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गुरुवार, 20 अक्टूबर 2022
खेल वाइफ स्वैपिंग का: दिल्ली का "कचरा" यमुना को और "कल्चर" मथुरा को कर रहा है प्रदूषित
हाल ही में मध्यप्रदेश की एक 21 वर्षीय विवाहिता युवती ने अपने पति पर आरोप लगाए हैं कि वह उसे "वाइफ स्वैपिंग" (पत्नी की अदला-बदली) वाली पार्टी में शामिल होने के लिए मजबूर करता है। पीड़िता का पति चाहता है कि वह पार्टी में शामिल होकर गैर मर्दों के साथ शरीरिक संबंध बनाए। मप्र की राजधानी भोपाल के कोहेफिजा इलाके की रहने वाली इस 21 वर्षीय युवती का निकाह मोहम्मद अम्मार के साथ हुआ था। मोहम्मद अम्मार बीकानेर के एक पांच सितारा होटल में मैनेजर है। निकाह के बाद से वह बीकानेर में अपने पति के साथ रह रही थी।
पीड़िता का आरोप है कि निकाह के कुछ दिन बाद से ही उसका पति उस पर वाइफ स्वैपिंग पार्टी में शामिल होने और उसका हिस्सा बनने के लिए दबाव डालने लगा। बीमारी का बहाना बनाकर वह बमुश्किल अपने मायके भोपाल पहुंच सकी।
पुलिस ने धारा 377, 498 A, 323, 506, 34, 3/4 के तहत उसके पति पर FIR दर्ज कर उसकी गिरफ्तारी के प्रयास शुरू कर दिए हैं।
मध्यप्रदेश न तो अकेला ऐसा राज्य है और न बीकानेर एकमात्र ऐसी जगह जहां वाइफ स्वैपिंग का यह घिनौना खेल खेला जा रहा है। सच तो यह है कि मेट्रो सिटीज दिल्ली, मुंबई, कलकत्ता, चेन्नई सहित देश के तमाम दूसरे महानगरों सहित अनेक छोटे शहर भी अब इस खेल की गिरफ्त में आ चुके हैं।
यूं तो अन्य शहरों के मुकाबले तरक्की की दौड़ में विश्व का नामचीन धार्मिक शहर मथुरा भी बेशक काफी पिछड़ा हुआ प्रतीत होता हो, बेशक यहां अभी तरक्की को परिभाषित करने वाली अनेक सुविधाओं का अभाव हो, बेशक देश-दुनिया के साथ तरक्की के लिए कदम ताल मिलाने में इसे लंबा समय लगे, लेकिन वाइफ स्वैपिंग के मामले में कृष्ण की यह नगरी अन्य दूसरे महानगरों एवं नगरों से किसी तरह पीछे नहीं है। सच तो यह है कि वह बहुत से नगरों एवं महानगरों से इस क्षेत्र में काफी आगे है।
जी हां! चाहे आपको आसानी से यकीन आये या ना आए, चाहे आपका मुंह आश्चर्य से एकबार को खुले का खुला रह जाए लेकिन सच्चाई यही है कि विश्व की धार्मिक, सांस्कृतिक, आध्यात्मिक एवं साहित्यिक विरासत को दरकिनार कर यह शहर उस दिशा में करवट ले चुका है जिसके बारे में सोचना तक आम आदमी के लिए किसी महापाप से कम नहीं है।
"वाइफ स्वैपिंग" या "कपल स्वैपिंग" कहलाने वाले इस खेल में अधिकांशत: पैसे वाले परिवारों से संबंध रखने वाले लोग कम से कम छ: कपल का एक ग्रुप बनाते हैं और यह ग्रुप फिर वाइफ स्वैपिंग करता है। वाइफ स्वैपिंग के तहत न्यूड एवं सेमी न्यूड ग्रुप डांस से लेकर ग्रुप सेक्स तक सब-कुछ शामिल होता है।
इसके लिए सबकी सहमति से शहर के किसी बाहरी हिस्से में अच्छे होटल का हॉल तथा कमरे बुक कराये जाते हैं, जहां ग्रुप के सदस्य कपल पूर्व निर्धारित दिन व समय पर अपनी-अपनी गाड़ियों से पहुंचते हैं। इस खेल में शामिल होने के लिए जितना जरूरी है एक अदद कपल का होना, उतना ही जरूरी है एक गाड़ी का होना। खेल की शुरूआत ड्रिंक या ड्रग्स से होती है, और उसके बाद जैसे-जैसे सुरूर चढ़ता जाता है, खेल शुरू होने लगता है।
खेल की शुरूआत के लिए ग्रुप के सभी सदस्य हॉल की बत्तियां बुझाकर एक टेबिल पर अपनी-अपनी गाड़ियों की चाभियां रख देते हैं और फिर अंधेरे में ही ग्रुप के पुरुष सदस्य किसी एक गाड़ी की चाभी उठाते हैं। जिसके हाथ में जिसकी गाड़ी की चाभी आ जाती है, वह उस सदस्य की बीबी के साथ खेल खेलने को अधिकृत हो जाता है। ठीक इसी प्रकार उसकी बीबी के साथ वह सदस्य खेल खेलने का अधिकारी हो जाता है जिसकी चाभी उसके हाथ लगी है।
चाभियों की अदला-बदली के साथ यह सदस्य अपने पार्टनर को होटल में ही पहले से बुक्ड कमरों में ले जाते हैं और फिर वहां स्वछंद सेक्स का यह खेल शुरू हो जाता है।
इससे भी आगे इस खेल में कुछ लोग हॉल के अंदर ही एक-दूसरे की पत्नियों को लेकर सब-कुछ करने को स्वतंत्र होते हैं जबकि कुछ लोग दो-दो और तीन-तीन की संख्या में ग्रुप सेक्स करते हैं।
जाहिर है कि इस सारे खेल का राजदार और हिस्सेदार वह होटल मालिक भी होता है जिसके यहां खेल खेला जाता है। उसे इसके लिए अच्छी-खासी रकम मिलती है, वो अलग।
बताया जाता है कि मथुरा के नवधनाढ्यों को इस खेल की लत उस क्लब कल्चर से लगी है जो कथित तौर पर समाज सेवा के कार्य करते हैं अथवा समाज सेवा करने का दावा करते हैं।
इनके अलावा कुछ लोगों ने पर्सनल क्लब या ग्रुप भी बना लिए हैं और उनकी आड़ में विभिन्न कार्यक्रमों का आयोजन करते रहते हैं। जिनका असल मकसद उनके बीच से छांटकर ‘वाइफ स्वैपिंग’ अथवा ‘कपल स्वैपिंग' के लिए एक अलग ग्रुप बनाना होता है।
विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार पिछले कुछ समय के अंदर इस धार्मिक शहर के विशेष वर्ग में हुईं आकस्मिक युवा संदिग्ध मौंतों के पीछे यही खेल रहा है क्योंकि इसके आफ्टर इफेक्ट अंतत: ऐसे ही परिणाम निकालते हैं।
