शुक्रवार, 7 फ़रवरी 2014

चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़....

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़। जुल्‍म की छांव में दम लेने पर मजबूर हैं हम।।
और कुछ देर सितम सह लें, तड़प लें, रो लें। अपने अजदाद की मीरास है माज़ूर हैं हम ।।
जिस्‍म पर कैद है जज्‍ब़ात पे ज़ंजीरें हैं। फ़िक्र महबूस है गुफ़तार पे ताज़ीरें हैं।।
लेकिन अब ज़ुल्‍म की मियाद के दिन थोड़े हैं। इक ज़रा सब्र कि फ़रियाद के दिन थोड़े हैं।।

प्रसिद्ध पाकिस्‍तानी शायर फ़ैज अहमद फ़ैज ने सन् 1951 के दौरान ये लाइनें तब लिखीं थीं जब उन्‍हें लियाकत अली खां की सरकार का तख्‍ता पलट करने की साजिश के जुर्म में  गिरफ्तार कर लिया गया था।
फ़ैज साहब की दर्द में डूबी पर उम्‍मीद से भरीं ये लाइनें आज इसलिए याद आ रही हैं क्‍योंकि भारत लोकतंत्र का एक और चुनावी उत्‍सव मनाने जा रहा है। चुनावों के मद्देनजर समूची राजनीतिक जमात यह साबित करने पर आमादा है कि देश तथा देशवासियों का भाग्‍य सिर्फ और सिर्फ उनके हाथों में सुरक्षित है।
एक हफ्ता भी नहीं बीता जब दिल्‍ली में अल्‍पसंख्‍यकों के लिए आयोजित कार्यक्रम के दौरान एक मुस्‍लिम युवक को सुरक्षाकर्मी इसलिए मुंह बंद करके उठा ले गए क्‍योंकि  कुछ मुद्दों को लेकर वह सीधा प्रधानमंत्री से मुखातिब हुआ था।
इस कार्यक्रम में न सिर्फ प्रधानमंत्री, बल्‍कि सोनिया गांधी एवं फारुक अब्‍दुल्‍ला भी मंचासीन थे।
एक हफ्ता भी नहीं बीता जब राहुल गांधी ने एक टीवी चैनल को दिए अपने पहले इंटरव्‍यू में सिख दंगों पर माफी मांगने से इसलिए इंकार कर दिया क्‍योंकि वह उस समय बहुत छोटे थे। वह भूल गए कि अघोषित ही सही, पर वह प्रधानमंत्री पद के लिए कांग्रेसी उम्‍मीदवार हैं। भूल गए कि वह उसी कांग्रेसी विरासत के फिलहाल एकमात्र वारिस हैं जिसके कुछ नेताओं की 84 के सिख नरसंहार में संलिप्‍तता को उन्‍होंने स्‍वीकार किया।
आश्‍चर्यनजक रूप से वह यह तक भूल गए कि यदि कांग्रेस की महान विरासत के वह वारिस हैं और मौके-बेमौके अपने परिवार के बलिदान को कैश करने में लगे रहते हैं तो फिर उनके पापों का बोझ ढोने से इंकार कैसे कर सकते हैं।
इधर चुनावी दौर में भाजपा भी यह साबित करने पर तुली है कि देश व देशवासियों के लिए एकमात्र विकल्‍प है। यह वही भाजपा है जिसने अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में खुद को कांग्रेसी संस्‍कृति का वाहक बनकर अपनी मौलिकता खो दी थी और उसी के परिणाम स्‍वरूप दोबारा सत्‍ता का शिखर छूने को तरस गई।
शायद यही कारण है कि आज 'मोदी ही भाजपा और भाजपा ही मोदी' का नारा फ़िज़ा में गूंज रहा है क्‍योंकि बाकी भाजपाइयों पर आसानी से भरोसा कर पाना मुश्‍किल है, यह बात भाजपा भली प्रकार जान व समझ रही है।
सवाल यह नहीं है कि सत्‍ता किसके हाथों में जाए और कौन उसके सोपान पर प्रतिष्‍ठापित हो, सवाल यह है कि क्‍या इसी व्‍यवस्‍था का नाम लोकतंत्र है और क्‍या सामंतवाद की परिभाषा इससे इतर है?
जहां अपने ही देश के किसी नेता से कोई इसलिए सवाल नहीं पूछ सकता क्‍योंकि वह प्रधानमंत्री के पद पर काबिज है और इसलिए उसे मुंह बंद करके बाहर ले जाया जाता है कि वह 'सो कॉल्‍ड' 'प्रोटोकॉल' को फॉलो नहीं कर रहा?
