गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

BSNL के GM का घर और दफ्तर सील

नोएडा। 
नोएडा में आज एक बार फिर छापेमारी के बाद हड़कंप मच गया। इस बार छापा भारतीय संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) के महाप्रबंधक (जीएम) के घर और कार्यालय में मारा गया है। यह छापेमारी केंद्रीय अन्‍वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की दो विशेष टीम कर रही हैं।
नोएडा के सेक्टर 19 स्थित बीएसएनएल जीएम के ऑफिस में आज सीबीआई की टीम ने छापा मारा। इस दौरान सीबीआई की करीब पांच लोगों की टीम ने ऑफिस के सभी विभागों के कंप्यूटर स्कैन कर डाटा कॉपी कर लिए।
बीसएसएनएल के सूत्रों के मुताबिक सीबीआई टीम खासतौर पर टेंडर संबंधी फाइलों की जांच-पड़ताल कर रही है। सीबीआई टीम को विभाग के कई कामों में घपलेबाजी की आशंका है।
बीएसएनएल महाप्रंबंधक आदेश कुमार गुप्ता के ऑफिस के साथ ही उनके नोएडा सेक्टर-39 स्थित निवास पर भी छापा मारा गया। वहां सीबीआई की दूसरी टीम पहुंची।
सूत्रों के मुताबिक सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारी ने फोन पर सीबीआई टीम को निर्देश दिए हैं कि फाइलों की जांच-पड़ताल के दौरान आदेश कुमार गुप्ता को घर से बाहर बिठाकर रखा जाए। ताकि वह जांच को प्रभावित न कर सकें।
इस बाबत आदेश कुमार गुप्ता को घर के बाहर बैठाकर पूछताछ की जा रही है। जबकि उनके घर पर किसी भी आने-जाने पर रोक लगा दी गई है। मामले पर जब अमर उजाला ने सीबीआई अफसरों बातचीत करनी चाही, तो उन्होंने इसे फाइलों की जांच-पड़ताल संबंधी छापेमारी बताया।

बुधवार, 17 दिसंबर 2014

किशनी से लेकर कृष्‍ण के धाम तक...

