सोमवार, 9 सितंबर 2013

दंगे तो होंगे ही.. कोई रोक भी नहीं सकता

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
केंद्र सरकार की ताजा रिपोर्ट के अनुसार अखिलेश राज में अब तक सांप्रदायिक दंगों की 104 घटनाएं हो चुकी हैं। मुज़फ्फरनगर के दंगे में आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक 26 लोग मारे जा चुके हैं जबकि प्रत्‍यक्षदर्शी बताते हैं कि यह संख्‍या सैकड़ों में है।
राज्‍यपाल बी. एल. जोशी ने मुज़फ्फरनगर के दंगों को लेकर केंद्र सरकार को जो रिपोर्ट भेजी है, वह कहती है कि इन दंगों के लिए पूरी तरह राज्‍य सरकार जिम्‍मेदार है।
जो भी हो, लेकिन यहां विचारणीय प्रश्‍न यह है कि एक ऐसे दौर में जब आम आदमी के लिए अपनी जरूरतें पूरी करना भी कठिन होता जा रहा है, तब लोग एक-दूसरे का खून बहाने पर इतनी जल्‍दी आमादा क्‍यों रहे हैं ?
यहां यह बताने की कोई जरूरत नहीं रह जाती कि हर दंगे का शिकार आम आदमी ही होता है, खास लोग कभी किसी दंगे की चपेट में नहीं आते और देश के वर्तमान लोकतंत्र की परिभाषा भी शायद यही है।