कल ही की बात है जब सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि आखिर यह विशिष्‍टजन शब्‍द आया कहां से, किसने इसे ईजाद किया। संविधान तो ऐसे किसी शब्‍द का इस्‍तेमाल करने की इजाजत नहीं देता।
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार से दो हफ्तों में इस वीवीआईपी कल्‍चर पर जवाब मांगा है लेकिन क्‍या सरकार इसका जवाब देगी?
जिस प्रश्‍न का जवाब सन् 1947 के बाद से लगातार देश की जनता मांग रही है और किसी सरकार ने जवाब नहीं दिया तो दिन गिन रही वर्तमान सरकार से ऐसी उम्‍मीद करना बेमानी है।
बहरहाल, देश की जनता पर चुनावी खुमार चढ़ने लगा है और राजनीतिक दल उसके रंग में पूरी तरह रंग चुके हैं।
62 साल पहले फ़ैज साहब जेल की सलाखों के पीछे से कहते हैं-
अर्सा-ए-दहर की झुलसी हुई वीरानी में। हमको रहना है पर यूँ ही तो नहीं रहना है।।
अजनबी हाथों के बेनाम गराँबार सितम। आज सहना है हमेशा तो नहीं सहना है।।
दिल की बेसूद तड़प जिस्म की मायूस पुकार। चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़।।
बेशक, उनके अपने मुल्‍क पाकिस्‍तान पर फ़ैज साहब की उम्‍मीद खरी नहीं उतरती और पाकिस्‍तान की अवाम आज भी 1951 के हालातों में जीने पर मजबूर है लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि फ़ैज साहब की उम्‍मीद मर चुकी है।
फ़ैज साहब इस दुनिया से भले ही 29 साल पहले कूच कर गए लेकिन उनकी उम्‍मीदें पाकिस्‍तान की अवाम के दिलों में अब भी ज़िंदा हैं क्‍योंकि उम्‍मीदें मरा नहीं करतीं।
भारत के तथाकथित भाग्‍य विधाताओं को भी समझना होगा कि लोकतंत्र के छद्म स्‍वरूप और फिरंगियों की कार्बन कापियों से आमजन बुरी तरह उकता चुका है। वह समझ चुका है कि अब सत्‍ता बदलने से कुछ नहीं होने वाला। अब जरूरत है व्‍यवस्‍था बदलने की।
उस व्‍यवस्‍था को बदलने की जो स्‍वतंत्रता की आड़ में 'एज इट इज' एक्‍सेप्‍ट कर ली गई और जिसके कारण 'गुलामी' यथास्‍थिति को प्राप्‍त है। जिसके कारण कोई अपने ही चुने हुए नुमाइंदों से सवाल पूछने की हिमाकत नहीं कर सकता और जिसके कारण देश की सर्वोच्‍च अदालत को सरकार से यह पूछना पड़ता है कि आखिर यह वीवीआईपी कल्‍चर है क्‍या, कहां से आया है यह जबकि संविधान में तो इसका कहीं कोई उल्‍लेख नहीं है।
अपने मान-अपमान को प्रोटोकॉल के बहाने संसद से जोड़ने वाले और संसद के अंदर बैठकर हर रोज संसद की गरिमा को तार-तार करने वालों को अब यह समझना होगा कि  ''ज़िंदगी किसी मुफ़लिस की क़बा नहीं है जिसमें हर वक्‍त दर्द के पैबंद लगाकर धोखा दिया जाना संभव हो।
 चंद रोज़ और मेरी जान फ़क़त चंद ही रोज़......
चंद रोज बाद होने वाले चुनाव का नतीजा चाहे जो हो लेकिन यह तय है कि इस बार का चुनाव भविष्‍य को रेखांकित जरूर करेगा। केवल आमजन के भविष्‍य को नहीं, उन खास लोगों के भविष्‍य को भी जो सत्‍ता को अपनी बपौती मान बैठे हैं और जिनके लिए आमजन उनके इशारों पर नाचने वाली कठपुतलियों से अधिक कुछ नहीं रहा।
फ़ैज साहब के शब्‍द न तो सलाखों में कैद रहने को बाध्‍य हैं और ना सामंतवादी सोच के गुलाम बने रहने को अभिशप्‍त। वह सीमा के उस पार से भी बिना पासपोर्ट तथा वीजा के अपना सफर तय कर लेते हैं और सीमा के इस पार अपना वजूद कायम रखते हैं।
इसलिए इंतजार कीजिए, कहानी अभी खत्‍म नहीं हुई।

