बुधवार, 15 अक्टूबर 2014

अनेक गलगोटियाओं से भरा पड़ा है शिक्षा व्‍यवसाय

122 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी के मामले में गलगोटिया यूनीवर्सिटी के मालिकानों का फंसना तो शिक्षा के क्षेत्र में माफिया की सक्रियता का एक उदाहरण भर है। सच तो यह है कि एक वर्ग विशेष ने निजी शिक्षण संस्‍थाएं संचालित करने की आड़ में शिक्षा के क्षेत्र को अवैध पैसा कमाने की खान बना लिया है।
आश्‍चर्य की बात तो यह है कि शिक्षा का व्‍यवसायीकरण करके उसके माध्‍यम से बेहिसाब अवैध संपत्‍ति अर्जित करने वाला शिक्षा माफिया अब खुलेआम खुद को शिक्षाविद् कहता है।
विचारणीय है यह स्‍थिति कि चंद वर्षों पहले तक जहां किसी अच्‍छे-खासे शहर में बमुश्‍किल एक-दो शिक्षण संस्‍थान ऐसे होते थे जिनमें आधुनिक शिक्षा लिया जाना संभव था, वहां अचानक शिक्षण संस्‍थाओं की फेहरिस्‍त इतनी लंबी कैसे हो गई?
वह भी तब जबकि पहले अधिकांश शिक्षण संस्‍थाएं किसी न किसी संस्‍था द्वारा संचालित की जाती थीं न कि व्‍यक्‍ति विशेष द्वारा और आज एक-एक व्‍यक्‍ति दर्जन या आधा दर्जन शिक्षण संस्‍थाओं का मालिक बन बैठा है।
जाहिर है कि शिक्षा के व्‍यवसाय में कमाई का कोई न कोई ऐसा वैध अथवा अवैध स्‍त्रोत तो है जिससे बहुत कम समय के अंदर करोड़ों नहीं, अरबों रुपए की लागत वाले अत्‍याधुनिक शिक्षण संस्‍थान खड़े किये जा सकते हैं।
अगर हम बात करें मथुरा की तो करीब डेढ़ दशक पहले तक यहां किशोरी रमण महाविद्यालय तथा बीएसए यानि बाबू शिवनाथ अग्रवाल महाविद्यालय के रूप में मात्र दो ही डिग्री कॉलेज हुआ करते थे और इन दोनों महाविद्यालयों का संचालन अलग-अलग संस्‍थाएं करती थीं। दूसरे स्‍कूल-कॉलेज भी इन्‍हीं संस्‍थाओं से संचालित होते थे लेकिन डेढ़ दशक के अंदर यह धार्मिक नगरी अचानक न सिर्फ टेक्‍नीकल एजुकेशन का हब बन गई बल्‍कि गली-गली और मोहल्‍ले-मोहल्‍ले कंम्‍प्‍यूटर इंस्‍टीट्यूट भी खुल गये।
कल तक इनमें से किसी पर भू माफिया का तो किसी पर चांदी और क्रिकेट के सट्टेबाज का ठप्‍पा लगा था, आज वह अपने नाम से पहले बड़े फख्र के साथ शिक्षाविद् जोड़ रहे हैं।
यही नहीं, राजनीति में असफल लोग भी जब शिक्षा के व्‍यवसाय में उतरे तो वह सफल हो गये और आज कई-कई शिक्षण संस्‍थाओं के मालिक बनकर देश के भविष्‍य से खिलवाड़ कर रहे हैं।
कई बड़े शिक्षा व्‍यवसाई तो ऐसे हैं जिनकी संतानें होटलों में अय्याशी करती पकड़ी गई हैं लेकिन आज वही इन बड़ी शिक्षण संस्‍थाओं में बड़े-बड़े पदों को सुशोभित कर रहे हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह गलगोटिया यूनीवर्सिटी के मालिक सुनील गलगोटिया का पुत्र ध्रुव गलगोटिया शिक्षा की इस अपनी दुकान में डायरेक्‍टर के पद पर काबिज़ था।
शिक्षा के व्‍यवसायीकरण का इससे बड़ा दुर्भाग्‍य और क्‍या हो सकता है कि तमाम बड़ी शिक्षण संस्‍थाओं के मालिक अंगूठा टेक हैं और उनकी अय्याश औलादें बमुश्‍किल हाईस्‍कूल व इंटरमीडियेट तक की शिक्षा ग्रहण कर पाने में सफल हुई हैं। जिन्‍होंने डिग्रियां हासिल की हैं, उनकी डिग्रियां भी संदिग्‍ध हैं क्‍योंकि वह अपनी शिक्षण संस्‍थाएं खुलने के बाद जुगाड़ करके हासिल की हैं।
जहां तक सवाल इन शिक्षा व्‍यवसाइयों की नैतिकता का है, तो गलगोटियाओं का कारनामा साबित करता है कि नैतिकता उनके लिए कोई मायने नहीं रखती। अपने कॉलेज और यूनीविर्सिटीज में शिक्षा के साथ-साथ उच्‍च नैतिक शिक्षा देने का ढिंढोरा पीटने वाले ये शिक्षा व्‍यवसाई व्‍यक्‍तिगत जिंदगी में कितने नैतिक हैं, इससे शायद ही कोई अपरिचित हो।
मथुरा के एक नामचीन शिक्षा व्‍यवसाई का अपने ही संस्‍थान में बड़े पद पर काबिज की हुई अधेड़ महिला से क्‍या रिश्‍ता है और वह उस संस्‍थान में इस मुकाम तक कैसे पहुंची,  यह सर्वविदित है लेकिन आज ऐसे चरित्रहीन लोग शिक्षाविद् तथा समाजसेवी का तमगा लगाये हुए हैं।
छात्रों के साथ स्‍कॉलरशिप से लेकर प्‍लेसमेंट तक के नाम पर खुली धोखाधड़ी करने तथा उनके अभिभावकों को जमकर लूटने वाले इन तथाकथित शिक्षाविदों के बीच इन दिनों खुद को पुरस्‍कृत कराने की एक होड़ और चल पड़ी है। एक शिक्षा माफिया कहीं से एक सम्‍मान हासिल करके लाता है तो दूसरा शिक्षा माफिया दूसरे दिन कहीं किसी और से कोई सम्‍मान ले आता है। इस तरह एक-एक शिक्षा माफिया, दर्जनों पुरस्‍कार तथा सम्‍मान प्राप्‍त है जबकि यह सम्‍मान व पुरस्‍कार कैसे लिए जाते हैं, किसी से छिपा नहीं है।
आज भले ही गलगोटिया का ही सच सामने आया हो, लेकिन वह दिन दूर नहीं जब पता लगेगा कि दो दूनी चार करने में अधिकांश शिक्षा माफिया एक-दूसरे से पीछे नहीं हैं।
शिक्षा के क्षेत्र में माफियाराज के पनपने की सूचना चूंकि अब केंद्र सरकार से भी छिपी नहीं रही इसलिए केंद्र की भी इस पर नजरें लगी हैं। निकट भविष्‍य में अब शिक्षा माफिया यदि सरकार के निशाने पर हो और हर जिले में गलगोटियाओं व उनके परिजनों की धरपकड़ शुरू हो जाए तो कोई आश्‍चर्य नहीं क्‍योंकि हर गलगोटिया अंत तक आखिरी दांव फेंकने में माहिर होता है। वह व्‍यवस्‍था की आंखों में धूल झोंकने के सभी इंतजाम करता है। यह बात दीगर है कि भ्रष्‍टाचार के इस दौर में भी कानून जब अपना शिकंजा कसता है तो न कोई गलगोटिया बचता है और न आसाराम बापू व तरुण तेजपाल जैसे सामाजिक अपराधी और न सुब्रत राय सहारा जैसे आर्थिक अपराधी।
बस देखना यह होता है कि किसका नंबर कब आता है।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष

मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014

गलगोटिया यूनीवर्सिटी के डायरेक्टर और उनकी मां गिरफ्तार

122 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी के मामले में थाना हरीपर्वत पुलिस ने गलगोटिया विश्वविद्यालय के निदेशक ध्रुव गलगोटिया और पद्मिनी गलगोटिया को गुड़गांव से गिरफ्तार कर लिया।
पद्मिनी, शंकुतला एजुकेशनल सोसाइटी के चेयरमैन सुनील गलगोटिया की पत्नी हैं। उनके खिलाफ मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की कोर्ट ने गैर जमानती वारंट जारी किया था।
बता दें कि संजय प्लेस स्थित एसई इन्वेस्टमेंट कंपनी के असिस्टेंट मैनेजर गिर्राज किशोर शर्मा ने एक महीने पहले थाना हरीपर्वत में मुकद्दमा दर्ज कराया था।
शर्मा की शिकायत थी कि नोएडा की शकुंतला एजुकेशनल एवं वेलफेयर सोसाइटी ने कंपनी से सन 2010 से 2012 के बीच में 80 लाख रुपये के 10 लोन स्वीकृत कराए। इनमें संस्था से जुड़े गलगोटिया विश्वविद्यालय के नाम से भी लोन शामिल था।
स्वीकृत लोन का पैसा संस्था को 24 किस्तों में ब्याज के साथ अदा करना था लेकिन कुछ किश्‍तों के भुगतान के बाद अदायगी बंद कर दी गई। इसके बाद इन्वेस्टमेंट कंपनी ने संस्था को नोटिस जारी ‌किया।
कंपनी को ब्याज समेत करीब 122 करोड़ रुपये का बकाया अदा करना है। मुकद्दमे में एजुकेशनल सोसाइटी के चेयरमैन सुनील गलगोटिया, डायरेक्टर पद्मिनी गलगोटिया, ध्रुव गलगोटिया और श्रीमती जुगनू गलगोटिया को नामजद किया गया।
ऋण अदायगी बंद करने के बाद शकुंतला एजुकेशन सोसाइटी ने दिल्ली हाईकोर्ट में आरविटेशन दाखिल किया, जिसमें सोसाइटी को भारी घाटे में‌ दिखाया गया। साथ ही गलगोटिया विश्वविद्यालय को अलग संस्थान बताया गया।
जांच कर रही थाना हरीपर्वत पुलिस ने आरोपियों की गिरफ्तारी नहीं होने पर सीजेएम खलीकुज्जमा की अदालत में गैर जमानती वारंट जारी करने का प्रार्थना पत्र दिया गया था।
अदालत ने चारों आरोपियों को वारंट जारी किए थे। इसके बाद सुनील गलगोटिया ने हाईकोर्ट से गिरफ्तारी पर स्थगनादेश ले लिया था, बाकी लोगों को स्थगनादेश नहीं मिल सका था।
सोमवार को थाना हरीपर्वत पुलिस की टीम ने डायरेक्टर ध्रुव गलगोटिया और उनकी मां पद्मिनी गलगोटिया को गुड़गांव से गिरफ्तार कर लिया। टीम दोपहर तक दोनों को आगरा लेकर आएगी।
-Legendnews