शनिवार, 7 सितंबर 2013

84 Year old Young man

कई राज्‍यों में विधानसभा चुनाव और उसके बाद 2014 के लोकसभा चुनावों को देखते हुए वोटों के सौदागर चाहे जो कहें लेकिन सच्‍चाई यही है कि तथाकथित धर्मगुरू आसाराम बापू पर लगे यौन शोषण के गंभीर आरोपों ने आम आदमी के मन में ऐसे धर्मगुरुओं को लेकर गहरा प्रश्‍नचिन्‍ह अंकित कर दिया है।
इस वीडियो में जिस शख्‍स को आप हाथी जैसी चाल चलते देख रहे हैं, वह स्‍वयंभू पांचवें जगद्गुरू कृपालु महाराज हैं और खुद इनके भक्‍तों की मानें तो इनकी उम्र फिलहाल 84 साल है।
गौरतलब है कि 60-62 साल की उम्र में जब सामान्‍यत: लोग रिटायर्ड हो जाते हैं और धर्म के अनुसार भी इस समय वानप्रस्‍थ आश्रम ग्रहण कर लिया जाता है, तब इस देश के नेता और ऐसे तथाकथित धार्मिक गुरू पहले से कहीं अधिक सक्रिय दिखाई देते हैं।
अपने दोनों ओर हाथ बांधे कतारबद्ध खड़े स्‍त्री-पुरुषों के बीच चल रहे कृपालु महाराज के धार्मिक धंधे का टर्नओवर करोड़ों नहीं, अरबों का है और इस धंधे के उत्‍तराधिकारी उनकी अपनी संतानें हैं।
द इंटरनेशनल सोसायटी ऑफ डिवाइन लव तथा द यूनिवर्सल सोसायटी ऑफ स्‍प्रेचुअल लव नामक संस्‍थाओं के माध्‍यम से अपने धार्मिक कारोबार को संचालित करने वाले कृपालु महाराज भी यौन शोषण के आरोपों में कई बार देश-विदेश की जेलों के मेहमान रहे हैं।
बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि कृपालु महाराज को सर्वप्रथम यौन शोषण के आरोप में गिरफ्तार कराने का श्रेय उन्‍हीं डॉ. नरेन्‍द्र दाभोलकर को जाता है जिनकी पिछले दिनों हत्‍या कर दी गई। दाभोलकर द्वारा स्‍थापित संस्‍था 'अंध श्रृद्धा निर्मूलन समिति' ने ही नागपुर की दो लड़कियों के साथ कृपालु द्वारा दुष्‍कृत्‍य किये जाने का मामला उठाया था।
वीडियो में कृपालु महाराज का गुणगान करने वाली आवाज़ से लेकर उनके सामने जमीन पर बैठकर कृपा प्राप्‍त करने वाला व्‍यक्‍ति कोई और नहीं, इनके पेशेवर तौर-तरीकों का माध्‍यम है ताकि तमाम दूसरे लोगों को प्रभावित व आकर्षित किया जा सके।
सुंदर महिलाओं के जिस समूह को आप इस वीडियो में कृपालु महाराज की आरती उतारते देख रहे हैं, यह दरअसल इनकी वो एग्‍जीक्‍यूटिव्‍स हैं जो इनके लिए धनी-मानी मुर्गे फंसाती हैं और उसके एवज में पहले से तय अपना हैंडसम कमीशन तथा सुख-सुविधाएं हासिल करती हैं। यही महिलाएं महाराज जी की दैहिक एवं भौतिक तापों का निवारण उनकी इच्‍छानुसार करने का इंतजाम भी करती हैं।
चूंकि कृपालु महाराज की कृपापात्र बनने के लिए उनकी अपनी कुछ शर्तें है, और यह उन शर्तों को पूरा करने के बाद ही इस मुकाम तक पहुंचती हैं लिहाजा महाराजजी की जरूरतों को यह उनके एक इशारे से समझ जाती हैं।
बच्‍चों को लेकर वात्‍सल्‍य का भाव प्रदर्शित करने वाले कृपालु की वास्‍तविक सोच का अंदाज आप इस वीडियो के उस हिस्‍से से लगा सकते हैं, जहां कृपालु महाराज खुद तो कीमती स्‍पोर्ट शू में चल रहे हैं और उनके कृपापात्र बच्‍चे नंगे पैर हैं।
बीमारों की सेवा-सुश्रूषा का नाटक करते दिखाई देने वाले कृपालु महाराज ने मनगढ़ स्‍थित अपने आश्रम का भारी-भरकम गेट गिर जाने के कारण हुई दर्जनों मौतों पर बमुश्‍किल इतना भर कहा था कि ये तो ईश्‍वर की मर्जी थी। इसमें मैं क्‍या कर सकता हूं।
कड़वा सच तो यह है कि कदम-कदम पर धर्म का सौदा करने वाले कृपालु महाराज और इनके जैसे तमाम तथाकथित धर्मगुरू न केवल देश के आर्थिक अपराधी हैं बल्‍कि सामाजिक अपराधी भी हैं।
देश भारी आर्थिक संकट के दौर से गुजर रहा है और देशवासी सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती जा रही महंगाई से त्रस्‍त हैं लेकिन एक ओर धर्म के सौदागर ऐसे तथाकथित धर्मगुरू तथा दूसरी ओर इनके संरक्षणदाता वोटों के सौदागरों पर किसी प्रकार का कोई दुष्‍प्रभाव नहीं पड़ रहा क्‍योंकि इनकी आमदनी निष्‍प्रभावी है।
ऐसे में क्‍या यह सवाल पैदा नहीं होता कि आखिर इनकी आमदनी के वो कौन से स्‍त्रोत हैं, जो कभी नहीं सूखते। जिन पर कभी मंदी की मार नहीं पड़ती और जिनके खजाने का कभी कोई आंकलन नहीं कराया जाता जबकि इनकी शारीरिक, मानसिक तथा तथाकथित बौद्धिक ऊर्जा का राज यही अकूत संपदा है।

शुक्रवार, 6 सितंबर 2013

क्‍या कुछ बदल पाई LoC के कांटों की बाड़?

