गुरुवार, 11 जून 2015

आरटीआई ने खोली जमीन अधिग्रहण बिल के विरोध पर कांग्रेस की पोल

नई दिल्‍ली। कांग्रेस तकरीबन एक साल से जमीन अधिग्रहण संशोधन बिल का सख्त विरोध कर रही है, लेकिन आरटीआई के तहत हासिल दस्तावेजों ने कांग्रेस के इस विरोध की पोल खोल दी है।
ये दस्तावेज वही कह रहे हैं जो नरेंद्र मोदी कह रहे हैं यानी कांग्रेस शासित राज्यों ने भी सहमति वाले क्लॉज और कई अन्य विवादास्पद संशोधनों का समर्थन किया था।
इन दस्तावेजों के मुताबिक ग्रामीण विकास मंत्रालय ने संशोधनों पर राज्यों का मूड जानने के लिए 26 जून 2014 को बैठक बुलाई थी। इसमें कांग्रेस शासित राज्यों केरल, कर्नाटक, मणिपुर और महाराष्ट्र ने सहमति वाले क्लॉज और सोशल इंपेक्ट असेसमेंट की जरूरत से जुड़े संशोधनों का समर्थन किया था। पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) प्रॉजेक्ट्स के लिए जमीन अधिग्रहण से प्रभावित 80 फीसदी परिवारों की सहमति वाले क्लॉज में बदलाव के बीजेपी सरकार के प्रस्ताव का छत्तीसगढ़, केरल, मध्य प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, गुजरात और हरियाणा (उस वक्त यहां भी कांग्रेस की सरकार थी) की सरकारों ने समर्थन किया था।
आरटीआई कार्यकर्ता वेंकटेश नायक की तरफ से हासिल किये गये इन दस्तावेजों में यह भी कहा गया कि जून 2014 की बैठक में केरल, महाराष्ट्र और हरियाणा ने भी उपयोग नहीं की गई जमीन की वापसी के मामले में बीजेपी सरकार के प्रस्ताव का समर्थन किया था। कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार के जमीन अधिग्रहण ऐक्ट 2013 में कहा गया है कि अगर सरकार की तरफ से ली गई जमीन का पांच साल तक कोई उपयोग नहीं होता है तो इसे इसके मूल मालिकों को लौटाने की जरूरत होगी। हालांकि, संशोधन बिल में बीजेपी सरकार ने यह फैसला राज्यों पर छोड़ दिया है कि किस पीरियड के बाद इस्तेमाल नहीं की गई जमीन को लौटाने की जरूरत होगी। यूपीए सरकार के बिल में सरकारी ऑफिसर की तरफ से गड़बड़ी के मामले में सजा का प्रावधान रखा गया था। बीजेपी के संशोधन बिल में इसे खत्म कर दिया गया है और इसका समर्थन केरल ने भी किया था।
कांग्रेस शासित 9 राज्यों ने मुख्यमंत्रियों ने मंगलवार को प्रस्ताव पास जमीन अधिग्रहण बिल के संशोधनों को खारिज किया था। इस बैठक में पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी और उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी मौजूद थे। इस प्रस्ताव के मद्देनजर यह खुलासा किया गया है। हालांकि, कांग्रेस इस खुलासे पर ज्यादा परेशान नजर नहीं आई। पार्टी के सीनियर नेता और पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश ने लॉर्ड कीन्स को कोट करते हुए कहा, ‘जब तथ्य बदलते हैं तो मैं अपनी राय बदल लेता हूं।’ हालांकि, उन्होंने इस बात की पुष्टि की कि जब यूपीए सरकार ने लैंड बिल पर सलाह-मशवरा शुरू किया था तो केरल, हरियाणा और महाराष्ट्र जैसे कई राज्यों ने सहमति वाले क्लॉज पर आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा, ‘जब हमने राज्यों से बात की थी तो पृथ्वीराज (महाराष्ट्र के तत्कालीन सीएम), हुड्डा (हरियाणा के तत्कालीन सीएम) और केरल के सीएम को आपत्ति थी।’

शनिवार, 6 जून 2015

केजरीवाल क्‍या कुत्‍ते की दुम हैं?

