बुधवार, 21 मई 2014

टी-20 विश्व कप में ACSU अफसरों पर बड़ा खुलासा

नई दिल्ली। 
अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद् को शर्मनाक स्थिति का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि उसकी भ्रष्टाचार रोधी और सुरक्षा इकाई (एसीएसयू) के एक शीर्ष अधिकारी के बांग्लादेश में इस साल विश्व टी20 प्रतियोगिता के दौरान भारतीय सट्टेबाज के साथ कथित संपर्क का खुलासा हुआ है.
ढाका के टेलीविजन चैनल ‘बांग्ला ट्रिब्यून’ ने आडियो टेप जारी किया है जिसमें भारत से आईसीसी के एसीएसयू अधिकारी और कथित सट्टेबाज के बीच इस साल बांग्लादेश में विश्व ट्वेंटी20 के दौरान कथित बातचीत का जिक्र है.
चैनल ने दावा किया कि इस सट्टेबाज को ढाका पुलिस ने गिरफ्तार किया था लेकिन बाद में आईसीसी एसीएसयू अधिकारी के आग्रह पर उसे रिहा कर दिया गया जिसने अधिकारियों से कहा कि वह उसका मुखबिर है.
चैनल ने कहा, ‘‘आडियो रिकार्ड के आधार पर अप्रैल में सट्टेबाज को गिरफ्तार किया गया, जिसके बाद उसने क्रिकेट मैच फिक्सिंग पर अहम सूचना मुहैया कराई.’’ एसीएसयू अधिकारी ने इस कथित बातचीत पर प्रतिक्रिया देने से इंकार करते हुए कहा कि ऐसे मुद्दे पर प्रतिक्रिया देना आईसीसी का काम है. इस मामले में आईसीसी ने अब तक कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है.
इस बातचीत में एसीएसयू अधिकारी सट्टेबाज को सतर्क रहने और तुरंत बांग्लादेश छोड़ने के लिए कह रहा है क्योंकि उसकी उपस्थिति का पता चल चुका है.
अधिकारी साथ ही सट्टेबाज को कह रहा है कि उसकी मौजूगदगी ने सारा मामला बिगाड़ दिया है और उसका बचाव करना मुश्किल होगा.
-एजेंसी