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
अभी-अभी एक रिपोर्ट पढ़ी। इस रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान की वित्तीय राजधानी कराची में आपराधिक समूह रोजाना 83 करोड़ रुपये का काला कारोबार करते हैं। रिपोर्ट कहती है कि अवैध वसूली, लूट, अपहरण, सड़कों पर होने वाले अपराध और अवैध पार्किंग तथा अवैध बिजली कनेक्शन देने जैसे कई काम हैं जो इस शहर की अवैध अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान कर रहे हैं।

शहर के विभिन्न हिस्सों में हर रोज करीब एक करोड़ रुपये की वसूली होती है जबकि पांच करोड़ रुपये का अपहरण उद्योग है। शहर में अवैध पार्किंग के जरिये 24 लाख रुपये की उगाही होती है। इसके अलावा रेहड़ी, पटरी और फेरी वाले रोजाना 82 लाख रुपये पुलिस, अपराधियों और ठेकेदारों को देते हैं।
शहर में विभिन्न स्थानों पर 55,000 से अधिक फेरीवाले, खोमचे, स्टॉल आदि लगते हैं। पानी माफिया भी यहां सक्रिय है। यह यहां प्रतिदिन 27 करोड़ 20 लाख गैलन पानी अवैध तरीके से बेचते हैं। इससे 10 करोड़ रुपये की कमाई होती है।
शहर में 15,000 नशीले पदार्थ बेचने वाले और जुआघर हैं, इनमें 15 करोड़ रुपये प्रतिदिन का कारोबार होता है। कराची में भूमाफिया ने 30 हजार एकड़ सरकारी जमीन पर कब्जा किया हुआ है जिससे हर साल सरकार को 7 अरब रुपये का नुकसान हो रहा है।
शहर में वाहनों की चोरी शीर्ष पर है। मोबाइल फोन, नकदी, आभूषण और दूसरे कीमती सामान की रोजाना 52 लाख रुपये की लूट की जाती है। पुलिस को यहां रोजाना 21 करोड़ रुपये की रिश्वत मिलती है।
अब ज़रा गौर फरमाइए आज मथुरा के अखबारों की उन खबरों पर जो व्‍यापारी नेता मुरारी अग्रवाल के हवाले से छापी गई हैं।
युवा व्‍यापारी नेता मुरारी अग्रवाल ने सवाल उठाया है कि पुलिस के एक सिपाही से लेकर तमाम बड़े पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारी आखिर मथुरा में ही तैनाती क्‍यों चाहते हैं।
व्‍यापारी नेता के अनुसार इसकी बड़ी वजह स्‍थानीय नेताओं की निष्‍क्रियता के चलते सही कार्यों के लिए भी अधिकारी एवं कर्मचारियों को आसान रिश्‍वत मिल जाना और गलत कार्यों के लिए भारी रिश्‍वत मिलने से उपजी छवि है।
हो सकता है कि किसी स्‍तर पर मुरारी अग्रवाल का यह प्रश्‍न राजनीतिक हो, लेकिन  इसकी सच्‍चाई में कोई शक नहीं है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि पाकिस्‍तान की वित्‍तीय राजधानी कराची से मथुरा की तुलना नहीं की जा सकती। कराची की तुलना भारत की वित्‍तीय राजधानी मुंबई से करना ज्‍यादा मुनासिब होगा परंतु यहां हम हांडी के पूरे चावल न देखकर एक दाने से आंकलन का सर्वमान्‍य तरीका आजमा रहे हैं।
अब सवाल यह पैदा होता है कि क्‍या भारत की वर्तमान स्‍थितियों और पाकिस्‍तान के हालातों में कोई अंतर है?
जो पढ़ा और सुना गया, उसके अनुसार तो कोई फर्क नहीं है।
भारत में भी आम आदमी उतना ही परेशान है जितना संभवत: पाकिस्‍तान में। भारत के नेताओं की मानसिकता और पाकिस्‍तानी नेताओं की मानसिकता अपनी जनता के बावत कोई बहुत अलग नजर नहीं आती। रिश्‍वत और अधिकारों के दुरुपयोग को लेकर दोनों देशों के सरकारी अधिकारी एवं कर्मचारी भी एक जैसी सोच रखते दिखाई देते हैं।