सूत्रों की मानें तो एक प्रसिद्ध होटल मालिक की शादी-शुदा बहिन इसी खेल में अपनी जान दे चुकी है। उसकी मौत को इसलिए आत्महत्या प्रचारित किया गया क्योंकि उसने अपने मायके में जान दी थी, परंतु बताया जाता है कि इसके पीछे का असली कारण वाइफ स्वैपिंग का खेल ही था।
इसके अलावा कुछ समय पहले एक बिल्डर के युवा पुत्र की संदिग्ध मौत हो या एक अन्य बड़े व्यवसाई के अधेड़ उम्र पुत्र की होटल के कमरे में हुई मौत का मामला हो, सबके पीछे यही खेल बताया जाता है।
जिन परिवारों में यह मौतें हुई हैं, वह दबी जुबान से इतना तो स्वीकार करते हैं कि अवैध संबंध इन मौतों का कारण बने हैं लेकिन सीधे-सीधे वाइफ स्वैपिंग के खेल में संलिप्तता स्वीकार नहीं करते।
चूंकि इस खेल के परिणाम स्वरूप एचआईवी एड्स तथा आज के दौर की दूसरी संक्रामक बीमारियां भी तोहफे में मिलने की पूरी संभावना रहती है इसलिए इसके परिणाम तो किसी न किसी स्तर पर जाकर घातक होने ही होते हैं। ऐसी स्थिति में पति-पत्नी एक-दूसरे को दोषी ठहराने का प्रयास करते हैं और इसके फलस्वरूप गृहक्लेश बढ़ जाता है। रोज-रोज के गृहक्लेश का नतीजा फिर किसी अनहोनी के रूप में सामने आता है।
इस खेल से जुड़े लोगों से प्राप्त जानकारी के अनुसार धार्मिक शहर मथुरा में यूं तो इस खेल की शुरूआत हुए कई साल हो चुके हैं, लेकिन पिछले करीब पांच सालों से इसमें काफी तेजी आई है। पांच सालों में मथुरा के अंदर इस खेल के कई ग्रुप बने हैं और इसी कारण सो-कॉल्ड सभ्रांत परिवारों में कई जवान संदिग्ध मौतें भी हुई हैं।
आज तक ऐसी किसी मौत का मामला पुलिस के पास न पहुंचने की वजह से पुलिस ने उसमें कोई रुचि नहीं ली क्योंकि यूं भी मामला पैसे वालों से जुड़ा होता है।
यही कारण है वाइफ स्वैपिंग का यह खेल धर्म की इस नगरी में न केवल बदस्तूर जारी है बल्कि दिन-प्रतिदिन परवान चढ़ रहा है।
एक-दो नहीं, अनेक अपराधों का रास्ता बनाने वाला यह खेल यदि इसी प्रकार फलता-फूलता रहा और पुलिस व प्रशासन के बड़े अधिकारियों ने इस ओर अपनी निगाहें केंद्रित न कीं तो आने वाले समय में कृष्ण की नगरी के लिए यह ऐसा कलंक साबित होगा जिससे पीछा छुड़ाना मुश्किल हो जायेगा।
मुश्किल इसलिए कि मथुरा से दिल्ली बहुत दूर नहीं है। दिल्ली का कचरा अगर यमुना में बहकर आ रहा है तो दिल्ली का कल्चर भी सड़क के रास्ते मथुरा को प्रदूषित कर ही रहा है।आप अगर इस गलतफहमी में है कि 'बिहारी जी' सहित मथुरा के अन्य धार्मिक स्थानों पर धर्म के नाम पर तेजी के साथ बढ़ रही अनियंत्रित भीड़ का कारण अचानक उपजा भक्तिभाव है तो इस गलतफहमी को दूर कर लीजिए।
-लीजेण्ड न्यूज़
बुधवार, 7 सितंबर 2022
बहुत कन्फ्यूजन है भाई: कौन सा भारत जोड़ने निकले हैं राहुल बाबा, अंबानी-अडानी वाला या अपने वाला?
कथित तौर पर पार्टी को तोड़ने के जिम्मेदार कांग्रेस के 'चिर कुंवर' राहुल बाबा अब 'भारत जोड़ने' निकल पड़े हैं। अपने जीवन के करीब 150 बहुमूल्य दिन वह भारत जोड़ने में जाया करने वाले हैं। हालांकि उन्होंने फिलहाल यह नहीं बताया कि वह किस भारत को जोड़ने पर आमादा हैं।
राहुल बाबा वर्षों से लोगों को बता रहे हैं कि भारत एक नहीं, दो हैं। एक अमीरों का भारत जिसे वो अडानी-अंबानी का भारत बताते हैं और दूसरा गरीबों का भारत जिसे वो अपना मानकर चलते हैं। जाहिर है कि वो अपने वाले भारत को ही जोड़ने निकले होंगे क्योंकि अंबानी-अडानी वाला भारत मोदी जी का भारत है। उसे वो क्यों जोड़ने लगे।
बहरहाल, मुंह में चांदी की चम्मच लेकर पैदा हुए अरबपति परिवार के उत्तराधिकारी राहुल बाबा को लगता है कि भारत एक खिलौना है जो उनके हाथ से छीन लिया गया है, और जिन्होंने छीना है वो इस खिलौने से खेलने लायक नहीं हैं। वह इसे खंडित कर रहे हैं।
राहुल की सोच वाला एक और तबका है, और वो भी भारत जोड़ने निकला हुआ है। यह तबका है विपक्ष। इस तबके में शामिल लोगों के अनुसार विपक्ष ही असल भारत है, लिहाजा विपक्ष एकजुट हो गया तो समझो भारत जुड़ गया। लेकिन परेशानी यह है कि इस तबके के लोग सिर्फ 'दल' जोड़ने की बात कर रहे हैं, 'दिल' जोड़ने की नहीं। उनके दिलों के बीच 'पीएम पद' आड़े आ रहा है।
जिस प्रकार उच्चकोटि के मनुष्य जीवन पर्यन्त मात्र मोक्ष की कामना में लगे रहते हैं, उसी प्रकार हर नेता की कामना होती है कि येन-केन-प्रकारेण वह एकबार पीएम पद प्राप्त कर ले तो 'इहिलोक' के साथ-साथ शायद 'परलोक' भी सुधर जाएगा। 'पूर्व प्रधानमंत्री' के तमगे वाली कुर्सी वहां भी साथ ले जा सकेंगे। 'चित्रगुप्त' फिर जनसामान्य की तरह व्यवहार नहीं कर पाएंगे। विशिष्टता साथ चिपकी होगी।
यही कारण है कि विपक्ष के भारत जोड़ो अभियान की सफलता में 'नायकों' की संख्या आड़े आ रही है। प्रधानमंत्री का पद एक है किंतु उस पर दावा करने वाले विपक्षी अनेक हैं।
