Blog serves news about Corruption in India,Dirty politics,corruption free India,corruption in politics,real estate,Dharm and Society
बुधवार, 12 जून 2024
नयति की नियति को प्राप्त होने जा रहा है मथुरा का एक मशहूर हॉस्पिटल, चेयरमैन की विदेशी डिग्री भी चर्चा का विषय
कॉर्पोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया ने कृष्ण की पावन स्थली मथुरा से 28 फरवरी 2016 को एक सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल का संचालन शुरू किया था। 'नयति' के नाम से खोले गए इस हॉस्पिटल का उद्घाटन देश के दिग्गज उद्योगपति रतन टाटा के हाथों कराया गया। नेशनल हाईवे से सटी एक जमीन को लीज पर लेकर शुरू किए गए इस हॉस्पिटल ने बहुत कम समय में अच्छी खासी शोहरत हासिल कर ली लेकिन हॉस्पिटल की चेयरपर्सन नीरा राडिया का मकसद संभवत: कुछ और था, लिहाजा हॉस्पिटल के चर्चे इलाज से अधिक विवादों के कारण होने लगे। नीरा राडिया ने इन विवादों पर ध्यान देने की बजाय उन्हें दबाने में अधिक रुचि ली जिसके परिणाम स्वरूप मात्र चार साल में 'नयति' अपनी 'नियति' को प्राप्त हो गया। आज इस हॉस्पिटल पर ताला लटका है। मथुरा का एक अन्य हॉस्पिटल भी अब उसी राह पर
नयति की तरह ही नेशनल हाईवे के किनारे लीज की जमीन पर शुरू किया गया एक अन्य हॉस्पिटल भी अब उसी राह पर चल पड़ा है। बहुत कम समय में इस हॉस्पिटल ने भी प्रसिद्धि के साथ-साथ विवादों को जन्म देना प्रारंभ कर दिया है। इसे इत्तेफाक कहें या कुछ और कि नयति की तरह ही इस हॉस्पिटल में भी एक ओर जहां मरीजों के परिजनों से रूखा व्यवहार करना, मनमाने पैसे वसूलना तथा गोपनीयता की आड़ लेकर इलाज की कोई जानकारी न देना एवं मरीज की स्थिति न बताने जैसी बातें काफी आम हो चुकी हैं। वहीं दूसरी ओर नयति की तरह ही इस हॉस्पिटल में सेवारत डॉक्टर्स समय पर अपना वेतन पाने के लिए तरसने लगे हैं जिससे हॉस्पिटल के भविष्य का अनुमान लगाना कोई बड़ी बात नहीं रह गई।
बताया जाता है हॉस्पिटल के लिए बैंक से प्राप्त कर्ज की किस्तें भी अब समय पर अदा नहीं की जा रही हैं।
हॉस्पिटल के सूत्रों की मानें तो इस सबका एक बड़ा कारण संचालक द्वारा हॉस्पिटल से होने वाली आमदनी का बड़ा हिस्सा जमीनों की खरीद-फरोख्त में निवेश करना है ताकि एकमुश्त मोटी कमाई की जा सके।
नयति सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल की चेयरपर्सन नीरा राडिया और इस हॉस्पिटल के चेयरमैन में एक और बड़ी समानता है। सब जानते हैं कि नीरा राडिया शासन-प्रशासन में बने अपने रसूख का इस्तेमाल नयति या खुद के ऊपर लगे आरोपों को दबाने में करती रहीं, इसलिए नीरा राडिया के खिलाफ तमाम लोग मुंह खोलने को आसानी से तैयार नहीं होते थे।
ठीक इसी तरह इस हॉस्पिटल के चेयरमैन भी पुलिस-प्रशासन के साथ-साथ सत्ता के गलियारों तक उठने-बैठने में रुचि रखते हैं, और उससे बने अपने प्रभाव का प्रयोग अपने अथवा हॉस्पिटल के खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबाने में कर रहे हैं।
फर्क सिर्फ इतना है कि नीरा राडिया चिकित्सकीय पेशे से ताल्लुक नहीं रखती थीं जबकि ये महोदय इसी पेशे से ताल्लुक रखते हैं। हालांकि विदेश से प्राप्त इनकी डिग्री अच्छी-खासी चर्चा का विषय बनी हुई है।
चेयरमैन की डिग्री को लेकर चर्चा क्यों?
बताया जाता है चिकित्सकीय पेशे से जुड़े लोगों और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) की मथुरा इकाई में भी इस हॉस्पिटल के 'चेयरमैन डॉक्टर' की डिग्री चर्चा का विषय बनी हुई है क्योंकि उन्होंने अपनी पढ़ाई भारत से न करके ऐसे देश से की है जो दुनिया में सबसे सस्ती चिकित्सकीय एजुकेशन देने के लिए पहचाना जाता है।
यूं भी किसी दूसरे देश से डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी करके आने वालों के लिए भारत में प्रेक्टिस शुरू करने से पहले फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट्स एग्जामिनेशन (FMGE) की परीक्षा पास करनी होती है।
क्या कहते हैं भारत के नियम-कानून
भारत सरकार के नियमानुसार विदेश से MBBS की पढ़ाई पूरी करने के बाद भारत लौटने वाले डॉक्टर को पहले यहां फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट्स एग्जामिनेशन (FMGE) की परीक्षा पास करनी पड़ती है और तभी वह यहां प्रेक्टिस करने के लिए अधिकृत माने जाते हैं। इस परीक्षा को पास किए बिना वे भारत में मेडिकल प्रैक्टिस नहीं कर सकते। उन्हें लाइसेंस ही नहीं मिलेगा, किंतु विदेश से पढ़कर आने वाले अधिकांश डॉक्टर ऐसा नहीं करते क्योंकि इस परीक्षा को पास करने वालों की संख्या 15 फीसदी से भी कम है।
ये आंकड़े कुछ समय पहले नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस (NBE) द्वारा जारी किए गए हैं। NBE ही FMGE का आयोजन करती है।
विदेश से मेडिकल की पढ़ाई के लिए भी अब NEET अनिवार्य
विदेश से मेडिकल की पढ़ाई करने वालों की योग्यता पर लगते रहे सवालिया निशानों से निजात पाने के लिए सरकार ने नियमों में बदलाव भी किया है। अब विदेश जाकर मेडिकल की पढ़ाई करने के इच्छुक छात्रों को भारत में NEET की परीक्षा पास करना अनिवार्य कर दिया गया है। इसके बाद भी केवल वही छात्र स्वदेश लौटकर मेडिकल प्रैक्टिस करने के लिए पात्र होंगे, जिन्होंने ऐसे देश से पढ़ाई की हो जहां भारत के समकक्ष मेडिकल की पढ़ाई होती हो।
दरअसल, कई देश ऐसे हैं जहां डॉक्टर को दी जाने वाली डिग्री वहां भी मान्य नहीं होती, या सीमित चिकित्सकीय कार्य के लिए मान्य होती है।
IMA मथुरा का क्या कहना है?