अवैध वसूली, लूट, अपहरण, सड़कों पर होने वाले अपराध और अवैध पार्किंग तथा अवैध बिजली कनेक्शन, रेहड़ी, पटरी और फेरी वालों से उगाही, पानी माफिया, ड्रग्‍स माफिया, भूमाफिया का बोलबाला, वाहन चोरी आदि इनमें से कौन सा अपराध है जो भारत के कोने-कोने में नहीं होता।
पता नहीं कि पाकिस्‍तान में शिक्षा माफिया, तेल माफिया और मीडिया माफिया कितने सक्रिय हैं, अलबत्‍ता भारत में इनकी भी कोई कमी नहीं।
धर्म माफिया निश्‍चित तौर पर पाकिस्‍तान में गहरी जड़ें जमाये हुए हैं लेकिन भारत में भी इनकी जड़ें कम गहरी नहीं।
क्षेत्रफल के हिसाब से भारत व पाकिस्‍तान में एक बड़ा अंतर अवश्‍य है परंतु इस अंतर से किसी मुल्‍क के राजनेताओं और अधिकारी एवं कर्मचारियों की सोच में कोई परिवर्तन आता हो, ऐसा कहीं नहीं है।
फिर भारत और पाकिस्‍तान तो सन् 47 से पहले एक ही मुल्‍क हुआ करते थे लिहाजा दोनों मुल्‍कों का डीएनए किसी न किसी स्‍तर पर जाकर जरूर मिलता होगा।
कौन नहीं जानता कि पाकिस्‍तान के राष्‍ट्रपति का जन्‍म भारत के आगरा में हुआ था और तानाशाह परवेज मुशर्रफ दिल्‍ली की नाहरवाली हवेली में पैदा हुए थे।
इसी प्रकार भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पाकिस्‍तान के पंजाब प्रांत की पैदाइश हैं और विपक्षी पार्टी भाजपा के कद्दावर नेता लालकृष्‍ण आडवाणी उसी कराची के सिंध प्रांत में जन्‍मे हैं, जिसके काले कारोबार का जिक्र हमने ऊपर किया है।
ये तो चंद उदाहरण भर हैं, अन्‍यथा एक अन्‍य तानाशाह जनरल जिया उल हक से लेकर पाकिस्‍तान की सत्‍ता में रहे तमाम नेताओं ने भारत की जमीं पर अपनी आंखें खोलीं और अनेक भारतीय राजनेताओं का जन्‍म पाकिस्‍तान में हुआ।
ऐसे में देश बंटने और स्‍वतंत्रता मिलने के बाद पैदा हुई भारत की पीढ़ी का नजरिया कहीं न कहीं अलग तो होना ही था।
यही नजरिया आज सीमा के उस पार लोगों को परेशान किये हुए है और इसी के कारण सीमा के इस ओर लोग बेचैन हैं।
चूंकि दोनों ओर की गवर्नेंस का भी ताल्‍लुक फिरंगियों से विरासत में मिले तौर-तरीकों से है और आज तक वह उन्‍हीं तरीकों को अपनाये हुए हैं लिहाजा मौलिक सोच में कोई फर्क नहीं आ पाया।
यही वजह है कि कराची हो या मुंबई, दिल्‍ली हो या इस्‍लामाबाद सभी जगह हालात एक जैसे मालूम होते हैं।
जहां तक मथुरा के व्‍यापारी नेता मुरारी अग्रवाल के सवालों का तो ऐसे ही सवाल देशभर को परेशान कर रहे हैं।
हर शहर में आम शख्‍़स परेशान हैं, बशर्ते उसका संबंध राजनीति और राजनेता से न हो।
एक और आम चुनाव सामने आ खड़े हुए हैं पर उनके बाद भी कुछ बदलेगा, इसकी उम्‍मीद ना के बराबर है।
मथुरा हो या मुंबई, मनमोहन हों या मोदी, कांग्रेस हो या भाजपा, क्‍या फर्क पड़ता है।
एलओसी पर कांटों की बाड़ लगा देने से जिस प्रकार दो मुल्‍क अलग हो जाते हैं, काश उसी प्रकार नेताओं की सोच भी इस बाड़ से अलग हो गई होती। कम से कम 66 सालों बाद हम तो वहां खड़े न होते जहां पाकिस्‍तान भी खड़ा है।