केजरीवाल क्‍या कुत्‍ते की दुम हैं जो लाख जतन करके के बाद भी टेड़ी की टेढ़ी ही रहती है।माफ कीजिए मुझे एक अधूरे प्रदेश के पूरे मुख्‍यमंत्री को लेकर ऐसी भाषा का इस्‍तेमाल नहीं करना चाहिए किंतु क्‍या करूं जब से उनका एनडीटीवी पर इंटरव्‍यू देखा है, मुंह से कुछ इसी तरह की भाषा निकल रही है। डर है कि कहीं कोई मेरा जूत-चांद सम्‍मेलन न कर दे, मुंह पर कालिख (स्‍याही) न मल दे अथवा मेरे गाल को केजरीवाल का गाल समझकर झन्‍नाटेदार झापड़ रसीद न कर दे। मैं तो केजरीवाल जितना महान भी नहीं कि ऐसा करने वालों को सौ फीसदी माफ कर दूं और सबकी खुन्‍नस बेचारे नजीब जंग साहब तथा पीएम मोदी पर निकालने लगूं।
एनडीटीवी को दिये इंटरव्‍यू में केजरीवाल ने कहा कि अगर एलजी को अमित शाह का चौकीदार भी बुला ले, तो वह रेंगते हुए जाएंगे।
49 दिनों में सत्‍ता का खूंटा तोड़कर भाग खड़े होने वाले केजरीवाल को माफ करना दिल्‍ली वालों पर इतना भारी पड़ेगा, यह दिल्‍ली वालों ने सपने में भी नहीं सोचा होगा।
दिल्‍ली वासियों को तो दिलवालों का खिताब मिला हुआ है, फिर ये टटपूंजियों की भाषा बोलने वाला उनका मुख्‍यमंत्री कैसे हो सकता है।
माना कि उन्‍होंने केजरीवाल की मासूम सी सूरत, चुपचाप जनता से जूता खा लेने, मुंह पर कालिख लगवा लेने तथा कुट-पिट लेने की कुव्‍वत देखकर उसे बहुमत दे दिया किंतु इसका यह मतलब तो नहीं कि अब जनता को पूरे पांच साल नौटंकी झेलनी पड़े।
ये पब्‍लिक है, जो सब जानती है। ये कोई अन्‍ना हजारे, शांति भूषण, प्रशांत भूषण, योगेन्‍द्र यादव या मेधा पाटकर नहीं जिन्‍होंने केजरीवाल की काठ की हाण्‍डी एकबार तो चढ़वा ही दी और खुद बेआबरू होकर निकल लिये। और चुनाव कोई कुंभ का मेला नहीं। चुनाव तो पांच साला हैं, पांच साल बाद फिर माफी मांगने पब्‍लिक के बीच जाना पड़ेगा।
पब्‍लिक को क्‍या लेना-देना इस बात से कि तुम्‍हें कौन-कौन काम नहीं करने दे रहा और कौन किसका चमचा है। तुम आधे मुख्‍यमंत्री हो या पूरे हो, दिल्‍ली आधा राज्‍य है या अधूरा है। संविधान ने कितने अधिकार दे रखे हैं और कितने कर्तव्‍य।
यही सब परेशानियां थीं तो भाई किसने कहा था कि राजनीति में आओ, चुनाव लड़ो, 49 दिन का तमाशा देखकर और दिखाकर भी फिर मैदान में कूद पड़ो।
जहां तक मुझे याद है केवल कांग्रेस के नेतृत्‍व वाली यूपीए सरकार के मंत्रियों ने तो केजरी एंड पार्टी को चुनाव लड़ने के लिए उकसाया था। वही बात-बात पर कहते थे कि आओ चुनाव लड़ लो। जिन जंग साहब से आज केजरी जंग लड़ रहे हैं, तब वह कांग्रेसी थे, आज बिना सदस्‍यता लिए वह भाजपाई हो गये।
दरअसल केजरी की जंग साहब से जंग में एक बात पूरी तरह साफ हो चुकी है, और वह यह कि केजरी अब खुद को दिल्‍ली का नहीं, देश का नेता मान रहे हैं।
वह बार-बार मोदी पर हमला करते हैं ताकि किसी भी तरह खुद को मोदी के आस-पास खड़ा कर सकें। मोदी जी की चुप्‍पी उनके लिए असह्य हो गई है। समझ में नहीं आ रहा कि नमो-नमो जपते-जपते तीन महीने बीत गये किंतु नमो हैं कि पूरी तरह मौन धारण किये हैं। किसी ने केजरी के मसले पर मोदी जी से उनके मौन का कारण पूछा तो उनका जवाब था- आपने वो ऊपर की ओर मुंह करके थूकने वाली कहावत नहीं सुनी क्‍या।
मैं क्‍यों जवाब दूं, उसका थूक उसी के मुंह को सुशोभित कर रहा है। कुछ दिन और तमाशा देखिये, मुख्‍यमंत्री जी खांसेंगे ज्‍यादा और बोलेंगे कम क्‍योंकि उनकी खांसी मैंने ही उन्‍हें खास जगह भेजकर ठीक करवाई है। न खांसी स्‍थाई रूप से ठीक हुई है और न सत्‍ता स्‍थाई है। कहीं ऐसा न हो कि खांसी और सत्‍ता एकसाथ उखड़ पड़ें।
एनडीटीवी को दिये इंटरव्‍यू में केजरीवाल ने एक बात और पते की कही। बात कुछ यूं है कि मोदी जी मुझे राहुल गांधी समझने की भूल न करें।
केजरीवाल के कहने का तात्‍पर्य यह है कि वो राहुल गांधी से कहीं ज्‍यादा घाघ राजनीतिज्ञ हैं। और राहुल गांधी उनके सामने कुछ भी नहीं।
केजरीवाल सोच रहे हैं कि मैं एक तीर से कई निशाने साध लूंगा लेकिन वो भूल रहे हैं कि राजनीति कोई सरकारी नौकरी नहीं और मोदी या राहुल उनके असंवैधानिक पद प्राप्‍त उप मुख्‍यमंत्री मनीष सिसौदिया नहीं, जिन्‍हें वो कुछ भी कह सकते हैं। जैसी चाहें वैसी टोपी पहना सकते हैं। एक देश का पीएम है और एक खानदानी राजनेता। पता नहीं केजरी किस मुगालते हैं।
कहीं ऐसा न हो कि नमो-नमो का जप केजरी पर उलटा पड़ जाए और जनता पूछने लगे कि भाई क्‍या तुम पहले नहीं जानते थे कि दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री को कितने अधिकार हैं। अगर जानते थे तो चुनाव लड़े क्‍यों, पहले दिल्‍ली को पूर्ण राज्‍य बनवाने की लड़ाई लड़ लेते। और नहीं जानते थे तो अब पत्‍थरों से सिर मारकर क्‍या साबित करना चाहते हो।
सिर तो फूटेगा ही फूटेगा, कुछ दिनों में दिल्‍लीवासी ही पागल घोषित और कर देंगे। कहेंगे… इसे तो हमारे प्रति कर्तव्‍यों की नहीं, केंद्र को मिले अधिकारों की ज्‍यादा चिंता है। राहलु गांधी की चिंता है, सबकी चिंता है सिवाय जनता के।
मैं न तो दिल्‍ली का वोटर हूं और न आप का कार्यकर्ता। प्रशांत भूषण या योगेन्‍द्र यादव का आदमी भी नहीं हूं जो पुराने संबंधों का हवाला देकर ही केजरीवाल जी को समझा सकूं कि भइया… कोरी जंग में कुछ नहीं रखा।
अन्‍ना बेचारे तो समझाते-समझाते खुद समझ बैठे। सत्‍ता चीज ही ऐसी है।
यह केजरी वार और केजरी उवाच से नहीं चलती, इसे चलाने के लिए अनुभव, संयम और समझ की जरूरत है। यह आईआरएस की नौकरी नहीं, और न किसी न्‍यूज़ चैनल की एंकरिंग है। यह वो शै है, जो कदम-कदम पर इम्‍तिहान लेती है। पांच साल में एक बार से काम नहीं चलता।

