सोमवार, 12 जनवरी 2015

जहां भेड़-बकरियों से ज्‍यादा असुरक्षित हैं ''बेटियां''

मथुरा। 
यदि आपके जेहन में मथुरा की छवि सिर्फ एक धार्मिक स्‍थान की है और अगर आप ऐसा मानते हैं कि कृष्‍ण की यह पावन जन्‍मस्‍थली सिर्फ यमुना के घाटों, वृंदावन की कुंज गलियों, अरावली पर्वत श्रृंखला की गोवर्धन परिक्रमा, नंदगांव, बरसाना, कोकिलावन के शनिदेव मंदिर, द्वारिकाधीश, बिहारी जी जैसे तमाम मंदिरों तक ही सीमित है तो आप गलतफहमी में हैं। इन सबसे और अपनी धार्मिक छवि से इतर भी एक मथुरा है, और यह मथुरा एक ऐसी अंधी सुरंग में ले जाती है जहां जाते हुए तो बहुत कुछ नजर आता है किंतु वापस होते कुछ नजर नहीं आता। ऐसा लगता है जैसे इस सुरंग से वापसी का कोई मार्ग है ही नहीं।
कभी प्राचीन बेशकीमती मूर्तियों की तस्‍करी के लिए कुख्‍यात रहा मथुरा जनपद अपनी भौगोलिक स्‍थितियों के कारण समय के साथ यूं तो शराब, ड्रग्‍स, हथियार तथा चांदी आदि की तस्‍करी के लिए भी मशहूर होता गया किंतु आज यह गर्ल्‍स ट्रैफिकिंग यानि लड़कियों की तस्‍करी के लिए भी काफी मुफीद साबित हो रहा है लिहाजा यहां बड़े पैमाने पर लड़कियों के तस्‍कर सक्रिय हो चुके हैं।
चूंकि मथुरा जनपद की सीमा एक ओर राजस्‍थान से तथा दूसरी ओर हरियाणा से लगती है और राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली की दूरी भी यहां से मात्र 146 किलोमीटर है इसलिए हर किस्‍म के अपराधियों का आवागमन यहां काफी आसान रहता है। ऊपर से अनेक तथाकथित मठ, मंदिर एवं आश्रम भी अपराधियों को संरक्षण देने में अहम् भूमिका निभाते हैं।
यही कारण है कि विश्‍व प्रसिद्ध यह धार्मिक जनपद पिछले कुछ सालों से गर्ल्‍स ट्रैफिकिंग का बड़ा अड्डा बन चुका है।
यहां से ले जायी जाने वाली लड़कियां कहां गायब हो जाती हैं, इसका पता आज तक नहीं लगा। हां, यह पता जरूर है कि गायब होने की तुलना में बरामद होने वाली लड़कियों की संख्‍या नगण्‍य है। जो लड़कियां यदा-कदा मिल जाती हैं, उन्‍हें लेकर फिर पुलिस ऐसी कोई जांच नहीं करती जिससे दूसरी बेहिसाब लापता लड़कियों का कोई सुराग मिल सके।
सच तो यह है कि पुलिस मात्र खानापूरी करके ऐसे मामलों से पीछा छुड़ाने में ज्‍यादा रुचि लेती है ताकि कोई बड़ी मुसीबत गले न पड़ जाए।
पुलिस के ही सूत्र बताते हैं कि मथुरा जनपद से हर दिन कोई न कोई लड़की गायब होती है और पुलिस को इसकी सूचना भी दी जाती है किंतु पुलिस पहले तो ऐसे मामले बिना कोई लिखा-पढ़ी किये निपटाने का प्रयास करती है लेकिन यदि लिखा-पढ़ी करना मजबूरी बन जाता है तब मात्र गुमशुदगी दर्ज करके अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर लेती है। उसके बाद लड़की के परिवारीजनों से ही कह दिया जाता है कि यदि आपको कुछ पता लगे तो बता देना। पुलिसजन खुद उसके बाद कोई जानकारी करने की जहमत नहीं उठाते जबकि आज गर्ल्‍स चिल्‍ड्रन को अगवा कर उनसे वैश्‍यावृत्‍ति कराने, दूसरे प्रांतों में ले जाकर जबरन विवाह करा देने, खाड़ी के देशों में भेज देने तथा भीख मंगवाने से लेकर ड्रग्‍स की तस्‍करी कराने जैसे मामले सामने आ चुके हैं।
इसके अलावा निठारी जैसे कांड बताते हैं कि लड़कियों के साथ कितने किस्‍म के अपराध किये जा सकते हैं।
हाल ही में मथुरा से तीन नाबालिग लड़कियों को फिल्‍मों में काम दिलाने के बहाने अगवा कर ले जाने का मामला प्रकाश में आ चुका है, बावजूद इसके पुलिस लगभग हर दिन लड़कियों के गायब होने जैसे संगीन मामले को गंभीरता से नहीं लेती।
पुलिस के साथ-साथ इस मामले में न तो मथुरा का कोई सामाजिक संगठन रुचि लेता है और न कोई धार्मिक संस्‍था। राजनेता तो यहां जैसे केवल वक्‍त पर चुनाव लड़ने और बाकी समय निठल्‍ला चिंतन करने के लिए हैं। उनके द्वारा कभी किसी गंभीर समस्‍या के समाधान की पहल की ही नहीं जाती नतीजतन पुलिस तथा प्रशासनिक अफसर यहां ड्यूटी कम और मौज ज्‍यादा करते हैं।
नेताओं की निष्‍क्रियता, अफसरों की उदासीनता, पुलिस की अकर्मयण्‍यता तथा अपराधियों की इस अति सक्रियता पर यदि अब भी ध्‍यान नहीं दिया और लड़कियों का जनपद से गायब होना इसी प्रकार जारी रहा तो निश्‍चित ही वह दिन दूर नहीं जब किसी भयानक कांड के सूत्र मथुरा जैसी विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी से जुड़ते दिखाई देंगे। तब हो सकता है कि राजनीति भी हो और कुछ अफसरों से जवाब-तलब भी किया जाए किंतु तब तक बहुत देर हो चुकी होगी। उसके बाद भी जरूरी नहीं कि गर्ल्‍स ट्रैफिकिंग का यह सिलसिला थम ही जाए क्‍योंकि बेटियों को लेकर समाज जिस कदर संवेदनाहीन हो चुका है, उसी का परिणाम है कि आज बेटियां भेड़-बकरियों से भी ज्‍यादा असुरक्षित हैं। आश्‍चर्य इस बात पर भी होता है कि फिर भी हम खुद को सभ्‍य समाज का हिस्‍सा कहते हैं। फिर भी हम मथुरा को विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक स्‍थानों में शुमार करते हैं।
यहां एक सवाल यह पूछने का मन करता है कि यदि धार्मिक स्‍थल ऐसे होते हैं तो जरायम की दुनिया और जरायमपेशा शहर कैसे होते होंगे?
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष

सोमवार, 5 जनवरी 2015

...मुझको भी एक "पद्म" दिला दो

पाकिस्‍तानी गायक अदनान शामी का एक गीत काफी मशहूर है, आपने भी जरूर सुना होगा।
गीत के बोल हैं-    तेरी ऊँची शान है मौला, मेरी अर्ज़ी मान ले मौला...मुझको भी तो लिफ्ट करा दे।
थोड़ी सी तो लिफ्ट करा दे, बांग्ला मोटर कार दिला दे... एक नहीं दो चार दिला दे...
मुझको एरो प्लेन दिला दे, दुनिया भर की सैर करा दे, कैसे कैसों को दिया है... ऐसे वैसों को दिया है, मुझको भी तो लिफ्ट करा दे, थोड़ी सी तो लिफ्ट करा दे।

जैसा कि गीत की पक्‍तियों से जाहिर है कि अदनान शामी ने इन सभी चीजों की मांग ऊपर वाले से की है, किसी नीचे वाले से नहीं।
यूं भी कहा और माना यही जाता है कि जो भी मांगना है ऊपर वाले से मांगना चाहिए क्‍योंकि नीचे वाले तो सबके सब भिखारी हैं। किसी को कुछ चाहिए तो किसी को कुछ।
ऐसे में किसी भिखारी से क्‍या मांगना और क्‍यों मांगना।
अब रही बात ऊपर वाले की तो उससे मांगते वक्‍त भी अधिकांश लोग इस बात का ध्‍यान रखते हैं कि कब और क्‍या मांगा जाए क्‍योंकि गलत वक्‍त पर गलत मांग ऊपर वाला भी पूरी नहीं करता।
खैर, फिलहाल हम यहां बात कर रहे हैं ''ऊपर वाले'' जैसी दो तथाकथित महान हस्‍तियों की। दो दिन पहले तक वह मेरे लिए भी पूरी तरह महान हस्‍तियां ही थीं किंतु दो दिन में ''तथाकथित'' हो गईं।
पहले बात करते हैं प्रसिद्ध कवि और गीतकार गोपाल दास 'नीरज' की। 91 वर्ष पूरे करके 92 वर्ष में प्रवेश कर चुके यानि कब्र में पैर लटका कर बैठे इस कवि ने एक साक्षात्‍कार के दौरान कहा है कि मुझे ईमानदारी से काम करने का ''पूरा फल'' नहीं मिला।
नीरज के अनुसार उन्‍होंने 72 साल तक लगातार गीतों के माध्‍यम से हिंदी की सेवा की, फिर भी उन्‍हें किसी सरकार ने राज्‍यसभा के लिए नामित नहीं किया।
नीरज का एक और दर्द है कि उन्‍हें पद्म विभूषण की उपाधि से भी नहीं नवाजा गया।
कवि व गीतकार नीरज ने जिस दिन अपना यह दर्द एक पत्रकार के सामने बयां किया, उसी दिन ओलंपिक में बैडमिंटन का कांस्‍य पदक जीतने वाली भारतीय खिलाड़ी साइना नेहवाल ने पद्म भूषण पुरस्‍कार के लिए अपना आवेदन खारिज कर दिये जाने पर आपा खो दिया।
साइना नेहवाल का तर्क है कि जब पहलवान सुशील कुमार को पद्म पुरस्‍कार देने के लिए 5 साल के अंतराल का नियम दरकिनार किया जा सकता है तो उनके लिए क्‍यों नहीं।
जहां तक मेरी जानकारी है, कवि गोपाल दास नीरज और बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल को देश ने इतना कुछ दिया है जितने की उन्‍होंने संभवत: खुद कल्‍पना भी नहीं की होगी।
ये बात अलग है कि जितना उन्‍हें मिल गया...या मिलता गया...उतनी ही उनकी हवस बढ़ती गई...और नतीजा सामने है।
हो सकता है कि आज की तारीख में उन्‍हें अब तक प्राप्‍त प्रतिफल अपनी तथाकथित देश सेवा के सामने कम नजर आता हो लेकिन यहां बड़ा सवाल यह है कि क्‍या सम्‍मान और पुरस्‍कार भी मांगने की चीज हैं?
क्‍या मांग कर प्राप्‍त सम्‍मान और पुरस्‍कार किसी को संतुष्‍टि प्रदान कर सकते हैं?
क्‍या मान-सम्‍मान और पुरस्‍कारों की भीख मांगी जा सकती है, और क्‍या भीख में मिला सम्‍मान या पुरस्‍कार कोई अहमियत रखता है?
अगर किसी के पास इन सवालों के जवाब हों तो कृपया करके अवश्‍य दें ताकि मैं आगे से किसी महान शख्‍सियत की शान में गुस्‍ताखी करने से पहले उन जवाबों पर नजर डाल सकूं।
रहा सवाल कवि व गीतकार गोपाल दास नीरज तथा बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल द्वारा अपने-अपने तरीकों से देश की और हिंदी व खेल की सेवा करने का तो ऐसी सेवा समझ से परे है।
सेवा का तो मतलब ही कुछ और बताया गया है। यह कैसी सेवाएं हैं जिनके एवज में खुलेआम कीमत मांगी जा रही है। बेझिझक अपने लिए राज्‍य सभा का नॉमीनेशन तथा पद्म पुरस्‍कार की चाहत की जा रही है।