सारे नियम ताक पर रख कर सचिन को दिया भारत रत्‍न

नई दिल्ली। 
देश के सबसे बड़े सम्मान भारत रत्न को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। दरअसल एक आरटीआई से मांगी गई जानकारी के दौरान यह खुलासा हुआ है कि देश के हॉकी के जादूगर कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद की फाइल सरकारी मंत्रालयों में कई महीनों तक घूमती रही। ठीक उसी वक्त पूर्व भारतीय क्रिकेटर सचिन तेंदुलकर की भारत रत्न से जुड़ी फाइल की एंट्री हुई और उन्हें भारत रत्न का सम्मान दिए जाने पर केंद्र सरकार ने अंतिम मुहर लगा दी।
आरटीआई से यह खुलासा हुआ है कि सचिन तेंदुलकर को भारत रत्न देने के लिए सभी नियमों को ताक पर रख दिया गया। ध्यानचंद को भारत रत्न दिए जाने से जुड़ी फाइल सरकारी मंत्रालयों में चार महीनों तक घूमती रही। इसी बीच सचिन तेंदुलकर के फाइल की एंट्री हुई और वह देश के सबसे बड़े सम्मान यानी भारत रत्न लेने के मामले में बाजी मार गए क्योंकि इसके लिए सभी नियमों को दरकिनाकर कर दिया गया था। गौरतलब है कि 2014 में चार फरवरी को राज्य सभा सांसद सचिन तेंदुलकर को भारत के सर्वोच्‍च नागरिक सम्‍मान 'भारत रत्‍न' से नवाजा गया था। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने सचिन तेंदुलकर को यह सम्मान प्रदान किया था।
सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि अगर भारत सरकार ने 2013 में ध्यान चंद को भारत रत्न देने की पूरी तैयारी कर ली थी तो फिर उसे अचानक क्यूं बदल दिया गया? खेल मंत्रालय ने ध्यान चंद को भारत रत्न देने की सिफारिश की थी लेकिन खेल मंत्रालय को भारत सरकार ने यह नहीं बताया कि उसकी सिफारिश को क्यों नामंजूर किया गया। यह भी बड़ा सवाल है कि कैसे जानबूझकर ध्यान चंद के उस फाइल की अनदेखी होती रही जो देश के सबसे बड़े सम्मान भारत रत्न से जुड़ी फाइल थी।
सचिन ने पिछले साल नवंबर 2013 में मुबंई में वेस्‍टइंडीज के खिलाफ अपना अंतिम 200वां टेस्‍ट खेलकर संन्‍यास ले लिया था। सचिन क्रिकेट की दुनिया में रिकॉर्डों के बादशाह कहे जाते हैं। सचिन ने अपने करियर में कुल 200 टेस्ट मैच खेले। उन्होंने टेस्ट मैचों में 53.78 की औसत से कुल 15921 रन बनाए हैं। टेस्ट क्रिकेट में उनका उच्चतम स्कोर 248 रन है, जो उन्होंने बांग्लादेश के खिलाफ ढाका में बनाए थे। टेस्ट क्रिकेट में उन्होंने 51 शतक और 68 अर्धशतक जमाए हैं। इसी तरह वनडे क्रिकेट में उन्होंने कुल 463 मैच खेले हैं। वनडे की 452 पारियों में उन्होंने 44.83 की औसत से 18426 रन बनाए हैं। इसमें 49 शतक और 96 अर्धशतक शामिल हैं।
दूसरी तरफ हॉकी के जादूगर कहे जानेवाले ध्यान चंद ने भारत के लिए तीन ओलिंपिक गोल्ड मेडल जीते थे- 1928 (ऐम्सटर्डम), 1932 (लॉस एंजिलिस), और 1936 (बर्लिन)। हॉकी के इस महान खिलाड़ी ने सन 1979 में दुनिया को अलविदा कह दिया था। ध्यान चंद ने आजादी के पहले वाले भारत में इस खेल के प्रति भारतीयों में एक जुनून पैदा कर दिया था।
-एजेंसी