सोमवार, 2 सितंबर 2013

खुलासा: सेक्‍स करने में पूरी तरह सक्षम है आसाराम

जोधपुर। अपने ही अनुयायी की नाबालिग बेटी से यौन शोषण मामले में अरेस्ट विवादित धर्मगुरु आसाराम बापू कानून से बचने के लिए तमाम तरकीबों का इस्तेमाल कर रहे हैं। उन्होंने रविवार को जांच अधिकारियों से कहा कि वह नपुंसक हैं। ऐसे में इस तरह का अपराध करने में वह समर्थ ही नहीं हैं। 72 वर्षीय आसाराम के इस दावे की पोल तब खुल गई जब 'पोटेंसी टेस्ट' (मर्दानगी जांच) पॉजिटिव निकला। मतलब आसाराम की कामुकता पूरी तरह से ऐक्टिव है।
पुलिस का कहना है कि टेस्ट के पॉजिटिव रिजल्ट से उन्हें इस केस में काफी मजबूत मेडिकल सबूत मिला है। जोधपुर के पुलिस कमिश्नर बिजू जॉर्ज जोसेफ ने बताया कि डॉक्टर्स की एक टीम को राजस्थान के पुलिस हेडक्वॉर्टर में बुलाया गया था। यहीं पर आसाराम का 'पोटेंसी टेस्ट' लिया गया। कमिश्नर का कहना है कि इस 'पोटेंसी टेस्ट' से यह कन्फर्म हो गया हैकि आसाराम 16 साल की उस लड़की के साथ यौन शोषण और रेप जैसा अपराध करने लायक हैं। वहीं दूसरे सीनियर पुलिस ऑफिसर का कहना है कि यह टेस्ट एक नॉर्मल प्रक्रिया का हिस्सा है। किसी भी रेप केस में आरोपी का 'पोटेंसी टेस्ट' इसलिए लिया जाता है ताकि यह साबित हो सके कि वह रेप करने के काबिल है या नहीं।

रविवार, 1 सितंबर 2013

आसाराम बापू बनाम कृपालु आदि...

