शनिवार, 8 अगस्त 2015

यक्ष प्रश्‍नों का भी कुछ कीजिए राजा युधिष्‍ठिर!

यक्ष प्रश्नों का जहाँ पहरा कड़ा हो,
जिस सरोवर के किनारे
भय खड़ा हो,
उस जलाशय का न पानी पीजिए
राजा युधिष्ठिर।
बंद पानी में
बड़ा आक्रोश होता,
पी अगर ले, आदमी बेहोश होता,
प्यास आख़िर प्यास है, सह लीजिए,
राजा युधिष्ठिर।
जो विकारी वासनाएँ कस न पाए,
मुश्किलों में
जो कभी भी हँस न पाए,
कामनाओं को तिलांजलि दीजिए
राजा युधिष्ठिर।
प्यास जब सातों समंदर
लांघ जाए,
यक्ष किन्नर देव नर सबको हराए,
का-पुरुष बन कर जिए
तो क्या जिए?
राजा युधिष्ठिर।
पी गई यह प्यास शोणित की नदी को,
गालियाँ क्या दें व्यवस्था बेतुकी को,
इस तरह की प्यास का कुछ कीजिए
राजा युधिष्ठिर।

मथुरा में जन्‍मे और इसी वर्ष 11 फरवरी 2015 को ‘नि:शब्‍द’ हुए डा. विष्‍णु विराट ने यह कविता पता नहीं कब लिखी थी और किस उद्देश्‍य के साथ लिखी थी, यह तो कहना मुश्‍किल है अलबत्‍ता इत्‍तिफाक देखिए कि वर्तमान दौर में उनकी यह कविता व्‍यवस्‍था पर किस कदर गहरी चोट करती है जैसे लगता है कि भविष्‍य को वह अपनी मृत्‍यु से पहले ही रेखांकित कर गये हों।

धर्मराज युधिष्‍ठिर को केंद्र में रखकर लिखी गई इस कविता की तरह आज हमारा देश भी तमाम यक्ष प्रश्‍नों के पहरे में घुटकर रह गया है। स्‍वतंत्रता पाने के 67 सालों बाद भी आमजन भयभीत है। वह डरा हुआ है न केवल खुद को लेकर बल्‍कि देश के भी भविष्‍य को लेकर क्‍योंकि देश का भविष्‍य स्‍वर्णिम दिखाई देगा तभी तो उसका अपना भविष्‍य उज्‍ज्‍वल नजर आयेगा।
अभी तो हाल यह है कि सत्‍ताएं बदलती हैं। सत्‍ताओं के साथ कुछ चेहरे भी बदलते हैं लेकिन नहीं बदलती तो वो व्‍यवस्‍था जिसकी उम्‍मीद में चुनाव दर चुनाव आम आदमी अपने मताधिकार का इस्‍तेमाल करता है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि चुप्‍पी चाहे सत्‍ता के शिखर पर बैठे लोगों की हो या फिर जमीन से चिपके हुए आमजन की, होती बहुत महत्‍वपूर्ण है। हर तूफान से पहले प्रकृति शायद इसीलिए खामोशी ओढ़ लेती है।
2014 में हुए लोकसभा चुनावों के बाद आज जिस तरह की खामोशी समूचे राजनीतिक वातावरण में व्‍याप्‍त है, वह भयावह है। भयावह इसलिए कि ऊपरी तौर पर भरपूर कोलाहल सुनाई पड़ रहा है, संसद का मानसून सत्र हंगामे की भेंट चढ़ने जा रहा है। शीतकालीन सत्र पर भी अभी से आशंकाओं के बादल मंडराने लगे हैं किंतु सारे कोलाहल और हंगामे के बीच कहीं से कोई उत्‍तर नहीं मिल रहा। कोई समाधान नहीं सूझ रहा लिहाजा देश जैसे ठहर गया है। अगर कोई चाप सुनाई भी देती है तो सिर्फ रेंगने की, उसमें कहीं कोई गति नहीं है। सिर्फ दुर्गति है।
आमजन खुद को हर बार ठगा हुआ और अभिशप्‍त पाता है। उसे समझ में नहीं आता कि राजनीतिक कुतर्कों के बीच वह अपने तर्क किसके सामने रखे और कैसे व कब रखे। जिस वोट की ताकत पर वह सत्‍ता बदलने का माद्दा रखता है, वह ताकत भी बेमानी तथा निरर्थक प्रतीत होती है।
आमजन अब भी भूखा है, अब भी प्‍यासा है लेकिन राजनीति व राजनेताओं की भूख और प्‍यास हवस में तब्‍दील हो चुकी है। नीति व नैतिकता केवल किताबी शब्‍द बनकर रह गए हैं।
अब कोई राजा युधिष्‍ठिर अपनी कामनाओं, अपनी वासनाओं को तिलांजलि देने के लिए तैयार ही नहीं है। लगता है कि 21 वीं सदी में किसी और महाभारत की पटकथा तैयार हो रही है।
राजनेताओं की प्‍यास सातों समंदर लांघ रही है। यक्ष, किन्नर, देव, नर सबको हरा रही है। का-पुरुष बनकर जीने से किसी को परहेज नहीं रहा। आमजन की उम्‍मीद के सारे स्‍त्रोत सूखते दिखाई देते हैं। कहने को लोकतंत्र है परंतु आमजन जितना परतंत्र 67 साल पहले था, उतना ही परतंत्र आज भी है। व्‍यवस्‍था के तीनों संवैधानिक स्‍तंभ विधायिका, न्‍यायपालिका तथा कार्यपालिका…और कथित चौथा स्‍तंभ पत्रकारिता भी किसी अंधी सुरंग में तब्‍दील हो चुके हैं। यहां रौशनी की कोई किरण कभी दिखाई देती भी है तो सामर्थ्‍यवान को दिखाई देती है। असमर्थ व्‍यक्‍ति असहाय है। उसकी पीड़ा तक को व्‍यावसायिक या फिर निजी स्‍वार्थों की तराजू में तोलने के बाद महसूस करने का उपक्रम किया जाता है। वह लाभ पहुंचा सकती है तो ठीक अन्‍यथा नक्‍कारखाने में बहुत सी तूतियां समय-समय पर चीखकर स्‍वत: खामोश हो लेती हैं।
जिस न्‍यायपालिका से किसी भी आमजन की अंतिम आस बंधी होती है, वह न्‍यायपालिका खुद इतने बंधनों और किंतु-परंतुओं में उलझती जा रही है कि उसे खुद अब एक दिशा की दरकार है। सवाल बड़ा यह है कि दिग्‍दर्शक को दिशा दिखाए तो दिखाये कौन?
टकराव के हालात मात्र राजनीति तक शेष नहीं रहे, वह उस मुकाम तक जा पहुंचे हैं जहां से पूरी व्‍यवस्‍था के चरमराने का खतरा मंडराने लगा है। न्‍याय के इंतजार में कोई थक-हार कर बैठ जाता है तो कोई हताश होकर वहां टकटकी लगाकर देखने लगता है, जहां कहते हैं कि कोई परमात्‍मा विराजमान है। वास्‍तव का परमात्‍मा। जिसे लोगों ने अपनी सुविधा से अलग-अलग नाम और अलग-अलग काम दे रखे हैं।
कहते हैं वह ऊपर बैठा-बैठा सबको देखता है, सबकी सुनता है लेकिन कब देखता है और कब सुनता है, इसका पता न सुनाने वाले को लगता है और न टकटकी लगाकर देखने वालों को।
हालात तो कुछ ऐसा बयां करते हैं जैसे 21 वीं सदी का आमजन ही ऊपर वाले को देख रहा है। देख रहा है कि वह कब और कैसे महाभारत में कहे गये अपने शब्‍दों को साकार करने आता है।
कहते हैं कि उसे भी निराकार से साकार होने के लिए किसी आकार की जरूरत पड़ती है।
तो क्‍या हमारी व्‍यवस्‍था भी कोई आकार ले रही है। इस बेतुकी व्‍यवस्‍था से ही कोई तुक निकलेगा और वह सबको तृप्‍त करने का उपाय करने में सक्षम होगा?
कुछ पता नहीं…लेकिन डॉ. विष्‍णु विराट सही लिखते हैं कि-
पी गई यह प्यास शोणित की नदी को,
गालियाँ क्या दें व्यवस्था बेतुकी को,
इस तरह की प्यास का कुछ कीजिए
राजा युधिष्ठिर।
यक्ष प्रश्‍नों का जवाब दिए बिना…ठहरे हुए सरोवर से प्‍यास बुझाने के लिए बाध्‍य असहायों को राजा युधिष्‍ठिर कब उत्‍तर देकर पुनर्जीवित करते हैं, यह भी अपने आप में एक यक्ष प्रश्‍न बन चुका है। नई व्‍यवस्‍था के नए राजा युधिष्‍ठिर के लिए नए यक्ष प्रश्‍न।
ऐसे-ऐसे यक्ष प्रश्‍न जिनके उत्‍तर अब शायद इस युग के राजा युधिष्‍ठिर को भी तलाशने पड़ रहे हैं।
इधर यक्ष प्रश्‍नों को भी उत्‍तर का इंतजार है राजा युधिष्‍ठिर!
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

