गुरुवार, 21 अगस्त 2014

जूलर्स भी खूब काट रहे हैं ''टटलू''

क्‍या आप स्‍वर्ण आभूषण या सोने के सिक्‍के आदि खरीदने के शौकीन हैं, क्‍या आप सोने में निवेश करते हैं ताकि वह बुरे वक्‍त में कभी आपके काम आ सके?
यदि ऐसा है तो यह खबर विशेष रूप से आपके ही लिए है क्‍योंकि आपका यह शौक या आपकी निवेश करने की आदत आपके लिए भारी घाटे का सौदा भी हो सकता है।
यूं तो राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली से मात्र 146 किलोमीटर दूर स्‍थित विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक जिला एक लंबे समय से चांदी के आभूषणों और चांदी के सिक्‍के बनाने के लिए मशहूर है लिहाजा यहां चांदी की खपत बड़ी मात्रा में होती है किंतु अब यह जिला स्‍वर्णाभूषणों की खपत का भी बड़ा बाजार है।
दरअसल जब से कृष्‍ण की पावन जन्‍मभूमि पर रियल एस्‍टेट के कारोबारियों ने अपने पैर फैलाने शुरू किए हैं, तब से यहां कालेधन का प्रवाह तेजी के साथ बढ़ा है। काले धन का यह प्रवाह रियल एस्‍टेट के साथ-साथ सर्राफे के कारोबारियों को भी मुफीद है क्‍योंकि जब किसी के पास कालाधन बढ़ता है तो उसके लिए गोल्‍ड में निवेश करना आसान होता है।
इसके अलावा आम भारतीयों की सोच भी यही है कि गोल्‍ड पर निवेश किया गया पैसा सामाजिक प्रतिष्‍ठा बढ़ाने के अलावा आड़े वक्‍त में काम आने का सबसे अच्‍छा ज़रिया बनता है।
कालेधन के प्रवाह तथा लोगों की इस सोच का अब इस धार्मिक जनपद के अधिकांश ज्‍वैलर्स जमकर लाभ उठा रहे हैं और धर्म के दोगुने करने तक से परहेज नहीं कर रहे।
इस कारोबार से ही जुड़े सूत्रों के अनुसार चूंकि हैसियत बढ़ाने या निवेश करने के लिए सोना खरीदने वाले लोग बहुत ही मुश्‍किल से अपने सोने को रीसेल करते हैं इसलिए ज्‍वैलर्स द्वारा की जाने वाली धोखाधड़ी एवं बेईमानी का खुलासा नहीं हो पाता।
बेईमानी का खुलासा न हो, इसके लिए अधिकांश ज्‍वैलर्स अपने ग्राहकों को इस तरह की सलाह भी देते हैं कि यदि कभी आपको अपना सोना बेचने की जरूरत पड़ जाए तो आप हमारे पास चले आइए। हम आपसे सिर्फ मेकिंग का पैसा काटेंगे, सोने का पूरा पैसा वापस दे दिया जायेगा।
ज्‍वैलर्स का अपने ग्राहकों के प्रति दिखाया गया यह प्रेम या अतिरिक्‍त सुविधा देने का दिखावा ही सामान बेचने के साथ किए गये छल की पूरी कहानी का राज है। ज्‍वैलर्स जानते हैं कि सौ में से नब्‍बे ग्राहक ऐसे होते हैं जो जरूरत पड़ने पर सोना कभी वहां नहीं बेचने जाते, जहां से उसे खरीदते हैं क्‍यों कि ऐसा करने में वह खुद की प्रतिष्‍ठा व संपन्‍नता प्रभावित होती महसूस करते हैं।
यही कारण है कि ज्‍यादातर ज्‍वैलर्स सोने के टंच में धोखाधड़ी करते हैं और उसमें भारी लाभ कमाते हैं।
सरकार ने सर्राफा बाजार में की जाने वाली इस धोखाधड़ी को बंद करने तथा स्‍वर्ण आभूषणों की गुणवत्‍ता के लिए ''हॉलमार्क'' की व्‍यवस्‍था की लेकिन अब ज्‍वैलर्स ने उसमें भी ग्राहक को ठगने का रास्‍ता निकाल लिया है।
अब अगर शुद्ध सोने की गारंटी देने वाला हॉलमार्क ही नकली हो तो ग्राहक किस पर भरोसा करेगा?
जी हां, आपको आसानी से यकीन आए या न आए परंतु पूरी तरह सच है यह बात कि जूलरी बाजार में अवैध हॉलमार्किंग का धंधा भी जोरों पर है और मथुरा जैसी धार्मिक नगरी के ज्‍वैलर्स इस गोरखधंधे से बेहिसाब पैसा अर्जित कर रहे हैं।
इसके लिए लो कैरेट सोने पर हायर फिटनेस नंबर डलवाने या ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स (बीआईएस) के लाइसेंस के बिना ही अपनी जूलरी पर हॉलमार्किंग करवाने का खेल बड़े पैमाने पर खेला जा रहा है।
फर्जी तरीके से कराई गई ज्यादातर हॉलमार्किंग में मुहरों की संख्या 5 से कम रखी जाती है जबकि असली हॉलमार्किंग में पूरी 5 मोहरें अंकित रहती हैं।
चांदनी चौक, दरीबा कलां, कूचा महाजनी, करोलबाग के जूलरी बाजारों में पैठ रखने वाले एक बुलियन एक्सपर्ट ने नकली हॉलमार्किंग वाले गहनों के कुछ पीस दिखाते हुए बताया, 'बीआईएस रजिस्टर्ड सेंटर से कराई गई हॉलमार्किंग के तहत गहनों के हर पीस पर 5 तरह के मार्क छापे जाते हैं। पहला बीआईएस का लोगो, दूसरा फिटनेस नंबर यानी कैरेट का संकेत, तीसरा मार्किंग सेंटर का लोगो, चौथा वर्ष कोड और पांचवां बेचने वाले जूलर का लोगो या ट्रेड मार्क।
फर्जीवाड़ा दो तरह से होता है। एक, हॉलमार्किंग तो असली होती है लेकिन रजिस्टर्ड जूलर मार्किंग सेंटर वालों को पैसे खिलाकर लो कैरेट सोने पर एक दो नंबर ज्यादा कैरेट का निशान छपवा लेते हैं। दूसरा, बीआईएस रजिस्ट्रेशन के बिना ही आधा-अधूरा हॉलमार्किंग करा ली जाती है, जिसमें अनिवार्य 5 चिह्नों की जगह 3 या 4 चिह्न ही रखे जाते हैं। यह सिर्फ ग्राहक को इम्प्रेस करने के मकसद से होता है, उसे कोई सर्टिफिकेट नहीं दिया जाता।'
हॉलमार्किंग फिटनेस नंबर हर कैरेट के लिए अलग-अलग होता है। मसलन 23 कैरेट सोने के लिए 958, 22 कैरेट के लिए 916, 21 कैरेट के लिए 875, 18 कैरेट के लिए 750, 17 कैरेट के लिए 708, 14 कैरेट के लिए 585, 9 कैरेट के लिए 375 तथा 8 कैरेट के लिए 333
जानकार बताते हैं कि कैरेट में एकाध नंबरों का फर्क तब तक नहीं पकड़ा जा सकता, जब तक ग्राहक उसकी किसी लैब में जांच नहीं कराए। आम तौर पर लोग हॉलमार्किंग और सर्टिफिकेट से ही संतुष्ट होते हैं पर अंतर ज्यादा होने से बायबैक स्कीमों और पुरानी जूलरी को बेचते समय यह विवाद बन सकता है। फर्जीवाड़े का बड़ा धंधा बिना रजिस्ट्रेशन के ही 3 या 4 मार्क लगवाकर ग्राहकों को गुमराह करने वालों का है।
दिल्ली में 23 हॉलमार्क सेंटर बीआईएस की ओर से हॉलमार्किंग के लिए अधिकृत हैं और हॉलमार्किंग के लिए रजिस्टर्ड जूलर्स की तादाद 1 हजार से ज्यादा नहीं है लेकिन यहां कुल जूलर्स की संख्या 50,000 से ज्यादा है, जिनमें 5 हजार बड़े बुलियन डीलर हैं। इसकी एक वजह यह है कि हॉलमार्किंग कानूनी तौर से अनिवार्य नहीं है। यह जूलर पर निर्भर करता है कि वह अपनी जूलरी की हॉलमार्किंग कराए या नहीं। बीआईएस कानून के मुताबिक हॉलमार्किंग या जूलरी की किसी भी शिकायत पर जिम्मेदारी हॉलमार्किंग सेंटर की नहीं बल्कि जूलर की होगी और उसी के खिलाफ मामला दर्ज होगा।
चूंकि हॉलमार्किंग सिर्फ रिटेल जूलर्स के लिए है, थोक कारोबारियों को इसकी इजाजत नहीं है इसलिए रिटेल जूलर्स के लिए फर्जीवाड़ा करना और सहज हो जाता है।
इस धोखाधड़ी का एक बड़ा कारण यह भी है कि स्‍वर्णाभूषणों की खरीद में अधिकांशत: लोग कालेधन का ही इस्‍तेमाल करते हैं और इसलिए उसकी खरीद का बिल नहीं लेते। जब बिलिंग नहीं होती तो जूलर्स के लिए वक्‍त पर ग्राहक से पल्‍ला झाड़ने में भी कोई दिक्‍कत नहीं होती।
संभवत: इसीलिए धर्म नगरी में अधर्म और बेईमानी के इस कारोबार को आज इतना परवान चढ़ा दिया है कि जगह-जगह जूलरी शोरूम खुल गए हैं और शहर का कोई इलाका ऐसा नहीं जहां सर्राफा कारोबारी न हों जबकि कुछ वर्षों पूर्व तक इनका अपना एक अलग मार्केट हुआ करता था।
आश्‍चर्य की बात तो यह है कि स्‍वर्ण और डायमंड पर भी अब इसके कारोबारी बाकायदा छूट देते हैं तथा समय-समय पर स्‍कीम निकाल कर सेल लगाते हैं।
है ना चकित करने वाला कारोबार। और उससे भी अधिक चकित करती है लोगों की वह सोच जो आंख बंद करके अपनी जेब कटवाती है और किसी से कोई शिकायत तक नहीं करती।
-LegendNews exclusive

