शुक्रवार, 13 दिसंबर 2013

देश के भविष्‍य पर अट्टहास करती 'कतरनें'

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
बात चूंकि अखबारों से निकली है इसलिए अखबार की कतरनों को ही देश का भविष्‍य रेखांकित करने के लिए चुन रहा हूं।
सबसे पहले उस अखबार के क्‍लासीफाइड विज्ञापन का ज़िक्र जिसकी टैग लाइन है- ''विश्‍व का सर्वाधिक पढ़ा जाने वाला अखबार''

विज्ञापन का शीर्षक है 'मित्र बनाओ', लेकिन मजमून कहता है '' साक्षी मसाज क्‍लब (रजिस्‍टर्ड 2001) हाई प्रोफाइल लड़कियों, मैडम की मसाज करके युवक 25000 रुपये कमाएं (तुरंत सर्विस)। मोबाइल नंबर-080594*****
अब देखिए एक दूसरे अखबार के विज्ञापन को जिसकी टैगलाइन है -''तरक्‍की को चाहिए नया नज़रिया'' ।
अब अखबार के इस नए नज़रिए को देखिए-
इसके तहत 'मनोरंजन' शीर्षक वाले विज्ञापनों में प्रकाशित इस क्‍लासीफाइड का मजमून है- 'मस्‍ती फ्रेंडशिप'.......ऑल इंडिया सर्विस, हाईप्रोफाइल हाउसवाइफ से फुल एंजॉय करके पार्ट/फुल टाइम 18000-25000 रोजाना कमाएं।
इस विज्ञापन के साथ संपर्क करने के आठ मोबाइल नंबर दिए गये हैं।
इसी तरह 'मेडिकल' शीर्षक वाले विज्ञापनों के तहत उत्‍तेजना कैप्‍सूल से लेकर रोमांटिक स्‍प्रे तक और कामसूत्र पुस्‍तिका से लेकर गुप्‍तांग को कड़क, सुडौल, ताकतवर व लंबा-मोटा तक करने का दावा बेहद अश्‍लील भाषा में किया जाता है।
इसी प्रकार 'वाणिज्‍य' शीर्षक वाले विज्ञापनों की बानगी देखिए- '' सभी कंपनियों के 3G डिजिटल टावर खाली जमीन, छत, खेत या प्‍लॉट पर लगवाएं और पाएं 80 लाख रुपये एडवांस, 70 हजार रुपये किराया एवं 20 साल का कोर्ट एग्रीमेंट। संपर्क करें- 09991039***
यहां यह जान लेना जरूरी है कि ऐसे सभी विज्ञापन अधिकांशत: बड़ी धोखेबाजी का सबब बनते हैं और आये दिन इनके माध्‍यम से लोगों को ठगने की खबरें भी छपती हैं।
विज्ञापनों के बाद चर्चा उन खबरों की जिनका सीधा संबंध देश के तथाकथित भाग्‍य विधाताओं से है।
पहली खबर राजनीति से, जिसमें देश के विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद साहब कहते हैं कि सोनिया गांधी राहुल गांधी की ही नहीं, हमारी और देशभर की मां हैं। उनके सानिध्‍य में ही देश सुरक्षित है।
दूसरी खबर जुडीशियरी से, जिसमें सर्वोच्‍च न्‍यायालय के एक अवकाश प्राप्‍त न्‍यायधीश लेकिन पश्‍चिम बंगाल मानवाधिकार आयोग के अध्‍यक्ष माननीयअशोक गांगुली कहते हैं कि मुझ पर यौन शोषण के आरोप प्रथम दृष्‍ट्या सही साबित होते हों तो होते रहें परंतु मैं अपने पद से इस्‍तीफा नहीं दूंगा। मुझे क्‍या करना है, यह मैं जानता हूं और इसके लिए जवाब देने को बाध्‍य नहीं हूं।
बाकी खबरें ब्‍यूरोक्रेसी से, जिसमें सीबीएसई के एक अधिकारी पर यौन शोषण के आरोप लगते हैं। एक अधिकारी रिश्‍वत लेते रंगेहाथ पकड़ा जाता है। एक आईपीएस पर उसी की अधीनस्‍थ दुराचार का आरोप लगाती है और एक आईएएस पर उसकी पत्‍नी दहेज उत्‍पीड़न का केस दर्ज कराती है।
अलग-अलग किस्‍म के आपराधिक मामले होने के बावजूद इनमें एक समानता भी है। समानता यह है कि सभी आरोपी खुद को निर्दोष बताते हुए कहते हैं कि उन्‍हें फंसाया जा रहा है।
इसके बाद नंबर आता है उन साधु-संतों का जिनके ऊपर समाज को पथभ्रष्‍ट होने से बचाये रखने की जिम्‍मेदारी है और जो भारतीय संस्‍कृति, धर्म, नीति, नैतिकता तथा चरित्र के संरक्षक माने जाते हैं।
आसाराम बापू और नारायण साईं नामक पिता-पुत्र पर लगे आरोप इस क्षेत्र में आई गिरावट का उदाहरण प्रस्‍तुत करने के लिए काफी हैं अन्‍यथा सब जानते हैं कि ऐसे तत्‍वों की फेहरिस्‍त काफी लंबी हो सकती है।