यदि इसी को देश सेवा, समाज सेवा या किसी भी किस्‍म की कोई सेवा कहते हैं तो हर वो नागरिक देश सेवा में लीन है जो देश की जनसंख्‍या बढ़ाने में बिना सोचे-समझे अपना योगदान दे रहा है क्‍योंकि आज सवा अरब से ऊपर की वह संख्‍या ऐसे ही लोगों के कारण बन सकी है जिस संख्‍या पर देश गर्व करने लगा है। जो कभी चिंता का विषय बनी थी किंतु आज उसे लेकर दूसरे देश चिंतित हैं।
यदि यही देश सेवा है तो हर वो व्‍यक्‍ति भी देश सेवा कर रहा है जो अपना-अपना काम करके दौलत, शौहरत व इज्‍ज़त कमा रहा है या फिर बमुश्‍किल ही सही पर जीविको पार्जन कर रहा है।
देखा जाए तो वह नीरज व नेहवाल जैसे देश सेवकों से कहीं ज्‍यादा महान है क्‍योंकि वह सरकार से किसी प्रकार के मान-सम्‍मान व ईनाम-इकराम की इच्‍छा पाले बिना और सरकार पर बोझ बने बिना चुपचाप अपना काम कर रहा है और उन बच्‍चों को भी पाल रहा है जो बेशक पैदा चाहे उसने किये हों किंतु जिस पर गर्व देश कर रहा है। बच्‍चों को कर्ज लेकर पढ़ाता है और जब वह कुछ बन जाता है तो देश उसका क्रेडिट ले लेता है।
देश के पूर्व और वर्तमान प्रधानमंत्री विभिन्‍न राष्‍ट्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय मंचों से कहते हैं कि हमारा युवा हमारी सबसे बड़ी पूंजी है। हमारे इंजीनियर, डॉक्‍टर और वैज्ञानिक विश्‍व में देश की पताका फहरा रहे हैं।
यदि राज्‍यसभा की सदस्‍यता और पद्म पुरस्‍कार देने का यही पैमाना है तो शायद ही देश का कोई नागरिक हो, जिसकी इन पर दावेदारी न बनती हो।
उन चोर-उचक्‍कों की भी जो भारी-भरकम जोखिम उठाकर अपने काम को अंजाम देते हैं सरकारों से कोई ऐसी शिकायत नहीं करते कि यदि उन्‍हें भी समय रहते उनकी योग्‍यता के अनुसार रोजी-रोजगार मिल गया होता तो वह इतना जोखिम भरा काम नहीं करते। ऐसा काम जिसमें बच्‍चों की परवरिश करने के लिए तो कोई पीठ तक नहीं थपथपाता लेकिन पकड़े जाने पर जेल जरूर जाना पड़ता है जबकि वह भी अपने तरीके से देश सेवा ही कर रहे हैं।
91 साल के वयोवृद्ध कवि को कभी देश या ऐसे-वैसे देशवासियों की चिंता नहीं सताई पर इस बात का मलाल है कि किसी सरकार ने उन्‍हें राज्‍यसभा नहीं भेजा, पद्म विभूषण नहीं दिया। कभी ऊपर वाले का शुक्रिया अदा नहीं किया कि इतना मान-सम्‍मान और धन-दौलत अपना काम करते हुए दिलवा दिया लेकिन चला-चली की बेला में सरकार से शिकायत कर रहे हैं।
युवा बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल ने भी कभी देश व देशवासियों की स्‍थिति-परिस्‍थितियों पर चिंता जाहिर की हो, ऐसा स्‍मरण नहीं आता। कभी किसी प्राकृतिक आपदा में करोड़ों की अपनी दौलत से अंशभर कुछ दिया हो, याद नहीं आता परंतु पद्म पुरस्‍कार ऐसे मांग रही हैं जैसे बैडमिंटन खेल कर एकमात्र देश पर और हर तरह से देशवासियों पर कोई उपकार कर रही हों।
देश अनेक तरह की परेशानियों का सामना कर रहा है, तमाम देशवासी अपनी ख्‍वाहिशें पूरी होने के लिए ताजिंदगी तरसते रहते हैं, कुल आबादी का एक बड़ा हिस्‍सा अपने सपने पूरे होने की उम्‍मीद में दुनिया से कूच कर जाता है...और हमारी तथाकथित महान हस्‍तियों को अपनी हवस पूरी न हो पाने से नाराजगी है।
यदि महानता इसी को कहते हैं और ऐसे ही होते हैं महान लोग...तो ऐसी महानता किसी काम की नहीं।
ईश्‍वर न करे कि आने वाली पीढ़ी को ऐसे महान लोगों की हवस का पता भी लगे...क्‍योंकि यदि पता लग गया तो उनकी भी नजरों से ये उसी प्रकार गिर जायेंगे जिस प्रकार मेरी नजरों से दो दिन के अंदर गिर गये अन्‍यथा दो दिन पहले तक मैं भी इन्‍हें बहुत महान मानता था।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