आगरा से प्रकाशित दैनिक जागरण अखबार के सातवें पृष्‍ठ पर बॉटम में एक खबर छपी है। इस सिंगल कॉलम खबर का शीर्षक है- दुष्‍कर्म के बाद मुकद्दमे का इंतजार, थाने में बैठी किशोरी।
खबर के अनुसार विधवा और गूंगी-बहरी अपनी मां के साथ किशनी थाना क्षेत्र के गांव ढकरोई में रह रही एक पंद्रह वर्षीय किशोरी को गांव के ही 45 वर्षीय सरविंद उर्फ पुलंदर बाथम ने तब अपनी हवस का शिकार बना डाला जब वह शौच के लिए खेत पर गई थी।
मंगलवार सुबह 7 बजे की गई इस वारदात का मुकद्दमा लिखाने थाने पहुंची किशोरी के प्रार्थना पत्र पर पुलिस ने जांच के आदेश दे दिये लेकिन मुकद्दमा दर्ज नहीं किया। मुकद्दमा दर्ज होने के इंतजार में पीड़िता देर शाम तक थाने पर ही बैठी थी।
यहां यह जान लेना जरूरी है कि कस्‍बा किशनी, मैनपुरी जिले का हिस्‍सा है और वहां से सांसद हैं सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव के पौत्र तेज प्रताप सिंह यादव। वही तेज प्रताप सिंह यादव जिनका रिश्‍ता कल ही राजद मुखिया लालू प्रसाद यादव की पुत्री राजलक्ष्‍मी के साथ तय हुआ है।
समाजवादी कुनबे के सबसे लाड़ले सदस्‍य की कांस्‍टीट्यूएन्‍सी में पुलिस का यह हाल है तो जाहिर है कि सूबे के अन्‍य जनपदों की पुलिस का इससे अलग कुछ होने से रहा।
फिर कृष्‍ण की नगरी मथुरा में तो समाजवादी पार्टी बदहाल है। यहां से न उसका कोई सांसद है और न विधायक। लाख प्रयास के बावजूद मुलायम के नेतृत्‍व वाला समाजवादी कुनबा यहां अपना खाता तक खोल पाने में कभी सफल नहीं हुआ।
समाजवादी पार्टी के लिए ऐसे सूखाग्रस्‍त क्षेत्र में यदि एमबीए की छात्रा से बलात्‍कार की वारदात का मुकद्दमा तीन दिन तक जांच कराने के बाद लिखा गया, तो इसमें कौन सी बड़ी बात हो गई।
ऊपर से यहां तो लड़की जिस व्‍यक्‍ति के खिलाफ बलात्‍कार के आरोप की तहरीर लेकर गई थी, वह तमाम तमगों से विभूषित था।
वह उत्‍तर प्रदेश जर्नलिस्‍ट एसोसिएशन का प्रदेश उपाध्‍यक्ष, ब्रज प्रेस क्‍लब का अध्‍यक्ष, स्‍थानीय छावनी परिषद् का पूर्व उपाध्‍यक्ष होने के साथ-साथ पत्रकार था... वकील था... और पता नहीं क्‍या-क्‍या था। साथ में बसपा की टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ चुका था।
मथुरा की महिला एसएसपी मंजिल सैनी स्‍वयं उसके निजी कार्यक्रम का हिस्‍सा बनने उसके निवास तक पहुंच चुकी थीं।
उसे समाज के तमाम सफेदपोश सभ्रांत उद्योगपति, व्‍यापारी, नेता, बिल्‍डर, ब्‍यूरोक्रेट्स और पत्रकारों से न केवल चरित्र प्रमाण पत्र प्राप्‍त था बल्‍कि वह उसके दरबार की शोभा बढ़ाया करते थे। उसके यहां हर दिन हाजिरी लगाना बहुत से तथाकथित सभ्रांतजनों का शगल था।
कृष्‍ण का धाम जिन नेताओं के कारण समाजवादी पार्टी की पहचान बना हुआ है, वह भी बलात्‍कार के आरोपी की खुलेआम पैरवी कर रहे थे और एसएसपी से मुलाकात करके बता रहे थे कि पत्रकार को साजिश का शिकार बनाया जा रहा है।
