मंगलवार, 21 अप्रैल 2015

…न ब्रूयात सत्यम् अप्रियं, बट…बोलना पड़ता है

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जस्‍टिस और भारतीय प्रेस परिषद के पूर्व अध्‍यक्ष मार्कण्‍डेय काटजू कितना सत्‍य बोलते हैं, इसका तो कोई पैमाना मेरे पास नहीं है किंतु इतना जरूर है कि वो सार्वजनिक रूप से जो कुछ बोलते हैं, वह समाज के एक बड़े तबके को ‘प्रिय’ नहीं लगता। अलबत्‍ता उनके अपने ब्‍लॉग का नाम ‘सत्‍यम् ब्रूयात’ है। और संस्‍कृत के जिस श्‍लोक का यह हिस्‍सा है, उसकी पहली पंक्‍ति के पूरे शब्‍द हैं-  सत्यम् ब्रूयात प्रियं ब्रूयात, न ब्रूयात सत्यम् अप्रियं।
बहरहाल, जस्‍टिस काटजू की अपने देशवासियों को लेकर की गई इस आशय की टिप्‍पणी कि ”अधिकांश भारतीय मूर्ख हैं”, कभी-कभी उचित प्रतीत होती है। हालांकि उनके अतिशयोक्‍ति पूर्ण बयानों से हर वक्‍त सहमत नहीं हुआ जा सकता।
फिलहाल बात करें दो-तीन दिनों से चल रहे उस राजनीतिक घटनाक्रम की जिसके तहत एक ओर सत्‍तापक्ष तथा दूसरी ओर विपक्ष की चकल्‍लस सड़क से लेकर संसद तक जारी है, तो साफ-साफ महसूस होता है कि मुठ्ठीभर लोग किस तरह पूरे देश को मूर्ख बना रहे हैं और देशवासी मूर्ख बन भी रहे हैं। देशवासियों की छोड़िये, वह मीडिया भी उस बहस का हिस्‍सा बना हुआ है जो पूरी तरह निरर्थक साबित हो रहा है और जिसका एकमात्र मकसद वो खेल खेलना है जिसमें न कभी उसकी हार होती है न जीत। जिसमें हारती है तो सिर्फ और सिर्फ जनता क्‍योंकि वह स्‍वतंत्रता प्राप्‍त होने से लेकर आज तक लगातार हारती रहने की आदी हो चुकी है।
हम बात कर रहे हैं उस भूमि अधिग्रहण बिल की जिसे लाई तो थी मनमोहन सिंह के नेतृत्‍व वाली यूपीए सरकार किंतु जिसे कुछ संशोधनों के साथ पास कराना चाहती है नरेंद्र मोदी के नेतृत्‍व वाली एनडीए सरकार।
अब तमाशा देखिये…कांग्रेस कहती है कि बिल में किये गये संशोधन किसान विरोधी और उद्यमियों के हित में हैं जबकि मोदी सरकार कहती है कि किसानों के हित में इससे बेहतर बिल दूसरा कोई हो ही नहीं सकता।
संसद का पहला सत्र इसी बहस की भेंट चढ़ गया और वर्तमान सत्र से ठीक पहले कांग्रेस ने करीब दो महीने की छुट्टियां बिताकर लौटे राहुल गांधी को एक मर्तबा फिर किसान रैली की आड़ लेकर आकर्षक पैक के साथ लांच किया।
अपनी इस री-लांचिंग में राहुल खूब बोले, और जमकर बोले। करीब-करीब उसी अंदाज में जिस अंदाज में वह कांग्रेस के अघोषित नेता माने जाने से लेकर बोलते रहे हैं। मोदी सरकार को निशाने पर रखा तथा यूपीए सरकार का गुणगान किया।
यह बात अलग है कि कुछ मीडिया तत्‍वों को उनमें विपश्‍यना करके लौटने से उपजा तथाकथित बदलाव नजर आया और उनकी बॉडी लैंग्‍वेज पहले के मुकाबले अधिक प्रभावशाली दिखाई दी। सोनिया और मनमोहन ने भी एक अर्से बाद अपने मुंह का अवकाश समाप्‍त किया और मोदी सरकार पर यथासंभव तीर चलाए किंतु किसी ने यह बताकर नहीं दिया कि यूपीए सरकार द्वारा तैयार किये गये भूमि अधिग्रहण बिल में मोदी सरकार ने ऐसे कौन से बदलाव कर दिये कि पूरा बिल किसानों के लिए अचानक अमृत से जहर बन गया।
इधर उनसे भी पहले मोदी जी ने अपने सांसदों की क्‍लास में भूमि अधिग्रहण बिल पर कोई समझौता न करने तथा उसकी खूबियां जनता की बीच जाकर बताने का पाठ पढ़ाया किंतु वह कौन सी खूबियां हैं जिन्‍हें सांसदों को जनता के बीच जाकर बताना है, यह नहीं बताया। अब या तो मोदी जी की कक्षा के छात्र (सांसद) सर्वज्ञ होते हुए मौनव्रत धारण किये हुए हैं अथवा मोदी जी की बात उन्‍हें मनमोहन, सोनिया तथा राहुल की तरह समझ में नहीं आ रही।
मोदी जी स्‍वयं और उनके मंत्री लगातार यह कह जरूर रहे हैं कि वह जनता के बीच जाकर नये भूमि अधिग्रहण बिल की खूबियां बतायेंगे किंतु बता कोई नहीं रहा। पता नहीं इसके लिए वह किस मुहूर्त का इंतजार कर रहे हैं।
कुल मिलाकर सत्‍ता पक्ष और विपक्ष राजनीति की बिसात पर किसान-किसान खेल रहा है किंतु कोई यह बताने को तैयार नहीं कि भूमि अधिग्रहण बिल की खूबियां हैं तो क्‍या हैं…और खामियां हैं तो कौन-कौन सी हैं। इस बिल को लेकर कोई किताब ऐसी बाजार में मिल नहीं रही, जिसे पढ़कर किसान या आम जनता यह समझ सके कि सच कौन बोल रहा है और झूठ कौन।
किसान अगर कर रहा है तो केवल इतना कि या तो तथाकथित रूप से आत्‍महत्‍या कर रहा है या फिर तथाकथित सदमे में मर रहा है। इस सबके अलावा वह कुछ कर रहा है तो कांग्रेस की किसान रैली में जाकर हरियाणा कांग्रेस की गुटबाजी का हिस्‍सा बन रहा है। कुछ किसान गुलाबी पगड़ी बांधकर हरियाणा कांग्रेस के प्रदेश अध्‍यक्ष अशोक तंवर के खिलाफ हूटिंग करने गये थे तो कुछ सतरंगी पगड़ी के साथ हरियाणा के पूर्व मुख्‍यमंत्री भूपेन्‍द्र सिंह हुड्डा की ताकत का अहसास कराने पहुंचे थे। अब इन ”पेड किसानों” का किस तरह भूमि अधिग्रहण बिल के अच्‍छे या बुरे होने से कोई ताल्‍लुक हो सकता है, यह बात शायद ही किसी को समझ में आ पाये।
यूं भी किसी राजनीतिक दल की रैली में शिरकत करने वाले लोग उसी पार्टी के अंधभक्‍त होते हैं, यह अब कोई छिपी हुई बात नहीं रह गई। दूसरे कुछ लोग अगर होते हैं तो वो जो दिहाड़ी डायटिंग तथा फ्री ट्रेवलिंग कराकर लाये ले जाये जाते हैं। ऐसे लोगों को किसान कहना, किसानों की तौहीन है। हां…इन्‍हें राजनीतिक पार्टियों के ”किसान मोहरे” कहा जा सकता है जो ”माउथ प्रचार” के जरिये अपनी पार्टी या अपने नेता का स्‍तुतिगान करते हैं। लगभग उसी अंदाज में जिस अंदाज में कभी ”भांड़” अपने राजा-महाराजाओं की विरुदावली गाया करते थे। ऐसे भांड़ों का 21 वीं सदी वाला संसदीय संस्‍करण आज भी हर राजनीतिक पार्टी के पास मौजूद है और बखूबी अपने काम को अंजाम दे रहा है। फिर चाहे वह कोई राष्‍ट्रीय पार्टी हो या क्षेत्रीय। माया, मुलायम, ममता और जयललिता से लेकर अरविंद केजरीवाल तथा अखिलेश यादव तक के पास अपने-अपने निजी भांड़ हैं।
यूं भी जिस देश में हर कोई किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़ा है और कमोबेश देश की पूरी आबादी दलगत राजनीति की शिकार है, उस देश में निजी सोच रखने वालों को पूछता ही कौन है। उनकी तादाद इतनी अधिक कम है कि उन्‍हें देश की आबादी का हिस्‍सा या देश का नागरिक तक मानने को कोई आसानी से तैयार नहीं होता लिहाजा उनकी आवाज़ नक्‍कारखाने की तूती बन कर रह गई है।