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
एक बच्‍ची के साथ दुष्‍कर्म के आरोपी आसाराम बापू की गिरफ्तारी से यूं तो मथुरा-वृंदावन का कोई सीधा संबंध नहीं हैं लेकिन जो संबंध है, वो बहुत महत्‍वपूर्ण है और उसके बिना आसाराम की कहानी न तो शुरू की जा सकती है, न उसके क्‍लाईमेक्‍स का कोई मतलब रह जाता है क्‍योंकि मथुरा-वृंदावन भी धर्मनगरी हैं लिहाजा यहां साधु-संत  एवं महंतों का अच्‍छा-खासा आधिपत्‍य है।
आगे बढ़ने से पहले कुछ बातें हैं जिन पर गौर किया जाना बहुत जरूरी है ताकि यह समझा जा सके कि आखिर कैसे कोई 'आसूमल' देखते-देखते आसाराम बापू बन जाता है।
नंबर एक- श्री पंचदशनाम जूना अखाड़े ने तथाकथित महिला संत राधेमां को विगत माह विवादास्‍पद तरीके से दिया गया महामण्‍डलेश्‍वर का पद बहाल कर दिया। इसकी सफाई में अखाड़े की ओर से कहा गया कि उनके ऊपर लगाये गये आरोपों की जांच के दौरान पुष्‍टि न हो पाने पर यह फैसला लिया गया है।
नंबर दो- गायत्री तपोभूमि ट्रस्‍ट में संचारी के पद पर कार्यरत चन्‍द्रपाल सिंह ने 2 करोड़ 43 लाख रुपये का गबन किया है जिसकी तपोभूमि ट्रस्‍ट ने मथुरा के गोविंदनगर थाने में एफआईआर दर्ज कराई है।
गायत्री तपोभूमि ट्रस्‍ट के संस्‍थापक आचार्य श्रीराम शर्मा वैसे तो पड़ोसी जिला आगरा में गांव आंवलखेड़ा के मूल निवासी थे लेकिन उन्‍होंने अपनी कर्मभूमि बनाई मथुरा और यहीं से दौलत व शौहरत की ऊंचाइयां हासिल कीं।
नंबर तीन- जयगुरूदेव नाम परमात्‍मा का, सतयुग आयेगा का ढोल पीटकर नाम और दाम कमाने वाले बाबा जयगुरुदेव की बेशुमार चल-अचल संपत्‍ति पर उनकी मृत्‍यु के बाद विवाद चल रहे हैं और यह विभिन्‍न न्‍यायालयों में लंबित हैं।
नंबर चार- पूर्वी उत्‍तर प्रदेश में जनपद प्रतापगढ़ के कस्‍बा मनगढ़ का मूल निवासी है रामकृपाल त्रिपाठी। आज लोग उसे कृपालु महाराज के नाम से जानते हैं। वह खुद को पांचवां जगद्गुरू शंकराचार्य कहता है। कृपालु महाराज की मथुरा के वृंदावन एवं बरसाना सहित देश-विदेश में अरबों की संपत्‍ति है।
आसाराम बापू और कृपालु महाराज में काफी समानताएं हैं। मसलन आसाराम की तरह ही कृपालु महाराज गृहस्‍थ है और उसका भरा-पूरा परिवार है। आसाराम की तरह ही कृपालु की संतानें उसके धर्म के धंधे की वारिस हैं और कृपालु द्वारा स्‍थापित ट्रस्‍टों पर वही काबिज हैं।

मंगलवार, 27 अगस्त 2013

नए सिरे से परिभाषित हो ''यदा यदा हि धर्मस्‍य.....

(कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी विशेष)
एक और कृष्‍ण जन्‍माष्‍टमी, एक और कृष्‍ण जन्‍मोत्‍सव.... लेकिन सब-कुछ प्रतीकात्‍मक।
बस एक परंपरा है जिसे निभाते चले जा रहे हैं यंत्रचालित ढंग से। पांच हजार से भी सौ-दो सौ साल पहले श्रीकृष्‍ण का जन्‍म हुआ था। कुछ लोग इस बार के जन्‍म को उनका 5125 वां जन्‍मोत्‍सव बता रहे हैं।
जो भी हो।
श्रीमद्भगवतद्वगीता के अध्‍याय 4 में कहा गया है-
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥७॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥८॥
अर्थात्
जब-जब धर्म की हानि होने लगती है और अधर्म आगे बढ़ने लगता है, तब-तब मैं स्वयं की सृष्टि करता हूं, अर्थात् जन्म लेता हूं। सज्जनों की रक्षा एवं दुष्टों के विनाश और धर्म की पुनः स्थापना के लिए मैं विभिन्न युगों (कालों) मैं अवतरित होता हूं।
अब सवाल यह पैदा होता है कि धर्म की हानि और अधर्म के आगे बढ़ने का पैमाना क्‍या है?
धर्म की पुनर्स्‍थापना, सज्‍जनों की रक्षा एवं दुष्‍टों के नाश का उचित समय आखिर कौन सा होता है?
जिन कारणों से कौरव-पाण्‍डवों के बीच महाभारत जैसा भीषण युद्ध हुआ और जिन परिस्‍थितियोंवश श्रीकृष्‍ण भी इस युद्ध को रोक पाने में असफल रहे, उससे तो आज के हालात कहीं बहुत अधिक बदतर हैं।
महाभारत से पूर्व एक द्रोपदी का चीरहरण रोकने कृष्‍ण दौड़े चले आये थे लेकिन अब वही कृष्‍ण देशभर में हो रहे चीरहरणों पर चुप्‍पी साधे क्‍यों बैठे हैं?
पाण्‍डवों को उनके हिस्‍से का राजपाठ तो दूर, सुई की नोक के बराबर जमीन तक देने को राजी न होना महाभारत होने का दूसरा बड़ा कारण बना परंतु क्‍या आज भी यही सब नहीं हो रहा?
घर-घर में बैठे कौरव आज भी पाण्‍डवों का हक मार रहे हैं और उनके खून से होली खेल रहे हैं लेकिन अब कोई कृष्‍ण किसी की मदद करने नहीं आता।
तो क्‍या महाकाव्‍य महाभारत के 'भीष्‍म पर्व' को अब 'मृतप्राय:' और श्रीमद्भागवत को कथावाचकों के लिए 'वैभवपूर्ण एवं विलासितापूर्ण जीवन' का 'माध्‍यमभर' मान लिया जाए।
क्‍या मान लिया जाए कि इन धर्मग्रंथों में जो कुछ लिखा गया, जो कुछ कहा गया और जो संदेश इनके द्वारा दिया गया है, वह सब छलावा है।
यदि नहीं, तो कोई कृष्‍ण आकर धर्म की पुनर्स्‍थापना का शंखनाद क्‍यों नहीं करता?
कैसे कोई कृपालु, कोई आसाराम, कोई प्रकाशानंद जैसा गीदड़ किसी के भरोसे को तोड़कर अपनी हवस मिटाने में कामयाब हो जाता है?
कैसे कोई उपदेशक अपने ही उपदेशों को निजी जिंदगी में तार-तार करता दिखाई देता है और मठ, मंदिर, आश्रम एवं दूसरे धार्मिक स्‍थल पापकर्मों को अंजाम देने के सुविधाजनक अड्डे बने हुए हैं।
हे कृष्‍ण! क्‍या ये जरूरी नहीं कि या तो अब धर्म की हानि एवं अधर्म के बढ़ने की कोई सीमा निर्धारित हो या फिर गीता में दर्ज 'यदा-यदा हि धर्मस्‍य... को नए सिरे से परिभाषित किया जाए।
Rs 3Cr. Term@aaaaa

रविवार, 25 अगस्त 2013

दिल्‍ली हाईकोर्ट की टिप्‍पणी या खतरे की घंटी?

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
दिल्‍ली हाईकोर्ट ने राष्‍ट्रीय राजधानी में 20 अगस्‍त की बारिश के कारण हुए जलभराव को लेकर एमसीडी के अधिकारियों से पूछा-  आपको मालूम है कि हम क्‍या कर सकते हैं ?
जब एक अधिकारी ने कहा कि अदालत का आदेश न मानने पर हमें जेल भेजा जा सकता है तो एक्‍टिंग चीफ जस्‍टिस बी. डी. अहमद और जस्‍टिस विभू बाखरू की बैंच ने इन अधिकारियों से यह भी पूछा- कभी सोचा है कि पब्‍लिक क्‍या कर सकती है  ?
अधिकारियों की चुप्‍पी पर न्‍यायाधीशों ने कहा- कोर्ट के कारण ही आप पब्‍लिक के गुस्‍से से बचे हुए हैं। नहीं तो पब्‍लिक आपका क्‍या हाल करेगी, भगवान ही जाने।
अदालत ने यहां तक कह दिया कि समय रहते नहीं सुधरे तो वह दिन दूर नहीं जब जनता आपको दौड़ा-दोड़ाकर पीटेगी।
अदालतों की भी अपनी एक मर्यादा होती है लिहाजा न्‍यायाधीश उस मर्यादा का सम्‍मान करते हुए टीका-टिप्‍पणी करते हैं।
दिल्‍ली हाईकोर्ट के न्‍यायाधीशों ने जो कुछ कहा, उसे सिर्फ सांकेतिक माना जा सकता है अन्‍यथा उनके इतना कुछ कहने पर मजबूर होने का मतलब बहुत गंभीर है।
कड़वा सच भी यही है कि देश के वर्तमान हालात बेहद निराशाजनक, हताश करने वाले और विस्‍फोटक हो चुके हैं।

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