IMA मथुरा के अध्यक्ष डॉक्टर मनोज गुप्ता से Legend News ने जब ये जानकारी चाही कि मथुरा में ऐसे कितने डॉक्टर प्रेक्टिस कर रहे हैं जिन्होंने देश के बाहर से डिग्री ली है, तो उनका कहना था कि IMA मथुरा के पास ऐसी कोई सूची नहीं है। सीएमओ ऑफिस में रजिस्टर्ड डॉक्टर्स को IMA की सदस्यता दे दी जाती है।
अलबत्ता डॉक्टर मनोज गुप्ता ने इतना जरूर माना कि समय-समय पर ये मुद्दा IMA की बैठकों में उठाया जाता रहा है किंतु किसी नतीजे तक नहीं पहुंचा। इसका कारण IMA में होने वाले वार्षिक चुनाव बताए जाते हैं। चूंकि IMA के पदाधिकारियों को अल्प अवधि के लिए चुना जाता है इसलिए कोई पदाधिकारी इस गंभीर मुद्दे पर ठोस निर्णय नहीं ले पाता। ये भी कह सकते हैं कि वो किसी विवाद में पड़ कर अपने लिए मुसीबत मोल नहीं लेना चाहता।
इस संबध में और जानकारी करने पर इतना पता जरूर लगा कि IMA मथुरा के ही एक पूर्व पदाधिकारी ने कुछ समय पहले मुख्यमंत्री के पोर्टल पर शिकायत कर विदेश से डिग्री लेकर आए डॉक्टर्स द्वारा गैर कानूनी तरीके से प्रेक्टिस किए जाने का मुद्दा उठाया था, जिसे सीएमओ मथुरा को रेफर भी किया गया लेकिन तत्कालीन सीएमओ मथुरा ने उसे भी 'भुना' लिया और कोई कार्रवाई नहीं की।
वर्तमान सीएमओ मथुरा क्या बताते हैं?
मथुरा के वर्तमान सीएमओ से जब इस मुतल्लिक बात की गई तो उनका कहना था कि विदेश से डॉक्टर की डिग्री लेकर आने वालों द्वारा भारत में कहीं भी प्रेक्टिस किए जाने की जानकारी मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया या मेडिकल एजुकेशन से जुड़े विभागों को ही होती है। हमारे पास तो वही लिस्ट होती है जो IMA के पास रहती है।
IMA मथुरा में कुल कितने डॉक्टर पंजीकृत हैं?
एक अनुमान के अनुसार IMA मथुरा के सदस्य डॉक्टरों की संख्या लगभग चार सौ के करीब है। इसमें वो डॉक्टर भी शामिल हैं जो विदेश से डिग्री लेकर आए हैं और वो भी जो विभिन्न कारणों से प्रेक्टिस करने के पात्र नहीं हैं।
ऐसे डॉक्टर खुद भी इस बात से भली-भांति परिचित हैं कि वो प्रेक्टिस करने के लिए अधिकृत नहीं हैं इसलिए कहीं वो संचालक का चोला ओढ़कर काम कर रहे हैं तो कहीं चेयरमैन या चेयरपर्सन बनकर।
लीज की जमीन पर हॉस्पिटल का संचालन कर रहे उसके चेयरमैन चिकित्सक को भी कभी किसी का उपचार करते नहीं देखा गया जबकि वो सर्जन बताए जाते हैं।
विदेश से डिग्री लेकर आने वाले इन डॉक्टर्स और गैरकानूनी तरीके से प्रेक्टिस कर रहे डॉक्टर्स की जानकारी देने को कोई इसलिए भी तैयार नहीं है क्योंकि IMA मथुरा के कुछ सदस्य ऐसे भी हैं जिनका संरक्षण गैरकानूनी तरीके से प्रेक्टिस कर रहे इन डॉक्टर्स को प्राप्त है और वो निजी स्वार्थवश उनके खिलाफ कोई एक्शन नहीं होने देना चाहते।
बेशक काबिल डॉक्टर्स का एक बड़ा वर्ग चाहता है कि इन तत्वों के खिलाफ ठोस एक्शन हो जिससे वो उस जमात में अलग से पहचाने जा सकें किंतु फिलहाल ऐसा होता नजर नहीं आ रहा।
चिकित्सकीय पेशे के लिए कलंक बना कॉर्पोरेट कल्चर
कोई भी डॉक्टर जिसने अपनी मेहनत एवं लगन और मरीजों के प्रति अपने प्रोफेशनल एथिक्स के बूते समाज में जगह बनाई है, वह कभी नहीं चाहता कि उसका कोई मरीज या उसके परिजन उसकी सेवा से असंतुष्ट होकर जाएं, लेकिन इसके उलट जिन्होंने इस पेशे को कार्पोरेट कल्चर में ढाल रखा है उनके लिए अधिक से अधिक कमाई ही उनका एकमात्र ध्येय होता है।
यही कारण है कि मथुरा जैसे छोटे से शहर में आए दिन किसी न किसी हॉस्पिटल से कोई न कोई विवाद सामने आता रहता है, और इस स्थिति से जनसामान्य के साथ-साथ काफी बड़ी संख्या में स्थानीय डॉक्टर्स भी परेशान हैं। लेकिन सवाल यह खड़ा होता है कि बिल्ली के गले में घंटी बांधे कौन?
और यदि कोई ये घंटी बांधने का दुस्साहस कर भी ले तो क्या गारंटी है कि उसके बाद कार्रवाई होगी। जैसे कि मुख्यमंत्री पोर्टल पर शिकायत करने के बाद भी नहीं हो सकी।
जैसे कि IMA से लेकर CMO तक, ये तो स्वीकार कर रहे हैं कि गैरकानूनी तरीके से प्रेक्टिस और कॉर्पोरेट कल्चर से हॉस्पिटल चलाने वालों की संख्या अच्छी-खासी है किंतु वो उनका नाम सार्वजनिक करने को तैयार नहीं।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
बुधवार, 22 मई 2024
यूपी की वो समस्या जिसका पहले कार्यकाल से लेकर अब तक समाधान नहीं निकाल सके योगी जी जैसे सीएम
शुक्रवार 20 नवंबर 2020 को लखनऊ में की गई एक समीक्षा बैठक के दौरान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिलाधिकारियों और पुलिस कप्तानों सहित सभी उच्च अधिकारियों को स्पष्ट आदेश एवं निर्देश दिए कि उन्हें अपने सरकारी मोबाइल (सीयूजी) नम्बर पर आने वाली हर कॉल खुद रिसीव करनी होगी। साथ ही सीयूजी नंबरों के जरिए सामने आने वाली जनसमस्याओं को गंभीरता से लेना होगा और उनका समाधान करना होगा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने साफ-साफ कहा कि डीएम और पुलिस कप्तान सहित अन्य सभी अधिकारी अपने सीयूजी नम्बर पर आने वाली हर फोन कॉल का जवाब भी जरूर दें। यह आदेश तत्काल प्रभाव से अमल में लाया जाए। इसे जांचने के लिए अगले एक सप्ताह में मुख्यमंत्री कार्यालय से औचक फोन कर अधिकारियों की कार्यशैली परखी जाएगी ताकि आदेश की अवहेलना करने वाले अधिकारियों के खिलाफ आवश्यक एक्शन लिया जा सके। सीएम योगी ने गैर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने के लिए उच्चाधिकारियों को भी निर्देशित किया।