रविवार, 5 अक्टूबर 2014

IAS के उत्‍पीड़न में अखिलेश सरकार पर 5 लाख जुर्माना

लखनऊ। 
सुप्रीम कोर्ट ने अखिलेश सरकार पर एक आईएएस अफसर के उत्पीड़न के मामले में पांच लाख रुपए का जुर्माना लगाया है। साथ ही, अफसर को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
मामला 1979 बैच के आईएएस विजय शंकर पांडेय से जुड़ा है। उन्हें मायावती सरकार में 16 अप्रैल 2011 को प्रमुख सचिव सूचना, सचिवालय प्रशासन और खाद्य एंव औषधि नियंत्रण विभाग से हटा दिया गया था। उन्हें सदस्य राजस्व परिषद के पद पर तैनात किया गया था। उन पर यह कार्रवाई सिर्फ इसलिए की गई थी क्योंकि वह एक भ्रष्टाचार विरोधी संगठन के संस्थापक सदस्य थे। पांडेय ने इंडिया रिजुवनेशन इनिशिएटिव नाम के भ्रष्टाचार रोधी संगठन बनाया। बाद में, विदेश से कालाधन वापस लाने और टैक्स चोर हसन अली के खिलाफ जांच की सुस्त रफ्तार पर प्रवर्तन निदेशालय के खिलाफ याचिका दाखिल की थी। मायावती सरकार ने इसे आईएएस सेवा नियमों का उल्लंघन माना। विभागीय जांच बिठाई। वह बेदाग निकले। अखिलेश यादव सरकार ने भी जांच बिठाई। इस पर पांडेय कैट गए, जहां उनकी याचिका खारिज हो गई।
फैसले में क्या कहा सुप्रीम कोर्ट
कोर्ट के फैसले में कहा गया कि इस गलत कार्रवाई के लिए उन अफसरों की तलाश होनी चाहिए, जो इसके लिए जिम्मेदार हैं। साथ ही, उनसे जुर्माना भी वसूला जाना चाहिए। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को इसलिए लपेट लिया, क्योंकि केंद्र सरकार ही आईएएस अफसरों का कैडर तय करती है।
कैसे चला संघर्ष
विजय शंकर पांडेय की इस कार्यवाही से उस दौरान मुख्यमंत्री रही मायावती उन पर भड़क उठी थी। उन्होंने इसे आईएएस सर्विस रुल का उल्लंघन माना और  27 फरवरी 2012 को विजयशंकर पर विभागीय जांच बैठा दी। इस जांच की जिम्मेदारी जांच अधिकारी जगन मेथ्यु को सौंपी गईं थी। जगन ने अपनी जांच रिपोर्ट 30 अगस्त को सौंपी। इसमें उन्होंने विजय शंकर पांडेय पर लगाए गए सारे आरोप निराधार पाए।
हालांकि, मायावती की सरकार चले जाने के बावजूद उनका उत्पीड़न बंद नहीं हुआ था। जब जांच में उनके ऊपर आरोप सिद्ध नहीं हुए तो अखिलेश सरकार ने 11 सितंबर को विजय शंकर पांडेय के मामले पर जांच कमिटी बिठा दी। इस कमिटी में तत्कालीन कृषि उत्पादन आयुक्त आलोक रंजन और अनिल कुमार गुप्ता थे।
सरकार के इस फैसले के खिलाफ विजय शंकर ने 26 सितंबर को कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। लेकिन 20 दिसंबर 2013 को कोर्ट ने उनकी अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां भी याचिका खारिज हो गई। इसके बाद विजय शंकर पांडेय तीन अप्रैल 2014 को सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए। शुक्रवार को उन्हें न्याय मिला, कोर्ट ने अखिलेश सरकार और केंद्र सरकार पर जुर्माना ठोंकते हुए पांच लाख रुपए का जुर्माना लगाया गया। यह जुर्माना दोनों सरकार को मिलकर विजय शंकर पांडेय को देना है।
क्या कहते हैं जानकार
पूर्व आईएएस अफसर एसएन शुक्ला का कहना हैं कि सुप्रीम कोर्ट का यह ऐतिहासिक फैसला है। इसे सिर्फ विजय शंकर पांडेय के लिए नहीं मानना चाहिए, बल्कि यह फैसला उन सभी अफसरों का हौसला बढ़ाने के लिए है, जो सरकार के गलत कामों पर अपनी आवाज बुलंद करना चाहते हैं। यह फैसला सिर्फ सरकारों के साथ उन अफसरों की भी आंख खोलेगा, जो सरकार के कहने पर ईमानदार अफसरों का उत्पीड़न करते हैं।
क्या कहना हैं सरकार में बैठे अफसरों का
सरकार में बैठे कई आईएएस अफसर सुप्रीमकोर्ट के इस फैसले से उत्साहित हैं। नाम नहीं छपने की शर्त पर वह कहते हैं कि इस फैसले से अफसरों का मोरल बढ़ा है। अब जो अधिकारी दबाव में चुप्पी साधे रहते थे, वह अब गलत काम के खिलाफ अपना मुंह खोल सकेंगे। एक वरिष्ठ सीनियर आईएएस अफसर कहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने इस फैसले से सरकार के गलत कामों के खिलाफ बोलने वाले अफसरों को एक सुरक्षा कवच दे दिया है। 
कौन हैं विजय शंकर पांडेय
1979 बैच के आईएएस विजय शंकर पांडेय उप्र सहकारी कताई मिल संघ में एमडी रहते हुए लिए गए निर्णयों को लेकर चर्चित हुए थे। उनके फैसलों को लेकर सतर्कता जांच तक हुई। इसके बाद भ्रष्ट आईएएस अफसरों को चिन्हित करने को लेकर छेड़ी गई अपनी मुहिम के कारण चर्चा में रहे। इससे तमाम वरिष्ठ आईएएस अफसर उनसे नाराज हुए और तत्कालीन प्रमुख सचिव नीरा यादव का उनसे टकराव हुआ। बसपा शासन में कैबिनेट सचिव के साथ उनकी अंदरखाने में होने वाली खटपट को लेकर भी वह खासे चर्चित रहे।
-एजेंसी