मंगलवार, 4 अगस्त 2015

संसद में सियार ?

क्‍या भारतीय संसद में सियार भी घुस आए हैं?
क्‍या सदन में अब सियारों का ऐसा झुण्‍ड सक्रिय है जिसकी आवाज़ के सामने दूसरी सारी आवाजें दबकर रह गई हैं?
लगता तो ऐसा ही है क्‍यों कि संसद भवन से इन दिनों सिर्फ हू-हू की आवाजें आ रही हैं। बाकी आवाजें तो कहीं खो सी गई हैं।
हंगामा क्‍यूं बरपा है, नेताओं के अलावा किसी की समझ में नहीं आ रहा। हंगामे के जो कारण सामने आ रहे हैं, वो बेमानी नजर आते हैं।
कम से कम इतने मायने तो नहीं रखते कि संसद का पूरा सत्र ही हंगामे की भेंट चढ़ा दिया जाए।
बहरहाल, लोकसभा अध्‍यक्ष द्वारा 25 कांग्रेसी सदस्‍यों को 5 दिन के लिए निलंबित कर दिए जाने के बाद अब लगभग यह तय है कि संसद का मानसून सत्र यूं ही हंगामे की भेंट चढ़ने वाला है।
एक अनुमान के अनुसार सत्र के साथ लोकसभा और राज्‍यसभा में चल रहे इस हंगामे की भेंट जनता की गाढ़ी कमाई का करीब 250 करोड़ रुपया भी चढ़ जायेगा। ये वो आंकड़ा है जो संसद की कार्यवाही पर प्रतिघंटे आने वाले खर्च का जोड़ है।
दलगत राजनीति से इतर जो लोग आम आदमी की परिभाषा के दायरे में आते हैं उन्‍हें समझ में नहीं आ रहा कि इस स्‍थिति के लिए दोष किसे दें। भारी बहुमत देकर सत्‍ता पर बैठाई गई भारतीय जनता पार्टी व उसके सहयोगी दलों को अथवा कांग्रेस या कुकरमुत्‍तों की तरह उग आई उन दूसरी पार्टियों को जो दो-दो, चार-चार सदस्‍यों के बल पर विपक्षी दल तो कहलाती ही हैं।
आरोप-प्रत्‍यारोप का हाल यह है कि सत्‍तापक्ष और विपक्ष दोनों संसद बाधित करने के लिए एक-दूसरे को जिम्‍मेदार ठहरा रहे हैं।
कांग्रेस का कुतर्क है- चूंकि यूपीए की सरकार में भाजपा ने संसद नहीं चलने दी थी इसलिए अब हम उसी का अनुसरण करके क्‍या गलत कर रहे हैं। भाजपा कहती है कि तब स्‍थितियां और थीं। हजारों नहीं, लाखों करोड़ रुपए के घोटाले हुए और उनमें कांग्रेसी मंत्रियों की संलिप्‍तता प्रथम दृष्‍ट्या साबित हो रही थी लिहाजा उस स्‍थिति की तुलना आज की स्‍थितियों से किया जाना किसी तरह सही नहीं है।
ललित मोदी को कथित सहयोग के मुद्दे पर सुषमा स्‍वराज और वसुंधरा राजे के ऊपर लगाये जा रहे आरोप बेबुनियाद हैं और इसीलिए कांग्रेस बहस से भाग रही है।
दरअसल पिछले कुछ वर्षों से राजनीतिक दलों ने आरोप-प्रत्‍यारोप की एक नई परंपरा ईजाद की है। इस परंपरा के तहत किया यही जाता है जो आज कांग्रेस कर रही है।
यूपीए की सरकार में हुए घोटालों का जवाब यह कहकर दिया जाता था कि एनडीए की सरकार में भी यह सब हुआ था। बात चाहे लाखों करोड़ के कोयला घोटाले की रही हो अथवा 2जी घोटाले और कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में हुए घोटालों की। घोटालों का जवाब घोटालों से देने की इस नई परंपरा का ही नतीजा है कि आज संसद ठप्‍प है और तमाम बिल लटके पड़े हैं।
उत्‍तर प्रदेश के जनपद गोंडा अंतर्गत गांव परसपुर में जन्‍मे एक क्रांतिकारी कवि हुए हैं जिन्‍हें ‘अदम गोंडवी’ के नाम से जाना जाता है।
अदम गोंडवी का न तो कभी ज्‍योतिष विद्या से कोई संबंध रहा और ना उन्‍होंने कोई भविष्‍यवाणी की, उन्‍होंने तो बस जुबानी जमा खर्च किया। किंतु उनका ये जुबानी जमाखर्च इत्‍तफाखन आज की राजनीति और राजनेताओं पर इतना ज्‍यादा सटीक बैठता है कि लगता है जैसे वह भविष्‍य को बखूबी भांप चुके थे।
देश को स्‍वतंत्रता मिलने के मात्र दो महीने बाद पैदा हुए अदम गोंडवी सन् 2011 तक जीवित रहे परंतु इस बीच उन्‍होंने इतना कुछ कह डाला कि जिसे कहने को शताब्‍दियां भी कम पड़ सकती हैं।
राजनीति और राजनेता उनके निशाने पर हमेशा रहे क्‍योंकि उन्‍होंने एक ऐसा जीवन जिया जो देश के कर्णधारों की कथनी और करनी के भेद को न सिर्फ कदम-कदम पर भुगतता है बल्‍कि उसके बीच बुरी तरह पिसता भी है। वह खुद भुक्‍तभोगी थे इसलिए उनकी तल्‍खी रचनाओं का हिस्‍सा बन जाती थी।
एक जगह उन्‍होंने लिखा है-
कितना प्रतिगामी रहा भोगे हुए क्षण का इतिहास।
त्रासदी, कुंठा, घुटन, संत्रास लेकर क्‍या करें।।
अदम गोंडवी के पास शब्‍द थे किंतु देश की एक बड़ी आबादी नि:शब्‍द है। क्‍या बोले और किससे बोले। उनसे जिन्‍हें पूरा एक दशक दिया शासन चलाने को या उनसे जिन्‍हें ऐतिहासिक बहुमत देकर काबिज कराया यह सोचकर कि शायद अब अच्‍छे दिन देखने को मिल जाएं।
अदम गोंडवी ने सही खाका खींचा था उस भारत मां का जिसे उसकी अपनी औलादें लज्‍जित करने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ रहीं।
उन्‍होंने लिखा था-
मुक्तिकामी चेतना अभ्यर्थना इतिहास की।
यह समझदारों की दुनिया है विरोधाभास की।।
आप कहते हैं इसे जिस देश का स्वर्णिम अतीत।
वो कहानी है महज़ प्रतिरोध की, संत्रास की।।
यक्ष प्रश्नों में उलझ कर रह गई बूढ़ी सदी।
ये परीक्षा की घड़ी है क्या हमारे व्यास की?
भारत माँ की एक तस्वीर मैंने यूँ बनाई है।
बँधी है एक बेबस गाय खूँटे में कसाई के।।
इधर एक दिन की आमदनी का औसत है चवन्नी का।
उधर लाखों में गांधी जी के चेलों की कमाई है।।
हाल ही में पंजाब के गुरदासपुर में आतंकी हमला हुआ। यह न तो कोई पहला हमला था और न इसे आखिरी माना जा सकता है। बावजूद इसके सो-कॉल्‍ड बुद्धिजीवियों का एक बड़ा तबका 1993 के मुंबई बम धमाकों के आरोपी याकूब मेमन की फांसी पर विलाप करता रहा। उसे मृत्‍युदण्‍ड से बचाने का हरसंभव प्रयास करता रहा।
पता नहीं गोंडवी ने कितने दिन पहले लिखा था यह सब कि-
कोई भी सिरफिरा धमका के जब चाहे जिना कर ले।
हमारा मुल्क इस माने में बुधुआ की लुगाई है।।
लेकिन आज भी हालात जस के तस हैं। कोई अंतर नजर नहीं आता। फिर चाहे मसला बाहरी सुरक्षा का हो या आंतरिक सुरक्षा का।
देश में औरतों की इज्‍जत इस कदर सस्‍ती हो गई है कि हर दिन उससे जुड़ी खबरें शीर्ष पर होती हैं। कहा यह जाता है कि अब यह सब बहुत बढ़ गया है परंतु अदम गोंडवी की कविता तो कुछ और कहती है। वह बताती है कि आज बेशक औरतों की इज्‍जत को भी सियासी नफे-नुकसान का हिस्‍सा बना दिया गया हो और इसलिए उस पर भरपूर सियासत की जा रही हो लेकिन हालात इस मामले में भी पहले कोई बहुत अच्‍छे नहीं रहे।
गोंडवी की ये दो लाइनें साफ करती हैं-
आ रही थी वह चली खोई हुई जज्बात में।
क्या पता उसको कि कोई भेड़िया है घात में।।
