बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

''एक्‍सीडेंटल पॉलिटीशियन'' हैं मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के प्रमुख प्रत्‍याशी, जानिए इनके राजनीति में प्रवेश की अनछुई कहानी...

मथुरा-वृंदावन विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में मौजूद अधिकांश प्रमुख प्रत्‍याशी एक्‍सीडेंटल पॉलिटीशियन हैं न कि रैगूलर पॉलिटीशियन। यानि ये लोग किसी न किसी दुर्घटनावश या यूं कहें कि हालातों के मद्देनजर अथवा मौका मिलने पर राजनीति में आ गए अन्‍यथा न तो इनके परिवार में कोई राजनीतिज्ञ रहा और न इनकी अपनी राजनीति में कोई रुचि थी।
सबसे पहले बात करते हैं चार बार विधायक रह चुके कांग्रेस व समाजवादी पार्टी के गठबंधन प्रत्‍याशी प्रदीप माथुर की।
1980-81 की बात रही होगी, तब प्रदीप माथुर बीएसए कॉलेज में लॉ (कानून) के विद्यार्थी हुआ करते थे। कृष्‍णा नगर के एक छोटे से किराए के मकान में रहने वाले प्रदीप माथुर के पिता सरकारी विभाग के मुलाजिम थे और इनकी माली हालत बस गुजारा करने भर की इजाजत देती थी।
लॉ के आखिरी सेमिस्‍टर की पढ़ाई के दौरान बीएसए कॉलेज के सामने हुई एक सड़क दुर्घटना में किसी युवक की मौत हो गई। पिता के साए से महरूम इस युवक की बहिन का रिश्‍ता तय हो चुका था और नजदीक ही शादी की तारीख तय थी।
चौबिया पाड़ा क्षेत्र के रहने वाले उक्‍त युवक के परिवार में इस दुर्घटना से कोहराम मचना ही था। मृत युवक के परिवार की दुर्दशा और उसकी बहिन की होने जा रही शादी को देखते हुए बीएसए कॉलेज के कुछ लॉ स्‍टूडेंट आगे आए। इन स्‍टूडेंट्स ने पहले तो कॉलेज के सामने वाली सड़क को अवरुद्ध किया और बाद में युवक के परिवार की मदद करने का बीड़ा उठाया। इन स्‍टूडेंट्स में से एक का नाम था प्रदीप माथुर। अन्‍य युवकों में शामिल थे घाटी बहालराय घीया मंडी निवासी रमेश पचौरी। वकील आनंद मोहन पचौरी के पुत्र रमेश पचौरी अब मथुरा में ही रेवेन्‍यू के वकील हैं। इस ग्रुप में शामिल तीसरे युवक का नाम था अब्‍दुल जब्‍बार। सदर बाजार निवासी अब्‍दुल जब्‍बार आज वृंदावन में एक कुकिंग गैस एजेंसी के संचालक हैं, साथ ही राजनीति में भी रुचि रखते हैं। अब्‍दुल जब्‍बार भी प्रदीप माथुर की तरह कांग्रेसी हैं और प्रदीप माथुर के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चले हैं, बावजूद इसके उन्‍हें राजनीति में कोई उल्‍लेखनीय उपलब्‍धि हासिल नहीं हो पाई।
इनके अलावा इसी ग्रुप में शामिल रहे चौथे छात्र का नाम राकेश यादव है जिन्‍हें लोग राकेश मामा के नाम से जानते हैं। राकेश यादव भी कांग्रेसी हैं और अब तक प्रदीप माथुर का साथ देकर अपनी निष्‍ठा पूरी कर रहे हैं। राकेश यादव एक इंटर कॉलेज के संचालक तो हैं ही, कामधेनु गऊशाला का भी संचालन करते हैं। वह एक बार कांग्रेस की टिकट पर एमएलसी का चुनाव लड़ चुके हैं किंतु उसमें सफलता नहीं मिल सकी।
बहरहाल, इन सभी स्‍टूडेंट्स ने मिलकर सड़क दुर्घटना में मारे गए उस युवक की बहिन का विवाह कराने के लिए चंदा इकठ्ठा किया और तय समय पर उसकी शादी करवा दी।
युवकों के इस नेक काम की गूंज प्रदेश सरकार के कानों तक पहुंची अत: प्रदेश सरकार ने इन युवकों को पुरस्‍कृत करने का ऐलान किया। तत्‍कालीन गवर्नर ने इन्‍हें पुरस्‍कृत किया तो ये युवक अचानक समाज में हीरो बनकर उभरे।
कांग्रेस को उस दौरान चुनाव लड़ाने के लिए साफ-सुथरी छवि वाले उत्‍साही युवकों की तलाश थी। मथुरा में कांग्रेस की यह तलाश प्रदीप माथुर के रूप में पूरी हुई जिसका बड़ा कारण हाईकमान तक प्रदीप माथुर के किन्‍हीं निकटस्‍थ रिश्‍तेदार की पहुंच भी बताई जाती है।
जो भी हो, इस तरह अचानक एक दुर्घटना से उपजे हालातों ने प्रदीप माथुर को पहले चुनावी चेहरा बनवाया और फिर विधायक।
पहला चुनाव जीतने के बाद प्रदीप माथुर अगले चुनाव में जीत दर्ज नहीं करा पाए किंतु राजनीति उन्‍हें रास आ गई। अब वह लगातार तीन बार से विधायक हैं। इस बीच केंद्र में भी कांग्रेस के नेतृत्‍व वाली सरकार काबिज रही किंतु प्रदीप माथुर ने मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के लिए ऐसा कोई काम नहीं किया जिसका उल्‍लेख किया जा सके।
वैसे खुद प्रदीप माथुर पहले यमुना नदी पर गोकुल बैराज को बनवाने का श्रेय लेते थे लेकिन जब से यह सिद्ध हुआ कि गोकुल बैराज सरकार के लिए सफेद हाथी तथा यमुना के लिए वरदान की जगह अभिषाप बन गया है तब से प्रदीप माथुर ने गोकुल बैराज के निर्माण का श्रेय लेना बंद कर दिया है।
यही हाल कांग्रेस के नेतृत्‍व वाली सरकार की जवाहर लाल नेहरू नेशनल अरबन रिन्‍यूअल मिशन यानि ''जे नर्म'' योजना का हुआ। जे नर्म में मथुरा को शामिल कराने का श्रेय प्रदीप माथुर ने डंके की चोट पर लिया और इस आशय का प्रचार किया कि इस योजना के धरातल पर उतरने के साथ मथुरा का कायाकल्‍प उसकी गरिमा के अनुसार होगा। इस योजना के तहत मथुरा के लिए 1800 करोड़ से अधिक की रकम निर्धारित की गई किंतु नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। जे नर्म के तहत हुए चंद कामों ने पूरे शहर का हुलिया बिगाड़ कर रख दिया और मथुरा की सूरत बनने की जगह बिगड़ती चली गई। यह बात अलग है कि इस योजना के तहत प्रथम फेज का काम पूरा कराने को जो करोड़ों रुपया मिला, उसका विभिन्‍न स्‍तर पर बंदरबांट होता रहा और काम समय पर पूरा न हो पाने की वजह से मथुरा को योजना से बाहर कर दिया गया। इस पूरे घपले में कहीं न कहीं विधायक प्रदीप माथुर की भी संलिप्‍तता का जिक्र होता रहा है लेकिन स्‍पष्‍टत: कुछ सामने नहीं आया।
आम जनता द्वारा ''जे नर्म'' में हुए घपले से विधायक प्रदीप माथुर को जोड़ने की एक वजह यह भी रही है कि इस बीच प्रदीप माथुर फर्श से अर्श तक जा पहुंचे जबकि हैसियत उनकी सिर्फ विधायक की ही थी। प्रदीप माथुर की माली हालत की बात करें तो अब वह प्रत्‍यक्ष में एक गैस एजेंसी और सर्वाधिक कीमती इलाके कृष्‍णा नगर में करोड़ों रुपए मूल्‍य की भव्‍य कोठी के मालिक हैं। उनकी संतानें मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर चुकी हैं और उनके नाम पर भी पॉश कॉलोनियों में अचल संपत्‍तियां हैं।
बताया जाता है कि प्रदीप माथुर की दूसरे व्‍यापारों में भी साझेदारी है किंतु इसकी पुष्‍टि नहीं हो सकी, अलबत्‍ता लोकपाल से शिकायत जरूर हुई।
एक ऐसे ही व्‍यापारिक मामले में सरकारी कर्ज को लेकर प्रदीप माथुर पर केस चला था और उसमें गैर जमानती वारंट भी जारी हुए थे लेकिन वर्तमान में उसका क्‍या स्‍टेटस है, यह कोई बताने को तैयार नहीं।
जाहिर है कि मथुरा के लिए प्रदीप माथुर ने कुछ किया या नहीं किया, किंतु अपने लिए इतना कुछ कर लिया है कि आगे आने वाली पीढ़ी को भी शायद ही कभी आर्थिक समस्‍या का सामना करना पड़े।
यमुना प्रदूषण मुक्‍ति के लिए शुरू की गई पदयात्रा में बाबा जयकृष्‍ण दास सहित यमुना भक्‍तों के साथ प्रदीप माथुर द्वारा केंद्र के इशारे पर किए गए धोखे से मथुरा की जनता बेहद नाराज है और इसीलिए इस बार जब प्रदीप माथुर नामांकन भरने से पहले यमुना पूजन करने पहुंचे तो उनका खासा विरोध किया गया।
मथुरा की जनता से पूछने पर वह साफ कहती है कि कुल चार बार की विधायकी में प्रदीप माथुर ने अपना घर खूब भरा लेकिन मथुरा का कोई भला नहीं कर पाए। मथुरा के लिए जो भी योजनाएं लाई गईं, उनका मकसद निजी स्‍वार्थ पूरे करना रहा न कि मथुरा को उसके गौरवशाली अतीत से रूबरू कराना।
ऐसे ही दूसरे एक्‍सीडेंटल पॉलिटीशियन हैं राष्‍ट्रीय लोकदल के प्रत्‍याशी डॉ. अशोक अग्रवाल। जहां तक सवाल बाल रोग विशेषज्ञ रहते राजनीति में आने वाले डॉ. अशोक अग्रवाल का है, तो इसका कारण बनी अपहरण की एक आपराधिक घटना वरना डॉ. अशोक, ''अशोक हॉस्‍पीटल'' के नाम से चौकी बाग बहादुर क्षेत्र में अपना अच्‍छा-खासा चिकित्‍सकीय व्‍यवसाय चला रहे थे।
यह आपराधिक घटना घटी सन् 2003 के जुलाई महीने में। इस घटना के तहत शहर के मशहूर डॉक्‍टर उमेश माहेश्‍वरी का मसानी क्षेत्र से तब देर शाम अपहरण कर लिया गया जब वो चौक बाजार स्‍थित अपनी क्‍लीनिक से एनएच टू स्‍थित अपने घर तथा हॉस्‍पीटल लौट रहे थे। माहेश्‍वरी हॉस्‍पीटल नामक इस संस्‍थान को डॉ. उमेश माहेश्‍वरी के पुत्र डॉ. मयंक माहेश्‍वरी व डॉ. शशांक माहेश्‍वरी संचालित करते हैं। हॉस्‍पीटल के ऊपर ही माहेश्‍वरी परिवार ने अपना निवास बना रखा है।
प्रसिद्ध चिकित्‍सक उमेश माहेश्‍वरी के अपहरण से मथुरा ही नहीं नजदीकी शहरों के चिकत्‍सा जगत में भी हंगामा मच गया क्‍योंकि डॉ. उमेश माहेश्‍वरी आम जनता के बीच काफी लोकप्रिय थे।