-यायावर

गुरुवार, 4 जून 2015

मैगी मुद्दा: “मीडिया” पर मुकद्दमा क्‍यों नहीं?

बहुराष्‍ट्रीय कंपनी नेस्‍ले के मैगी नूडल्‍स में घातक पदार्थों की मौजूदगी का मुद्दा यूं तो राष्‍ट्रव्‍यापी हो चुका है और उसकी बिक्री पर बैन से लेकर ब्राण्‍ड एंबेसेडर्स तक के खिलाफ एफआईआर के आदेश दिये जा चुके हैं किंतु इस सबके बावजूद एक सवाल है जिसका उत्‍तर देने को कोई तैयार नहीं जबकि सवाल उतना ही महत्‍वपूर्ण है, जितना महत्‍वपूर्ण है मैगी मुद्दा।
सवाल यह है कि जब दो साल पहले मैगी का विज्ञापन छोड़ चुके अमिताभ बच्‍चन पर और 12 साल पहले मैगी का विज्ञापन करने वाली प्रीति जिंटा पर आज मुकद्दमा कायम हो सकता है तो उन मीडिया हाउसेस पर क्‍यों नहीं हो सकता जो अब तक मैगी का विज्ञापन बराबर कर रहे हैं।
अमिताभ और प्रीति जिंटा ने जब यह विज्ञापन किया था, तब तो मैगी में घातक पदार्थों की मौजूदगी का मुद्दा था ही नहीं और माधुरी दीक्षित ने भी जब विज्ञापन लिया होगा तब उस पर कोई विवाद नहीं था किंतु मीडिया तो अब जबकि सब-कुछ सामने आ चुका है, तब भी मैगी के विज्ञापनों को प्रकाशित व प्रसारित कर रहा है।
हम यहां अमिताभ, प्रीति या माधुरी अथवा उनके जैसे तमाम सेलिब्रिटीज द्वारा भ्रामक विज्ञापनों का पक्ष नहीं ले रहे और न उन्‍हें क्‍लीनचिट दे रहे हैं, हम तो यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि एक ही देश में किसी आपराधिक कृत्‍य पर दोहरा दृष्‍टकोण या दोहरी नीति क्‍यों?
बात प्रिंट मीडिया की हो या इलैक्‍ट्रॉनिक मीडिया अथवा नये उभरते वेब मीडिया की ही क्‍यों न हो, इन सभी में ऐसे आपत्‍तिजनक विज्ञापनों की भरमार देखी जा सकती है जो स्‍वास्‍थ्‍य व समाज के लिए तो घातक हैं ही, बढ़ते अपराध के लिए भी काफी हद तक जिम्‍मेदार हैं लेकिन उनका प्रकाशन व प्रसारण करने वाले मीडिया हाउसेस के खिलाफ कभी कोई कार्यवाही नहीं होती।
देशभर के लगभग सभी नामचीन अखबार लिंग वर्धक यंत्र बिकवा रहे हैं, तंत्र-मंत्र और वशीकरण करने वालों का प्रचार कर रहे हैं, चमत्‍कारिक नगीने व पैंडेट सहित देवी-देवताओं की मूर्तियां बेच रहे हैं…और यहां तक कि युवितयों व घरेलू महिलाओं की मसाज करके हजारों रुपए कमाने का दावा करने वाले विज्ञापन छाप रहे हैं। लगभग सभी चैनल्‍स जिनमें न्‍यूज़ चैनल्‍स भी शामिल हैं, ज्‍योतिषियों से हर समस्‍या का समाधान करा रहे हैं, उन लोगों को भी भरपूर प्रोत्‍साहन दे रहे हैं जो अंधश्रद्धा बढ़ाने में सहायक हैं, किंतु किसी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं हो रही।
अखबार तो अपने बचाव में विज्ञापनों के साथ बहुत छोटी सी वैधानिक चेतावनी इस आशय की प्रकाशित करके अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर लेते हैं कि ”पाठकों को सलाह दी जाती है कि किसी उत्‍पाद या सेवा के बारे में पूरी जांच-पड़ताल कर लें, यह समाचार पत्र उत्‍पाद या सेवा की गुणवत्‍ता तथा विज्ञापनदाता द्वारा किये गये दावे की पुष्‍टि नहीं करता। समाचार पत्र उपरोक्‍त विज्ञापनों के बारे में उत्‍तरदायी नहीं होगा।”
विज्ञापनों के अंत में या किसी एक कोने में छोटी सी इस आशय की चेतावनी लिख देने भर से क्‍या समाचार पत्र की जिम्‍मेदारी पूरी हो जाती है, क्‍या उन्‍हें इसकी आड़ में वैश्यावृत्‍ति को बढ़ावा देने वाले, आपराधिक कृत्‍यों के लिए प्रोत्‍साहित करने वाले और अंधभक्‍ति व अंधश्रद्धा की ओर उन्‍मुख करने वाले विज्ञापन छापने का अधिकार मिल जाता है ?
