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रविवार, 19 दिसंबर 2010
बनारस ब्लास्ट..ध्यान बांटने की कोशिश!
लीजेण्ड न्यूज़ विशेष
बेशक ये दोनों ही टिप्पणियां गैरजिम्मेदारी का परिचय देती हैं लेकिन इनसे एक बात का पता जरूर लगता है कि देश की जनता और विशेषकर युवा वर्ग उन लोगों से किस कदर आजिज आ चुका है जो खुद को देश का कर्णधार तथा भाग्यविधाता कहते हैं।
यदि देखा जाए तो यह एक संदेश भी है कि स्वतंत्र भारत का युवा क्या सोचता है और वह किस मन: स्थति में जी रहा है। युवाओं की इन टिप्पणियों के गूणार्थ समझना यूं भी जरूरी है कि भारत को युवा देश माना जा रहा है यानि वो देश जिसकी कुल जनसंख्या में सबसे ज्यादा संख्या युवाओं की है।
संसद पर हमले को एक लम्बा अरसा गुजर गया लेकिन बनारस का बम ब्लास्ट हाल का है इसलिए फिलहाल यदि वहीं की बात करें तो अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या भ्रष्टाचार ने वाकई देश के हालात इतने खराब कर दिये हैं कि युवक ऐसा सोचने को बाध्य है ?
इस प्रश्न का उत्तर 'हां' में मिलता है क्योंकि दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र के चारों स्तंभों से भ्रष्टाचार की 'बू' आने लगी है। संवैधानिक तीनों स्तंभ यानि विधायिका, न्यायपालिका तथा कार्यपालिका में से विधायिका व कार्यपालिका तो काफी पहले भ्रष्ट हो चुके थे। यह भी कह सकते हैं कि वह कभी ईमानदार रहे ही नहीं। बाकी बची थी न्यायपालिका, तो वह भी अब अछूती नहीं रही। सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे ही नहीं कहा था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में कुछ सड़ रहा है। उधर सुप्रीम कोर्ट में भी सब-कुछ ठीक-ठाक नहीं है।
चौथा और गैर संवैधानिक स्तंभ कहलाता है मीडिया। गैर संवैधानिक होते हुए लोकतंत्र में मीडिया की एक अहम् व सशक्त भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। वह भूमिका जिसके कारण मीडिया का महत्व कभी कम नहीं हुआ और जिसके कारण तीनों संवैधानिक स्तंभ उसे अहमियत देने के लिए मजबूर रहे।
यह मीडिया भी भ्रष्टाचार की दलदल में बड़ी तेजी के साथ समा रहा है। पहले तो पेड न्यूज़ ने और अब स्पेक्ट्रम घोटाले ने मीडिया में भ्रष्टाचार को रेखांकित किया है लिहाजा सबका ध्यान इस ओर गया।
अब जबकि चारों स्तंभों को भ्रष्टाचार का घुन लग चुका हो और किसी भी देश का भविष्य कहलाने वाले युवाओं के भविष्य पर गहरा सवालिया निशान लगा हो, तो युवा सोचेगा भी क्या।
वह यही सोच सकता है क्योंकि उसे यह सब सोचने पर लगभग मजबूर किया जा रहा है।
बनारस के शीतला माता घाट पर किये गये बम विस्फोट से हालांकि बहुत अधिक नुकसान नहीं हुआ लेकिन बड़ा मुद्दा यह है कि आतंकी आखिर बार-बार हमारे यहां ब्लास्ट कर हमारी संप्रभुता को खुली चनौती दे रहे हैं और हम आज तक उनके रहमोकरम पर जिंदा हैं।
यही कारण है कि लोग आज पूछ रहे हैं- बनारस के बाद कहां ? उन्हें सरकार से कहीं अधिक आतंकियों के नेटवर्क पर भरोसा है। उन्हें मालूम है कि सरकार अभी तक ऐसा कोई तंत्र खड़ा नहीं कर पायी है जो आतंकवादियों की प्लानिंग का उसके अंजाम तक पहुंचने से पहले पता लगा सके।
सरकार प्रदेश की हो या देश की, उसे आतंकियों के बावत जो जानकारियां मिलती भी हैं वो इतनी मामूली होती हैं जिनके आधार पर किसी नतीजे तक नहीं पहुंचा जा सकता।
संभवत: इसीलिए बनारस ब्लास्ट के बाद केन्द्र और प्रदेश सरकारें एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप में उलझी हैं जबकि ब्लास्ट करने वालों का कोई सुराग नहीं लगा। जिनके ऊपर कानून-व्यवस्था का निर्वहन करने की जिम्मेदारी है, वह अंधेरे में तीर चला रहे हैं। वोट की राजनीति के लिए आजमगढ़ में दबिश न देने की हिदायत दे रहे हैं। दलील दी जा रही है कि आजमगढ़ को बदनाम किया जा रहा है। इनसे कोई ये पूछने वाला नहीं है कि विस्फोट करने वालों के तार आजमगढ़ से जुड़े होने की सूचना आम पब्िलक ने नहीं दी। ये सूचना भी सरकारी तंत्र ने ही दी। फिर आजमगढ़ में दबिश देने से मनाही क्यों ? सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि एक खास तबके का वोट बैंक उसकी वजह से प्रभावित न हो।
नेताओं के लिए राष्ट्रहित कोई मायने नहीं रखता, यह एक आम धारणा बन चुकी है। यह धारणा यूं ही नहीं बनी, इसके पीछे कुछ खास कारण हैं। सब जानते हैं कि जब कभी कोई आतंकी वारदात देश के अंदर कहीं होती है तो आतंकियों तक पहुंचने की बजाय सारा तंत्र इस बहस में उलझ जाता है कि वारदात को अंजाम देने वाले किस तबके से थे। वो हिंदू थे या मुसलमान। सिख थे या ईसाई। कोई यह नहीं सोचता कि वो किसी वर्ग से हों समाज, देश व मानवता के अपराधी हैं। उनकी पहचान किसी समुदाय से नहीं, उनके अपराध से की जानी चाहिए लेकिन ऐसा है नहीं। बस इसीलिए आज यह पूछा जा रहा है कि बनारस के बाद कहां ?
बात सही भी है क्योंकि कोई आतंकी वारदात आखिरी साबित नहीं होती। मुंबई पर किये गये आतंकी हमले के बाद यह माना जा रहा था कि सरकार शायद अब ऐसे कुछ मुकम्मल इंतजामात करेगी कि कोई आतंकी संगठन कहीं किसी वारदात को अंजाम नहीं दे पायेगा लेकिन यह विश्वास टूट गया।
जब आतंकवादी किसी एक जगह को बार-बार टारगेट बना सकते हैं तो उनके लिए किसी नई जगह पर वारदात करना और भी आसान है। बनारस को फिर टारगेट बनाकर उन्होंने यह संदेश दिया है कि वह जब चाहें और जहां चाहें, अपनी नापाक हरकतों को अंजाम दे सकते हैं। रही बात किसी नई जगह की तो कहीं भी कुछ करने को स्वतंत्र हैं।
जिन प्रमुख स्थानों पर आतंकी साया मंडराने की सूचनाएं मिलती रहती हैं, उनमें मथुरा तथा आगरा शामिल हैं। अब अगर बात करें यहां की सुरक्षा-व्यवस्था को लेकर तो वह कृष्ण जन्मभूमि, मथुरा रिफाइनरी तथा ताजमहल तक सीमित है। इसके बाद सब भगवान भरोसे हैं।
मथुरा हो या आगरा, कहीं के जिला प्रशासन को न तो यह मालूम है कि उनके जिलों में कितने मोबाइल उपभोक्ता हैं। कितने पोस्टपेड कनैक्शन हैं और कितने प्रीपेड। उनकी आइडेंटिटी सही है या फर्जी।
यहीं नहीं, पुलिस तथा प्रशासन को तो यह तक नहीं मालूम कि इन दो अति संवेदनशील जिलों में कितने साइबर कैफे हैं और कितने लोग व्यक्ितगत रूप से इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। जो इंटरनेट यूजर हैं, उनका पेशा क्या है।
इन हालातों में किसी के भी द्वारा इसका दुरुपयोग किया जाना बहुत मामूली बात है। फिर सांप जब डस कर निकल जाता है तब लकीर पीटने की औपचारिकता निभाई जाती है। वो भी तब तक जब तक आम पब्िलक का गुस्सा ठण्डा नहीं पड़ जाता। विरोधियों के तीर चलने बंद नहीं हो जाते। जैसे ही आक्रोश ठण्डा पड़ने लगता है, लकीर पीटने की कवायद भी बंद कर दी जाती है। शायद इस इंतजार में कि जब अगली बारदात होगी, तब देखा जायेगा।
शासन-प्रशासन की इसी मानसिकता के कारण संभवत: कोई आतंकी वारदात, आखिरी वारदात साबित नहीं होती।
संभवत: यही वो वजह है जो युवाओं को ऐसा कुछ सोचने पर मजबूर कर रही है कि कहीं बनारस का ब्लास्ट नेताओं ने ही जनता का ध्यान भ्रष्टाचार व महंगाई जैसी लाइलाज समस्याओं से हटाने के लिए तो नहीं कराया।
युवाओं की इस सोच को गैरजिम्मेदाराना भले ही मान लिया जाए लेकिन पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि आकंठ भ्रष्टाचार में डूब चुके हमारे तंत्र का किसी भी हद तक गिर जाना, आश्चर्य की बात नहीं रह गई। वह निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए कुछ भी कर और करा सकते हैं। किसी भी हद तक जा सकते हैं। वो दंगे-फसाद करा सकते हैं तो बम ब्लास्ट भी करा सकते हैं।
वो देश का पैसा लूटकर विदेशी बैंकों में जमा कर सकते हैं तो पैसे की खातिर विदेशी एजेंट भी बन सकते हैं। ऐसे उदाहरण सामने हैं।
फिर कैसे तो जनता यह भरोसा करे कि नेता चाहे कुछ भी कर लें लेकिन देश की संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेंगे। वह कैसे मान ले कि बनारस का ब्लास्ट आखिरी ब्लास्ट साबित होगा।
अगर आज कोई युवा फेसबुक पर यह लिख रहा है कि बनारस में ब्लास्ट आतंकियों की बजाय नेताओं ने तो नहीं कराया, तो इसमें युवक का क्या दोष ?