अदम गोंडवी को दुनिया से कूच किये साढ़े तीन साल हो गए, और कितने ऐसे अदम गोंडवी और कूच कर जायेंगे जो स्‍वतंत्रता के 67 सालों बाद भी सच्‍ची स्‍वतंत्रता का ख्‍वाब मन में संजोए बैठे हैं।
इसी 27 जुलाई को देश के पूर्व राष्‍ट्रपति एपीजे अब्‍दुल कलाम उसी दिन हुए गुरदासपुर आतंकी हमले तथा संसद की कार्यवाही न चलने की चिंता लिए दुनिया छोड़ गए लेकिन न सत्‍तापक्ष ने अपनी जिद छोड़ी न विपक्ष ने। संसद उनके रहते भी ठप्‍प पड़ी थी और उनके जाने के बाद भी ठप्‍प पड़ी है। कहने को राष्‍ट्रीय शोक है किंतु सच तो यह है कि ‘शोक’ मनाने की परंपराएं भी अब ‘शौक’ पूरे करने के काम आती हैं। मानसून सत्र संसद बाधित करने का शौक पूरा करने के काम आ रहा है। जनहित के नाम पर पूरा किये जाने वाले इस शौक से यदि निजी हित साधे जाते हैं तो इसमें कोई बुराई नजर नहीं आती। आखिर जनप्रतिनिधि भी जनहित की आड़ नहीं लेंगे तो कौन लेगा जबकि उन्‍हें तो जनता ने चुना ही इसलिए है।
संविधान की रचना करने वालों ने शायद ही कभी कल्‍पना की हो कि संविधान में दर्ज इबारत की व्‍याख्‍या इस कदर बेहूदे तरीकों से तोड़ी-मरोड़ी जायेगी। इस कदर उसकी छीछालेदर होगी कि मूल आत्‍मा का पता तक लगाना बड़े-बड़े विशेषज्ञों के लिए मुश्‍किल हो जायेगा।
संविधान प्रदत्‍त अधिकारों को तो बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जायेगा किंतु कर्तव्‍यों का कोई जिक्र नहीं होगा।
सांसदों पर की गई छोटी सी टिप्‍पणी को संसद की अवमानना में तब्‍दील कर देने वाले माननीय क्‍या कभी नहीं सोचेंगे कि वो किस कदर संसद की मान-मर्यादा को हर पल तार-तार कर रहे हैं। क्‍या उन्‍हें कभी अपने किये पर लज्‍जा का अनुभव होगा, संभवत: नहीं। ये बात अलग है कि उंगलियों पर गिने जाने लायक कुछ माननीय वर्तमान हालातों से द्रवित हैं और अपना दुख व रोष भी प्रकट करते हैं किंतु इस भीड़तंत्र में उनकी सुनता ही कौन है।
लोकसभा और राज्‍यसभा की तरह ही है विधानसभाओं का भी हाल। ताजा उदाहरण दिल्‍ली विधानसभा का है।
कल की ही बात है। महिला सुरक्षा के मुद्दे पर चर्चा के लिए विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया था किंतु इसका उपयोग किया गया केवल पुलिस कमिश्नर और प्रधानमंत्री को गाली देने के लिए।
स्‍थिति का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि सत्‍ताधारी आम आदमी पार्टी के ही एक विधायक पंकज पुष्कर को कहना पड़ा कि यह सिर्फ समय और जनता के पैसे की बर्बादी है।
सत्र बुलाने के पीछे सरकार की मंशा महिलाओं की सुरक्षा न होकर राजनीतिक नजर आती है। सरकार में नकारात्मक विचारों को सुनने का धैर्य नहीं है और एक तरह के फ्लोर मैनेजमेंट की प्रवृत्ति पैदा हो गई है।
पंकज पुष्कर तो इतने नाराज हुए कि टी ब्रेक के बाद वह विधानसभा से ही चले गए।
देश के सामने अनगिनित समस्‍याएं हैं। प्रदेशों की सत्‍ता पार्टियों की जगह परिवारों के हाथ में है। आम आदमी को अपनी समस्‍याओं के समाधान की बात तो दूर उन्‍हें सही कानों पहुंचाने का भी कोई उपाय नहीं सूझ रहा। मामूली से मामूली परेशानी के लिए उसे दर-दर भटकना पड़ता है।
राजनीतिक पार्टियां अपनी कई-कई पीढ़ियों का इंतजाम कर रही हैं। कोई गांधी बाबा के नाम पर तिजोरी भर रहा है तो कोई बाबा साहब अंबेडकर के नाम पर। कोई लोहिया की आड़ में जनता को लोहे के चने चबाने पर मजबूर कर रहा है तो कोई दीनदयाल उपाध्‍याय और श्‍यामाप्रसाद मुखर्जी के नाम पर।
अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता के हवाले से नेताओं की जुबान इतनी बेलगाम हो चुकी है कि पता ही नहीं चलता कि वो गालियां बक रहे हैं या संसदीय भाषा में गालियों को समाहित कर रहे हैं।
मुझे नहीं पता कि कुत्‍ते जब एक-दूसरे पर भौंकते हैं तो गालियां देते हैं या नहीं। उनके यहां गालियां संसदीय होती हैं या असंसदीय। लेकिन इतना जरूर पता है कि हमारे देश के नेताओं ने अब गालियों को संसदीय दर्जा दे दिया है। चाहे वह अघोषित ही क्‍यों न हो।
ऐसा नहीं होता तो परस्‍पर इतने अधिक अनर्गल प्रलाप के बाद किसी की तो मानहानि हुई होती। किसी को तो बुरा लगता। तमाशबीन बनी जनता को बुरा लगता है किंतु माननीयों को नहीं। आश्‍चर्य होता है।
कई बार ऐसा भी लगता है कि आश्‍चर्य किस बात का, यह सब उस म्‍यूचल अंडरस्‍टेंडिंग का हिस्‍सा है जिसके तहत सत्‍ता हस्‍तांतरण का खेल पूरी शांति के साथ खेला जाता है और जिसे आमजन लोकतंत्र समझता है।
सच तो यह है कि जिसे आमजन लोकतंत्र समझ कर खुद को बहला लेता है, उसकी असलियत कुछ और है। लोकतंत्र को अंग्रेजी में डेमोक्रेसी कहते हैं पर सच यह है कि यहां न डेमोक्रेसी है न ब्‍यूरोक्रेसी, यहां तो सिर्फ हिप्‍पोक्रेसी है। एक ऐसी हिप्‍पोक्रेसी जिसे डेमोक्रेसी और ब्‍यूराक्रेसी मिलकर अंजाम दे रही हैं ताकि जनता का कन्‍फ्यूजन बरकरार रहे।
यहां भी सुकून देता है बाबा अदम गोंडवीं का यह कथन कि-
जनता के पास एक ही चारा है बगावत।
यह बात कह रहा हूँ मैं होशो-हवास में।।
उम्‍मीद है कि अदम गोंडवी की बाकी कविताओं में छिपा सत्‍य जिस प्रकार आज चरितार्थ हो रहा है, उसी तरह यह दो लाइनें भी अंतत: चरितार्थ होंगी।
किसी के भी धैर्य की परीक्षा लेना उचित नहीं होता, फिर ये तो जनता है। जनता जिसे ‘जनार्दन’ की संज्ञा दी जाती है।
करते रहिए संसद बाधित, मत चलने दीजिए विधानसभाओं के सत्र, एक खास समय पर जनता की आंखों में मिर्च झोंक कर सत्‍ता तो हथियाई जा सकती है किंतु उसे हमेशा के लिए अंधा बनाकर रखना नामुमकिन है।
इंतजार कीजिए और देखिए कि आगे-आगे होता है क्‍या।
जनता की बदहाली और बेबसी का तमाशा देखने वाले खुद तमाशा बनकर न रह जाएं। दुनिया बड़ी तेजी से करवट बदल रही है। तमाम देशों के सत्‍ताधारियों का हश्र उसका उदाहरण है, सब्र का बांध जब टूटता है तो सैलाब बन जाता है।
यह बांध सबको बहाकर ले जाए, उससे पहले दो मिनट का मौन संसद में रखकर विचार कर लीजिए कि सवा अरब की आबादी आपके आचरण को देख भी रही है और सुन भी रही है।
आप चाहें तो सवा अरब से खुद को अलग कर लीजिए क्‍यों कि आप तो माननीय हैं। वो माननीय जिन्‍हें न अपने मान की परवाह है और न संसद के अवमान की।
ईश्‍वर आपकी मदद करे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