आश्‍चर्य इस बात पर भी है कि अपना चेहरा चमकाने के लिए विभिन्‍न समाचार चैनल्‍स पर पैनल डिस्‍कशन का हिस्‍सा बनने वाले तथाकथित समाज सुधारक और हर मामले के विशेषज्ञ भी इस मामले में कुछ बोलते दिखाई नहीं देते। वो किसी एंकर से नहीं पूछते कि उनके अपने चैनल्‍स पर भ्रामक विज्ञापन क्‍यों प्रसारित किये जा रहे हैं।
समौसे और चटनी, रसगुल्‍ले तथा खीर खिलाकर बड़ी से बड़ी समस्‍या का समाधान करने वाले बाबा का विज्ञापन भी बदस्‍तूर जारी है जबकि कुछ समय पहले उसके खिलाफ भी आवाज़ उठी थी और पैनल डिस्‍कशन तक हुए थे।
हाल ही में सभी तथाकिथत बड़े अखबारों ने रीयल एस्‍टेट से जुड़ा एक ऐसा भ्रामक जैकेट पेज विज्ञापन छापा था जिसमें 2 लाख 40 हजार का प्‍लॉट खरीदने पर 2 लाख 56 हजार रुपए का बोनस देने की बात कही गई थी। 15 लाख का एक फ्लैट बुक कराने पर 9 लाख रुपए की गाड़ी देने का झांसा दिया गया था।
इस तरह के विज्ञापन जो किसी बड़े ”फ्रॉड” का स्‍पष्‍ट रूप से अहसास कराते हैं और जिनकी वजह से फ्रॉड लोग अपने मकसद में कामयाब होते हैं, क्‍या उनके प्रकाशक पर कार्यवाही नहीं होनी चाहिए।
किसी खास डीओ की महक से राह चलती लड़कियों को बेकाबू कर देने का विज्ञापन क्‍या महिलाओं के मान-सम्‍मान को बढ़ाता है किंतु ऐसे विज्ञापन प्रसारित करने वाले मीडिया हाउसेस लगातार मलाई मार रहे हैं। उनके खिलाफ कोई कुछ नहीं कहता। वो महिलाएं भी नहीं, जो देश में महिला सुरक्षा को लेकर हर सरकार और यहां तक कि हर मर्द को कठघरे में खड़ा करने से नहीं चूकतीं। जैसे मर्द होना कोई गुनाह हो और हर मर्द एक वहशी दरिंदा हो।
किसी भी दिन का कोई नामचीन अखबार उठाकर देख लीजिए। उनमें जापानी तेल व जापानी कैप्‍सूल से लेकर लिंग वर्धक यंत्र सहित मनचाहे प्‍यार को वशीकरण के जरिये आपकी झोली में डाल देने तथा घरेलू महिलाओं की मसाज करके हजारों रुपए कमाने जैसे विज्ञापनों की भरमार होगी। विज्ञापनों के साथ इनकी भाषा तक भड़काऊ और अश्‍लील होती है किंतु उनके लिए शायद कोई कानून नहीं बना।
मैगी हो या कोई भी दूसरा खाद्य पदार्थ, रोजमर्रा में उपयोग आने वाली सामग्री हो या प्रसाधन सामग्री, यदि वह गलत दावे के साथ बेची जा रही है तो उसके खिलाफ कार्यवाही जरूर की जानी चाहिए क्‍योंकि लूट का लाइसेंस देना अथवा लोगों के स्‍वास्‍थ्‍य या जीवन से खिलवाड़ करने का मौका देना किसी के हित में नहीं होगा परंतु उस लूट तथा धोखे के प्रत्‍यक्ष हिस्‍सेदारों पर भी कार्यवाही अवश्‍य की जानी चाहिए। फिर चाहे वह अमिताभ बच्‍चन जैसा कोई महानायक हो, करोड़ों दिलों को धड़काने वाली माधुरी दीक्षित हो, प्रीति जिंटा जैसी अभिनेत्री हो या फिर लोकतंत्र का तथाकथित चौथा पाया ”मीडिया” ही क्‍यों न हो। कानून सबके लिए बराबर होना चाहिए और न्‍याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिए, होते हुए दिखना भी चाहिए ताकि आम जनता को महसूस हो कि मीडिया के पास सिर्फ सवाल करने का हक ही नहीं है, जवाब देने की जिम्‍मेदारी भी है।
उसका काम केवल दूसरों को कठघरे में खड़ा करने का न होकर खुद को कठघरे से रुबरू कराना भी है। विज्ञापन लेना मीडिया की व्‍यावसायिक मजबूरी बन चुका है लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि भक्ष और अभक्ष का भेद भुलाकर अपने लिए सबकुछ ग्राह्य बना लिया जाए तथा मैगी या किसी अन्‍य उत्‍पाद पर पैनल डिस्‍कशन कराकर अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर ली जाए।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष

मंगलवार, 26 मई 2015

ट्राई के पूर्व चेयरमैन प्रदीप बैजल ने लिखा, मनमोहन ने दी थी मुझे धमकी

नई दिल्ली। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अब ट्राई के तत्कालीन चेयरमैन प्रदीप बैजल ने भी कठघरे में खड़ा किया है। प्रदीप बैजल के अनुसार मनमोहन ने उन्‍हें धमकी दी थी। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में पूर्व कैबिनेट सहयोगियों की ओर से पहले ही लपेटे जा चुके बैजल ने जल्द प्रकाशित होने वाली अपनी किताब ‘द कंप्लीट स्टोरी ऑफ इंडियन रिफॉर्म्स: 2जी पावर ऐंड प्राइवेट एंटरप्राइज’ में मनमोहन सिंह को घोटाले का जिम्मेदार ठहराते हुए लिखा है कि पूर्व पीएम ने उन्हें 2जी मामले में सहयोग न करने पर नुकसान उठाने की चेतावनी दी थी।
कई सालों तक 2जी और संपत्तियों के विनिवेश के मामले में जांच का सामना कर चुके बैजल ने कहा कि हमारे जैसे अधिकारियों की हालत होती है कि करें तब भी मुश्किल और कुछ न करें तब भी परेशानी।
2006 में रिटायर हुए बैजल ने अपनी किताब में पूरे घोटाले के लिए मनमोहन को जिम्मेदार ठहराते हुए लिखा है, ‘मैंने यूपीए-2 के दौरान बहुत से लोगों को चेताया था कि मेरे या अन्य लोगों से जो भी पूछताछ हो रही है, उसकी आंच प्रधानमंत्री तक भी जाएगी क्योंकि हमने प्रधानमंत्री और अन्य मंत्रियों के फैसलों को ही आगे बढ़ाया है। यह अब सच साबित हो रहा है।’
‘हाउ द प्रॉब्लम्स बीगेन’ नाम से लिखे चैप्टर में बैजल ने दावा किया है कि उन्होंने 2004 में दयानिधि मारन को टेलिकॉम मिनिस्टर बनाने का विरोध किया था क्योंकि वह खुद एक ब्रॉडकास्टर भी थे और यह हितों के टकराव का मामला था लेकिन तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह ने इन आपत्तियों को खारिज कर दिया था।
बैजल ने दावा किया कि मनमोहन ने दो समितियों को गठित किया था, जिनमें से एक के अध्यक्ष वह खुद थे और दूसरी की जिम्मेदारी उनके प्रधान सचिव पर थी। मारन इन समितियों की बैठक में अधिकारियों का जाने से मना करते थे। मारन का कहना था कि वह खुद ‘टेलिकॉम प्राइम मिनिस्टर’ हैं। बैजल ने लिखा है, ‘मारन ने धमकी दी थी कि यदि मेरे आदेशों का पालन नहीं करोगे तो नुकसान उठाना पड़ेगा और मुझे बाद में खामियाजा भुगतना भी पड़ा।’