गुरुवार, 7 अगस्त 2014

मोतीलाल वोरा ने लुटियंस में कब्‍जा रखे हैं 9 सरकारी बंगले

नई दिल्ली। 
कांग्रेस के दिग्गज नेता और कोषाध्यक्ष मोतीलाल वोरा के नाम पर नई दिल्‍ली के लुटियंस इलाके में नौ सरकारी मकान अलॉटेड हैं। राज्यसभा सदस्य के नाते उन्हें 33 लोधी एस्टेट बंगला आवंटित किया गया है। आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक, राज्यसभा सचिवालय ने पुष्टि की है कि इसके अलावा भी वोरा को छह बंगले और दो फ्लैट दिए गए हैं।
खबर के मुताबिक लोधी एस्टेट के बंगले के अलावा वोरा के पास वीवीआईपी इलाके नॉर्थ एवेन्यू में 49, 63, 78 और 112 नंबर बंगला, साउथ एवेन्यू में 49 और 139 नंबर बंगला, वीपी हाउस में 124 और 507 नंबर फ्लैट हैं। इनमें से ज्यादातर घरों में लंबे समय से वोरा के 'अतिथि' रहते हैं।
पूर्व सांसद केसी लेंका और द्विजेंदर नाथ शर्मा वीपी हाउस वाले फ्लैटों में रहते हैं। नॉर्थ एवेन्यू वाले एक बंगले में महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ से आए कांग्रेसी कार्यकर्ता रहते हैं। वोरा के सबसे नए अतिथि पूर्व सांसद राज बब्बर हैं, जो साउथ एवेन्यू वाले बंगले में शिफ्ट होने वाले हैं। इस बंगले में फिलहाल साफ-सफाई का काम चल रहा है। यह घर 2006 से ही वोरा के कब्जे में है और राज बब्बर इसमें उनके तीसरे गेस्ट होंगे।
अब सवाल उठता है कि क्या कोई सांसद अपने अतिथि के लिए सरकारी घर ले सकता है?
सांसद अपने संसदीय क्षेत्र के गणमान्य नागरिकों के लिए मामूली किराये पर कुछ समय के लिए घर ले सकते हैं। हालांकि, वोरा के मामले में ज्यादातर गेस्ट पार्टी के वे पूर्व सांसद हैं, जिन्हें चुनाव हारने के चलते मकान खाली करना पड़ता है। इस मामले में गौर करने वाली बात यह है कि नॉर्थ और साउथ एवेन्यू जैसे पॉश इलाकों में किराये पर रहने के लिए लाखों रुपये प्रति महीना देना पड़ता है जबकि तथाकथित गेस्ट के लिए ये बंगले 19000 रुपये के किराये पर ही उपलब्ध हैं।
साफ है कि कांग्रेस नेता वोरा को घर देने के मामले में नियमों की जमकर धज्जियां उड़ाई गईं। सांसद को नियम के तहत गेस्ट को ठहराने के लिए घर तीन महीने के लिए दिया जाता है। हाउस कमेटी की गाइड लाइंस के मुताबिक, समीक्षा करके इसकी अवधि अधिकतम छह महीने की जा सकती है। इस समय लुटियंस इलाके में सांसदों ने 46 मकान अपने अतिथियों के लिए अलॉट कराए हैं। इनमें सबसे ज्यादा 8 मोतीलाल वोरा के पास ही हैं। बड़े नेताओं में जनार्दन द्विवेदी, आनंद शर्मा, अरुण जेटली और नजम्मा हेपतुल्ला के नाम पर एक-एक घर अलॉट है।
राज्यसभा सचिवालय ने वोरा को इन घरों को खाली करने का नोटिस जारी कर दिया है। इसके बावजूद इनमें उनके गेस्ट ही रह रहे हैं। वोरा ने इस बारे में सफाई देते हुए कहा कि उन्होंने आठ मकान अलॉट नहीं कराए हैं। उनका कहना है कि उनके पास सिर्फ 78 नॉर्थ एवेन्यू और 139 साउथ एवेन्यू वाला बंगला है, बाकी के बारे में उन्हें जानकारी नहीं है।
-एजेंसी

मंगलवार, 5 अगस्त 2014

यमुना प्रदूषण: 'जो छिनरे, वही डोली के संग'