रविवार, 26 जुलाई 2015

व्यापम घोटाले के विसलब्लोअर की पत्नी से 10 लाख रुपए बरामद

इंदौर। मध्य प्रदेश के कुख्यात व्यापम घोटाले के विसलब्लोअर प्रशांत पांडेय की पत्नी मेघना से पुलिस ने शनिवार रात 10 लाख रुपए बरामद किए हैं। पुलिस ने मेघना को हिरासत में लेकर पूछताछ की और उनसे कथित तौर पर हवाला की शंका में करीब 10 लाख रुपए जब्त किए।
पांडेय का आरोप है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा उनकी याचिका पर व्यापम घोटाले की सीबीआई जांच का आदेश दिए जाने के बाद प्रदेश सरकार उनके परिवार को परेशान कर रही है।
पुलिस अधीक्षक (पूर्वी क्षेत्र) ओपी त्रिपाठी ने बताया कि पुलिस को जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम के सामने स्थित निजी फर्म लक्ष्मी मोटर्स के पास हवाला के लेन-देन के बारे में मुखबिर से सूचना मिली थी।
इस सूचना पर पुलिस जब मौके पर पहुंची, तो मेघना पांडेय इस फर्म के दफ्तर से एक बैग लेकर आते दिखाई दीं। मेघना इस निजी फर्म में एचआर मैनेजर के पद पर काम करती हैं।
त्रिपाठी ने बताया कि एक महिला पुलिस अधिकारी ने जब मेघना के कब्जे से मिले बैग की तलाशी ली, तो इसमें नौ लाख 96 हजार रुपए पाए गए।
इस रकम के बारे में मेघना पुलिस को ‘संतोषजनक जवाब’ नहीं दे सकीं और मामला ‘संदिग्ध’ पाया गया लिहाजा यह रकम दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 102 के तहत जब्त कर ली गई और पूछताछ के बाद मेघना को छोड़ दिया गया।
पुलिस अधीक्षक ने बताया कि पुलिस ने मेघना के कब्जे से जब्त संदिग्ध रकम के बारे में आयकर विभाग और अन्य संबंधित महकमों को सूचना दे दी है। मामले में विस्तृत जांच जारी है।
दूसरी ओर व्यापम घोटाले के विसलब्लोअर प्रशांत पांडेय ने आरोप लगाया कि पुलिस ने प्रदेश सरकार के इशारे पर उनकी पत्नी को अवैध तौर पर हिरासत में रखा और उनके परिवार की ‘मेहनत की कमाई के’ 10 लाख रुपए जबरन जब्त कर लिए।
पांडेय ने कहा, ‘उच्चतम न्यायालय द्वारा मेरी याचिका पर व्यापम घोटाले और इससे जुडे़ लोगों की संदिग्ध हालात में मौत के मामलों की सीबीआई जांच का आदेश दिए जाने के बाद प्रदेश सरकार के इशारे पर मेरे परिवार को परेशान किया जा रहा है।’
उन्होंने कहा कि पुलिस ने उनकी पत्नी के कब्जे से करीब 10 लाख रुपए की जो रकम जब्त की, वह उनके परिवार ने अपनी मेहनत की कमाई से पिछले 10 साल के दौरान बचाई थी। उनके परिवार ने इस रकम के बारे में अपने आयकर रिटर्न में भी जानकारी दी थी। पांडे ने कहा, ‘हम किराए के घर में रहते हैं। हमें एक फ्लैट बुक करने के लिए बिल्डर को करीब 10 लाख रुपए देने थे लेकिन इससे पहले ही पुलिस ने अपनी ताकत का दुरुपयोग करते हुए यह रकम मेरी पत्नी के कब्जे से जब्त कर ली।’
-एजेंसी

शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

करोड़ों रुपए की धोखाधड़ी करके भी कानून की पकड़ से दूर हैं ‘जैन रियलटर्स’ के मालिक

मथुरा की रियल एस्‍टेट कंपनी कोशदा बिल्‍डकॉन प्रा. लि. के वृंदावन स्‍थित प्रोजेक्‍ट ‘मंदाकिनी’ में कथित साझेदारी की आड़ लेकर दिल्‍ली बेस्‍ड कंपनी ‘जैन रियलटर्स’ द्वारा विभिन्‍न लोगों के साथ करोड़ों रुपए की धोखाधड़ी करने का मामला सामने आया है
जैन रियलटर्स के मालिकानों ने वृंदावन स्‍थित प्रोजेक्‍ट ‘मंदाकिनी’ में कथित साझेदारी के नाम पर तमाम फ्लैट्स का सौदा कर लिया और विभिन्‍न लोगों से बतौर एडवांस लाखों रुपए ले लिये जबकि जैन रियलटर्स की कोशदा बिल्‍डकॉन से कथित साझेदारी पहले ही विवादित हो गई थी।
जैन रियलटर्स के मालिकानों ने फ्लैट की बुकिंग के नाम पर जिन लोगों से लाखों रुपए हड़प लिये, उनमें से आधा दर्जन लोगों ने जैन रियलटर्स के मालिकानों अजय जैन व विजय जैन पुत्रगण सुरेश चन्‍द्र जैन तथा सुरेश चन्‍द्र जैन पुत्र भिक्‍कीमल जैन निवासीगण 3-4, हिमालयन अपार्टमेंट प्‍लॉट नंबर-10 सैक्‍टर 22 द्वारका नई दिल्‍ली के खिलाफ थाना कोतवाली वृंदावन में मुकद्दमा दर्ज करा रखा है किंतु पुलिस अब तक अजय व विजय जैन को गिरफ्तार नहीं कर सकी है।
पुलिस ने इस मामले में मात्र सुरेश चंद्र जैन की गिरफ्तारी की थी जो कई महीने जेल में रहने के बाद जमानत लेने में सफल रहे।
जैन रियलटर्स की धोखाधड़ी के शिकार बने लोग अब अपने पैसों की वसूली के लिए पुलिस तथा अदालत के चक्‍कर काटने पर मजबूर हैं।
जैन रियलटर्स के शिकार बने एक एनआरआई वृद्ध प्रबल रंजन रे तो अपनी जिंदगीभर की जमा पूंजी अजय व विजय जैन को दे बैठे और अब न्‍याय की उम्‍मीद लगाये बैठे हैं ताकि उनका पैसा उनके जीते जी वापस मिल सके।
जिन लोगों ने जैन रियलटर्स के मालिकानों अजय व विजय जैन तथा उनके पिता सुरेश जैन के खिलाफ एफआईआर कराई है उनमें बनवारी लाल शर्मा निवासी बी-5, टोडरमल मार्ग, बनी पार्क जयपुर (राजस्‍थान), बीना अग्रवाल पत्‍नी संतोष कुमार अग्रवाल निवासी 135 डीडीए फ्लैट, पॉकेट 1-2, द्वारका नई दिल्‍ली, जयवीर जैन पुत्र स्‍व. रायबहादुर जैन, निवासी 807, सैक्‍टर 17 ए, गुड़गांव हरियाणा, श्रीमती सरोज जैन पत्‍नी धर्मवीर जैन निवासी ए 377 इंदिरा नगर, लखनऊ (उप्र), श्रीमती मीरा जैन पत्‍नी जयवीर जैन निवासी 807, सैक्‍टर 17 ए, गुड़गांव हरियाणा तथा खुशीन्‍दर बाली पुत्र यशपाल बाली निवासी स्‍काईलोक, सीजीएचएस लि. सैक्‍टर-6, प्‍लॉट नंबर-35, द्वारका नई दिल्‍ली शामिल हैं।
यह सभी एफआईआर थाना कोतवाली वृंदावन जनपद मथुरा में आईपीसी की धारा 420, 467, 468, 471, 120 बी, 504 व 506 के तहत अलग-अलग अपराध संख्‍या पर दर्ज हैं।
यह भी पता लगा है कि वृंदावन पुलिस ने अजय और विजय जैन के खिलाफ दर्ज मुकद्दमों की तादाद तथा अपराध की गंभीरता के मद्देनजर इन पर गैंगेस्‍टर एवं गुण्‍डा एक्‍ट की कार्यवाही करते हुए ईनाम घोषित कर दिया है, बावजूद इसके वह इन दोनों भाइयों को गिरफ्तार करने में कोई रुचि नहीं दिखा रही जिससे पीड़ित पक्ष काफी निराश हैं।
पुलिस के इस ढीले रवैये का कारण, पुलिस के ही सूत्र इनकी उत्‍तर प्रदेश पुलिस के कुछ बड़े अधिकारियों से नजदीकी बताते हैं।
करोड़ों रुपए की धोखाधड़ी के इस मामले का सबसे दिलचस्‍प पहलू यह है कि जो पुलिस छोटे-छोटे आपराधिक मामलों में पूरी सक्रियता दिखाते हुए आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए दविश पर दविश देती है, वह एक रियल एस्‍टेट कंपनी चलाने वाले दो सगे भाइयों को महीनों बीत जाने के बाद भी गिरफ्तार नहीं कर पा रही जबकि वो और उनके परिजन खुलेआम दिल्‍ली स्‍थित अपने ठिकानों पर बेखौफ धंधा करते देखे जा सकते हैं।
यहां सवाल यह नहीं है कि कोशदा बिल्‍डकॉन प्रा. लि. के वृंदावन स्‍थित प्रोजेक्‍ट मंदाकिनी में जैन रियलटर्स की साझेदारी है या नहीं, और है तो कितनी है। सवाल यह है कि इस विवादित साझेदारी के बीच जिस तरह से अजय व विजय जैन तथा उनके पिता सुरेश जैन ने विभिन्‍न लोगों से करोड़ों रुपए की रकम हड़प ली, वो कहां जाएं। वह कैसे अपनी रकम निकलवाएं और यह रकम कब तक निकल पायेगी।
इस संबंध में पूछे जाने पर वृंदावन पुलिस ने इतना जरूर बताया कि जैन रियलटर्स के मालिकानों अजय व विजय जैन तथा उनके पिता सुरेश चन्‍द्र जैन के खिलाफ करोड़ों रुपए की धोखाधड़ी के दर्ज लगभग सभी आधा दर्जन मामलों में चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है लिहाजा अब वह बहुत दिनों तक बच नहीं पायेंगे।
रहा सवाल पुलिस द्वारा उनको गिरफ्तार न कर पाने का, तो पुलिस ने उनके पिता को गिरफ्तार किया था और कई महीने वह मथुरा जिला कारागार में निरुद्ध भी रहे।
पुलिस का कहना है कि अजय और विजय जैन के खिलाफ गुण्‍डा एक्‍ट व गैंगेस्‍टर एक्‍ट के तहत कार्यवाही करने का मकसद भी उनको कानून की गिरफ्त में लाने का था और अब चूंकि लगभग सभी मामलों में आरोप पत्र कोर्ट के अंदर दाखिल किये जा चुके हैं इसलिए कोर्ट की मंशा के अनुरूप कार्यवाही अमल में लाई जायेगी।
-लीजेंड न्‍यूज़ विशेष