एकबार फिर लौटते हैं लोकतंत्र के उस चौथे खंभे की ओर जो 'प्रेस' से 'मीडिया' और मीडिया से 'मीडिएटर' कब बन बैठा, पता ही नहीं लगा।
इस तबके पर भी वैसे तो उंगलियां उठती रहती थीं लेकिन तरुण तेजपाल के रूप में इसका जो घिनौना चेहरा सामने आया है, उसने किसी मीडिया पर्सन को भरोसे लायक नहीं छोड़ा। जिसके तेज से कभी देश के प्रधानमंत्रियों एवं रक्षामंत्रियों की भी आंखें चुंधियाने लगी थीं और जिसने पत्रकारिता की एक नई परिभाषा गढ़कर देश के लोगों में उम्‍मीद की किरण पैदा की, उसका अपना चेहरा इतना वीभत्‍स होगा इसकी कल्‍पना तक किसी से नहीं की थी।
तो यह सच्‍चाई है आज के हमारे उस लोकतंत्र की, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह चार मजबूत स्‍तंभों पर टिका है। और ये चार स्‍तंभ हैं क्रमश: विधायिका, कार्यपालिका, न्‍यायपालिका और पत्रकारिता।
इनमें से पहले तीन संवैधानिक हैं जबकि पत्रकारिता को चौथा स्‍तंभ यूं ही मान लिया गया है।
अखबारों से निकली खबरें और उन्‍हीं में छपे विज्ञापन यह बताने को काफी हैं कि जिन स्‍तंभों (खंभों) पर विश्‍व का यह सबसे बड़ा लोकतंत्र पिछले 66 सालों से टिका है, वह न सिर्फ जर्जर हो चुके हैं बल्‍कि इस कदर सड़ चुके हैं कि अब उनके सहारे लोकतंत्र को जीवित रख पाना असंभव सा लगता है।
स्‍वतंत्रता के बाद राजनीति के लगातार होने वाले पतन ने 'छूत' की किसी बीमारी की तरह जिस तरह बाकी क्षेत्रों को भी प्रभावित किया है, उससे जाहिर होता है कि अब यदि देर की तो उपचार करने का वक्‍त भी हाथ से निकल जायेगा।
लोकतंत्र के चारों पाए जिस तेजी के साथ ध्‍वस्‍त हो रहे हैं, उन्‍हें समय रहते नहीं संभाला गया तो अखबार की कतरनें अट्टहास करती सुनाई देंगी और हमारे मुंह से चाहते हुए भी चीख तक नहीं निकल पायेगी।
किसी का कत्‍ल करने के लिए जरूरी नहीं कि खंजर से उसे मारा जाए या कि बंदूक की गोली उस पर चलाई जाए। मारने के और भी कई तरीके हैं.....और उनमें से एक तरीका यह भी है कि अपना धर्म, अपना कर्तव्‍य न निभाकर उस रास्‍ते को अपना लिया जाए जो सिर्फ और सिर्फ तमाशाबीन बनाए रखता है। जो अपनी हवस मिटाने के लिए उस ओर ले जाता है जहां से सही-गलत, धर्म-अधर्म तथा नीति व अनीति का अंतर तक दिखाई नहीं देता।
जहां खड़े होकर सिर्फ अपने स्‍वार्थों की पूर्ति को ही अपना कर्तव्‍य समझ लिया जाता है और ऐसी परिभाषाएं गढ़ ली जाती हैं जिनमें निजी स्‍वार्थ ही निहित हो।
विधायिका, कार्यपालिका और न्‍यायपालिका की बात यदि कुछ क्षणों के लिए छोड़ दी जाए तो पत्रकारिता का पतन सर्वाधिक चिंता का विषय हो जाता है क्‍योंकि आमजन के लिए यही वह आखिरी प्‍लेटफॉर्म है जहां वह बिना किसी प्रोटोकॉल के अपनी बात रख सकता है, जहां से उसे उम्‍मीद होती है कि बिना कुछ गंवाये वह न्‍याय पा सकता है।
लेकिन अफसोस कि उसके चरित्र में बहुत तेजी से गिरावट देखने को मिल रही है। विज्ञापनों में नहीं, खबरों में भी। खबरनवीस खुद खबर बन रहे हैं।
निजी हित साधने के लिए तंत्र के साथ लोक की भी हत्‍या कर रहा है पत्रकारिता का यह पतन।
हत्‍या भी ऐसी जिसमें खंजर या बंदूक की जगह आधुनिक संसाधनों का दुरुपयोग   तथा कानून में बने सूराखों का हरसंभव उपयोग कुछ इस तरह किया जा रहा है कि किसी को आसानी से इल्‍म तक न हो।
आखिर में एक शेर के साथ बात खत्‍म, जो कुछ यूं है-
जो कहते हैं इस शहर में कातिल नहीं कोई।
तू उनके लिए सुबह का अखबार लिए जा।।