महाभारत नायक योगीराज श्रीकृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली मथुरा सहित समूचे ब्रजमंडल में एक कहावत कुछ इस तरह है- 'जो छिनरे, वो ही डोली के संग'।
फिलहाल यह कहावत उन तमाम लोगों पर पूरी तरह सटीक बैठती है जो यमुना को प्रदूषण से मुक्‍त कराने के लिए चलाए जा रहे आंदोलनों का हिस्‍सा बने हुए हैं और बड़ी शान के साथ मंचासीन होकर अखबारों के लिए फोटो खिंचवाते हैं।
कहावत से इन लोगों का वास्‍ता कैसे और क्‍यों है, यह जानने से पहले वो जान लेना जरूरी है, जिसके कारण ऐसे लोग कहावत का हिस्‍सा बन चुके हैं।
दरअसल यमुना की शुद्धि के लिए डाली गई एक जनहित याचिका पर करीब 16 साल पहले इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय ने न केवल अनेक आदेश-निर्देश दिए बल्‍कि उन आदेश-निर्देशों का अनुपालन कराने को नोडल अधिकारी भी नियुक्‍त किए। मथुरा में अपर जिलाधिकारी (प्रशासन) को यह जिम्‍मेदारी सौंपी गई।
यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने के लिए दिए गए इन आदेश-निर्देशों की गंभीरता के मद्देनजर उच्‍च न्‍यायालय ने नोडल अधिकारियों को न्‍यायिक शक्‍ति तक प्रदान की ताकि वह इस मामले में किसी स्‍तर पर कोताही बरतने वालों को खुद सबक सिखा सकें, फिर चाहे वह उनके सीनियर अधिकारी ही क्‍यों न हों।
उच्‍च न्‍यायालय के आदेश-निर्देशों का अनुपालन कराने के लिए यमुना एक्‍शन प्‍लान के तहत प्राप्‍त सैंकड़ों करोड़ रुपए का इस्‍तेमाल किया गया।
रुपया तो खर्च हो गया लेकिन यमुना में प्रदूषण दूर होने की जगह बढ़ता चला गया, नतीजा सबके सामने है।
अगर बात करें केवल मथुरा और आगरा की तो यहां यमुना मात्र एक नाम के लिए शेष है। सच्‍चाई तो यह है कि यमुना में आज जो कुछ दिखाई दे रहा है, वह मात्र मल-मूत्र, घातक रसायन और नाले-नलियों से बहकर आ रही गंदगी के अलावा कुछ नहीं है।
अब सवाल यह पैदा होता है कि 16 साल पहले यमुना को प्रदूषण मुक्‍त करने के लिए दिए गए तमाम आदेश-निर्देशों के बावजूद यमुना का ऐसा हाल हो कैसे गया?
इस प्रश्‍न का जवाब तब मिलेगा जब उन लोगों पर नजर डाली जाए जिनके ऊपर उच्‍च न्‍यायालय के आदेश-निर्देशों का अनुपालन कराने की जिम्‍मेदारी है।
इसमें सबसे पहला नाम आता है नोडल अधिकारी एडीएम प्रशासन का। पिछले 16 सालों के दौरान मथुरा में एडीमए प्रशासन के पद पर जितने भी अधिकारी तैनात रहे, उनमें से शायद ही किसी ने नोडल अधिकारी के दायित्‍व का सही-सही निर्वहन किया हो।
एक नोडल अधिकारी ने तो साफ-साफ यह स्‍वीकार भी किया कि उन्‍हें यमुना प्रदूषण के मामले में कोर्ट से प्राप्‍त अधिकार और कर्तव्‍यों को जानने का ही समय नहीं मिलता। खाना-पूरी करने के लिए वह यदा-कदा मीटिंग करके अखबारों में समाचार जरूर छपवा लेते हैं जिससे कोर्ट तक यह संदेश न जाए कि नोडल अधिकारी कुछ नहीं कर रहे। जिलाधिकारियों ने इस सब में नोडल अधिकारियों का पूरा साथ दिया और लकीर पीटने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
नोडल अधिकारी के पद पर रहे प्रशासनिक अफसरों की इस नीति का ही परिणाम है कि आज तक एक दिन के लिए भी न तो दरेशी रोड स्‍थित पशुवध शाला में पशुओं का कटान बंद हुआ और न ही कभी पूरी तरह नाले व नाली टेप हो सके। यमुना में दिन-रात जहर घोलने वाली कोई इकाई कभी बंद नहीं हुई और नए आधुनिक कट्टीघर के लिए जमीन तक तलाशने का काम नहीं किया जा सका।
उच्‍च न्‍यायालय के आदेश-निर्देशों की खुलेआम धज्‍जियां उड़ाई जाती रहीं और यमुना एक्‍शन प्‍लान के नाम पर मिले सारे पैसे का बंदरबांट हो गया।
यह सारा काम नोडल अधिकारी के साथ-साथ प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नगर पालिका, याचिकाकर्ता और जनप्रतिनिधियों की देखरेख में होना था लेकिन किसी ने अपनी जिम्‍मेदारी को गंभीरता से नहीं लिया और 16 वर्षों से सब एक-दूसरे पर दोषारोपण करने में लगे रहे।
यमुना रक्षक दल के बैनर तले जब यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने का अभियान छेड़ा गया और पिछले साल इस अभियान ने एक बड़े आंदोलन की शक्‍ल अख्‍ति़यार कर ली तो चेहरा चमकाकर प्रसिद्धि पाने वालों की अच्‍छी-खासी जमात उनके साथ खड़ी दिखाई दी।
इस जमात ने अपना स्‍वार्थ पूरा होते ही आंदोलन को फ्लॉप कराने का षड्यंत्र रचना शुरू कर दिया और देखते-देखते वह अपने मकसद में सफल हो गए। अब कहने को यमुना की प्रदूषण मुक्‍ति के लिए कई संगठन खड़े दिखाई देते हैं परंतु एक भी संगठन ऐसा नहीं है जिसके क्रिया-कलापों में गंभीरता दिखाई देती हो। सबकी अपनी-अपनी ढपली हैं, और अपने-अपने राग। दुख व शर्म की बात तो यह है कि सब एक-दूसरे की नीति ही नहीं नीयत पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं, आरोप-प्रत्‍यारोप लगा रहे हैं।
आश्‍चर्य की बात यह है कि इन संगठनों में भी वही लोग हैं जो कल तक एक झण्‍डे के नीचे इकठ्ठे थे और एकस्‍वर से यमुना को मुक्‍त कराने की बात करते थे।
अगर इन सबका उद्देश्‍य पवित्र है और सब यमुना को प्रदूषण मुक्‍त देखना चाहते हैं तो वो कौन से कारण हैं, जिन्‍होंने आंदोलन को दोफाड़ की जगह चार फाड़ कर दिया?
एक और महत्‍वपूर्ण सवाल यह कि नगर पालिका अध्‍यक्ष और जिलाधिकारी सहित ऐसे अनेक लोग जिनके ऊपर यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने की जिम्‍मेदारी है, वह आंदोलनकारियों के साथ क्‍यों व कैसे खड़े हैं। कैसे वह अखबारों में फोटो छपवाकर ऐसा संदेश दे रहे हैं कि वह यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने के लिए बहुत चिंतित हैं जबकि वही तो यमुना की वर्तमान दुर्दशा के लिए सर्वाधिक जिम्‍मेदार हैं।
कड़वा सच तो यह है कि वही यमुना को नदी से गंदा नाला बना देने के अपराधी हैं और वही उच्‍च न्‍यायालय की अवमानना के लिए जिम्‍मेदार लोगों की परिधि में आते हैं। यदि इन्‍हीं लोगों ने अपनी जिम्‍मेदारी निभाई होती और यमुना एक्‍शन प्‍लान के नाम पर मिली करोड़ों रुपए की रकम का सही-सही इस्‍तेमाल कराया होता तो निश्‍चित ही यमुना इतनी बदहाल न होती।
घोर आश्‍चर्य होता है इस बात पर कि यमुना के लिए आंदोलनरत किसी भी संगठन ने आज तक 'कंटेम्‍प्‍ट ऑफ कोर्ट' की कार्यवाही करने में रुचि क्‍यों नहीं ली। क्‍यों केवल मजमा लगाकर अखबारों में फोटो छपवाने तक सब सीमित हैं। अखबार भी जन जागरूकता या जनसहभागिता की आड़ लेकर प्रसार-प्रचार करने में तो लगे हैं लेकिन कोई अखबार यह नहीं पूछ रहा कि जो यमुना की वर्तमान दयनीय दशा के लिए जिम्‍मेदार हैं और जिन्‍होंने 16 साल से उच्‍च न्‍यायालय के किसी आदेश-निर्देश का पालन कराने में कोई रुचि नहीं दिखाई, ईमानदारी से न तो अधिकारों का इस्‍तेमाल किया और न कर्तव्‍यों का निर्वहन, वह अब किस मुंह से आंदोलनकारियों के साथ खड़े हैं।
कहीं फिर इनका कोई ऐसा छद्म मकसद तो नहीं जिसे पूरा करने के लिए वह शिद्दत के साथ सक्रिय हैं ताकि सांप मर जाए और लाठी भी न टूटे।
यही वह स्‍थिति भी है जो ब्रज की उस कहावत को इनके ऊपर पूरी तरह सटीक बैठाती है- ''जो छिनरे, वही डोली के संग'' ।
रही बात यमुना को प्रदूषण से मुक्‍ति मिलने की तो वह तभी संभव है जब 'कंटेम्‍प्‍ट ऑफ कोर्ट' की कार्यवाही अमल में लाई जाए और कोर्ट उसके लिए जिम्‍मेदार सभी तत्‍वों को कठघरे में खड़ा करके एक ओर जहां आदेश-निर्देशों की खुलेआम अवहेलना पर सवाल करे वहीं दूसरी ओर यमुना एक्‍शन प्‍लान के तहत खर्च हुए करोड़ों रुपयों का हिसाब भी मांगे।
जिस दिन इस दिशा में किसी स्‍तर से ठोस प्रयास शुरू हो गया उस दिन यमुना को प्रदूषण मुक्‍त करने का रास्‍ता तो साफ होगा ही, साथ ही यमुना की वर्तमान दुर्दशा के लिए जिम्‍मेदार बहुत से लोग बेनकाब हो जायेंगे। संभव है कि कुछ को जेल की हवा तक खानी पड़ जाए।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