ओलम का पहला अक्षर होने के नाते 'अरविंद' (केजरीवाल) से शुरू करें तो अखिलेश यादव कहते हैं कि मेरा नाम भी 'अ' से प्रारंभ होता है। केसीआर की मानें तो हिंदी वर्णमाला के व्यंजन जहां से शुरू होते हैं वो उनके नाम का पहला अक्षर है। इसलिए वही उचित होगा। ममता बनर्जी कहती हैं कि उनके नाम में पहले आदरणीय आता है, उसके बाद बनर्जी, और फिर अंत में ममता। 'अल्फाबेट' के अनुसार उनका नाम में A के साथ B जुड़ा है इसलिए वही पीएम पद की मौलिक हकदार हैं। उनके सामने न तो 'अरविंद' का 'केजरीवाल' टिकता है और न कल्वाकुंतला चंद्रशेखर राव यानी केसीआर के हिज्जे K C R कहीं मुकाबला कर सकते हैं।
सुशासन बाबू का 'सु' त्यागकर शासन पर काबिज रहने वाले नीतीश कुमार कह तो ये रहे हैं कि उनके मन में पीएम पद की कोई अभिलाषा नहीं है किंतु उनकी यह बात कोई मान नहीं रहा। लोग कह रहे हैं कि पलटी मारने में उनका कोई सानी नहीं है, यह वो बार-बार सिद्ध कर चुके हैं इसलिए जो वो कह रहे हैं, उसका 'पलट' अभी से मानकर चलने में ही भलाई है।
यूं भी राबड़ी पुत्र पहले दिन से माला फेर रहे हैं कि 'चचा नीतेशे बाबू' की नजर दूर की कुर्सी पर अटकी रहे तो वो पास की कुर्सी खिसका लें और देश-दुनिया को बता दें कि 'पलटूराम' के खिताब पर किसी एक का अधिकार नहीं ना है।
कन्याकुमारी से भारत जोड़ने निकले राहुल बाबा का दावा है कि पीएम पद के एकमात्र स्वाभाविक एवं योग्य प्रत्याशी सिर्फ और सिर्फ वही हैं। नेहरू से चलकर गांधी तक के सरनेम देखेंगे तो सबकुछ साफ हो जाएगा। वाड्रा को बाद में देख लीजिएगा।
नेहरू-गांधी ने 3 पीएम देश को दिए हैं। राहुल बाबा पहले भी कई बार पूछ चुके हैं कि मेरे पास तीन-तीन पीएम की विरासत है, तुम्हारे पास क्या है....हैं ?
जो भी हो... कुल मिलाकर पीएम की कुर्सी को खंड-खंड करने में व्यस्त भारत को अखंड कैसे करेंगे, इसका तो पता नहीं किंतु इतना जरूर पता है कि भारत हो या पीएम की कुर्सी, उसका विभाजन जिन्होंने किया है वही अब उसे जोड़ने निकले हैं।
यहां 1947 वाले 'विभाजन' की बात नहीं की जा रही, अमीर-गरीब वाले भारत की बात की जा रही है। वैसे कोई कुछ भी समझने को स्वतंत्र है। परतंत्र हैं तो बस हम और आप जैसे लोग जिन्हें यही नहीं पता कि भारत को तोड़ने और जोड़ने की परिभाषा अलग-अलग क्यों है, और हर दिन लोकतंत्र की हत्या होने के बावजूद वह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कैसे बना हुआ है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
मंगलवार, 23 अगस्त 2022
अन्ना के चेलों ने बहुत जल्द पूरा कर लिया "राजनीति" से "शराबनीति" तक का सफर
बाबूराव हजारे यानी अन्ना हजारे। ये वो शख्सियत है जिसने कई दशक पहले शराब निषेध अभियान की शुरूआत महाराष्ट्र के रालेगण सिद्धि से की थी। हजारे और उनके युवा समूह ने सुधार की प्रक्रिया जारी रखने के लिए शराब के मुद्दे को उठाने का फैसला किया। गांव के मंदिर में आयोजित एक बैठक के तहत ग्रामीणों ने शराब के ठेके बंद करने और शराब पर प्रतिबंध लगाने का संकल्प लिया। चूंकि ये संकल्प मंदिर में किए गए थे इसलिए वे एक तरह से धार्मिक प्रतिबद्धता बन गए। तीस से अधिक शराब बनाने वाली इकाइयों ने स्वेच्छा से अपने प्रतिष्ठान बंद कर दिए। जो लोग सामाजिक दबाव के आगे नहीं झुके उन्हें अपने व्यवसाय बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि हजारे के युवा समूह ने उनके परिसर को तोड़ दिया। बताते हैं कि एक बार अन्ना के युवा समूह ने 3 शराबी ग्रामीणों को खंभों से बांध दिया और फिर हजारे ने खुद सेना की अपनी बेल्ट से उन्हें पीटा। उन्होंने इस सजा को यह कहते हुए उचित भी ठहराया कि "एक माँ अपने बीमार बच्चे को इसलिए कड़वी दवाएँ पिलाती है क्योंकि उसे पता होता है कि वह दवा उसके बच्चे को ठीक कर सकती है। हो सकता है कि बच्चे को दवा पसंद न आए, लेकिन माँ ऐसा इसलिए करती है क्योंकि वह बच्चे की परवाह करती है। शराबियों को दंडित किया गया ताकि उनके परिवारों को नष्ट होने से बचाया जा सके।"
अन्ना ने महाराष्ट्र सरकार से एक कानून पारित करने की अपील की, जिसके तहत 25 फीसदी महिलाओं की मांग पर गांव में शराबबंदी लागू कर दी जाए। 2009 में राज्य सरकार ने इसे दर्शाने के लिए बॉम्बे प्रोहिबिशन एक्ट 1949 में संशोधन किया।
"राजनीति" से "शराबनीति" पहुंचे अन्ना के चेले
एक दशक पूर्व 2011 में अन्ना के ही आंदोलन से उपजे उनके चेले आज 'हर घर तक' पहुंच बनाने वाली अपनी "शराबनीति" को न सिर्फ जायज ठहरा रहे हैं बल्कि उसके लिए किए गए सैकड़ों करोड़ रुपए के घोटाले को राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से जोड़ रहे हैं।
भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े किए गए एक जनआंदोलन की कोख से पैदा हुई आम आदमी पार्टी के नेता अब कहते हैं- वह चूंकि "कट्टर ईमानदार" हैं इसलिए जब तक उनके ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोप साबित न हो जाएं, तब तक कार्रवाई किया जाना राजनीतिक प्रतिशोध है।