दलगत राजनीति के चंगुल में लोग इस कदर फंस चुके हैं कि उन्‍हें अपने परिवार के सदस्‍यों का जन्‍मदिन याद हो या न हो लेकिन पार्टी के नेता का जन्‍मदिन कभी नहीं भूलते। अपने पिता को कोई गाली देकर चला जाए, कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन नेताजी की शान में किसी ने गुस्‍ताख़ी कर दी तो जान देने और लेने पर आमादा हो जाते हैं।
कांग्रेस को केंद्र की सत्‍ता पर रहते किसानों के लिए कुछ अच्‍छा स्‍थाई काम करने के लिए पूरे दस साल कम पड़ गये थे और मोदी सरकार के लिए दस महीने बहुत ज्‍यादा हो गये। इस बात का जवाब क्‍या किसी के पास है?
यदि यह मान भी लिया जाए कि मोदी सरकार का भूमि अधिग्रहण बिल किसान विरोधी तथा उद्यमियों के हित में है, तो उसे सामने आने दीजिए। ठीक उसी तरह जैसे समय के साथ कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स, टूजी स्‍पेक्‍ट्रम तथा कोलगेट घोटाले का सच सामने आ ही गया जबकि यूपीए सरकार ने इन सब को पूरी तरह झुठलाने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी।
चुनाव कोई कुंभ के मेले की तरह तो हैं नहीं, अगले पांच साल बाद फिर होने हैं। तब मोदी जी की सरकार का जनता खुद-ब-खुद वही हाल कर देगी जो आज कांग्रेस का कर रखा है। पांच साल के लिए उन्‍हें स्‍पष्‍ट जनादेश मिला है तो उससे पहले आप उन्‍हें सत्‍ता से च्‍युत कर नहीं सकते। फिर इतनी निम्‍न स्‍तरीय राजनीति का मतलब क्‍या है।
मतलब साफ है, कांग्रेस हो या भाजपा…सपा हो या बसपा…राजद हो या बीजद…सबके नेता जानते हैं कि मार्कण्‍डेय काटजू का कथन ही अंतिम सत्‍य है। वह उनके कथन पर राजनीति बेशक कर लें किंतु सच्‍चाई पर उन्‍हें भी तनिक शक नहीं है। वह जानते हैं कि जो जनता आज भी आसाराम बापू, नारायण साईं, स्‍वामी नित्‍यानंद तथा शिवानंद तिवारी जैसे दुराचारियों को संत मान रही है और जो लोग आज भी सहाराश्री की चिटफंड कंपनी में पैसा जमा कर रहे हैं, जिनके लिए देश में हुए खरबों के घोटाले कोई मायने नहीं रखते, जिनकी अंधभक्‍ति किसी तर्क अथवा तथ्‍य को मानने के लिए तैयार नहीं होती, उन्‍हें भेड़ की तरह हांकना कोई मुश्‍किल काम नहीं।
कोई भी राजनीतिक दल, चाहे वह क्षेत्रीय हो या राष्‍ट्रीय…सत्‍ता से बेदखल होते ही इस कवायद में लग जाता है कि अपने अंधभक्‍तों की आंखों पर चढ़े चश्‍मे का रंग हर हाल में बरकरार रखा जाए। चाहे किसी भूमि अधिग्रहण बिल के जरिये और चाहे किसान रैली के जरिए। चाहे संसद के अंदर से, चाहे संसद के बाहर बैठकर…अंधभक्‍तों का अपने पक्ष में ”ब्रेनवॉश” करते रहना जरूरी है क्‍योंकि सत्‍ता की कुंजी वही लोग हैं। इसीलिए तो भाजपा ने सत्‍ता पर काबिज होने के साथ अपने अंधभक्‍तों की संख्‍या का विश्‍व रिकॉर्ड बनाने जैसे महत्‍वपूर्ण कार्य को अंजाम तक पहुंचाया। भाजपा हो या कांग्रेस…या कोई भी अन्‍य पार्टी…सभी के नेता जानते हैं कि उनका वोटर ही उन्‍हें सत्‍ता तक पहुंचाता है, विपक्षी अंधभक्‍तों के मत उन्‍हें कभी नहीं मिलने वाले। शिखर तक पहुंचाने में दिमाग से दिवालिया दलगत राजनीति के शिकार ही निर्णायक साबित होते हैं, विचारवान बुद्धिजीवी नहीं। वह उनकी दृष्‍टि में किसी खेत की मूली नहीं हैं।
यही कारण है कि स्‍वतंत्र भारत में सत्‍ता का स्‍वाद बारी-बारी से चखा जाता रहा है। यह बात अलग है कि किसी को समय ज्‍यादा मिला और किसी को कम। किंतु सत्‍ता हमेशा ऐसे तत्‍वों के हाथ में रही जिन्‍हें फिरंगियों की कार्बन कॉपी कह सकते हैं। इतना कहने में आपत्‍ति हो तो यह जरूर कह सकते हैं कि पिछले 67 सालों में किसी सत्‍ता ने कभी ऐसा कुछ महसूस नहीं कराया जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि वाकई यह देश स्‍वतंत्र हो चुका है और लोकतंत्र को सही-सही परिभाषित करने वाली सरकार काम कर रही है। यानि जनता के द्वारा चुनी गई, जनता के लिए, जनता की सरकार।
आज तक जितनी भी सरकारें रहीं हैं, फिर चाहे वह केंद की हों या राज्‍यों की, गठबंधन की रही हों, या स्‍पष्‍ट बहुमत वाली…एक दल की रही हों या अनेक दलों की…सबका आचरण समय के साथ रंग बदलता रहता है। विपक्ष में रहते उनके रंग-ढंग कुछ और रहते हैं तथा सत्‍ता हासिल होते ही कुछ और हो जाते हैं। गिरगिट भी फिर इनके आचरण के सामने कुछ नहीं रह जाता।
जाहिर है कि न तो कांग्रेस कुछ अजूबा कर रही है और न भाजपा या उसके साथ सत्‍ता का स्‍वाद चख रहे उसके सहयोगी दल। सब वही कर रहे हैं जो स्‍वतंत्र भारत की राजनीति अब तक करती रही है।
मार्कण्‍डेय काटजू को हम सनकी कह सकते हैं, आत्‍ममुग्‍ध कह सकते हैं, बड़बोला या अभिमानी बता सकते हैं…यह भी आरोप लगा सकते हैं कि वह मीडिया की सुर्खियों में रहने के लिए ऊट-पटांग बयान देने तथा अनर्गल बोलते रहने के आदी हैं किंतु इन सारी बातों को स्‍वीकार कर लेने के बावजूद कहीं न कहीं उनका यह कथन एकबार सोचने पर बाध्‍य अवश्‍य कर देता है कि क्‍या वाकई देश की अधिकांश जनता मूर्ख है।
खासतौर पर ऐसे समय जरूर उनका कथन विचार करने पर मजबूर कर देता है जब कोई नेता अपनी बेतुकी बातों, कुतर्कों, निरर्थक आरोप एवं प्रत्‍यारोपों, अभद्र भाषा-शैली वाले भाषणों तथा बेहूदी बयानबाजी के बावजूद तालियां बटोर लेता है तथा शत-प्रतिशत निजी स्‍वार्थों की पूर्ति यानि सत्‍ता हथियाने अथवा सत्‍ता बरकरार रखने के लिए चिलचिलाती धूप, तेज बारिश, आंधी-तूफान या कड़कड़ाती ठंड में लाखों लोगों को एकत्र कर पाता है। वो भी मात्र इसलिए कि उसे आपको मूर्ख बनाना है। यह जानते हुए कि वह आपके लिए कुछ नहीं कर सकता।
यह भी जानते हुए कि उसके पास अकूत दौलत है, बेहिसाब ताकत है, दुनिया भर में शौहरत है।
यह जानते व समझते हुए कि सड़क से संसद तक कुत्‍ते-बिल्‍लियों की भांति जन्‍मजात दुश्‍मन दिखाई देने वाले तथा एक दूसरे पर गुर्राते नजर आने वाले कैमरा ऑफ होते ही एक दूसरे की कुशलक्षेम किसी सहोदर की तरह पूछते हैं। ऑन रिकार्ड इनकी सूरत व सीरत कुछ और होती है तथा ऑफ रिकॉर्ड कुछ और।
हो सकता है कि मार्कण्‍डेय काटजू के कथन में मूर्खों की जमात का प्रतिशत आंशिक रूप से कुछ ऊपर-नीचे हो, किंतु बहुत ज्‍यादा नहीं है।
स्‍वतंत्र भारत से लेकर आज तक की राजनीति और राजनेताओं की सफलता का प्रतिशत तो यही बताता है।
यदि कभी इस बिंदु पर विचार न किया हो तो अब करके देखें, हो सकता है कि खुद आपको भी अहसास हो कि आप अब तक उसी जमात का हिस्‍सा बने हुए हैं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 18 अप्रैल 2015