रविवार, 24 मई 2015

काले धन का सबसे बड़ा स्रोत नौकरशाही और राजनीतिक वर्ग: सर्वे

नई दिल्‍ली। नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड इकनॉमिक रिसर्च (NCAER) के सर्वे से पता लगता है कि देश में काले धन का सबसे बड़ा स्रोत नौकरशाही और राजनीतिक वर्ग को मिलने वाली घूस की रकम है।
सर्वे के मुताबिक भले ही बीते कुछ सालों में भ्रष्टाचार के खिलाफ जागरूकता बढ़ी हो, लेकिन आज भी देश में हर शहरी परिवार को साल में करीब 4,400 रुपये की घूस देनी पड़ती है जबकि ग्रामीण इलाकों में एक परिवार को साल में करीब 2,900 रुपये रिश्वत में देने पड़ते हैं।
अघोषित संपत्ति का आंकलन करने के लिए केंद्र सरकार की ओर से बनाए गए आयोग ने इसका खुलासा किया है।
नेशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड इकनॉमिक रिसर्च (NCAER) के सर्वे के मुताबिक लखनऊ, पटना, भुवनेश्वर, चेन्नै, हैदराबाद, पुणे और ग्रामीण इलाके के लोगों को सामान्य कामों… जैसे एडमीशन कराने और पुलिस से संबंधित काम निपटाने के लिए देश में सबसे अधिक घूस देनी पड़ती है। सितंबर से दिसंबर 2012 के बीच हुए सर्वे के मुताबिक शहरों में लोगों को हर साल करीब 18 हजार रुपये नौकरी पाने और ट्रांसफर कराने के लिए खर्च करने पड़ते हैं। यही नहीं, ट्रैफिक पुलिस को भी साल में कम से कम 600 रुपये घूस के तौर पर देने पड़ते हैं।
सर्वे के मुताबिक देश में काले धन का सबसे बड़ा स्रोत नौकरशाही और राजनीतिक वर्ग को मिलने वाली घूस की रकम है। यह काला धन आम तौर पर ठेके आवंटित करने, विकास योजनाओं को मंजूरी देने, खनन और तेल उत्पादों की बिक्री करने आदि से हासिल होता है। सर्वे की रिपोर्ट 2013 और 2014 में वित्त मंत्रालय को सौंपी गई थी लेकिन अब इसे अन्य विभागों से राय लेने के लिए उन्हें सौंपा गया है। रिपोर्ट के अनुसार ग्रामीण इलाकों में भ्रष्टाचार पूरी तरह से बेकाबू है। गरीब लोगों के लिए चलाई जाने वाली मनरेगा, पीडीएस, इंदिरा आवास योजना, सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों और छात्रवृत्ति योजनाओं के बजट का तकरीबन आधा हिस्सा भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है।
दिल्ली, हैदराबाद, नोएडा, लखनऊ और पटना में हुए सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार सड़क किनारे पटरी बाजार और रेहड़ी लगाने वालों को हर महीने लगभग 1,100 रुपये की घूस देनी पड़ती है। इन लोगों की करीब 13 फीसदी कमाई घूस देने में ही चली जाती है। केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड की निगरानी में हुए इस सर्वे की रिपोर्ट ऐसे वक़्त में आई है, जब पार्टी लाइन से ऊपर उठकर सभी सांसद देश में काले धन पर लगाम कसने के लिए कड़ा कानून बनाने की मांग कर रहे हैं।

शुक्रवार, 22 मई 2015

खुलासा: स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना में कुछ कंपनियों को फायदा पहुंचाना चाहती थी यूपीए