जनहित में दिए गए इन आदेश-निर्देशों के अनुपालन की सत्यता परखने के लिए योगी सरकार ने लगभग चार महीने बाद 15 मार्च 2021 को तमाम बड़े अधिकारियों से उनके सीयूजी नंबरों पर संपर्क साधने का प्रयास किया किंतु इनमें से 25 जिलाधिकारियों तथा 4 कमिश्नरों ने अपने सीयूजी नंबर रिसीव करने की जहमत नहीं उठाई। अधिकारियों की इस हरकत के लिए प्रदेश के नियुक्ति एवं कार्मिक विभाग ने वाराणसी, प्रयागराज, अयोध्या तथा बरेली के मंडलायुक्तों से जवाब तलब भी किया।
इनके अतिरिक्त गौतमबुद्ध नगर (नोएडा), गाजियाबाद, बदायूं, अलीगढ़, कन्नौज, संत कबीरनगर, सिद्धार्थनगर, गोरखपुर, फिरोजाबाद, हापुड़, अमरोहा, पीलीभीत, बलरामपुर, गोंडा, जालौन, कुशीनगर, औरैया, कानपुर देहात, झांसी, मऊ तथा आजमगढ़ के जिलधिकारियों को भी कारण बताओ नोटिस जारी किए गए किंतु इसके तीन साल बाद भी स्थिति जस की तस है।
2017 में पूर्ण बहुमत के साथ यूपी के सीएम बने योगी आदित्यनाथ ने 2022 में एकबार फिर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। अब उस सरकार को बने भी दो साल से अधिक का समय बीत चुका है किंतु अधिकारियों के रवैये में कोई परिवर्तन नजर नहीं आ रहा।
अधिकांश अधिकारी आज भी न तो अपने सीयूजी नंबर रिसीव करते हैं और न किसी को कोई जवाब देते हैं। ऐसे अधिकारियों की भी कमी नहीं हैं जिनके सीयूजी नंबर उनके अधीनस्थ उठाते हैं और फोन करने वाले का 'स्टेटस' देखकर जवाब देते हैं।
जनसामान्य की तो किसी भी समस्या को शायद ही कोई अधिकारी गंभीरता से लेता हो अन्यथा ज्यादातर अधिकारी और उनके अधीनस्थ अनजान नंबर से आए कॉल को रिसीव करना तक जरूरी नहीं समझते।
इसके अलावा हर सरकारी अधिकारी के सीयूजी नंबर पर WhatsApp चालू होना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है उसे 'सीन' करना यानी देखना तथा देखकर आवश्यकता अनुसार उसका जवाब देना और समस्या का यथासंभव समाधान करना। लेकिन तमाम अधिकारी ऐसा नहीं करते।
उन्होंने अपने WhatsApp पर इस तरह की सेटिंग की हुई है कि प्रथम तो वो उन तक संदेश पहुंचते ही नहीं हैं, और यदि पहुंच भी जाएं तो भेजने वाले को पता नहीं लगता कि उसका मैसेज देखा भी है या नहीं क्योंकि उस सेटिंग के बाद वहां 'ब्लू टिक' शो नहीं करता। सिर्फ मैसेज पहुंचने के दो टिक शो होते हैं।
अगर बात करें राजनीतिक एवं धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मथुरा जैसे जिले की तो उसका हाल भी दूसरे जिले से कुछ अलग नहीं है। मथुरा में तैनात अधिकांश अधिकारी यही रवैया अनपाए हुए हैं जबकि योगी सरकार कहती है कि अयोध्या के बाद उसका सारा फोकस मथुरा के विकास तथा यहां के लोगों की समस्याओं के समाधान पर टिका है।
आज इस बाबत 'लीजेण्ड न्यूज़' ने मथुरा में सत्ताधारी दल के जिलाध्यक्ष निर्भय पांडे से फोन पर बात की और पूछा कि क्या यह बड़ी समस्या उनके संज्ञान में है?
इस पर उनका कहना था कि फिलहाल चुनाव संबंधी कार्य के लिए मैं आजमगढ़ में हूं, और समय मिलते ही इसे चेक करके उच्च अधिकारियों से बात करूंगा।
मथुरा बीजेपी के महानगर अध्यक्ष घनश्याम लोधी ने बताया कि वह भी चुनाव प्रचार के लिए श्रावस्ती गए हुए हैं, और लौटकर जिलाधिकारी से इस संबंध में बात करेंगे।
मथुरा में कांग्रेस के जिलाध्यक्ष भगवान सिंह वर्मा को जब इस समस्या से अवगत कराया गया तो उन्होंने भी चुनाव प्रचार में व्यस्तता का हवाला देते हुए कहा कि समय मिलते ही वो इस मुद्दे को जिलाधिकारी के सामने रखेंगे।
उनका कहना था कि वह पड़ोसी राज्य हरियाणा के गुरूग्राम से लोकसभा चुनाव लड़ रहे अभिनेता राजबब्बर के चुनाव प्रचार में लगे हैं। और वहां से फ्री होने पर यह मुद्दा जरूर उठाएंगे।
बहरहाल, 1 जून को लोकसभा के चुनाव संपन्न होने जा रहे हैं और 4 जून को उनका नतीजा भी निकल आएगा। बस देखना यह होगा कि सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेतागण इसके बाद इस अत्यंत जरूरी मुद्दे पर कितने गंभीर होते हैं और इसका निराकरण कैसे करते हैं। फिलहाल तो समाधान के लिए दिए गए सीयूजी नंबर अपने आप में एक समस्या बनकर रह गए हैं जिसका हल शायद योगी जी जैसे सीएम को भी नहीं सूझ रहा।
यदि ऐसा न होता तो अपने पहले कार्यकाल में उठाई गई इस समस्या का कोई तो समाधान योगी जी दूसरे कार्यकाल तक जरूर ढूंढ चुके होते।
अधिकारी भी भली-भांति जानते हैं कि ऊपर से आए आदेश-निर्देशों का कितना और किस तरह पालन करना है। इसीलिए सरकारें बदलती हैं लेकिन सरकारी अफसरों की कार्यप्रणाली जस की तस रहती है। उसमें कहीं कोई बदलाव नहीं आता।
इतना जरूर है कि जिला अध्यक्ष और महानगर अध्यक्ष के रूप में बैठे सत्ताधारी दल के पदाधिकारी अगर इस ओर ध्यान दें और खुद मॉनिटरिंग करके सरकार तक जमीनी हकीकत पहुंचाएं तो काफी हद तक अधिकारियों की मनमानी पर शिकंजा कसा जा सकता है। वरना ढर्रे पर तो सब चल ही रहा है क्योंकि लखनऊ में बैठे अधिकारी रोज-रोज फैक्ट चेक नहीं कर सकते। करते भी हैं तो नोटिस देकर खाना-पूरी कर लेते हैं, जैसा 15 मार्च 2021 को किया तो गया लेकिन किसी अधिकारी के खिलाफ कोई एक्शन हुआ हो, इसकी कोई सूचना कहीं से नहीं मिली। नतीजा सामने है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
सोमवार, 29 अप्रैल 2024
यूनिवर्सिटीज से लेकर कॉलेज और स्कूली छात्र तक ड्रग स्मगलर्स की गिरफ्त में, धार्मिक स्थल भी अछूते नहीं
बंदरगाह, एयरपोर्ट, रेलवे स्टेशन तथा बस अड्डों से देशभर में आए दिन पकड़ी जाने वाली ड्रग्स की अच्छी-खासी तादाद इस बात की पुष्टि करती है कि भारत हर किस्म के नशीले पदार्थों की खपत का एक बड़ा केंद्र बना हुआ है, किंतु सवाल यह खड़ा होता है कि जो ड्रग्स पकड़ी नहीं जाती वह कहां जाती है। साथ ही यह भी कि जो पकड़ में नहीं आती, उस ड्रग्स की तादाद कितनी है और उसे ड्रग स्मगलर्स कहां तथा कैसे खपाते हैं। ड्रग्स स्मगलर्स की गिरफ्त में हैं हर आयु वर्ग के छात्र-छात्राएं