50 वर्ष की लाइफ वाला ओवरब्रिज 50 दिनों से पहले ही हुआ ध्‍वस्‍त

-लोकार्पण से पहले ही सड़क का एक हिस्‍सा टूटकर गिरा
-पूरे ओवरब्रिज पर जगह-जगह पड़ी दरारें
-विद्युत कार्य की आड़ में आवागमन बंद करके सेतुनिगम करा रहा है मरम्‍मत कार्य
-निगम का कोई अधिकारी मुंह खोलने को तैयार नहीं
-एकसाथ सैंकड़ों जिंदगियां कभी भी पड़ सकती हैं खतरे में
50-year life overbridge is dismantled in only 50 daysसैंकड़ों जिंदगियां गंवाने के बाद कृष्‍ण की नगरी में उसकी पावन जन्‍मस्‍थली के निकट रेलवे क्रॉसिंग पर जब ओवरब्रिज बनने का रास्‍ता साफ हुआ तो उम्‍मीद की जा रही थी कि अब न केवल लोगों की जान का जोखिम खत्‍म हो जायेगा बल्‍कि आवागमन भी सुगम होगा।
लेकिन अब जबकि गोविंद नगर स्‍थित रेलवे क्रॉसिंग पर यह ओवरब्रिज बनकर तैयार हो चुका है तो पता लग रहा है कि इसके कारण तो खतरा और बढ़ गया है तथा सैंकड़ों जिंदगियां कभी भी एकसाथ खत्‍म हो सकती हैं।
उत्‍तर प्रदेश राज्‍य सेतु निगम द्वारा बनाया गया उक्‍त ओवरब्रिज आवागमन के लिए विधिवत खोले जाने से पूर्व ही ध्‍वस्‍त होने लगा है और उसमें जगह-जगह पड़ चुकी दरारें यह बता रही हैं कि यह किसी भी दिन बड़े हादसे का कारण बन सकता है।
50-year life overbridge is dismantled in only 50 days
ओवरब्रिज के ऊपर काली पॉलीथिन डालकर मरम्‍मत कार्य करते सेतु निगम कर्मचारी
गौरतलब है कि देश के सर्वाधिक व्‍यस्‍त और सबसे अधिक तीव्र गति वाले रेल मार्ग पर बने गोविंद नगर ओवरब्रिज का लोकार्पण पिछले महीने प्रदेश के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव को करना था। अखिलेश यादव मथुरा आये भी किंतु वह दूसरे कार्यक्रमों में व्‍यस्‍तता के चलते इस ओवरब्रिज का लोकार्पण नहीं कर सके लिहाजा इसे अनौपचारिक तौर पर आवागमन के लिए खोल दिया गया।
चूंकि यह ओवरब्रिज नेशनल हाईवे नंबर- 2 को कृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली से जोड़ता है और कृष्‍ण जन्‍मस्‍थली के दर्शनार्थ प्रतिदिन हजारों की संख्‍या में देशी-विदेशी लोग यात्री बसों से अथवा निजी वाहनों से आते हैं अत: इस ओवरब्रिज के खुलते ही इस पर वाहनों का आवागमन शुरू हो गया।
इस पर बेफिक्र होकर दौड़ रहे वाहन चालकों को इस बात का इल्‍म तक नहीं हुआ कि भ्रष्‍टाचार के गारे से बने करीब 50 वर्ष की लाइफ वाले इस ओवरब्रिज ने तो 50 दिन में ही सेतु निगम की असलियत बता कर रख दी।
ओवरब्रिज की सड़क का एक हिस्‍सा जहां टूटकर गिर गया वहीं कई स्‍थानों पर दरारें आ गईं। ऐसे में सेतु निगम के स्‍थानीय प्रोजेक्‍ट मैनेजर तथा अभियंताओं के माथे पर बल पड़ना स्‍वाभाविक था।
करोड़ों की लागत से बने करीब 900 मीटर लंबे इस ओवरब्रिज की खामियां तथा अपना भ्रष्‍टाचार छिपाने के लिए सेतु निगम के स्‍थानीय अधिकारियों ने आनन-फानन में ओवरब्रिज पर ”सावधान! विद्युत कार्य प्रगति पर है” का ”स्‍टॉपर” लगाकर आवागमन बंद कर दिया और जहां से ओवरब्रिज की सड़क ध्‍वस्‍त हुई थी उसकी मरम्‍मत का कार्य शुरू कर दिया।
बड़ी चालाकी के साथ टूटी हुई सड़क के ऊपर काले रंग की मोटी पॉलीथिन बिछा दी गई और उसके ऊपर बिजली के तारों के बंडल रख दिये गये ताकि किसी को शक न हो। पॉलीथिन के निकट कुछ इस अंदाज में त्रिपाल की तरह कपड़ा डालकर काम किया जाने लगा जैसे धूप से बचाव किया जा रहा हो।
दरअसल इस सब की आड़ में ओवरब्रिज के नीचे की ओर काफी बड़े हिस्‍से पर लोहे की शटरिंग लगाकर और उसे नटबोल्‍ट आदि से कसकर दुरुस्‍त करने का प्रयास किया जा रहा था।
50-year life overbridge is dismantled in only 50 days
ओवरब्रिज की सड़क पर नीचे की ओर लगाई गई शटरिंग जिसे क्‍लेंप (लाल घेरे में) से कसकर टिकाया हुआ है।
”लीजेण्‍ड न्‍यूज़” को जब सेतु निगम के इस कारनामे की जानकारी हुई तो सबसे पहले मौके पर जाकर अधिकारियों द्वारा की जा रही लीपापोती के फोटोग्राफ्स लिये और फिर पूरे मामले की जानकारी करने का प्रयास किया।
ओवरब्रिज पर मरम्‍मत कार्य करा रहे सेतु निगम के कर्मचारी द्वारा सूचित किये जाने पर कोई वीरेन्‍द्र नामक अभियंता और उनके साथ आये किन्‍हीं सिंह साहब और शर्मा जी ने अधिकृत रूप से अपना वक्‍तव्‍य देने में तो खुद को असमर्थ बताया लेकिन इतना कहा कि बेमौसम हुई बारिश के कारण ओवरब्रिज क्षतिग्रस्‍त हुआ है। हम उसे ठीक करने में लगे हैं। जल्‍द ही ठीक हो जायेगा।
यह पूछे जाने पर कि 50 वर्ष की मियाद वाला ओवरब्रिज 50 दिन से पहले ही कैसे क्षतिग्रस्‍त हो सकता है जबकि उसके निर्माण में बारिश आदि के होने का ध्‍यान तो रखा गया होगा, वह कोई उत्‍तर नहीं दे सके।
उनके द्वारा यह जरूर बताया गया कि कोई आरके सिंह इस ओवरब्रिज के प्रोजेक्‍ट मैनेजर हैं जो आगरा बैठते हैं और यहां आते-जाते रहते हैं। प्रोजेक्‍ट मैनेजर आरके सिंह का न तो उन्‍होंने कोई कॉन्‍टेक्‍ट नंबर बता कर दिया और ना बात कराना जरूरी समझा। हां, इस आशय का अनुरोध अवश्‍य करते रहे कि ज्‍यादा बड़ा मामला नहीं है, आप इसे इतनी गंभीरता से न लें।
विधिवत लोकार्पण होने से पहले ही तथा एक माह के अंदर हुए ओवरब्रिज के इस हाल की पुनरावृत्‍ति आगे नहीं होगी, इस बात की क्‍या गारंटी है और यह किसी बड़े हादसे का कारण नहीं बनेगा, इसकी जिम्‍मेदारी कौन लेगा, इन शंकाओं के बारे में सेतु निगम के इन अधिकारी व कर्मचारियों के पास कहने को कुछ नहीं था।
यहां यह जान लेना और जरूरी है कि सेतु निगम की यही टीम मथुरा में यमुना नदी पर बने पुराने पुल की मियाद खत्‍म हो जाने के कारण अब नये पुल का निर्माण कर रही है। यह पुल गोविंद नगर रेलवे क्रॉसिंग पर बने पुल से काफी लंबा बनना है और उससे कई गुना अधिक लागत में बनना है।
समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव संभवत: सही कहते हैं कि अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों का ध्‍यान सिर्फ कमीशनखोरी पर है इसलिए न तो जनभावना के अनुरूप काम हो पा रहे हैं और न उत्‍तर प्रदेश सरकार की छवि सुधर पा रही है।
आश्‍चर्य की बात यह है कि सेतु निगम ने यह कारनामा तब कर दिखाया जब खुद मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव मथुरा जैसी विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक जगह के विकास कार्यों में स्‍वयं रुचि ले रहे हैं और चाहते हैं कि 2017 में होने वाले विधानसभा चुनावों के दौरान यहां कम से कम उनकी पार्टी का खाता तो खुल जाए।
एक अन्‍य आश्‍चर्य की बात यह है कि माननीय मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव के चाचा और सपा मुखिया मुलायम सिंह के भाई शिवपाल सिंह यादव ही सेतु निगम के चेयरमैन हैं और वो भी अक्‍सर मथुरा आते रहते हैं। किंतु लाखों लोगों की आंखों में धूल झोंककर भ्रष्‍टाचार करने में माहिर सेतु निगम के अधिकारियों को उनकी आंखों में धूल झोंकते परेशानी क्‍यों होने लगी।
50 वर्ष की लाइफ वाले ओवरब्रिज का 50 दिनों से पहले ही क्षतिग्रस्‍त हो जाने पर अन्‍य तकनीकी जानकारों का कहना है कि इसका एकमात्र कारण मानक के अनुरूप निर्माण सामग्री का इस्‍तेमाल न किया जाना और उसके अनुपात में भारी हेरफेर किया जाना ही होता है। दूसरे किसी कारण से कोई ओवरब्रिज इतने कम समय में क्षतिग्रस्‍त हो ही नहीं सकता।
अब सवाल यह पैदा होता है कि 50 साल की लाइफ वाला जो ओवरब्रिज लोकार्पण से पहले ही एक महीने के अंदर क्षतिग्रस्‍त हो गया, उसे कितने समय तक और कैसे उपयोगी बनाये रखा जा सकता है?
सवाल यह भी है कि जिस तरह लीपापोती करके और सरकार से लेकर आमजन तक की आंखों में धूल झोंककर इसे उपयोगी बनाने का प्रयास किया जा रहा है, क्‍या उस तरह यह किसी भी दिन एकसाथ सैंकड़ों लोगों की जिंदगी के लिए खतरे का कारण नहीं बन जायेगा?
सवाल बहुत हैं किंतु जवाब देने वाला कोई नहीं। सेतु निगम के अधिकारी व कर्मचारी तो अपना मुंह सिलकर बैठे हुए हैं।
अब देखना सिर्फ यह है कि सीमेंट, बजरी, लोहे और कंक्रीट के साथ भारी भ्रष्‍टाचार के गारे से गोविंदनगर रेलवे क्रॉसिंग पर बना यह ओवरब्रिज मरम्‍मत के सहारे कितने दिन चलता है और कितने बड़े हादसे का कारण बन पाता है।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2015