बनारस के शीतला माता घाट पर आतंकियों द्वारा किये गये बम विस्फोट के बाद किसी युवक ने सोशल नेटवर्किंग साइट 'फेसबुक' पर लिखा कि कहीं ये ब्लास्ट भ्रष्टाचार से घिरे नेताओं ने जनता का ध्यान बांटने के लिए तो नहीं कराया।
इसी प्रकार जब संसद पर आतंकी हमला हुआ और सुरक्षा बलों ने अपनी जान पर खेलकर उस हमले को विफल किया तो अधिकांश युवा यह कहते सुने गये कि काश ! सुरक्षा बल आतंकियों को अंदर घुस जाने देते।बेशक ये दोनों ही टिप्पणियां गैरजिम्मेदारी का परिचय देती हैं लेकिन इनसे एक बात का पता जरूर लगता है कि देश की जनता और विशेषकर युवा वर्ग उन लोगों से किस कदर आजिज आ चुका है जो खुद को देश का कर्णधार तथा भाग्यविधाता कहते हैं।
यदि देखा जाए तो यह एक संदेश भी है कि स्वतंत्र भारत का युवा क्या सोचता है और वह किस मन: स्थति में जी रहा है। युवाओं की इन टिप्पणियों के गूणार्थ समझना यूं भी जरूरी है कि भारत को युवा देश माना जा रहा है यानि वो देश जिसकी कुल जनसंख्या में सबसे ज्यादा संख्या युवाओं की है।
संसद पर हमले को एक लम्बा अरसा गुजर गया लेकिन बनारस का बम ब्लास्ट हाल का है इसलिए फिलहाल यदि वहीं की बात करें तो अब सवाल यह पैदा होता है कि क्या भ्रष्टाचार ने वाकई देश के हालात इतने खराब कर दिये हैं कि युवक ऐसा सोचने को बाध्य है ?
इस प्रश्न का उत्तर 'हां' में मिलता है क्योंकि दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र के चारों स्तंभों से भ्रष्टाचार की 'बू' आने लगी है। संवैधानिक तीनों स्तंभ यानि विधायिका, न्यायपालिका तथा कार्यपालिका में से विधायिका व कार्यपालिका तो काफी पहले भ्रष्ट हो चुके थे। यह भी कह सकते हैं कि वह कभी ईमानदार रहे ही नहीं। बाकी बची थी न्यायपालिका, तो वह भी अब अछूती नहीं रही। सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसे ही नहीं कहा था कि इलाहाबाद हाईकोर्ट में कुछ सड़ रहा है। उधर सुप्रीम कोर्ट में भी सब-कुछ ठीक-ठाक नहीं है।
चौथा और गैर संवैधानिक स्तंभ कहलाता है मीडिया। गैर संवैधानिक होते हुए लोकतंत्र में मीडिया की एक अहम् व सशक्त भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। वह भूमिका जिसके कारण मीडिया का महत्व कभी कम नहीं हुआ और जिसके कारण तीनों संवैधानिक स्तंभ उसे अहमियत देने के लिए मजबूर रहे।
यह मीडिया भी भ्रष्टाचार की दलदल में बड़ी तेजी के साथ समा रहा है। पहले तो पेड न्यूज़ ने और अब स्पेक्ट्रम घोटाले ने मीडिया में भ्रष्टाचार को रेखांकित किया है लिहाजा सबका ध्यान इस ओर गया।
अब जबकि चारों स्तंभों को भ्रष्टाचार का घुन लग चुका हो और किसी भी देश का भविष्य कहलाने वाले युवाओं के भविष्य पर गहरा सवालिया निशान लगा हो, तो युवा सोचेगा भी क्या।
वह यही सोच सकता है क्योंकि उसे यह सब सोचने पर लगभग मजबूर किया जा रहा है।
बनारस के शीतला माता घाट पर किये गये बम विस्फोट से हालांकि बहुत अधिक नुकसान नहीं हुआ लेकिन बड़ा मुद्दा यह है कि आतंकी आखिर बार-बार हमारे यहां ब्लास्ट कर हमारी संप्रभुता को खुली चनौती दे रहे हैं और हम आज तक उनके रहमोकरम पर जिंदा हैं।
यही कारण है कि लोग आज पूछ रहे हैं- बनारस के बाद कहां ? उन्हें सरकार से कहीं अधिक आतंकियों के नेटवर्क पर भरोसा है। उन्हें मालूम है कि सरकार अभी तक ऐसा कोई तंत्र खड़ा नहीं कर पायी है जो आतंकवादियों की प्लानिंग का उसके अंजाम तक पहुंचने से पहले पता लगा सके।
सरकार प्रदेश की हो या देश की, उसे आतंकियों के बावत जो जानकारियां मिलती भी हैं वो इतनी मामूली होती हैं जिनके आधार पर किसी नतीजे तक नहीं पहुंचा जा सकता।
संभवत: इसीलिए बनारस ब्लास्ट के बाद केन्द्र और प्रदेश सरकारें एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप में उलझी हैं जबकि ब्लास्ट करने वालों का कोई सुराग नहीं लगा। जिनके ऊपर कानून-व्यवस्था का निर्वहन करने की जिम्मेदारी है, वह अंधेरे में तीर चला रहे हैं। वोट की राजनीति के लिए आजमगढ़ में दबिश न देने की हिदायत दे रहे हैं। दलील दी जा रही है कि आजमगढ़ को बदनाम किया जा रहा है। इनसे कोई ये पूछने वाला नहीं है कि विस्फोट करने वालों के तार आजमगढ़ से जुड़े होने की सूचना आम पब्िलक ने नहीं दी। ये सूचना भी सरकारी तंत्र ने ही दी। फिर आजमगढ़ में दबिश देने से मनाही क्यों ? सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि एक खास तबके का वोट बैंक उसकी वजह से प्रभावित न हो।
नेताओं के लिए राष्ट्रहित कोई मायने नहीं रखता, यह एक आम धारणा बन चुकी है। यह धारणा यूं ही नहीं बनी, इसके पीछे कुछ खास कारण हैं। सब जानते हैं कि जब कभी कोई आतंकी वारदात देश के अंदर कहीं होती है तो आतंकियों तक पहुंचने की बजाय सारा तंत्र इस बहस में उलझ जाता है कि वारदात को अंजाम देने वाले किस तबके से थे। वो हिंदू थे या मुसलमान। सिख थे या ईसाई। कोई यह नहीं सोचता कि वो किसी वर्ग से हों समाज, देश व मानवता के अपराधी हैं। उनकी पहचान किसी समुदाय से नहीं, उनके अपराध से की जानी चाहिए लेकिन ऐसा है नहीं। बस इसीलिए आज यह पूछा जा रहा है कि बनारस के बाद कहां ?