राष्‍ट्रपति भवन व संसद भवन की जमीन का मुआवजा मांगा

नई दिल्ली। 
जिस जगह पर राष्ट्रपति भवन संपदा, संसद भवन व अन्य सरकारी दफ्तर बने हैं, उस जमीन का मुआवजा किसानों को न मिलने के दावे वाली याचिका पर हाईकोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा है. याचिका में कहा गया है कि मालचा गांव के किसानों से वर्ष 1911-12 में उस वक्त जमीन का अधिग्रहण किया गया था, जब कोलकाता से बदल कर नई दिल्ली को राजधानी बनाया गया था. किसानों की तरफ से एडवोकेट डा. सूरत सिंह का कहना है कि मुआवजा राशि 2217 रुपए दस आना और ग्यारह पैसा दी जानी थी जो नहीं दी गई.
न्यायमूर्ति बीडी अहमद व आईएस मेहता की बेंच के समक्ष पेश मामले में उप राज्यपाल, भूमि एवं वन विभाग, शहरी विकास मंत्रालय को भी नोटिस जारी कर 23 मार्च तक जवाब मांगा है. किसानों की तरफ से एडवोकेट डा. सूरत सिंह ने अपनी जिरह में भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को चुनौती देते हुए कहा कि वर्ष 1911-12 के दरमियान मालचा गांव के करीब 150 किसानों की 1700 एकड़ जमीन अधिगृहीत की गई थी.
कहा गया कि इसी जमीन पर राष्ट्रपति भवन संपदा, संसद भवन व अन्य सरकारी दफ्तर बनाए गए. बेंच को बताया गया कि नए भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के मुताबिक अगर फैसला पांच साल या इससे पहले हुआ है और मुआवजा या जमीन का कब्जा नहीं लिया गया है तो माना जाएगा कि जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया समाप्त हो चुकी है. कहा गया कि यह कानून एक जनवरी 2014 से प्रभावी हुआ है.
यह भी बताया गया कि वर्ष 1911-12 के आदेश संख्या 30 के जरिए मालचा गांव की 1700 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गई थी. सज्जन सिंह व अन्य की याचिका के अनुसार भुगतान रजिस्टर में दर्ज उनके पूर्वज शादी को जमीन के बदले 2217 रुपए, दस आना व ग्यारह पैसा मुआवजा मिलना था, जो कि अदा नहीं किया गया. याचिका में मांग है कि उनको मुआवजा दिलवाया जाए. 
-एजेंसी

बुधवार, 24 दिसंबर 2014

रेप केस: उपमन्‍यु के घर फरारी का नोटिस चस्‍पा -एक पत्र ने भी किया अफवाहों का बाजार गर्म

पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु पर एमबीए की एक छात्रा के साथ बलात्‍कार किये जाने के आरोप में कल पुलिस ने एक कदम और आगे बढ़ाते हुए कोर्ट से सीआरपीसी की धारा 82 के तहत कार्यवाही करा ली है। पुलिस ने कल ही उपमन्‍यु के घर पर उसकी फरारी संबंधी सूचना का नोटिस भी चस्‍पा कर दिया है।
पीड़िता के अधिवक्‍ता प्रदीप राजपूत द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार रेप के आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु के फरार हो जाने तथा पुलिस की गिरफ्त में न आने पर कल इस मामले की आई. ओ. महिला सब इंस्‍पेक्‍टर रीना ने संबंधित न्‍यायालय से सीआरपीसी की धारा 82 के तहत कार्यवाही किये जाने की अनुमति लेकर आरोपी के घर उसका नोटिस चस्‍पा कर दिया।
इस प्रक्रिया के बाद भी यदि उपमन्‍यु पुलिस अथवा कोर्ट के समक्ष हाजिर नहीं होता है तो पुलिस उसे फरार मानते हुए सीआरपीसी की धारा 83 के तहत उसकी चल-अचल संपत्‍ति कुर्क करने का आदेश ले सकती है।
सामान्‍य तौर पर 82 के बाद 83 की कार्यवाही करने के लिए पुलिस 30 दिन का समय लेती है किंतु यह समय निर्धारित नहीं है। यदि पुलिस को ऐसा लगता है कि आरोपी इस बीच में अपनी चल-अचल संपत्‍ति बेच सकता है तो वह 83 की कार्यवाही करने का आदेश कभी भी लेकर उसकी चल-अचल संपत्‍ति कुर्क कर सकती है।
उल्‍लेखनीय है कि उपमन्‍यु के खिलाफ न्‍यायालय ने गैर जमानती वारंट (NBW) पहले से जारी किया हुआ है।
चूंकि यह मामला यूपी जर्नलिस्‍ट एसोसिएशन के प्रदेश उपाध्‍यक्ष, ब्रज प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष, मथुरा की छावनी परिषद् के पूर्व उपाध्‍यक्ष का तमगा प्राप्‍त तथा अधिवक्‍ता सहित बसपा की टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ चुके एक प्रभावशाली पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु से ताल्‍लुक रहता है लिहाजा तरह-तरह की अफवाहों का बाजार भी इस बीच गर्म है।
पहले इस आशय की अफवाह उड़ी की भारी-भरकम रकम देकर उपमन्‍यु ने पीड़िता के परिवार से समझौता कर लिया है, और अब कल से एक नई अफवाह यह उड़ी कि इस मामले की तफ्तीश (जांच) को डीजीपी ने गैर जनपद (फिरोजाबाद) स्‍थानांतरित कर दिया है।
हद तो तब हो गई जब तफ्तीश चेंज होने के संबंध में पुलिस महानिदेशक उत्‍तर प्रदेश के कार्यालय से जारी दर्शाया हुआ डीजीपी आनंद लाल बनर्जी के तथाकथित हस्‍ताक्षरयुक्‍त वाला एक पत्र भी सोशल मीडिया पर तैरने लगा।
आगरा परिक्षेत्र की पुलिस उपमहानिरीक्षक श्रीमती लक्ष्‍मी सिंह के नाम से संबोधित इस पत्र में लिखा है कि हनुमान नगर निवासी सेना के पूर्व सूबेदार त्रिभुवन उपमन्‍यु के संलग्‍न पत्र का अवलोकन करें जो माननीय मुख्‍यमंत्री के कार्यालय से मुकद्दमा अपराध संख्‍या 944/2014 धारा 376 व 506 के संबंध में प्रेषित है और निष्‍पक्ष विवेचना गुण-दोष के आधार पर जनपद फिरोजाबाद से कराये जाने के संबंध में है।