बुधवार, 22 जुलाई 2015

यूपी: पीसीएस से एसडीएम बनने वाले 86 में 56 यादव कैसे, याचिका दायर

लखनऊ। उत्तर प्रदेश पीसीएस की परीक्षा में पीसीएस से एसडीएम बनने वाले 86 में 56 यादव कैसे, यह जानने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई है।
याचिका दायर असफल होने वाले कुछ छात्रों ने की है और यूपीपीसीएस द्वारा आयोजित पिछली तीन परीक्षाओं में अनियमितता और धोखाधड़ी के आरोप लगाए हैं।
छात्रों का आरोप है कि पिछली तीन परीक्षाओं के बाद एसडीएम बनने वाले छात्रों में से आधे एक ही जाति के हैं।
इलाहाबाद हाई कोर्ट में दायर याचिका में दावा किया गया कि एसडीएम बनने वाले 86 लोगों में से 56 एक ही जाति के हैं। साथ ही, पिछले तीन वर्षों में यूपीपीएससी की परीक्षाओं में उत्तीर्ण होने वालों में भी 50 फीसदी इसी एक जाति के हैं।
याचिकाकर्ताओं ने यूपीपीएससी के चेयरपर्सन डॉ. अनिल यादव पर अपनी ही जाति के छात्रों को फायदा पहुंचाने का आरोप लगाते हुए इस मामले की सीबीआई जांच कराने की मांग की है।
याचिका के मुताबिक 2011 में सिलेक्ट हुए 389 पीसीएस ऑफिसर्स में से 72 उनकी ही जाति के हैं। ओबीसी कोटे में पास होने वाले 111 छात्रों में से 45 इसी जाति के हैं। याचिका के मुताबिक यूपीपीएससी की परीक्षाओं में इस तरह की अनियमितता डॉ. अनिल यादव के चेयरपर्सन बनने के बाद ही शुरू हुई। उनके कार्यकाल में 2011, 12 और 13 में परीक्षाएं कराई गईं।
पहुंचाया गया फायदा: याचिकाकर्ताओं में से एक अवधेश पांडेय ने कहा, ‘सामान्यत: पीसीएस परीक्षाएं दो-तीन वर्षों के अंतराल पर आयोजित कराई जाती थीं, लेकिन अपनी जाति के लोगों को लाभ पहुंचाने के लिए डॉ. यादव इन्हें हर साल आयोजित करवाने लगे। हमने हाई कोर्ट में यूपीपीएससी द्वारा आयोजित एक दर्जन से ज्यादा परीक्षाओं के परिणाम सबूत के तौर पर पेश किए, जो एक जाति विशेष को लाभ पहुंचाने की ओर इशारा करते हैं। यह मामला मध्य प्रदेश के व्यापम घोटाले से भी बड़ा हो सकता है और इसकी सीबीआई जांच कराई जानी चाहिए।’
रिपोर्ट के मुताबिक याचिकाकर्ताओं का दावा है कि अपनी जाति के अभ्यर्थियों को लाभ पहुंचाने के लिए यूपीपीएससी के नियम भी बदले गए। अब लिखित परीक्षा में कुछ विषयों में शून्य अंक लाने वाले छात्रों को भी आगे बढ़ा दिया जाता है। अब मेरिट की लिस्ट लिखित परीक्षा और इंटरव्यू के नंबरों को मिलाकर तैयार की जाती है। ऐसे में लिखित परीक्षा में बहुत कम अंक हासिल करने वालों को इंटरव्यू में ज्यादा नंबर दे दिए जाते हैं लेकिन लिखित में ज्यादा नंबर लाने वाले छात्रों को इंटरव्यू में ज्यादा नंबर नहीं मिल पाते।
बदले गए नियम और फैसले: एक याचिकाकर्ता विशाल कुमार ने यूपीपीएससी की उस प्रक्रिया पर भी सवाल उठाया, जिसके तहत एग्जाम की आंसर शीट सार्वजनिक किया जाना बंद कर दिया गया। ऐसे में छात्रों को पता ही नहीं चलता था कि वे कहां गलत थे। हाई कोर्ट में मामला पहुंचने पर इसका भी तोड़ निकाल लिया गया। यूपीपीएससी की परीक्षा में कई ऐसे सवाल मिले, जिनके एक से ज्यादा सही जवाब थे लेकिन पेपर जांचने वाले अपने मन से किसी भी एक जवाब को सही मान लेते थे। यह मामला अभी लंबित है।