उस वक्‍त मथुरा के एसएसपी प्रेम प्रकाश हुआ करते थे। जाहिर है कि पुलिस पर डॉ. उमेश माहेश्‍वरी को जल्‍द से जल्‍द अपराधियों के चंगुल से छुड़ाने का खासा दबाव था लिहाजा पुलिस हाथ-पैर तो खूब मार रही थी किंतु नतीजा कुछ नहीं निकल रहा था।
इधर डॉ. उमेश माहेश्‍वरी के दोनों डॉ. पुत्र तथा अन्‍य लोग भी अपने स्‍तर से डॉ. साहब के बारे में जानकारी करने का पूरा प्रयास कर रहे थे।
इस दौरान पुलिस को पता लगा कि डॉ. उमेश माहेश्‍वरी के अपहरणकर्ताओं से कुछ लोग संपर्क साधने में सफल हुए हैं और उनकी अपहरणकर्ताओं से बातचीत चल रही है।
इन लोगों में कृष्‍ण जन्‍मभूमि की सुरक्षा ड्यूटी में तैनात पुलिस के ही एक सीओ त्रिदीप सिंह, अलीगढ़ में तैनात एलआईयू का एक सब इंस्‍पेटर मलिक सहित एक उद्योगपति, एक प्रसिद्ध वकील तथा एक डॉक्‍टर भी शामिल हैं।
पुलिस अभी और कुछ कर पाती कि इससे पहले किसी तरह डॉ. उमेश माहेश्‍वरी बदमाशों के चंगुल से मुक्‍त होने में सफल रहे। बदमाशों के चंगुल से मुक्‍त होकर डॉ. उमेश माहेश्‍वरी ने होटल मधुवन में एक प्रेस कांफ्रेस करके जो जानकारी दी, उसके मुताबिक पुलिस की उन्‍हें मुक्‍त कराने में कोई भूमिका नहीं रही।
डॉ. उमेश माहेश्‍वरी द्वारा दी गई जानकारी मथुरा पुलिस को काफी नागवार गुजरी और उसने अपना मुंह साफ करने के लिए सबसे पहले सीओ त्रिदीप सिंह पर शिकंजा कसा। पुलिस ने सीओ त्रिदीप सिंह के सरकारी घर से 11 लाख रुपए बरामद करते हुए बताया कि यह रकम बदमाशों को फिरौती देकर डॉ. उमेश माहेश्‍वरी को छुड़वाने के एवज में सीओ को मिली है तथा सीओ व अन्‍य कई लोग बदमाशों को फिरौती दिलवाने में शामिल रहे हैं। सीओ त्रिदीप सिंह को आरोपी बनाकर जेल भेजने के बाद पुलिस ने रात में फौजदारी के प्रसिद्ध वकील राम सरीन के डेंपियर नगर स्‍थित आवास पर दविश दी और फिर चौकी बाग बहादुर स्‍थित डॉ. अशोक के निवास को घेर लिया।
पुलिस ने डॉ. अशोक पर बदमाशों के साथ सांठगांठ होने का आरोप लगाया और कहा कि फिरौती की रकम दिलवाने में उनकी भी भूमिका रही है। पुलिस ने डॉ. अशोक और एडवोकेट राम सरीन को गिरफ्तार तो नहीं किया लेकिन उनके यहां पुलिसिया तांडव जमकर किया।
डा. अशोक को पुलिस के इस अप्रत्‍याशित व्‍यवहार ने पूरी तरह हिला दिया अत: उन्‍होंने पुलिसिया हरकत के अगले दिन अपने हॉस्‍पीटल में एक प्रेस कांफ्रेंस बुलाई। प्रेस कांफ्रेस में डॉ. अशोक ने जो जानकारी दी वो चौंकाने वाली थी।
डॉ. अशोक ने बताया कि पुलिस द्वारा उनके यहां दविश देने से पहले मथुरा दैनिक जागरण के ब्‍यूरो चीफ अमी आधार निडर का फोन उनके पास आया था और उन्‍होंने मुझसे एसएसपी के नाम से 5 लाख रुपयों की मांग की।
डॉ. अशोक ने तब प्रेस कांफ्रेंस में बताया कि अमी आधार निडर ने उनसे साफ कहा है कि एसएसपी प्रेम प्रकाश उनके घर पर बैठे हैं और यदि यह मांग पूरी नहीं की गई तो रात में आपको आरोपी बनाकर जेल भेज दिया जाएगा।
डॉ. अशोक ने प्रेस कांफ्रेस में बाकायदा रोते हुए सिलसिलेवार पुलिस और अमी आधार निडर के धमकाने का ब्‍यौरा देकर कहा कि यदि मुझे न्‍याय नहीं मिला तो मैं आत्‍महत्‍या कर लूंगा।
डॉ. अशोक के साथ हुई इस घटना के बाद एसएसपी प्रेम प्रकाश का तबादला पड़ोसी जनपद अलीगढ़ के लिए कर दिया गया और दैनिक जागरण ने अमी आधार निडर को भी हटा दिया।
इसके काफी समय बाद सीओ त्रिदीप सिंह को पहले जमानत मिली और फिर अदालत ने उन्‍हें निर्दोष भी माना। सीओ के यहां से पुलिस द्वारा बरामद दिखाया गया 11 लाख रुपया सीओ को मिल गया किंतु उस घटना ने डॉ. अशोक को राजनीति में कदम रखने के लिए प्रेरित किया।
डॉ. अशोक ने सबसे पहले बहुजन समाज पार्टी की सदस्‍यता ली। बहुजन समाज पार्टी ने उन्‍हें विधानसभा का चुनाव लड़ने को तैयार भी किया किंतु ऐन वक्‍त पर उनका पत्‍ता काटकर देवेन्‍द्र गौतम ''गुड्डू'' को टिकट पकड़ा दिया। इधर गुड्डू गौतम चुनाव हार गए और उधर डॉ. अशोक ने बसपा छोड़कर सपा का दामन थाम लिया।
2012 का विधानसभा चुनाव वह सपा के टिकट पर लड़े भी लेकिन कांग्रेस व रालोद के गठबंधन उम्‍मीदवार प्रदीप माथुर से मात्र 1500 मतों के अंतर से हारकर तीसरे नंबर पर रहे। यही रालोद जिसके टिकट पर डॉ. अशोक अब चुनाव लड़ रहे हैं।
इस बार सपा कांग्रेस के गठबंधन से मथुरा-वृंदावन विधानसभा क्षेत्र की सीट सिटिंग विधायक तथा कांग्रेस विधानमंडल दल के नेता प्रदीप माथुर के खाते में चली गई और सारी तैयारियों के बाद भी डॉ. अशोक मुंह देखते रह गए।
मौका देखकर राष्‍ट्रीय लोकदल ने डॉ. अशोक को लपक लिया और उन्‍हें अपना टिकट थमाकर मथुरा-वृंदावन से चुनाव मैदान में उतार दिया क्‍योंकि रालोद के पास इस सीट के लिए कोई कद्दावर केंडीडेट था ही नहीं।
दुर्घटनावश राजनीति में आए प्रदीप माथुर की गिनती आज घाघ राजनीतिज्ञों में होती है जबकि चार बार विधायक रहकर भी उन्‍होंने मथुरा के लिए कुछ नहीं किया। हां, अपने लिए खूब किया। इतना किया कि राजनीति में आने से पहले जिस प्रदीप माथुर की हैसियत स्‍कूटर पर चलने की नहीं थी आज वह करोड़ों की चल-अचल संपत्‍ति के मालिक हैं।
इसी सीट से बसपा के प्रत्‍याशी योगेश द्विवेदी कुछ वर्षों पहले तक होटल में बैरे का काम करते थे। खुद योगेश द्विवेदी ने अपने इस रूप की फोटो सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक पर डाली हुई हैं जिनमें वह बहिन मायावती व मान्‍यवर कांशीराम की खिदमत करते दिखाई दे रहे हैं। उनसे पहले उनकी मां पुष्‍पा शर्मा भी इसी प्रकार स्‍वास्‍थ्‍य विभाग में एएनएम थीं और बाद में नगर निकाय का चुनाव लड़कर वृंदावन नगर पालिका की अध्‍यक्ष बनीं। पुष्‍पा शर्मा ने एक चुनाव विधायकी का भी लड़ा लेकिन उसमें उन्‍हें असफलता हाथ लगी थी। इसी प्रकार योगेश द्विवेदी ने 2009 का लोकसभा चुनाव भी बसपा की टिकट पर लड़ा था किंतु वह हार गए। योगेश द्विवेदी की मां पुष्‍पा शर्मा अपनी आपराधिक छवि के कारण राजनीति में आईं और उनकी प्रेरणास्‍त्रोत दस्‍यु सुंदरी से सांसद बनीं फूलन देवी रहीं। फूलन देवी से उनकी निकटता हमेशा चर्चा का विषय रही है।
अब शेष रह जाते हैं भाजपा के राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता और प्रत्‍याशी श्रीकांत शर्मा। श्रीकांत शर्मा का राजनीति में प्रवेश किसी घटना-दुर्घटनावश हुआ या नहीं, इसके बारे में तो कहना मुश्‍किल है लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि उनके राजनीतिक कद तथा उम्‍मीदवारी को उनकी ही पार्टी के लोग किसी बड़ी दुर्घटना से कम नहीं मानते।
मथुरा में एक से एक धुरंधर नेता मुंह देखते रह गए और श्रीकांत शर्मा अचानक हवाई मार्ग द्वारा उस धरा पर उतरे, जिस धरा को वह बीस साल पहले ही छोड़ चुके थे। खुद को गोवर्धन विधानसभा क्षेत्र के गांव गंठौली निवासी बताने वाले श्रीकांत शर्मा हिमालय में तपस्‍या करके अमित शाह को प्राप्‍त कर पाए अथवा अमित शाह ने हिमालय जाकर उन्‍हें हासिल किया, इस रहस्‍य को जानने के लिए मथुरा की जनता बेहद उत्‍साहित है। जनता को उनकी जीत-हार से ज्‍यादा इस बात में रुचि है कि बीस साल से अधिक समय तक वह राजनीति के किन गलियारों की शोभा बढ़ा रहे थे और कैसे मोदी सरकार के साथ-साथ राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता व राष्‍ट्रीय सचिव जैसे पदों पर नमूदार हो गए।
श्रीकांत शर्मा की शहरी सीट पर उम्‍मीदवारी मथुरा की जनता के लिए किसी रहस्‍य-रोमांच से कम नहीं है। आम मतदाता और खुद पार्टी के भी एक बड़े तबके के लिए उनकी उम्‍मीदवारी किसी दुर्घटना की तरह है।
अब देखना यह है कि इन चारों एक्‍सीडेंटल पॉलिटीशियन में से किस के सिर जीत का सेहरा बंधता है और कौन-कौन हार से रूबरू होता है परंतु यह निश्‍चित है कि मथुरा का विकास एकबार फिर यक्षप्रश्‍न बनने जा रहा है।
यक्ष प्रश्‍न इसलिए क्‍योंकि इन चुनावों से ठीक पहले भी मथुरा की जनता को कुछ ऐसी ही आस बंधाई गई थी, ऐसे ही वायदे किए गए थे और ऐसी ही तकरीरें सुनाई गईं थीं जो अब दिवास्‍वप्‍न बनकर रह गई हैं।
मथुरा की स्‍वप्‍न सुंदरी सांसद अब कहती हैं कि मथुरा के विकास में अखिलेश सरकार रोड़े अटकाती रही है इसलिए विकास चाहिए तो प्रदेश में भी भाजपा की सरकार बनवाइए।
पता नहीं चुनावों का ऊंट किस करवट बैठेगा लेकिन यह जरूर पता है कि किसी न किसी दुर्घटनावश राजनीति में प्रवेश करने वाले मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के ये प्रत्‍याशी क्‍या-क्‍या गुल खिलायेंगे। जीत किसी की हो लेकिन जनता की हार पहले से तय है क्‍योंकि एक्‍सीडेंटल राजनीतिज्ञों से और उम्‍मीद भी क्‍या की जा सकती है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