बात सही भी है क्योंकि कोई आतंकी वारदात आखिरी साबित नहीं होती। मुंबई पर किये गये आतंकी हमले के बाद यह माना जा रहा था कि सरकार शायद अब ऐसे कुछ मुकम्मल इंतजामात करेगी कि कोई आतंकी संगठन कहीं किसी वारदात को अंजाम नहीं दे पायेगा लेकिन यह विश्वास टूट गया।
जब आतंकवादी किसी एक जगह को बार-बार टारगेट बना सकते हैं तो उनके लिए किसी नई जगह पर वारदात करना और भी आसान है। बनारस को फिर टारगेट बनाकर उन्होंने यह संदेश दिया है कि वह जब चाहें और जहां चाहें, अपनी नापाक हरकतों को अंजाम दे सकते हैं। रही बात किसी नई जगह की तो कहीं भी कुछ करने को स्वतंत्र हैं।
जिन प्रमुख स्थानों पर आतंकी साया मंडराने की सूचनाएं मिलती रहती हैं, उनमें मथुरा तथा आगरा शामिल हैं। अब अगर बात करें यहां की सुरक्षा-व्यवस्था को लेकर तो वह कृष्ण जन्मभूमि, मथुरा रिफाइनरी तथा ताजमहल तक सीमित है। इसके बाद सब भगवान भरोसे हैं।
मथुरा हो या आगरा, कहीं के जिला प्रशासन को न तो यह मालूम है कि उनके जिलों में कितने मोबाइल उपभोक्ता हैं। कितने पोस्टपेड कनैक्शन हैं और कितने प्रीपेड। उनकी आइडेंटिटी सही है या फर्जी।
यहीं नहीं, पुलिस तथा प्रशासन को तो यह तक नहीं मालूम कि इन दो अति संवेदनशील जिलों में कितने साइबर कैफे हैं और कितने लोग व्यक्ितगत रूप से इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं। जो इंटरनेट यूजर हैं, उनका पेशा क्या है।
इन हालातों में किसी के भी द्वारा इसका दुरुपयोग किया जाना बहुत मामूली बात है। फिर सांप जब डस कर निकल जाता है तब लकीर पीटने की औपचारिकता निभाई जाती है। वो भी तब तक जब तक आम पब्िलक का गुस्सा ठण्डा नहीं पड़ जाता। विरोधियों के तीर चलने बंद नहीं हो जाते। जैसे ही आक्रोश ठण्डा पड़ने लगता है, लकीर पीटने की कवायद भी बंद कर दी जाती है। शायद इस इंतजार में कि जब अगली बारदात होगी, तब देखा जायेगा।
शासन-प्रशासन की इसी मानसिकता के कारण संभवत: कोई आतंकी वारदात, आखिरी वारदात साबित नहीं होती।
संभवत: यही वो वजह है जो युवाओं को ऐसा कुछ सोचने पर मजबूर कर रही है कि कहीं बनारस का ब्लास्ट नेताओं ने ही जनता का ध्यान भ्रष्टाचार व महंगाई जैसी लाइलाज समस्याओं से हटाने के लिए तो नहीं कराया।
युवाओं की इस सोच को गैरजिम्मेदाराना भले ही मान लिया जाए लेकिन पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि आकंठ भ्रष्टाचार में डूब चुके हमारे तंत्र का किसी भी हद तक गिर जाना, आश्चर्य की बात नहीं रह गई। वह निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए कुछ भी कर और करा सकते हैं। किसी भी हद तक जा सकते हैं। वो दंगे-फसाद करा सकते हैं तो बम ब्लास्ट भी करा सकते हैं।
वो देश का पैसा लूटकर विदेशी बैंकों में जमा कर सकते हैं तो पैसे की खातिर विदेशी एजेंट भी बन सकते हैं। ऐसे उदाहरण सामने हैं।
फिर कैसे तो जनता यह भरोसा करे कि नेता चाहे कुछ भी कर लें लेकिन देश की संप्रभुता से कोई समझौता नहीं करेंगे। वह कैसे मान ले कि बनारस का ब्लास्ट आखिरी ब्लास्ट साबित होगा।
अगर आज कोई युवा फेसबुक पर यह लिख रहा है कि बनारस में ब्लास्ट आतंकियों की बजाय नेताओं ने तो नहीं कराया, तो इसमें युवक का क्या दोष ?
सोमवार, 6 दिसंबर 2010
दलालों का देश या देश के दलाल ?
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में घोटालों की जो श्रृंखला बन चुकी है, उसे देखकर ऐसा महसूस होता है कि या तो ईमानदारी और बेईमानी की परिभाषा नये सिरे से गढ़नी होगी या फिर भ्रष्टाचार को लेकर अपनी सोच को ज्यादा उदार बनाना होगा।
घोटालों के इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी लकीर खींचने वाले 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले ने भ्रष्टाचार के बावत एक प्रकार की अघोषित बहस छेड़ दी है। इस बहस का मूल मुद्दा यह है कि आखिर भ्रष्टाचार कहते किसे हैं और भ्रष्ट आचरण के मानदण्ड क्या हैं ?
बहस में पड़ने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि आखिर 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला है क्या और इसे किस तरह अंजाम दिया गया।
सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला करीब 1.77 लाख करोड़ रुपये का है। सीएजी ने यह आंकड़ा निकालने के लिए 3जी स्पेक्ट्रम आवंटन और मोबाइल कंपनी एस-टेल के सरकार को दिए प्रस्तावों को आधार बनाया है।
दूरसंचार की रेडियो फ्रिक्वेंसी को सरकार नियंत्रित करती है और अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ (आईटीए) से तालमेल बनाकर काम करती है। दुनिया में आई मोबाइल क्रांति के बाद कई कंपनियों ने इस क्षेत्र में प्रवेश किया। सरकार ने हर कंपनी को फ्रिक्वेंसी रेंज यानी स्पेक्ट्रम का आवंटन कर लाइसेंस देने की नीति बनाई। उन्नत तकनीकों के हिसाब से इन्हें पहली जनरेशन (पीढ़ी) अर्थात 1जी, 2जी और 3जी का नाम दिया गया। हर नई तकनीक में ज्यादा फ्रिक्वेंसी होती है और इसीलिए टेलीकॉम कंपनियां सरकार को भारी रकम देकर फ्रिक्वेंसी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस लेती हैं।
सीएजी रिपोर्ट के अनुसार केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ए. राजा ने 2008 में नियमों का खुला उल्लंघन करते हुए 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन किया। इसके लिए उनके विभाग ने 2001 में आवंटन के लिए अपनाई गई प्रक्रिया को आधार बनाया, जो काफी पुरानी तथा आज के संदर्भ में औचित्यहीन थी। उन्होंने इसके लिए नीलामी के बिना ही पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर आवंटन किए। इससे 9 कंपनियों को काफी लाभ हुआ। प्रत्येक को केवल 1651 करोड़ रुपयों में स्पेक्ट्रम आवंटित किए गए जबकि हर लाइसेंस की कीमत 7,442 करोड़ रुपयों से 47,912 करोड़ रुपये तक हो सकती थी। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि स्पेक्ट्रम के लिए लाइसेंस नीलामी का आवंटन
हालांकि दूरसंचार विभाग ने पहले आओ पहले पाओ के आधार पर किया, लेकिन इसमें भी अनियमितताएं कर कुछ कंपनियों को सीधा लाभ पहुंचाया। कुल 122 लाइसेंसों में से 85 लाइसेंस अयोग्य और अपात्र कंपनियों को दिए गए। लाइसेंस आवंटन में कानून मंत्रालय और वित्त मंत्रालय के सुझावों को भी ताक पर रख दिया गया।
सीएजी ने 1.77 लाख करोड़ का आंकड़ा निकालने के लिए दो तथ्यों को आधार बनाया। उन्होंने इस साल 3जी आवंटन में मिली कुल रकम और 2007 में एस-टेल कंपनी द्वारा लाइसेंस के लिए सरकार को दिए प्रस्ताव के आधार पर यह नतीजा निकाला। सीएजी के अनुसार 122 लाइसेंस के आवंटन में सरकार को जितनी रकम मिली, उससे 1.77 लाख करोड़ रुपए और मिल सकते थे। कहने का तात्पर्य यह है कि 1.77 लाख करोड़ रुपये कम लिये गये इसीलिए यह घोटाला 1.77 लाख करोड़ रुपयों का माना गया।
जाहिर है कि ये सब अनियमितताएं यूं ही नहीं बरती गयी होंगी। ऐसा करने के पीछे कुछ खास निजी मकसद जरूर रहे होंगे और उन्हें स्पेक्ट्रम के आवंटन से पहले अथवा बाद में पूरा किया गया होगा। उक्त खास और निजी मकसद का इल्म सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को ले जाने वाले याची द्वारा दी गयी कुछ जानकारियों से हो रहा है। उसने याचिका के माध्यम से जानना चाहा है कि 18 अक्टूबर 2007 को अनिल अंबानी की कंपनी टाइगर ट्रस्टी ने किसी विदेशी कंपनी को अपने 50 लाख शेयर ट्रांसफर किए, जबकि कंपनी के बैंक अकाउंट में एक हजार करोड़ रु. थे। सीबीआई ने यह जानने की कोशिश नहीं की है कि यह शेयर किसे ट्रांसफर किए गए। यही नहीं, याचिकाकर्ता द्वारा दी गयी ठोस जानकारी के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने 2जी स्पेक्ट्रम मामले में सीबीआई द्वारा अक्टूबर 2009 में दर्ज एफआईआर पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। 1.77 लाख करोड़ रुपए के इस घोटाले में लाभ कमाने वाली दो कंपनियों का सीवीसी की रिपोर्ट में नाम था, लेकिन सीबीआई की एफआईआर में उन्हें शामिल नहीं किया गया। दो कंपनियों को 1500-1600 करोड़ रुपए में स्पेक्ट्रम दिया गया, जबकि कुछ दिन बाद ही इसके लिए छह हजार करोड़ रुपए वसूले गए। सीबीआई ने सीवीसी की रिपोर्ट के आधार पर अज्ञात लोगों के खिलाफ ही मामला दर्ज किया था।