शुक्रवार, 26 सितंबर 2014

बंगाल बिटुमिन फैक्‍ट्री में छापामारी...या नाटक

मथुरा। 
राष्‍ट्रीय राजमार्ग स्‍थित बंगाल बिटुमिन कंपनी में कल दोपहर वाणिज्‍य कर विभाग के प्रवर्तन दल ने छापा मारने के बाद जिस तरह कानूनी औपचारिकता पूरी की है, उसे लेकर तमाम सवाल खड़े हो रहे हैं। छापे की कार्यवाही और उसके बाद अपनाई गई प्रक्रिया पर सबसे बड़ा सवाल तो यही खड़ा होता है कि वाणिज्‍य कर विभाग के प्रवर्तन दल की यह कथित छापेमारी बंगाल बिटुमिन कंपनी के मालिक को बचाने के लिए थी या उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही करने के लिए, क्‍योंकि पूरी कार्यवाही को देखकर कहीं से ऐसा नहीं लगता कि प्रवर्तन दल किसी के खिलाफ ठोस कार्यवाही करने जा रहा है।
वाणिज्‍य कर विभाग की मंशा का पता पहले तो इसी बात से लगता है कि उसने बंगाल बिटुमिन कंपनी के मालिक कृष्‍ण कुमार नागपाल निवासी बी-116, सरिता विहार, अपोलो हॉस्‍पीटल के निकट नई दिल्‍ली की कोसी में ही स्‍थित दूसरी ऑयल कंपनी पर साथ के साथ छापा क्‍यों नहीं मारा जबकि कंपनी मालिक द्वारा वहां भी इसी तरह के सारे गोरखधंधे किए जाते हैं। ऐसा संभव हो नहीं सकता कि कोसी के अजीजपुर में स्‍थित 'बिंग बैन' नामक इस ऑयल कंपनी की वाणिज्‍य कर विभाग के प्रवर्तन दल को जानकारी ही न रही हो।
विश्‍वस्‍त सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार सन् 1990 में नेशनल हाईवे नंबर दो पर किलोमीटर स्‍टोन 110 के निकट छाता में स्‍थापित बंगाल बिटुमिन फैक्‍ट्री के मालिक कृष्‍ण कुमार नागपाल की कोसी के अजीजपुर में  'बिंग बैन' ऑयल कंपनी सहित एक फैक्‍ट्री करनाल में करनाल ब्रॉडवेज बिटुमिन के नाम से है जबकि एक अन्‍य फैक्‍ट्री नोएडा में भी है।
करनाल की बिटुमिन फैक्‍ट्री में मथुरा के अलावा पानीपत रिफाइनरी से भी तेल का बड़ा खेल किया जाता है।
बताया जाता है कि सेटिंग की मंशा के चलते बिटुमिन फैक्‍ट्री के मालिक को राहत देने के लिए वाणिज्‍य कर विभाग में शामिल प्रवर्तन दल के अधिकारियों ने फैक्‍ट्री को सील न करके केवल कंटेनर्स को सील करने की औपचारिकता निभाई, और वो भी फैक्‍ट्री में पाये गये सभी कंटेनर्स को सील करना जरूरी नहीं समझा।
सूत्रों के मुताबिक छापे के वक्‍त बंगाल बिटुमिन फैक्‍ट्री के अंदर बिटुमिन से भरे करीब 20 कंटेनर मौजूद थे किंतु प्रवर्तन दल ने सबको छापे में शामिल नहीं किया और ना ही बरामद कंटेनर्स के अंदर मिले माल की कीमत का सही आंकलन किया गया।
इस धंधे से जुड़े दूसरे लोगों का कहना है कि बिटुमिन से भरे एक टेंकर की कीमत ही करीब 10 लाख रुपए बैठती है, फिर यह कैसे हो सकता है कि जो कंटेनर पकड़े गये हैं, उनमें मिले माल की कीमत कम हो जाए।
सूत्रों की मानें तो मथुरा जनपद के छाता-कोसी क्षेत्र में ही बंगाल बिटुमिन जैसी करीब एक दर्जन फैक्‍ट्रियां हैं और इन सबकी जानकारी वाणिज्‍य कर विभाग तथा इलाका पुलिस को भली प्रकार है।
सच तो यह है कि उक्‍त सभी फक्‍ट्रियां वाणिज्‍य कर विभाग, इलाका पुलिस तथा प्रभावशाली राजनीतिक हस्‍तियों के संरक्षण में ही संचालित हो रही हैं और इनसे अरबों रुपये के राजस्‍व की चोरी हर महीने की जाती है।
राजनीतिक दबाव में वाणिज्‍य कर विभाग तथा इलाका पुलिस इनके खिलाफ कार्यवाही न करके खाओ और खाने दो की सर्वसुलभ नीति अख्‍तियार करना ज्‍यादा उचित समझते हैं।
कल  की छापामार कार्यवाही के पीछे का कारण सुविधा शुल्‍क बढ़वाना और बाकी फैक्‍ट्री मालिकानों को इस आशय की चेतावनी देना था कि यदि बात नहीं मानी गई तो शिकंजा कसा जा सकता है तथा जरूरत पड़ी तो पूरा भांडा भी फोड़ा जा सकता है।
यही कारण है कि छापेमारी के उपरांत न तो बंगाल बिटुमिन फैक्‍ट्री के मालिक का नाम जाहिर किया गया और न उस पूरे माल का जो मौके पर मौजूद था।
वाणिज्‍य कर विभाग की नीयत यदि नेक होती तो वह कृष्‍ण कुमार नागपाल की कोसी के अजीजपुर में स्‍थित बिंगबैन ऑयल फैक्‍ट्री सहित दिल्‍ली के सरिता विहार स्‍थित निवास पर भी एकसाथ छापेमारी करता क्‍योंकि वहां से काले तेल के धंधे का पूरा कच्‍चा चिठ्ठा हासिल हो सकता था।
जहां तक सवाल फैक्‍ट्रियों का है तो यहां का सारा गोरखधंधा के. के. नागपाल और उसके जैसे तमाम दूसरे धंधेबाज अपने कारिंदों से ही करवाते रहे हैं ताकि वह खुद कभी कानून की गिरफ्त में न आ सकें।
बाकी काम तो फिर चांदी का जूता उन अधिकारियों से करवा ही देता है जो हर समय ऐसे धंधेबाजों पर अपनी गिद्ध दृष्‍टि इसीलिए गढ़ाये रहते हैं कि पर्याप्‍त शुकराना न देने की चूक को छापेमारी की चेतावनी से जाहिर कराया जा सके।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष

रविवार, 7 सितंबर 2014

प्रशासन बाखबर...मथुरा में भी स्‍लीपर माड्यूल्स!