शुक्रवार, 1 अगस्त 2014

राहुल के कहने पर 5 घंटे में सचिन को बनाया भारत रत्‍न

नई दिल्‍ली। 
पिछले साल सचिन तेंडुलकर को भारत रत्‍न देने से संबंधित पूरी कागजी कार्यवाही मात्र पांच घंटे में पूरी की गई थी। खास बात यह है कि सचिन के नाम की सिफारिश भी किसी ने नहीं की थी। सिर्फ राहुल गांधी के कहने पर सचिन के लिए जल्‍दबाजी में 'भारत रत्‍न' की घोषणा की गई। 14 नवंबर की दोपहर राहुल गांधी को अचानक लगा कि सचिन को लेकर देशभर में जबर्दस्‍त उत्‍साह और सकारात्‍मक माहौल है। वह दिन उनके आखिरी टेस्‍ट का पहला दिन था। राहुल ने अपना चुनावी दौरा टाल मुंबई जाकर मैच देखने का फैसला किया। इसी दौरान उन्‍होंने सचिन को भारत रत्‍न देने के बारे में पीएमओ से बात की।
14 नवंबर की दोपहर 1.35 बजे प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) में एक चिट्ठी तैयार हुई। चिट्ठी में खेल मंत्रालय को तत्‍काल सचिन तेंडुलकर का बायोडाटा भेजने के लिए कहा गया था। ‘Urgent: Out Today’ लिख कर चिट्ठी रवाना की गई और खेल मंत्रालय से कुछ ही घंटे में सचिन का बायोडाटा पीएमओ पहुंच गया। देर शाम तक प्रधानमंत्री के पास सचिन को 'भारत रत्‍न' देने संबंधित अंतिम नोट पहुंच गया और अगले दिन (15 नवंबर) राष्‍ट्रपति के पास दो लोगों (सचिन और वैज्ञानिक सीएनआर राव) को 'भारत रत्‍न' देने का प्रस्‍ताव राष्‍ट्रपति के दस्‍तखत के लिए भेज दिए गए। राष्‍ट्रपति ने उसी दिन दस्‍तखत कर दिए।
-एजेंसी