मंगलवार, 21 जुलाई 2015

‘ऐशले मेडिसन’ हैक, शादीशुदा लोगों में हड़कंप

वॉशिंगटन। सबसे बड़ी ऑनलाइन डेटिंग साइट ‘ऐशले मेडिसन’ के हैक हो जाने से शादीशुदा लोगों में हड़कंप मच गया है। दरअसल इससे करोड़ों शादीशुदा लोगों की जिंदगी पर सीधा असर पड़ेगा।
इस साइट की टैगलाइन का हिंदी अर्थ है, ‘जिंदगी छोटी है, बनाएं रिश्ते’,। साइट के हैक होने की पुष्टि कर दी गई है। जानकारी के मुताबिक इस वेबसाइट पर शादीशुदा लोग डेटिंग करने के लिए पार्टनर ढूंढ़ते हैं।
खबर है कि उन लोगों के नाम, पते, तस्वीरें और सभी जरूरी जानकारियां चुरा ली गईं हैं।
एक अनुमान के मुताबिक करीब 37 मिलियन यानी 3.7 करोड़ यूजर्स की निजी जानकारी इससे खतरे में आ गई है। 2005 में शुरू हुई इस वेबसाइट के अब तक करीब 3.7 करोड़ यूजर्स हैं।
अब पर्सनल डेटा को लेकर लोगों में खासा डर है कि यह कहीं उनकी खुशहाल जिंदगी को यह हैकिंग बर्बाद न कर दे।
-एजेंसी