अब यह कोई दबी-ढकी बात नहीं रह गई कि ड्रग स्मगलर्स का सबसे आसान शिकार बनते हैं विभिन्न आयु वर्ग के छात्र-छात्राएं, क्योंकि पढ़ाई के अलावा करियर बनाने का दबाव आज के छात्रों पर इतना अधिक होता है कि उन्हें भटकते देर नहीं लगती। फिर घर-परिवार से दूरी उनके भटकाव में अहम भूमिका निभाती है।
धर्म और शिक्षा का मिश्रण बनाता है गंभीर हालात
वैसे तो देश का हर धार्मिक स्थल ड्रग स्मगलर्स के लिए मुफीद रहता है, लेकिन यदि कोई स्थान धर्म के साथ-साथ पर्यटन का केंद्र और शिक्षा का हब भी हो तो नशे के कारोबार में वह चार-चांद लगाने का काम करता है।
धर्म की आड़ करती है सोने पर सुहागे का काम
कृष्ण का जन्मस्थान मथुरा चूंकि देश का एक बड़ा धार्मिक स्थल है, इसलिए यहां आने-जाने वाले लोगों की संख्या भी काफी है। मथुरा की भौगोलिक स्थिति ऐसी है कि इसकी एक सीमा राजस्थान से तो दूसरी हरियाणा से लगती है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली भी यहां से मात्र 150 किलोमीटर की दूरी पर है।
कुछ वर्षों पहले तक मथुरा और उसके आस-पास के धार्मिक स्थलों पर मात्र उन यात्रियों का आना-जाना रहता था जो अपने मन में भक्तिभाव रखते थे तथा श्रद्धावश यहां खिंचे चले आते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। जब से देश में धार्मिक पर्यटन का शौक पैदा हुआ है और इसका एक नया वर्ग बना है तब से यह विश्व प्रसिद्ध धार्मिक स्थल, पर्यटक स्थल में तब्दील हो चुका है। मथुरा जनपद में कुछ समय से भीड़ का दबाव इतना अधिक है कि प्रशासन के भी हाथ-पांव फूले रहते हैं।
जाहिर है कि धार्मिक पर्यटक के रूप में आने वाला हर व्यक्ति न तो धार्मिक होता है और न श्रद्धालु, वह एक ऐसा बहरूपिया होता है जो मौका देखकर सुविधा अनुरूप अपना रूप बदलता रहता है। इसमें एक रूप ड्रग स्मगलर का, तो दूसरा ड्रग पेडलर का भी हो सकता है।
एजुकेशन हब के रूप में भी है मथुरा की पहचान
चूंकि मथुरा की पहचान अब एजुकेशन हब के रूप में भी स्थापित हो चुकी है तो यहां शिक्षा ग्रहण करने न सिर्फ देश, बल्कि विदेशों तक से छात्र आते हैं इसलिए ड्रग स्मगलर्स के लिए यह धार्मिक जनपद काफी लाभदायी साबित हो रहा है। ड्रग स्मगलर्स ने यहां अपने पेडलर का बड़ा जाल बुन लिया है जो यूनिवर्सिटीज से लेकर कॉलेज तथा स्कूलों के छात्र-छात्राओं तक अपनी पहुंच रखते हैं। हॉस्टल और बोर्डिंग स्कूल विशेष तौर पर ड्रग पेडलर के निशाने पर होते हैं क्योंकि घर-परिवार से दूर रहने वाले छात्र उनके शिकंजे में आसानी से फंस जाते हैं। बाद में यही छात्र उनकी 'चेन' बनाने के काम आते हैं।
विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार मोक्ष नगरी मथुरा में आज ड्रग सप्लायर और ड्रग पेडलर इस कदर सक्रिय हैं कि शायद ही किसी शिक्षण संस्था के छात्र-छात्राएं उनकी पहुंच से दूर हों। ड्रग स्मगलर ने इस काम में शहर के उन बेरोजगार तथा महत्वाकांछी युवाओं को लगा रखा है जो कम समय के अंदर अपने सारे सपने पूरे करना चाहते हैं। ये युवा सुबह से शाम तक शिक्षण संस्थाओं के इर्द-गिर्द मंडराते रहते हैं जिसकी पूरी जानकारी इलाका पुलिस को भी होती है और वो इन्हें पूरा संरक्षण देती है।
शिक्षण संस्थाएं भी नहीं हैं अनभिज्ञ
ऐसा नहीं है कि छात्र-छात्राओं में ड्रग्स के एडिक्शन और उसको पूरा करने के लिए ड्रग पेडलर की सक्रियता से शिक्षा व्यवसायी अनभिज्ञ हों, वह सब-कुछ जानते हैं लेकिन चुप रहने में अपनी भलाई समझते हैं।
इस बारे में बात करने पर वो साफ कहते हैं कि प्रथम तो संस्थान के बाहर होने वाली किसी गतिविधि से उनका कोई लेना-देना नहीं है। दूसरे इससे संस्थान की बदनामी होती है और संस्थान का प्रबंध तंत्र अपने चारों ओर दुश्मन खड़े पाता है।
बात चाहे पुलिस-प्रशासन की हो या अभिवावकों की, हर कोई संस्थान पर दोषारोपण करने में जुट जाता है जबकि ड्रग पेडलर पुलिस से मिल रहे संरक्षण तथा छात्र-छात्राओं की मनोदशा का ही लाभ उठाते हैं।
स्थानीय निजी हॉस्पिटल और नर्सिंग होम्स उठाते हैं जमकर आर्थिक लाभ
मथुरा में यूं तो कोई नामचीन हॉस्पिटल नहीं है, लेकिन निजी नर्सिंग होम्स तथा हॉस्पिटल की कमी भी नहीं हैं।
बताया जाता है नशे की ओवरडोज होने से तबीयत बिगड़ने पर बाहरी छात्र-छात्राएं अक्सर निजी हॉस्पिटल अथवा किसी नर्सिंग होम पहुंचते हैं, लेकिन इनके संचालक इसकी सूचना सही जगह देने के बजाय उनका आर्थिक शोषण करते हैं।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार नेशनल हाईवे पर बने कई हॉस्पिटल तथा नर्सिंग होम्स इसका भरपूर आर्थिक लाभ उठा रहे हैं जिसकी जानकारी पुलिस को भी है, किंतु न पुलिस उनके खिलाफ कोई एक्शन लेती है और न वो पुलिस से ड्रग पेडलर को मिल रहे संरक्षण पर अपना मुंह खोलते हैं।
यही कारण है कि मथुरा नगरी एक ओर जहां ड्रग स्मगलर्स के लिए तो दूसरी ओर पुलिस प्रशासन के लिए माल कमाने का सुरक्षित ठिकाना बन चुकी है। पिछले दिनों हुई एक भीषण सड़क दुर्घटना के तार भी कहीं न कहीं नशे के काले कारोबार से जुड़ रहे हैं लेकिन कोई कुछ कहने को तैयार नहीं है। कारण वही है कि इस 'हमाम' में शिकार और शिकारी दोनों की स्थिति एक जैसी है। किसी एक ने जुबान खोल दी तो तमाम सफेदपोश लोग मुंह दिखाने लायक नहीं रहेंगे।
- सुरेन्द्र चतुर्वेदी
सोमवार, 22 अप्रैल 2024