गुरुवार, 12 दिसंबर 2013

कालाधन विदेश भेजने में भारत विश्‍व का पांचवां बड़ा देश

वॉशिंगटन। 
कालाधन विदेश भेजने के मामले में भारत 2002-11 के बीच पांचवां सबसे बड़ा देश रहा। वाशिंगटन स्थित वित्तीय अनुसंधान संगठन की रपट के अनुसार इस दौरान भारत से कुल 343.04 अरब डॉलर कालाधन विदेश भेजा गया। रपट के अनुसार केवल 2011 में ही देश से 84.93 अरब डॉलर की काली कमाई बाहर भेजी गयी। वर्ष के दौरान देश इस मामले में तीसरे स्थान पर रहा।
इलिसिट फाइनेंशियल फ्लोज फ्रॉम डेवलपिंग कंट्रीज-2002-2011 यानी विकासशील देशों से अवैध धन का प्रवाह-2002-2011 में कहा गया है कि 2011 में विकासशील देशों से अपराध, भ्रष्टाचार, और करापवंचन के जरिये 946.7 अरब डालर का धन विदेशों में चला गया। ग्लोबल फाइनेंशियल इंटिग्रिटी (जीएफआई) द्वारा कल प्रकाशित इस ताजा रपट के अनुसार 2002-11 के दौरान विकासशील देशों से 5,900 अरब डालर काली कमाई विदेश भेजी गयी। जीएफआई वॉशिंगटन का अनुसंधान और प्रचार संगठन है।
जीएफआई के अध्यक्ष रेमंड बेकर कहा, ‘जहां एक ओर विश्व अर्थव्यवस्था वैश्विक वित्तीय संकट के चलते हिचकोले खा रही थी, वहीं काली कमाई की दुनिया खूब फल-फूल रही थी। इस दौरान साल दर साल विकासशील देशों से उत्तरोत्तर अधिक काला धन बाहर भेजा जाता रहा है।’ बेकर ने कहा कि अकेले 2011 में ही गरीब देशों से करीब 1,000 अरब डालर की काली कमाई विदेशों में भेजी गयी। उन्होंने कहा कि इसके लिए, ‘बेनामी, छद्म कंपनियों, काले धन के पनाहगाहों तथा व्यापार के जरिये मनी-लांड्रिंग की तिकड़मों का इस्तेमाल किया गया।’
रिपोर्ट में कहा गया है कि 2011 में जहां 946.7 अरब डालर की काली कमाई विदेशों को भेजी गई, वहीं 2010 में यह आंकड़ा 832.4 अरब डालर था। 2002 में काला धन विदेश भेजने का आंकड़ा 270.3 अरब डालर का था।
अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि विकासशील देशों ने 2002 से 2011 के दौरान काली कमाई के रूप में 5,900 अरब डालर का धन गंवाया है। रिपोर्ट में बताया गया है कि दूसरे देशों को काला धन भेजने वाला शीर्ष 15 देशों में से 6 एशिया के हैं। एशियाई देशों में इस सूची में चीन, मलेशिया, भारत, इंडोनेशिया, थाइलैंड व फिलिपीन हैं। वहीं दो देश अफ्रीका के नाइजीरिया व दक्षिण अफ्रीका, चार यूरोप के रूस, बेलारूस, पोलैंड व सर्बिया, दो पश्चिमी देश मेक्सिको व ब्राजील व एक मेना क्षेत्र में इराक है।
पिछले 10 बरस में काले धन के प्रवाह के मामले में चीन 1,080 अरब डालर के साथ शीर्ष पर रहा है। उसके बाद रूस 880.96 अरब डालर, मेक्सिको 461.86 अरब डालर व मलेशिया 370.38 अरब डालर का नंबर आता है। जीएफआई के मुख्य अर्थशास्त्री देव कार ने कहा, ‘यह काफी कष्टदायक है कि किस तरह से काले धन का प्रवाह बढ़ रहा है।’
-एजेंसी

वेबसाइट कोबरापोस्‍ट ने फिर किए 11 माननीय बेनकाब

नई दिल्‍ली। 
देश में राजनीति का स्तर किस हद तक गिर रहा है, इसका एक बड़ा फिर उदाहरण सामने आया है। खोजी पत्रकारिता के लिए जानी जाने वाली वेबसाइट कोबरापोस्ट ने पैसे के लिए किसी भी हद तक गिरने वाले सांसदों के बारे में बड़ा खुलासा किया है। कोबरापोस्ट के मुताबिक एक फर्जी विदेशी ऑयल कंपनी के लिए 11 सांसद पैसा लेकर चिट्ठी लिखने को तैयार थे।
अपने एक साल के अभियान के बाद कोबरापोस्ट ने 11 सांसदों को अपने खुफिया कैमरे में कैद कर लिया है। ये सांसद लगभग सभी प्रमुख दलों से जुड़े हैं। इसमें बीजेपी, कांग्रेस, बीएसपी, जेडीयू और एआईएडीएमके के सांसद शामिल हैं। इन्होंने एक फर्जी ऑस्ट्रेलियाई ऑयल कंपनी के हित में सिफारिशी चिट्ठी लिखने के बदले 50 हजार रुपये से लेकर 50 लाख रुपये तक मांगे। खुफिया कैमरे में कैद 11 सांसदों में से 6 ने तो बाकायदा पैसे लेकर सिफारिशी चिट्ठियां भी लिख दीं।
कोबरापोस्ट ने इस अभियान का नाम 'ऑपरेशन फॉल्कन क्लॉ' रखा है। इसमें के. सुगुमार और सी. राजेंद्रन एआईडीएमके के सांसद हैं। लाल भाई पटेल, रविंद्र कुमार पांडेय और हरी मांझी बीजेपी सांसद हैं। विश्व मोहन कुमार, महेश्वर हजारी, भूदेव चौधरी जेडीयू के माननीय सांसद हैं। खिलाड़ी लाल बैरवा और विक्रमभाई अर्जनभाई कांग्रेसी सांसद हैं। कैसर जहां बीएसपी से जुड़ी हैं।
कोबरापोस्ट ने दावा किया है कि किसी भी सांसद ने फर्जी ऑस्ट्रेलियाई कंपनी की सचाई जानने के बारे में कोशिश तक नहीं की। वह पैसे के बदले आसानी से पेट्रोलियम मंत्रालय को इस फर्जी कंपनी के पक्ष में चिट्ठी लिखने के लिए तैयार हो गए।
कुछ ने तो कोबरापोस्ट के पत्रकारों को पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली से मिलवाने तक का वायदा कर दिया। जेडीयू सांसद महेश्वर हजारी ने तो यहां तक कहा, जब तक हैं तब तक आपकी कंपनी की मदद करेंगे...। यहां से लेकर मंत्रालय तक, जहां तक कहिएगा। महेश्वर हजारी बिहार के समस्तीपुर से जेडीयू सांसद हैं।
-एजेंसी

बुधवार, 11 दिसंबर 2013

जेएनयू की 53 फीसदी छात्राएं यौन उत्पीड़न की शिकार

नई दिल्ली। 
देश के प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में एक सर्वेक्षण में 53 फीसदी छात्राओं ने अपने जीवनकाल में किसी न किसी समय पर यौन उत्पीड़न का शिकार होने का खुलासा किया है। मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री ने लोकसभा में सदस्यों के सवालों के लिखित जवाब में यह जानकारी दी। उन्होंने बताया कि जवाहर लाल नेहरू विवि ने मंत्रालय को सूचित किया है कि अगस्त 2013 में विवि ने लैंगिक संबंधों को लेकर एक आंतरिक सर्वेक्षण कराया था जिसमें 528 लोगों को एक नमूना सर्वेक्षण के तौर पर लिया गया।
राज्य मंत्री ने बताया कि सर्वेक्षण में 53 फीसदी प्रतिभागियों ने खुलासा किया कि उन्हें अपनी जिंदगी में कभी न कभी यौन उत्पीड़न का शिकार होना पड़ा है। जेएनयू ने आगे बताया है कि सर्वेक्षण के नतीजे यह नहीं बताते कि यौन उत्पीड़न विवि परिसर में हुआ।
सर्वेक्षण के अनुसार, यौन उत्पीड़न का मुख्य कारण एक ऐसे सामाजिक ढांचे का अस्तित्व में होना है जहां महिलाओं को निम्न दर्जा दिया जाता है और एक ऐसी संस्कृति भी इसके लिए उत्तरदायी है जो लैंगिक रूप से असंवेदनशील है।
-एजेंसी

मंगलवार, 10 दिसंबर 2013

सेक्‍स सीडी कांड में फंसी कांग्रेस की नेत्री

देहरादून। 
दुष्कर्म के मामले में गिरफ्तार उत्तराखंड के निलंबित अपर सचिव जे. पी. जोशी को युवती द्वारा ब्लैकमेल किये जाने में मध्यस्थ के रूप में नाम आने पर रितु कंडियाल को प्रदेश युवा कांग्रेस ने महासचिव पद से हटा दिया। वहीं मामले में पूछताछ के लिये पुलिस उनसे संपर्क करने का प्रयास कर रही है।
जारी किए गए एक बयान में प्रदेश युवा कांग्रेस के अध्यक्ष भुवन कापड़ी ने कहा, 'उत्तराखंड के चर्चित सेक्स प्रकरण में युवा कांग्रेस महासचिव रितु कंडियाल की संलिप्तता की बात सामने आने से संगठन की भावनाओं को ठेस पहुंची है।' उन्होंने बताया, 'इसलिये राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव शाटव की संस्तुति के आधार पर रितु कंडियाल को तत्काल प्रभाव से पद से हटाया जाता है।' हालांकि उन्होंने कहा कि यदि वह बाद में बेकसूर पायी जाती हैं तो उनके विषय में दोबारा विचार किया जायेगा।
गौरतलब है कि युवती द्वारा निलंबित अपर सचिव जोशी के खिलाफ नौकरी का झांसा देकर कथित रूप से दुष्कर्म का मुकद्दमा दर्ज कराये जाने के बाद आरोपी अधिकारी ने भी युवती तथा उसके साथियों के खिलाफ ब्लैकमेलिंग और धमकी देने का मामला दर्ज कराया था। प्रकरण में जोशी को गिरफ्तार करने के बाद उनके द्वारा दर्ज कराये गये मामले की जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि युवती ने अपने साथियों के साथ मिलकर स्वयं कथित दुष्कर्म की घटना की सीडी बनायी और बाद में उसका उपयोग आरोपी अपर सचिव को ब्लैकमेल करने और धन ऐंठने के प्रयास के लिये किया।
जांच के दौरान यह बात भी सामने आयी कि युवती तथा उसके साथियों ने जोशी से कहा कि इस मामले को निपटाने के लिये रकम का खुलासा कांग्रेस नेता रितु कंडियाल करेंगी। जांच के अनुसार, कंडियाल ने जोशी को फोन कर बताया कि युवती तथा उसके साथी इस मामले को निपटाने के लिये तीन करोड़ रुपये मांग रहे हैं। पुलिस को दिये अपने बयान में जोशी भी कह चुके हैं कि उनसे रितु ने संपर्क कर युवती तथा उसके साथियों की ओर से तीन करोड़ रुपये की मांग की थी।
युवती द्वारा दिल्ली में इस साल 22 नवंबर को मामला दर्ज किये जाने से तीन दिन पहले रितु दुबई चली गयीं। इस बीच, रितु के दुबई से भारत लौटने की चर्चाओं के बीच उससे पूछताछ करने के लिये उससे संपर्क करने का प्रयास कर रही है। इस बाबत पूछे जाने पर पुलिस महानिरीक्षक (कानून और व्यवस्था) रामसिंह मीणा ने कहा कि जांच दल रितु से संपर्क करने का प्रयास कर रहा है। हालांकि उसके सभी फोन 'स्विच ऑफ' आ रहे हैं।
पुलिस महानिरीक्षक ने कहा कि रितु से संपर्क होने होने के बाद पुलिस उससे मामले में पूछताछ करेगी। गौरतलब है कि पुलिस ने युवती तथा उसके एक अन्य साथी नीरज चौहान को ब्लैकमेलिंग और धमकी देने के आरोप में गत शुक्रवार को गिरफ्तार किया था। हालांकि युवती के ट्रांजिट जमानत पर होने के कारण उसे छोड़ दिया गया।
-एजेंसी

लालबत्ती लगाने का अधिकार किस किस को: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली। 
उच्चतम न्यायालय  ने वाहनों पर लाल बत्ती और सायरन के दुरुपयोग को रोकने के लिए सख्त रवैया अपनाते हुए आज व्यवस्था दी कि संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों के अलावा कोई अन्य लाल बत्ती का इस्तेमाल नहीं कर सकेगा। न्यायमूर्ति जी. एस. सिंघवी की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने उत्तर प्रदेश के निवासी अभय सिंह की एक जनहित याचिका पर व्यवस्था देते हुए केंद्र और राज्य सरकारों को तीन माह के भीतर ऐसी सूची जारी करने का निर्देश दिया जिसमें लाल बत्ती का इस्तेमाल करने के लिए पात्र लोगों का उल्लेख किया गया हो।
न्यायालय ने साथ ही यह भी स्पष्ट कर दिया कि इस सूची को बेवजह लंबा नहीं किया जा सकेगा। खंडपीठ ने इस आदेश का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ कठोर सजा का प्रावधान करने के वास्ते मोटर वाहन अधिनियम में आवश्यक संशोधन करने का सरकार को निर्देश दिया। न्यायालय ने कहा कि वाहनों में प्रेसर हार्न, विभिन्न प्रकार की आवाज वाले हार्न और संगीतमय हार्न नहीं लगाए जाएंगे।
न्यायालय ने पुलिस और आपातकालीन  वाहनों पर घूमने वाली नीली बत्ती लगाने के निर्देश दिये। खंडपीठ ने पुलिस को इस व्यवस्था को निष्पक्ष तरीके और कड़ाई से पालन कराने की हिदायत भी दी। न्यायालय ने गत अगस्त में कहा था कि वाहनों पर अवैध तरीके से लाल बत्ती लगाई जा रही हैं जो समाज के लिए एक समस्या है। इन लाल बत्तियों का दुरुपयोग हो रहा है। याचिकाकर्ता ने लाल बत्ती और सायरन के दुरुपयोग का मामला न्यायालय के समक्ष उठाया था।
अभय सिंह की दलील थी कि लाल बत्ती का व्यापक पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा है। अपराधी भी लाल बत्ती लगे वाहन से पुलिस को चकमा देने में सफल रहते हैं। इस बीच केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने न्यायालय के इस आदेश पर कुछ बोलने से यह कहते हुए कन्नी काट ली कि वह संबंधित आदेश का अध्ययन करने के बाद ही अपनी प्रतिक्रिया देंगे।
हालांकि केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम  रमेश और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) नेता तारिक अनवर सहित कई व्यक्तियों ने शीर्ष अदालत की इस व्यवस्था को सही ठहराया है। रमेश और अनवर ने कहा कि शीर्ष अदालत का आदेश बिल्कुल जायज है क्योंकि इससे लाल बत्तियों के दुरुपयोग पर रोक लग सकेगी। जनता दल यू नेता साबिर अली ने न्यायालय के आदेश पर हैरानी जताई है।
-एजेंसी

सोमवार, 9 दिसंबर 2013

सेना के गोल्‍फ क्‍लबों में कराई जा रही हैं शादी और पार्टियां

नई दिल्ली। 
संसद की एक महत्वपूर्ण समिति ने सशस्त्र बलों के नियंत्रण वाले गोल्फ कोर्सों के भयंकर दुरुपयोग के लिए बलों की आज कड़ी आलोचना की और रक्षा मंत्रालय से रक्षा भूमि पर प्रतिबंधित गतिविधियों की जांच करने और इसके दुरुपयोग को रोकने के लिए कदम उठाने को कहा। लोकसभा में पेश की गई लोक लेखा समिति की रिपोर्ट में कहा गया है कि गोल्फ को एक सैन्य गतिविधि नहीं माना जा सकता है। समिति ने इस बात पर भी हैरानी जाहिर की है कि दिल्ली जैसी जगहों में ये गोल्फ क्लब विदेशी राजनयिकों तक को सदस्यता प्रदान कर रहे हैं।
रक्षा परिसंपदा पर पेश रिपोर्ट में समिति ने पाया है कि रक्षाकर्मियों के लिए बनाए गए क्लब और पार्कों का इस्तेमाल सामान्य नागरिकों द्वारा पार्टियों और शादी-ब्याह के लिए किया जा रहा है और इससे मिलने वाले शुल्क को सरकारी खजाने में जमा नहीं कराया जा रहा है।
समिति ने कहा है कि समिति गोल्फ कोर्सों के दुरुपयोग की कड़ी आलोचना करती है और साथ ही गोल्फ कोर्सों के संबंध में पूरी नीति की समीक्षा करने और उपचारात्मक कार्यवाही करने की सिफारिश करती है ताकि रक्षाकर्मियों के लिए स्थापित इन सुविधाओं का किसी भी प्रकार से दुरुपयोग न हो।
समिति ने रक्षा मंत्रालय से गोल्फ कोर्सों, सेना द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले पर्यावरणीय पार्कों, क्लबों की सदस्यता और उससे मिलने वाली वार्षिक धनराशि और उसके लेखे-जोखे के संबंध में एक स्थिति पत्र पेश करने को भी कहा है।
समिति ने इस संबंध में सेना प्रमुख के 2004 के एक फैसले पर भी आश्चर्य जताया है जिसमें गोल्फ को एक खेल गतिविधि तथा गोल्फ कोर्सों का नामकरण आर्मी एनवायरमेंटल पार्क एंड ट्रेनिंग एरिया के रूप में घोषित किया गया था।
-एजेंसी
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