शनिवार, 3 मई 2014

फर्जी शंकराचार्य हैं मोदी के विरोधी अधोक्षानंद


कांग्रेस ने अपने राजनीतिक फायदे-नुकसान के लिए एक नया शंकराचार्य ही पैदा कर दिया है। दअरसल, जिस अधोक्षानंद देवतीर्थ को पुरी पीठ का शंकराचार्य कहकर कांग्रेस भाजपा पर हमला कर रही है, उनका उस पीठ से कोई लेना देना नहीं है। इसके साथ ही वह इस पीठ के शंकराचार्य भी नहीं हैं। यहां पर शंकराचार्य के तौर पर स्वामी निश्चलानंद सरस्वती हैं और उन्होंने अभी तक अपना कोई उत्तराधिकारी भी घोषित नहीं किया है।
दरअसल, यह बहस तब शुरू हुई है जब अधोक्षानंद देवतीर्थ के नाम से एक ऐसा बयान जारी किया गया जिसमें कहा गया कि वह पुरी पीठ के शंकराचार्य हैं और बनारस में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के प्रत्याशी नरेंद्र मोदी के खिलाफ प्रचार करेंगे।
जब हमने इस पूरे मामले की छानबीन की तो मामला कुछ और ही निकल कर सामने आया।
जिस अधोक्षानंद देवतीर्थ को पुरी शंकराचार्य के नाम से कांग्रेस प्रचारित कर रही है, उसका पीठ से कोई लेना-देना ही नहीं है। खुद शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ने बयान जारी करके कहा है कि उन्होंने या पीठ ने किसी भी प्रत्याशी के समर्थन या विरोध में कोई बयान जारी नहीं किया है।
बात यहीं खत्म हो जाती तो भी बेहतर होता, जब पीठ से संपर्क किया गया तो पीठ की बेवसाइट और शंकराचार्य के दफ्तर के आधिकारिक नंबरों पर पूरी तरह से इस बात की पुष्टि की गई कि शंकराचार्य के तौर पर फिलहाल स्वामी निश्चलानंद सरस्वती ही विराजमान हैं।
इतना ही नहीं, कार्यालय ने किसी अधोक्षानंद देवतीर्थ के पीठ से जुड़े होने के सवाल पर भी साफ कहा कि इस तरह का कोई शख्स इस पीठ से कोई रिश्ता नहीं रखता है और न ही इस पीठ के अंदर इस नाम का कोई शख्स है।
गौरतलब है कि कांग्रेस, उक्‍त देवतीर्थ को आगे कर भाजपा पर हमला बोल रही है। कांग्रेस अपने विज्ञापन में देवतीर्थ को पुरी पीठ का शंकराचार्य बता रही है। इससे आगे बढ़कर कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह खुद उस विज्ञापन को अपने टि्वटर और फेसबुक अकाउंट पर जारी कर भाजपा पर हमला बोल रहे हैं। अब सवाल खुद कांग्रेस के पाले में आ खड़ा हो गया है कि यह कौन सी राजनीति है, जिसके लिए इतनी ओछी हरकत की जा रही है।
-एजेंसी

गुरुवार, 1 मई 2014

13 कं. पर किसी का रिटर्न तक दाखिल नहीं कर रहे वाड्रा

नई दिल्‍ली। 
विवादित जमीन सौदों के लेकर प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा पहले से ही घिरे हुए हैं। अब पता चला है कि मार्च 2011 से उन्होंने अपनी 13 कंपनियों का सालाना रिटर्न्स भी कॉर्पोरेट अफेयर्स मंत्रालय में दाखिल नहीं किए हैं जबकि ऐसा करना अनिवार्य हैं। संभावना जताई जा रही है कि रॉबर्ट वाड्रा जानकारी ने देकर अपनी कंपनियों के कुछ और डील्स के बारे में जानकारी मीडिया से छिपाना चाहते हैं।