पत्र में यह भी लिखा है कि उपरोक्‍त प्रकरण वादी के बताये गये तथ्‍यों के अनुसार संदिग्‍ध प्रतीत हो रहा है।
जांच स्‍थानांतरित करने के लिए जिन सज्‍जन पूर्व सूबेदार त्रिभुवन उपमन्‍यु के नाम का उल्‍लेख उक्‍त पत्र में किया गया है, बताया जाता है कि वह आरोपी पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु के सगे भाई हैं।
इस संबंध में जानकारी की गई तो पता लगा कि प्रथम तो प्रतिवादी पक्ष के किसी प्रार्थना पत्र पर जांच स्‍थानांतरित करने का कोई प्रावधान नहीं है और दूसरे इसी पत्र में यह भी लिखा है कि उपरोक्‍त प्रकरण वादी के बताये गये तथ्‍यों के अनुसार संदिग्‍ध प्रतीत हो रहा है  जबकि विरोधाभासी है क्‍योंकि इस मामले में पीड़िता खुद 'वादी' है।
इस सबके अलावा पत्र में डीआईजी को उनके व्‍यक्‍तिगत नाम से संबोधित किया जाना, बिना जांच के ही एक संगीन अपराध को संदिग्‍ध बताया जाना तथा पत्र की तारीख 22 को काटकर हाथ से 18 किया जाना आदि तमाम ऐसे कारण हैं जो पत्र को किसी सुनियोजित साजिश का हिस्‍सा साबित करते हैं।
हालांकि इस पत्र के आधार पर कल पूरे दिन अफवाहों का बाजार तो गर्म रहा ही, साथ ही यह दावा करने वालों की भी खासी संख्‍या सामने आती रही जिन्‍होंने कहा कि उनकी डीआईजी से बात हो चुकी है और उन्‍होंने जांच फिरोजाबाद स्‍थानांतरित किये जाने की पुष्‍टि कर दी है।
इतना सब-कुछ हो जाने तथा सोशल मीडिया पर भी प्रसारित होने के बावजूद आश्‍चर्यजनक रूप से पुलिस इस मामले में चुप्‍पी साधे रही जबकि यह एक संगीन साइबर क्राइम की श्रेणी में आता है।
इस तरह पुलिस विभाग के गोपनीय पत्र का मजमून तैयार करके उसे प्रसारित करना तथा उसके लिए प्रदेश के डीजीपी कार्यालय तथा डीजीपी के नाम व हस्‍ताक्षरों का इस्‍तेमाल करना अपने आप में बड़ी साजिश की ओर इशारा करता है परंतु पुलिस ने ऐसा करने वाले का पता तक लगाना जरूरी नहीं समझा।
यूं तो इस रेप केस को लेकर पुलिस के कुछ आला अधिकारियों का रवैया शुरू से काफी लचीला रहा है परंतु अब ऐसे किसी पत्र को प्रसारित करने के मामले में भी पूरी तरह उदासीन बने रहना साइबर क्राइम को बढ़ावा देने से कम नहीं माना जा सकता।
जो भी हो, अब देखना यह है कि पुलिस इस मामले में आरोपी पत्रकार को गिरफ्त में ले पाती है अथवा ऐसी तरह-तरह की अफवाहों के बीच उसे कोर्ट में सरेंडर करने का मौका देती है ताकि सांप मर जाए और लाठी भी सही सलामत रहे।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष

सोमवार, 22 दिसंबर 2014

हद कर दी आपने हुड्डा साहब, एक वकील की फीस 6 करोड़

चंडीगढ़। 
हरियाणा में भूपिंदर सिंह हुड्डा की अगुवाई वाली पूर्ववर्ती कांग्रेस सरकार ने 6 करोड़ रुपये से ज्यादा की फीस पर सीनियर वकील केटीएस तुलसी की सेवाएं लीं। हरियाणा सरकार ने तुलसी की सेवा ऐसे समय में ली, जब उस पर 82,000 करोड़ रुपये का बकाया था। इस बात का खुलासा एक व्यापक पड़ताल से हुआ है। हरियाणा के एडवोकेट जनरल ऑफिस में 200 से ज्यादा लॉ ऑफिसर थे, इसके बावजूद राज्य सरकार ने मारुति सुजुकी के मानेसर प्लांट में हुई हिंसा के दोषियों के खिलाफ ट्रायल में केटीएस तुलसी को स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर नियुक्त किया गया। तुलसी की नियुक्ति जुलाई 2012 में की गई।
500 से ज्यादा डॉक्युमेंट्स का आंकलन करके पता लगाया गया कि हुड्डा ने तुलसी के फीस शेड्यूल को सेटल किए बगैर उनकी नियुक्ति की। 'भारी भरकम खर्च' को देखते हुए नौकरशाहों ने तुलसी की सेवाएं बंद करने की सलाह भी दी, लेकिन उनकी सेवाएं बनाए रखी गईं। हुड्डा सरकार ने बिना किसी देरी के न केवल तुलसी को 5.5 करोड़ रुपये का भुगतान किया, बल्कि विधानसभा चुनावों से पहले उनके लंबित बिलों का भुगतान करने की भी कोशिश की। केटीएस तुलसी के पेंडिंग बिल्स करीब 65 लाख रुपये के थे।
हालांकि, अब मनोहर लाल खट्टर की अगुवाई वाली बीजेपी सरकार ने तत्काल प्रभाव से तुलसी की सर्विसेज बंद करने और लंबित बिलों की जांच करने का फैसला किया है। राज्य सरकार तुलसी की जगह पर 'रीजनबल फीस' लेने वाले एक सीनियर क्रिमिनल लॉयर को इंगेज करेगी। तुलसी की सर्विसेज लेने के तीन महीने से ज्यादा समय के बाद उनके फीस शेड्यूल (इसमें उनके तीन सहायक वकील भी थे) को फाइनल किया गया।
हालांकि, राज्य के एडवोकेट जनरल हवा सिंह हुड्डा ने 24 अगस्त 2012 को सरकार से कहा था कि फीस शेड्यूल को पहले से तय किया जाए। उन्होंने कहा था कि अगर पहले से फीस तय नहीं की गई, तो इसे स्वीकार करना कठिन हो जाता है। तत्कालीन एडवोकेट जनरल ने राज्य को यह भी सलाह दी थी कि तुलसी से सुनवाई की प्रभावी तरीकों के फीस बिल देने को कहा जाए।
तत्कालीन मुख्यमंत्री ने तुलसी और उनके तीन सहायक वकीलों के फीस शेड्यूल को एक ही दिन मंजूरी दी है। तुलसी पर किए जाने वाले खर्च का मामला एक आरटीआई से सामने आया है। गुड़गांव के रहने वाले एक शख्स ने जनवरी 2013 में सूचना के अधिकार के तहत तुलसी और उनके जूनियर पर किए गए खर्च का ब्योरा मांगा था। मई 2013 में गृह सचिव ने ऑफिशल फाइल पर एक नोट लिखा, जिसमें भारी खर्च बचाने के लिए यह केस पब्लिक प्रॉसीक्यूटर्स को देने की बात कही गई थी।