वो इस शब्द को गढ़ने से पहले इतना भी विचार नहीं करते कि 'कट्टरवाद' किसी किस्म का हो, अच्छा नहीं माना जाता। पूरा विश्व आज किसी न किसी किस्म के 'कट्टरवाद' का शिकार है। फिर वह कट्टरवादिता धर्म से जुड़ी हो या समाज से। कट्टरवादिता अपने आप में मिलावटी तथा दिखावटी होने का संदेश देती है। कोई व्यक्ति ईमानदार है तो उसका ईमानदार होना ही काफी है, उसके लिए 'कट्टर' नहीं होना पड़ता। आंशिक भ्रष्ट या कट्टर ईमानदार जैसे शब्द खुद एक धोखा हैं।
मजे की बात यह है कि कल तक स्वयं को 'आम आदमी' मानने वाले सड़क से सत्ता तक पहुंचे ये लोग अब अघोषित रूप से यह बताना चाहते हैं कि वो कानून से ऊपर हैं और इसलिए उनके साथ कानून भी विशिष्ट व्यवहार करे।
यही नहीं, इनकी मानें तो इन्हें लेकर होने वाली हर कार्रवाई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सीधा हाथ होता है। मोदी इनसे इतने डरे हुए हैं कि इन्हें नष्ट करना चाहते हैं। इनके दावे पर यकीन किया जाए तो इनका कद इतना बढ़ चुका है जिससे प्रधानमंत्री परेशान हैं और वो दिन-रात इनका ही स्मरण करते हैं।
आश्चर्य भी होता है और हंसी भी आती है जब ये खेत की बात को खलिहान तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। शराब घोटाले को लेकर सीबीआई ने छापामारी शुरू की तो कहा जाने लगा कि हमारी शिक्षा नीति समूचे विश्व में सराही जा रही है इसलिए ये छापामारी की गई है। देखिए न्यूयॉर्क टाइम्स के फ्रंट पेज पर मनीष सिसोदिया की शिक्षा नीति को जगह मिली है इसलिए मोदी सरकार डर गई है। मनीष सिसोदिया की शिक्षा नीति विश्व में सर्वोत्तम है।
भ्रष्टाचार की बात पर ये दूसरे दलों का भ्रष्टाचार गिनाने लगते हैं। बेशक दूध का धुला कोई नहीं लेकिन जिस तरह नमक से नमक नहीं खाया जा सकता, उसी तरह दूसरे को भ्रष्ट बताकर अपना भ्रष्टाचार उचित नहीं ठहराया जा सकता।
जिस पार्टी को अभी राष्ट्रीय पार्टी तक का दर्जा हासिल नहीं है, उसके कर्ता-धर्ता ढिंढोरा पीट रहे हैं कि 2024 में प्रधानमंत्री पद के लिए अरविंद केजरीवाल सीधे नरेंद्र मोदी मुकाबले में आ खड़े हुए हैं इसलिए मोदी सरकार सीबीआई के छापे पड़वा रही है।
अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और राघव चड्ढा जैसे आम आदमी पार्टी के नेता संभवत: यह मान बैठे हैं कि न्यूयॉर्क टाइम्स में खबरें छपवाकर वह एक ओर जहां विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद की उम्मीवारी हासिल कर लेंगे, वहीं दूसरी ओर केंद्र की सत्ता उतनी ही आसानी से प्राप्त कर पाएंगे जितनी कि पंजाब की प्राप्त कर ली थी।
राजनीति में आए हैं तो सत्ता के ख्वाब देखने में कोई बुराई नहीं है लेकिन सूरज की ओर ऊपर मुंह करके थूकने से सूरज तक नहीं पहुंचा जा सकता। वो थूक खुद के थोबड़े पर ही आकर गिरता है, यह सर्वविदित है। चेहरे पर कालिख लगी हो तो शीशा साफ करने से काम नहीं चलता।
राजनीति में कोई व्यक्ति या कोई दल अजेय नहीं होता। उत्थान और अवसान एक सतत प्रक्रिया है और उससे हर एक को गुजरना होता है, किंतु आम आदमी पार्टी के नेताओं की प्रॉब्लम यह है कि वो कुएं को तालाब नहीं, समुद्र समझ बैठे हैं।
दिल्ली और पंजाब जीतकर वो समझ रहे हैं कि वो देश ही नहीं, दुनिया के ऐसे नायाब हीरे हैं जिनकी चमक ने सबको चौंधिया दिया है। रसोली अपनी आंखों में हैं और दोष दूसरे में ढूंढ रहे हैं।
तमाम बुध्दिजीवी समय-समय पर ये सलाह देते रहे हैं कि यदि किसी को जरूरत से ज्यादा अभिमान हो जाए तो उसे अपनी जड़ों की ओर देख लेना चाहिए। इससे भ्रम दूर होने में मदद मिल सकती है।
बेहतर होगा कि अन्ना के आंदोलन की उपज आम आदमी पार्टी के नेता एकबार फिर अन्ना की शरण में जाकर बैठें और उनसे पूछें कि क्या वो हर किस्म के आरोप-प्रत्यारोपों से परे हैं, क्या वो भ्रष्टाचार प्रूफ हैं, क्या वो कानून से ऊपर हैं। उम्मीद ही नहीं पूरा विश्वास है कि अन्ना उनके इस मुगालते को दूर कर देंगे।
हो सकता है कि अन्ना अपने मंदिर के किसी कोने में ले जाकर इन्हें उनकी खोई हुई वो सूरत और सीरत भी दिखा दें जिसे सामने रखकर इन्होंने अन्ना को धोखा दिया और कभी राजनीति में न आने का वायदा करके राजनीति को ही पेशा बना लिया।
रही बात दिल्ली की तो वो अभी बहुत दूर है। दिल्ली के अधीन होने में और दिल्ली हासिल करने में बहुत फर्क होता है। अलबत्ता 'तिहाड़' बहुत नजदीक नजर आ रही है। इसे जितनी जल्दी समझ लें, उतना अच्छा है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
बुधवार, 20 जुलाई 2022
योगी जी... देखिए तो कि भ्रष्टाचार पर आपकी जीरो टॉलरेंस नीति का मथुरा पुलिस ने कैसा मजाक बनाया है?
हालांकि इसकी भनक लगते ही एक ओर जहां एसएसपी मथुरा अभिषेक यादव ने विभागीय जांच के आदेश देते हुए संबंधित थाना प्रभारी इंस्पेक्टर अजय कौशल और चौकी प्रभारी सतोहा योगेश नागर को निलंबित कर दिया वहीं दूसरी ओर आईजी आगरा जोन नचिकेता झा ने भी जिले में तैनात आईपीएस अधिकारी (एएसपी) संदीप मीणा को जांच सौंपी है, लेकिन यहां सवाल यह पैदा होता है कि किसी इतने गंभीर मामले में क्या केवल विभागीय जांच कराया जाना पर्याप्त है?