रविवार, 8 जनवरी 2017

घड़ी-घड़ी घड़ियाल बजावै, ना जाने घड़ी कैसी आवै

समय के बारे में एक पुरानी कहावत ब्रज क्षेत्र में मशहूर है। कहावत यह है कि ”घड़ी-घड़ी घड़ियाल बजावै, ना जाने घड़ी कैसी आवै”।
इत्‍तफाकन फिलहाल यह कहावत समाजवादी कुनबे पर पूरी तरह सटीक बैठती है। लगता है समाजवादी कुनबे को भी इस बात का अहसास हो चुका है कि उनका खराब समय अब शुरू हो चुका है, और संभवत: इसीलिए ऊपर दिए गए चित्र में कुनबे के दो वरिष्‍ठजन अपनी-अपनी घड़ियों पर एकसाथ नजर गढ़ाए बैठे हैं।
अमर सिंह ने कल मीडिया से बात करते हुए सच ही कहा था कि ”माटी कहे कुम्‍हार से तू क्‍या रूंधे मोय, इक दिन ऐसा आएगा मैं रूधूंगी तोय”।
मुलायम सिंह को ज़मीन से जुड़ा नेता कहा जाता है। समय का खेल देखिए कि जमीन से जुड़े इस नेता की सारी साख अब जमीन में मिलती जा रही है। मिट्टी के जिन अखाड़ों से कुश्‍ती के दांव-पेंच सीखकर मुलायम सिंह ने राजनीति के बड़े-बड़े धुरंधरों को मिट्टी सुंघा दी, वही मुलायम सिंह अब अपने बेटे के हाथों चित्‍त होते जा रहे हैं।
अमर सिंह ने कल एक और बात कही थी। उन्‍होंने कहा था कि राजनीति बड़ी निर्मम होती है। पता नहीं अमर सिंह को इसका अहसास कब हुआ, लेकिन जब भी हुआ…बहुत सही हुआ।
कुछ लोग समाजवादी कुनबे में चल रहे इस कलह को एक ऐसा नाटक बता रहे हैं जो अखिलेश को पूर्ण उत्‍तराधिकार सौंपने की खातिर मुलायम व अखिलेश द्वारा मिलकर खेला जा रहा है।
अगर यह सच है, और हर रोज अपने निम्‍नतम स्‍तर तक पहुंचने वाला समाजवादी पार्टी का कलह वाकई किसी नाटक की स्‍क्रिप्‍ट का हिस्‍सा है तो निश्‍चित ही इसका स्‍क्रिप्‍ट राइटर बेहद घटिया होगा। उसकी सोच ”औरंगजेब” से प्रभावित रही होगी।
माना कि मुलायम सिंह का राजनीतिक इतिहास तमाम छल-प्रपंच, धोखाधड़ी और मौकापरस्‍ती से भरा पड़ा है किंतु इसमें भी कोई दो राय नहीं कि देश को अब तक का सबसे बड़ा राजनीतिक कुनबा देने में उनकी भूमिका अद्वितीय रही है।
मुलायम ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि राजनीति की जिस वंशावली को वह वटवृक्ष मानकर चल रहे थे, वह उनके सामने ही न सिर्फ विषबेल में तब्‍दील हो जाएगी बल्‍कि उन्‍हें भी विषपान करने पर मजबूर कर देगी।
अमर सिंह की मानें तो शिवपाल ने ही चार साल की उम्र से अखिलेश की परवरिश की क्‍योंकि मुलायम तब राजनीति में बहुत व्‍यस्‍त हो चुके थे। तो क्‍या शिवपाल की परवरिश में ही खोट निकली, या फिर मौका मिलते ही अखिलेश ”नमक हराम” हो गए।
कहते हैं खून का रंग बहुत गाढ़ा होता है। वह आसानी से नहीं धुलता लेकिन यहां तो ऐसा लग रहा है जैसे समाजवादी कुनबे का खून पानी हो चुका है। मुलायम का ”अमर प्रेम” उनके अपने खून को नागवार गुजर रहा है और चाचा शिवपाल पर अखिलेश की परवरिश भारी पड़ रही है।
जो भी हो, लेकिन चुनावों के मुहाने पर खड़े होकर राजनीति की विरासत के लिए मची इस कलह का नतीजा समाजवादी पार्टी को चुनाव परिणामों में जरूर दिखाई देगा, हालांकि अखिलेश यादव को अब भी अपनी जीत का भरोसा है।
हो सकता है कि सीएम की ऊंची कुर्सी पर बैठे अखिलेश को जमीनी हकीकत दिखाई न दे रही हो और इसीलिए वह अपनी जीत के प्रति आश्‍वस्‍त हों किंतु मुलायम व शिवपाल काफी हद तक अपनी हकीकत समझ चुके हैं। वो सार्वजनिक रूप से इसे स्‍वीकार करें या न करें लेकिन उन्‍हें इस बात का अहसास हो चुका है कि घड़ी की सुइयां अब उनके मन माफिक नहीं चल रहीं।
जिस समाजवाद के रथ पर सवार होकर मुलायम एंड पार्टी ने लंबे समय तक देश के सबसे बड़े सूबे की राजनीति को अपनी उंगलियों पर नचाया, वही समाजवाद का रथ अब उनके अपने खून की वजह से कीचड़ में धंसता दिखाई दे रहा है।
इसे अखिलेश की महत्‍वाकांक्षा कहें या मुलायम का पुत्र मोह कि समाजवादी पार्टी का ”समाजवाद” पूरी तरह बिखर चुका है। मुलायम सिंह द्वारा ”परिवारवाद” में तब्‍दील की गई ”समाजवाद” की परिभाषा अब नए सिरे से लिखी जा रही है। इस परिभाषा में बेशक पितृदोष नजर आता हो परंतु आज का सत्‍य यही है।
सत्‍य यह भी है कि सत्‍ता की खातिर उपजे संघर्ष में रिश्‍तों की बलि हमेशा चढ़ाई जाती रही है। वह युग चाहे राजा-महाराजाओं और बादशाहों का हो अथवा लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारों का। सत्‍ता संघर्ष में इतिहास हर युग के अंदर खुद को दोहराता रहा है।
नि: संदेह जीवन के लगभग 80 वसंत देख चुके मुलायम ने अपने खिलाफ करवट बदल रहे समय की नब्‍ज पहचान कर ही बेटे से सुलह की कोशिशों को अंजाम तक पहुंचाने का प्रयास किया होगा लेकिन तय है कि समय अब मुलायम का साथ छोड़ चुका है। कल को हो सकता है कि शिवपाल भी अपना कोई अलग रास्‍ता चुन लें क्‍योंकि बूढ़े दरख़्त के गिरने का खतरा ज्‍यादा होता है, उससे आसरे की उम्‍मीद काफी कम।
मुलायम और शिवपाल अपनी-अपनी कलाइयों पर बंधी घड़ी भले ही एक ही टाइम पर देख रहे हों किंतु दोनों के घड़ी देखने का मकसद अलग-अलग भी हो सकता है।
दरअसल, घड़ियां समय जरूर बताती हैं लेकिन यह खुद को ही तय करना होता है कि समय शुरू हो रहा है अथवा समय पूरा हो रहा है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