नई दिल्ली। एक ताजा खुलासे में मनमोहन सिंह की यूपीए सरकार स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना में कुछ निजी कंपनियों को फायदा पहुंचाना चाहती थी। इसके लिए उसने नियमों को तोड़ने मरोड़ने का काम भी किया था। यह खुलासा कोबरापोस्‍ट ने किया है।कोबरापोस्ट के पास मौजूद आरटीआई ऐक्टिविस्ट विवेक गर्ग के डॉक्यूमेंट्स से पता चलता है कि सरकार ने प्राइवेट सेक्टर को फायदा पहुंचाने के लिए नियमों में बदलाव किया था। ऐसा तब किया जबकि इसके प्रति कई ब्यूरोक्रेट्स और मंत्रियों ने चिंता जताई थी।
देश के चार मेट्रो शहरों दिल्ली, मुंबई, चेन्नै, कोलकाता को जोड़ने के लिए प्रधानंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 5846 किलोमीटर की स्वर्णिम चतुर्भुज परियोजना लॉन्च की थी। सत्ता में आने के बाद 2005-06 में यूपीए ने इस परियोजना का श्रेय लेने की होड़ में इसे 4 की बजाय छह लेन का बनाने का प्रस्ताव रखा और इसकी अनुमानित लागत 41,210 करोड़ रुपये रखी गई।
परियोजना को शुरू करने की जल्दबाजी में मनमोहन सिंह की अध्यक्षता वाली कैबिनेट कमेटी ऑन इंफ्रास्ट्रक्चर (सीसीआई) ने छह लेन के स्पेसीफिकेशन को कम करने का निर्णय लिया था, जिसे चार लेन के लिए ट्रैफिक की क्षमता 40 हजार पैसेंजर कार यूनिट्स प्रति दिन से घटाकर छह लेन के लिए 25 हजार पैसेंजर कार यूनिट्स प्रति दिन कर दिया गया। यह पहली बार था जब किसी परियोजना को शुरू करने की जल्दबाजी में नियमों में बदलाव किया गया था
तब के केंद्रीय सड़क एंव परिवहन मंत्री कमलनाथ को पीपीपी मॉडल के तहत छह लेन के प्रॉजेक्ट को बनाने के लिए कैबिनेट की मंजूरी मिल गई थी। 41,210 करोड़ के इस प्रॉजेक्ट में से 35,692 करोड़ का योगदान प्राइवेट सेक्टर का था। शेष 5518 करोड़ को सरकार से फंड से पूरा किया जाना था।
निजी निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने वायाबिलेटी गैप फंडिंग (वीजीएफ) के रूप में 5 फीसदी कंस्ट्रक्शन कॉस्ट देने का फैसला किया। अपवाद स्वरूप कुछ मामलों में 10 फीसदी वीजीएफ दिया गया लेकिन यूपीए सरकार ने अपने ही नियमों की अवहेलना की। सूत्रों के मुताबिक कुछ टॉप ब्यूरोक्रेट्स के विरोध के बावजूद दो मामलों में वीजीएफ को 36 फीसदी कर दिया गया।
ओडिशा में एनएच-5 पर चंडीखोल-जगतपुर-भुवनेश्वर खंड के 67 किलोमीटर के दो निर्माण कार्यों के लिए ठेकेदार को प्रॉजेक्ट की कुल लागत 1047 करोड़ रुपये में से 36.96 फीसदी वीजीएफ यानी कि 387 करोड़ रुपये दिए गए। इसी तरह उत्तर प्रदेश और बिहार में एनएच-2 पर वाराणसी-औरंगाबाद 192 किलोमीटर लंबे खंड के लिए 2848 करोड़ रुपये के प्रॉजेक्ट में वीजीएफ के रूप में 38.48 करोड़ रुपये दिए गए। इन दो मामलों से सरकारी खजाने को करीब 1483 करोड़ का नुकसान हुआ।
सड़क एवं परिवहन मंत्रालय के डॉक्यूमेंट्स के मुताबिक नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया (NHAI) ने इन प्रस्तावों को मंजूरी दी थी लेकिन इससे पता चलता है कि यह वीजीएफ पर कैबिनेट कमिटी ऑन इकनॉमिक अफेयर्स (सीसीईए) द्वारा मंजूर किए गए नियमों का उल्लघंन था। एनएच-2 स्थित छह लेन वाले वाराणसी-औरंगाबाद सेक्शन को 21 नवंबर 2008 को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप अप्रेजल कमिटी (पीपीपीएसी) ने मंजूरी दी थी। इसे सीसीईए ने 28 जनवरी 2009 को मंजूरी दे दी।
एनएच-5 स्थित छह लेन वाले चंडीखोल-जगतपुर-भुवनेश्वर सेक्शन के लिए बोली की प्रक्रिया 2008-09 के दौरान शूरू हुई थी। 15 फर्मों ने इस प्रॉजेक्ट के लिए आवेदन 7 मई 2008 को जमा किया था। दो राउंड के बाद 15 में से सिर्फ तीन आवेदन कर्ता ही नीलामी के लिए सहमत हुए। 2 जनवरी 2009 को जब बोली खुली तो वीजीएफ के लिए सबसे कम बोली 387 करोड़ रुपये या टीपीसी का 36.96 फीसदी की थी। एक बार फिर से एनएचएआई ने इसे उचित ठहरा दिया।
सूत्रों के मुताबिक वीजीएफ लिमिट को 10 फीसदी से ज्यादा बढ़ाए जाने का फाइनैंस मंत्रालय के कई सचिवों ने विरोध किया था लेकिन उनकी बातों को अनसुना कर दिया गया। आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक वीजीएफ में बढ़ोत्‍तरी के पीछे ओडिशा के सीएम नवीन पटनायक की बड़ी भूमिका थी। 2009 में मनमोहन सिंह से मुलाकात के दौरान पटनायक ने वीजीएफ को बढ़ाकर 38 फीसदी किए जाने का दबाव डाला था। सूत्रों के मुताबिक पीएमओ ने 7 अगस्त 2009 को सड़क एंव परिवहन मंत्रालय को लिखे एक पत्र में कहा था कि नवीन पटनायक ने पीएम को अवगत कराया है कि कलकत्ता और चेन्नै को जोड़ने वाले एनएच-5 के ट्रैफिक में जबर्दस्त बढ़ोत्‍तरी हुई है।
सूत्रों के मुताबिक सरकार छह लेन के प्रॉजेक्ट को मंजूरी देने की हड़बड़ी में थी जिसे कैबनेट से मंजूरी दिलाने के लिए 100 किलोमीटर के 65 हिस्सों में विभाजित कर दिया गया। इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने तक इस मामले को लेकर पूर्व पीएम मनमोहन सिंह, चिदंबरम, कमलनाथ, सीबीआई डायरेक्टर या एनएचआई चेयरमैन को भेजे सवालों का कोई जवाब नहीं मिला था।