नेहरू ने बोस परिवार की 20 साल करवाई थी जासूसी!

इंटेलिजेंस ब्यूरो की दो फाइल्स से साफ हुआ है कि जवाहरलाल नेहरू सरकार ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परिजनों की 20 साल तक जासूसी करवाई थी। इंग्लिश न्यूज़ पेपर मेल टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक ये फाइल्स नेशनल आर्काइव्स में हैं। इनसे पता चलता है कि 1948 से लेकर 1968 तक लगातार बोस के परिवार पर नजर रखी गई थी। इन 20 सालों में से 16 सालों तक नेहरू प्रधानमंत्री थे और आईबी सीधे उन्हें ही रिपोर्ट करती थी।
ब्रिटिश दौर से चली आ रही जासूसी को इंटेलिजेंस ब्यूरो ने बोस परिवार के दो घरों पर नजर रखते हुए जारी रखा था। कोलकाता के 1 वुडबर्न पार्क और 38/2 एल्गिन रोड पर निगरानी रखी गई थी। आईबी के एजेंट्स बोस परिवार के सदस्यों के लिखे या उनके लिए आए लेटर्स को कॉपी तक किया करते थे। यहां तक कि उनकी विदेश यात्राओं के दौरान भी साये की तरह पीछा किया जाता था।
एजेंसी यह पता लगाने की इच्छुक रहती थी कि बोस के परिजन किससे मिलते हैं और क्या चर्चा करते हैं। यह सब किस वजह से किया जाता, यह तो साफ नहीं है मगर आईबी नेताजी के भतीजों शिशिर कुमार बोस और अमिय नाथ बोस पर ज्यादा फोकस रख रही थी। वे शरत चंद्र बोस के बेटे थे, जो कि नेताजी के करीबी रहे थे। उन्होंने ऑस्ट्रिया में रह रहीं नेताजी की पत्नी एमिली को भी कई लेटर लिखे थे।
अखबार से बातचीत में नेता जी के पड़पौत्र चंद्र कुमार बोस ने कहा, ‘जासूसी तो उनकी की जाती, जिन्होंने कोई क्राइम किया हो। सुभाष बाबू और उनके परिजनों ने देश की आजादी की लड़ाई लड़ी है। कोई उन पर किसलिए नजर रखेगा?’
पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज अशोक कुमार गांगुली ने मेल टुडे से बात करते हुए कहा, ‘हैरानी की बात यह है कि जिस शख्स ने देश के लिए सब कुछ अर्पित कर दिया, आजाद भारत की सरकार उसके परिजनों की जासूसी कर रही थी।’
बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता एम. जे. अकबर ने अखबार से बातचीत में कहा कि इस जासूसी की एक ही वजह हो सकती है। उन्होंने कहा, ‘सरकार को पक्के तौर पर नहीं पता था कि बोस जिंदा हैं या नहीं। उसे लगता था कि वह जिंदा हैं और अपने परिजनों के संपर्क में हैं। मगर कांग्रेस परेशान क्यों थी? नेताजी लौटते तो देश उनका स्वागत ही तो करता। यही तो वजह थी डर की। बोस करिश्माई नेता थे और 1957 के चुनाव में उन्होंने कांग्रेस को कड़ी चुनौती दी होती। यह कहा जा सकता है कि अगर बोस जिंदा होते तो जो काम 1977 में हुआ, वह 15 साल पहले ही हो जाता।’
आईबी की फाइल्स को बहुत कम ही गोपनीय दस्तावेजों की श्रेणी से हटाया जाता है। ऑरिजनल फाइल्स अभी भी पश्चिम बंगाल सरकार के पास हैं। अखबार का कहना है कि ‘इंडियाज़ बिगेस्ट कवर-अप’ के लेखक अनुज धर ने इस साल जनवरी में इन फाइल्स को नेशनल आर्काइव्ज़ में पाया था। उनका मानना है कि इन फाइल्स को गलती से गोपनीय की श्रेणी से हटा दिया गया होगा।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़