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

काटजू जी, सारी न्‍यायिक व्‍यवस्‍था ही कठघरे में है

प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्‍यक्ष और सर्वोच्‍च न्‍यायालय के पूर्व न्‍यायाधीश मार्कण्‍डेय काटजू द्वारा मद्रास हाईकोर्ट के एक भ्रष्‍ट जज की प्रोन्‍नति के मामले में यूपीए सरकार की भूमिका को लेकर जो खुलासा किया गया है, वह इसलिए भले ही चौंका रहा हो कि उसमें कानून मंत्री से लेकर पीएमओ तक का हस्‍तक्षेप सामने आ चुका है लेकिन कड़वा सच यह है कि आज न न्‍यायपालिका पूरी तरह स्‍वतंत्र रह गई हैं, न न्‍यायाधीश। न्‍यायपालिकाओं पर जहां प्रोन्‍नति एवं ट्रांसफर-पोस्‍टिंग के लिए दबाव रहता है, वहीं न्‍यायाधीशों पर पक्षपात करने का दबाव बनाया जाता है।
जाहिर है कि इस स्‍थिति का खामियाजा न्‍याय की उम्‍मीद पाले बैठे आमजन के साथ-साथ उन न्‍यायाधीशों को भी उठाना पड़ता है तो ईमानदारी से अपना कार्य करना चाहते हैं।
ऐसे न्‍यायाधीशों को दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ती है और भारी मानसिक उत्‍पीड़न सहन करना होता है क्‍योंकि आज न्‍यायपालिका का एक बड़ा हिस्‍सा भ्रष्‍टाचार के आगोश में समा चुका है।
मार्कण्‍डेय काटजू ने जिस जज की प्रोन्‍नति में केंद्र सरकार की भूमिका का उल्‍लेख किया है, उसकी बुनियाद वहां से शुरू होती है जहां वो जज साहब जिला जज की कुर्सी पर आसीन थे। काटजू के मुताबिक तब उन्‍होंने यूपीए सरकार की सहयोगी पार्टी के नेता को जमानत दी थी। नेताजी ने अगर जज साहब द्वारा जमानत देने को इतना बड़ा उपकार माना कि उनके लिए सीधे केंद्र सरकार से हस्‍तक्षेप करने को कहा तो यह तय है कि जज साहब ने वह जमानत अधिकारों का दुरूपयोग करके ही दी होगी।
बहरहाल, मार्कण्‍डेय काटजू द्वारा खुलासा किये जाने के बाद इस मामले में पर्याप्‍त हंगामा हो चुका है और जमकर राजनीति भी की जा चुकी है इसलिए अब इसमें आगे कुछ होने की उम्‍मीद कम ही लगती है। हालांकि इस बीच तत्‍कालीन कानून मंत्री हंसराज भारद्वाज का झूठ और तत्‍कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की चुप्‍पी के पीछे का राज भी सामने आ चुका है परंतु होना जाना कुछ नहीं है क्‍योंकि हमाम में कमोबेश सारे नेताओं का हाल एक जैसा रहता है। सब जानते हैं कि बात निकलेगी तो बहुत दूर तक जायेगी।
यही कारण है कि जब कभी व्‍यवस्‍थागत दोष से उपजे भ्रष्‍टाचार की बात आती है तो उसे शोर-शराबा करके दबा दिया जाता है क्‍योंकि इसी में शासकों की भलाई है। वह जानते हैं कि यदि इसकी मुकम्‍मल जांच होती है तो उसके लिए जड़ जक जाना होगा, और जड़ तक जाने में समूची व्‍यवस्‍था के ही ढह जाने का खतरा है।
मार्कण्‍डेय काटजू के आरोपों को यदि फिलहाल यहीं छोड़ दिया जाए तो कौन नहीं जानता कि आम आदमी के लिए देश में न्‍याय पाना अब असंभव न सही परंतु अत्‍यन्‍त कठिन जरूर हो चुका है। भ्रष्‍टाचार की जड़ ऊपर से नीचे चलती है या नीचे से ऊपर की ओर जाती है, इस बहस में पड़े बिना यह कहा जा सकता है कि जिला स्‍तर पर ही आमजन के लिए न्‍याय पाना काफी दुरूह है।
न्‍याय के मंदिर में प्रतिष्‍ठापित न्‍यायमूर्तियों के सामने ही जब उनके अधीनस्‍थ खुलेआम प्रत्‍येक वादी-प्रतिवादी से सुविधा शुल्‍क वसूलते हैं और न्‍यायमूर्ति कुछ नहीं कहते तो यह स्‍वाभाविक सवाल खड़ा होता है कि फिर वह कैसे न्‍यायमूर्ति हैं ?
जिला सत्र न्‍यायालयों का यह हाल है कि उनमें ईमानदार अधिकारियों को चिन्‍हित करना आसान नहीं होता। दर्जनों न्‍यायिक अधिकारियों के बीच बमुश्‍किल दो-चार अधिकारियों के बारे में यह धारणा होती है कि वह ईमानदार हैं।
किसी भी जिले की बार एसोसिएशन को भली प्रकार पता होता है कि कौन अधिकारी भ्रष्‍ट है और कौन ईमानदार।
भ्रष्‍ट न्‍यायिक अधिकारियों की कार्यप्रणाली का आलम यह होता है कि वह पैसे की खातिर न केवल अपने अधिकारों का भरपूर दुरुपयोग करते हैं बल्‍कि जमानत से लेकर फैसलों तक को उसके लिए लटकाते रहते हैं।
चूंकि सामान्‍य तौर पर न्‍यायिक अधिकारी के खिलाफ बोलना भी कोर्ट की अवमानना प्रचारित कर रखा है और उसे लेकर आमजन में भय व्‍याप्‍त रहता है इसलिए कोई किसी न्‍यायिक अधिकारी के खिलाफ बोलने अथवा उसकी शिकवा-शिकायत करने का जोखिम नहीं उठाता।
अवमानना की गलत व्‍याख्‍या के चलते अधिकांश भ्रष्‍ट न्‍यायाधीश कानून को अपने मन मुताबिक इस्‍तेमाल करते हैं और अधिकारों का मन चाहा प्रयोग करते देखे जा सकते हैं।
उदाहरण के लिए धारा 319 को ही ले लें। धारा 319 के तहत किसी व्‍यक्‍ति को तलब करने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बहुत स्‍पष्‍ट आदेश-निर्देश दे रखें हैं ताकि कोई अदालत उसका दुरुपयोग न कर सके परंतु काफी बड़ी संख्‍या में न्‍यायिक अधिकारी इस धारा का दुरुपयोग निजी स्‍वार्थों के पूर्ति के लिए करते पाये जाते हैं। पीड़ित व्‍यक्‍ति पहले तो उससे निजात पाने में लग जाता है, फिर यह सोचकर चुप बैठ जाता है कि जान बची और लाखों पाये। इसके अलावा भी उसे हर किसी से न्‍यायिक अधिकारी के खिलाफ आवाज न उठाने की ही सलाह मिलती है लिहाजा वह चुप रहने में ही अपनी भलाई समझकर बैठ जाता है।
हाईकोर्ट से प्राप्‍त सेम डे सुनवाई के आदेश हों या जमानत प्राप्‍त हो जाने के, हर मामले में जिला स्‍तर पर न्‍यायिक अधिकारी मनमानी करते देखे जा सकते हैं किंतु उनके खिलाफ कोई मार्कण्‍डेय काटजू आवाज नहीं उठाता क्‍योंकि सबको अपनी दुकान उन्‍हीं के सहयोग से चलानी होती है।
जिस न्‍याय पालिका को आम आदमी अपनी आखिरी उम्‍मीद समझता है और बड़े भरोसे के साथ वहां फरियाद लेकर जाता है, वहीं कदम-कदम पर उसके विश्‍वास का खून होता है लेकिन वह उस खून का घूंट पीने को मजबूर है क्‍योंकि उसके खिलाफ जाए तो जाए कहां।
अनेक लोगों के जीवन का एक बड़ा हिस्‍सा जिला स्‍तर पर न्‍यायिक अधिकारियों की मनमानी और भ्रष्‍टाचार की भेंट चढ़ जाता है लेकिन न कोई देखने वाला है और न सुनने वाला। ईमानदार अधिकारी इसलिए मुंह सिलकर नौकरी करते हैं क्‍योंकि वह हर वक्‍त अपने ही साथी भ्रष्‍ट अधिकारियों के निशाने पर रहते हैं। उन्‍हें दोहरी लड़ाई लड़नी पड़ती है।
ईमानदार अधिकारियों की स्‍थिति आज बत्‍तीसी के बीच जीभ जैसी हो चुकी है। उनका सारा समय अपनी ईमानदारी को बरकरार रखने और अपनी नीति एवं नैतिकता को बचाये रखने में बीत जाता है।
इस सब के कारण वह इतने तनाव में रहते हैं कि कई बार उन्‍हें अपनी ईमानदारी ही अपने ऊपर बड़ा बोझ लगने लगती है। ऐसे अधिकारियों को तमाम बार अपने घर-परिवार से भी एक लड़ाई अलग लड़नी पड़ती है। परिवार के सदस्‍यों को समझाना पड़ता है कि ईमानदारी कोई अभिशाप नहीं है।
न्‍यायपालिका में भ्रष्‍टाचार और राजनीतिक हस्‍तक्षेप इसलिए घातक है कि लगभग पूरी तरह सड़ चुकी देश की व्‍यवस्‍था के बीच सिर्फ न्‍यायपालिका से ही आमजन सारी उम्‍मीद लगाये रहता है। लोकतंत्र के तीन संवैधानिक स्‍तंभों में से न्‍यायपालिका में भी यदि लोगों का भरोसा नहीं रहा तो निश्‍चित जानिए कि वह दिन दूर नहीं जब हर व्‍यवस्‍था ध्‍वस्‍त हो जायेगी और देश को गर्त में जाने से कोई नहीं रोक सकेगा।
मार्कण्‍डेय काटजू ने चाहे समय रहते यह मुद्दा भले ही न उठाया हो और आज यह मुद्दा उठाने के पीछे चाहे उनका अपना कोई स्‍वार्थ छिपा हो लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि देश की न्‍याय व्‍यवस्‍था में सब-कुछ ठीक नहीं चल रहा तथा उसमें अब एक बड़े परिवर्तन की आवश्‍यकता है क्‍योंकि यदि समय रहते यह परिवर्तन नहीं किया गया तो इसके अत्‍यंत गंभीर परिणाम सामने होंगे। वह स्‍थिति संभवत: न देश के लिए हितकर होगी और न देशवासियों के लिए।
अब जरूरत है देश को एक ऐसी न्‍यायिक व्‍यवस्‍था की जिसमें हर स्‍तर पर समानता का केवल दिखावा न हो और उसके दायरे से कोई बाहर न जा सके। वो न्‍यायमूर्तियां भी नहीं, जो अपने पद व अपनी गरिमा के खिलाफ जाकर काम करती हैं। वो शासक भी नहीं जो उन्‍हें अपने हाथ की कठपुतली बनाकर व्‍यवस्‍थागत दोष का इस्‍तेमाल राजनीतिक हित साधने में करते हैं, और वो सत्‍ता भी नहीं जो जनहित को तिलांजलि देकर न्‍यायिक व्‍यवस्‍था को अपनी इच्‍छानुसार चलने के लिए बाध्‍य कर देती है।
- सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
 