इतना सब कुछ हो गया और सरकार का मुखिया गांधी जी के तीनों बंदरों की सीख को आत्मसात कर हाथ पर हाथ रखे बैठा रहा। उसने न कुछ देखा, ना सुना और ना बोला। इस सब के बावजूद संप्रग की अध्यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस के घोषित राष्ट्रीय महासचिव व अघोषित युवराज राहुल गांधी आज प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का बचाव कर रहे हैं जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि भ्रष्टाचार सिर्फ रिश्वत खाने तक सीमित है। भ्रष्टाचार की शिकायतों को लगातार अनदेखा करना, उन पर कोई टिप्पणी तक ना करना और कानों में तेल डालकर सोते रहना सोनिया व राहुल के मुताबिक भ्रष्टाचार नहीं है।
सोनिया गांधी द्वारा मनमोहन सिंह पर लग रहे आरोपों को शर्मनाक बताने का कुल जमा निष्कर्ष तो यही निकलता है कि किसी सरकार का मुखिया अपनी नाक के नीचे लाखों करोड़ का घोटाला होते देखकर भी केवल इसलिए ईमानदार है क्योंकि उसने खुद रिश्वत नहीं खायी।
अगर ईमानदारी ऐसी किसी कमजोरी का नाम है जो अपनी आंखों के सामने हो रही बेईमानी के खिलाफ मुंह खोलने की इजाजत नहीं देती तो निश्चित ही वो ईमानदारी, बेईमानी से भी बदतर है और ऐसा ईमानदार आदमी, बेईमानों से भी गया-गुजरा है।
2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में किस-किस की भूमिका रही और यह भूमिका किस स्तर की थीं, यह तो आगे आने वाला वक्त ही बतायेगा लेकिन एक बात जो तय है, वह यह कि 1.77 लाख करोड़ रुपए का यह घोटाला न तो रातों-रात हुआ है तथा ना ही इसे अकेले ए. राजा ने अंजाम दिया है।
अभी तक इस मामले का जो आंशिक सच सामने आ पाया है, उससे साबित होता है कि देश इस समय स्वतंत्रत भारत के सर्वाधिक संकट के दौर से गुजर रहा है। ऐसा लगता है जैसे इस देश की कमान राजनीतिक पार्टियों या उनके नेताओं के हाथ में न होकर दलालों के हाथ में है और वही राज कर रहे हैं। यहां ना डेमोक्रेसी कायम है और ना ब्यूरोक्रेसी, यहां अगर कुछ कायम है तो वह है हिप्पोक्रेसी। जो जितना बड़ा हिप्पोक्रेट, वह उतना सफल इंसान।
हिप्पोक्रेट्स की इस जमात में एक तबका बड़ी शिद्दत तथा तेजी के साथ और जुड़ा है, और यह तबका है मीडियाकर्मियों का। वह मीडियाकर्मी जिन्हें अभिव्यक्ित की स्वतंत्रता के नाम पर किसी के भी ऊपर कीचड़ उछालने का लाइसेंस मिला हुआ है। वह मीडियाकर्मी जो खुद को लोकतंत्र का सच्चा 'पहरुआ' कहते हैं लेकिन हकीकत में वह उसके लिए कलंक बन चुके हैं। एनडीटीवी की ग्रुप एडीटर बरखा दत्त और हिंदुस्तान टाइम्स के एडीटोरियल एडवाइजर वीर सिंघवी का नाम कार्पोरेट दलाल नीरा राडिया के साथ सार्वजनिक हो ही चुका है। अभी और ऐसे कितने नाम सामने आयेंगे, यह तो फिलहाल भविष्य के गर्भ में है लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि इलैक्ट्रॉनिक पत्रकारिता व इसके पॉलिश्ड पत्रकारों ने मीडिया को गर्त तक ले जाने का काम बखूबी किया है।
ये वो लोग हैं जो आज तक छोटे शहरों और कस्बों में खुद इन्हीं के लिए काम करने वाले स्ट्रिंगर्स को जर्नलिज्म का कोढ़ तथा दलाल प्रचारित करते रहे हैं जबकि कड़वा सच यह बखूबी जानते हैं। ये और इनके मालिकान खूब जानते हैं कि दिन-रात एक करके और जान हथेली पर लेकर काम करने वाले स्ट्रिंगर इनसे उतना पैसा भी नहीं पाते जितने में अपनी भागदौड़ का खर्चा पूरा कर सकें। घर-परिवार चलाने की तो सोचना तक बेमानी है। इन हालातों में वह कैसे और क्यों काम करते हैं, इस सच्चाई से भी कोई मीडिया व्यवसायी अनभिज्ञ नहीं होता। अगर यह कहा जाए कि मीडिया तथा मीडियाकर्मियों को भ्रष्ट बनाने में सबसे बड़ी भूमिका मीडिया व्यवासाइयों की है तो कुछ गलत नहीं होगा।
बहरहाल, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले ने एक बात पूरी तरह साफ कर दी है कि इस देश के अंदर बह रही भ्रष्टाचार की गंगा में हर कोई हाथ धोने को बेताब है। फर्क है तो केवल इतना कि कोई हाथ धोकर तमाशबीन बना बैठा है और कोई किनारे बैठा मौके की तलाश कर रहा है।
लोकतंत्र के तीनों घोषित स्तंभ विधायिका, न्यायपालिका तथा कार्यपालिका पर तो भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं लेकिन अब एकमात्र अघोषित स्तंभ 'पत्रकारिता' भी
इसमें न केवल शामिल हो चुका है बल्िक इनके लिए मध्यस्थ तथा लायजनर का काम कर रहा है।
इन हालातों में विचारणीय प्रश्न यह है कि जब 'मेढ़' ही 'खेत' को खाने पर आमादा हो तो वह खेत बचेगा कैसे और कब तक बचेगा। देश की अर्थव्यवस्था पर सीधी चोट करने वालों का बचाव यदि इसलिए किया जायेगा कि किसी भी प्रकार सरकार चलती रहे, यदि इसलिए एक प्रधानमंत्री अपने ही बेईमान मंत्रियों को खुली लूट करते देखता रहेगा कि वह कथित रूप से ईमानदार है तो उस देश को कितने समय तक बचाया जा सकता है। सरकारी खजाना किसी राजनीतिक पार्टी या सत्ताधारी दल की निजी सम्पत्ति नहीं होता। उस पर एकमात्र अधिकार जनता का है। उस खजाने को सुरक्षित ना रख पाने वाला, उसमें सेंध लगाने वाला तथा उसको नुकसान पहुंचाने वाला व्यक्ित जितना दोषी है, उतना ही दोषी वह व्यक्ित भी है जो जिम्मेदार पद पर रहते हुए चुपचाप यह सब देख रहा हो। तल्ख सच्चाई तो यह है कि वह उस पद पर रहने का हकदार ही नहीं है क्योंकि किसी की ईमानदारी अगर उसके लिए कमजोरी बन जाए तो न ऐसी ईमानदारी किसी काम की और ना ऐसा व्यक्ित।
देश इस समय ऐसे संक्रमण काल से गुजर रहा है जहां कुछ कठोर निर्णय लेने ही होंगे क्योंकि यदि अब भी वो निर्णय नहीं लिये गये तो हम निर्णय लेने लायक भी नहीं रहेंगे।
खोखली तरक्की के जिस सोपान पर चढ़कर हम इतरा रहे हैं, वह हमें एक झटके में किसी भी वक्त रसातल दिखा सकता है।
मैंने सुना है कि किसी देश में मैडम ट्रेसा द्वारा स्थापित ''चैम्बर ऑफ हॉरर्स'' नामक एक अनोखा अजायबघर था। इस अजायबघर में उसके नाम को सार्थक करती हुई भयानक वस्तुओं का संग्रह था।
अगर हमारे देश में सब-कुछ इसी प्रकार चलता रहा और देश को लूटने वाले तथा उसे लुटते देखने वाले अपने-अपने पक्ष में दलीलें देकर एक-दूसरे को इसी तरह जिम्मेदार ठहराते रहे तो मुझे पूरा यकीन है कि शीघ्र ही एक चैम्बर ऑफ हारर्स नामक अजायबघर हमारे यहां भी कायम किया जायेगा। इस अजायबघर में हमारे मंत्रियों और नेताओं की मूर्तियां स्थापित होंगी ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां यह जान सकें कि कभी भारत को कैसे-कैसे जीव-जंतु चलाते थे।
आने वाले युग के छात्रों को अध्यापक इन मंत्री व नेताओं की मूर्तियां दिखाकर इस बेईमान व भ्रष्ट दौर की दास्तां सुनायेंगे और बतायेंगे कि किस तरह के अकर्मण्य लोग सत्ता पर काबिज थे।
अध्यापक उन बच्चों को बतायेंगे कि सच्चाई व सिद्धांत पर दृढ़ रहना ऐसे अवगुण थे जिनसे ये मंत्री पद के भूखे महापुरुष हमेशा दूर रहते थे और उसी के सिर पर सेहरा बंधता था जो सच्चाई का पूरी तरह गला घोंट सके तथा जिस सिद्धांत पर खड़ा है, उसी की पीठ में छुरा घोंप सके।
निश्चित ही आने वाले युग के ये विद्यार्थी आश्चर्य करेंगे कि देश चलाने वाले जिन लोगों को बुद्धि की सबसे अधिक जरूरत थी, वही इस दृष्टि से सर्वथा शून्य थे।
उन्हें ऐसी जनता पर भी आश्चर्य होगा जो शेर की खाल ओढ़कर देश को पूरी तरह बर्बाद करने वाले इन गीदड़ों से शासित होती रही।
घोटालों के इतिहास में अब तक की सबसे बड़ी लकीर खींचने वाले 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले ने भ्रष्टाचार के बावत एक प्रकार की अघोषित बहस छेड़ दी है। इस बहस का मूल मुद्दा यह है कि आखिर भ्रष्टाचार कहते किसे हैं और भ्रष्ट आचरण के मानदण्ड क्या हैं ?