पूरे पुलिस विभाग को शर्मिंदा करने और योगी सरकार के आदेश-निर्देशों को बेखौफ होकर ताक पर रखने के इस मामले में प्रथम दृष्ट्या संलिप्त दिखाई दे रहे पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की जानी चाहिए?
बताया जाता है भ्रष्टाचार के इस पूरे नायाब खेल की सूचना लखनऊ में बैठे बड़े अधिकारियों को भी लग चुकी है, और वो आगरा तथा मथुरा के बड़े अधिकारियों की कार्रवाई पर पूरी नजर बनाए हुए हैं।
क्या है पूरा मामला
घटनाक्रम के अनुसार मथुरा जनपद के मलाईदार थानों में शुमार हाईवे थाना पुलिस ने विगत 11 जुलाई को साइबर क्राइम करने वाले गिरोह के 19 सदस्यों को मुखबिर की सूचना पर एकसाथ धर-दबोचा।
पुलिस के लिए सिरदर्द बना हुआ है साइबर क्राइम
यहां यह जान लेना जरूरी है कि सोशल मीडिया के इस दौर में साइबर क्राइम पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है और इसीलिए हर जनपद में पुलिस का एक साइबर सेल काम भी कर रहा है।
ये बात अलग है कि अपराधियों के हमेशा पुलिस से दो कदम आगे चलने तथा पुलिस के पास उनकी तुलना में संसाधनों के अभाव की वजह से पुलिस को साइबर अपराधियों से निपटने में दिक्कतें पेश आती हैं।
यही कारण है कि हर दिन कोई न कोई व्यक्ति कहीं न कहीं साइबर अपराधियों का शिकार होता है।
पैसे लेकर छोड़ दिए सभी 19 अपराधी
पुलिस भी इस बात से भली-भांति परिचित है और उच्च अधिकारी इनकी धर-पकड़ के लिए परेशान भी रहते हैं, बावजूद इसके मथुरा के थाना हाईवे की पुलिस ने साइबर अपराधियों के इस पूरे गिरोह को लाखों रुपए लेकर छोड़ दिया और अपने अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं लगने दी।
विभागीय सूत्र बताते हैं कि हाईवे थाना पुलिस ने गिरोह के सभी 19 सदस्यों को छोड़ने की एवज में दलालों के माध्यम से प्रति सदस्य करीब डेढ़ लाख रुपया वसूला। दलालों को क्या मिला, इसकी जानकारी होना बाकी है।
थाना पुलिस के इस योजनाबद्ध भ्रष्टाचार का अंदाज लगाने के लिए यह जान लेना काफी है कि थाने में कुछ देर रखने के बाद इन सभी 19 अपराधियों को थाना परिसर में पीछे की ओर बने कमरों में रखा गया, जिससे मामला चुपचाप निपटाने में आसानी हो।
छोड़े गए अपराधियों के नाम
रविकांत पुत्र श्रीचंद निवासी गांव नवादा थाना हाईवे, जितेन्द्र पुत्र राजकुमार निवासी अलीगढ़, गिर्राज पुत्र रवीन्द्र निवासी एटा, विनोद पुत्र नवी निवासी असम, सैकुल पुत्र रेशम, साहिल पुत्र अब्दुल, तस्लीम पुत्र नसरू, रॉबिन पुत्र रेशम, हमीद पुत्र आशू, मकसूद पुत्र कमरुद्दीन, साहिल पुत्र आयन, भाकिल पुत्र मोहन्दा, सुहैल पुत्र याकतअली, साबिर पुत्र अनवर, ताहिर पुत्र जाकिर, सकलम पुत्र मोहन्दा, इरशाद पुत्र महमूदा और राशिद।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार जांच अधिकारी आईपीएस संदीप मीणा ने इस मामले में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए थाने के सीसीटीवी कैमरे की फुटेज हासिल कर ली है और उसमें ये अपराधी आते व जाते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसके अलावा जांच अधिकारी को एक साक्ष्य सतोहा चौकी के रजिस्टर से प्राप्त हुआ है।
दरअसल, चौकी प्रभारी सतोहा ने किसी आंशका के चलते इन सभी 19 आरोपियों का नाम चौकी के रजिस्टर में दर्ज कर लिया था क्योंकि अपराधियों की धरपकड़ में वह भी शामिल थे। संभवत: इसीलिए चौकी प्रभारी सतोहा योगेश नागर अब खुद को पूरी तरह निर्दोष बता रहे हैं और कह रहे हैं कि मैं अधिकारियों के सामने पूरा सच लेकर आऊंगा।
ऐसे में एक सवाल यह और उठता है कि बिना ठोस कार्रवाई हुए और लाखों रुपए हड़प कर एकसाथ 19 साइबर अपराधियों को छोड़ देने जैसे संगीन मामले में एफआईआर दर्ज किए बिना क्या पूरा सच सामने आ पाएगा। या मथुरा के ही डॉ. निर्विकल्प अपहरण काण्ड की तरह ये भी फाइलों में दब कर रह जाएगा।
क्या है डॉ. निर्विकल्प का अपहरण काण्ड
10 दिसंबर 2019 को रात करीब 8 बजे हाईवे थाना क्षेत्र में ही गोवर्धन चौराहे के फ्लाई ओवर पर मथुरा के मशहूर ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. निर्विकल्प का अपहरण कर उनसे वसूली गई 52 लाख रुपयों की फिरौती को इलाका पुलिस हड़प गई और बदमाश छोड़ दिए गए।
जब इस मामले में शोर-शराबा हुआ तो पूरे दो महीने बाद 11 फरवरी 2020 की रात 10 बजकर 53 मिनट पर हाईवे थाना पुलिस ने अपनी ओर से IPC की धारा 364 A के तहत एक एफआईआर दर्ज की।
हाईवे थाने के तत्कालीन प्रभारी इंस्पेक्टर जगदंबा सिंह की ओर से दर्ज कराई गई इस एफआईआर में सनी मलिक पुत्र देवेन्द्र मलिक निवासी न्यू सैनिक विहार कॉलोनी थाना कंकरखेड़ा मेरठ, महेश पुत्र रघुनाथ निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा, अनूप पुत्र जगदीश निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा तथा नीतेश उर्फ रीगल पुत्र नामालूम निवासी भोपाल मध्यप्रदेश (हाल निवासी दिल्ली एनसीआर) को नामजद किया गया।