गुरुवार, 9 अप्रैल 2015

हीरा (धोखा) है सदा के लिए

दूध, दही, घी और मावा (खोआ) ही नहीं, आभूषणों में जड़ा हीरा भी है सिंथेटिक
कहावत के तौर पर बताते हैं कि इस देश में कभी दूध-दही की नदियां बहती थीं। आशय यह है कि यहां दूध दही प्रचुर मात्रा में था। अब इसे ज्‍यामितीय विधि से बढ़ती जनसंख्‍या का दबाव कहें या गाय-भैंस जैसे दुधारू पशुओं की दिन-प्रतिदिन घटती तादाद कि दूध-दही ही नहीं, उससे बनने वाले सभी सामान का अभाव है लिहाजा सिंथेटिक यानि मिलावटी अथवा नकली उत्‍पाद की भरमार है। दूध में मिलावट का आलम तो यह है कि सुप्रीम कोर्ट तक को इसमें दखल देकर कहना पड़ा कि मिलावटी दूध की बिक्री हर हाल में रोकी जाए। इस सब के बावजूद आज भी बाजार में सिंथेटिक दूध, दही, घी, मावा (खोआ) तथा पनीर सहित दूध से बनने वाले अनेक उत्‍पाद सिंथेटिक बिक रहे हैं जबकि वो बहुत सी जानलेवा बीमारियों के कारक हैं।
खैर…यह तो बात हो गई दूध व दूसरे दुग्‍ध उत्‍पादों की, लेकिन हम आज आपको बता रहे हैं एक ऐसे बेशकीमती पदार्थ की जिसके आकर्षण से शायद ही कभी कोई अछूता रह पाया हो। जिस किसी के पास थोड़ी सी संपन्‍नता आई, वह सबसे पहले उसे पाने की चाहत रखता है। फिर वह चाहे कोई स्‍त्री हो या पुरुष।
जी हां! हम बात कर रहे हैं हीरे की। हीरा और उससे जड़े आभूषणों की। उस हीरे की जिसके लिए विज्ञापन में कहा जाता है- ”हीरा है सदा के लिए”।
अब हम आपको हीरे से जुड़ी वह सच्‍चाई बताने जा रहे हैं जिसे आप न तो जानते हैं और न जान सकते हैं। कर सकते हैं तो केवल इतना कि हीरे के आकर्षण को छोड़कर ठगाई से बच सकते हैं।
आपको यह जानकर आश्‍चर्य होगा कि दूध और दूध से बने उत्‍पादों तथा तमाम खाद्य सामग्रियों की तरह वह हीरा भी आपको सिंथेटिक ही बेचा जा रहा है जिसे असली बताकर प्रति रत्‍ती के हिसाब से आपकी जेब तराशी जाती है। कहते हैं कि असली हीरे की धार बहुत तेज होती है, किंतु सर्राफा व्‍यवसाई नकली हीरे से आपकी बेहिसाब जेब काट रहे हैं और आपको इसका अहसास तक नहीं होता। आप हीरे के आकर्षण में बंधे मोटी रकम देकर घर चले आते हैं यह सोचकर कि ”हीरा है सदा के लिए”।
लीजेण्‍ड न्‍यूज़ ने जब हीरा जड़ित आभूषणों की सच्‍चाई जाननी चाही तो चौंकाने वाला खुलासा हुआ। और यह खुलासा किसी अन्‍य ने नहीं, खुद डायमंड ट्रेड से जुड़े एक दिग्गज कारोबारी ने किया।
उसने बताया कि लगभग हर शहर में मौजूद नामचीन यानि ब्रांडेड जूलर्स से लेकर हर तरह के आभूषण बेचने वालों तक में से किसी को कभी आपने यह कहते नहीं सुना होगा कि वह सिंथेटिक डायमंड से जुड़े आभूषण बेचता है। आपने कभी सिंथेटिक डायमंड की बिक्री के लिए कोई विज्ञापन भी नहीं देखा होगा जबकि डायमंड से जुड़े जितने भी आभूषण बाजार में बिकते हैं, उनमें सिंथेटिक डायमंड ही इस्‍तेमाल हो रहा है लेकिन कीमत असल डायमंड की वसूली जाती है। उन्‍होंने बताया कि इसीलिए आज आभूषणों की बिक्री के लिए भी जूलर्स द्वारा नित नई स्‍कीम लांच की जाती हैं। कोई उसमें छूट देने की बात करता है तो कोई मेकिंग चार्ज न लेने की। बहुत से लोग ऐसी स्‍कीम के तहत महंगी-महंगी गाड़ियां ईनाम में देने का प्रलोभन दे रहे हैं। हालांकि असली डायमंड कारोबारी अपने स्‍तर से इसका विरोध कर रहे हैं क्‍योंकि इससे न सिर्फ डायमंड व्‍यवसाय का नाम बदनाम हो रहा है, बल्‍कि उनका धंधा भी प्रभावित होता है।
मात्र 15 दिन पहले ही कॉमर्स मिनिस्ट्री ने सिंथेटिक डायमंड के इस अवैध कारोबार के बारे में आगाह किया है। उसने मुंबई की एक ट्रेड एसोसिएशन से पूछा भी है कि असली और सिंथेटिक डायमंड के बीच फर्क की क्‍या पहचान है क्‍योंकि आज सिंथेटिक  डायमंड पूरे देश में बेचा जा रहा है।
कॉमर्स मिनिस्ट्री ने सिंथेटिक डायमंड के बारे में दूसरे देशों से इंपोर्ट के तौर-तरीकों की भी जानकारी मांगी है।
बताया जाता है कि सिंथेटिक डायमंड असल डायमंड की तुलना में आधी कीमत के होते हैं। सिंथेटिक डायमंड्स विदेश में लैब के अंदर बनाए जाते हैं। वहां से ये सूरत तथा मुंबई के ट्रेडर्स के पास पहुंचते हैं और फिर देशभर में।
विदेश से सिंथेटिक डायमंड आसानी के साथ आ पाने की वजह यह है कि भारत में सिंथेटिक डायमंड के लिए अलग से कोई कोड नहीं है जबकि हर कमोडिटी का एक नंबर वाला कोड होता है। यह कोड उस वक्त कस्टम डिपार्टमेंट को बताना पड़ता है जब कोई सामान विदेश से देश के अंदर लाना होता है। इसे हार्मनाइज्ड कमोडिटी डिस्क्रिप्शन ऐंड कोडिंग सिस्टम या एचएस कोड कहते हैं।
यहां यह जान लेना भी जरूरी है कि चीन में नेचुरल और सिंथेटिक डायमंड के लिए अलग-अलग कोड हैं और इसलिए भारत के असली डायमंड कारोबारी सरकार से मांग कर रहे हैं कि हमारे यहां भी ऐसा ही सिस्‍टम लागू किया जाए। साथ ही सिंथेटिक डायमंड ड्यूटी फ्री न रहे।
भारत में जो सिंथेटिक डायमंड आता है, उसे 7104 कैटेगरी में डाला जाता है। यह अलग-अलग तरह के सिन्थेटिक स्टोन की कैटेगरी है। इसके लिए अलग कोड न होने के कारण सरकार या ट्रेड एसोसिएशन के लिए यह बताना मुश्किल है कि देश में कितना सिंथेटिक डायमंड आ रहा है।
गौरतलब है कि भारत के अंदर करीब 74 प्रतिशत सिंथेटिक डायमंड सूरत में आता है और यहां से देश का करीब 94 प्रतिशत डायमंड एक्सपोर्ट किया जाता है।
डायमंड कारोबारियों से जुड़े सूत्र बताते हैं कि सिंथेटिक डायमंड को नेचुरल डायमंड में आसानी से मिलाया जा सकता है। पॉलिश होने के बाद दोनों में फर्क का पता नहीं चलता। किसी जूलरी में लगने के बाद डायमंड की जांच भी नहीं हो सकती।’
यही कारण है कि नामचीन से नामचीन सर्राफा व्‍यवसाई असली हीरे के नाम से बड़े पैमाने पर सिंथेटिक हीरे वाली जूलरी को खपा कर लोगों के साथ खुलेआम धोखाधड़ी कर रहे हैं।
चूंकि भारत के लोग अपनी कोई भी जूलरी बहुत ही विषम परिस्‍थितियों के चलते बेचना मंजूर करते हैं इसलिए वह असली कीमत देकर नकली यानि सिंथेटिक हीरे को गले लगाये रहते हैं।
ऐसे में जरूरत है तो इस बात की कि धोखाधड़ी के इस अवैध कारोबार पर लगाम लगाई जाए क्‍योंकि इससे एक ओर जहां बेईमान सर्राफा व्‍यवसाई हीरे के आकर्षण का लाभ उठाकर करोड़ों नहीं, अरबों रुपए का चूना लगा रहे हैं वहीं दूसरी ओर बेखौफ होकर ग्राहकों के भरोसे का खून किया जा रहा है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 2 अप्रैल 2015