दूसरी पार्टियों का भी कोई नेता उसके खिलाफ मुंह खोलने की जुर्रत नहीं कर सकता था क्‍योंकि सब आये दिन उसके लिए राग दरबारी का गायन करते रहे थे। अधिकांश पत्रकार तो हर दिन उसकी चौखट चूमने ऐसे जाया करते थे जैसे द्वारिकाधीश मंदिर की मंगला या शयन आरती करने बहुत से उनके भक्‍त बेनागा जाते हैं।
इन हालातों में मंजिल सैनी यदि बलात्‍कार के आरोपी को लेकर किसी मंजिल तक फिलहाल नहीं पहुंच पाईं हैं, तो उन्‍हें दोष देना भी किसी साजिश का हिस्‍सा लगता है। एफआईआर तो कोई भी किसी के खिलाफ लिखा सकता है।
मंजिल सैनी ने तो उसके बाद बहुत कुछ करवा दिया। कई दिन बाद ही सही लेकिन पीड़िता का मेडीकल कराया, 161 के बयान कराये, उससे पहले खुद उससे सफाई मांगी, उसके अगले दिन कोर्ट में 164  के बयान कराये।
बाकी रह गई गिरफ्तारी...तो वह होती रहेगी। तब तक आरोपी को पीड़िता और उसके परिजनों से जबरन सुलह-सफाई कराने का अवसर देने में क्‍या हर्ज है।
इसके लिए पीड़िता के परिजनों पर एक नहीं, दो-दो मुकद्दमे कायम किये गये। सुलह-सफाई के लिए वो उपलब्‍ध रहें इसलिए गिरफ्तारी उनकी भी नहीं की गई।
एसएसपी महोदया भी आखिर हैं तो सामाजिक प्राणी, वह भी समाज का हिस्‍सा हैं और इसीलिए मानती हैं कि जो काम समाज के तथाकथित ही सही पर सभ्रांत तत्‍वों द्वारा समझौता करके संपन्‍न करा लिया जाता है, वह कानून नहीं कर पाता।
समझौते के लिए समय की दरकार होती है, इसलिए समय अफरात में दिया जा रहा है। यूं भी उनके पास समय की कमी होती तो वह निजी कार्यक्रमों का हिस्‍सा बनने नहीं जातीं।
रहा सवाल ''आजतक'' जैसे राष्‍ट्रीय चैनल का... तो उसने अपने कार्यक्रम ''वारदात'' में 'कानून का रेप' जैसे शीर्षक वाली सनसनीखेज रिपोर्टिंग करके क्‍या कर लिया। एसएसपी महोदया को न गिरफ्तारी करनी थी, न की।
करें भी क्‍यों...जब किशनी से लेकर कृष्‍ण के धाम तक समाजवादी पुलिस का रवैया आम आरोपियों के लिए एक समान है तो खास आरोपियों के साथ खास व्‍यवहार करना कैसे गुनाह हो सकता है।
मथुरा में बलात्‍कार की शिकार लड़की के 3 तारीख के प्रार्थना पत्र पर 6 तारीख को मुकद्दमा दर्ज करा दिया, 11 तारीख को 161 के बयान तथा मेडीकल करवा दिया, 12 तारीख को 164 के बयान कराकर अपना कर्तव्‍य पूरा कर दिया। उसी दिन पीड़िता के बयानों की कोर्ट से नकल लेने के लिए एप्‍लीकेशन डाल दी। 15 तारीख को नकल हासिल कर ली।
इतना कुछ कर डाला सिवाय एक गिरफ्तारी के, तो इसमें इतनी हायतौबा मचाने वाली क्‍या बात है।
जब लड़की करीब डेढ़ साल तक यौन उत्‍पीड़न सहने के बाद एफआईआर करा सकती है तो पुलिस उसकी जांच के लिए साल-छ: महीने का समय नहीं ले सकती। इसमें गलत क्‍या है।
और फिर बिना जांच के ऐसे कैसे किसी सभ्रांत पत्रकार को गिरफ्तार किया जा सकता है। जांच होती किसलिए है। जांच में कोई आंच आरोपी पर नहीं आई तो पुलिस किसे मुंह दिखायेगी।
तभी तो कृष्‍ण का धाम हो या तेजू भैया की किशनी...बिना जांच के रेप जैसे संगीन आरोप की एफआईआर दर्ज नहीं की जाती।
एक जांच एफआईआर से पहले और एक जांच एफआईआर के बाद...यही है सच्‍चा समाजवाद और इसी को कहते हैं समाजवादी सरकार का इकबाल।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