समाजवादी पार्टी के अंदर जल्‍द हो सकता है बड़ा विस्‍फोट, अखिलेश कर सकते हैं नई पार्टी का ऐलान

समाजवादी पार्टी में इन दिनों सतही तौर पर दिखाई दे रही शांति दरअसल उस तूफान का आगाज़ है जो चुनावों की विधिवत घोषणा से पहले किसी भी समय आने वाला है।
पार्टी के ही अति विश्‍वसनीय सूत्रों की मानें तो नोटबंदी के बाद अचानक समाजवादी पार्टी में सुलह का जो दिखावा किया गया, वह सिर्फ रोज-रोज हो रही छीछालेदर से बचने का उपक्रम भर था। हकीकत में कहीं कुछ बदला नहीं था।
बहुत तेजी से यदि कुछ बदल रहा था तो वह थीं निष्‍ठाएं। ये बदली हुई निष्‍ठाएं ही अब राख के ढेर में दबी हुई चिंगारी का काम कर रही हैं।
बताया जाता है कि प्रदेश अध्‍यक्ष की कुर्सी पर काबिज होने के बाद जिस तरह चचा शिवपाल यादव चुन-चुनकर अखिलेश के खास लोगों की टिकट काट रहे हैं, उससे अखिलेश का पारा सातवें आसमान तक जा पहुंचा है।
स्‍थिति-परिस्‍थितियों के मद्देनजर अखिलेश ने पहले भी इस तरह की मांग रखी थी कि उम्‍मीदवारों के चयन में उनका दखल रखा जाए किंतु अखिलेश की मांग को चचा शिवपाल के साथ-साथ नेताजी ने भी तवज्‍जो नहीं दी।
अखिलेश की मांग के विपरीत चचा शिवपाल ने एक ओर जहां उनके नजदीकियों की टिकट काटना शुरू कर दिया वहीं दूसरी ओर उन माफियाओं की उम्‍मीदवारी पर मोहर लगा दी जो अखिलेश को फूटी आंख नहीं सुहाते।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक चचा शिवपाल के इस कारनामे ने राख के ढेर में दबी चिंगारियों को हवा देने का काम किया, नतीजतन अखिलेश ने आर-पार की लड़ाई लड़ने का मन बना लिया है।
आमसभाओं में अखिलेश भले ही विवादास्‍पद मुद्दों पर यह कहकर पल्‍ला झाड़ लेते हों कि इन मुद्दों पर निर्णय नेताजी लेंगे किंतु खास मौकों पर अखिलेश यह जताना नहीं भूलते कि उनकी सहमति के बिना कुछ नहीं हो पाएगा। बड़े निर्णय उनकी मोहर लगे बिना किसी मुकाम तक नहीं पहुंच सकते। फिर चाहे बात कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन की हो अथवा उम्‍मीदवारों को फाइनल करने की।
यही कारण है कि हाल ही में उन्‍होंने एक कार्यक्रम के दौरान यहां तक कह दिया था कि कोई साथ हो या न हो, यदि जनता साथ है तो एकबार फिर मेरी सरकार बनने से कोई नहीं रोक सकता।
पार्टी सूत्रों के अनुसार फिलहाल चचा-भतीजे के बीच प्रतिष्‍ठा का सबसे बड़ा मुद्दा या यूं कहें कि नाक की लड़ाई, पार्टी के प्रदेश अध्‍यक्ष पद को लेकर है।
पार्टी के सूत्र बताते हैं कि अखिलेश ने इस मुद्दे पर पार्टी और परिवार के बीच साफ संदेश भी दे दिया है। अखिलेश ने कह दिया है कि या तो चचा से प्रदेश अध्‍यक्ष का पद छीनकर उसकी कमान उनके हाथों में सौंप दी जाए ताकि वह जिताऊ उम्‍मीदवारों को मैदान में उतारकर दोबारा सपा की सरकार बनाने का मार्ग प्रशस्‍त किया जा सके अन्‍यथा वह अपना अलग मार्ग चुन लेंगे। अखिलेश ने इसके लिए समय भी निर्धारित कर दिया है। यानि जो करना है, वह निर्वाचन आयोग की घोषणा से पहले।
गौरतलब है कि इसी महीने निर्वाचन आयोग द्वारा उत्‍तर प्रदेश में चुनावों की तिथियां घोषित किए जाने की पूरी उम्‍मीद है और उसके बाद आदर्श आचार संहिता लागू हो जाएगी। अखिलेश इससे पहले ही अपने राजनीतिक भविष्‍य की दिशा तय कर लेना चाहते हैं।
बताया जाता है कि समय रहते यदि नेताजी ने अखिलेश के मन मुताबिक शिवपाल यादव को किनारे नहीं लगाया और प्रदेश अध्‍यक्ष की कमान अखिलेश को नहीं सौंपी तो अखिलेश अपनी अलग राह पर चलने का ऐलान कर सकते हैं। वह उत्‍तराधिकार की लड़ाई को दरकिनार कर नई पार्टी के गठन की घोषणा कर सकते हैं।
और अगर ऐसा होता है तो निश्‍चित ही समाजवादी पार्टी इन चुनावों में मुख्‍य मुकाबले से बाहर हो जाएगी। यह बात अलग है कि उसके बाद निगाहें पूरी तरह अखिलेश की परफॉरमेंस पर टिकी होंगी और अखिलेश की परफॉरमेंस ही यह तय करेगी कि समाजवादी पार्टी का भविष्‍य क्‍या होगा।
- सुरेंन्‍द्र  चतुर्वेदी