भारत में अल-कायदा की सक्रियता बढ़ाने को लेकर उसके सरगना अल ज़वाहिरी का वीडियो सामने आने के बाद पश्‍चिमी उत्‍तर प्रदेश के जिन जिलों पर पुलिस, खुफिया एजेंसियों और एटीएस की निगाहें केंद्रित हुई हैं, उनमें विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक जनपद मथुरा का भी नाम है।
मथुरा की भौगोलिक स्‍थिति भी कुछ ऐसी है जिसका लाभ अपराधी तत्‍वों को हमेशा से मिलता रहा है। राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली से यह मात्र 146 किलोमीटर दूर है तो हरियाणा एवं राजस्‍थान की सीमाएं इससे लगी हुई हैं। इसके एक ओर राष्‍ट्रीय राजमार्ग नंबर दो है तो दूसरी ओर ताज एक्‍सप्रेस-वे बन चुका है जिसने वाहनों की रफ्तार को काफी बढ़ा दिया है।
मथुरा की इस भौगोलिक स्‍थिति का अब तक आपराधिक तत्‍व जमकर लाभ उठाते रहे हैं और इसीलिए यह धार्मिक जिला पश्‍चिमी उत्‍तर प्रदेश की प्रमुख क्राइम बेल्‍ट में शुमार किया जाता है किंतु अल-कायदा की धमकी ने पुलिस, खुफिया एजेंसियों तथा एटीएस के अधिकारियों की चिंता बढ़ा दी है।
मथुरा में विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक इमारत कृष्‍ण जन्‍मभूमि है और यहां से मात्र 52 किलोमीटर दूर आगरा में विश्‍व के आकर्षण का केंद्र ताजमहल खड़ा है। इन दोनों इमारतों की सुरक्षा पर सरकार का बेहिसाब पैसा खर्च होता है, साथ ही भारी संख्‍या में सुरक्षा बल तैनात रहते हैं।
मथुरा में प्रमुख आतंकी संगठनों के स्‍लीपर माड्यूल्स की मौजूदगी का पता समय-समय पर लगता रहा है और देश में हुईं कई आतंकी वारदातों के सूत्र भी किसी न किसी रूप में मथुरा से जुड़े हैं लेकिन आज तक कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया।
इस संबंध में जानकारी करने पर इस आशय की सूचनाएं जरूर मिलती रही हैं कि मथुरा को आतंकी संगठनों के स्‍लीपर माड्यूल्स एक शरण स्‍थली के रूप में इस्‍तेमाल करते हैं और इसलिए इसे किसी वारदात के लिए नहीं चुनते। कई राज्‍यों से इसकी सीमाओं के लगने का लाभ वह अपने सहज आवागमन तथा छुपने के आसान ठिकाने के रूप में करते हैं।
पूर्व में सिमी की मथुरा में अच्‍छी-खासी गतिविधियां रही हैं और उससे जुड़े लोगों को भी गिरफ्तार किया गया है।
इस संबंध में मेरठ मंडल के कमिश्‍नर की रिपोर्ट गौर करने लायक है। इस रिपोर्ट के मुताबिक पश्‍चिमी उत्‍तर प्रदेश से अनेक पाकिस्‍तानी नागरिक लापता हैं और बहुत से बांग्‍लादेशी यहां रह रहे हैं।
कमिश्‍नर मेरठ ने समुदाय विशेष के उन खास लोगों पर नजर रखने एवं उनकी पुख्‍ता जानकारी करने को कहा है जो पिछले कुछ समय में अचानक सुविधा संपन्‍न हुए हैं या बहुत कम समय के अंदर उनके स्‍टैंडर्ड ऑफ लिविंग में बदलाव आया है। ऐसे लोगों की आमदनी के स्‍त्रोत पता करने के आदेश भी कमिश्‍नर मेरठ ने दिए हैं।
भले ही यह आदेश कमिश्‍नर मेरठ मंडल के हों किंतु मथुरा में वर्ग विशेष के अंदर ऐसे लोगों की कोई कमी नहीं हैं जिनकी आमदनी का कोई प्रत्‍यक्ष स्‍त्रोत न होते हुए उनके रहन-सहन में बड़ा बदलाव देखा जा सकता है।
इसके अलावा पिछले कुछ समय में बड़ी तेजी के साथ एक समुदाय विशेष की रुचि मीडिया, राजनीति एवं सामाजिक सेवा को लेकर बढ़ी है। मीडिया में तो इनकी संख्‍या चौंकाने वाली है।
आश्‍चर्य की बात यह है कि जिला प्रशासन भी इस मामले में निष्‍क्रिय पड़ा हुआ है। उसने कभी यह तक जानने की कोशिश नहीं की कि आखिर वो किस अखबार, न्‍यूज़ चैनल अथवा वेब पत्रकारिता से जुड़े हैं और कहां उनके समाचारों का प्रकाशन या प्रसारण होता है।
कहने को हर जिले की तरह मथुरा में भी एक सूचना एवं जनसंपर्क विभाग कायम है और उसमें अधिकारी व कर्मचारी भी मौजूद हैं किंतु वह अपनी जिम्‍मेदारी सिर्फ तथाकथित चंद बड़े अखबारों एवं कथित बड़े पत्रकारों की चाटुकारिता तक सीमित रखते हैं। जिले की बात तो छोड़िए, शहर में जिला मुख्‍यालय पर भी कितने पत्रकार सक्रिय हैं और वह किन-किन संस्‍थानों के लिए कार्य करते हैं, इसकी कोई जानकारी सूचना विभाग के पास नहीं मिल सकती।
इसी प्रकार बहुत से तत्‍व सामाजिक संगठनों की आड़ लेकर तो बहुत से राजनीतिक संगठनों से जुड़े होने का हवाला देकर अपनी गतिविधियों को बेरोकटोक अंजाम दे रहे हैं।
अलग-अलग रंगों में रंगे और भिन्‍न-भिन्‍न संस्‍थाओं के इन तथाकथित नुमाइंदों में एक बड़ी समानता है। समानता यह है कि सब का मकसद किसी न किसी तरह पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों के नजदीकी बनाना, उनके साथ उठना-बैठना एवं उनकी प्रत्‍येक गतिविधि की जानकारी रखना है।
इन हालातों में एक स्‍वाभाविक प्रश्‍न यह उठता है कि आखिर यह क्‍यों पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों के इर्द-गिर्द बने रहते हैं, क्‍यों यह उनकी हर गतिविधि पर बारीक नजर रखते हैं ?
एक सवाल यहां यह और खड़ा होता है कि बुद्धि के पुतले समझे जाने वाले पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारियों के मन में क्‍या इन्‍हें एवं इनकी गतिविधियों को लेकर कोई सवाल पैदा नहीं होता ?
क्‍या कभी कोई इस आशय की शंका खड़ी नहीं होती कि जब इनके समाचार कहीं प्रकाशित या प्रसारित नहीं होते तो यह क्‍यों सारे दिन कलक्‍ट्रेट पर मंडराते रहते हैं?
क्‍या वह कभी नहीं सोचते कि इन लोगों की आमदनी का ज़रिया क्‍या है और किस तरह यह अपने अच्‍छे-खासे खर्चे पूरे करते हैं।
यदि कोई सामाजिक सेवा में लगा है अथवा उसने कोई एनजीओ बना रखा है तो उसके लिए हर वक्‍त अधिकारियों के पास बने रहना क्‍यों जरूरी है?
नि:संदेह ऐसे तत्‍व दूसरे समुदायों में भी हैं और उनकी भी गतिविधियां कम संदिग्‍ध नहीं हैं परंतु फिलहाल जिस तरह का खतरा मंडरा रहा है और अल-कायदा जैसा आतंकी संगठन ऐलान कर चुका है, उसके मद्देनजर आतंक के स्‍लीपर माड्यूल्स की घुसपैठ बड़ा खतरा बन सकती है।
बेहतर होगा कि इस विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक जनपद का पुलिस-प्रशासन समय रहते चेत जाए और कमिश्‍नर मेरठ की तरह गंभीरता पूर्वक ऐसे तत्‍वों पर पैनी नजर रखते हुए कार्यवाही रिपोर्ट जारी करे अन्‍यथा कबूतर के आंख बंद कर लेने से बिल्‍ली उसे अपना शिकार बनाने में परहेज नहीं करेगी। वह शिकार के लिए उचित समय और माहौल का इंतजार भले ही कर ले, परंतु उसकी फितरत बदलने वाली नहीं है।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष
 