गुरुवार, 21 मई 2015

फार्मेसी कॉउंसिल से अप्रूवल के बिना ही करा दी बी फार्मा, अब भटक रहे हैं छात्र

लखनऊ। शिक्षा माफिया के सामने प्रदेश का तंत्र किस कदर असहाय और बौना साबित हो रहा है इसका ज्‍वलंत उदाहरण हैं वो कॉलेज जिन्‍होंने फार्मेसी कॉउंसिल ऑफ इंडिया से अप्रूवल लिए बिना ही हजारों छात्रों को बी. फार्मा करा दी।
अब ये छात्र अपना रजिस्‍ट्रेशन कराने के लिए भटक रहे हैं किंतु उत्‍तर प्रदेश फॉर्मेसी काउंसिल उनका रजिस्‍ट्रेशन करने को तैयार नहीं है। फार्मेसी काउंसिल ने उनकी वैधता पर प्रश्‍न चिन्‍ह लगा दिया है।
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ समेत प्रदेश के कई जिलों से बी. फार्मा कर चुके ऐसे हजारों छात्र अब भटकने को मजबूर हैं।
कहा जा रहा है कि इन छात्रों ने जिन कॉलेज में दाखिला लिया था, उन्हें फार्मेसी कॉउंसिल ऑफ इंडिया से अप्रूवल ही नहीं है।
आरोप है कि कॉलेजों ने यूपीटीयू के तत्कालीन अधिकारियों की मिलीभगत से पहले बिना अप्रूवल दाखिले लिए और बाद में छात्रों को दूसरे कॉलेजों में शिफ्ट कर दिया गया। पूरे मामले की जानकारी फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया को भेज दी गई है।
लखनऊ स्थित चरक इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मेसी ने वर्ष 2009 में बी फॉर्मा कोर्स में दाखिले लिए थे। कॉलेज ने एआईसीटीई से कोर्स की मान्यता लेकर यूपीटीयू से सबद्धता हासिल कर ली। इसके मुताबिक दाखिले भी कर लिए, लेकिन कोर्स को फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया से अप्रवूल नहीं मिला। इसके बावजूद कोर्स शुरू हुआ और यूपीटीयू के तत्कालीन अधिकारियों ने परीक्षा भी करा दी।
इसके बाद छात्रों को यूपीटीयू की संस्तुति पर दूसरे मान्यता प्राप्त कॉलेज से संबद्ध करा दिया गया। छात्रों ने दूसरे से लेकर चौथे साल तक की पढ़ाई दूसरे कॉलेजों में की। कोर्स पूरा होने के बाद ये छात्र सुनहरे भविष्य का सपना देख रहे थे जबकि यूपी फार्मेसी काउंसिल ने पहले वर्ष के दाखिले ही अवैध करार देते हुए पंजीकरण से इंकार कर दिया।
उलझन में छात्र
प्रदेश की राजधानी स्थित चरक इंस्टीट्यूट ऑफ फार्मेसी समेत प्रदेश के कई ऐसे कॉलेजों के छात्र अब परेशान हैं। आरोप है कि यूपीटीयू अधिकारियों की मिलीभगत के चलते उनका करियर चौपट होने के कगार पर है। सूत्रों के मुताबिक प्रदेश के दर्जनों कॉलेज इस घपले में शामिल हैं और वो अब तक हजारों छात्रों को बी. फार्मा का कोर्स करा चुके हैं लेकिन उनका पंजीकरण नहीं किया जा सकता।
उप्र फार्मेसी काउंसिल के पास लगातार ऐसे छात्र पहुंच रहे हैं। इन मामलों की रिपोर्ट फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया के पास भेज दी गई है। वहीं, फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया ने रिपोर्ट मिलने के बाद यूपीटीयू या संबंधित कॉलेज के प्रतिनिधियों को पेश होने को कहा था, बावजूद इसके न तो यूपीटीयू से कोई गया और न ही कॉलेजों ने कोई दिलचस्पी दिखायी। ऐसे में खुद को ठगा महसूस कर रहे छात्र अब कोर्ट जाने की तैयारी में हैं।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष
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