सोमवार, 27 जनवरी 2014

...तो भाई द्वारा बहन को दिया गया तोहफा है विवादित जमीन

नई दिल्‍ली। 
कांग्रेस उपाध्यक्ष और अगला पीएम बनने की रेस में शामिल राहुल गांधी ने हरियाणा में अपनी वह जमीन बहन प्रियंका गांधी को तोहफे में दे दी थी, जो उनके जीजा रॉबर्ट वॉड्रा के प्लॉट के ठीक बराबर में है। यह मामला करीब छह साल पुराना है। राहुल ने हरियाणा में पलवल जिले के हसनपुर गांव में 3 मार्च 2008 को छह एकड़ जमीन खरीदी थी, जिसके लिए 26.47 लाख रुपए अदा किए गए।
इसी दिन रॉबर्ट वॉड्रा ने हसनपुर में खेती की जमीन खरीदी थी। यह करीब नौ एकड़ थी और इसके लिए उन्होंने 36.90 लाख रुपए चुकाए। 2012 में राहुल ने यह प्रियंका को तोहफे में दे दी।
तोहफे की इस बात का खुलासा ऐसे वक्‍त हुआ है, जब इसी साल हरियाणा में खरीदी गई वॉड्रा की प्रॉपर्टी विवादों में घिर गई थी। यह विवाद रियल एस्टेट की दिग्गज कंपनी डीएलएफ के साथ एक डील को लेकर खड़ा हुआ था।
राहुल गांधी ने 26 जुलाई 2012 को यह जमीन अपनी बहन को तोहफे में दी थी और तीन महीने बाद अक्टूबर में हरियाणा के आईएएस अधिकारी अशोक खेमका ने वॉड्रा के कुछ अन्य प्लॉट का म्यूटेशन रद्द कर दिया।
हुड्डा की अगुवाई वाली हरियाणा की कांग्रेस सरकार ने वॉड्रा और डीएलएफ के बीच हुई डील को 'निजी ट्रांजेक्‍शन' करार दिया था।
यह दिलचस्प है कि हसनपुर की जमीन के लिए एक ही पावर ऑफ अटॉर्नी धारक महेश सिंह नागर के जरिए राहुल गांधी और रॉबर्ट वॉड्रा के लिए दो अलग-अलग सेल डीड तैयार की गई थीं।
12 अगस्‍त 2012 में लोकसभा सचिवालय को सौंपे एक दस्तावेज में राहुल गांधी ने कहा, "मैंने 51 कनाल की खेती की जमीन अपनी बहन ‌प्रियंका गांधी वॉड्रा को दी और इसके लिए पैसे का कोई लेन-देन नहीं हुआ।"
इसमें आगे लिखा है, "क्योंकि यह भाई की तरफ से एक बहन को दिया गया तोहफा है इसलिए कृषि जमीन के ट्रांसफर को लेकर किसी तरह की रकम पर कोई गौर नहीं किया गया।"
सचिवालय में 2013 में दिए गए एक और डिक्‍लेरेशन के मुताबिक राहुल ने गुड़गांव की सिग्नेचर टावर्स-2 में दो कमर्शियल प्रॉपर्टी खरीदीं। अक्टूबर 2010 में 1.44 करोड़ रुपए और 5.36 करोड़ रुपए में इनकी बुकिंग की गई थी।
उन्होंने कुल अब तक दो किस्त जमा कराई हैं। हालांकि, इसमें प्रॉपर्टी का साइज नहीं बताया है। राहुल ने गुड़गांव की प्रॉपर्टी खरीदने से पहले दिल्ली के साकेत स्थित मेट्रोपोलेटिन मॉल अपनी दो दुकान 5.28 करोड़ रुपए में बेच दी। उन्होंने 2006 में ये दुकान खरीदी थीं।
राहुल लोकसभा के उन 20 सांसदों में शामिल हैं, जिन्होंने 15वीं लोकसभा के दौरान इस तरह का हलफनामा देने के बाद अपनी संपत्ति और देनदारी को अपडेट किया। पहले शपथपत्र में उन्होंने हसनपुर की जमीन की जानकारी दी थी।
-एजेंसी

शिकागो की महर्षि यूनिवर्सिटी से 163 वैदिक पंडित लापता

शिकागो। 
उत्तर भारत के गांवों से वैदिक पंडित के रूप में प्रशिक्षित किए जाने के लिए लाए गए कम से कम 163 किशोर अमेरिका में पिछले एक वर्ष से लापता हैं। इन किशोरों को महर्षि महेश योगी द्वारा स्थापित दो संस्थानों द्वारा प्रशिक्षित किया जाना था। शिकागो से प्रकाशित होने वाली साप्ताहिक पत्रिका "हाइ इंडिया" के ताजा अंक में प्रकाशित एक रपट के मुताबिक, 1,050 भारतीय किशोरों को आयोवा के फायरफील्ड स्थित महर्षि वैदिक सिटी और महर्षि यूनिवर्सिटी ऑफ मैनेजमेंट लाया गया था, जिनमें से करीब 163 का पिछले एक वर्ष से अता-पता नहीं है। लापता किशोरों में कुछ की उम्र मात्र 19 वर्ष है।
वैदिक सिटी और यूनिवर्सिटी, दोनों संस्थानों को महर्षि महेश योगी के परिवार के लोग चलाते हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, इन संस्थाओं का प्रबंधन करने वालों ने लापता लोगों की तलाश करने की भी जहमत नहीं उठाई है।
यहां तक कि भारतीय मूल के आध्यात्मिक गुरू द्वारा स्थापित अनगिनत शिक्षण केंद्रों में से एक ग्लोबल काउंट्री ऑफ वर्ल्‍ड पीस (जीसीडब्ल्यूपी) को भी "विश्व शांति पेशेवर" कहे जाने वाले इन वैदिक अध्येताओं की दुर्दशा या लापता होने के बारे में कुछ भी नहीं पता है। शिक्षण केंद्र के अधिकारियों ने बताया, ""या तो आव्रजन उद्देश्य के लिए या फिर अपने अमरीकी सपनों को पूरा करने के लिए वे यहां से निकल भागे।""
-एजेंसी

रविवार, 26 जनवरी 2014

उत्‍सव किसका... 'गण' का... या 'तंत्र' का ?