मंगलवार, 2 सितंबर 2014

मथुरा में भी मौजूद हैं कई रंजीत उर्फ रकीबुल

नेशनल शूटर तारा शाहदेव से जुड़ा कथित लव जिहाद संबंधी मामला सामने आने के बाद रांची (झारखंड) पुलिस ने भले ही उसके पति रंजीत सिंह कोहली उर्फ रकीबुल हसन खान को गिरफ्तार कर लिया किंतु यदि इस दिशा में और आगे बढ़ा जाए तो देश का कोई राज्‍य, कोई जिला और कोई नगर ऐसा नहीं बचेगा जहां रंजीत सिंह कोहली उर्फ रकीबुल हसन खान जैसे लोग मौजूद न हों।
फिलहाल यदि हम बात करें विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक जिला और भगवान श्रीकृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली का गौरव प्राप्‍त मथुरा की तो यहां एक-दो नहीं, कई रंजीत सिंह कोहली उर्फ रकीबुल हसन खान मिल जायेंगे।
रंजीत सिंह कोहली को तो इस मुकाम तक पहुंचने के लिए न केवल अपना धर्म बदलना पड़ा बल्‍कि छद्म नामों और कामों का भी सहारा लेना पड़ा किंतु मथुरा में मौजूद रंजीत सिंहों को कभी ऐसा करने तक की जरूरत नहीं पड़ी। वह ताल ठोक कर अपने असली नाम और काम के बूते ही वह सब कर रहे हैं जो रंजीत सिंह कोहली कर रहा था।
एक एनजीओ संचालित करने वाले रंजीत सिंह कोहली उर्फ रकीबुल हसन खान की अब तक जितनी असलियत सामने आई है, उससे निष्‍कर्ष यह निकलता है कि वह शासन-प्रशासन व सत्‍ता का एक हाई प्रोफाइल दलाल था जिसे आज की भाषा में लाइजनर कहा जाने लगा है।
वह न्‍यायपालिका के कई उच्‍च अधिकारियों से संपर्कों के बल पर अपने यहां फाइलें मंगवाकर केसेज का निर्णय तय कराता था। वह जमानत दिलवाने से लेकर सजा से बचाने तक की ताकत रखता था और इसके लिए शराब, लड़कियां, पैसा, गाड़ियां तथा जिस अधिकारी की जो मांग होती थी, वह पूरी करता था। उसने इन सब कामों के लिए कई ऑफिस बना रखे थे और गाड़ियों का पूरा बेड़ा उसके पास था। उसके निजी ताल्‍लुकात जिन लोगों से थे, उनमें न्‍यायिक अधिकारियों के अलावा पुलिस व प्रशासन के आला अफसर तथा मंत्रिगणों की अच्‍छी-खासी फेहरिस्‍त थी। उसके घर की हर रात रंगीन होती थी और हर दिन महफिल सजती थी।
अब ज़रा अपने दिमाग पर जोर डालिये और फिर सोचिए कि जो कुछ रंजीत सिंह कोहली उर्फ रकीबुल हसन खान अपना धर्म परिवर्तन करके या नकाब पहनकर अब तक रांची में कर रहा था, क्‍या मथुरा में मौजूद रंजीत सिंह कोहली वही काम बिना धर्म परिवर्तन किए नहीं कर रहे।
क्‍या यहां ऐसे रंजीत सिंह कोहलियों की कमी है जो शराब, शबाब, पैसा और गाड़ियां उपलब्‍ध कराकर यही सब-कुछ नहीं करते।
गौरतलब है कि रंजीत सिंह कोहली के बारे में अब तक यह पता नहीं लग पाया है कि लव जिहादी है या नहीं, अलबत्‍ता इतना जरूर सामने आ चुका है कि उसने धर्म परिवर्तन किया था और वह शासन-सत्‍ता में बैठे लोगों से संबंधों तथा उन्‍हें मुहैया कराई जाने वाली सुविधाओं के बल पर लोगों के काम कराता था।
यही काम मथुरा के कई लोग कर रहे हैं और उनमें से कई की गिनती तो संभ्रांत व प्रतिष्‍ठित लोगों में होती है। उनके नाम पब्‍लिक के बीच बड़ी इज्‍ज़त के साथ लिए जाते हैं।
इन लोगों में से कोई मीडियाकर्मी है तो कोई मिठाई विक्रेता। कोई होटल स्‍वामी है तो कोई ओटोमोबाइल क्षेत्र का बड़ा कारोबारी। कोई बड़ा शिक्षा व्‍यवसाई है तो कोई रियल एस्‍टेट के क्षेत्र में बड़ा नाम रखता है। प्रत्‍यक्ष में इनमें से किसी का कोई भी काम हो लेकिन इनका असली काम वही है जो रंजीत सिंह कोहली उर्फ रकीबुल हसन खान कर रहा था।