बहस में पड़ने से पहले यह जान लेना जरूरी है कि आखिर 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला है क्या और इसे किस तरह अंजाम दिया गया।
सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला करीब 1.77 लाख करोड़ रुपये का है। सीएजी ने यह आंकड़ा निकालने के लिए 3जी स्पेक्ट्रम आवंटन और मोबाइल कंपनी एस-टेल के सरकार को दिए प्रस्तावों को आधार बनाया है।
दूरसंचार की रेडियो फ्रिक्वेंसी को सरकार नियंत्रित करती है और अंतर्राष्ट्रीय दूरसंचार संघ (आईटीए) से तालमेल बनाकर काम करती है। दुनिया में आई मोबाइल क्रांति के बाद कई कंपनियों ने इस क्षेत्र में प्रवेश किया। सरकार ने हर कंपनी को फ्रिक्वेंसी रेंज यानी स्पेक्ट्रम का आवंटन कर लाइसेंस देने की नीति बनाई। उन्नत तकनीकों के हिसाब से इन्हें पहली जनरेशन (पीढ़ी) अर्थात 1जी, 2जी और 3जी का नाम दिया गया। हर नई तकनीक में ज्यादा फ्रिक्वेंसी होती है और इसीलिए टेलीकॉम कंपनियां सरकार को भारी रकम देकर फ्रिक्वेंसी स्पेक्ट्रम के लाइसेंस लेती हैं।
सीएजी रिपोर्ट के अनुसार केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ए. राजा ने 2008 में नियमों का खुला उल्लंघन करते हुए 2जी स्पेक्ट्रम आवंटन किया। इसके लिए उनके विभाग ने 2001 में आवंटन के लिए अपनाई गई प्रक्रिया को आधार बनाया, जो काफी पुरानी तथा आज के संदर्भ में औचित्यहीन थी। उन्होंने इसके लिए नीलामी के बिना ही पहले आओ, पहले पाओ के आधार पर आवंटन किए। इससे 9 कंपनियों को काफी लाभ हुआ। प्रत्येक को केवल 1651 करोड़ रुपयों में स्पेक्ट्रम आवंटित किए गए जबकि हर लाइसेंस की कीमत 7,442 करोड़ रुपयों से 47,912 करोड़ रुपये तक हो सकती थी। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि स्पेक्ट्रम के लिए लाइसेंस नीलामी का आवंटन
हालांकि दूरसंचार विभाग ने पहले आओ पहले पाओ के आधार पर किया, लेकिन इसमें भी अनियमितताएं कर कुछ कंपनियों को सीधा लाभ पहुंचाया। कुल 122 लाइसेंसों में से 85 लाइसेंस अयोग्य और अपात्र कंपनियों को दिए गए। लाइसेंस आवंटन में कानून मंत्रालय और वित्त मंत्रालय के सुझावों को भी ताक पर रख दिया गया।
सीएजी ने 1.77 लाख करोड़ का आंकड़ा निकालने के लिए दो तथ्यों को आधार बनाया। उन्होंने इस साल 3जी आवंटन में मिली कुल रकम और 2007 में एस-टेल कंपनी द्वारा लाइसेंस के लिए सरकार को दिए प्रस्ताव के आधार पर यह नतीजा निकाला। सीएजी के अनुसार 122 लाइसेंस के आवंटन में सरकार को जितनी रकम मिली, उससे 1.77 लाख करोड़ रुपए और मिल सकते थे। कहने का तात्पर्य यह है कि 1.77 लाख करोड़ रुपये कम लिये गये इसीलिए यह घोटाला 1.77 लाख करोड़ रुपयों का माना गया।
जाहिर है कि ये सब अनियमितताएं यूं ही नहीं बरती गयी होंगी। ऐसा करने के पीछे कुछ खास निजी मकसद जरूर रहे होंगे और उन्हें स्पेक्ट्रम के आवंटन से पहले अथवा बाद में पूरा किया गया होगा। उक्त खास और निजी मकसद का इल्म सुप्रीम कोर्ट में इस मामले को ले जाने वाले याची द्वारा दी गयी कुछ जानकारियों से हो रहा है। उसने याचिका के माध्यम से जानना चाहा है कि 18 अक्टूबर 2007 को अनिल अंबानी की कंपनी टाइगर ट्रस्टी ने किसी विदेशी कंपनी को अपने 50 लाख शेयर ट्रांसफर किए, जबकि कंपनी के बैंक अकाउंट में एक हजार करोड़ रु. थे। सीबीआई ने यह जानने की कोशिश नहीं की है कि यह शेयर किसे ट्रांसफर किए गए। यही नहीं, याचिकाकर्ता द्वारा दी गयी ठोस जानकारी के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने 2जी स्पेक्ट्रम मामले में सीबीआई द्वारा अक्टूबर 2009 में दर्ज एफआईआर पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं। 1.77 लाख करोड़ रुपए के इस घोटाले में लाभ कमाने वाली दो कंपनियों का सीवीसी की रिपोर्ट में नाम था, लेकिन सीबीआई की एफआईआर में उन्हें शामिल नहीं किया गया। दो कंपनियों को 1500-1600 करोड़ रुपए में स्पेक्ट्रम दिया गया, जबकि कुछ दिन बाद ही इसके लिए छह हजार करोड़ रुपए वसूले गए। सीबीआई ने सीवीसी की रिपोर्ट के आधार पर अज्ञात लोगों के खिलाफ ही मामला दर्ज किया था।
इतना सब कुछ हो गया और सरकार का मुखिया गांधी जी के तीनों बंदरों की सीख को आत्मसात कर हाथ पर हाथ रखे बैठा रहा। उसने न कुछ देखा, ना सुना और ना बोला। इस सब के बावजूद संप्रग की अध्यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस के घोषित राष्ट्रीय महासचिव व अघोषित युवराज राहुल गांधी आज प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह का बचाव कर रहे हैं जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि भ्रष्टाचार सिर्फ रिश्वत खाने तक सीमित है। भ्रष्टाचार की शिकायतों को लगातार अनदेखा करना, उन पर कोई टिप्पणी तक ना करना और कानों में तेल डालकर सोते रहना सोनिया व राहुल के मुताबिक भ्रष्टाचार नहीं है।
सोनिया गांधी द्वारा मनमोहन सिंह पर लग रहे आरोपों को शर्मनाक बताने का कुल जमा निष्कर्ष तो यही निकलता है कि किसी सरकार का मुखिया अपनी नाक के नीचे लाखों करोड़ का घोटाला होते देखकर भी केवल इसलिए ईमानदार है क्योंकि उसने खुद रिश्वत नहीं खायी।
अगर ईमानदारी ऐसी किसी कमजोरी का नाम है जो अपनी आंखों के सामने हो रही बेईमानी के खिलाफ मुंह खोलने की इजाजत नहीं देती तो निश्चित ही वो ईमानदारी, बेईमानी से भी बदतर है और ऐसा ईमानदार आदमी, बेईमानों से भी गया-गुजरा है।
2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में किस-किस की भूमिका रही और यह भूमिका किस स्तर की थीं, यह तो आगे आने वाला वक्त ही बतायेगा लेकिन एक बात जो तय है, वह यह कि 1.77 लाख करोड़ रुपए का यह घोटाला न तो रातों-रात हुआ है तथा ना ही इसे अकेले ए. राजा ने अंजाम दिया है।
अभी तक इस मामले का जो आंशिक सच सामने आ पाया है, उससे साबित होता है कि देश इस समय स्वतंत्रत भारत के सर्वाधिक संकट के दौर से गुजर रहा है। ऐसा लगता है जैसे इस देश की कमान राजनीतिक पार्टियों या उनके नेताओं के हाथ में न होकर दलालों के हाथ में है और वही राज कर रहे हैं। यहां ना डेमोक्रेसी कायम है और ना ब्यूरोक्रेसी, यहां अगर कुछ कायम है तो वह है हिप्पोक्रेसी। जो जितना बड़ा हिप्पोक्रेट, वह उतना सफल इंसान।
हिप्पोक्रेट्स की इस जमात में एक तबका बड़ी शिद्दत तथा तेजी के साथ और जुड़ा है, और यह तबका है मीडियाकर्मियों का। वह मीडियाकर्मी जिन्हें अभिव्यक्ित की स्वतंत्रता के नाम पर किसी के भी ऊपर कीचड़ उछालने का लाइसेंस मिला हुआ है। वह मीडियाकर्मी जो खुद को लोकतंत्र का सच्चा 'पहरुआ' कहते हैं लेकिन हकीकत में वह उसके लिए कलंक बन चुके हैं। एनडीटीवी की ग्रुप एडीटर बरखा दत्त और हिंदुस्तान टाइम्स के एडीटोरियल एडवाइजर वीर सिंघवी का नाम कार्पोरेट दलाल नीरा राडिया के साथ सार्वजनिक हो ही चुका है। अभी और ऐसे कितने नाम सामने आयेंगे, यह तो फिलहाल भविष्य के गर्भ में है लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि इलैक्ट्रॉनिक पत्रकारिता व इसके पॉलिश्ड पत्रकारों ने मीडिया को गर्त तक ले जाने का काम बखूबी किया है।