सोमवार, 21 जुलाई 2014

कांग्रेस सरकार के कारनामों पर काटजू ने किया बड़ा खुलासा

नई दिल्‍ली। 
मद्रास हाईकोर्ट के एक जज के खिलाफ भ्रष्टाचार के कई आरोप लगे थे। उन्हें सीधे तौर पर तमिलनाडु में डिस्ट्रिक्ट जज के तौर पर नियुक्त कर दिया गया था। डिस्ट्रिक्ट जज के तौर पर इस जज के कार्यकाल के दौरान उनके खिलाफ मद्रास हाई कोर्ट के विभिन्न पोर्टफोलियो वाले जजों ने कम-से-कम आठ प्रतिकूल टिप्पणियां की थीं। लेकिन मद्रास हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस ने अपनी कलम की ताकत से एक ही झटके में सारी प्रतिकूल टिप्पणियों को हटा दिया और यह जज हाईकोर्ट में अडिशनल जज बन गए। वह तब तक इसी पद पर थे, जब नवंबर 2004 में मैं मद्रास हाई कोर्ट का चीफ जस्टिस बनकर आया।
इस जज को तमिलनाडु के एक बहुत ही महत्वपूर्ण राजनीतिक नेता का समर्थन प्राप्त था। मुझे बताया गया कि ऐसा इसलिए था क्योंकि डिस्ट्रिक्ट जज रहते हुए इस नेता को जमानत दी थी।
इस जज के बारे में भ्रष्टाचार की कई रिपोर्ट्स मिलने के बाद मैंने भारत के चीफ जस्टिस आरसी लाहोटी को इस जज के खिलाफ एक गुप्त आईबी जांच कराने की गुजारिश की। कुछ हफ्ते बाद जब मैं चेन्नै में था तो चीफ जस्टिस के सेक्रेट्री ने मुझे फोन किया और बताया कि जस्टिस लोहाटी मुझसे बात करना चाहते हैं। चीफ जस्टिस लाहोटी ने कहा कि मैंने जो शिकायत की थी वह सही पाई गई है। आईबी को इस जज के भष्टाचार में शामिल होने के बारे में पर्याप्त सबूत मिले हैं।
अडिशनल जज के तौर पर उस जज का दो साल का कार्यकाल खत्म होने वाला था। मुझे लगा कि आईबी रिपोर्ट के आधार पर अब हाईकोर्ट के जज के तौर पर काम करने से रोक दिया जाएगा लेकिन असल में हुआ यह कि इस जज को एडिशनल जज के तौर पर एक और साल की नियुक्ति मिल गई जबकि इस जज के साथ नियुक्त किए गए छह और एडिशनल जजों को स्थायी कर दिया गया।
मैंने बाद में इस बात को समझा कि यह आखिर हुआ कैसे। सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए एक कॉलेजियम प्रणाली होती है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के पांच सबसे सीनियर जज होते हैं जबकि हाईकोर्ट के जजों की नियुक्ति के लिए तीन सबसे सीनियर जजों की कॉलेजियम होती है।
उस समय सुप्रीम कोर्ट के तीन सबसे सीनियर जज थे, देश के चीफ जस्टिस लाहोटी, जस्टिस वाईके सभरवाल और जस्टिस रूमा पाल। सुप्रीम कोर्ट की इस कॉलेजियम ने आईबी की प्रतिकूल रिपोर्ट के आधार पर उस जज का दो साल का कार्यकाल खत्म होने के बाद जज के तौर आगे न नियु्क्त किए जाने की सिफारिश केंद्र सरकार को भेजी।
उस समय केंद्र में यूपीए की सरकार थी। कांग्रेस इस गठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी थी लेकिन उसके पास लोकसभा में पर्याप्त बहुमत नहीं था और इसके लिए वह अपनी सहयोगी पार्टियों के समर्थन पर निर्भर थी। कांग्रेस को समर्थन देने वाली पार्टियों में से एक पार्टी तमिलनाडु से थी जो इस भ्रष्ट जज को समर्थन कर रही थी। तीन सदस्यीय जजों की कॉलेजियम के फैसले का इस पार्टी ने जोरदार विरोध किया।
मुझे मिली जानकारी के मुताबिक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह उस समय संयुक्त राष्ट्र आमसभा की बैठक में भाग लेने के लिए न्यूयॉर्क जा रहे थे। दिल्ली एयरपोर्ट पर मनमोहन सिंह को तमिलनाडु की पार्टी के मंत्रियों ने कहा कि जब तक आप न्यूयॉर्क से वापस लौटेंगे उनकी सरकार गिर चुकी होगी क्योंकि उनकी पार्टी अपना समर्थन वापस ले लेगी। (उस जज को अडिशनल जज के तौर पर काम जारी न रखने देने के लिए)
यह सुनकर मनमोहन परेशान हो गए लेकिन एक सीनियर कांग्रेसी मंत्री ने कहा कि चिंता मत करिए वह सब संभाल लेंगे। वह कांग्रेसी मंत्री इसके बाद चीफ जस्टिस लाहोटी के पास गए और उनसे कहा कि अगर उस जज को एडिशनल जज के पद से हटाया गया तो केंद्र सरकार के लिए संकट की स्थिति पैदा हो जाएगी। यह सुनकर जस्टिस लाहोटी ने उस भ्रष्ट जज को एडिशनल जज के तौर पर एक साल का एक और कार्यकाल देने के लिए भारत सरकार को पत्र लिखा। (मुझे इस बात का आश्चर्य है कि क्या उन्होंने इसके लिए कॉलेजियम के बाकी दो सदस्यों से भी राय ली) इस तरह की परिस्थितयों में उस जज को एडिशनल जज के तौर पर और एक साल का कार्यकाल मिल गया।
उसके बाद चीफ जस्टिस बने वाईके सभरवाल ने उस जज को एक कार्यकाल और दे दिया। उनके उत्तराधिकारी चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन ने उस जज को स्थायी जज के तौर पर नियुक्त करते हुए किसी और हाईकोर्ट में ट्रांसफर कर दिया।
मैंने इन सब बातों का एक साथ उल्लेख करके यह दिखाने की कोशिश की सिद्धांत के उलट सिस्टम कैसे काम करता है। सच तो यह है कि आईबी की प्रतिकूल रिपोर्ट के बाद इस जज को एडिशनल जज के रूप में काम करने की इजाजत नहीं मिलनी चाहिए थी।
(मार्कंडेय काटजू वर्तमान में वह प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के चेयरमैन हैं)