किस्सा कुर्सी का: घुंघुरू सेठ... शुगर, ईडी, सीबीआई और आम के फेर में फंसे खास आदमी
"आम" से "खास आदमी" बने AAP के दिल्ली वाले घुंघुरू सेठ तो बड़े "खदूस" निकले। सेठ जी जेल प्रवास के दौरान भी न केवल "सेठानी" के हाथ से बने पकवानों का मजा लूट रहे हैं बल्कि मधुमेह जैसी बीमारी को भी ठीक उसी अंदाज में चुनौती दे रहे हैं जैसे तिहाड़ जाने से पहले ED और CBI को दिया करते थे। कहते थे कि हिम्मत है तो हाथ डाल कर दिखाएं, लाखों घुंघुरू सेठ दिल्ली की सड़कों पर दिखाई देंगे। ये बात अलग है कि घुंघुरू सेठ की चुनौती को स्वीकार करते हुए जब ED ने उनके गले पर हाथ डालकर हवालात में ला ठूंसा, तो दिल्ली के किसी कोने से 'चूं' की आवाज भी सुनाई नहीं दी।
जो आवाजें सुनाई दे भी रही हैं, वो AAP के उन्हीं खास आदमियों की हैं जिन्होंने AAP के साथ ही आम आदमी की आत्मा का पिंडदान कर दिया था। वो अब खास से खासमखास बनने की जुगाड़ में हैं और इसलिए उसी तरह की हरकतें कर रहे हैं जिस तरह की हरकतें आप तिहाड़ में कर रहे हैं।फर्क सिर्फ इतना है कि आप बाहर निकलने की जुगत में हैं और वो आपको लंबे समय तक अंदर रखने का बंदोबस्त करने में लगे हैं। आप अपनी शुगर बढ़ा रहे हैं जिससे मेडिकल ग्राउंड पर बेल मिल जाए और वो उसे कम कराने के लिए "इंसुलिन" मांग रहे हैं ताकि सब-कुछ ठीक हो जाए और मेडिकली फिट-फाट होकर आप 'तिहाड़ी लुत्फ़' उठाते रहें।
घुंघुरू सेठ, आपको याद होगा कि आपने अपनी जेल यात्रा से पहले और अपने साथियों के जेल प्रवास पर बहुत कुछ ऐसा कहा था जिसका बड़ा गूढ़ अर्थ था। जैसे वो तो 'सेनानी' हैं। साल-दो साल भी रहना पड़ा तो हंस-हंस के काट लेंगे, लेकिन जब आपकी बारी आई है तो आपका रो-रोकर बुरा हाल है।
वैसे घुंघुरू सेठ एक बात तो तय है कि आपकी जिह्वा पर देवी सरस्वती विराजती हैं। आपके पुराने वीडियो देखे। उन्हें देखने के बाद इस बात का इल्म हुआ, अन्यथा आपकी 'सरकार' बन जाने के बाद भी हम तो आपको वही फटोली टाइप का चप्पल चटकाता हुआ आम आदमी समझते रहे। हमें पता ही नहीं था कि कभी ठेल-ढकेलों पर गोलगप्पे खाने वाला झोलाछाप शर्ट में लिपटा हुआ यह आदमी इतना शातिर निकलेगा कि ED और CBI को भी 'मीठी गोली' दे देगा।
नतीजा जो भी हो, फिलहाल चुनावों के बीच घुंघुरू सेठ चर्चा में हैं और उनका शुगर लेवल राष्ट्रीय स्तर की बहस का मुद्दा बना हुआ है। हालांकि आश्चर्य इस बात पर जरूर हो रहा है कि घुंघुरू सेठ को घर से आम, मिठाई तथा पूरी जैसे पकवान भेजने वाली सेठानी ने अचानक चुप्पी साध ली है। डाइट चार्ट को ताक पर रखकर 'तर माल' भेजने वाली सेठानी की चुप्पी आने वाले तूफान का संकेत दे रही है क्योंकि कहते हैं "राजनीति" में कोई किसी का स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता। कुल मिलाकर मामला कुर्सी का है और कुर्सी जो न करवा दे, वो थोड़ा है।
कुर्सी यदि बच्चों के सिर की कसम तुड़वा सकती है। 'अनीति' से 'शराब नीति' बनवा सकती है। 'विश्वास' के साथ धोखा कर सकती है और सत्य के प्रतीक 'सत्येन्द्र' को झूठ के पुलिंदे में तब्दील करा सकती है, तो सेठानी से भी सब-कुछ करा सकती है। कुर्सी पर बैठने की रिहर्सल तो सेठानी कर ही चुकी हैं। बस उसे अमलीजामा पहनाना बाकी है।
दरअसल, सेठानी भी जानती हैं कि घुंघुरू सेठ चाहे जितने पैर पीट लें... वो लंबे नप चुके हैं। उनका शुगर लेवल हाई रहे या लो, लेकिन उनका अपना लेवल अब शायद ही उठ सके।
भरोसा न हो इस बात पर तो एक नजर यूपी के उन मियां साहब की हालत पर डाल लें जिनके नाम का अर्थ ही उर्दू में "महान और पराक्रमी" होता है और कभी सत्ता के गलियारों में उनकी एक आवाज से बड़े-बड़े शूरमाओं का पायजामा ढीला हो जाया करता था लेकिल आज बेचारे वैसे ही सींखचों के पीछे पाए जाते हैं जैसे कि घुंघुरू सेठ बैरक नंबर दो में पाए जाते हैं।
वैसे घुंघुरू सेठ के नाम का अर्थ ही "कमल" होता है। इस नजरिये ये देखें तो घुंघुरू सेठ खुद से लड़ रहे हैं। और खुद से लड़कर कोई जीता है क्या।बेहतर होगा कि वह अपने अब तक किए पापों का प्रायश्चित पूरी ईमानदारी से कर लें और सेठानी को चुपचाप कुर्सी सौंपकर तिहाड़ में उनके भी आने का मार्ग प्रशस्त करें। ईश्वर उनकी मदद जरूर करेंगे क्योंकि संभवत: ईश्वर के पास भी उनके इलाज का मात्र यही एक उपाय शेष है। आखिर अर्धांगिनी जो हैं। पाप-पुण्य में बराबर की भागीदार तो होंगी ही।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शनिवार, 13 अप्रैल 2024
बड़े सवाल: क्या पैसे देकर BSP का टिकट लाए हैं सुरेश चौधरी, और क्या वह BJP के डमी उम्मीदवार हैं?
महाभारत नायक भगवान श्रीकृष्ण की पावन जन्मस्थली से बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने चौधरी सुरेश सिंह को चुनाव मैदान में उतारा है। सुरेश सिंह यूं तो एक उच्च शिक्षित पूर्व सरकारी अधिकारी हैं किंतु चुनावी दृष्टिकोण से उनकी विशेषता उनका उस जाट समुदाय से होना है जिसके मतदाताओं की मथुरा लोकसभा क्षेत्र में संख्या सर्वाधिक है। बसपा उम्मीदवार का पूरा परिचय
विधानसभा क्षेत्र गोवर्धन के नगला अक्खा निवासी लगभग 62 वर्षीय सुरेश सिंह भारत सरकार के राजस्व विभाग सहित कई अन्य दूसरे विभागों में अपनी सेवाएं दे चुके हैं और फिलहाल लंबे समय से एक आवासीय शिक्षण संस्था का संचालन कर रहे हैं।
इसके अलावा वह विश्व हिंदू परिषद और अंतर्राष्ट्रीय हिंदू परिषद के पदाधिकारी रहे हैं तथा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) से भी उनका गहरा नाता है।
क्या पैसा देकर BSP का टिकट लाए हैं सुरेश चौधरी?