रेलवे में 10 हजार करोड़ की होती है सालाना लूट: श्रीधरन

नई दिल्ली। मेट्रो मैन के नाम से मशहूर ई श्रीधरन ने कहा है कि भारतीय रेलवे को सामानों की खरीदारी में हर साल कम से कम 10 हजार करोड़ रुपए का चूना लग रहा है। श्रीधरन की रिपोर्ट में कहा गया है कि खरीद अधिकारों को विकेंद्रित करने यानी निचले स्तर तक देने से इस लूट को रोका जा सकता है।
श्रीधरन ने रेलवे के जनरल मैनेजर्स को वित्तीय अधिकार देने और अधिकारों के विकेंद्रीकरण संबंधी अपनी फाइनल रिपोर्ट में कहा है कि इस समय खरीद अधिकार सीमित होने से रेलवे का बहुत ज्यादा पैसा महज कुछ हाथों में है। इससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलता है।
श्रीधरन की अध्यक्षता वाली इस कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में रेलवे के कई वरिष्ठ अधिकारियों की भी राय ली है। मौजूदा खरीद प्रक्रिया का विश्लेषण कर कमिटी इस नतीजे पर पहुंची है कि जवाबदेही तय करने और अधिकारों को विकेंद्रित करने से रेलवे की सालाना आय में भारी अंतर आ जाएगा। इससे हर साल सामान की खरीद में करीब 5 हजार करोड़ रुपए और कामों के ठेके देने में भी इतने ही रुपयों की बचत होगी।
कमेटी ने अपनी फाइनल रिपोर्ट 15 मार्च को दाखिल की थी। इसमें कहा गया है कि बोर्ड को कोई भी वित्तीय फैसले नहीं लेने चाहिए। खुद अपनी जरूरत के सामान की खरीदारी भी उत्तरी रेलवे से करानी चाहिए। ये अधिकार जनरल मैनेजर और निचले स्तर के अधिकारियों को दिए जाने की भी सिफारिश की गई है।
आपको बता दें कि रेलवे देश में सबसे ज्यादा खरीदारी करने वाली दूसरी सबसे बड़ी एजेंसी है। इससे ज्यादा की खरीदारी सिर्फ डिफेंस के सामान की होती है। रेलवे हर साल खरीदारी पर करीब 1 लाख करोड़ रुपए खर्च करती है, जिसमें से करीब आधी रकम से रेलवे बोर्ड खरीदारी करता है।
पिछले साल नवंबर में श्रीधरन के प्रारंभिक रिपोर्ट देने के बाद से ही रेलवे ने अधिकारों के विकेंद्रीकरण का काम शुरू कर दिया है। अब श्रीधरन कमेटी ने कहा है कि रेलवे बोर्ड का गठन रेलवे की नीतियां, योजनाएं, नियम और सिद्धांतों को बनाने, इनकी जांच करने और रेलवे को दिशानिर्देश देने को हुआ था लेकिन आज बोर्ड इनमें से कोई भी काम नहीं कर रहा है।
कमेटी ने विस्तार से विश्लेषण के लिए डीजल, कंक्रीट स्लीपर्स, 53-s सीमेंट जैसे सामनों की खरीद प्रक्रिया का भी अध्धयन किया। उनके मुताबिक, रेलवे देश में सबसे ज्यादा डीजल की खरीद करता है और पिछले 15 महीनों से इसका नया ठेका ही फाइनल नहीं हुआ है। कई चीजों के ठेके तो दशकों से फाइनल नहीं हुए हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, हालात इतने खराब हो गए हैं कि रेलवे के कामकाज की इस व्यवस्था को अच्छे से झकझोरने की जरूरत है, जिससे प्रभावी और बेहतर बिजनेस के फैसले लिए जा सकें। इसमें कहा गया है कि बोर्ड को फील्ड में मौजूद अपने शीर्ष अधिकारियों यानी जनरल मैनेजर्स की बिजनस की क्षमता पर ही शक है।
इसके अलावा रिपोर्ट में रेलवे की ढुलाई और यात्रियों की संख्या (हवाई और सड़क के मुकाबले) कम होने पर भी चिंता जताई गई है। रिपोर्ट के मुताबिक 1960-61 के 82 फीसदी (टन के हिसाब से) के मुकाबले आज रेलवे से केवल 30 फीसदी ढुलाई होती है। श्रीधरन ने कहा है कि शायद ही रेलवे के मुकाबले किसी और भारतीय संस्था की इतनी ज्यादा समितियों ने समीक्षा की होगी, लेकिन विडंबना यह है कि सारी सिफारिशें आज भी धूल फांक रही हैं।
-एजेंसी