गुरुवार, 10 जुलाई 2014

''कुमार स्‍वामी''... साधु या शैतान ?

सुना है पहले बड़े ही सुनियोजित तरीके से ठगों का गिरोह ठगाई का अपना धंधा किया करता था। मसलन जैसे कोई व्‍यक्‍ति पशु पैंठ से गाय खरीद कर लाया। रास्‍ते में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर मौजूद गिरोह के सदस्‍य उससे पूछते थे- अरे भाई, यह गधा कितने का खरीदा?
गाय को गधा बताये जाने पर पहले तो वह आदमी चौंककर कहता है कि क्‍या अंधे हो भाई, यह गधा नहीं गाय है लेकिन रास्‍ते में जब तमाम लोग यही सवाल करते मिलते तो गाय लाने वाले को अपने ऊपर ही शक हो जाता था और वह सोचने लगता कि हो न हो मैं ही मूर्ख बन आया हूं। गांव पहुंचूंगा इसे लेकर तो बड़ी बदनामी होगी, साथ ही मजाक भी उड़ेगा लिहाजा वह खुद भी गाय को गधा मानकर रास्‍ते में ही कहीं चुपचाप छोड़कर चल देता था और पीछे से ठग उस गाय को ले उड़ते थे।
समय के साथ ठगाई का तरीका भले ही बदल गया हो लेकिन धंधा आज भी जारी है। यकीन न हो तो आज का दैनिक जागरण अखबार उठाकर देख लो।
इस अखबार में एक जैकेट पेज विज्ञापन छपा है। यह विज्ञापन मथुरा के वृंदावन में कुमार स्‍वामी द्वारा 12 व 13 जुलाई को आयोजित 'प्रभु कृपा दुख निवारण समागम' का है। 'स्‍वयंभू ब्रह्मर्षि' कुमार स्‍वामी के इस विज्ञापन में नेशनल हाईवे नंबर दो के पास वृंदावन के ही चौमुहां क्षेत्र अंतर्गत श्री राधा-कृष्‍ण का एक विशाल मंदिर बनाये जाने की घोषणा की गई है। 108 एकड़ भूमि पर प्रस्‍तावित इस मंदिर के निर्माण में दो हजार किलो सोना इस्‍तेमाल करने की बात लिखी है।
इस मंदिर के उद्देश्‍य और इसके ऊपर होने वाले खर्च पर चर्चा बाद में, पहले इसी विज्ञापन में किए गये दूसरे दावों की बात।
विज्ञापन में 'दिव्‍य पाठ से आई जीवन में खुशहाली' शीर्षक से करीब डेढ़ दर्जन लोगों के अनुभव प्रकाशित कराये गये हैं। इन लोगों में युवक-युवतियों एवं महिला-पुरुषों के अलावा दो बच्‍चों के भी फोटो लगे हैं।
इन तथाकथित निजी अनुभवों के माध्‍यम से दावा किया गया है कि ब्रह्मर्षि कुमार स्‍वामी द्वारा उपलब्‍ध कराये गये दिव्‍य पाठ से, उनके समागम में शामिल होने से तथा उनके द्वारा बताये गये अन्‍य उपायों से किस प्रकार उनके सारे कष्‍ट दूर हो गए।
इन कष्‍टों में एमबीबीएस करने के लिए एडमीशन से लेकर गोल्‍डमेडल हासिल होने तथा मनमाफिक नौकरी पाने से लेकर हार्ट की ब्‍लॉकेज समाप्‍त हो जाने तक का जिक्र है।
इतना ही नहीं, किसी का दावा है कि कुमार स्‍वामी की कृपा और उनके द्वारा बताये गये उपायों से उसका लाइलाज ब्रेस्‍ट कैंसर पूरी तरह ठीक हो गया तो किसी का दावा है कि उसकी बच्‍चेदानी का कैंसर ठीक हो गया। ब्‍लड शुगर, ब्‍लड प्रेशर व थॉयराइड जैसी बीमारियां कुमार स्‍वामी की कृपा से खत्‍म होने का दावा इन अनुभवों में किया गया है।
इसी विज्ञापन में 'मेडिकल साइंस हतप्रभ' शीर्षक से दावा किया गया है कि कुमार स्‍वामी द्वारा उपलब्‍ध कराये गये दिव्‍य पाठ के बाद जन्‍म से गूंगा व बहरा एक बच्‍चा बोलने व सुनने लगा तथा किसी कारण पूरी तरह आंखों की रौशनी गंवा चुके एक अन्‍य बच्‍चे की आंखों की रौशनी लौट आई। विज्ञापन के अनुसार गूंगे व बहरे बच्‍चे का इलाज पूर्व में पीजीआई चण्‍डीगढ़ से चल रहा था लेकिन वहां कोई लाभ नहीं हुआ।
विज्ञापन की मानें तो जहां मेडीकल साइंस असमर्थ हो गई, वहां कुमार स्‍वामी से उपलब्‍ध दिव्‍य पाठ ने चमत्‍कार कर दिखाया। यहां तक कि अनेक असाध्‍य रोगों का इलाज मात्र ईमेल के जरिए कर दिया।
लोगों को प्रभावित करने के लिए विज्ञापन में एक ओर जहां आज देश के प्रधानमंत्री व गुजरात के पूर्व मुख्‍यमंत्री नरेन्‍द्र मोदी तथा मथुरा की सांसद एवं सुविख्‍यात अभिनेत्री हेमा मालिनी का कुमार स्‍वामी को लेकर तथाकथित संदेश भी छापा गया है वहीं दूसरी ओर अमेरिका के सीनेटरों से प्राप्‍त अंबेसेडर ऑफ पीस अवार्ड, न्‍यूयॉर्क स्‍टेट सीनेट से प्राप्‍त सम्‍मान, मॉरीशस के पीएम से प्राप्‍त एंजल ऑफ ह्यूमेनिटी अवार्ड  तथा ब्रिटेन की संसद से प्राप्‍त अंबेसेडर ऑफ पीस अवार्ड के फोटो प्रकाशित किये गये हैं। यह बात अलग है कि इन फोटोग्राफ्स की सत्‍यता को भी प्रमाण की जरूरत पड़ सकती है। जैसे नरेन्‍द्र मोदी और हेमा मालिनी का संदेश कब और किस संदर्भ में दिया गया था, दिया गया था भी या नहीं।
इन फोटोग्राफ्स को विज्ञापन में प्रकाशित करने के पीछे लोगों को प्रभावित करने के अलावा भी कोई दूसरा मकसद हो सकता है, यह समझ से परे है। हां, यह बात जरूर समझ में आती है कि प्रभावित क्‍यों और किसलिए किया जा रहा है।