ये वो लोग हैं जो आज तक छोटे शहरों और कस्बों में खुद इन्हीं के लिए काम करने वाले स्ट्रिंगर्स को जर्नलिज्म का कोढ़ तथा दलाल प्रचारित करते रहे हैं जबकि कड़वा सच यह बखूबी जानते हैं। ये और इनके मालिकान खूब जानते हैं कि दिन-रात एक करके और जान हथेली पर लेकर काम करने वाले स्ट्रिंगर इनसे उतना पैसा भी नहीं पाते जितने में अपनी भागदौड़ का खर्चा पूरा कर सकें। घर-परिवार चलाने की तो सोचना तक बेमानी है। इन हालातों में वह कैसे और क्यों काम करते हैं, इस सच्चाई से भी कोई मीडिया व्यवसायी अनभिज्ञ नहीं होता। अगर यह कहा जाए कि मीडिया तथा मीडियाकर्मियों को भ्रष्ट बनाने में सबसे बड़ी भूमिका मीडिया व्यवासाइयों की है तो कुछ गलत नहीं होगा।
बहरहाल, 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले ने एक बात पूरी तरह साफ कर दी है कि इस देश के अंदर बह रही भ्रष्टाचार की गंगा में हर कोई हाथ धोने को बेताब है। फर्क है तो केवल इतना कि कोई हाथ धोकर तमाशबीन बना बैठा है और कोई किनारे बैठा मौके की तलाश कर रहा है।
लोकतंत्र के तीनों घोषित स्तंभ विधायिका, न्यायपालिका तथा कार्यपालिका पर तो भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहे हैं लेकिन अब एकमात्र अघोषित स्तंभ 'पत्रकारिता' भी
इसमें न केवल शामिल हो चुका है बल्िक इनके लिए मध्यस्थ तथा लायजनर का काम कर रहा है।
इन हालातों में विचारणीय प्रश्न यह है कि जब 'मेढ़' ही 'खेत' को खाने पर आमादा हो तो वह खेत बचेगा कैसे और कब तक बचेगा। देश की अर्थव्यवस्था पर सीधी चोट करने वालों का बचाव यदि इसलिए किया जायेगा कि किसी भी प्रकार सरकार चलती रहे, यदि इसलिए एक प्रधानमंत्री अपने ही बेईमान मंत्रियों को खुली लूट करते देखता रहेगा कि वह कथित रूप से ईमानदार है तो उस देश को कितने समय तक बचाया जा सकता है। सरकारी खजाना किसी राजनीतिक पार्टी या सत्ताधारी दल की निजी सम्पत्ति नहीं होता। उस पर एकमात्र अधिकार जनता का है। उस खजाने को सुरक्षित ना रख पाने वाला, उसमें सेंध लगाने वाला तथा उसको नुकसान पहुंचाने वाला व्यक्ित जितना दोषी है, उतना ही दोषी वह व्यक्ित भी है जो जिम्मेदार पद पर रहते हुए चुपचाप यह सब देख रहा हो। तल्ख सच्चाई तो यह है कि वह उस पद पर रहने का हकदार ही नहीं है क्योंकि किसी की ईमानदारी अगर उसके लिए कमजोरी बन जाए तो न ऐसी ईमानदारी किसी काम की और ना ऐसा व्यक्ित।
देश इस समय ऐसे संक्रमण काल से गुजर रहा है जहां कुछ कठोर निर्णय लेने ही होंगे क्योंकि यदि अब भी वो निर्णय नहीं लिये गये तो हम निर्णय लेने लायक भी नहीं रहेंगे।
खोखली तरक्की के जिस सोपान पर चढ़कर हम इतरा रहे हैं, वह हमें एक झटके में किसी भी वक्त रसातल दिखा सकता है।
मैंने सुना है कि किसी देश में मैडम ट्रेसा द्वारा स्थापित ''चैम्बर ऑफ हॉरर्स'' नामक एक अनोखा अजायबघर था। इस अजायबघर में उसके नाम को सार्थक करती हुई भयानक वस्तुओं का संग्रह था।
अगर हमारे देश में सब-कुछ इसी प्रकार चलता रहा और देश को लूटने वाले तथा उसे लुटते देखने वाले अपने-अपने पक्ष में दलीलें देकर एक-दूसरे को इसी तरह जिम्मेदार ठहराते रहे तो मुझे पूरा यकीन है कि शीघ्र ही एक चैम्बर ऑफ हारर्स नामक अजायबघर हमारे यहां भी कायम किया जायेगा। इस अजायबघर में हमारे मंत्रियों और नेताओं की मूर्तियां स्थापित होंगी ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां यह जान सकें कि कभी भारत को कैसे-कैसे जीव-जंतु चलाते थे।
आने वाले युग के छात्रों को अध्यापक इन मंत्री व नेताओं की मूर्तियां दिखाकर इस बेईमान व भ्रष्ट दौर की दास्तां सुनायेंगे और बतायेंगे कि किस तरह के अकर्मण्य लोग सत्ता पर काबिज थे।
अध्यापक उन बच्चों को बतायेंगे कि सच्चाई व सिद्धांत पर दृढ़ रहना ऐसे अवगुण थे जिनसे ये मंत्री पद के भूखे महापुरुष हमेशा दूर रहते थे और उसी के सिर पर सेहरा बंधता था जो सच्चाई का पूरी तरह गला घोंट सके तथा जिस सिद्धांत पर खड़ा है, उसी की पीठ में छुरा घोंप सके।
निश्चित ही आने वाले युग के ये विद्यार्थी आश्चर्य करेंगे कि देश चलाने वाले जिन लोगों को बुद्धि की सबसे अधिक जरूरत थी, वही इस दृष्टि से सर्वथा शून्य थे।
उन्हें ऐसी जनता पर भी आश्चर्य होगा जो शेर की खाल ओढ़कर देश को पूरी तरह बर्बाद करने वाले इन गीदड़ों से शासित होती रही।
बुधवार, 24 नवंबर 2010
यम के ''फांस'' में यमुना
यमद्वितीया पर विशेष

लीजेण्ड न्यूज़
आज यमद्वितीया है, यम के ''फांस'' (फंदे) से मुक्ित का पर्व। कहते हैं कि आज के दिन यमुना के तीर्थस्थल मथुरा में विश्राम घाट पर जो भाई-बहिन हाथ पकड़ कर एकसाथ स्नान करते हैं, उन्हें यम के फांस से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ित मिल जाती है। यम के फांस से मुक्ति अर्थात बार-बार जन्म और मृत्यु के उस बंधन से मुक्ित जिसकी कामना बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, साधु-संत, योगी तथा वैरागी भी करते हैं।
यमुना जल के पान (आचमन) और उसमें स्नान से पतितों के भी पावन होने की धार्मिक मान्यता के कारण यूं तो वर्षभर लाखों लोग मथुरा आते हैं लेकिन यमद्वितीया पर यह संख्या एक ही दिन में लाखों तक पहुंच जाती है। जिला प्रशासन को इस दिन सुरक्षा व सुविधा के विशेष इंतजाम करने पड़ते हैं।
आदिकाल से चली आ रहीं धार्मिक मान्यताओं के तहत पतित पावनी और मोक्ष प्रदायनी यमुना बेशक अनवरत लोगों के पाप धो रही हो, उन्हें यम के फांस से मुक्ित दिला रही हो लेकिन आज वह खुद इस फांस से मुक्ित का मार्ग तलाश रही है। प्रदूषण ने उसके अस्ितत्व को खतरे में डाल दिया है। वह तिल-तिल उस दिशा में जा रही है जहां से उसके मात्र कागजों तक सिमट जाने की संभावना बलवती होती है। इसे कलियुग का प्रभाव कहें या कलियुगी मानसिकता का दुष्परिणाम कि मृत्यु के देवता और अपने भाई ''यम'' के फंदे से मुक्ित दिलाने वाली ''यमुना'' को अब अपने लिए कोई मुक्ितदाता नहीं मिल पा रहा। यमुना को खुद के लिए एक ऐसे तारनहार की तलाश है जो उसे प्रदूषण से मुक्ित दिला सके। उन लोगों का इंतजार है जो उसे पूरी तरह काल के गाल में समाने से पहले एकबार फिर जीवनदायिनी बना सकें। व्यवस्थागत दोष से आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हमारी विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका को चेता सकें, उन्हें यह समझा सकें कि जल के बिना जीवन संभव नहीं है इसलिए जल की अक्षय स्त्रोत नदियों को पवित्र बनाये रखना जीवन को बचाये रखने के लिए जरूरी है।
कहने को यमुना की प्रदूषण मुक्ति के लिए दायर हुई जनहित याचिका के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट ने न केवल अनेक दिशा-निर्देश दिये बल्िक उनका पालन कराने हेतु एक कमेटी का गठन किया और एक नोडल अधिकारी की भी नियुक्ित की परंतु आज वह सब बेमानी हो चुके हैं।
कमेटी निष्क्रिय पड़ी है और माननीय न्यायालय के अधिकार प्राप्त नोडल अधिकारी (जिले के एडीएम प्रशासन) को न अपने अधिकारों का पता है, न कर्तव्यों का।
जाहिर है कि जब उन्हें ही अपने अधिकार और कर्तव्यों की जानकारी नहीं है तो वो यमुना एक्शन प्लान से जुड़े विभागों तथा उनके अधिकारियों को उनके अधिकार व कर्तव्य कैसे बतायेंगे।
ऐसे में वही हो रहा है जिसकी उम्मीद की जाती है। पतित पावनी की संज्ञा प्राप्त यमुना में नाले और नालियों की गंदगी सहित चांदी एवं साड़ियों के कारखानों का कैमिकलयुक्त जहरीला पानी दिन-रात समाहित हो रहा है। गटर की मल-मूत्र युक्त गंदगी सीधी गिर रही है और हाईकोर्ट के आदेशों को ताक पर रखकर अवैध रूप से संचालित की जा रही पशुवधशाला का रक्त समा रहा है।
यमुना की प्रदूषण मुक्ित के लिए अब तक मिला सैंकड़ों करोड़ रुपया भ्रष्टाचारियों की तिजोरियां भर चुका है और इस मद में मिलने वाले बाकी रुपयों को हड़पने की व्यवस्था की जा चुकी है।
आश्चर्यजनक रूप से माननीय न्यायालय भी चुप्पी साधे बैठे हैं जबकि विभिन्न माध्यमों से उन तक बार-बार इस आशय की शिकायतें पहुंचायी जाती रही हैं कि यमुना प्रदूषण के मामले में उनके द्वारा दिये-गये आदेश-निर्देश मजाक बनकर रह गये हैं। उनका अनुपालन न करके कोर्ट की लगातार अवमानना की जा रही है। जिन अधिकारियों पर यमुना को प्रदूषणमुक्त रखने के लिए सुझाये गये उपायों का अनुपालन कराने की जिम्मेदारी है, वही निजी आर्थिक लाभ उठाकर यमुना के अस्तित्व को षड्यंत्र पूर्वक समाप्त करा रहे हैं।
10 जुलाई सन् 1998 को यमुना प्रदूषण सम्बन्धी इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दिये गये आदेश-निर्देशों का लगभग तभी से खुला उल्लंघन किया जा रहा है लेकिन आज तक इसके लिए जिम्मेदार किसी अधिकारी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गयी।
अपनी गर्दन बचाये रखने एवं न्यायपालिका को गुमराह करने के लिए अधिकारी समय-समय पर बैठकें तो करते हैं तथा उनमें शिकायतों के निस्तारण का भी नाटक किया जाता है लेकिन यह सारी कवायद केवल इसलिए ताकि सनद रहे और वक्त जरूरत काम आये।
इन हालातों में ऐसी कोई उम्मीद करना कि पतित पावनी और मोक्षदायिनी यमुना खुद पावन हो पायेगी, दिवास्वप्न देखने से अधिक कुछ नहीं।
यमुना को अगर उसका खोया हुआ स्वरूप लौटाना है, उसे प्रदूषणमुक्त करना है, उसकी संज्ञाएं कायम रखनी हैं तो सबको अपने-अपने हिस्से का संकल्प करना होगा।
कुछ ऐसा करना होगा जिससे हमारे व्यवस्थागत दोष दूर हों और हम यमुना के साथ-साथ समस्त जीवनदायिनी नदियों की पवित्रता उसी भावना, उसी धार्मिक मान्यता की तरह बनाये रख सकें जिसके तहत हजारों साल बाद भी हम यमुना का पान (आचमन) तथा उसमें स्नान करने जाते हैं।
यदि समय रहते ऐसा कुछ नहीं किया गया तो नदियों के साथ-साथ हमारा भी अस्तित्व समाप्त होने से हमें कोई नहीं बचा पायेगा। तब हम पछतायेंगे जरूर लेकिन देर इतनी हो चुकी होगी कि उसका भी कोई मतलब नहीं रह जायेगा।
लीजेण्ड न्यूज़
आज यमद्वितीया है, यम के ''फांस'' (फंदे) से मुक्ित का पर्व। कहते हैं कि आज के दिन यमुना के तीर्थस्थल मथुरा में विश्राम घाट पर जो भाई-बहिन हाथ पकड़ कर एकसाथ स्नान करते हैं, उन्हें यम के फांस से हमेशा-हमेशा के लिए मुक्ित मिल जाती है। यम के फांस से मुक्ति अर्थात बार-बार जन्म और मृत्यु के उस बंधन से मुक्ित जिसकी कामना बड़े-बड़े ऋषि-मुनि, साधु-संत, योगी तथा वैरागी भी करते हैं।
यमुना जल के पान (आचमन) और उसमें स्नान से पतितों के भी पावन होने की धार्मिक मान्यता के कारण यूं तो वर्षभर लाखों लोग मथुरा आते हैं लेकिन यमद्वितीया पर यह संख्या एक ही दिन में लाखों तक पहुंच जाती है। जिला प्रशासन को इस दिन सुरक्षा व सुविधा के विशेष इंतजाम करने पड़ते हैं।
आदिकाल से चली आ रहीं धार्मिक मान्यताओं के तहत पतित पावनी और मोक्ष प्रदायनी यमुना बेशक अनवरत लोगों के पाप धो रही हो, उन्हें यम के फांस से मुक्ित दिला रही हो लेकिन आज वह खुद इस फांस से मुक्ित का मार्ग तलाश रही है। प्रदूषण ने उसके अस्ितत्व को खतरे में डाल दिया है। वह तिल-तिल उस दिशा में जा रही है जहां से उसके मात्र कागजों तक सिमट जाने की संभावना बलवती होती है। इसे कलियुग का प्रभाव कहें या कलियुगी मानसिकता का दुष्परिणाम कि मृत्यु के देवता और अपने भाई ''यम'' के फंदे से मुक्ित दिलाने वाली ''यमुना'' को अब अपने लिए कोई मुक्ितदाता नहीं मिल पा रहा। यमुना को खुद के लिए एक ऐसे तारनहार की तलाश है जो उसे प्रदूषण से मुक्ित दिला सके। उन लोगों का इंतजार है जो उसे पूरी तरह काल के गाल में समाने से पहले एकबार फिर जीवनदायिनी बना सकें। व्यवस्थागत दोष से आकंठ भ्रष्टाचार में डूबी हमारी विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका को चेता सकें, उन्हें यह समझा सकें कि जल के बिना जीवन संभव नहीं है इसलिए जल की अक्षय स्त्रोत नदियों को पवित्र बनाये रखना जीवन को बचाये रखने के लिए जरूरी है।
कहने को यमुना की प्रदूषण मुक्ति के लिए दायर हुई जनहित याचिका के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट ने न केवल अनेक दिशा-निर्देश दिये बल्िक उनका पालन कराने हेतु एक कमेटी का गठन किया और एक नोडल अधिकारी की भी नियुक्ित की परंतु आज वह सब बेमानी हो चुके हैं।
कमेटी निष्क्रिय पड़ी है और माननीय न्यायालय के अधिकार प्राप्त नोडल अधिकारी (जिले के एडीएम प्रशासन) को न अपने अधिकारों का पता है, न कर्तव्यों का।
जाहिर है कि जब उन्हें ही अपने अधिकार और कर्तव्यों की जानकारी नहीं है तो वो यमुना एक्शन प्लान से जुड़े विभागों तथा उनके अधिकारियों को उनके अधिकार व कर्तव्य कैसे बतायेंगे।
ऐसे में वही हो रहा है जिसकी उम्मीद की जाती है। पतित पावनी की संज्ञा प्राप्त यमुना में नाले और नालियों की गंदगी सहित चांदी एवं साड़ियों के कारखानों का कैमिकलयुक्त जहरीला पानी दिन-रात समाहित हो रहा है। गटर की मल-मूत्र युक्त गंदगी सीधी गिर रही है और हाईकोर्ट के आदेशों को ताक पर रखकर अवैध रूप से संचालित की जा रही पशुवधशाला का रक्त समा रहा है।
यमुना की प्रदूषण मुक्ित के लिए अब तक मिला सैंकड़ों करोड़ रुपया भ्रष्टाचारियों की तिजोरियां भर चुका है और इस मद में मिलने वाले बाकी रुपयों को हड़पने की व्यवस्था की जा चुकी है।
आश्चर्यजनक रूप से माननीय न्यायालय भी चुप्पी साधे बैठे हैं जबकि विभिन्न माध्यमों से उन तक बार-बार इस आशय की शिकायतें पहुंचायी जाती रही हैं कि यमुना प्रदूषण के मामले में उनके द्वारा दिये-गये आदेश-निर्देश मजाक बनकर रह गये हैं। उनका अनुपालन न करके कोर्ट की लगातार अवमानना की जा रही है। जिन अधिकारियों पर यमुना को प्रदूषणमुक्त रखने के लिए सुझाये गये उपायों का अनुपालन कराने की जिम्मेदारी है, वही निजी आर्थिक लाभ उठाकर यमुना के अस्तित्व को षड्यंत्र पूर्वक समाप्त करा रहे हैं।
10 जुलाई सन् 1998 को यमुना प्रदूषण सम्बन्धी इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा दिये गये आदेश-निर्देशों का लगभग तभी से खुला उल्लंघन किया जा रहा है लेकिन आज तक इसके लिए जिम्मेदार किसी अधिकारी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गयी।
अपनी गर्दन बचाये रखने एवं न्यायपालिका को गुमराह करने के लिए अधिकारी समय-समय पर बैठकें तो करते हैं तथा उनमें शिकायतों के निस्तारण का भी नाटक किया जाता है लेकिन यह सारी कवायद केवल इसलिए ताकि सनद रहे और वक्त जरूरत काम आये।
इन हालातों में ऐसी कोई उम्मीद करना कि पतित पावनी और मोक्षदायिनी यमुना खुद पावन हो पायेगी, दिवास्वप्न देखने से अधिक कुछ नहीं।
यमुना को अगर उसका खोया हुआ स्वरूप लौटाना है, उसे प्रदूषणमुक्त करना है, उसकी संज्ञाएं कायम रखनी हैं तो सबको अपने-अपने हिस्से का संकल्प करना होगा।
कुछ ऐसा करना होगा जिससे हमारे व्यवस्थागत दोष दूर हों और हम यमुना के साथ-साथ समस्त जीवनदायिनी नदियों की पवित्रता उसी भावना, उसी धार्मिक मान्यता की तरह बनाये रख सकें जिसके तहत हजारों साल बाद भी हम यमुना का पान (आचमन) तथा उसमें स्नान करने जाते हैं।
यदि समय रहते ऐसा कुछ नहीं किया गया तो नदियों के साथ-साथ हमारा भी अस्तित्व समाप्त होने से हमें कोई नहीं बचा पायेगा। तब हम पछतायेंगे जरूर लेकिन देर इतनी हो चुकी होगी कि उसका भी कोई मतलब नहीं रह जायेगा।
सचमुच पूरे देश में ही इस कहावत को बदलना होगा ,हम आपकी इस बात से पूरी तरह सहमत हैं.....सुमित्रा सिंह ,खुर्दबुर्द.ब्लागस्पाट.कॉम
प्लीज ! ''उल्लुओं'' को दोष मत दो
लीजेण्ड न्यूज़ विशेष
बर्बाद गुलिस्तां करने को, जब एक ही उल्लू काफी हो ।
अंजामे गुलिस्तां क्या होगा, हर शाख पर उल्लू बैठा है ।।
मुझे नहीं मालूम कि ये पंक्ितयां कब तथा किस परिपेक्ष्य में लिखी गयी थीं लेकिन इतना जरूर पता है कि स्वतंत्रता मिलने के बाद से इनका इस्तेमाल अक्सर उन लोगों के लिए किया जाता रहा है जिन्हें हम ''नेता'' कहते हैं और जो खुद को देश का कर्णधार एवं भाग्य विधाता मानते रहे हैं।
आज में एक ऐसी कहानी आपके लिए लिख रहा हूं जो शायद इस सर्वमान्य धारणा को बदल सके और समझा सके कि किसी चमन की बर्बादी के पीछे वास्तविक कारण क्या होते हैं।
कहानी कुछ इस तरह है कि किसी जंगल में हंस-हंसिनी का एक जोड़ा वर्षों से रहा करता था। जंगल बहुत हरा-भरा होने के कारण उनका जीवन बड़े आनंदपूर्वक व्यतीत हो रहा था। एक साल उस जंगल में भयानक सूखा पड़ा। पेड़-पौधों के साथ-साथ पानी के सारे साधन सूख गये। यहां तक कि पशु-पक्षियों के पीने लायक पानी भी नहीं बचा।
मंगलवार, 20 अप्रैल 2010
कृपालु या कलंक

मथुरा। खुद को पांचवां जगद् गुरू शंकराचार्य बताने वाले कृपालु महाराज के मनगढ स्िथत आश्रम में भण्डारे के दौरान 65 लोगों की मौत के तत्काल बाद उन्हीं के द्वारा वृंदावन में फिर भण्डारे का वैसा ही आयोजन करना यह साबित करता है कि कृपालु महाराज और उसके अनुयायियों को इतने लोगों की मौत का न तो कोई दु:ख हुआ न कोई अफसोस। संवेदनहीनता की पराकाष्ठा का निम्नतम् एवं घिनौना उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कृपालु के प्रवक्ता ने यह और कह दिया कि जो कुछ हुआ, वह ईश्वर की मर्जी थी।
यहीं नहीं, कृपालु के प्रवक्ता की मानें तो उनके द्वारा आयोजित इस भण्डारे के लिए आश्रम की ओर से किसी को निमंत्रण नहीं भेजा गया था। 65 गरीब लोगों की दर्दनाक मौत के बाद कृपालु के प्रवक्ता का यह बयान जितना चौंकाने वाला है, उतना ही चौंकाता है प्रशासन का उस बयान को चुपचाप स्वीकार कर लेना। वह भी तब कि जांच रिपोर्ट में इस पूरी घटना के लिए आश्रम को प्रथम द्रष्ट्या दोषी बताया गया।
घटना के बाद से लगभग भूमिगत हो चुके कृपालु कल अचानक प्रकट हुए और मृतकों तथा घायलों के लिए मुआवजे का चैक मीडिया को बुलाकर प्रशासन के नाम जारी किया। इस दौरान भी कृपालु ने अपना मुंह नहीं खोला।
वृंदावन (मथुरा) स्िथत आश्रम में प्रशासन की रोक के बावजूद भण्डारे के दौरान नोट बांटे जाने का जवाब आयोजकों ने यह दिया कि भोजन के साथ दक्षिणा देना सामान्य बात है और ऐसा करने से प्रशासनिक रोक का उल्लंघन नहीं हुआ। आश्चर्यजनक रूप से सिटी मजिस्ट्रेट ने भी आश्रम की इस बेहूदा दलील पर हां में हां मिला दी जो इस बात की पुष्िट करती है कि धर्म के ऐसे धंधेबाजों के समक्ष शासन और प्रशासन कितना बौना है।
सच तो यह है कि कृपालु जैसे लोगों का धर्म या दान-दक्षिणा से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है। वह जो कुछ करते हैं, अपने कृत्यों पर पर्दा डालने और शौहरत हासिल करने के लिए करते हैं। अपनी पत्नी की बरसी के नाम पर कृपालु ने यही सब किया वरना गरीबों को मदद करने के तमाम अन्य तरीके ऐसे हैं जिन्हें अपनाकर एक पंथ दो काज जैसी कहावत चरितार्थ की जा सकती थी। यूं भी यदि कृपालु का संतत्व से कोई सम्बन्ध है तो फिर अपनी दिवंगत पत्नी के नाम पर इतने बडे आडम्बर का क्या मतलब!
दरअसल कृपालु भी उन्हीं तथाकथित साधुओं की जमात का हिस्सा हैं जिनके कुकृत्यों ने सम्पूर्ण साधु समाज पर गहरा प्रश्नवाचक चिन्ह अंकित कर दिया है और जिनके कारण योगगुरू बाबा रामदेव तथा आर्ट आफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर सहित तमाम धर्माचार्यों को आगे आकर ऐसे तत्वों के खिलाफ कार्यवाही करने की हिमायत करनी पडी। हाल ही में पकडे गये इच्छाधारी के बावत तो योगगुरू बाबा रामदेव ने यहां तक कह दिया कि ऐसे लोगों को फांसी पर चढा देना चाहिए।
कृपालु महाराज बेशक अपनी अकूत सम्पत्ित के बल पर अब तक अपने कुकृत्यों को दबवाने में सफल रहे हैं लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं निकलता कि वह पाक-साफ हैं और साधु समाज पर कलंक लगाने वालों से किसी प्रकार भिन्न हैं। बात चाहे नागपुर की दो सगी बहनों के साथ बलात्कार के मामले से जुडी हो या फिर टुबेगो एण्ड त्रिनिदाद की विदेशी धरती पर एक 22 वर्षीय युवती के साथ दुराचार की जिसमें कृपालु को गत वर्ष वहां बंदी बनाया गया था। वृंदावन के आश्रम की भूमि को खरीदने में करोडों रूपयों की स्टाम्प चोरी का मामला हो या आश्रम के कर्मचारी की संदिग्ध मौत का, सब यह संकेत करते हैं कि कृपालु के कारनामे कम से कम संतत्व की श्रेणी में नहीं आते।
यह बात दीगर है कि इस सब के बावजूद कृपालु जैसों को संत मानने वालों की कोई कमी नहीं है क्योंकि वह उनके काले कारनामों को अपने प्रभाव तथा धर्म की आड में दबाये रखने की जुगत जानते हैं। कृपालु जैसे कथित साधु अपने इन भक्तों की काली कमाई को सफेद करने और सरकार की नजरों में धूल झौंकने के विशेषज्ञ हैं।
यही कारण है कि देश के कर्णधार हमारे बडे-बडे नेता इनके चरणों में शीश नवाते हैं और कानून के शिकंजे में फंसने पर इनके मददगार बनते हैं। कौन नहीं जानता कि देश से छिपाई गई कुल काली कमाई का एक बडा हिस्सा उन नेताओं, नौकरशाहों तथा सफेदपोशों के कब्जे में हैं जो कृपालु जैसे धर्म के धंधेबाजों के यहां अक्सर ढोक लगाते हैं। तभी तो देश में धर्म बाकायदा एक ऐसा व्यवसाय बन चुका है जो 100 प्रतिशत सफलता की गारण्टी देता है। तभी तो आज कोई चैनल ऐसा नहीं जिस पर धर्म की दुकान न सजाई जाती हो। देश का कोई हिस्सा ऐसा नहीं जहां धर्म के धंधेबाज पूरी सिद्दत से सक्रिय न हों। कोई शासन और कोई प्रशासन ऐसा नहीं जो इन्हें निजी लाभ के लिए संरक्षण न देता हो। और जब तक धर्म की ये दुकानें सरकार और सरकारी नुमाइंदों के संरक्षण में चलेंगी तब तक कृपालु एवं इच्छाधारी जैसे बहरूपिये देश के माथे पर कलंक लगाते रहेंगे। कभी बेबस और लाचारों को अपनी हवस का शिकार बनाकर तो कभी अपनी शौहरत की भूख पूरी करने लिए उनकी जिंदगी दांव पर लगाकर।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
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