शनिवार, 28 मार्च 2015

उत्‍तर प्रदेश विधान सभा: न पक्ष, न विपक्ष…सिर्फ एक पक्ष और समकक्ष

कल के किसी अखबार में पहले पन्‍ने पर दो कॉलम की एक खबर छपी थी। खबर का मजमून कुल जमा यह था कि उत्‍तर प्रदेश विधान सभा के बजट सत्र का आखिरी दिन ‘माननीयों के नाम रहा।
इस दिन विधान सभा व विधान परिषद् सदस्‍यों के वेतन-भत्‍ते व कूपन बढ़ाने का विधेयक पेश किया गया, जिस पर ‘आश्‍चर्यजनक किंतु सत्‍य’ की तरह समूची विधायिका ने गजब की एकजुटता दिखाते हुए अपनी सहमति प्रदान कर दी लिहाजा पलक झपकते यह विधेयक पास भी हो गया।
”माननीयों” के वेतन-भत्‍ते व कूपनों में हुई इस वृद्धि से सरकारी खजाने पर करीब-करीब 48 करोड़ रुपए का सालाना खर्च और बढ़ जायेगा।
वैसे यह कोई पहला अवसर नहीं है जब माननीयों ने सर्वसम्‍मति से इस तरह अपने वेतन-भत्‍ते बढ़ाये हों, पूर्व में भी हमेशा यही होता रहा है। अपवाद स्‍वरूप कभी किसी माननीय ने इस पर विरोध दर्ज कराया भी है तो उसकी आवाज नक्‍कार खाने में ‘तूती’ ही साबित हुई है।
यूं देखा जाए तो भारतीय राजनीति का यही कड़वा सच है किंतु जाति, धर्म, संप्रदाय का शिकार आमजन इसे स्‍वीकार करने को तैयार नहीं होता। वह दलगत राजनीति की दलदल में इतना नीचे तक धंस चुका है कि उसे सच्‍चाई दिखाई नहीं देती। उसके लिए अपने मां-बाप से अधिक अपनी पार्टी के नेता की अहमियत है। जिन्‍हें अपने परिजनों की जन्‍म व पुण्‍य तिथियां याद नहीं रहतीं, वह अपनी पार्टी के नेता की इन तिथियों पर आयोजन करना कभी नहीं भूलते।
इसे आमजन का दुर्भाग्‍य कहें या राजनेताओं का सौभाग्‍य कि जिस देश में विभिन्‍न कारणों से लगभग हर दिन किसान आत्‍महत्‍या कर रहा है, महिलाएं सुरक्षित नहीं हैं, युवक बेरोजगार हैं, अपराधियों का बोलबाला है, कानून का राज केवल किताबों तक सीमित है, उस देश के सबसे बड़े प्रदेश में माननीयों के वेतन-भत्‍ते बढ़ाने का विधेयक तो बिना किसी विरोध के एक दिन के अंदर पास हो जाता है और जनहित से जुड़े विधेयक दलगत राजनीति की भेंट चढ़ जाते हैं।
उत्‍तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के युवराज पर भरोसा करके जनता ने उन्‍हें उसी तरह भारी समर्थन देकर सत्‍तारुढ़ कराया था, जिस तरह 2014 के लोकसभा चुनावों में मोदी पर भरोसा करके भाजपा को कराया। अखिलेश सरकार ने अपने तीन साल पूरे कर लिये। अभी दो साल बाकी हैं।
आत्‍ममुग्‍धता की शिकार अखिलेश सरकार और सत्‍ता के नशे में चूर समाजवादी कुनबा शायद यह समझ बैठा है कि यूपी की सत्‍ता पर उनका स्‍थाई कब्‍जा हो चुका है। तभी तो नेता सदन अहमद हसन ने पिछले दिनों हुई बेमौसम बारिश व ओलावृष्‍टि से बर्बाद फसल को देखकर किसानों की आत्‍महत्‍या पर कहा था कि प्रदेश में एक भी किसान ने आत्‍महत्‍या नहीं की, उनकी मौत तो प्राकृतिक आपदा के चलते हुई है।
कुछ ऐसा ही मुगालता संभवत: भाजपा, बसपा और दूसरे दलों को है कि समाजवादी पार्टी से ऊब चुकी जनता के पास 2017 के विधानसभा चुनावों में उनके अलावा कोई विकल्‍प नहीं है।
वर्तमान राजनीतिक परिस्‍थितियों पर दृष्‍टि डालें तो उनका मुगालता एक बार को सही प्रतीत होता है परंतु हकीकत कुछ और भी है। अब जनता अपने शासकों के हर कर्म व कुकर्म पर पैनी नजर गढ़ाये रहती है और सही वक्‍त का इंतजार करती है। लोकसभा चुनावों से पहले उसने कांग्रेस के नेतृत्‍व वाली यूपीए सरकार को खूब सहा और दिल्‍ली में चुनावों से पूर्व भी उसने अपने भाव प्रकट नहीं होने दिये। अब बारी उत्‍तर प्रदेश की है। देश के एक ऐसे सूबे की जिसने अब तक सर्वाधिक प्रधानमंत्री दिये हैं। जिसने देश की राजनीति की दिशा व दशा दोनों को तय करने में हमेशा महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई है।
बजट सत्र के आखिरी दिन ‘माननीयों’ के वेतन-भत्‍ते बढ़ाने को जो विधायकी खेल खेला गया, उससे समाजवादी पार्टी को कोई नुकसान शायद ही पहुंचे क्‍योंकि वह अपना जितना तथा जो कुछ नुकसान अपने ही हाथों कर सकती थी वह कर चुकी है और उसकी भरपाई करने का वक्‍त भी निकल चुका है लेकिन 2017 में सत्‍तारूढ़ होने का ख्‍वाब देख रहीं भाजपा एवं बसपा जैसी पार्टियों के लिए यह खेल भारी पड़ सकता है।
सामान्‍य तौर पर सांप और नेवले की भांति हर वक्‍त एक दूसरे को पटखनी देने की जुगत में लगे दिखाई देने वाले और सदन के अंदर सारी मान-मर्यादाओं को ताक पर रखकर लड़ने-झगड़ने वाले, बात-बात पर सदन को बाधित करने तथा उसके लिए नियम-कानूनों की धज्‍जियां उड़ाने वाले माननीय जब अपने वेतन-भत्‍तों पर चोर-चोर मौसेरे भाई की कहावत को चरितार्थ करते दिखाई देते हों तो जनता का सोचने पर मजबूर होना स्‍वाभाविक है।
इस सबके बीच इस सारे घटनाक्रम पर सिर्फ राज्‍यपाल रामनाइक का आपत्‍ति दर्ज कराना गौरतलब है। माना कि वह भारतीय जनता पार्टी से ही ताल्‍लुक रखते हैं किंतु उनकी आपत्‍ति पद की गरिमा के अनुकूल तथा भाजपा के प्रतिकूल कही जा सकती है। भाजपा के प्रतिकूल इसलिए क्‍योंकि भाजपा के माननीय भी विधेयक पास कराने वालों में शामिल थे।
हो सकता है कि रामनाइक को व्‍यक्‍तिगत स्‍तर पर माननीयों की यह करतूत नागवार गुजरी हो परंतु राज्‍यपाल जिस तरह अब इस देश में मात्र एक पद नाम रह गया है, उससे ऐसा लगता है कि इससे अधिक महामहिम राज्‍यपाल और कुछ कर भी नहीं सकते थे।
जनहित में कोई क्रांतिकारी कदम उठाने की अपेक्षा तो अब किसी से भी करना, अपनी अक्‍ल पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगवाने के समान है। फिर रामनाइक ऐसा कोई कदम कैसे उठा सकते हैं, आखिर अंग्रेजों से विरासत में मिली व्‍यवस्‍था का सुख उम्र के इस पड़ाव पर मिलना कुछ तो अहमियत रखता ही है। ताजिंदगी न सही, जब तक मोदी सरकार है तब तक ही सही। सूबे के महामहिम का तमगा यूं ही नहीं छोड़ा जाता।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुक्रवार, 13 मार्च 2015

न्‍यूज़ चैनल्‍स का ‘पैनल′ पॉल्‍यूशन’