शुक्रवार, 17 जुलाई 2015

मीडिया जगत: ”काला” धंधा, ”गोरे” लोग

सावधान…होशियार…ये मीडिया जगत के गोरे लोगों का काला धंधा है। इसके नियम भी ये खुद बनाते हैं और शर्तें भी खुद तय करते हैं। इनके सामने जितना असहाय हर आम और खास आदमी है, उतनी ही असहाय वह न्‍याय व्‍यवस्‍था भी है जो बड़े-बड़ों को कठघरे में खड़ा कर लेती है।
बानगी देखिए:
छोटा लिंग, निराश क्‍यों ? जापानी लिंगवर्धक यंत्र फ्री। सेक्‍स धमाका…लिंग को 7-8 इंच लंबा, मोटा, सुडौल तथा ताकतवर बनाएं। लाभ नहीं तो पैसा वापस।
क्‍या आपके पति की आपमें रुचि कम हो रही है? आपमें सेक्‍स इच्‍छा की कमी है…जापानी-M कैप्‍सूल पुरुषों के लिए और जापानी-F कैप्‍सूल महिलाओं के लिए। शौकीन लोग भी इस्‍तेमाल करके असर देखें।
यह मजमून उन विज्ञापनों का है जो हर रोज देश के तथाकथित बड़े अखबारों में छपते हैं।
यह और ऐसे अनेक विज्ञापन जिनमें डेटिंग, मीटिंग, चेटिंग, फ्रेंडशिप कराने से लेकर हर उम्र की महिला से संपर्क कराने का दावा किया जाता है, प्रमुख अखबारों की कमाई का बड़ा जरिया हैं।
इन विज्ञापनों को प्रकाशित करने वाले अखबार अपने बचाव में एक छोटी सी सूचना अथवा परामर्श भी सबसे नीचे कहीं प्रकाशित करते हैं।
यहां सवाल यह है कि समाज के हर वर्ग को दिन-रात नीति और नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले तथा किसी के भी चरित्र का हनन करने को तत्‍पर अखबारों के मालिकान अपने बचाव में मात्र एक चेतावनी जारी करके कुछ भी छापने के लिए अधिकृत हैं या ये भी कानून से बच निकलने के हथकंडे अपनाकर नीति व नैतिकता को ताक पर रख चुके हैं।
आश्‍चर्य की बात तो यह है कि कोई सामाजिक या राजनीतिक संगठन इनके विरोध में आवाज नहीं उठाता जबकि अखबारों के ऐसे विज्ञापन यौन अपराधों की ओर प्रेरित करने का खुला आह्वान कर रहे हैं।
हालांकि इस मामले में न इलैक्‍ट्रॉनिक मीडिया पीछे हैं और न वेब मीडिया। वह जैसे प्रिंट मीडिया से प्रतिस्‍पर्धा को उतावला है, किंतु प्रिंट मीडिया व बाकी मीडिया में एक फर्क है। फर्क यह है कि छपे हुए शब्‍द इंसान को जितना अधिक प्रभावित करते हैं, उतना दूसरे माध्‍यम नहीं करते। इसके अलावा अखबार समाचारों का सबसे पुराना माध्‍यम हैं लिहाजा अखबारों की जिम्‍मेदारी भी औरों से अधिक बनती है लेकिन पैसे की खातिर अखबारों ने जिम्‍मेदारी को लाचारी में तब्‍दील कर लिया है।
अखबार मालिकानों का पैसे के लिए यह नैतिक पतन यदि इसी प्रकार जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब अखबारों में देह व्‍यापार के लिए लड़कियों की अथवा पुरुष वैश्‍यावृति के इच्‍छुक युवाओं की आवश्‍यकता संबंधी विज्ञापन भी प्रकाशित होने लगेंगे।
ताकत हमेशा अपने साथ तमाम बुराइयां लेकर आती है। चूंकि मीडिया फिलहाल काफी ताकतवर होकर उभरा है इसलिए वह निरंकुश हो चुका है। कहने के लिए मीडिया पर भी लगाम लगाने की व्‍यवस्‍था है किंतु यह व्‍यवस्‍था कुछ वैसी ही है जैसी सांसदों व विधायकों के वेतन-भत्‍ते तय करने की है। यानि मुजरिम ही मुंसिफ है।
तभी तो आलम यह है कि मीडिया हाउसेस को न किसी कानून की परवाह है और न किसी अदालत की। उस सर्वोच्‍च अदालत की भी नहीं जिसके चक्‍कर में फंसने से हर आम और खास आदमी बचने की पूरी कोशिश करता है।
सरकारी विज्ञापनों में मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों तथा जनप्रतिनिधियों के फोटो छपवाने पर पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने एक आदेश दिया जिसके अनुसार सिर्फ प्रधानमंत्री को ही सरकारी विज्ञापन में फोटो छपवाने का अधिकार होगा। विशेष परिस्‍तिथियों में राष्‍ट्रपति, गवर्नर तथा सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्‍टिस का फोटो सरकारी विज्ञापन का हिस्‍सा बन सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश तथा इससे संबंधित निर्देशों की सबसे पहले धज्‍जियां उड़ाईं दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने। उसके बाद तमिलनाडु की मुख्‍यमंत्री जे. जयललिता तथा उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश-निर्देशों को खुली चुनौती देते हुए अपने फोटो सरकारी विज्ञापनों में प्रकाशित व प्रसारित कराये।
बेशक इस मामले में एक याचिका कांग्रेस नेता अजय माकन ने दायर की है और उस पर केंद्र तथा संबंधित राज्‍य सरकारों से जवाब तलब भी किया गया है। केंद्र से यह पूछा गया है कि उसने सुप्रीम कोर्ट के आदेश-निर्देशों का अनुपालन कराने की दिशा में क्‍या कदम उठाये हैं लेकिन उन अखबारों तथा टीवी चैनलों का क्‍या जो नेताओं द्वारा सर्वोच्‍च न्‍यायालय के आदेश-निर्देशों की अवहेलना करने का जरिया बन रहे हैं।
अक्‍सर बात होती है कि नेता, अपराधी तथा पुलिस-प्रशासन का एक ऐसा गठजोड़ बन गया है जो व्‍यवस्‍था पर हावी है और जिसने समाज को भयभीत कर रखा है। हाल ही में पुलिस की कार्यप्रणाली को रेखांकित करते हुए उत्‍तर प्रदेश की कानून-व्‍यवस्‍था के बावत इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इसी प्रकार की तल्‍ख टिप्‍पणी की है।
क्‍या ऐसा नहीं लगता कि इस टिप्‍पणी में कुछ छूट गया है, कुछ अधूरा रह गया है। यह टिप्‍पणी तब मुकम्‍मल होती जब इसके साथ मीडिया को भी शामिल किया जाता लेकिन लगता है कि न्‍यायिक व्‍यवस्‍था भी मीडिया से बच कर निकल जाने में भलाई समझती है।
यदि ऐसा नहीं है तो क्‍यों कोई उच्‍च या सर्वोच्‍च न्‍यायालय विज्ञापनों के मामले में दिये गये आदेश-निर्देशों की अवहेलना करने के सहयोगी मीडिया हाउसेस पर कार्यवाही नहीं कर रहा।
क्‍यों इस मामले में वह किसी की याचिका का मोहताज है, क्‍यों वह ऐसे मामले में स्‍वत: संज्ञान नहीं ले रहा जिसका संदेश जनता के बीच काफी गलत जा रहा है। आमजन के मन में यह बात घर कर रही है कि सत्‍ता पर काबिज तथा सामर्थ्‍यवान लोगों के सामने सर्वोच्‍च न्‍यायालय भी बौना है।
कल ही ”हिंदुस्‍तान टाइम्‍स” समूह के हिंदी संस्‍करण ”हिंदुस्‍तान” में उत्‍तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव के चित्रों सहित एक चार पेज का जैकेट विज्ञापन छपा है। महिला शिक्षा और सुरक्षा को लेकर उत्‍तर प्रदेश के बढ़ते कदमों को प्रचारित करने वाले इस विज्ञापन में पढ़ें बेटियां-बढ़ें बेटियां, कन्‍या विद्याधन योजना, कौशल विकास मिशन, वुमेन पॉवर हेल्‍प लाइन, रानी लक्ष्‍मी बाई महिला सम्‍मान कोष तथा समाजवादी पेंशन योजना सहित कृषि में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी व महिलाओं के सशक्‍तीकरण का बखान किया गया है।
घर बैठे ऑनलाइन शिकायत (एफआईआर) दर्ज कराने की सुविधा का भी इस विज्ञापन में जिक्र है और एंबुलेंस सेवा का भी। लैपटॉप वितरण का भी और आशा ज्‍योति केंद्रों का भी। विज्ञापन में अखिलेश के साथ उनकी धर्मपत्‍नी व सांसद डिंपल यादव का भी फोटो प्रकाशित किया गया है और प्रदेश के अन्‍य दूसरे मंत्रियों व अधिकारियों का भी।
यह बात अलग है कि जिस दिन 16 जुलाई को अखिलेश सरकार ने ”मीडिया मार्केटिंग इनीशिएटिव” की आड़ लेकर लाखों रुपए का यह विज्ञापन अखबार में छपवाया, उसी दिन मथुरा के जिला अस्‍पताल में भर्ती एक नौ साल की लावारिस व मंदबुद्धि बच्‍ची के साथ गैंगरेप की वारदात सामने आई जिससे विज्ञापन की असलियत खुद-ब-खुद जाहिर हो जाती है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि हर किस्‍म के मीडिया की आमदनी का एकमात्र ”वैध” स्‍त्रोत विज्ञापन ही हैं और विज्ञापनों को प्रकाशित किये बिना किसी मीडिया संस्‍थान का सुचारु रुप से संचालन संभव नहीं है किंतु इसका यह मतलब कतई नहीं हो सकता कि आमदनी के लिए भक्ष या अभक्ष में भेद न रखा जाए।
आमदनी जरूरी है लेकिन जिस प्रकार कोई अपनी क्षुदा पूर्ति के लिए नाले-नाली की गंदगी नहीं खाता, उसी प्रकार मीडिया हाउसेस को भी यह तय करना होगा कि आमदनी के लिए अवैध तथा गंदे स्‍त्रोत स्‍वीकार न हों।
यदि समय रहते ऐसा नहीं किया गया तो तोप का मुकाबला करने की क्षमता रखने वाले जिन अखबारों ने कभी नैतिकता के उच्‍च मानदंड स्‍थापित कर देश को स्‍वतंत्र कराने में बड़ी भूमिका निभाई थी, जिनके उच्‍च आदर्श समाज को दिशा देने में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा करते रहे, जिनमें छपने वाले समाचारों के कारण कोई सत्‍ता से बेदखल हुआ तो कोई अप्रत्‍याशित रूप से सत्‍ता पर काबिज होने में सफल रहा, वही अखबार तथा समय के साथ प्रकट हुए मीडिया के दूसरे रूप खुद अपने वजूद को बचा पाने की क्षमता खो देंगे।
माना कि आज मीडिया जगत विज्ञापन ही नहीं, समाचारों के प्रकाशन व प्रसारण में मनमानी करने की ताकत पा चुका है लेकिन यह ताकत ही उसे ऐसे गर्त में ले जाने का माध्‍यम बन सकती है जिससे उबर पाना आसान नहीं होगा।
संभवत: यही कारण है कि आज आमजन के अंदर जिस कदर नेताओं, उनके राजनीतिक दलों तथा उनके लिए भांड़ों का काम कर रहे पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों के प्रति आक्रोश बैठा हुआ है, उसी प्रकार मीडिया के प्रति भी आक्रोश पनप रहा है।
मीडिया और मीडिया कर्मियों को आमजन निश्‍चित ही अब अच्‍छी नजर से तो नहीं देखता।
वैध या अवैध तरीकों से पैसा जुटाने की जुगत में मीडिया ने अपने लिए करवट लेती इस जनभावना को नहीं पहचाना और सरकारों की सांठगांठ से उसका धंधा परवान चढ़ता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब उसका भी खेल खत्‍म होते ज्‍यादा देर नहीं लगेगी।
और तब उसके सभी कथित हिमायती या उसकी ताकत के सामने चुप बैठे रहने पर मजबूर संवैधानिक संस्‍थाएं ही उनकी जड़ों में मठ्ठा डालने का काम करेंगी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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