सुरेश चौधरी ने बीएसपी से अपनी उम्मीदवारी का टिकट क्या पैसा देकर लिया है, यह सवाल अब इस धर्म नगरी में इसलिए खड़ा हो रहा है क्यों कि बसपा के ही एक अन्य नेता और पत्रकार कमलकांत उपमन्यु ने पार्टी पर इस तरह के गंभीर आरोप लगाए हैं।
दरअसल, कमलकांत उपमन्यु वो पहले व्यक्ति हैं जिनका नाम बसपा ने अपनी दूसरी लिस्ट में मथुरा से लोकसभा उम्मीदवार के तौर पर घोषित किया। उससे पहले बसपा के राष्ट्रीय महासचिव मुनकाद अली सहित कई अन्य प्रदेश स्तरीय पदाधिकारियों की मौजूदगी में बाकायदा कार्यकर्ता सम्मेलन बुलाकर मीडिया के सामने कमलकांत उपमन्यु को मथुरा से चुनाव लड़ाने का ऐलान किया गया, और यह खबर प्रकाशित तथा प्रसारित भी हुई।
चूंकि कमलकांत उपमन्यु इससे पहले 1999 में मथुरा से बसपा की ही टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ चुके थे और तीसरे नंबर पर रहकर अच्छे मत प्राप्त किए थे इसलिए इस बार उनकी उम्मीदवारी ने किसी को आश्चर्य में नहीं डाला। लोगों को आश्चर्य तब हुआ जब उन्हें पता लगा कि बसपा ने उपमन्यु का टिकट काटकर चौधरी सुरेश सिंह को टिकट दे दिया है।
अब क्या कह रहे हैं कमलकांत उपमन्यु
चुनाव लड़ने की पूरी तैयारी कर चुके कमलकांत उपमन्यु को अपना टिकट कटने से झटका लगना तो स्वाभाविक था ही किंतु उन्होंने यह बताकर मथुरा की जनता को भी सोचने पर मजबूर कर दिया कि पार्टी ने उनका टिकट मुंह मांगी रकम न दे पाने के कारण काटा है।
कमलकांत उपमन्यु का आरोप है कि चौधरी सुरेश सिंह ने पार्टी को उनसे कहीं अधिक पैसा देकर लोकसभा की उम्मीदवारी का टिकट खरीदा है। उपमन्यु ने दावा किया कि सुरेश सिंह को टिकट देने के बाद भी उनके ऊपर यह कहते हुए दबाव बनाया गया कि यदि वह पार्टी को अब भी पैसा दे देते हैं तो चुनाव उन्हें ही लड़वाया जाएगा।
उपमन्यु ने कैमरे के सामने कहा कि एक करोड़ से शुरू की गई पार्टी की डिमांड 70 लाख तक आ गई, किंतु मैं इसके लिए तैयार नहीं हुआ।
चौधरी सुरेश सिंह का क्या कहना है?
उधर कमलकांत उपमन्यु के आरोपों पर चौधरी सुरेश सिंह का पक्ष जानने के लिए काफी प्रयास किए गए किंतु उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया। सुरेश सिंह ने मोबाइल पर सिर्फ इतना मैसेज भेज दिया कि ''मुझे इस बारे में कोई जानकारी नहीं है। मैंने कोई पैसा नहीं दिया।''
क्या BJP के डमी उम्मीदवार हैं BSP उम्मीवार चौधरी सुरेश सिंह?
चौघरी सुरेश सिंह पर एक आरोप यह भी लग रहा है कि वह BJP के डमी उम्मीदवार की हैसियत से चुनाव लड़ रहे हैं। इस तरह का आरोप लगाने वाले लोग सुरेश सिंह की विश्व हिंदू परिषद (VHP), अंतर्राष्ट्रीय हिंदू परिषद तथा राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (RSS) से जुड़ी पृष्ठभूमि को अपने तर्क का आधार बनाते हैं जिसे पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता।
कांग्रेस के टिकट पर बॉक्सर विजेंदर सिंह का नाम आना भी एक कारण
बताया जाता है कि उपमन्यु को बसपा की टिकट पर चुनाव लड़ाने की घोषणा के बाद सुरेश सिंह को सामने लाने का एक बड़ा कारण कांग्रेस के टिकट पर अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त बॉक्सर विजेंदर सिंह का कांग्रेस उम्मीदवारी के लिए नाम चर्चा में आना रहा।
बॉक्सर विजेंदर सिंह भी जाट बिरादरी से ताल्लुक रखते हैं इसलिए कहा जाने लगा कि वो भाजपा के जाट वोट में सेंध लगा सकते हैं। मथुरा से दो बार की सांसद भाजपा उम्मीदवार हेमा मालिनी अभिनेता धर्मेन्द्र की पत्नी होने के कारण खुद को जाट बिरादरी से जोड़ती तो हैं लेकिन मथुरा का मतदाता इससे अधिक प्रभावित नहीं होता। वह मोदी के मैजिक का लाभ उठाकर इस धर्म नगरी में जीत का रिकॉर्ड कायम करती रही हैं, और इस बार भी वही मैजिक उनके काम आने की उम्मीद लगाई जा रही है।
यही कारण है कि बॉक्सर विजेंदर सिंह का नाम कांग्रेस से उछलने के साथ ही भाजपा में भी हलचल दिखाई दी लिहाजा भाजपा की पूरी लॉबी सक्रिय हो गई।
सूत्रों की मानें तो समय रहते भाजपा की सक्रियता का परिणाम चौधरी सुरेश सिंह के रूप में निकल कर आया ताकि यदि बॉक्सर विजेंदर सिंह कांग्रेस की टिकट पर ताल ठोकने उतर भी जाएं तो जाट वोट बंट जाए और इसका सीधा लाभ हेमा मालिनी को मिले। हालांकि सुरेश सिंह का नाम घोषित होने के बाद बॉक्सर विजेंदर सिंह ने कांग्रेस का ही 'हाथ' झटक दिया और वह भाजपा में शामिल हो गए। ऐसे में कांग्रेस को नामांकन के अंतिम दिन एक ऐसे कार्यकर्ता मुकेश धनकर को मथुरा से उम्मीदवार घोषित करना पड़ा जिसे कांग्रेस शायद सामान्य परिस्थितियों में कोई चुनाव नहीं लड़वाती।
क्या बसपा का कैडर वोट भी सुरेश चौधरी की उम्मीदवारी से नाराज है?