गौरतलब है कि 2011 में ही वाड्रा के बिजनेस मॉडल और जमीन सौदों को लेकर पहली बार सवाल उठे थे। उस साल डीएलएफ से लोन लेकर हरियाणा में वाड्रा के जमीन खरीदने और राजस्थान में हजारों एकड़ जमीन हासिल करने को लेकर विवाद हुआ था। हालांकि, इन दोनों सौदों का जिक्र उन्होंने मार्च 2011 तक मंत्रालय को भेजे अपने फाइनैंशल स्टेटमेंट्स में किया है। इसके बाद उन्होंने एक बार भी मंत्रालय को ब्योरा नहीं भेजा है।
अंग्रेजी अखबार डीएनए ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि उसने कॉर्पोरेट अफेयर्स मंत्रालय में मौजूद 13 कंपनियों के दस्तावेजों की जांच की है और पाया कि उन्होंने पिछले दो सालों से सात कंपनियों के फाइनैंशल स्टेटमेंट्स नहीं जमा किए हैं। बाकी छह कंपनियां वाड्रा ने जुलाई से अगस्त 2012 के दौरान ही बनाईं लेकिन इनकी डील्स की जानकारियां भी मंत्रालय को नहीं दी गईं। सूत्रों का कहना है कि सभी छह कंपनियां ग्रामीण इलाकों में जमीन खरीदने के लिए बनाई गई थीं।
खास बात यह है कि पिछले दिनों अपने पति का मजबूती से बचाव कर चुकीं प्रियंका गांधी ने भी एक कंपनी को शुरू करने में उनको सहयोग दिया था। नवंबर 2007 में बनी ब्लू ब्रीज ट्रेडिंग प्राइवेट लिमिटेड में प्रियंका डायरेक्टर बनीं लेकिन 8 महीने में ही उन्होंने यह पद छोड़ा दिया। बाद में रॉबर्ट वाड्रा की मां मॉरीन वाड्रा डायरेक्टर बनाई गई थीं। ब्लू ब्रीज रिटर्न्स दाखिल कर रही है।
कॉर्पोरेट अफेयर्स मंत्रालय के नियमों के मुताबिक, वाड्रा लगातार दो साल से डिफॉल्ट कर रहे हैं और अगर वह तीसरे साल भी रिटर्न्स दाखिल नहीं करते हैं, तो मंत्रालय उन सभी कंपनियों के खिलाफ कार्यवाही कर सकता है जिसमें वह डायरेक्टर हैं। कंपनियों पर न्यूनतम 50 हजार रुपये या फाइनैंशल स्टेटमेंट दाखिल किए जाने तक प्रतिदिन 5 हजार रुपये की दर से जुर्माना लगाया जा सकता है। मंत्रालय के सूत्र ने बताया कि न्यूनतम जुर्माना तब लगाया जाता है जब कंपनी के पास रिटर्न न दाखिल करने की तर्कसंगत वजह हो।
मंत्रालय के एक सीनियर अधिकारी का कहना है, 'शायद मीडिया में कंपनियों के बिजनेस मॉडल और लैंड डील्स के बारे में और जानकारी आने से बचने के लिए वाड्रा ने फाइनैंशल स्टेटमेंट्स दाखिल करना बंद कर दिया है। उन्हें लगा होगा कि वह भारी जुर्माना देना अफोर्ड कर सकते हैं, लेकिन अपने बिजनेस प्लान्स की जानकारी लीक नहीं होने देना चाहते।'
-एजेंसी

मंगलवार, 22 अप्रैल 2014

कोबरा ने 1984 पर स्‍टिंग करके अब कांग्रेस को मारा डंक

नई दिल्ली। 
1984 के सिख विरोधी दंगों के बारे में एक सनसनीखेज खुलासा सामने आया है। कोबरापोस्ट द्वारा किए गए इस स्टिंग ऑपरेशन में इस बात का खुलासा किया गया है कि कैसे पुलिस ने कांग्रेस सरकार के सामने खुद को सही साबित करने के लिए दंगाइयों के खिलाफ कार्यवाही करने से मना कर दिया था, और खास बात यह कि आंशिक तौर पर पुलिस फोर्स खुद भी सांप्रदायिक हो गई थी।
दंगे के समय वहां तैनात रहे छह एसएचओ ने कोबरापोस्ट के एक अंडरकवर रिपोर्टर द्वारा लिए गए सीरीज इंटरव्यू में पुलिस द्वारा कार्यवाही न करने की बात स्वीकार की है। हालांकि, दो सीनियर ऑफिसर्स एसी. पी. गौतम कौल और तब के पुलिस कमिश्नर एस. सी. टंडन के इंटरव्यू में इस तरह बयान सामने नहीं आए हैं। जहां टंडन सारे सवालों को टाल गए, वहीं गौतम कौल ने एक घटना का जिक्र किया है कि वह गुरुद्वारा रकाबगंज के पास दंगे की खबरों की जांच के लिए गए तो उन्हें वहां से भागना पड़ा, क्योंकि वह उग्र भीड़ के सामने अकेले पड़ गए थे।
अगर ये इंटरव्‍यू सही हैं तो इससे पता चलता है कि कैसे पुलिस फोर्स न सिर्फ कार्यवाही करने में विफल रही बल्कि सिखों को 'सबक' सिखाने के लिए सरकार के साथ सांठ-गांठ भी की। यह अल्पसंख्यकों के खिलाफ राज्य प्रायोजित हिंसा का सबसे खराब उदाहरण है।
जिन एसएचओ के इंटरव्यू लिए गए उनमें कल्याणपुर के शूरवीर सिंह त्यागी, दिल्ली कैंटोंमेंट के रोहतास सिंह, कृष्णा नगर के एस. एन. भाष्कर, श्रीनिवासपुर के ओ. पी. यादव तथा मेहरौली के जयपाल सिंह और तब पटेल नगर में तैनात एसएचओ अमरीक सिंह भुल्लर शामिल हैं। जयपाल सिंह ने जांच कमीशन के पास एक ऐफिडेबिट जमा कराई है जिसमें उन्होंने स्थानीय नेताओं पर न सिर्फ दंगे में शामिल होने बल्कि भीड़ को भड़काने का भी आरोप लगाया है।
इस इंटरव्यू में सामने आए सनसनीखेज खुलासों में से एक यह है कि पुलिस को यह संदेश प्रसारित किए गए कि पुलिस उन दंगाइयों के खिलाफ कोई कार्यवाही न करे जो 'इंदिरा गांधी जिंदाबाद' के नारे लगा रहे थे और कुछ मामलों में पीड़ितों की लाशों को दंगों की जगह से दूर फेंक दिया जाए जिससे मरने वालों की आधिकारिक संख्या कम दिखाई जा सके।
इन पुलिस वालों के अनुसार पुलिस कंट्रोल रूम में आगजनी और दंगों की खबरों की भरमार के बावजूद महज दो फीसदी संदेश ही रेकॉर्ड किए गए। बाद में सीनियर पुलिस अधिकारियों पर कार्यवाही न करने के आरोपों से बचने के लिए पुलिस लॉगबुक में परिवर्तन कर दिया गया।
सीनियर अधिकारियों ने दंगाइयों पर गोली चलाने का आदेश नहीं दिया। यहां तक कि फायर ब्रिगेड ने भी आगजनी प्रभावित क्षेत्रों में जाने से मना कर दिया। पुलिस ने दंगा प्रभावितों को एफआईआर दर्ज करने की अनुमति नहीं दी और जो एफआईआर दर्ज हुए भी उनमें भी हत्या और आगजनी की अलग-अलग घटनाओं को एक ही एफआईर में दर्ज कर लिया गया।
कम से कम तीन एसएचओ ने टंडन की कुप्रबंधन के लिए आलोचना की है। त्यागी ने जोर देकर कहा, 'जानबूझकर या अनजाने में, वह (टंडन) सरकार के प्रभाव में थे। शुरुआत में उन्होंने स्थिति को ठीक ढंग से नहीं संभाला और पहले दो दिनों में स्थिति नियंत्रण से बाहर हो गई।' यादव ने भी टंडन पर फोर्स को नेतृत्व न प्रदान करने का आरोप लगाया।
दंगों की जांच के लिए गठित रंगनाथ मिश्रा समिति और कपूर-कुसुम मित्तल समिति दोनों ने ही टंडन को कानून और व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने के लिए जिम्मेदार ठहराया था। जब कोबरा पोस्ट के रिपोर्टर ने टंडन की इस बारे में प्रतिक्रिया जाननी चाही तो उन्होंने यह कहते हुए कुछ भी कहने से मना कर दिया कि चुनाव के सीजन में उनके द्वारा कुछ भी कहने से विवाद खड़ा हो सकता है।
भाष्कर ने अपने सीनियर अधिकारियों को भेजे गए उस मेसेज को अपने पास रखा है जिसे उन्होंने अनदेखा कर दिया था। भुल्लर ने एडिशनल सीपी हुकुम चंद जाटव पर प्रेस द्वारा दी गई आगजनी और हत्या की सूचना के बाद भी कार्यवाही करने से मना कर देने का आरोप लगाया है। भुल्लर के मुताबिक जाटव तब करोल बाग के कंट्रोल रूम में थे जब एक रिपोर्टर ने उन्हें घटना की सूचना दी लेकिन जाटव ने कहा कि वह कंट्रोल रूम में ही थे और ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है। भुल्लर का दावा है, 'वह (जाटव) सब कुछ जानते थे लेकिन वहां से मूव ही नहीं किया।'
एक और पुलिस अधिकारी रोहतास सिंह ने कहा कि डीसीपी चंद्र प्रकाश ने उन्हें दंगाइयों की भीड़ पर गोली चलाने की अनुमति नहीं दी थी। सिंह के मुताबिक, 'उन्होंने मुझसे कहा और लिखित में दिया कि इंदिरा गांधी की हत्या एक बड़ी घटना है। अब क्यों तुम (गोली चलाकर) एक और बड़ी घटना करना चाहते हो?
सिंह जोर देकर कहते हैं कि वह अपने आरोपों को और मजबूती से साबित कर पाते अगर वायरलेस मेसेजेज को ठीक ढंग से रेकॉर्ड किया गया होता। सिंह कहते हैं, 'अगर वे मेसेजेज रेकॉर्ड किए गए होते तो मैं कई बातें साबित कर सकता था लेकिन 2 फीसदी मेसेजेज भी कंट्रोल रूम के लॉग बुक में रेकॉर्ड नहीं किए गए।' उन्होंने आरोप लगाया कि चंद्र प्रकाश ने उन मेसेजेज को भी बदल दिया जिनसे वह फंस सकते थे। सिंह यह भी स्वीकार करते हैं कि फोर्स सांप्रदायिक हो गई थी। उन्होंने कहा, 'मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि हमारे पुलिस के जवान सांप्रदायिक सोच के हो गए थे।'
इंटरव्यू से पता चलता है कि कैसे पुलिस ने तीन दिन बाद सेना के हस्ताक्षेप से दंगों पर नियंत्रण के बाद लोगों को इंसाफ दिलाने की बजाय अपनी गलतियों पर पर्दा डालने की कोशिश की। पहले तो उन्होंने केस दर्ज नहीं किए और जब किए भी तो असमान मामलों को एक साथ एक एफआईआर के तहत दर्ज कर लिया।
भुल्लर के मुताबिक, 'पुलिस ने केस दर्ज नहीं किए, इसके बजाय उन्होंने केस को दबाने की कोशिश की। वे जानते थे कि उनके इलाकों में जबर्दस्त दंगे हो रहे हैं इसलिए उन्होंने इसे कमतर दिखान की कोशिश की और इसलिए अपनी नौकरियां बचाने के लिए लाशों को सुल्तानपुरी में फेंक दिया गया।'
-एजेंसी

शनिवार, 19 अप्रैल 2014

वॉल स्ट्रीट तक पहुंचने के लिए वाड्रा को दी भाजपा ने बधाई

नई दिल्ली। 
सोनिया गांधी के दामाद और प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा पर बीजेपी का हमला आज भी जारी है. आज बीजेपी नेताओं अरुण जेटली और रविशंकर प्रसाद ने वाड्रा के कारोबार को वाड्रा मॉडल का नाम दे दिया. आपको बता दें कि शुक्रवार को जारी एक रिपोर्ट में द वॉल स्ट्रीट ने खुलासा किया था कि दसवीं पास कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के दामाद और प्रियंका गांधी के पति रॉबर्ट वाड्रा के पास 2012 में सवा तीन सौ करोड़ की जमीन जायदाद थी.
अरुण जेटली ने अपने ब्लॉग में लिखा है- राबर्ट वाड्रा को बधाई हो. द वॉल स्ट्रीट जनरल तक पहुंच गए. बिजनेस एनालिस्ट को वाड्रा बिजनेस मॉडल पर रिसर्च पेपर तैयार करना चाहिए. बिना पूंजी लगाए बिजनेस शुरू किया. राजनीतिक पूंजी से लोन और एडवांस आए. लोन से बाजार मूल्य से कम दाम में प्रापर्टी खरीदी.
ब्लॉग में आगे यूपीए सरकार पर निशाना साधते हुए जेटली ने लिखा है- सरकार के संरक्षण में बहुत सारे लोग ऐसे सौदे करना चाहेंगे. इससे गंभीर सवाल खड़े होंगे. इसलिए तो द वॉल स्ट्रीट ने ये किया.
अमेरिकी अखबार द वॉल स्ट्रीट जनरल की रिपोर्ट में ने अनुमान लगाया गया है कि साल 2012 तक रॉबर्ट वाड्रा ने 72 करोड़ रुपये की जमीन बेच कर मुनाफा कमाया था और अब भी करीब 253 करोड़ रुपये की जमीन के रॉबर्ट वाड्रा मालिक हैं. आपको बता दें कि ये सारे आंकड़े 2012 तक के हैं, उसके बाद से रॉबर्ट वाड्रा की कंपनियों के दस्तावेज सरकारी वेबसाइट पर उपलब्ध नहीं हैं.
साल 1997 में रॉबर्ट वाड्रा की शादी प्रियंका गांधी से हुई थी. साल 2004 में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए ने सत्ता संभाली थी. उस वक्त तक रॉबर्ट वाड्रा एक छोटा से एक्सपोर्ट का बिजनेस चलाते थे. पर साल 2007 में रॉबर्ट वाड्रा ने रियल एस्टेट के बिजनेस में कदम रखा. करीब एक लाख की पूंजी के साथ शुरू हुआ बिजनेस सात साल में करोड़ों में पहुंच गया है तरक्की की ये कहानी कांग्रेस शासित राज्यों में लिखी गई.
द वॉल स्ट्रीट जनरल ने जिन सौदों का जिक्र किया है उसमें शामिल हैं-
साल 2008- स्काई लाइट ने गुड़गांव में साढ़े तीन एकड़ जमीन खरीदी करीब 7.5 करोड़ में खरीदी और ढाई महीने में लैंड यूज बदल कर डीएलएफ को ये जमीन 58 करोड़ में बेच दी. अखबार ने इस सौदे को लेकर अशोक खेमका के तबादले और दूसरी अनियमितताओं का जिक्र भी किया है.
साल 2008-09- स्काई लाइट हॉस्पिटेलिटी ने 31 करोड़ में दिल्ली में डीएलएफ के एक होटल में 50 फीसदी की हिस्सेदारी खरीदी थी जबकि साल 2012 में इसकी कीमत हो गई 198 करोड़.
साल 2010- जनवरी 2010 में वाड्रा ने 94 एकड़ जमीन 42 लाख में खरीदी. कुछ ही वक्त बाद केंद्र सरकार की तरफ से सोलर पार्क में निवेश करने पर टैक्स रियायत देने का ऐलान किया गया. एक साल में राजस्थान सरकार ने भी ऐसी ही रियायत दी. नतीजा हुआ जमीनें करीब दस गुना महंगी हो गईं.
साल 2009-12- राजस्थान में वाड्रा की कंपनियों ने तीन साल में 2000 एकड़ जमीन खरीदी. जिसमें करीब एक तिहाई 700 एकड़ जमीन बेच कर करीब 16 करोड़ कमा लिए. जो जमीन पर खर्च करने का तीन गुना था. कांग्रेस इस मामले में रॉबर्ट वाड्रा का बचाव करती आ रही थी अब कांग्रेस का कहना है कि अगर कुछ गलत लगता है तो जांच होनी चाहिए.
द वॉल स्ट्रीट रिपोर्टर ने रॉबर्ट के प्रवक्ता से इस बारे में बात की तो उनके प्रवक्ता ने कहा कि ये वाड्रा को बदनाम करने की साजिश है. वाड्रा के प्रवक्ता ने कहा कि राजनीतिक कारणों से बदनाम करने की साजिश चल रही है. वाड्रा के पास जमीन खरीदने और बेचने का अधिकार है. उन्होंने किसी से अनुचित लाभ नहीं लिया. रॉबर्ट वाड्रा ने जो भी किया वो कानून के मुताबिक किया. इससे ज्यादा कुछ नहीं कहना है.
-एजेंसी