स्‍पष्‍ट है कि पूर्व में कभी जिस तरह ठगों का सरगना गाय को गधा साबित करने के लिए एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत गिरोह के सदस्‍यों का इस्‍तेमाल किया करता था, ठीक उसी तरह आज के कुमार स्‍वामी अपने तथाकथित भक्‍तों का इस्‍तेमाल कर रहे हैं जो वास्‍तव में उनके गिरोह का ही हिस्‍सा हैं अन्‍यथा क्‍या ऐसा संभव है कि जन्‍म से गूंगा-बहरा कोई ऐसा बच्‍चा जिसे ठीक करने में मेडीकल साइंस भी असमर्थ हो, उसे कुमार स्‍वामी ने ठीक कर दें। क्‍या ऐसा संभव है कि लाइलाज कैंसर का इलाज और ब्‍लड शुगर व ब्‍लड प्रेशर को कुमार स्‍वामी हमेशा के लिए ठीक कर सकें। मनमाफिक नौकरी पाने की बात हो या परीक्षा में मनमाफिक अंक प्राप्‍त करने की, सबकुछ कुमार स्‍वामी करवा सकते हों।
सूरदास के भक्‍तिपदों में एक पद है-
चरण-कमल बंदौ हरि राई।
जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अंधे को सब कुछ दरसाई।।
बहिरौ सुनै मूक पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराई।
'सूरदास' स्वामी करूणामय, बार-बार बन्दौं तेहि पाई।।
सूरदास ने अपने भक्‍ति पदों की रचना भगवान कृष्‍ण के संदर्भ में की है जबकि सूरदास प्रत्‍यक्षत: स्‍वयं मृत्‍युपर्यन्‍त दृष्‍टिहीन ही रहे और सूरदास नाम भी जन्‍मांध लोगों का पर्याय बन गया। लेकिन यहां तो सब-कुछ ब्रह्मर्षि कुमार स्‍वामी की कृपा से संभव बताया जा रहा है।
बेशक धर्म की आड़ में लोगों को ठगने का धंधा करने वाले आज हर धर्म में सक्रिय हैं और कोई धर्म इस प्रकार के धंधेबाजों से अछूता नहीं रह गया है लेकिन कुमार स्‍वामी के विज्ञापन की चर्चा इसलिए जरूरी है क्‍योंकि यह कुछ समय पूर्व इसी तरह यमुना को शुद्ध करने का बीड़ा मथुरा में उठा चुके हैं। तब इन्‍होंने एक बड़ी धनराशि अपनी ओर से यमुना शुद्धीकरण के लिए दान देने का ऐलान यमुना पर संकल्‍प के साथ किया था लेकिन आज न उस धनराशि का कोई पता है और ना ही यमुना शुद्धीकरण के लिए उठाये गये संकल्‍प का। हां, उसके साथ ही कुमार स्‍वामी के संस्‍थान की वेबसाइट पर यमुना शुद्धीकरण के लिए यथासंभव दान देने की अपील जरूर शुरू कर दी गई थी। उसके माध्‍यम से कितना दान मिला, और कुमार स्‍वामी द्वारा यमुना के लिए दान की गई भारी-भरकम रकम का क्‍या हुआ, कुछ नहीं पता।
अब कुमार स्‍वामी ने 108 एकड़ में दो हजार किलो सोने से जड़ा राधाकृष्‍ण का मंदिर बनाने की घोषणा की है।
यदि 25 हजार रुपया प्रति दस ग्राम सोने की कीमत से दो हजार किलो सोने का भाव कैलकुलेट किया जाए तो यह रकम बैठती है पांच सौ करोड़ रुपया। पांच सौ करोड़ रुपए का सोना और उसके अलावा 108 एकड़ नेशनल हाईवे से सटी हुई जगह की कीमत, फिर इतने बड़े मंदिर के निर्माण पर आने वाला खर्च आदि सब जोड़ा जाए तो यह रकम हजारों करोड़ बैठेगी।
यहां सवाल यह पैदा होता होता है कि कुमार स्‍वामी के पास इतनी रकम पहले से है या यह उगाही जानी है। यदि पहले से है तो आई कहां से।
नहीं है तो क्‍या मंदिर के निर्माण की घोषणा और उसके लिए अखबार में दिये गये लाखों रुपये कीमत के विज्ञापन का मकसद उसी प्रकार धन की उगाही करना है जिस प्रकार यमुना शुद्धीकरण के नाम पर कुछ समय पूर्व शुरू किया था।
एक अन्‍य सवाल यहां यह भी है कि 12-13 जुलाई को वृंदावन क्षेत्र में आयोजित प्रभु कृपा दुख निवारण समागम या अन्‍य स्‍थानों पर होते आ रहे ऐसे ही दूसरे समागम क्‍या नि:शुल्‍क होते हैं अथवा इनमें शामिल होने की कोई फीस वसूली जाती है। विज्ञापन के अनुसार उत्‍तर प्रदेश में कुमार स्‍वामी का यह 396वां समागम है। 395 इससे पहले विभिन्‍न स्‍थानों पर किये जा चुके हैं।
यदि यह समागम नि:शुल्‍क होते हैं तो इनके आयोजन के लिए भारी-भरकम खर्च कहां से आता है, कौन यह खर्च उठाता है और उसका इसके पीछे मकसद क्‍या है।
जाहिर है कि इन सभी प्रश्‍नों का जवाब कुमार स्‍वामी के दो पेज वाले 'जेकेट एड' से मिल जाता है परंतु धर्म की आड़ लेकर चल रहे ठगी के इस धंधे पर रोक लगाना आसान नहीं। हाल ही मैं साईं बाबा को लेकर उपजा विवाद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
चूंकि धर्म ही सभी पापकर्मों के लिए सबसे बड़ी आड़ का काम कर सकता है इसलिए कुमार स्‍वामी जैसे लोग न केवल धर्म को धंधा बनाकर ऐश कर रहे हैं बल्‍कि देश व विदेश में मौजूद उस कालेधन को सफेद करने में लगे हैं जिनको बाहर निकालने में अब तक सरकारें भी असफल रही हैं।
पता नहीं क्‍यों सरकारों का ध्‍यान इस ओर नहीं जाता। यदि जाने लगे तो एक बड़ी मात्रा में कालेधन का पता और उसकी आड़ बने पूरे खेल का पर्दाफाश होते ज्‍यादा वक्‍त नहीं लगेगा।
-legendnews
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