अब जबकि सुरेश चौधरी द्वारा बसपा उम्मीदवार के तौर पर नामांकन दाखिल किया जा चुका है तो पता लग रहा है कि बसपा का कैडर वोट भी पार्टी के इस परिवर्तन से नाराज है। वोटर का कहना है कि सुरेश चौधरी का झुकाव हमेशा से भाजपा की ओर रहा है और अब भी वह भाजपा को ही लाभ पहुंचाने के लिए चुनाव मैदान में उतरे हैं।
गौरतलब है कि कभी बसपा को भर-भरकर वोट देने वाला अल्पसंख्यक समुदाय बसपा से छिटक चुका है। इंडी गठबंधन का हिस्सा होने के कारण मथुरा की लोकसभा सीट कांग्रेस के हिस्से में आई है जिस पर कांग्रेस का 'मजबूर' प्रत्याशी मैदान में है। गठबंधन के चलते सपा का कुछ वोट यदि कांग्रेस प्रत्याशी को मिल भी जाए तो वह सिर्फ वोटों की गिनती ही बढ़ा सकेगा क्योंकि सपा का अपना जनाधार मथुरा में कभी नहीं रहा।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि एक ओर जहां कोई उल्लेखनीय काम न कर पाने के बाद भी हेमा मालिनी की किस्मत का सितारा बुलंदी पर है वहीं दूसरी ओर बसपा अपने आरोप-प्रत्यारोप से ही निजात नहीं पा रही।
बाकी कसर उसके उम्मीदवार सुरेश चौधरी सहित पूरी पार्टी की चुप्पी पूरी कर दे रही है, जो अपनी ही पार्टी पर लग रहे आरोपों का माकूल जवाब तक देने को तैयार नहीं है। वह और उनके मुनकाद अली जैसे बाकी बड़े नेता सिर्फ आरोपों से पल्ला झाड़ते नजर आ रहे हैं जबकि कमलकांत उपमन्यु पार्टी पर खुलकर गंभीर आरोप लगा रहे हैं।
चौधरी सुरेश सिंह को शायद अभी इस बात का इल्म नहीं कि चुनावों के दौर में इस तरह के आरोप किसी के पूरे राजनीतिक करियर को प्रभावित करते हैं। ये बात और है कि बसपा ऐसे आरोपों की आदी है।
चौधरी सुरेश सिंह अपनी 'एक लाइना' सफाई से आरोपों का जवाब देने की कोशिश जरूर कर रहे हैं लेकिन बसपा पर टिकट बेचने के आरोप पहली बार नहीं लग रहे। चुनाव किसी स्तर का हो, कहते हैं कि बसपा बिना अपनी मांग पूरी कराए किसी को टिकट नहीं देती।
और जहां तक सवाल सुरेश चौधरी को BJP के डमी उम्मीदवार की हैसियत से चुनाव लड़ाने के आरोप का है, तो इस आरोप में उनकी अपनी पृष्ठभूमि ही सहायक साबित हो ही रही है, साथ ही बसपा सुप्रीमो पर भी पहले से ये आरोप चस्पा हैं कि वह ईडी तथा सीबीआई के भय से अब हर चुनाव में वही निर्णय लेती हैं जो कहीं न कहीं बीजेपी को लाभ पहुंचाता प्रतीत होता है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
फिर एक बार सामने आई कुशल राजनीतिज्ञ श्रीकृष्ण के जन्मस्थान की राजनीतिक दरिद्रता
माना कि आगामी लोकसभा चुनाव पूरी तरह 'मोदी की गारंटी' पर लड़ा जाएगा और मैदान में मुखौटा चाहे कोई हो, पर पीएम मोदी ही हर उम्मीदवार का चेहरा होंगे। बावजूद इसके कुशल राजनीतिज्ञ भगवान श्रीकृष्ण के जन्मस्थान से हेमा मालिनी को तीसरी बार टिकट मिलना यहां की राजनीतिक दरिद्रता को पूरी तरह उजागर करता है।
दरअसल, नटवर नागर कृष्ण को अपना इष्ट बताने वाली सिने अभिनेत्री हेमा मालिनी ने उनके जन्मस्थान का लोकसभा में प्रतिनिधत्व करते हुए पिछले 10 वर्षों में ऐसा कोई उल्लेखनीय काम यहां नहीं किया जिससे उनकी तीसरी बार चुनाव लड़ने की दावेदारी पुख्ता होती, किंतु दुर्भाग्य से नेताओं का इस धर्म नगरी में इतना अधिक अकाल है कि भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को कोई अन्य दिखाई ही नहीं दिया होगा।
इस बात का थोड़ा अंदाजा तीन बार के सांसद रहे चौधरी तेजवीर सिंह को पार्टी द्वारा राज्यसभा भेजने से भी लगाया जा सकता है, अन्यथा तेजवीर सिंह तो भरी जवानी में कभी उतने सक्रिय नजर नहीं आए जितना भाजपा के किसी सांसद को होना चाहिए था। तेजवीर सिंह का कार्यकाल जिन्होंने देखा है, वह भलीभांति जानते होंगे कि चौधरी साहब किस मिट्टी के बने हैं।
बहरहाल, इस विश्व विख्यात धार्मिक नगरी की ऐसी राजनीतिक दरिद्रता का एकमात्र कारण यही है कि यहां ऐसा कोई दमदार नेता है ही नहीं, जिसे लेकर पार्टी या जनता आश्वस्त हो सके।
किसी बाहरी उम्मीदवार को तीसरी बार मथुरा से मौका मिलने पर भाजपा का एक बड़ा वर्ग निश्चित रूप से निराश होगा किंतु गौर करेंगे तो ये वर्ग काफी हद तक अपनी इस दशा या कहें कि दुर्दशा के लिए खुद भी जिम्मेदार है।
RLD का NDA में आना भी एक बड़ा कारण
इसमें कोई दो राय नहीं कि हेमा मालिनी को तीसरी बार मथुरा से चुनाव लड़ाने का साहस भाजपा शायद इसलिए भी कर सकी क्योंकि वह RLD को NDA का हिस्सा बनाने में सफल रही। यदि जयंत चौधरी NDA गठबंधन का हिस्सा न होते तो भाजपा को जरूर विचार करना पड़ता, लेकिन अब तो ऐसा लगता है कि जैसे हेमा मालिनी की किस्मत में ही एक तरह से 'निर्विरोध राजयोग' लिखा है।
दूसरे दलों से भी कोई चुनौती नहीं
हेमा मालिनी की किस्मत का सितारा किस कदर बुलंद है इसे यूं भी समझा जा सकता है कि उनकी अपनी पार्टी भाजपा के साथ-साथ विपक्षी दल में भी ऐसा कोई नेता नहीं है जो उन्हें टक्कर देने का माद्दा रखता हो।
अगर बात करें सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की तो उसका अब यहां कोई धनी-धोरी ही नहीं रहा। कहने को वह एक राष्ट्रीय दल है, लेकिन मथुरा के पिछले चुनाव नतीजे बताते हैं कि अब वह यहां से चुनाव लड़ने की सिर्फ लकीर पीटती है।
'इंडी' अलायंस के तहत समाजवादी पार्टी से सीटों के बंटवारे में यूं तो मथुरा की सीट कांग्रेस को मिली है परंतु यहां वोट बैंक के नाम पर समाजवादी का सूखा जग जाहिर है। कौन नहीं जानता कि समाजवादी पार्टी के तत्कालीन मुखिया मुलायम सिंह यादव अपने उस दौर तक में यदुवंशी कृष्ण की नगरी से कभी किसी एक उम्मीदवार को विधानसभा चुनाव नहीं जिता सके, जिस दौर में उनकी प्रदेशभर के अंदर तूती बोलती थी।
वर्तमान सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने भी मथुरा की मांट सीट से अपने मित्र और पार्टी के कद्दावर नेता संजय लाठर को दो बार चुनाव मैदान में उतारा किंतु उसे जीत नहीं दिला सके। अखिलेश के हाथ में कमान आज भी है परंतु मथुरा से सपा का सूखा खत्म नहीं हुआ। शायद इसलिए भी उन्होंने सीटों के बंटवारे में मथुरा की सीट कांग्रेस के मत्थे मढ़ने में अपनी भलाई समझी।