”न भूतो, न भविष्‍यति” (जो न पहले कभी हुआ, न आगे कभी होगा) की तर्ज पर मीडिया (विशेष रूप से इलैक्‍ट्रॉनिक मीडिया) ”आम आदमी पार्टी” (आप) को लेकर समाचारों तथा पैनल डिस्‍कशन का प्रसारण कर रहा है, उसे देख और सुनकर ऐसा लगता है जैसे देश की सारी समस्‍याएं सिमटकर ”आप” तक सीमित रह गई हों।
विभिन्‍न समाचार चैनल्‍स ”आप” के अंदर उपजी फूट पर न केवल खुद अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं बल्‍कि ऐसे-ऐसे तत्‍वों को भी अनर्गल प्रलाप करने का अवसर दे रहे हैं जिनका स्‍तर किसी गली-मोहल्‍ले की समस्‍या सुलझाने में सहायक नहीं हो सकता। यह भी कह सकते हैं कि उनका किसी समस्‍या के समाधान से दूर-दूर तक कोई वास्‍ता ही नहीं होता, अलबत्‍ता वह स्‍वयं में समस्‍या जरूर होते हैं।
कुछ समाचार चैनल्‍स ने तो इसके लिए अपने मेहमान बाकायदा मुकर्रर किये हुए हैं। इन चैनल्‍स ने हर समस्‍या पर बोलने का इन्‍हें जैसे कॉपी राइट दे रखा हो अथवा उनके लिए पेटेंट हासिल कर लिया हो। बिना यह सोचे-समझे कि उनके इस तथाकथित डिस्‍कशन से उनके दर्शक किस कदर परेशान हैं। उन्‍हें समझ में नहीं आता कि बहस रूपी इस मानसिक प्रदूषण से छुटकारा पाया जाए तो कैसे?
हद तो तब हो जाती है जब टीवी का एंकर किसी कथित बुद्धिजीवी से पूछता कुछ है लेकिन वह जवाब वही देता है, जो देना चाहता है। जिसे वह रट कर आया है अथवा शब्‍दों के दोहराव के कारण उसे रट गया है।
चूंकि इस तथाकथित डिस्‍कशन में विरोधी पार्टियों सहित संबंधित पार्टी का भी कोई न कोई नुमाइंदा जरूर शामिल किया जाता है इसलिए बहस को सास-बहू की तू-तू मैं-मैं बनते देर नहीं लगती।
कल तक जो आम आदमी पार्टी खुद को खास बताते नहीं थकती थी और उसके पदाधिकारी कांग्रेस, भाजपा, सपा, बसपा या देश की तमाम दूसरी पार्टियों से खुद की तुलना तक करना गवारा नहीं करते थे, आज वही अपने अंदर से उठ रही सड़ांध को ढकने का प्रयास उन्‍हीं पार्टियों से तुलना करके दे रहे हैं।
आश्‍चर्य की बात यह है कि कोई टीवी प्रस्‍तोता इनसे यह नहीं पूछता, कि अरे भाई…उनके कर्मों का लेखा-जोखा गिनाने से आप दूध के धुले किस तरह साबित हो सकते हैं?
भाजपा ने अपराधियों को टिकट बांटे, कांग्रेस ने गुण्‍डे मवालियों को नेता बना दिया, सपा और बसपा में अपराधियों का बोलबाला है…अगर यह बातें मान भी ली जाएं तो इससे आपको वैसे ही (कु) कर्म करने का अधिकार प्राप्‍त हो जाता है क्‍या?
आप अपने नेताओं प्रशांत भूषण, योगेन्‍द्र यादव, अंजलि दमानिया, राजेश गर्ग, इरफान उल्‍ला खान सहित पार्टी के संरक्षक शांति भूषण द्वारा लगाये गये आरोपों का जवाब देने की बजाय हर बहस को दूसरी ओर क्‍यों मोड़ ले जाते हो?
क्‍या कोई आरोपी यह दलील देकर खुद को आरोपमुक्‍त करा सकता है कि आरोप लगाने वाले पर इसी तरह के कई आरोप पहले से चस्‍पा हैं…अथवा जिस तरह के आरोप हम पर लगाये जा रहे हैं, वैसे आरोप तो लाखों-करोड़ों लोगों पर हर दिन लगते हैं लिहाजा पहले उनसे सफाई मांगी जाए, उसके बाद हम अपनी सफाई देंगे।
बुद्धि का दिवाला निकाल कर बैठने वालों और उन्‍हें उसका खुलेआम अवसर देने वालों से मैं यह पूछना चाहता हूं कि आपको देशभर में यह डिस्‍कशन प्रदूषण फैलाने का अधिकार किसने दे दिया?
जिन दर्शकों के दम पर टीआरपी का खेल खेलकर सारे चैनल्‍स खुद को सर्वोपरि साबित करते रहते हैं, क्‍या उनसे कभी किसी चैनल ने यह जानने की कोशिश की कि आखिर वह क्‍या देखना चाहता है और क्‍या सुनना उसे पसंद है।
चैनल्‍स के लिए क्‍या दिल्‍ली के अंदर पापी पेट की खातिर बंदरिया का नाच दिखाने वाला ही सब-कुछ होता है, दिल्‍ली के बाहर की दुनिया हिंदुस्‍तान का हिस्‍सा नहीं है।
टीआरपी की दौड़ और उसके लिए किये जाने वाले खेल की खातिर दिल्‍ली तक सिमट कर बैठे इलैक्‍ट्रॉनिक चैनल्‍स में से कोई बतायेगा कि दिल्‍ली के बाहर जिस पार्टी को हाल के लोकसभा चुनावों में कोई पूछने वाला तक पैदा नहीं हुआ, उसे लेकर वह हर रोज ”स्‍यापा” आयोजित किसलिए करते हैं?
राजस्‍थान की रुदालियों की तरह क्‍यों लगभग सभी चैनल्‍स ने अपने-अपने लिए किराये के कथित बुद्धिजीवी एकत्र कर रखे हैं?
क्‍यों कभी इस बहस में किन्‍हीं ऐसे लोगों को शामिल नहीं करते जिनका संबंध आम जनमानस से हो, जो बता सकें कि सत्‍ता के भूखे इन भेड़ियों से इतर भी एक दुनिया है और उस दुनिया के लोग उनके बारे में क्‍या सोचते हैं।
जनता के साथ यह कैसा मजाक है कि उसे किस्‍म-किस्‍म के बहुरूपियों को हर रोज केवल इसलिए झेलना पड़ता है क्‍योंकि वह टीवी चैनल्‍स के ”खास मेहमान” होते हैं।
आम आदमियों से भरे इस देश में ‘खास मेहमानों’ के बिना क्‍या टीवी चैनल्‍स की दुकान भी नहीं चल सकती जबकि समाचार जगत तो हमेशा से आम आदमी की दुनिया से सरोकार रखने का दावा करता रहा है।
यदि यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब समाचारों के प्रसारण का यह माध्‍यम पूरी तरह महत्‍वहीन होकर रह जायेगा और इसकी भी कुगति वैसी ही होगी जैसी आज किसी भी राजनीतिक दल की है। बेशक लोग मजबूरी में उसे ढोते जरूर हैं किंतु सम्‍मान कोई नहीं करता। आम आदमी पार्टी के खास चेहरे चाहे कहें कुछ भी, किंतु चेहरे का नकाब उतर चुका है। उन्‍होंने भी सत्‍ता धोखे से ही हथियाई है, इसका खुलासा हो गया है।
यकीन न हो तो एक जेनुइन सर्वे उस दिल्‍ली की जनता के बीच जाकर करवा लीजिए जिसने चंद रोज पहले 70 में से 67 सीटों पर जीत दिलवाकर अरविंद केजरीवाल को मुख्‍यमंत्री का ताज सौंपा था।
तय मानिये कि दिल्‍ली की जनता आज खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही होगी…और कोस रही होगी उस दिन को जिसे उसने अपने लिए परिवर्तन का अवसर मानकर आप जैसी फूहड़ पार्टी के पक्ष में भारी मतदान किया।
उसे अफसोस होगा कि उन्‍होंने क्‍यों अरविंद केजरीवाल पर भरोसा कर लिया। जो शख्‍स अपने साथियों तक का भरोसा बनाये रखने में सफल नहीं हो पाया, वह जनता के भरोसे पर क्‍या खरा साबित होगा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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