सोमवार, 5 दिसंबर 2016

बलात्‍कार के आरोपी से Chief justice का मिलना बन सकता है बड़े विवाद का कारण

इलाहाबाद हाई कोर्ट के Chief justice दिलीप बाबा साहब भोसले की मथुरा यात्रा के दौरान बलात्‍कार के एक आरोपी से मुलाकात बड़े विवाद का कारण बन सकती है। दरअसल, जिस व्‍यक्‍ति के साथ चीफ जस्‍टिस भोसले को हाथ मिलाते हुए फोटो सोशल साइट पर डाले गए हैं, उसी व्‍यक्‍ति के खिलाफ बलात्‍कार जैसे संगीन अपराध का यह मामला चीफ जस्‍टिस भोसले की ही अदालत में लंबित है।
सोशल साइट पर चीफ जस्‍टिस भोसले से अपनी मुलाकात के फोटो बलात्‍कार के इसी आरोपी द्वारा शेयर किए गए हैं जिनसे साफ जाहिर होता है कि उसका चीफ जस्‍टिस से मुलाकात करने का उद्देश्‍य क्‍या था। हालांकि, यह संभव है कि चीफ जस्‍टिस भोसले को इस मुलाकाती की असलियत और अपने यहां उसके खिलाफ लंबित बलात्‍कार के मामले की जानकारी न हो किंतु विधि विशेषज्ञों के अनुसार चीफ जस्‍टिस भोसले का इस तरह मुलाकात करना न सिर्फ प्रोटोकॉल के खिलाफ है बल्‍कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस संबंध में जारी गाइड लाइंस की अवहेलना भी है।
cjbhosle-kkउल्‍लेखनीय है कि इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय के चीफ जस्‍टिस डीबी भोसले गत शनिवार को अपनी पत्‍नी सहित मथुरा आए थे। इस दौरान वह मथुरा में भगवान द्वारिकाधीश तथा वृंदावन में ठाकुर बांके बिहारी के दर्शन करने भी गए।
इसी दौरान चीफ जस्‍टिस से एनयूजेआई के कार्यकारिणी सदस्य, उपजा के प्रदेश उपाध्यक्ष व ब्रज प्रेस क्लब के अध्यक्ष कमलकांत उपमन्यु एडवोकेट ने भी एक कथित प्रतिनिधमंडल के साथ शिष्‍टचार मुलाकात की। एडवोकेट के लिबास काले कोट व कॉलर बैंड में की गई इस मुलाकात के दौरान चीफ जस्‍टिस भोसले, कमलकांत उपमन्‍यु से बड़ी गर्मजोशी के साथ हाथ मिलते हुए दिखाई दिए जबकि बाकी पत्रकारगण हाथ बांधे खड़े नजर आए।
कमलकांत उपमन्‍यु ने उसी दिन शाम को चीफ जस्‍टिस भोसले से अपनी इस मुलाकात के फोटो पूरी न्‍यूज़ सहित अपनी दोनों फेसबुक आईडी पर शेयर भी किए। कमलकांत उपमन्‍यु की एक फेसबुक आईडी कमलकांत उपमन्‍यु के नाम से है जबकि दूसरी कमलकांत उपमन्‍यु II के नाम पर है।
क्‍या है पूरा मामला:
मथुरा में पंजाब केसरी के रिपोर्टर कमलकांत उपमन्‍यु के खिलाफ एक लड़की द्वारा अपने साथ दुराचार तथा यौन उत्‍पीड़न सहित अपने परिचितों को जान से मारने की धमकी देने जैसे संगीन आरोप वर्ष 2014 के दिसंबर माह में लगाये गए। तब मथुरा की एसएसपी मंजिल सैनी हुआ करती थीं। मंजिल सैनी फिलहाल लखनऊ की एसएसपी हैं।
cj-1-kkमंजिल सैनी से अति घनिष्‍ठता के चलते कमलकांत उपमन्‍यु के खिलाफ पहले तो बलात्‍कार का अपराध पंजीकृत ही नहीं किया गया और पीड़िता द्वारा तहरीर दिए जाने के बावजूद उस पर जांच के आदेश कर दिए गए। शहर में इस मामले को लेकर काफी आक्रोश पैदा होने के उपरांत बमुश्‍किल 06 दिसंबर 2014 को थाना हाईवे में आईपीसी की धारा 376 व 506 मुकद्दमा अपराध संख्‍या 944/ 2014 के तहत एफआई आर दर्ज की गई किंतु आरोपी की गिरफ्तारी फिर भी नहीं हुई।
हां, इतना जरूर हुआ कि पब्‍लिक के दबाव में एसएसपी को पीड़िता का मैडिकल कराना पड़ा और उसके बाद 161 तथा 164 के बयान भी दर्ज कराने पड़े। इस आधार पर आरोपी पत्रकार के खिलाफ 82 की कार्यवाही हुई तथा अदालत से वारंट भी जारी किए गए लेकिन इस सब के बावजूद मथुरा पुलिस कमलकांत उपमन्‍यु की गिरफ्तारी सुनिश्‍चित नहीं कर सकी।
मंजिल सैनी ने तो पीड़िता के परिवार को दबाव में लेने के लिए उसके सगे भाई पर ही एक मुकद्दमा दर्ज करा दिया जो बाद में झूठा साबित हुआ।
बताया जाता है कि एसएसपी मंजिल सैनी आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु से अपनी निकटता के चलते उन्‍हें अपने बचाव तथा मामले को रफा-दफा करने का पूरा मौका दे रही थीं।
हुआ भी यही। कमलकांत उपमन्‍यु ने मथुरा पुलिस से मिले इस मौके का लाभ उठाकर तत्‍कालीन डीजीपी आनंद लाल बनर्जी से किसी तरह सेटिंग कर ली और अपने सगे भाई त्रिभुवन उपमन्‍यु के प्रार्थना पत्र पर अपने खिलाफ जांच को फिरोजाबाद ट्रांसफर करा लिया। चूंकि सारा मामला सेटिंग से हुआ था इसलिए फिरोजाबाद पुलिस ने इस मामले में फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी।
इस बीच मथुरा बार एसोसिएशन के तत्‍कालीन अध्‍यक्ष एडवोकेट विजयपाल तोमर ने जांच ट्रांसफर किए जाने के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की जिसकी सुनवाई तत्‍कालीन चीफ जस्‍टिस डी वाई चंद्रचूढ़ के यहां हुई।
चीफ जस्‍टिस डी वाई चंद्रचूढ़ ने प्रथम दृष्‍ट्या इस मामले की गंभीरता के मद्देनजर बहुत सख्‍त आदेश-निर्देश जारी किए।
डी वाई चंद्रचूढ़ का प्रमोशन हो जाने के बाद यह मामला जस्‍टिस अरुण टंडन तथा जस्‍टिस सुनीता अग्रवाल की डिवीजन बैंच में स्‍थानांतरित हो गया। माननीय टंडन तथा सुनीता अग्रवाल ने इस मामले की सुनवाई करते हुए 12 जुलाई 2016 के अपने आदेश में मुख्‍यमंत्री उत्‍तर प्रदेश अखिलेश यादव के स्‍पेशल ऑफीसर इंचार्ज जगजीवन प्रसाद, डीजीपी उत्‍तर प्रदेश तथा एसएसपी मथुरा को 25 जुलाई तक अपने-अपने शपथपत्र दाखिल करने को कहा। कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी पूछा कि जिस तरह से बलात्‍कार पीड़िता के कोर्ट में बयान होने के बावजूद जांच ट्रांसफर कर दी गई, उसे देखते हुए क्‍यों न यह मामला सीबीआई के सुपुर्द कर दिया जाए।
हाईकोर्ट के आदेश का पालन करते हुए तत्‍कालीन डीजीपी आनंद लाल बनर्जी व तत्‍कलीन एसएसपी मथुरा मंजिल सैनी ने तो अपने-अपने जवाब सहित शपथ पत्र दाखिल कर दिए किंतु सीएम के स्‍पेशल ऑफीसर इंचार्ज जगजीवन प्रसाद ने अपना जवाब दाखिल नहीं किया।
शासन के अनुरोध पर हाईकोर्ट ने जगजीवन प्रसाद को जवाब दाखिल करने के लिए कुछ समय और देते हुए अगली तारीख 08 अगस्‍त मुकर्रर कर दी।
इसके बाद चीफ जस्‍टिस के पद पर दिलीप बाबा साहब भोसले की नियुक्‍ति हो जाने के कारण यह मामला स्‍वाभाविक रूप से उनकी अदालत में आ गया, और काफी दिनों तक अनलिस्‍टेड रहा ताकि इसकी सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर की जा सके किंतु विभिन्‍न कारणों से इसकी सुनवाई प्राथमिकता के आधार पर नहीं की जा सकी।
प्राप्‍त जानकारी के अनुसार गत माह इसे मार्च 2017 के लिए लिस्‍टेड किया गया है लेकिन पेंडिंग मुकद्दमों की तादाद तथा अदालती प्रक्रिया को देखते हुए इस बात की संभावना काफी कम है कि मार्च 2017 में भी इस मामले की सुनवाई हो पाएगी।
इसी सबके चलते अब आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु का मथुरा में चीफ जस्‍टिस से मिलना और चीफ जस्‍टिस का उससे बड़ी गर्मजोशी के साथ हाथ मिलाते हुए फोटो सार्वजनिक होना बड़े विवाद का विषय बन सकता है क्‍योंकि चीफ जस्‍टिस की ऐसी कोई मुलाकात किसी के साथ होना उनके कार्यक्रम का हिस्‍सा नहीं था। आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु चूंकि खुद को पत्रकार के साथ-साथ वकील भी मानता है इसलिए वह चीफ जस्‍टिस से मुलाकात के वक्‍त वकालत का चोगा भी धारण किए था किंतु चीफ जस्‍टिस की न तो पत्रकारों से कोई वार्ता पूर्व निर्धारित थी और ना ही वकीलों से। संभवत: इसीलिए मथुरा बार एसोसिएशन का कोई पदाधिकारी अथवा प्रेक्‍टिशनर वकील चीफ जस्‍टिस से मिलने नहीं पहुंचा, अलबत्‍ता नॉन प्रेक्‍टिश्‍नर वकील होते हुए आरोपी पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु वकालत के चोगे में उनसे मिला।
ऐसी स्‍थिति में यह सवाल उठना स्‍वाभाविक है कि कमलकांत उपमन्‍यु की चीफ जस्‍टिस से मुलाकत कराने में किसी न किसी ने मध्‍यस्‍थ की भूमिका जरूर अदा की होगी और निश्‍चित तौर पर वह व्‍यक्‍ति न्‍यायपालिका का ही हिस्‍सा होगा क्‍योंकि हाई कोर्ट के चीफ जस्‍टिस जैसी हस्‍ती से बिना किसी तय कार्यक्रम के इस तरह मुलाकात होना संभव नहीं होता।
प्रोटोकॉल को ताक पर रखकर की गई इस मुलाकात और इसके पीछे छिपे उद्देश्‍य की जांच यूं भी जरूरी है कि इससे कानून का भरोसा जुड़ा हुआ है। चीफ जस्‍टिस भोसले की आदलत में ही आगे कमलकांत उपमन्‍यु के खिलाफ सुनवाई होनी है।
आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु ने जिस तरह चीफ जस्‍टिस भोसले से हुई अपनी मुलाकात को एक ओर जहां अपनी फेसबुक प्रोफाइल से प्रचारित व प्रसारित किया है और दूसरी ओर प्रमुख समाचार पत्रों में प्रकाशित कराया है, उससे उसकी मंशा तो साफ जाहिर होती ही है।
इन हालातों में चीफ जस्‍टिस भोसले द्वारा बलात्‍कार के आरोपी पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु से हाथ मिलाते हुए फोटो प्रकाशित होने पर सवाल खड़े होंगे ही।
उधर इलाहाबाद हाई कोर्ट में इस मामले को ले जाने वाले याची अधिवक्‍ता विजयपाल तोमर का कहना है कि वह चीफ जस्‍टिस व आरोपी की मुलाकात का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक ले जाएंगे जिससे इसके पीछे छिपे उद्देश्‍य और मुलाकात तय कराने वाले तत्‍वों का पर्दाफाश हो सके।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बुधवार, 30 नवंबर 2016

यूपी के 60 IAS अफसरों ने नहीं दिया अब तक अपनी अचल संपत्‍ति का ब्‍यौरा, कई लापता

यूपी के 60 IAS अफसरों ने एक वर्ष बीत जाने के बावजूद अब तक सरकार को अपनी अचल संपत्ति का ब्यौरा नहीं दिया है। यूपी की नौकरशाही में अफसरों के रवैये को लेकर यह बड़ी जानकारी मिली है। बता दें कि इनमें दो आईएएस आलोक रंजन और जावेद उस्मानी यूपी सरकार में चीफ सेक्रेटरी भी रहे हैं। संपत्ति का ब्यौरा नहीं देने वाले कुछ अफसर कई वर्षों से लापता हैं। कई ऐसे भी हैं जिन्होंने पिछले कुछ वर्षों से अपनी सम्पत्ति का कोई ब्यौरा ही नहीं दिया जबकि 2015 के लिए इन अफसरों को इस वर्ष 31 जनवरी तक सम्पति का ब्यौरा उपलब्ध कराना था।
नीचे पढ़िए सबसे ज्यादा डिफाल्टर यूपी
यूपी में बार-बार आदेश के बावजूद आईएएस अफसर संपत्ति का ब्यौरा देने में आनाकानी कर रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक ऐसे अफसरों की संख्या 60 के करीब है।
केन्द्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग की रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में कुल 166 अफसर ऐसे हैं, जिन्होंने वर्ष 2015 के लिए अपनी संपत्ति का ब्यौरा नहीं दिया है।
इनमें सर्वाधिक अफसर यूपी कैडर के हैं। 2014 में देश भर से ब्यौरा नहीं देने वाले 329 अफसरों में अकेले यूपी से 29 अफसर शामिल हैं।
दिलचस्प है लापता अफसरों की कहानी
संपत्ति का ब्यौरा नहीं देने वाले कई आईएएस अफसर लंबे वक्त से लापता हैं। इनमें एक नाम रीता सिंह का है जो 22 अप्रैल 2003 से छुट्टी पर हैं।
इनकी अनिवार्य सेवानिवृति को लेकर केन्द्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय ने राष्ट्रपति को पिछले वर्ष पत्र भी लिखा था।
इनके अलावा संजय भाटिया, अतुल बागई, संजीव आहलुवालिया नाम के आईएएस अफसरों ने भी लंबे वक्त से अपनी सम्पति का ब्यौरा नहीं दिया है।
ये सभी अफसर लापता भी है। आईएएस अनीता श्रीवास्तव, शैलेश कृष्ण, पीवी जगमोहन, संजय भाटिया जैसे कई अफसर हैं, जिन्होंने कई वर्षों का संपत्ति का ब्यौरा उपलब्ध नहीं कराया है।
अखिलेश सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले और हाल ही में राजनीति में उतरे आईएएस डॉ. सूर्य प्रताप सिंह ने भी दो वर्षों से अपनी संपत्ति का ब्यौरा विभाग को उपलब्ध नहीं कराया है।