बुधवार, 16 अप्रैल 2014

बाप रे बाप: ये वकील हैं या..हर पेशी की फीस 25 लाख रुपए

सरकार के कोल ब्लॉक्स डीऐलोकेशन के कदम को चुनौती देने के लिए कैप्टिव कोल कंपनियों ने एक पेशी के लिए 25 लाख रुपये तक लेने वाले नामी-गिरामी वकीलों को हायर किया है। जुलाई में कई अदालतों में इस मामले की सुनवाई शुरू होगी। तब मुकुल रोहतगी और के. के. वेणुगोपाल जैसे सीनियर वकील इन कंपनियों की पैरवी करते हुए दिखेंगे।
इंडस्ट्री के लोगों का कहना है कि जहां कई सीनियर वकील एक पेशी के लिए 20 लाख रुपये की फीस ले रहे हैं, वहीं उनके साथ जाने वाले वकील भी एक पेशी के लिए 4 से 5 लाख रुपये ले रहे हैं। इनमें से एक कंपनी के प्रवक्ता ने कहा, 'एक पेशी के लिए नॉर्मल फीस 5-7 लाख रुपये होती है लेकिन आउट स्टेशन सुनवाई में खर्च डबल हो जाता है। तब कंपनी को वकीलों और उनके स्टाफ के रहने का भी इंतजाम करना पड़ता है। सभी कंपनियों ने कम से कम दो वकील हायर किए हैं। वहीं कुछ कंपनियों ने दो सीनियर वकील के साथ दो जूनियर वकील अप्वाइंट किए हैं।'
ऊपर की अदालतों में रोहतगी, नीरज किशन कौलव, दुष्यंत दवे, अरविंद निगम और ए. एस. चंडियोक जैसे सीनियर वकील कोल ब्लॉक्स मामले को हैंडल कर रहे हैं। कंपनियों ने करण लूथरा, ऋषि अग्रवाल, महेश अग्रवाल और गौरव जुनेजा जैसे वकीलों को भी हायर किया है। इसके बारे में दिल्ली हाईकोर्ट के एक वकील ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया, 'सीनियर वकील जाने-माने होते हैं और उसी हिसाब से वे फीस भी लेते हैं।
मिसाल के लिए जब रोहतगी, कौल और चंडियोक जैसे वकील पेश हुए तो कोर्ट ने केंद्र सरकार के बैंक गारंटी भुनाने और कोल ब्लॉक डीऐलोकेशन पर स्टे लगा दिया।' सरकार की ओर से 218 कैप्टिव कोल ब्लॉक्स दिए गए हैं। इनमें से प्राइवेट कंपनियों को दिए गए 56 और सरकारी कंपनियों को दिए गए 22 ब्लॉक्स कैंसल किए जा चुके हैं।
करीब-करीब सभी प्राइवेट कंपनियों ने कोल ब्लॉक डीऐलोकेशन और बैंक गारंटी भुनाने को चैलेंज किया है। ये मुकदमे झारखंड, जबलपुर, छत्तीसगढ़, ओडिशा और दिल्ली में चल रहे हैं। वकील ने बताया कि कंपनियां हाईकोर्ट का भी खर्च उठा रही हैं जबकि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार हो रहा है। क्या केंद्र सरकार को कैप्टिव कोल ब्लॉक एलोकेट करने का अधिकार है, इस बारे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आना है।
कोर्ट ने कोल माइन ऐलोकेशन मामले में सभी पक्षों की दलील सुन ली है। इसमें 7 राज्यों और माइनिंग कंपनियों की एसोसिएशंस ने भी अपना पक्ष रखा है। इसके बाद अदालत ने मामले में फैसला सुरक्षित रखा है।
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