इस पूरे प्रकरण का एक दिलचस्प पहलू यह भी रहा कि डॉ. निर्विकल्प के अपहरण की अपनी ओर से FIR दर्ज कराने वाले इंस्पेक्टर जगदंबा सिंह को उसी दिन तत्काल प्रभाव से तत्कालीन एसएसपी शलभ माथुर ने निलंबित कर दिया। जिन्हें बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर बहाल भी कर दिया गया।
नामजद अपराधियों को पुलिस ने पकड़ा भी, लेकिन उन 52 लाख रुपए का कुछ पता नहीं लगा जिन्हें अपराधियों को फिरौती के रूप में देने की पुष्टि खुद डॉ निर्विकल्प कर चुके थे।
बहरहाल, अब देखना यह होगा कि लाखों रुपए लेकर साइबर क्राइम के गिरोह से जुड़े डेढ़ दर्जन अपराधियों को छोड़ने का यह संगीन मामला भी डॉ. निर्विकल्प अपहरण काण्ड की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा या फिर ईमानदार पुलिस अफसरों के रहते किसी ऐसे अंजाम तक पहुंचेगा, जिसके बाद कोई थाना या चौकी प्रभारी इतना बड़ा दुस्साहर न कर सके और योगी सरकार की भ्रष्टाचार के मामले में अपनाई गई जीरो टॉलरेंस की नीति का इस तरह मजाक न उड़ा पाए।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
गुरुवार, 7 जुलाई 2022
अग्निपथ… अग्निपथ… अग्निपथ, कौन कहता है ‘नाम में क्या रखा है’… नाम में ही सब कुछ रखा है
‘अग्नि’ का तो धर्म ही जलना और जलाना होता है। हालांकि वह भी राहत प्रदान करती है, बशर्ते उसका उपयोग समय और परिस्थितियों के अनुकूल हो। अग्नि से खेलने वाले अक्सर अपने हाथ जला बैठते हैं। फिलहाल कुछ अराजक तत्व अग्नि से खेल रहे हैं। वो देश जलाने पर आमादा हैं। राजनीतिज्ञ उन्हें पेट्रोल की तरह यूज कर रहे हैं, और वो यूज हो रहे हैं।
ये बात अलग है कि आज नहीं तो कल, उनकी समझ में जरूर आएगा कि पवित्रता की प्रतीक अग्नि का ‘दुरूपयोग’ किस कदर उनके ‘भविष्य पर भारी’ पड़ गया।
कमियां किसी भी योजना में हो सकती हैं… या कहें कि निकाली जा सकती हैं इसलिए केंद्र सरकार की अग्निपथ योजना अपवाद नहीं हो सकती लेकिन इसके विरोध की आड़ में देश को जला डालने की मंशा सिर्फ और सिर्फ देश द्रोह है, इसके अलावा कुछ नहीं।
आम आदमी के पैसों से जुटाई गई सरकारी संपत्ति को मात्र इसलिए फूंक डालना कि कोई योजना पसंद नहीं आई या उसे समझने व समझाने में कोई चूक हो गई, कहां की समझदारी है।
आमजन की सुविधा के लिए दौड़ रही बसों और ट्रेनों को आग के हवाले कर देने वाले कैसे कभी ‘शूरवीर’ हो सकते हैं। अपनी बुद्धि और विवेक को गिरवी रखकर सड़कों पर अराजकता फैला रहे राजनीतिक साजिश के शिकार इन तत्वों की शर्मनाक हरकतें इन्हें आत्मघाती रास्ते पर ले जा रही हैं।
बेशक…बेशक पिछले कुछ वर्षों से देश को किसी न किसी षड्यंत्र में उलझाने की कोशिशें लगातार जारी हैं। बात चाहे नागरिकता (संशोधन) कानून (सीएए) की हो या फिर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की, नए कृषि कानूनों की हो अथवा कश्मीर से धारा 370 और अनुच्छेद 35A के प्रावधानों को निरस्त करने की, सबके विरोध का तरीका कमोबेश एक जैसा ही रहा है। मकसद ये कि किसी भी तरह ऐसी अराजक स्थितियां पैदा कर दी जाएं कि लोगों को सोचने-समझने का मौका ही न मिले और वो सबके लिए सरकार को कठघरे में खड़ा कर दें।
जो कुछ आज एक खास तबके द्वारा ‘अग्निपथ योजना’ के लिए कहा जा रहा है कि किसी को भरोसे में नहीं लिया… किसी से पूछा नहीं… युवाओं को समझाया नहीं, ठीक यही बातें उन सभी सरकारी योजनाओं के लिए कही गई थीं जिनका हिंसक विरोध सड़कों पर उतर कर किया गया। उद्देश्य केवल यही रहा कि किसी भी तरह अपने हिंसक प्रदर्शनों और देश की जनता को बंधक बनाने की अपनी शर्मनाक करतूतों को जायज ठहराया जा सके। कभी किसी सड़क को महीनों नहीं, साल-दोसाल के लिए घेरकर तो कभी राष्ट्रीय राजमार्गों तथा अन्य सड़कों पर अराजकता फैलाकर।
एक बार को यह मान भी लिया जाए कि सरकार का हर निर्णय गलत है, और उसे जनहित की समझ नहीं हैं। विशेष रूप से वर्तमान सरकार को तो कतई नहीं है। तो भी क्या विरोध का वो रास्ता सही कहा जा सकता है जिससे करोड़ों की आबादी बेवजह न सिर्फ परेशान होती हो, बल्कि उसकी जान इसलिए सांसत में फंसी रहती हो कि कब किस जगह कुछ असामाजिक तत्व हाथों में डंडे लेकर खड़े मिल जाएंगे।
कब कहीं से पथराव होने लगेगा और कब बसों और ट्रेनों को फूंकने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। सड़कों पर जलते हुए टायर तथा वाहन, दुकानों में तोड़फोड़ और यहां तक कि बूढ़े- बच्चे व बीमार राहगीरों के साथ मारपीट का खौफनाक मंजर दिखाई देने लगेगा।
लोकतंत्र पर खतरे की दुहाई देने और संविधान एवं कानून-व्यवस्था में आस्था का ढोंग करने वाले खास तत्व इन दिनों न्यायालयों के उन निर्णयों पर भी सवाल उठाने से परहेज नहीं करते, जो उनके माफिक न हों।
अग्निपथ हो या कोई अन्य सरकारी योजना, यदि उसमें खामी दिखाई दे रही है तो उसे संवैधानिक तरीकों से चुनौती दी जा सकती है। उस पर कोर्ट के जरिए रोक भी लगवाई जा सकती है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। फिर इतना हंगामा क्यों?