मथुरा के डॉक्‍टर्स भी आयकर विभाग के निशाने पर, शीघ्र होगी बड़ी कार्यवाही

मथुरा के डॉक्‍टर्स भी आयकर विभाग के निशाने पर हैं और शीघ्र ही विभाग उनका बड़े स्‍तर पर सर्वे कराने की तैयारी कर रहा है। यह जानकारी आयकर विभाग के ही उच्‍च पदस्‍थ सूत्रों से प्राप्‍त हुई है।
आयकर विभाग के सूत्र बताते हैं कि मथुरा के कई नामचीन चिकित्‍सकों ने बड़ी मात्रा में अपनी ब्‍लैक मनी मथुरा से बाहर रियल एस्‍टेट में निवेश की हुई है।
कृष्‍णानगर क्षेत्र में मेन रोड पर अपना नर्सिंग होम चलाने वाले एक चिकित्‍सक दंपत्‍ति का बड़े रियल एस्‍टेट ग्रुप के नोएडा स्‍थित प्रोजेक्‍ट में करीब 50 करोड़ रुपया लगे होने की जानकारी आयकर विभाग को मिली है। विभाग के अनुसार यह चिकित्‍सक इस रियल एस्‍टेट ग्रुप के साथ पिछले करीब आठ साल से जुड़ा है।
विभाग के अनुसार कृष्‍णानगर का यह चिकित्‍सक दंपत्‍ति तो मात्र एक उदाहरण है अन्‍यथा कृष्‍ण की नगरी में ऐसे डॉक्‍टर्स की संख्‍या दो दर्जन से ऊपर बताई जाती है।
सूत्रों के मुताबिक मोदी सरकार द्वारा 08 नवंबर की रात 12 बजे के बाद से अचानक 1000 और 500 के पुराने नोटों को प्रचलन से बाहर कर देने पर मथुरा का चिकित्‍सा जगत भी काफी प्रभावित हुआ है।
बताया जाता है कि सरकार द्वारा की गई इस अचानक नोटबंदी से प्रभावित मथुरा के कई प्रमुख डॉक्‍टर्स तो अगले 3 दिनों तक अपने नर्सिंग होम्‍स तथा हॉस्‍पीटल पर आए ही नहीं और उनके स्‍टाफ ने मरीजों को डॉक्‍टर साहब के जिले से बाहर होने की जानकारी दी।
इन डॉक्‍टर्स द्वारा अपने मरीजों को कोई पूर्व सूचना दिए बिना इस तरह गायब हो जाने की वजह ”लीजेंड न्‍यूज़” ने जाननी चाही तो पता लगा कि वह पुराने नोटों को ठिकाने लगाने की कवायद में व्‍यस्‍त हैं।
उल्‍लेखनीय है कि मथुरा में नर्सिंग होम्‍स एवं हॉस्‍पीटल संचालक कई दर्जन डॉक्‍टर्स ऐसे हैं जिनकी प्रतिदिन की आय एक लाख रुपए से ऊपर है लेकिन आयकर देने के नाम पर यह मात्र औपचारिकता निभाते हैं और अपनी अधिकांश कमाई रियल एस्‍टेट सहित अन्‍य दूसरे क्षेत्रों में निवेश करते रहे हैं।
चिकित्‍सा जगत के सूत्रों का ही कहना है कि मथुरा में ऐसे डॉक्‍टर्स की कोई कमी नहीं जो नियमित तौर पर अपनी ओपीडी (Outdoor Patient Department) द्वारा ही एक से डेढ़ लाख रुपए तक लेकर घर जाते हैं और इसका कोई ब्‍यौरा उनके इनकम टैक्‍स रिटर्न में नहीं होता।
सूत्रों के अनुसार फिजीशियन से लेकर विशेषज्ञ डॉक्‍टर्स तक ने अपनी फीस खुद निर्धारित की हुई है। सामान्‍य फीस के अतिरिक्‍त इनकी इमरजैंसी फीस अलग है जिसके एवज में यह मात्र परामर्श देते हैं। परामर्श शुल्‍क के अलावा नर्सिंग होम या हॉस्‍पीटल के अंदर ही संचालित मेडिकल स्‍टोर व पैथोलॉजी के माध्‍यम से होने वाली कमाई अलग है।
यही कारण है कि नर्सिंग होम्‍स या हॉस्‍पीटल संचालक अधिकांश डॉक्‍टर्स ने अपने यहां मेडिकल स्‍टोर तथा पैथोलॉजी चलाने का जिम्‍मा अपने निकटतम रिश्‍तेदारों अथवा अत्‍यंत भरोसेमंद व्‍यक्‍ति को ही सौंप रखा है ताकि उससे होने वाली अतिरिक्‍त आमदनी की जानकारी बाहर तक न पहुंचे।
डॉक्‍टर्स की अतिरिक्‍त आमदनी का एक और स्‍त्रोत है दवा कंपनियों से मिलने वाले महंगे-महंगे गिफ्ट और मोटी रकम। ये गिफ्ट और रकम डॉक्‍टर्स को एमआर के माध्‍यम से मिलती है। डॉक्‍टर्स के लिए ये एमआर परिवार सहित देश और देश के बाहर घूमने-फिरने का भी इंतजाम करते हैं।
इस सब के अतिरिक्‍त तमाम डॉक्‍टर्स ने तो गांव-देहात में सक्रिय झोलाछाप डॉक्‍टर्स को भी अपना कमीशन एजेंट बना रखा है। ये झोलाछाप अपनी सेटिंग वाले डॉक्‍टर को गांवों से उसी प्रकार मरीज रैफर करके अपना कमीशन सीधा करते हैं जिस प्रकार मथुरा या अन्‍य छोटे शहरों के डॉक्‍टर महानगरों के डॉक्‍टर्स अथवा मशहूर निजी हॉस्‍पीटल्‍स को अपने यहां से मरीज भेजकर कमीशन लेते हैं।
सच तो यह है कि आज चिकित्‍साजगत एक ऐसे कॉकस का शिकार है जिसके लिए पैसा ही उसका कर्म है और पैसा ही धर्म। पैसे के अलावा उन्‍हें कुछ नहीं सूझता।
यही कारण है कि कभी किसी निजी हॉस्‍पीटल से पैसा न दे पाने में असमर्थ किसी के परिजन का शव उन्‍हें न सौंपे जाने की बात सामने आती है तो कहीं किसी मरीज को ही बंधक बना लिए जाने का पता लगता है।
अंधी कमाई करने में व्‍यस्‍त चिकित्‍सा जगत के इस खेल का पता यूं तो आयकर विभाग को बहुत पहले से था किंतु वह भी कुछ इसके प्रभाव तथा कुछ अपनी कार्यप्रणाली के चलते निष्‍क्रिय पड़ा रहता था। अब जबकि मोदी सरकार ने नोटबंदी के साथ-साथ चिकित्‍सा के क्षेत्र में व्‍याप्‍त काले धन पर पैनी नजर गढ़ाने का फरमान जारी किया है और सार्थक नतीजे सामने लाने को कहा है तो आयकर विभाग ने इस क्षेत्र के माफियाओं की कुंडली खंगालना शुरू कर दिया है।
आयकर विभाग के सूत्र बताते हैं कि मथुरा में काली कमाई करने वाले सर्वाधिक चिकित्‍सक कृष्‍णा नगर क्षेत्र से हैं। यह क्षेत्र पिछले कुछ समय के अंदर ही निजी नर्सिंग होम्‍स तथा हॉस्‍पीटल्‍स का एक ”हब” बन चुका है।
आवासीय क्षेत्र कृष्‍णा नगर में इन चिकित्‍सकों ने सर्किल रेट्स से कई-कई गुना ज्‍यादा कीमत पर जमीनें लेकर अपने नर्सिंग होम्‍स व हॉस्‍पीटल बनाए हैं।
गौरतलब है कि कृष्‍णा नगर फिलहाल मथुरा शहर का सर्वाधिक कीमती क्षेत्र है और यहां जमीन की कीमत गलियों के अंदर भी एक से सवा तथा डेढ़ लाख रुपया प्रति वर्ग गज तक है। मेन रोड पर तो यह कीमत दो से सवा दो लाख रुपया प्रति वर्ग गज तक पहुंच जाती है जो कि सर्किल रेट से करीब पांच गुना अधिक है।
आयकर विभाग के अनुसार कृष्‍णा नगर के बाद काली कमाई करने में दूसरा नंबर आता है नेशनल हाई-वे के किनारे बने हुए नर्सिंग होम्‍स तथा हॉस्‍पीटल्‍स का। नेशनल हाई-वे पर नर्सिंग होम्‍स, हॉस्‍पीटल तथा दूसरी चिकित्‍सा सुविधाएं एवं जांच केंद्र खोले बैठे लोगों की आमदनी का ब्‍यौरा भी आयकर विभाग ने जुटा लिया है और शीघ्र ही इनके खिलाफ कानूनी कार्यवाही अमल में लाने की तैयारी है।
नेशनल हाई-वे के साथ-साथ महोली रोड, भूतेश्‍वर, मथुरा-वृंदावन रोड आदि पर बने नर्सिंग होम्‍स व हॉस्‍पीटल भी आयकर विभाग के टारगेट बताए जाते हैं।
ऐसा नहीं है कि जनसामान्‍य के बीच ईश्‍वर जैसा दर्जा प्राप्‍त सभी चिकित्‍सक सिर्फ और सिर्फ मोटी कमाई करने में लगे हैं तथा उस काली कमाई को इधर-उधर निवेश करते हैं, कई चिकित्‍सक ऐसे भी हैं जो अपना काम न केवल ईमानदारी से करते हैं बल्‍कि कमाई के अनुरूप टैक्‍स भी अदा करते हैं लेकिन ऐसे चिकित्‍सकों की मथुरा में संख्‍या काफी कम है।
जाहिर है कि ऐसे में वह काली कमाई करने वाले अपने हमपेशा लोगों के खिलाफ मुंह खोलने की हिम्‍मत नहीं कर पाते हैं और चुपचाप तमाशबीन बने रहने को मजबूर हैं।
मोदी सरकार द्वारा उठाए गए नोटबंदी के कदम के बाद ऐसे चिकित्‍सक न सिर्फ काफी खुश हैं बल्‍कि दबी जुबान से प्रधानमंत्री के फैसले का समर्थन कर रहे हैं।
इन चिकित्‍सकों का भी यह मानना है कि यदि समय रहते आयकर विभाग चिकित्‍साजगत में मौजूद काले धन पर प्रभावी कार्यवाही करने में सफल रहा और सफेदपोश चिकित्‍सकों का चेहरा बेनकाब कर पाया तो इसका लाभ चिकित्‍साजगत के साथ-साथ उस जनसामान्‍य को भी मिलेगा जो आज इनके हाथों में खेलने पर मजबूर हैं तथा इनकी हर नाजायज बात सिर झुकाकर स्‍वीकार करने को बाध्‍य है।
यह भी ज्ञात हुआ है कि अपने खिलाफ आयकर विभाग की सक्रियता के संकेत कुछ खास चिकित्‍सकों को मिल चुके हैं लिहाजा वह अभी तो किसी भी तरह अपनी काली कमाई व अधिकारियों को मैनेज करने की कोशिश में लगे हैं परंतु मोदी सरकार की सख्‍ती उनके प्रयासों में आड़े आती दिखाई दे रही है।
अब देखना यह है कि धर्म की नगरी में लंबे समय से सक्रिय अधर्म की कमाई करने वाले तथा भगवान का दर्जा प्राप्‍त इन चिकित्‍सकों के खिलाफ आयकर विभाग कब तक कार्यवाही अमल में लाता है और कब आम आदमी को इनकी प्रताड़ित करने वाली कमाई से मुक्‍ति दिलाने में सफल होता है।
कहने को मोदी सरकार ने चिकित्‍सकीय पेशे की मनमानी पर लगाम लगाने ने लिए नर्सिंग होम्‍स एक्‍ट भी बनाया है लेकिन देशभर के नर्सिंग होम्‍स व हॉस्‍पीटल संचालक डॉक्‍टर इस एक्‍ट का विरोध कर रहे हैं और इसलिए अभी नया एक्‍ट प्रभावी नहीं हो सका है।
जो भी हो, इसमें कोई दोराय नहीं कि मोदी सरकार की मंशा के अनुरूप यदि आयकर विभाग चिकित्‍सकीय पेशे में व्‍याप्‍त गंदगी तथा उससे उपजी काली कमाई का सफाया करने में सफल रहा तो निश्‍चित ही इसका बड़ा लाभ मरीज व उनके परिजनों को मिलेगा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

माय लॉर्ड, अंतहीन लाइनें तो अदालतों के बाहर भी लगी हैं

”HELLO सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया, अदालतों के सामने अंतहीन लाइनें लगी हुई हैं। 2 करोड़ 70 लाख मामले लंबित हैं, और अब तक कहीं भी कोई दंगा नहीं हुआ है।”
यह ट्वीट जाने-माने स्‍तंभकार तुफैल अहमद का है, जो उन्‍होंने सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्‍पणी को लेकर किया है जिसमें उसने कहा था कि नोटबंदी के बाद लोग सड़कों पर हैं और जल्‍दी ही इस स्‍थिति को नहीं संभाला गया तो दंगे भी हो सकते हैं।
दूसरी ओर ट्वीट के जरिए ही आज कांग्रेस के राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए पूछा है कि क्‍या अब मोदी सरकार कोर्ट को भी राष्‍ट्रविरोधी कहेगी ?
राहुल ने अपने ट्वीट के साथ एक अंग्रेजी अखबार की खबर भी टैग की है। इस खबर के अनुसार कलकत्ता हाईकोर्ट ने सरकार से कहा है कि उसने कदम उठाने से पहले पूर्व तैयारी नहीं की जबकि सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इससे आगे संकट की स्थिति पैदा हो सकती है।
पहले बात करते हैं तुफैल अहमद के ट्वीट की। तुफैल अहमद ने सुप्रीम कोर्ट के सामने जो सवाल उठाया है, क्‍या उसका कोई जवाब कोर्ट के पास है ?
क्‍या सुप्रीम कोर्ट के पास इस सवाल का भी कोई जवाब है कि विभिन्‍न न्‍यायालयों में लंबित मुकद्दमों की यह संख्‍या आज अचानक पैदा हो गई अथवा इसमें पूर्ववर्ती सरकारों तथा न्‍यायपालिकाओं की कार्यप्रणाली ने भी कोई भूमिका निभाई है?
जहां तक सवाल नोटबंदी के बाद बैंकों के सामने लगने वाली लंबी-लंबी लाइनों और लोगों को हो रही परेशानी का है तो इसका अंदेशा खुद प्रधानमंत्री ने 8 नवंबर की रात राष्‍ट्र के नाम अपने संबोधन में भी जताया था। साथ ही प्रधानमंत्री ने कहा था कि देशहित में उठाए जा रहे इस कड़े कदम से थोड़ी परेशानी के बाद बहुत सी समस्‍याओं से मुक्‍ति मिल जाएगी।
सुप्रीम कोर्ट ने प्रधानमंत्री के कथन पर गौर न करके और सिर्फ याचिकाओं को आधार बनाकर जो कुछ कहा, उसकी अपेक्षा तो देश की सबसे बड़ी अदालत से नहीं थी क्‍योंकि सर्वोच्‍च अदालत का कथन लोगों के बीच भय का वातावरण बनाने में सहायक हो सकता है।
प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी ने काले धन और नकली नोटों के खात्‍मे की दिशा में जो कदम उठाया है, वह निश्‍चित ही किसी बड़ी सर्जिकल स्‍ट्राइक से कम नहीं कहा जा सकता लिहाजा उसका असर तो होना ही था।
फिजीकली, मैंटली अथवा सोशली…कोई भी ऑपरेशन बिना थोड़ी-बहुत तकलीफ के पूरा नहीं होता। फिर यह तो एक ऐसा ऑपरेशन था जिसकी जरूरत कई दशकों से महसूस की जा रही थी।
बेशक मोदी जी द्वारा दिखाया गया 500 और 1000 के नोटों को प्रचलन से बाहर करने का दुस्‍साहस भी काले धन के समूल नाश में मात्र एक पहल ही है, परंतु किसी भी मुकाम तक पहुंचने के लिए किसी न किसी स्‍तर से पहल तो करनी ही पड़ती है।
अगर बात करें नोट बंदी से बैंकों के सामने उपजी लंबी-लंबी लाइनों तथा आम लोगों के समक्ष खड़ी हो रहीं परेशानियों की, तो सवा सौ करोड़ की आबादी वाले इस देश में कहां लाइन नहीं लगी हैं। रेल और बस की टिकट लेने से लेकर सिनेमा की टिकट लेने तक, हर जगह लाइन में लगना पड़ता है। सड़क पर दो पहिया और चार पहिया वाहन सवार भी बिना कतार में लगे मंजिल तक नहीं पहुंच पाते। श्‍मशान घाट भी अब तो लाइन लगने से नहीं बचे।
नोट बंदी से उपजी भीड़ के मद्देनजर दंगे-फसाद हो जाने की आशंका जाहिर करने वाले माननीय न्‍यायाधीश क्‍या देश को यह बताएंगे कि उन्‍हीं के किसी साथी ने कभी देर से मिलने वाले न्‍याय को अन्‍याय की जो संज्ञा दी थी, उस पर कोर्ट कब विचार करेगा?
जिस विवादित कोलेजियम सिस्‍टम को अपनी प्रतिष्‍ठा का प्रश्‍न बनाकर माननीय उच्‍च न्‍यायालय लंबित होते मुकद्दमों की संख्‍या बढ़ने का हवाला दे रहा है, क्‍या वह हमेशा से वजूद में था, और क्‍या वही मुकद्दमों के बढ़ते बोझ का एकमात्र कारण है ?
कौन नहीं जानता कि आज देश की न्‍यायिक व्‍यवस्‍था को भी उसी प्रकार घुन लग चुका है जिस प्रकार दूसरी व्‍यवस्‍थाओं विधायिका व कार्यपालिका को लगा हुआ है। किसे पता नहीं है कि जिला अदालतों से लेकर उच्‍च और उच्‍चतम न्‍यायालय तक में भ्रष्‍टाचार का बोलबाला है। नि:संदेह यहां भी हर पायदान पर ईमानदार अधिकारी एवं कर्मचारी भी हैं किंतु उनकी स्‍थिति बेहद दयनीय है। वह खुद को 32 दांतों के बीच में ”जीभ” के होने जैसा महसूस करते हैं।
यहां पूर्व कानून मंत्री शांतिभूषण द्वारा की गई वह टिप्‍पणी भी काबिले गौर है जिसके तहत उन्‍होंने सर्वोच्‍च न्‍यायालय के अधिकांश मुख्‍य न्‍यायाधीशों की ईमानदारी पर बड़ा सवाल खड़ा किया था। प्रसिद्ध वकील शांतिभूषण की उस टिप्‍पणी ने तब न्‍यायपालिका तथा माननीय विद्वान न्‍यायाधीशों को हिला कर रख दिया था लिहाजा एकबार तो ऐसा लगने लगा था जैसे शांतिभूषण किसी भी वक्‍त अदालत की अवमानना के आरोप में अदालतों के चक्‍कर काटते दिखाई देंगे लेकिन उनके खिलाफ कार्यवाही करने की हिम्‍मत न सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने दिखाई और न किसी न्‍यायाधीश ने।
लिखने को तो बहुत कुछ है लेकिन यह बहुत कुछ लिखा नहीं जा सकता। अगर कोई लिखने बैठ जाए तो उसका भी अंत शायद कभी नहीं होगा क्‍योंकि सुप्रीम कोर्ट से लेकर सुप्रीम पॉवर तक सब अपने आप को जायज ठहराने की जिद पाले बैठे हैं।
प्रधानमंत्री मोदी ने तो कम से कम इतना साहस दिखाया कि पहले दिन ही अपने निर्णय से परेशानियां उत्‍पन्‍न होने की आशंका जताई और फिर यह भी कहा कि 50 दिनों बाद मेरा निर्णय गलत लगे तो जो सजा चाहो मुझे दे देना, लेकिन विपक्षी पार्टियां दो-तीन दिन बाद सन्‍निपात से उभरते ही कुतर्कों के सहारे प्रधानमंत्री को मुजरिम साबित करने पर आमादा हैं।
कांग्रेस के राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट और कलकत्ता हाईकोर्ट की टीका-टिप्‍पणियों को आधार बनाकर मोदी सरकार को निशाना बना रहे हैं, उससे साफ जाहिर है कि उनके अपने पास कोई विजन है ही नहीं। उनकी बुद्धि को लेकर अक्‍सर उठाए जाने वाले सवालों के पीछे संभवत: उनके द्वारा की जाती रही ऐसी ही ओछी राजनीति है। दुर्भाग्‍य की बात यह है कि कांग्रेस की चापलूसी वाली संस्‍कृति उन्‍हें आइना दिखाने का माद्दा नहीं रखती लिहाजा वह मौके-बेमौके भोंडा प्रदर्शन करते रहते हैं।
चार हजार रुपयों के लिए अपनी भारी-भरकम सुरक्षा-व्‍यवस्‍था के साथ बैंक जाकर तमाशा खड़ा करने से बेहतर होता कि वह लोकसभा में यह बताते कि नोट बंदी से उपजी समस्‍या के समाधान का उनके पास भी कोई उपाय है और उससे आमजनता को राहत मिल सकती है।
राहुल गांधी ही क्‍यों…सपा, बसपा, माकपा और ममता की टीएमसी सहित मोदी सरकार में शामिल शिवसेना तक मोदी सरकार के फैसले को लेकर हायतौबा मचा रही है। दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल तो जैसे प्रधानमंत्री से निजी दुश्‍मनी पालकर बैठे हैं। ऐसे में वह नोट बंदी पर चुप कैसे रह सकते थे।
प्रधानमंत्री को टारगेट करने वाली इन पार्टियों और इनके स्‍वयंभू मुखियाओं की हकीकत से वह जनता अच्‍छी तरह वाकिफ है जिसके कंधे पर बंदूक रखकर यह अपना-अपना हित साधना चाहती हैं।
आज सड़क चलता कोई राहगीर भी बता देगा कि प्रधानमंत्री के नोटबंदी वाले निर्णय ने इन पार्टियों के आकाओं की हजारों करोड़ की गड्डियों को रद्दी में तब्‍दील करके रख दिया। अब इन्‍हें समझ में नहीं आ रहा कि आखिर करें तो करें क्‍या ?
कैसे मोदी के इस मास्‍टर स्‍ट्रोक से मुक्‍ति पाएं और कैसे आगामी विधानसभा चुनावों के लिए काले धन का इंतजाम करें।
अचानक की गई इस सर्जिकल स्‍ट्राइक ने कांग्रेस सहित लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों और उनके नेताओं की बुद्धि को लकवाग्रस्‍त कर दिया है। इनमें से कोई यह तक बताने को तैयार नहीं है कि यदि पीएम का निर्णय इतना ही जनविरोधी है तो उन्‍होंने खुद अपने ही पैरों पर कुल्‍हाड़ी मारने का काम किया है। उसके लिए विपक्ष इतना चिंतित क्‍यों है। आगामी चुनावों में विपक्ष के मन की मुराद बिना कुछ किए पूरी होने वाली है।
मोदी का कदम आत्‍मघाती है तो विपक्ष चुपचाप तमाशा देखे और आगामी चुनावों के लिए हसीन सपने पालते हुए मोदी और उनकी पार्टी को मुंह चिढ़ाए।
कल की ही रिपोर्ट है कि शिवसेना को विडियोकॉन कंपनी ने एक वर्ष में 85 करोड़ रुपए का चंदा दिया है जबकि इस दौरान उसे मिली कुल चंदे की रकम 87 करोड़ है। कहने का तात्‍पर्य यह है कि कुल 87 करोड़ के चंदे में 85 करोड़ अकेले विडियोकॉन ने दिए हैं। इससे आप अंदाज लगा सकते हैं कि सरकार में शामिल होते हुए शिवसेना, मोदी जी के निर्णय पर क्‍यों लालपीली हो रही है और क्‍यों ममता, मुलायम, मायावती व अरविंद केजरीवाल के साथ खड़ी है। नोट बंदी ने इन सबके पैरों की बिवाइयां को इतनी बुरी तरह चटका दिया है कि उनसे खून टपकने लगा है लेकिन वह उन्‍हें किसी को दिखा तक नहीं सकते।
कांग्रेस का तो जैसे समूचा बेड़ा गर्क हो गया। राहुल गांधी की खाट यात्रा और ”27 साल यूपी बदहाल” की टैग लाइन को मोदी के एक निर्णय ने किनारे लगा दिया। खाट यात्रा की खाटों का तो पता नहीं क्‍या हुआ, अलबत्‍ता कांग्रेस की खाट फिलहाल ऐसी खड़ी हुई है कि उसके रणनीतिकारों की भी बुद्धि का दिवाला निकल गया है।
कांग्रेस और अन्‍य कई पार्टियों के सामने सबसे बड़ी समस्‍या उत्‍तर प्रदेश जैसे बड़े राज्‍य में चुनाव लड़ने की खड़ी हो गई है। कांग्रेस के लिए यह स्‍थिति जहां मरे पर मार वाली कहावत को चरितार्थ कर रही है वहीं मुलायम तथा मायावती अकेले में सिर पकड़ कर सोचने पर मजबूर हो गए हैं।
आश्‍चर्य की बात है कि मीडिया द्वारा कराए गए सर्वे में मोदी के इस कदम को जनसमर्थन मिलने की बातें सामने आ रही हैं। परेशानियों के बावजूद लोग यह मानने को तैयार नहीं कि मोदी का कदम गलत है।
यह वही मीडिया है जिसके अपने घर भी शीशे के हैं। जो बैंकों के सामने लगने वाली लाइनों को दिखाकर भय का वातावरण उत्‍पन्‍न करने में रत्‍तीभर पीछे नहीं रहना चाहता क्‍योंकि मोदी के मास्‍टर स्‍ट्रोक ने आखिर इनके हित भी तो प्रभावित किए हैं। चार चूहे मरने से लेकर एक आदमी की मौत को भी चीख-चीख कर ब्रेकिंग न्‍यूज़ बताने वाला मीडिया आज खामोशी के साथ खून के आंसू पीने को बाध्‍य है।
हर कोई जानता है कि लगभग सारे बड़े मीडिया हाउस काले धन के बल पर अपना अस्‍तित्‍व बचाए हुए थे। मोदी की सर्जिकल स्‍ट्राइक ने उन्‍हें खुद एक ऐसी ब्रेकिंग न्‍यूज़ बना दिया जिसका खामोश क्रंदन सुनाई भले ही न दे रहा हो लेकिन कोने में बैठकर रुला जरूर रहा है। मीडिया में व्‍याप्‍त जिस काले धन ने एक-एक एंकर को सैकड़ों करोड़ का मालिक बना दिया और जिसने कल के कई एंकर्स को न्‍यूज़ चैनल्‍स का मालिक बनवा दिया, वह भले ही प्रधानमंत्री के निर्णय पर सार्वजनिक रूप से बुक्‍का फाड़कर रो नहीं सकते लेकिन उनके निर्णय को देश की बर्बादी वाला साबित करने की कोशिश तो कर ही सकते हैं।
मीडिया के पास इस सवाल का भी कोई जवाब नहीं है कि चुनाव लड़ने में जो परेशानियां विपक्षी पार्टियों के सामने खड़ी होने वाली हैं, क्‍या भाजपा उनसे अछूती रह जाएगी…और रह जाएगी तो कैसे ?
यदि चंदे से हुए धंधे पर चोट पड़ी है तो वह चोट भाजपा को भी पड़ी होगी, फिर रोना किस बात का।
हां, विधान सभा चुनावों के टिकट बेचने से हुई आमदनी को कागज के टुकड़ों में तब्‍दील होते देखने का कुछ खास पार्टियों का दुख जरूर समझ में आता है क्‍यों कि इसके परिणाम टिकट वितरण सहित चुनावों की तिथि घोषित होने पर ज्‍यादा बड़ी परेशानी का कारण बन सकते हैं।
सबका अपना-अपना दुख है। सुप्रीम कोर्ट का अपना और पार्टी सुप्रीमोज का अपना। दुख भी ऐसा कि जिसे सार्वजनिक तौर पर बयां करना संभव नहीं।
ऐसे में जनता के कांधे का ही सहारा है। 125 करोड़ की आबादी कुछ पार्टियों और चंद नेताओं के दुख का पहाड़ तो ढो ही सकती है, इसलिए ढो रही है। यह जानते व समझते हुए भी उनके आंसू घड़ियाली हैं और उनकी सहानुभूति निजी शोक संवेदना से उपजी ऐसी अनुभूति है जिसका सहानुभूति से दूर-दूर तक कोई वास्‍ता नहीं। वास्‍ता है तो नोट व वोट की उस राजनीति से जिस पर फिलहाल तो पाला पड़ ही गया है। आगे की राम जाने।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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