीं होता तो नौकरशाहों की इतनी हिमाकत नहीं होती, और न ये इतने बेलगाम होते कि मंत्री तथा मुख्यमंत्री की नाराजगी से भी इनके कानों पर जूं नहीं रेंगती।
यहां यह जान लेना भी जरूरी है कि मथुरा में तैनात इन अधिकारियों सहित प्रदेशभर के बहुत से अधिकारियों का ऐसा दुस्साहस तभी संभव है जब वो जानते हों कि मंत्री और मुख्यमंत्री कहीं न कहीं इतने मजबूर हैं कि वो घुड़की तो दे सकते हैं, एक्शन नहीं ले सकते। वर्ना यदि एक-दो ऐसे अफसरों पर भी समुचित एक्शन हुआ होता तो ऐसी नौबत नहीं आती।
एक्शन हुआ होता तो न ऊर्जा मंत्री इतने असहाय दिखाई देते और न मुख्यमंत्री को नाराजगी जाहिर करनी पड़ती। 2027 के विधानसभा चुनाव बहुत दूर नहीं हैं। समय रहते यदि योगी सरकार नहीं चेती, तो इसका भाजपा को बड़ा नुकसान भी उठाना पड़ सकता है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शुक्रवार, 8 अगस्त 2025
मथुरा-वृंदावन नगर निगम का RDF घोटाला: करोड़ों के खेल में आखिर कितने हिस्सेदार?
नगर निगम मथुरा-वृंदावन में हुए RDF घोटाले की शिकायत यूं तो विभागीय मंत्री अरविंद कुमार शर्मा तथा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ तक पहुंच चुकी है, किंतु यहां बड़ा सवाल यह है कि करोड़ों के इस घोटाले में शामिल लोगों को आखिर कौन और क्यों बचा रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं घोटाले में कुछ ऐसे विभागीय अधिकारी एवं कर्मचारी भी हिस्सेदार हों, जिनके ऊपर घोटाले को सामने लाने की जिम्मेदारी बनती है।
ये गंभीर सवाल इसलिए उठ खड़े हुए हैं क्योंकि नगर निगम ने इस पूरे कांड की प्रमुख किरदार कंपनी के साथ "नोटिस-नोटिस" का खेल तो खूब खेला लेकिन उसे बैक डोर से न सिर्फ भुगतान किया जाता रहा बल्कि शेष भुगतान को भी दिलाए जाने की व्यवस्था की जा रही है।
गौरतलब है कि दयाचरण एंड कंपनी को वर्ष 2023 में नगर निगम मथुरा-वृंदावन ने कूड़े के निस्तारण का ठेका दिया लेकिन ठेका हासिल करने वाली यह कंपनी शुरू से ही अपने काम में बेहद लापरवाह रही नतीजा जहां-तहां काफी कूड़ा एकत्र होता रहा। \
जैसे-तैसे जब कंपनी पर काम पूरा करने का दबाव बनाया तो उसने उसे निर्धारित डंपिंग यार्ड में न डलवाकर सार्वजनिक स्थानों और यहां तक कि तालाब एवं जलाशयों में फिंकवा दिया जिससे कई बीमारियों के फैलने का खतरा है।
आश्चर्य की बात यह है इस पूरे प्रकरण में मथुरा-वृंदावन नगर निगम का कोई जिम्मेदार अधिकारी मुंह खोलने को तैयार नहीं है, अलबत्ता दबी जुबान ने कुछ कर्मचारी यह जरूर कहते हैं कि यदि किसी अधिकारी ने जुबान खोल दी तो कई पूर्व अधिकारी भी इस घोटाले की जांच के दायरे में होंगे इसलिए चुप्पी साधे बैठे हैं।
ऐसे ही कुछ कर्मचारियों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि वह 2019-20 में डूडा के माध्यम से नगर निगम में लगे थे लेकिन तब से लेकर आज तक न तो उनकी सुरक्षा के लिए तय उपकरण उपलब्ध कराए गए हैं और न उनका स्वास्थ्य परीक्षण कराया गया। यही नहीं, पिछले करीब दो साल से कूड़ा निस्तारण के लिए जरूरी मशीनें खराब पड़ी हुई हैं जिस कारण कूड़े के पहाड़ खड़े हो चुके हैं।
कर्मचारियों का दावा है कि दयाचरण एंड कंपनी को ठेका दिए जाने से लेकर अब तक मात्र 25 प्रतिशत कूड़े का निस्तारण किया गया है जबकि टेंडर के मुताबिक कंपनी को कूड़े के निस्तारण की प्रक्रिया पूरी करके उसे जूते बनाने वाली तथा कागज बनाने वाली कंपनियों को भेजना था जिससे नगर निगम की आय होनी थी।
दयाचरण एंड कंपनी की लापरवाही एवं अधिकारियों पर उसकी मेहरबानी के आलम का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कूड़ा निस्तारण की प्रक्रिया के लिए जरूरी बिजली का कनेक्शन तक उसने नहीं लगवाया और जो कुछ आंशिक काम किया उसके लिए नगर निगम की बिजली का इस्तेमाल किया गया।
हालांकि पिछले दिनों जब प्रदेश के नगर निकाय मंत्री अरविंद कुमार शर्मा मथुरा आए तो उनके संज्ञान में इस पूरे घोटाले और इसे संरक्षण दिए जाने की बात लाई गई किंतु उन्होंने शिकायत लिखित में पहुंचाने को कहकर लगभग अपना पल्ला झाड़ लिया। लेकिन बताया जाता है कि अब कुछ लोगों ने लिखित शिकायत भी मंत्री तथा मुख्यमंत्री तक पहुंचा दी है ताकि ठेकेदार का शेष भुगतान भी चोरी-छिपे कराकर करोड़ों के इस घोटाले का पूरी तरह पटाक्षेप न कर दिया जाए।
विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार नगर निगम के कुछ जिम्मेदार अधिकारी एवं कर्मचारियों द्वारा यह सारा खेल इसलिए खेला जा रहा है क्योंकि दयाचरण एंड कंपनी ने कहीं अन्यत्र कोई बड़ा टेंडर हासिल कर लिया है। ऐसे में यदि उसके खिलाफ मथुरा-वृंदावन नगर निगम से कोई कार्रवाई की जाती है तो उसका यह टेंडर भी खटाई में पड़ सकता है।
उसके खिलाफ मथुरा-वृंदावन नगर निगम से कोई ठोस कार्रवाई न हो और सबकुछ सामान्य तरीके से निपट जाए इसके लिए अधिकारियों को ऑब्लाइज भी किया जा रहा है क्योंकि यदि ऐसा नहीं होता तो अब तक दयाचरण एंड कंपनी को ब्लैक लिस्ट किया जा चुका होता।
जाहिर है कि कोई तो है जो इस पूरे घोटाले को पहले दिन से प्राश्रय दे रहा है और तमाम अनियमितताओं के बावजूद कंपनी के खिलाफ ठोस कार्रवाई करने की बजाय उसे लगातार बच निकलने के रास्ते उपलब्ध करा रहा है।
योगी सरकार की भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति तथा भगवान श्रीकृष्ण की नगरी के निवासियों की खुशहाली के लिए जरूरी है कि इस घोटाले की उच्च स्तरीय जांच कराकर इसमें संलिप्त सभी लोगों के चेहरे सामने लाए जाएं और उससे होने वाले बड़े नुकसान को रोका जाए।
-Legend News