शेष रह गई बहिनजी की बहुजन समाज पार्टी, तो उसका ग्राफ जब से नीचे आया है तब से ऊपर आने का नाम नहीं ले रहा। हालांकि पहले भी कभी बसपा का मथुरा से कोई सांसद तो नहीं रहा लेकिन विधायक कई रहे हैं। ये बात अलग है कि आज उसके पास मथुरा में न कोई विधायक है और न चुनाव में टक्कर देने लायक कोई नेता।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि हेमा मालिनी के लिए 2024 का लोकसभा चुनाव जितना आसान बन गया है, उतने आसान तो उनके लिए पहले दो चुनाव भी नहीं रहे। सतही तौर पर देखें तो किसी दल या नेता के लिए इससे बेहतर स्थिति कोई और नहीं हो सकती परंतु यही स्थिति न केवल भाजपा के लिए बल्कि मथुरा की जनता के लिए भी चिंता का विषय अवश्य कही जा सकती है।
मथुरा का धार्मिक और राजनीतिक दृष्टि से एक विशिष्ट स्थान है। यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने से लेकर कृष्ण जन्मस्थान के लिए लड़ी जा रही लड़ाई तक में यहां के जनप्रतिधियों की भूमिका रेखांकित होती है, लेकिन हेमा मालिनी उसमें अब तक फिट नहीं बैठीं। इन प्रमुख मुद्दों के अलावा यह धार्मिक नगरी अपनी गरिमा के अनुरूप विकास का लंबे समय से इंतजार कर रही है। ऐसे में यहां के लोगों को पार्ट टाइम नहीं, फुल टाइम राजनेताओं की दरकार है। हेमा मालिनी ने पिछले दस वर्षों में यहां कितना विकास कराया है और कितना समय यहां की जनता को दिया है, इसका जिक्र करने की संभवत: अब जरूरत भी नहीं रह गई। जाहिर है तीसरा कार्यकाल कुछ अलग होने की कोई उम्मीद लगाना व्यर्थ होगा।
अंत में यह कह सकते हैं कि नेताओं के लिए राजनीति, कर्म से कहीं अधिक भाग्य का ऐसा खेल है कि वो जब जोर मारता है तो सारे पांसे खुद-ब-खुद फिट बैठ जाते हैं। हेमा मालिनी के पांसे कुछ यही इशारा कर रहे हैं।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
बुधवार, 6 सितंबर 2023
... उन सभी छद्म धर्मनिरपेक्ष सनातियों को समर्पित, जो स्टालिन जैसों की ऊर्जा के स्त्रोत हैं
सनातन पर स्टालिन का बयान उन सभी छद्म धर्मनिरपेक्ष सनातनियों को समर्पित है, जो स्टालिन जैसों की ऊर्जा के स्त्रोत हैं और जिनके कारण समय-समय पर अनेक "विधर्मी", सनातन धर्मावलंबियों को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने का दुस्साहस कर पाते हैं।
'सनातन' का शाब्दिक अर्थ है- 'शाश्वत' अर्थात 'सदा बना रहने वाला', यानी जिसका न आदि है और न अन्त। सनातन धर्म को हिन्दू धर्म अथवा वैदिक धर्म के नाम से भी जाना जाता है और इसे दुनिया के सबसे प्राचीनतम धर्म होने का गौरव प्राप्त है।
ऐसे में सवाल यही खड़ा होता है कि एक कन्वर्टेड ईसाई, भरी सभा में सनातन धर्म को समाप्त करने की घोषणा कर कैसे सकता है?
वो इसलिए कि प्रथम तो विधर्मियों ने सनातन धर्मावलंबियों की सहिष्णुता को 'कायरता' समझ रखा है। दूसरे जिस प्रकार वृक्ष को काटने में कुल्हाड़ी की मदद लकड़ी ही करती है, उसी प्रकार सदियों से कथित धर्मनिरपेक्ष लोग सनातन को समझे बिना उसको नष्ट-भ्रष्ट करने का ताना-बाना बुनते रहते हैं।
सच तो यह है कि धर्मनिरपेक्ष जैसा कोई शब्द होता ही नहीं, जो होता है वो धर्मसापेक्ष होता है। संभवत: इसीलिए संविधान में भी धर्मनिरपेक्षता को परिभाषित नहीं किया गया है।
धर्मनिरपेक्षता की प्रचलित परिभाषा को यदि मान भी लिया जाए तो किसी दूसरे धर्म को समाप्त करने का आह्वान करने वाला व्यक्ति विशेष या राजनीतिक दल कैसे धर्मनिरपेक्ष हो सकता है। जाहिर है कि यह धर्मनिरपेक्षता की आड़ में कुर्सी के लिए खेला जाने वाला राजनीतिक खेल ही है।
बेशक हर राजनीतिक खेल हमेशा से ही सत्ता हथियाने का जरिया बना हुआ है और इसीलिए राजनीतिक बयानबाजी के निहितार्थ भी निकाले जाते रहे हैं, किंतु इसका मतलब यह कतई नहीं कि नेतागण मुंह को गटर की तरह इस्तेमाल करने लग जाएं।
राजनीति में प्रतिस्पर्धा होना सामान्य सी बात है और प्रतिस्पर्धा के चलते आरोप-प्रत्यारोप भी चलते हैं, परंतु किसी दूसरे धर्म को नेस्तनाबूद करने की मानसिकता यह बताती है कि वह व्यक्ति समाज में रहने लायक नहीं रहा। उसकी मन: स्थिति यह साबित करती है कि वह खुले में घूमने का अधिकार खो चुका है।
ये बात अलग है कि सैकड़ों साल से दिमागी दिवालियापन के शिकार ऐसे लोग समाज में न सिर्फ रहते आए हैं बल्कि धर्म और समाज दोनों को कलंकित भी करते रहे हैं।
देश पर आक्रांतांओं के आक्रमण का काल हो या गुलामी का कालखंड, हर दौर में ऐसे तत्वों की विशेष भूमिका रही है जिनके लिए 'राष्ट्रद्रोही' शब्द भी छोटा मालूम पड़ता है।
स्टालिन का दुस्साहस ऐसे ही तत्वों की करतूत है जो हर हाल में देश को पतन के रास्ते पर ले जाने की मंशा पाले बैठे हैं। इनमें नेता भी हैं, और अभिनेता भी। नौकरशाह भी हैं और जनसामान्य भी। किसी खास राजनीतिक दल की डोर से बंधे चाटुकार भी हैं और पत्रकार भी।
इनके अलावा एक वर्ग वो भी है जो खुद को सत्ता का स्वाभाविक दावेदार मानता है और जिसकी जहरभरी जुबान के लिए स्क्रिप्ट कहीं और से लिखी जाती है क्योंकि इस वर्ग के लोग अपना मानसिक संतुलन खो चुके हैं।
तय है कि ऐसे लोगों में सुधार की कोई गुंजाइश तलाशना आत्मघाती हो सकता है इसलिए समय रहते उपचार जरूरी है।
चंद रोज पहले देश की सर्वोच्च अदालत ने 'हेट स्पीच' को लेकर काफी कड़ी प्रतिक्रिया दी थी। शायद अब वो समय आ गया है कि देश के 80 करोड़ से अधिक लोगों की भावनाओं को आहत करने वाला बयान देकर स्टालिन ने हेट स्पीच के लिए जो मानदंड स्थापित किए हैं, उन्हें यदि अब नहीं रोका गया तो उसके दुष्परिणाम विधायिका एवं कार्यपालिका के साथ-साथ न्यायपालिका को भी भुगतने होंगे।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी