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष)
अगर सन्, संवत्, तारीख और कलेण्‍डर की बात करें तो देश आज अपना 65 वां गणतंत्र दिवस मना रहा है। पर यदि बात करें उपलब्‍धियों की तो साढ़े छ: दशक का कालखण्‍ड बहुत से सवाल खड़े करता है। संभवत: यही वजह है कि आज के दिन भी जब कोई कुछ लिखने या याद करने बैठता है तो उसके हिस्‍से में उपलब्‍धियां इतनी कम आती हैं कि वह न चाहते हुए उदासी का अहसास कराए बिना नहीं रह पाता। वह खुद को गौरवान्‍वित महसूस करना चाहता है और देशवासियों को आशावान रहने का संदेश देना चाहता है परंतु ऐसा भी नहीं कर पाता।
शायद इसीलिए आज के अखबारों में गणतंत्र को लेकर जितने भी लेख समाज के विभिन्‍न वर्गों से आए बुद्धिजीवियों ने लिखे हैं, उनमें गणतंत्र दिवस की खुशी कम और एक किस्‍म की टीस अधिक महसूस होती है।
कहने को एक विशेष वर्ग इसे बुद्धिजीवियों की नकारात्‍मक सोच या उपलब्‍धियों को कम आंकने की प्रवृत्‍ति कहकर खारिज कर सकता है परंतु ऐसा है नहीं।
यूं भी 'शिखर' किसी का हो, वहां से धरातल की सच्‍चाई का अंदाज लगा पाना कठिन होता है और यही दिक्‍कत है हमारे शासक वर्ग की। वह बाढ़ की विभीषिका को भी हेलीकॉप्‍टर में बैठकर देखता है। वह नुकसान का आंकलन आंकड़ों से करता है, न कि नुकसान उठाने वालों के बोझ से।
सत्‍ता के शीर्ष पर किसी न किसी रूप में जमे रहकर जब उपलब्‍धियों को आंका जाता है तो उसमें कहीं न कहीं सत्‍ता का सुख खु़द-ब-खु़द समाहित होता है जबकि ज़मीनी हकीकत उससे कहीं बहुत अधिक तल्‍ख़ होती है।
कड़वा सच यह है कि सारा देश जैसे आधा गिलास भरा और आधा गिलास खाली के तर्क-वितर्क में उलझा है। ईमानदारी से कोई यह कहने को तैयार नहीं कि बेशक आधा गिलास भरा है पर आधा गिलास खाली भी है और खाली गिलास को भरने की जरूरत इसलिए है क्‍योंकि 65 सालों में इसे भर जाना चाहिए था, क्‍योंकि हमारी जरूरत है उसका जल्‍द से जल्‍द भरा जाना।
जब हम बात करते हैं भ्रष्‍टाचार, दुराचार, अनाचार, गरीबी, भुखमरी, अव्‍यवस्‍थाओं एवं कुव्‍यवस्‍थाओं की तो तुलनात्‍मक अध्‍ययन करने लगते हैं दूसरे मुल्‍कों का, उदाहरण देने लगते हैं वहां व्‍याप्‍त समस्‍याओं का लेकिन जब बात आती है तरक्‍की की तो हम अपनी परेशानियों का रोना लेकर बैठ जाते हैं। तब हम तुलनात्‍मक अध्‍ययन करते हैं विपक्षी पार्टियों के कार्यकाल से, उदाहरण देने लगते हैं उनकी ख़ामियों का और यह साबित करने का प्रयास करते हैं कि किस तरह हम अपने प्रतिद्वंदी से हर मायने में श्रेष्‍ठ हैं। प्रतिस्‍पर्धा तो हो रही है लेकिन अच्‍छाई के लिए नहीं, बुराई के लिए।
कौन नहीं जानता कि गणतंत्र दिवस और स्‍वतंत्रता दिवस एक रस्‍म अदायगी बनकर रह गए हैं। इनके आयोजनों में वह खुशी नहीं है जो होनी चाहिए। मन से शायद ही कोई अब इन राष्‍ट्रीय पर्वों को मनाता हो क्‍योंकि गण से तंत्र इतनी दूर हो गया जितना आसमान दूर है ज़मीन से।
2013 में गण ने तंत्र को झकझोरा जरूर और उसी के परिणामस्‍वरूप पांच राज्‍यों के चुनाव परिणामों ने एक कंकड़ उछालकर सत्‍ता की राजनीति में ख़लल डाल दिया लेकिन इतना काफी नहीं है।
काफी होता तो शह और मात के लिए षड्यंत्रों का खेल पूरी शिद्दत से न खेला जाता। 65 सालों की तुलना एक महीने से भी कम समय के शासन से नहीं की जाती। 'सबक सीखने' को 'एंज्‍वाय' नहीं किया जाता।
इस सबके बावजूद गण के पास तंत्र के अधीन रहने के सिवा चारा क्‍या है। तंत्र की खुशी में खुश होने के अतिरिक्‍त वह कर क्‍या सकता है। 2014 के लोकसभा चुनाव सामने हैं। यह भी एक उत्‍सव है। देखना यह है कि इस बार का यह उत्‍सव आने वाले राष्‍ट्रीय पर्वों को एक गिनती बनाए रखता है या फिर सही मायनों में गौरवान्‍वित करने का, खुशी मनाने का अवसर प्रदान करता है। जय हिंद! जय भारत!

बुधवार, 22 जनवरी 2014

अफसोस..... मुलायम हैं कि मानते ही नहीं

डॉ. राममनोहर लोहिया के समाजवाद की परिभाषा को परिवारवाद में समाहित कर देने वाले समाजवादी पार्टी के मुखिया मास्‍टर मुलायम सिंह यादव, अब उसे व्‍यक्‍तिवाद तक सीमित करने में लगे हैं। कभी साइकिल से सैफई की गलियों को नापने वाले मुलायम अब अपनी महत्‍वाकांक्षा पूरी करने पर इस कदर आमादा हैं कि उन्‍हें दिन-रात पीएम की कुर्सी के अलावा कुछ सूझ नहीं रहा। वह जहां जाते हैं, वहीं कहने लगते हैं कि बेटे को तो सीएम बना दिया अब बाप को क्‍या बनाओगे। ऐसा लगता है जैसे मुलायम ने केवल मांगने की आदत डाल ली है और देना पूरी तरह भूल चुके हैं।
कांग्रेस को सहारा देते-देते कांग्रेसी कल्‍चर का रंग उनके ऊपर इस कदर चढ़ा है कि आज वह कांग्रेसियों की ही भाषा बोलते हैं। वही क्‍यों, उनके पुत्र और उत्‍तर प्रदेश जैसे विशाल सूबे के मुखिया अखिलेश भी अब कांग्रेसी जुबान बोलने से परहेज नहीं करते। वह कांग्रेसी रहनुमाओं की तरह प्रदेश की जनता को यह बताने लगे हैं कि उन्‍होंने दिया क्‍या-क्‍या है, यह नहीं गिनाते कि लिया कितना है।
बेशक, सीबीआई के भय से मुक्‍ति की चाहत ने मुलायम के समाजवाद को सांप्रदायिकता की आड़ में कांग्रेस की ढपली बजाने पर मजबूर किया हो परंतु जनता हर समझौते का हिसाब मांगती है।
यही कारण है कि आज कांग्रेस के साथ खड़े होकर पैदा किया गया सांप्रदायिकता के भय का भूत भी काम नहीं आ रहा। अल्‍पसंख्‍यक समुदाय को सारा खेल समझ में आ चुका है। उसे मुलायम के समाजवाद की परिभाषा भी समझ में आ गई है और उसकी सांप्रदायिकता का मतलब भी।
खुद को ठगा हुआ महसूस करने वाला अल्‍पसंख्‍यक समुदाय अब मौकापरस्‍ती के मायने समझाने को 2014 के चुनावों की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा है।
कहते हैं कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती लेकिन जो भरे सावन में अंधा हुआ हो, उसका इलाज भी किया जाए तो क्‍या। उसे तो चारों ओर वोटों की लहलहाती फसल ही दिखाई देगी।
उत्‍तर प्रदेश अपने अब तक के सर्वाधिक बुरे दौर से गुजर रहा है। कानून-व्‍यवस्‍था ही नहीं, सब-कुछ बदहाल है। लगता है जैसे सरकार नाम की कोई चीज है ही नहीं और समाजवादी पार्टी, कोई पार्टी न होकर एक ऐसे परिवार का नाम है जो यूपी को अपनी निजी जागीर तथा जनता को अपना गुलाम समझ बैठा है।
यह तो तय है कि 2014 का लोकसभा चुनाव राजनीति की कोई नई इबारत लिखेगा और राजनीतिज्ञों को नया सबक सिखायेगा लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि कोई आमूल-चूल परिवर्तन होने जा रहा है।
भाजपा अध्‍यक्ष राजनाथ सिंह ने सही कहा है कि जनता अब सत्‍ता नहीं, व्‍यवस्‍था परिवर्तन चाहती है। यदि राजनाथ सिंह या भाजपा ने इसे एक राजनीतिक जुमले की तरह नहीं उछाला है और वाकई उन्‍हें जनआकांक्षा व जनभावना समझ में आ चुकी है तब तो ठीक, अन्‍यथा भाजपा के हाथ सत्‍ता भले ही आ जाए लेकिन जनाधार हासिल नहीं होगा।
फिर वही होगा, जिसका डर आज प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को सता रहा है। जिस तरह मनमोहन को डर है कि इतिहास उनके प्रति बेरहम न हो जाए, उसी तरह भाजपा के भी इतिहास बन जाने का ही भय पैदा हो जायेगा।
रही बात मुलायम की महत्‍वाकांक्षा और उनके सपनों में समा चुकी पीएम पद की कुर्सी की, तो उसका अहसास उन्‍हें तुरंत हो जायेगा बशर्ते वह परिवार से बाहर झांककर देख लें।
अपने समाजवाद को उन्‍होंने इतना ओछा कर दिया है कि यूपी में सत्‍ता का आधा कार्यकाल पूरा नहीं हुआ और वह बुरी तरह हांफने लगा है।
आश्‍चर्य की बात यह है कि कभी प्राइमरी के मास्‍टर रहे मुलायम सिंह, आज प्रदेश की प्राथमिकता को समझने के लिए तैयार नहीं हैं और देश की कमान संभालने को बेताब हैं। प्रधानमंत्री बनने की चाहत ने उन्‍हें कहीं का नहीं छोड़ा।
समय बीतता जा रहा है, दुंदुभि बजने को है परंतु सत्‍ता मद में चूर मुलायम सिंह समाजवाद को इतना सूक्ष्‍म कर चुके हैं जिसे देख पाने में संभवत: माइक्रोस्‍कोप भी मदद न कर पाए। समाजवाद का उनके द्वारा तैयार किया गया नया कलेवर और उनके द्वारा ही गढ़ी गई नई परिभाषा उनके सपनों को पूरा करने में सबसे बड़ी बाधा है। अफसोस...... इस सब के बाद भी मुलायम हैं कि मानते ही नहीं।   

मंगलवार, 14 जनवरी 2014

ऑपरेशन ब्लूस्टार में थैचर की भूमिका पर जांच के आदेश

लंदन। 
1984 में इंदिरा गांधी की ऑपरेशन ब्लू स्टार की योजना में माग्रेट थैचर सरकार की भूमिका पर ब्रिटिश पीएम ने जांच के आदेश दिए हैं.
ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने अपने कैबिनेट सचिव को इस दावे से जुड़े तथ्य पेश करने को कहा है, जिसमें वर्ष 1984 में इंदिरा गांधी की ऑपरेशन ब्लू स्टार की योजना में माग्रेट थैचर की सरकार द्वारा मदद करने की बात कही गई है.
लेबर सांसद टॉम वाटसन और लॉर्ड इंद्रजीत सिंह ने हाल ही में गोपनीयता की सूची से हटाए गए दस्तावेजों के आधार पर इस स्पष्टीकरण की मांग की है. इन दस्तावेजों में ऐसे संकेत मिले हैं कि ब्रिटेन की विशेष वायु सेवा (एसएएस) के अधिकारियों को स्वर्ण मंदिर पर धावा बोलकर अंदर छिपे आतंकियों को निकालने की योजना में भारत की मदद करने के लिए भेजा गया था. इस अभियान में एक हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे.
ब्रिटिश सरकार के प्रवक्ता ने सोमवार रात जारी बयान में कहा, ‘‘इन घटनाओं से बड़ी संख्या में जानें गईं और इन दस्तावेजों के कारण पैदा होने वाली वाजिब चिंताओं को हम समझते हैं. प्रधानमंत्री ने कैबिनेट सचिव से कहा है कि वह इस मामले को तत्काल देखें और तथ्य पेश करें.’’
प्रवक्ता ने आगे कहा, ‘‘प्रधानमंत्री और विदेश मंत्री को प्रकाशन से पहले इन दस्तावेजों के बारे में पता नहीं था. विदेशी सरकारों की ओर से सलाह के किसी भी अनुरोध का आंकलन सावधानीपूर्वक मंत्रियों की निगरानी और उचित कानूनी सलाह से किया जाता है.’’
जिन दस्तावेजों की यहां बात की जा रही है, उन्हें लंदन स्थित राष्ट्रीय अभिलेखागार ने 30 साल के गैर-गोपनीयता नियम के तहत नए साल पर एक श्रृंखला के रूप में जारी किया था.
अमृतसर में हुई इस घटना से करीब चार माह पहले यानी 23 फरवरी 1984 की तारीख वाले एक पत्र पर लिखा था, ‘अति गोपनीय और निजी’. इस दस्तावेज के अंदर लिखा था, ‘‘भारतीय प्रशासन ने हाल ही में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर से सिख चरमपंथियों को निकालने की योजना पर ब्रिटेन से सलाह मांगी है.’’
‘‘विदेश मंत्री ने भारत के इस अनुरोध पर सकारात्मक प्रतिक्रिया करने का फैसला किया. प्रधानमंत्री के समझौते के अनुसार एसएएस के एक अधिकारी ने भारत की यात्रा की और एक योजना का खाका तैयार किया जिसे श्रीमती गांधी ने अपनी सहमति दे दी. विदेश मंत्री का मानना है कि भारत सरकार इस योजना को जल्द ही अंजाम दे सकती है.’’
ब्रिटेन में नेटवर्क ऑफ सिख आग्रेनाइजेशंस के निदेशक लार्ड सिंह ने कहा, ‘‘ये दस्तावेज सबित करते हैं कि सिखों पर हमेशा संदेह किया गया. स्वर्ण मंदिर में धावे की योजना महीनेभर पहले बनायी गयी थी, यहां तक कि भारत सरकार सप्ताहभर पहले तक दावा करती रही कि ऐसी कोई योजना नहीं थी.’’
उन्होंने कहा, ‘‘वास्तविक तथ्यों की पुष्टि के लिए एक स्वतंत्र अंतर्राष्ट्रीय जांच की जरूरत को लेकर मैं पहले ही भारतीय उच्चायोग के जरिए भारत सरकार से संपर्क कर चुका हूं. अब मैं हाउस ऑफ लार्डस में इस मुद्दे को उठाऊंगा.’’
कुछ दस्तावेजों को ‘स्टॉप डीपोर्टेशंस’ ब्लॉग पर फिर से पेश किया गया है जो ब्रिटेन की आवजन नीति पर केंद्रित हैं और अभियान पर श्रीमती गांधी को सलाह देने के लिए थैचर द्वारा एसएएस अधिकारी भेजे जाने का दावा करते हैं.
वेस्ट ब्रोमविच ईस्ट के सांसद वाटसन ने कहा, ‘‘मैंने आज (सोमवार) सुबह ही दस्तावेज देखे तथा मुझे बताया गया है कि कुछ और को दबा कर रखा गया है. यह ठीक नहीं है. इंदिरा गांधी सरकार के साथ ब्रिटिश सैन्य मिलीभगत के बारे में स्पष्टीकरण मांगा जाना अनुचित नहीं होगा.’’
उन्होंने ब्रिटेन के विदेश मंत्री विलियम हेग को पत्र लिखा है और मुद्दे को हाउस ऑफ कामंस में उठाने की उनकी योजना है.
ऑपरेशन ब्लूस्टार के पांच महीने के बाद इंदिरा गांधी की उनके सिख अंगरक्षकों ने हत्या कर दी थी.
-एजेंसी

......और कितने भीष्‍म

(लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष) आज मकर संक्रांति है। इस दिन का यूं तो हिंदू धर्म में तमाम कारणों से विशेष महत्‍व है लेकिन इनमें एक बड़ा कारण यह भी है कि शरशैया पर लेटे हुए किंतु इच्‍छा मृत्‍यु का वरदान प्राप्‍त भीष्‍म पितामह ने आज ही के दिन को अपनी मृत्‍यु के लिए चुना था।
इससे पूर्व महाभारत युद्ध की समाप्‍ति के बाद सभी मृतकों को तिलांजलि देकर जब भगवान श्रीकृष्‍ण पांचों पाण्‍डवों सहित हस्‍तिनापुर लौटे तो शरशैया पर लेटे पितामह भीष्‍म ने श्रीकृष्‍ण को रोक कर उनसे पूछा-
"हे मधुसूदन, मेरे कौन से कर्मों का फल है जो मैं इस तरह शरशैया पर पड़ा हुआ हूँ?''
पितामह के प्रश्‍न पर मुस्‍कुराते हुए श्रीकृष्‍ण ने एक प्रतिप्रश्‍न किया। कृष्‍ण ने पितामह से जानना चाहा कि आपको अपने पूर्व जन्‍मों का कुछ स्‍मरण है?
इस पर पितामह का जवाब था- हे मधुसूदन! मुझे अपने पूरे सौ पूर्व जन्‍मों का स्‍मरण है, साथ ही यह भी याद है कि मैंने इन जन्‍मों में कभी किसी व्‍यक्‍ति का अहित नहीं किया।
श्रीकृष्‍ण फिर मुस्‍कुराये और बोले- लेकिन इन सौ वर्षों से ठीक पहले वाले जन्‍म में जब आप एक राज्‍य के युवराज थे, आपने शिकार खेलते हुए अपने घोड़े की पीठ पर आ गिरे गिरगिट को वाण की नोंक द्वारा उठाकर फेंक दिया था। वह गिरगिट एक बेरिया के पेड़ पर जा गिरा और बेरिया के कांटे उसके शरीर में धंस गए। उस स्‍थिति में वह गिरगिट पूरे 18 दिन जीवित रहा और ईश्‍वर से प्रार्थना करता रहा कि जिस तरह मैं तड़प-तड़प कर मृत्‍यु को प्राप्‍त हो रहा हूं, ठीक इसी तरह की मृत्‍यु को यह युवराज भी प्राप्‍त हो।
श्रीकृष्‍ण ने पितामह को बताया कि गिरगिट का यह श्राप आपके पुण्‍यकर्मों की वजह से कभी फलीभूत नहीं हुआ, लेकिन जब सक्षम होते हुए भी हस्‍तिनापुर की राजसभा में आप द्रोपदी का चीरहरण होते देखते रहे, दुर्योधन व दु:शासन को रोकने की जगह आप मूकदर्शक बने रहे तो आपके समस्‍त पुण्‍यकर्म क्षीण हो गए और उसी क्षण से गिरगिट का श्राप आपके ऊपर फलीभूत होने लगा।
पितामह, प्रत्‍येक मनुष्‍य को अपने कर्मों का फल कभी न कभी अवश्‍य भोगना पड़ता है। प्रकृति सर्वोपरि है, इसका न्याय सर्वोपरि और प्रिय है। इसलिए पृथ्वी पर निवास करने वाले प्रत्येक प्राणी व जीव जन्तु तक को अपने कर्मों के अनुसार उसका फल भोगना अवश्‍यम्‍भावी है।
महाभारत के युद्ध से उपजी इस कथा को अनेक लोग जानते होंगे लेकिन आज मकर संक्राति के दिन इसे उल्‍लिखित करने का उद्देश्‍य राजनीति के वर्तमान दौर से इसे जोड़ने तथा राजनीतिज्ञों को एक संदेश के रूप में स्‍मरण कराना है।
2014 के लोकसभा चुनावों से आमजन को बहुत उम्‍मीदें हैं। लोगों को लगता है कि संभवत: इन चुनावों के उपरांत एक लंबे समय से चले आ रहे राजनीति के संक्रमण काल को विराम मिलेगा और देश विकासशीलता के स्‍थाई दौर से बाहर निकलकर विकास के मार्ग पर चलेगा।
बहरहाल, भविष्‍य का तो कुछ पता नहीं परंतु वर्तमान को देखकर जरूर ऐसा लगता है कि जैसे एक-दो नहीं तमाम भीष्‍म पितामह मूकदर्शक बन देश का चीरहरण होते देख रहे हैं।
आश्‍चर्य की बात यह है कि आज के इन भीष्‍म पितामहों को न तो अपने शरशैया पर पड़े होने का भान है और ना अपने इसी जन्‍म के कर्मों का। ज़ाहिर है कि ऐसे में उनसे उनके पूर्व जन्‍मों के कर्मों का हिसाब रखने की कोई अपेक्षा करना तो पूरी तरह बेमानी है।
आश्‍चर्य की बात यह भी है कि जाति, धर्म एवं संप्रदाय के नाम पर राजनीति करने वाले, महाभारत जैसे धर्मयुद्ध की इस कथा से कोई सबक लेते मालूम नहीं पड़ते जबकि उन्‍होंने किसी एक गिरगिट को जाने-अनजाने में नहीं, जानबूझकर पूरे देश की आम जनता को बेरिया के कांटों पर ला पटका है। वह अभिशप्‍त है तिल-तिलकर मरने के लिए लेकिन उसकी आह तक सुनाई नहीं दे रही।
ऐसा लगता है कि श्रीकृष्‍ण के समय में होने वाला महाभारत भले ही अठारह अक्षौहणी सेना के मारे जाने पर समाप्‍त हो गया हो किंतु देश की स्‍वतंत्रता के लिए 1857 से शुरू हुआ महाभारत आज तक जारी है। 15 अगस्‍त 1947 को हुए युद्धविराम से जिस स्‍वतंत्रता का आभास कराया गया था, वह एक सुनियोजित छल था। उस दिन से हुआ तो सिर्फ इतना कि गोरों का स्‍थान उन काले अंग्रेजों ने ले लिया जो दिखते तो अपने जैसे हैं पर उनके क्रिया-कलाप किसी मायने में फिरंगियों से कम नहीं। उनकी सूरतें बेशक फिरंगियों से नहीं मिलतीं परंतु सीरतें हूबहू वैसी ही हैं।
संभवत: इसीलिए आज के शासकों को न तो भीष्‍मपितामह की कथा याद है और न श्रीकृष्‍ण व उनके बीच हुए संवाद। उन्‍हें याद हैं तो केवल वो तौर तरीके जिनका इस्‍तेमाल कर फिरंगियों ने सैकड़ों साल इस देश को गुलाम बनाए रखा और इसकी धन संपदा लूटकर ले गये।
खैर, इन्‍हें महाभारत याद न सही......श्रीकृष्‍ण और पितामह भीष्‍म के बीच का संवाद स्‍मरण न सही....लेकिन आमजन को याद भी है और उन्‍हें उस पर पूरा भरोसा भी है।
उन्‍हें श्रीकृष्‍ण द्वारा पितामह भीष्‍म से कहे गए उन अंतिम शब्‍दों पर अक्षरश: यकीन है कि  प्रत्‍येक मनुष्‍य को अपने कर्मों का फल कभी न कभी अवश्‍य भोगना पड़ता है। प्रकृति सर्वोपरि है, इसका न्याय सर्वोपरि और प्रिय है।
संक्रांति का पर्व यह स्‍मरण कराने तथा आमजन की आस्‍था को अडिग बनाये रखने के लिए काफी है कि जाने-अनजाने में किये गये कर्मों का भी फल भोगना पड़ता है लिहाजा आज नहीं तो कल देश के शासकों से प्रकृति इन 66 सालों का हिसाब मांगेगी जरूर।
गिरगिट का श्राप फलीभूत होने की शुरूआत तो हो चुकी है, बस उसका अंजाम तक पहुंचना बाकी है।
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