रही बात अग्निपथ योजना की, तो शूरवीर अपने शौर्य का प्रदर्शन करने के लिए हमेशा मौके की तलाश में रहते हैं। फिर वो मौका किसी रास्ते से मिले। शूरवीर न तो सड़क पर निर्दोष लोगों को परेशान करते हैं और न राष्ट्र की संपदा को आग के हवाले करने जैसे किसी कृत्य को अंजाम देते हैं। सच तो यह है कि वो सैनिक बनने लायक हैं ही नहीं, जो ऐसा कर रहे हैं। सैनिक तो सपने भी राष्ट्ररक्षा के देखता है।
सच्चे सैनिक के लिए कोई पथ ‘अग्निपथ’ नहीं होता। जो होता है वो शौर्यपथ होता है। वो अग्निवीर भी नहीं हो सकता, हां शूरवीर हो सकता है इसलिए सरकार को पुनर्विचार ही करना है तो योजना के नाम पर करे क्योंकि नाम में बहुत कुछ रखा है।
– सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शनिवार, 7 मई 2022
कॉपी-पुस्तक छोड़ गए हैं… सोच रहा हूं क्या होगा, आज सुबह बच्चे बस्तों में पत्थर लेकर निकले हैं
मथुरा (उत्तर प्रदेश) के गांव मलिकपुर में 15 नवम्बर 1953 को जन्मे ग़ज़लकार अशोक रावत ने कभी एक शेर लिखा था-
कॉपी-पुस्तक छोड़ गए हैं, सोच रहा हूं क्या होगा।
आज सुबह बच्चे बस्तों में पत्थर लेकर निकले हैं।।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से इंजिनियरिंग करने के बाद सरकारी सेवा में रहे अशोक रावत ने ये शेर कब और किस संदर्भ में लिखा था, इतना तो नहीं मालूम अलबत्ता यह तय है कि पत्थरबाजी को लेकर कुछ लोगों का इतिहास है बहुत पुराना।
धारा 370 हटा लेने के बाद हालांकि कश्मीर में हालात काफी बदले हैं, या कहें कि नियंत्रित हुए हैं परंतु देश के विभिन्न हिस्सों की ताजा हिंसक घटनाएं बताती हैं कि पत्थरबाजों का मिज़ाज नहीं बदला।
आश्चर्य के साथ-साथ ये शोध का भी विषय है कि आखिर इन सभी घटनाओं में समानता क्यों है? यानी कि अपनी उपद्रवी सोच के साथ सुरक्षाबलों को भी टारगेट करना।
सुरक्षाबलों से पत्थरबाजों के बैर का ताल्लुक कहीं सांप्रदायिक तो नहीं, अन्यथा कौन नहीं जानता कि सुरक्षाबल तो सबकी हिफ़ाज़त के लिए हैं।
यदि ऐसा है तो यह प्रवृत्ति न सिर्फ बेहद खतरनाक है बल्कि इस बात का संकेत भी है कि सुरक्षाबलों पर ये तत्व भरोसा नहीं करते।
बेशक आज सुरक्षाबल एक बड़े राजनीतिक टूल की तरह इस्तेमाल किए जाने लगे हैं किंतु फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि सांप्रदायिकता से उनका कोई ताल्लुक है।
फिर कौन है जो सांप्रदायिक सोच के साथ उपद्रवियों को सुरक्षाबलों के खिलाफ खड़ा कर रहा है और यह बताना चाहता है कि जो भी उनके सामने आएगा, वह उनके निशाने पर होगा। फिर चाहे वह कानून-व्यवस्था के रखवाले ही क्यों न हों।
गौर करेंगे तो पता चलेगा कि सुरक्षाबलों पर हमलावर होने का मुद्दा, सांप्रदायिकता की आड़ में बड़ी चालाकी से छिपाया जा रहा है जबकि पिछले दिनों हुईं सभी हिंसक घटनाओं का शिकार लोगों से कहीं अधिक सुरक्षाबल हुए हैं। विशेष रूप से राज्य पुलिस, क्योंकि वही सबसे पहले सामने आकर खड़ी होती है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि किन्हीं तत्वों द्वारा देश में पत्थरबाजी की भी ट्रेनिंग उसी प्रकार दी जा रही हो जिस प्रकार सीमा पार आतंकवाद की ट्रेनिंग बाकायदा कैंप लगाकर दी जाती है।
यदि ऐसा नहीं है तो कश्मीर से लेकर करौली तथा खरगोन, और जहांगीरपुरी से लेकर जोधपुर तक की घटनाओं में इतनी समानता कैसे है।
हो सकता है कि वोट की राजनीति तथा तुष्टिकरण की नीति के चलते फिलहाल यह सवाल पीछे छूट जाए किंतु तय जानिए कि इस एक सवाल का जवाब ही देश की शांति का मार्ग प्रशस्त करने वाला साबित होगा, वर्ना ये सिलसिला यहीं रुकने वाला नहीं।
सब जानते हैं कि कश्मीर में पत्थरबाजी बाकायदा एक कारोबार का रूप ले चुकी थी। उसके लिए कौन फंडिंग करता था और कहां से फंड आता था, ये भी अब किसी से छिपा नहीं।
देश के विभिन्न हिस्सों में हुईं ताजा हिंसक घटनाओं में एक और बात समान रूप से सामने आई है कि उपद्रवियों के साथ बाहरी तत्व शामिल थे। ये वो लोग थे जिन्हें क्षेत्रीय लोग न तो जानते थे और न पहले कभी इलाके में देखा गया था। ऐसे में यह समझना बहुत मुश्किल नहीं कि जो कुछ हुआ, वह किसी बड़ी साजिश का हिस्सा था।
ये साजिश कहां से और किसके द्वारा रची जा रही है, जिस दिन इसका खुलासा हो जाएगा उस दिन सारी पर्तें उघड़ती चली जाएंगी अन्यथा अभी तो शुरूआत है। आगे-आगे देखिए… होता है क्या।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
सोमवार, 14 मार्च 2022
मथुरा के एक सरकारी विभाग में “भ्रष्टाचार” का ठेका, पढ़कर झटका लग सकता है लेकिन हकीकत यही है
अब आप खबर के ऊपर लगी तस्वीरों को देखिए। ये तस्वीरें हैं मथुरा (यूपी) के कलक्ट्रेट स्थित रजिस्ट्री कार्यालय की, जहां कार्यालय के अलग-अलग पटल पर बैठे हैं ये चेहरे। इन चेहरों में से कोई ऐसा नहीं है जो सरकारी मुलाजिम हो किंतु रजिस्ट्री कार्यालय का काम इनके बिना करा पाना संभव नहीं है।
मथुरा जनपद में कुल पांच रजिस्ट्री कार्यालय हैं जिनमें से मुख्य है सदर तहसील का कलक्ट्रेट स्थित कार्यालय, जहां दो सब रजिस्ट्रार हैं। यहां सब रजिस्ट्रार प्रथम के पद पर एके त्रिपाठी और सब रजिस्ट्रार द्वितीय के पद पर विजय कुमार पांडे फिलहाल नियुक्त हैं।