आश्‍चर्य की बात यह है कि इनके प्रत्‍यक्ष और अप्रत्‍यक्ष कामों की शौहरत पूरे जिले की जनता के साथ-साथ प्रदेश और राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली सहित कई दूसरे राज्‍यों तक फैली है लेकिन क्‍या मजाल कि कभी इनकी कोई जांच भी किसी ने की हो।
आज भले ही रंजीत सिंह कोहली उर्फ रकीबुल हसन खान के ताल्‍लुकातों की वजह से कोई हाईकोर्ट का रजिस्‍ट्रार निलंबित हो गया हो, किसी मंत्री को अपनी सफाई में प्रेस कांफ्रेंस बुलानी पड़ी हो, कई माननीय न्‍यायाधीशों से पूछताछ की जा रही हो और कई उप पुलिस अधीक्षकों को नोटिस भेजकर जवाब तलब किया गया हो परंतु इससे सबक कोई नहीं लेता।
मथुरा में सक्रिय रंजीत सिंह कोहलियों की लाइफ स्‍टाइल पर गौर फरमायेंगे तो स्‍पष्‍ट हो जायेगा कि उनके क्रिया-कलापों तथा रंजीत सिंह के क्रिया-कलापों में आश्‍चर्यजनक रूप से कितनी समानता है।
मथुरा के रंजीत सिहों की भी रातें रंगीन होती हैं। उनके भी यहां हर दिन महफिल सजती हैं। इन रातों को रंगीन करने और महफिलों को गुलजार करने वाला कोई न कोई शासन-सत्‍ता का बड़ा नाम या पुलिस-प्रशासन का बड़ा अधिकारी ही होता है।
इनके ऊंचों ताल्‍लुकातों को बाकायदा अच्‍छा-खासा मीडिया कवरेज मिलता है और उस पर चर्चाएं होती हैं। उनकी तथाकथित तरक्‍की के कसीदे पढ़े जाते हैं।
क्‍या मजाल कि मथुरा में पोस्‍टिंग पर आने वाला किसी भी विभाग का कोई बड़ा अधिकारी या किसी भी दल का कोई बड़ा नेता, इनकी चौखट चूमे बिना वापस चला जाए। फर्क सिर्फ इतना है कि कोई इस काम को ढोल बजाकर यानि प्रचार-प्रसार करके अंजाम दे रहा है तो कोई गोपनीय तरीके से, अलबत्‍ता लाइजनिंग का खेल जारी है।
मजे की बात एक और है कि लाइजनर्स के हाथों की कठपुतली बनने वाले अधिकारी, नेता, मंत्री और माननीय का तमगा प्राप्‍त दूसरे लोग तब तक कुछ सोचने व समझने को तैयार नहीं होते जब तक किसी रंजीत सिंह कोहली उर्फ रकीबुल हसन खान का भांडा नहीं फूट जाता। वह सब-कुछ जानते व समझते हुए उनके यहां बेखौफ आते-जाते हैं और उनके साथ फोटो भी खिंचवाते हैं जिससे उनका मकसद पूरा हो सके।
पुलिस भी ऐसे लोगों पर तभी शिकंजा कसती है जब अपनी जान बचाने की नौबत आ जाए और राजनीतिक दबाव इस कदर बढ़ जाए कि कार्यवाही करने के अलावा कोई रास्‍ता ही न बचे अन्‍यथा वह खुद ऐसे तत्‍वों की ताबेदारी करने में पीछे नहीं रहती।
बहरहाल, आज नहीं तो कल.....कल नहीं तो कभी और..रंजीत सिंह कोहलियों का नंबर आता जरूर है। आज वह बेशक ताकतवर दिखाई देते हों और ऐसा महसूस कराते हों कि शासन-सत्‍ता एवं पुलिस-प्रशासन के उच्‍च अधिकारी उनके इर्द-गिर्द घूमते हैं लेकिन भविष्‍य में इसी तरह मिमियाते व गिड़गिड़ाते नजर आते हैं जैसे हर रंजीत सिंह कोहली को गिड़गिड़ाना पड़ता है। फिर चाहे वह झारखंड की राजधानी रांची में बैठकर लाइजनिंग कर रहा हो अथवा कृष्‍ण की जन्‍मभूमि मथुरा में बैठकर। कभी न कभी कोई तारा शाहदेव ऐसे तत्‍वों के पाप का घड़ा फोड़ने का ज़रिया बन ही जाती है।
- Legend News EXCLUSIVE

रविवार, 31 अगस्त 2014

देश के लिए बड़ा खतरा बने धर्म के धंधेबाज

धर्म को यदि शाब्‍दिक रूप से परिभाषित किया जाए तो उसके अनेक अर्थ सामने आ जायेंगे। इन अर्थों में तमाम इतने क्‍लिष्‍ट होंगे जिन्‍हें समझना और समझाना काफी मुश्‍किल हो जायेगा।
धर्म की गूढ़ता और उसको परिभाषित करने वाले अर्थ व अनर्थों में न पड़ा जाए तो इस बात से शायद ही किसी को आपत्‍ति हो कि धर्म को जब धंधा बना लिया जाता है तब वह धर्म नहीं रह जाता। तब वह खालिस अधर्म बन जाता है और अधर्मियों के खिलाफ सख़्त कार्यवाही करना सरकार की ज़िम्‍मेदारी बनती है।
हाल ही में एक खबर इस आशय की आई है कि धर्म के नाम पर विदेशों से आ रहे धन को लेकर सरकार काफी चिंतित है और उसने इस धन पर अपनी निगाहें केंद्रित कर दी हैं।
गृह मंत्रालय ने इस संबंध में जो आंकड़े जुटाए हैं, उनके अनुसार धर्म के नाम पर विदेशों से आ रहे धन की तादाद में सिर्फ सालभर के अंदर 23 फीसदी का इजाफा हुआ है। एक साल के अंदर इसमें 162 करोड़ रुपए की रिकॉर्ड बढ़ोत्‍तरी हुई है जो चौंकाने वाली है।
गौर करने वाली बात यह और है कि 162 करोड़ की बढ़ोत्‍तरी केवल उन गैर सरकारी धार्मिक संगठनों की है जिन्‍होंने एफसीआर नियमों के तहत बाकायदा रिटर्न दाखिल किए हैं जबकि ऐसे संगठनों की संख्‍या बहुत अधिक है जो धर्म के नाम पर विदेशों से धन तो लेते हैं किंतु रिटर्न तक दाखिल करना जरूरी नहीं समझते।
हालांकि ऐसे 4138 संगठनों को पिछले तीन सालों में प्रतिबंधित किया गया है परंतु अब भी इनकी संख्‍या बहुत अधिक है।
धर्म की आड़ में चल रहा अवैध धंधा सरकार ही नहीं समाज के लिए भी अत्‍यधिक चिंता का विषय है क्‍योंकि सामाजिक विघटन तथा दंगे-फसादों में इस धंधे से प्राप्‍त धन की बड़ी भूमिका रहती है।
देश इस दौर में जिन बड़ी परेशानियों का सामना कर रहा है, उनमें तथाकथित धर्म और उस धर्म के कारोबारियों की भागीदारी महत्‍वपूर्ण है। वह न केवल धर्म को अपने हिसाब से परिभाषित कर रहे हैं बल्‍कि उससे अर्जित संपत्‍ति का भी भरपूर दुरुपयोग कर रहे हैं।
यही कारण है कि एक ओर समाज भले ही पहले से अधिक शिक्षित हो रहा हो किंतु सामाजिक विघटन बढ़ रहा है। धर्म के नाम पर झगड़े, फसाद और दंगे हो रहे हैं।
देश की कुल जनसंख्‍या का एक बड़ा हिस्‍सा पूरी मेहनत-मशक्‍कत करने के बावजूद जरूरी संसाधन नहीं जुटा पाता और धर्म के धंधेबाज करोड़ों तथा अरबों रुपए इमारतों पर खर्च कर रहे हैं।
आश्‍चर्य की बात यह है कि कोई धर्म इस सब से अछूता नहीं रहा। सभी धर्मों के अंदर ऐसे तत्‍व अच्‍छी-खासी मात्रा में समाहित हो चुके हैं जिनके लिए धर्म आड़ का काम कर रहा है और वह उस आड़ के ज़रिए अपना कारोबार सरहदों के पार तक फैला चुके हैं।
कड़वा सच तो यह है कि धर्म को धंधा बनाने तथा उसको बाकायदा एक संगठित कारोबार की तरह संचालित करने वाले लोग देश के लिए घातक बीमारी का रूप ले चुके हैं।
भारी तादाद में विदेशी पैसा प्राप्‍त करने वाले तथाकथित धार्मिक संगठन उस पैसे का दुरुपयोग अपनी ऐश-मौज तथा उस खोखले अहम् की तुष्‍टि पर कर रहे हैं जो अंतत: सामाजिक विघटन का कारण बनता है।
बेशक इसके लिए हमारा वो कानून भी कम जिम्‍मेदार नहीं जो धर्म के नाम पर देश-विदेश से आने वाले कालेधन को सफेद करने की सहूलियत धार्मिक संगठनों को मुहैया कराता है इसलिए अब वक्‍त आ गया है कि ऐसे कानून की भी नए सिरे से व्‍याख्‍या की जाए और उसमें जरूरी संशोधन हों।
धर्म के लिए मिलने वाले धन पर कर में छूट का प्राविधान जिस दौर के अंदर बनाया गया था, उस दौर में धर्म का अवैध कारोबार करने की बात संभवत: किसी के दिमाग में नहीं रही होगी किंतु आज धर्म को बतौर धंधा इस्‍तेमाल करने वाले ही अधिक हैं लिहाजा समय की मांग है कि धार्मिक कारोबारियों की बारीक समीक्षा हो ताकि धर्म ही नहीं, देश भी बचा रहे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी           
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