उपमन्‍यु तो मुखौटा, असली चेहरे सामने आना बाकी

मथुरा। 
किसी भी मामले का पूरा सच सामने लाने के लिए उस पर चढ़े मुखौटे का हटना जरूरी होता है। मुखौटे हमेशा सच्‍चाई को छुपाने में बड़ी भूमिका अदा करते हैं। मुखौटों को मोहरा बनाकर खेल खेलने वाले जानते हैं कि यदि एक बार सच्‍चाई सामने आ गई तो वो कहीं के नहीं रहेंगे इसलिए वो मुखौटों को बेनकाब होने से बचाने की कोशिश में अपना सब-कुछ दांव पर लगा देते हैं।
कमलकांत उपमन्‍यु पर बलात्‍कार के आरोप की पुष्‍टि एक लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद संभव है, और इस प्रक्रिया का हिस्‍सा चाहे-अनचाहे पीड़िता को भी बनना होगा। जाहिर है कि इस प्रक्रिया के पूरे होने में समय भी अच्‍छा-खासा जाया होगा किंतु इस बीच एक  बात जरूर खुलकर सामने आ गई कि कमलकांत उपमन्‍यु सिर्फ एक मुखौटा है और उसके पीछे एक-दो नहीं, तमाम चेहरे छिपे हैं। वो चेहरे जिनका सच यदि सामने आ गया तो कमलकांत उपमन्‍यु के अनेक संस्‍करण सामने खड़े दिखाई देंगे।
यही कारण है कि अब ये चेहरे कमलकांत उपमन्‍यु को बचाने के लिए ऐड़ी से चोटी तक का जोर लगा रहे हैं, बिना यह सोचे-समझे कि जिस समाज का वह हिस्‍सा हैं वही समाज उन पर थूक रहा है।
इनमें से कोई बिना उद्योग के उद्योगपति का तमगा प्राप्‍त है तो कोई लगभग अंगूठा टेक होते हुए शिक्षाविद् है, कोई पत्रकारिता की आड़ में मीडिया माफिया है तो कोई राजनीति के चोले में प्रतिष्‍ठा प्राप्‍त गुण्‍डा है। जो सब-कुछ होते हुए कुछ नहीं हैं लिहाजा समाजसेवी का तमगा लगाकर चलते हैं, वो भी इसमें शामिल हैं। पुलिस तथा प्रशासनिक अधिकारी हैं, बिल्‍डर हैं, सत्‍ता के दलाल हैं, भूमाफिया हैं, धर्म की दुकान चलाने वाले तथाकथित साधु-संतों से लेकर कथावाचक तक हैं, और जुडीशियरी को अपनी जेब में रखकर चलने का दावा करने वाले सफेदपोश लाइजनर भी हैं। बहुत लंबी लिस्‍ट है ऐसे लोगों की। यह लिस्‍ट कितनी लंबी हो सकती है, इसका अंदाज उन फोटोग्राफ्स को देखकर लगाया जा सकता है जिन्‍हें कमलकांत उपमन्‍यु ने अपने कार्यालय और सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक व गूगल प्‍लस की वॉल पर सजा रखा है।
नि:संदेह इनमें से कई चेहरे ऐसे भी हैं जिन्‍हें कमलकांत उपमन्‍यु ने अपने साथ खड़ा करके फोटो खिंचवाने पर बाध्‍य कर दिया और कई चेहरे ऐसे भी हैं जिनके लिए उसके साथ फोटो खिंचवाना मजबूरी था परंतु अधिकांश चेहरे उस कॉकस का हिस्‍सा हैं जिसका खुद कमलकांत एक मुखौटा था, या यूं कहें कि एक इकाई भर है।
कमलकांत उपमन्‍यु तो अपनी ही उस हवस का शिकार बन गया जिसे उसने महत्‍वाकांक्षाओं को पूरा करने का माध्‍यम बनाया था। अन्‍यथा वह अकेला नहीं है, एक पूरा रैकेट है जो बहुत लंबे समय से अपने काम को बखूबी अंजाम दे रहा है।
बेशक इस रैकेट के अपने तर्क हैं और इसमें शामिल तत्‍व यह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि कमलकांत उपमन्‍यु को साजिश का शिकार बनाया जा रहा है किंतु ऐसे बेहिसाब तर्क हर उस शख्‍स के पास होते हैं जो कानून के शिकंजे में फंस जाता है।
आसाराम बापू हो या कथित संत रामपाल, नित्‍यानंद हो या पत्रकार तरुण तेजपाल...सबके पास अपने पक्ष में कहने को काफी कुछ होता है। यहां तक कि आतंकवादी और नक्‍सली भी अपने पक्ष में अनगिनित तर्क गढ़ लेते हैं और खुद को जायज ठहराने का पूरा प्रयास करते हैं परंतु सच्‍चाई को छिपा पाना संभव नहीं होता।
साम, दाम, दण्‍ड तथा भेद से अपने कर्मों पर पर्दा डालने की कोशिश अंत तक हर आरोपी करता है और यही उपमन्‍यु के मामले में भी किया जा रहा है।
वर्षों से एकत्र ताकत के बल पर यह कोशिश कितने दिन और जारी रहती है, इसका पता तो बाद में ही लगेगा किंतु नजीता बदल पाना अब संभव शायद ही हो क्‍योंकि कानूनी प्रक्रिया एक ठोस मुकाम हासिल कर चुकी है।
ये बात दीगर है कि दुराचार के मामले में 164 के बयान दो दिन पहले ही पूरे हो जाने के बाद आज उनकी नकल आईओ को लेनी थी लेकिन समाचार लिखे जाने तक आईओ नकल लेने कोर्ट नहीं पहुंची जबकि इस बावत प्रार्थना पत्र उसने शुक्रवार के दिन ही लगा दिया था।
पीड़िता के अधिवक्‍ता प्रदीप राजपूत ने बताया कि जब आईओ रीना से ऐसा किये जाने की वजह जानना चाही तो उसने यह कहकर फोन काट दिया कि मैं कुछ कहने अथवा बताने की स्‍थिति में नहीं हूं।
प्रदीप राजपूत ने कहा कि पुलिस का यह व्‍यवहार अप्रत्‍याशित है और वह इसके खिलाफ कोर्ट में अलग से आज शाम को ही प्रार्थना पत्र देंगे ताकि कोर्ट अपने स्‍तर से कार्यवाही आगे बढ़ा सके।
पूरे घटनाक्रम पर प्रदीप राजपूत का भी यही कहना है कि यदि इस मामले की जांच किसी निष्‍पक्ष एजेंसी से कराई जाए तो ऐसे-ऐसे चेहरे बेनकाब होंगे जिन्‍हें अब तक समाज में प्रतिष्‍ठा प्राप्‍त है और जो सभ्रांत होने का लबादा ओढ़े घूम रहे हैं। जो शेर की खाल में भेड़िये तो हैं ही, साथ ही एक कमलकांत उपमन्‍यु के फंसने पर अनेक कमलकांत उपमन्‍यु पैदा करने का माद्दा रखते हैं क्‍योंकि उन्‍हें अपने धंधे को सुचारू रुप से चलाने के लिए किसी न किसी कमलकांत उपमन्‍यु की दरकार हमेशा रहती है।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष

शुक्रवार, 12 दिसंबर 2014

उपमन्‍यु केस: पुलिस को कराने पड़े 164 के बयान

मथुरा। 
ऐसा लगता है कि एमबीए की छात्रा का यौन शोषण करने के आरोपी पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु के तथाकथित शुभचिंतक या तो बेहद मूर्ख हैं या फिर इतने अधिक चालाक कि वह उसके शुभचिंतक बनकर ही उसे पूरी तरह बर्बाद कर देना चाहते हैं ताकि फिर वह कभी पनप ही न सके।
उपमन्‍यु के इन शुभचिंतकों ने पहले तो जैसे ही यह भनक लगी कि पीड़ित लड़की पुलिस में जाने की तैयारी कर रही है, उसके परिजनों पर पेशबंदी में एफआईआर दर्ज कराने की सलाह दे डाली। फिर यह एफआईआर उपमन्‍यु के अपने ही चेलों से करवा दी ताकि जवाबदेही भी उसी की रहे।
हद तो तब हो गई जब उन्‍हीं शुभचिंतकों ने यह प्रचार भी कर दिया कि एफआईआर उपमन्‍यु को बचाने के लिए कराई गई है और इसीलिए एफआईआर के लिए दी गई तहरीर में उपमन्‍यु के खिलाफ साजिश रचे जाने का जिक्र भी कर दिया।
इन्‍हीं शुभचिंतकों ने एक अखबार की खबर में उपमन्‍यु के खिलाफ लिखे गये मुकद्दमे को क्रॉस केस घोषित करके रही-सही कसर पूरी कर दी ताकि वह आगे भी किसी से यह तक कह न सके कि पीड़िता के परिजनों पर मुकद्दमा कायम कराने में उसका कोई हाथ नहीं था।
अब खबर आई है कि उपमन्‍यु के पक्ष में उनके शुभचिंतकों ने करीब 3 सैकड़ा शपथपत्र इस आशय के एसएसपी को दिलवाये हैं कि उसे फंसाया गया है और वह तो बहुत इन्‍नोसेंट व्‍यक्‍ति है। इन शपथ पत्रों में एक शपथ पत्र पीड़िता के परिवार से ताल्‍लुक रखने वाली उस महिला का भी है जो पहले वीडियो कैमरे के सामने उपमन्‍यु पर बेहद घृणित आरोप लगा चुकी है। अब उसके शपथ पत्र की कितनी अहमियत होगी, इसका अंदाज उपमन्‍यु के शुभचिंतकों को छोड़कर कोई भी व्‍यक्‍ति लगा सकता है।
शपथपत्र दिलवाने वाले अक्‍ल के इन दुश्‍मनों ने इतना भी नहीं सोचा कि इस तरह तो वह लड़की व उसके परिजनों द्वारा कही जा रही उन बातों को तस्‍दीक ही कर रहे हैं कि कमलकांत उपमन्‍यु बेहद पॉवरफुल व्‍यक्‍ति है और वह कुछ भी करवा सकता है।
घोर आश्‍चर्य की बात है कि उपमन्‍यु के इन शुभचिंतकों में वकील भी हैं और पत्रकार भी, उद्योगपति भी हैं और टेक्‍नीकल एजुकेशन हब के मालिकान भी। वह खुद भी अपने आप को पत्रकार के साथ-साथ वकील लिखने लगा है।
घोर बुद्धिमानों की फौज और उसके मुखिया कमलकांत उपमन्‍यु ने 300 शपथपत्र एसएसपी को दिलवाने से पहले यह तो विचार किया होता कि इसी तरह यदि कोई दुराचार के आरोप से बच सकता तो तथाकथित संत आसाराम बापू भी आज जेल की सलाखों के पीछे नहीं होता।
आसाराम बापू तो अपने पक्ष में तीन लाख शपथपत्र दिलवा सकता था और जरूरत पड़ती तो यह संख्‍या 30 लाख भी हो सकती थी।
अक्‍ल के दुश्‍मन इन शुभचिंतकों को क्‍या यह नहीं मालूम कि इस तरह के चरित्र प्रमाण पत्रों को कोर्ट भी कोई मान्‍यता नहीं देतीं और इनका यही मैसेज जाता है कि आरोपी वाकई बहुत ताकतवर तथा धूर्त है।
एक ऐसे ही दूसरे तथाकथित संत रामपाल को अपनी निजी फौज और अनुयायी खड़े करके कानून से बड़ा साबित करना कितना मंहगा साबित हुआ, क्‍या यह भी उपमन्‍यु के शुभचिंतक भूल गये।
उपमन्‍यु की आस्‍तीन के सांपों को क्‍या वाकई यह नहीं मालूम कि उनका हर ऐसा कदम उपमन्‍यु के लिए नई मुसीबत बन रहा है क्‍योंकि इससे पीड़िता के आरोपों की पुष्‍टि होती जा रही है।
जहां तक सवाल एसएसपी मंजिल सैनी का अब तक उपमन्‍यु के पक्ष में खड़ी दिखाई देने का है तो वह भी उपमन्‍यु तथा स्‍वयं उनके अपने लिए परेशानी का सबब साबित होगा क्‍योंकि कोर्ट में केस जाने के बाद बहुत से प्रश्‍नों का जवाब उन्‍हें भी देना पड़ सकता है।
बताया जाता है कि बलात्‍कार जैसे गंभीर मामले में एसएसपी की उपमन्‍यु के प्रति अतिरिक्‍त सहानुभूति का इल्‍म शासन को भी हो चुका है और इसीलिए वह आज कोर्ट में 164 के तहत पीड़िता के बयान दर्ज कराने पर बाध्‍य हुई हैं अन्‍यथा कल तक तो वह दो-तीन दिन बाद बयान कराने की जिद पर अड़ी हुई थीं।
शासन के सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार कल जैसे ही खबरों तथा अन्‍य माध्‍यमों से सेक्रेट्री होम तथा डीजीपी को सारे घटनाक्रम का पता लगा वैसे ही उन्‍होंने जवाब तलब कर जल्‍द से जल्‍द बयान कराने और उसके बाद गिरफ्तारी सुनिश्‍चित करने को कहा जिससे पीड़िता या उसके परिवार पर दबाव बनाने का रास्‍ता बंद हो।
उल्‍लेखनीय है कि कल जब पीड़िता 161 के तहत अपने बयान दर्ज कराने एसएसपी ऑफिस पहुंची थी तो उसने एसएसपी से अपनी जान को खतरा बताते हुए सुरक्षा की मांग की थी, हालांकि एसएसपी ने उसके बाद भी उसे मात्र एक महिला सिपाही के साथ मेडीकल कराने जिला अस्‍पताल भेज दिया और कोर्ट में भी उसकी सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं किया।
बहरहाल, अब देखना यह है कि 161 के बयान, मेडीकल तथा अब 164 के बयान भी पूरे हो जाने के बाद एसएसपी मंजिल सैनी का अगला कदम क्‍या होता है... और क्‍या वह अब भी यही कहती रहेंगी कि जांच पूरी होने दीजिए, अगर उपमन्‍यु के खिलाफ लगाये गये आरोपों की पुष्‍टि होती है तो कार्यवाही जरूर होगी।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष

मंत्री बनते ही 500 गुना बढ़ गई इनकी दौलत!

लखनऊ। 
मंत्री बनने के बाद गायत्री प्रसाद प्रजापति अरबपति हो गए। उनकी संपत्ति 500 गुना से ज्यादा हो गई है। लोकायुक्त के पास की गई एक शिकायत में कहा गया है कि भूतत्व और खनिकर्म मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति ने जब विधानसभा चुनाव में नामांकन किया था तब उनकी संपत्ति 1.81 करोड़ रुपये थी। लोकायुक्त ने भी इसकी पुष्टि शुक्रवार को कर दी।
मंत्री बनने के बाद उन्होंने 942.57 करोड़ रुपये की संपत्ति खड़ी कर ली है। साक्ष्य के रूप में अमेठी, लखनऊ सदर और मोहनलालगंज में प्रजापति द्वारा अपने, अपने परिवारीजनों, रिश्तेदारों और करीबियों के नाम से जमीन की रजिस्ट्री के दस्तावेज लगाए गए हैं। लोक आयुक्त कार्यालय ने शिकायत दाखिल किए जाने की पुष्टि की है।
शिकायत प्रतापगढ़ के ओम शंकर द्विवेदी ने की है। शिकायत के साथ हाईकोर्ट के वकील अजय प्रताप सिंह राठौर ने अपना वकालतनामा लगाया है। उन्होंने 1725 पन्ने साक्ष्य के रूप में पेश किए हैं। शिकायतकर्ता के वकील का दावा है कि अभी तो केवल अमेठी, लखनऊ सदर व मोहनलालगंज में ही खरीदी गई जमीनों की रजिस्ट्री शिकायत के साथ संलग्न की गई है। जैसे-जैसे अन्य संपत्तियों का पता चलेगा, लोक आयुक्त को जानकारी दी जाएगी।
इस मामले को लेकर गायत्री प्रसाद प्रजापति ने अपनी सफाई पेश की है। प्रजापति का कहना है कि ये उनके राजनैतिक विरोधियों की साजिश है। लोग दूसरों की संपत्ति को भी मेरी बताकर आरोप लगा रहे हैं। अगर ये आरोप सही साबित हुए तो मैं राजनीति से सन्यास ले लूंगा।
शिकायतकर्ता का कहना है कि प्रजापति खुद तो एपीएल कार्डधारक हैं ही, जिनके नाम उन्होंने जमीनें खरीदी हैं, उनमें से भी कई एपीएल कार्डधारक हैं जिनकी सालाना आय 24 हजार रुपये से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। ऐसे में सवाल यह है कि इनके पास जमीनें खरीदने का पैसा कहां से आया?
लोक आयुक्त न्यायामूर्ति एन.के. मेहरोत्रा ने बताया कि भूतत्व एवं खनिकर्म मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति की शिकायत मिली है। दस्तावेज काफी हैं, अभी इसे देखा नहीं है। शिकायत का परीक्षण करने के बाद ही इस बारे में कु छ कहा जा सकता है।