इनके अतिरिक्त मांट, छाता और महावन तहसीलों के रजिस्ट्री कार्यालयों में एक-एक सब रजिस्ट्रार की तैनाती रहती है।
सदर तहसील के सब रजिस्ट्रार प्रथम एके त्रिपाठी के स्टाफ में नवल, देव, आरिफ, अतुल, राजू, रवि, शंकर और रजा कार्यरत हैं जबकि सब रजिस्ट्रार द्वितीय के अधीन हैं हेमवीर, केके, नेत्रपाल, यामीन, राहुल तथा विजय।
घोर आश्चर्य की बात यह है कि एक दर्जन से अधिक इन नामों में से कोई ऐसा नहीं है जो सरकारी मुलाजिम हो, या जिसे उत्तर प्रदेश सरकार ने स्थायी अथवा अस्थायी तौर पर नियुक्ति दी हो लेकिन ये रजिस्ट्री कार्यालय में इस शान के साथ कुर्सी पर काबिज मिलेंगे जैसे सरकारी दामाद हों।
कार्यालय के अलग-अलग पटल पर बैठे ये अवैध मुलाजिम एक ओर जहां बड़ी बेशर्मी के साथ हर जायज काम के लिए भी खुलेआम रिश्वत मांगते हैं वहीं तमाम नाजायज काम करके सरकार को प्रति माह करोड़ों रुपए के राजस्व की हानि पहुंचाते हैं।
रिश्वत मांगने या कहें कि पैसा झपटने में ये अवैध कर्मचारी इतने माहिर हैं कि काम कैसा भी और किसी का भी हो, इनको भेंट दिए बिना न तो कोई काम करा सकता है और न इनकी नजरों से बच के आ सकता है।
सामान्य तौर पर किसी तृतीय या चतुर्थ श्रेणी के सरकारी कर्मचारी को जितना वेतन महीने में एकबार मिलता है, उतना तो रजिस्ट्री कार्यालय का एक-एक अवैध कर्मचारी हर रोज अपनी जेबों में भरकर ले जाता है।
जाहिर है कि भ्रष्टाचार से होने वाली ये वो कमाई है जो ऊपर तक हिस्सा पहुंचाने के बाद बचती है और जिस पर सिर्फ और सिर्फ अवैध कर्मचारी का हक होता है। ऐसे में इनके अधिकारियों की अकूत कमाई का अंदाज लगाना कोई मुश्किल काम नहीं।
योगीराज भगवान श्रीकृष्ण की पावन जन्मस्थली का मुख्य रजिस्ट्री कार्यालय तो एक उदाहरण है अन्यथा बात करें जनपद की बाकी तीन तहसीलों के रजिस्ट्री कार्यालयों की या फिर प्रदेश भर के रजिस्ट्री कार्यालयों की, तो सब जगह कमोबेश स्थितियां यही मिलेंगी। यानी हर जगह भ्रष्टाचार के ठेके बेखौफ और बेझिझक चलते मिलेंगे, वो भी उस योगीराज में जिसने भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति अख्तियार की हुई है और जिसे सख्ती से लागू करने की बात कहकर 2022 में भी वापसी की है।
मथुरा या प्रदेश के किसी भी रजिस्ट्री कार्यालय में अवैध कमाई के कितने रास्ते होते हैं और किसकी कितनी कीमत तय है, इसका विस्तृत विवरण अगली बार…
कौन उठाता है भ्रष्टाचार का ये ठेका, और कौन करता है अवैध नियुक्तियां
रजिस्ट्री कार्यालय के ही सूत्र बताते हैं कि यहां अवैध तौर पर कार्यरत कर्मचारियों की जानकारी यूं तो सभी उच्च अधिकारियों को है किंतु इनकी नियुक्तियों में प्रमुख भूमिका सहायक स्टांप आयुक्त की होती है जो विकास प्राधिकरण में बैठते हैं।
जाहिर है कि सब रजिस्ट्रारों की सहमति के बिना या उनकी जानकारी के बगैर ये नियुक्तियां संभव नहीं हैं लिहाजा वो दूध के धुले नहीं हो सकते।
सूत्र बताते हैं कि किसी भी उच्च प्रशासनिक अधिकारी का कभी रजिस्ट्री कार्यालय में आकस्मिक निरीक्षण के लिए न आना और न अवैध नियुक्तियों को लेकर कभी किसी जिम्मेदार अधिकारी से कोई जवाब तलब करना, यह समझने के लिए काफी है कि स्थितियां किस हद तक बिगड़ी हुई हैं।
इसे यूं भी समझा जा सकता है सर्वाधिक कमाई वाले सरकारी विभागों में शुमार रजिस्ट्री कार्यालय के अवैध कर्मचारी ही अधिकारियों की वो दुधारू गाय हैं जो हर रोज उनके साथ-साथ विकास प्राधिकरण को भी मोटी कमाई करने तथा कमाई के नए-नए ‘ठिकाने’ तलाश कर देते हैं।
किसी भी जिले में कलक्ट्रेट वो जगह होती है जहां पुलिस व प्रशासन के आला अफसर बैठते हैं। यहीं से आमजन को न्याय मिलता है, किंतु जब पूरे कुएं में भी भांग घुली हो तो किससे शिकायत और कैसी शिकायत।
कहते हैं मथुरा तीन लोक से न्यारी है। शायद इसीलिए कभी एक ‘रामवृक्ष यादव’ नाम का दुबला-पतला शख्स अपने गुर्गों के साथ यहां आया था और सरकारी जवाहर बाग की सैंकड़ों एकड़ बेशकीमती जमीन पर वर्षों काबिज रहा।
इसी कलक्ट्रेट पर ऐसे ही बड़े-बड़े अधिकारियों की नाक के नीचे उसने जवाहर बाग में नंगा नाच किया, और जब उच्च न्यायालय की सख्ती के बाद अधिकारी उसे अवैध कब्जे से बेदखल करने पर मजबूर हुए तो दो पुलिस अफसरों को जान गंवानी पड़ी।
आज बेशक कोई सरकारी जमीन किसी के अवैध कब्जे में न सही किंतु वैध को अवैध तथा अवैध को वैध बताकर लोगों को खुलेआम लूटने और सरकारी खजाने को चूना लगाने का खेल बदस्तूर जारी है।
साथ ही जारी है एक ऐसे प्रदेश में अवैध नियुक्तियों के जरिए भ्रष्टाचार को ठेके पर उठाने का कारनामा, जहां नौकरी के लिए लाखों युवा दर-दर की ठोकरें खाते देखे जा सकते हैं।
यह सब इसलिए हो पा रहा है क्योंकि शिकवा-शिकायत के बावजूद भ्रष्टाचार के इन ठेकेदारों का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता। बिगड़ना तो दूर, कोई यह तक पूछने वाला नहीं कि भ्रष्टाचार को ठेके पर देने की कारस्तानी किसकी शह पर तथा किसकी कलम से हो रही है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी