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

IPL स्‍पॉट फिक्‍सिंग: धोनी ही हैं संदिग्‍ध Individual No 2

मुंबई। 
आईपीएल स्पॉट फिक्सिंग मामले में मुख्य संदिग्ध गुरुनाथ मयप्पन टीम इंडिया और आईपीएल टीम चेन्नई सुपर किंग्स के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी के होटल के कमरे में रोज जाते थे। मामले की जांच कर रही मुद्गल कमेटी की रिपोर्ट में जिस ‘Individual No 2’ का जिक्र है, वह कोई और नहीं बल्कि कप्तान धोनी हैं।
बता दें कि 5000 पन्नों की मुद्गल कमेटी की रिपोर्ट अभी तक सार्वजनिक नहीं हुई है। सिर्फ जस्टिस मुद्गल द्वारा तैयार 29 पेज की सिनॉप्सिस संबंधित लोगों को दी गई है। इसमें क्रिकेटर्स के नाम का जिक्र नंबर से है।
जस्टिस मुकुल मुद्गल की ओर से अप्वाइंट किए गए जांच कर्ता बीबी मिश्रा की चार महीने लंबी चली जांच की रिपोर्ट में पता चला है कि ‘Individual No 2’ के कमरे में सीधी पहुंच रखने वाला कोई एक शख्स था, तो वे थे गुरुनाथ मयप्पन। धोनी बीसीसीआई की एंटी करप्शन यूनिट की पाबंदियों की वजह से हर रोज सभी से उस होटल के बिजनेस सेंटर में मिलते थे, जहां टीम ठहरी होती थी। हालांकि, जांचकर्ताओं ने पाया कि मयप्पन धोनी के कमरे तक सीधी पहुंच रखते थे। वह रोजाना, यहां तक कि आईपीएल 6 के मैचों के दौरान भी धोनी से सीधे संपर्क में होते थे।
होटल स्टाफ से पूछताछ में हुआ खुलासा
कई टीम अधिकारी, खिलाड़ी और होटल स्टाफ से पूछताछ के बाद जांचकर्ता इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं। मयप्पन की धोनी के कमरे तक सीधी पहुंच सिर्फ इस वजह से थी क्योंकि उन्हें चेन्नई सुपर किंग्स के मालिक के तौर पर सभी से मिलाया गया था।
कोर्ट में दी थी अजीबोगरीब दलील
सुप्रीम कोर्ट में आईपीएल फिक्सिंग मामले में चल रही सुनवाई में बीसीसीआई के निर्वाचित प्रमुख और मयप्पन के रिश्तेदार एन श्रीनिवासन के वकील ने दलील दी थी कि मयप्पन को सट्‌टेबाजी में बड़ा नुकसान हुआ है। वकील के मुताबिक, अगर मयप्पन के पास अंदर की खबर होती तो उन्हें नुकसान नहीं होता लेकिन मुद्गल कमेटी के लिए जांच करने वाले मिश्रा की रिपोर्ट में पता चला है कि धोनी और मयप्पन रोजाना दो से तीन बार मिलते थे। मुद्गल कमेटी ने भले ही यह पाया हो कि मयप्पन वास्तव में सीएसके के अधिकारी थे और सट्‌टेबाजी में शामिल थे, श्रीनिवासन और टीम सीएसके ने जोर देकर कहा था कि मयप्पन का टीम के मामलों से कोई मतलब नहीं है और उन्हें टीम स्ट्रैटिजी की कोई जानकारी नहीं है।
-एजेंसी

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

अपने ही बिछाये जाल में फंस गये उपमन्‍यु !

मथुरा। 
लगता है कि पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु अपने ही बिछाये हुए जाल में फंस गये हैं। उपजा के प्रद्रेश उपाध्‍यक्ष, ब्रज प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष तथा मथुरा की छावनी परिषद् के पूर्व अध्‍यक्ष कमलकांत उपमन्‍यु ने पेशबंदी के लिए जिन लोगों का इस्‍तेमाल कर यौन उत्‍पीड़न पीड़िता के परिजनों पर दो मुकद्दमे कायम कराये हैं, उन दोनों के वादी उनके अपने ही चेले हैं और इसीलिए उन्‍होंने अपनी तहरीर में उपमन्‍यु के ऊपर बलात्‍कार का मुकद्दमा दर्ज कराने की साजिश का ज़िक्र किया।
उपमन्‍यु के बिछाये हुए जाल का खुलासा किसी और ने नहीं, फोटो खिंचाने के उनके उस जुनून ने ही कर दिया जिसके चलते वह हर दिन प्रमुख अखबारों की सुर्खियों का हिस्‍सा बनते रहे।
अब ज़रा इस खबर के साथ लगे फोटो पर गौर कीजिए। फोटो में चश्‍मा लगाये कमलकांत उपमन्‍यु के दाईं ओर (नीले घेरे में) खड़े व्‍यक्‍ति का नाम शिव कुमार शर्मा है और उसके बगल में लाल घेरे के अंदर खड़े व्‍यक्‍ति का नाम मुकेश शर्मा है। नटवर नगर निवासी ये दोनों वही लोग हैं जिन्‍होंने बलात्‍कार पीड़िता के परिजनों पर मुकद्दमे दर्ज कराये हैं।
ये फोटो तब का है जब कमलकांत के साथ ये दोनों लोग कहीं बाहर घूमने गये थे।
जाहिर है कि कमलकांत उपमन्‍यु का न केवल इनसे पुराना याराना है बल्‍कि इतने घनिष्‍ठ संबंध हैं कि साथ आना-जाना भी लगा रहता है। इस बात की पुष्‍टि इनके वो दूसरे फोटो भी करते हैं जिसमें शिव कुमार शर्मा की पुत्री व अन्‍य परिजन कमलकांत के साथ उत्‍तरांचल के एक धार्मिक स्‍थल की यात्रा करने गये थे और वहां धार्मिक क्रिया-कलापों एवं दान-पुण्‍य में सहभागिता करते दिखायी दे रहे हैं।
ऐसे में शिव कुमार शर्मा तथा मुकेश शर्मा द्वारा यौन उत्‍पीड़न की शिकार युवती के परिजनों पर अलग-अलग एफआईआर दर्ज कराने तथा उनमें कमलकांत उपमन्‍यु को किसी साजिश में फंसाने की आशंका ज़ाहिर करने का मकसद कोई भी समझ सकता है।
ये बात अलग है कि जो बात कोई सामान्‍य से सामान्‍य बुद्धि वाला व्‍यक्‍ति भी समझ सकता है, उसे न तो जिले की पुलिस कप्‍तान मंजिल सैनी ने समझा और न उनकी उस पुलिस ने जिसे जांच कर कार्यवाही करने का आदेश दिया गया था। स्‍पष्‍ट है कि कोई जांच की ही नहीं गई और बिना जांच किये ही पीड़िता के परिजनों पर दोनों मुकद्दमे दर्ज कर लिये गये।
उल्‍लेखनीय है कि इनमें से पहला मुकद्दमा भैंस बांधने को लेकर मारपीट करने का है तो दूसरा मुकद्दमा एक नाबालिग लड़की के साथ छेड़छाड़ करने तथा शिकायत करने पर तेजाब फेंककर जला देने की धमकी देने का है।
इन मुकद्दमों का सच और उसके पीछे छिपा मकसद सामने आने के बाद अब पीड़िता की तहरीर पर एसएसपी मंजिल सैनी की कथित जांच का सच भी सामने आ गया है और उस उद्देश्‍य का भी खुलासा हो गया है जिसके लिए वह यौन उत्‍पीड़न की शिकार युवती को न्‍याय दिलाने में अब तक हील-हुज्‍जत कर रही हैं।
पुलिस कप्‍तान साहिबा क्‍या अब भी यह कहेंगी कि कमलकांत उपमन्‍यु के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने में उन्‍होंने अनावश्‍यक देरी नहीं की और पीड़िता के परिजनों पर दो-दो मुकद्दमे दर्ज कराने के पीछे एकमात्र मकसद उन्‍हें भयभीत करना तथा कमलकांत उपमन्‍यु को उन पर दबाव बनाने के लिए मौका देना ही था।
आश्‍चर्य होता है इस बात पर कि एक युवा महिला पुलिस अधिकारी किसी दूसरी युवती के साथ हुए अत्‍याचार को लेकर इतनी संवेदनाहीन हो जाए और आरोपी को बचाने के लिए उसका पूरा-पूरा साथ दे।
यही नहीं, एफआईआर दर्ज हो जाने के बावजूद अब तक न तो पीड़िता के बयान दर्ज़ कराये गये और न मेडीकल कराना जरूरी समझा।
पीड़िता के अधिवक्‍ता प्रदीप राजपूत का कहना है कि इस नये खुलासे के बाद भी पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु की गिरफ्तारी न होना साफ करता है कि जांच अधिकारी व इलाका पुलिस एसएसपी के दबाव में है और इस कारण उसे पीड़ित पक्ष पर दबाब बनाने का पूरा अवसर मिल रहा है।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष
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