सफेदपोशों की काली जमात के बीच SSP साहिबा

मथुरा। 
ड्यूटी की खातिर हर वक्‍त 'खाक' में मिलने की प्रेरणा देने वाली 'खाकी वर्दी' को अपने बदन पर सजाकर रौब गांठने वाले पुलिस अफसर ही जब उसकी इज्‍जत से खिलवाड़ करने पर आमादा हो जाएं तो उसका इकबाल कायम कैसे रहेगा और कैसे कानून का राज स्‍थापित होगा?  
यह प्रश्‍न यूं तो कोई नए नहीं हैं, और हर उस घटना के बाद उठते हैं जिसमें पुलिस की भूमिका संदिग्‍ध प्रतीत होती है परंतु जहां जिले की कमान संभाले बैठे पुलिस कप्‍तान की ही भूमिका साफ-साफ पक्षपाती प्रतीत होती हो, वहां ऐसे किसी प्रश्‍न की अहमियत काफी बढ़ जाती है।
यह अहमियत तब और बढ़ जाती है जब मामला बलात्‍कार जैसे घृणित आपराधिक कृत्‍य का हो तथा आरोपी एक तथाकथित पत्रकार या यूं कहें कि हाईप्रोफाइल 'लाइजनर' हो जबकि पुलिस की कमान महिला पुलिस अधिकारी के हाथ में हो।
कमलकांत उपमन्‍यु पर बलात्‍कार का आरोप लगने के बाद कहने को तो कई ऐसे सफेदपोश लोग उसके पक्ष में सक्रिय हो गये जो किसी न किसी रूप में उसके रैकेट का हिस्‍सा हैं, परंतु इसमें सर्वाधिक महत्‍वपूर्ण भूमिका यदि कोई अदा कर रहा है तो वह हैं जिले की महिला पुलिस कप्‍तान मंजिल सैनी।
बेशक मंजिल सैनी तक पहुंचने व उनसे रूबरू होकर सवाल-जवाब करने की हिमाकत हर कोई नहीं कर सकता लेकिन जानना सब चाहते हैं कि आखिर कमलकांत उपमन्‍यु से उनका ऐसा कौन सा रिश्‍ता है, जिसे निभाने के लिए उन्‍होंने न केवल अपने बदन पर सजी खाकी वर्दी की इज्‍जत से खिलवाड़ करने में हिचक नहीं दिखाई बल्‍कि एक सामर्थ्‍यवान महिला होने के बावजूद एक लड़की के प्रति होने वाली स्‍वाभाविक संवेदना को भी महसूस नहीं किया।
3 दिसंबर को पीड़ित लड़की द्वारा पहली बार पुलिस को अपना प्रार्थना पत्र सौंपे जाने से लेकर अब तक 19 दिन गुजर गए लेकिन अब तक कप्‍तान साहिबा नित-नये तरीके निकालकर आरोपी पत्रकार को बचने और पीड़िता व उसके परिवार पर समझौते के लिए दबाव बनाने का पूरा मौका दे रही हैं।
देखा जाए तो इस तरह वह खुद एक आपराधिक कृत्‍य की भागीदार बन रही हैं और आगे जाकर उन्‍हें इसके लिए सक्षम व्‍यक्‍ति के सामने जवाब देना पड़ सकता है लेकिन फिलहाल तो उपमन्‍यु के प्रति उनकी अतिरिक्‍त सहानुभूति, उनकी ड्यूटी एवं कानून से परे जा चुकी है।
आम जनता की बात यदि छोड़ भी दें तो उनके अपने महकमे और यहां तक कि प्रशासनिक अधिकारियों के बीच भी उनकी आरोपी को लेकर बरती जा रही यह अतिरिक्‍त सहानुभति खासी चर्चा का विषय है।
आश्‍चर्य की बात है कि न्‍यूज़ चैनल आजतक की टीम द्वारा अपने कार्यक्रम 'वारदात' के लिए जब उनसे इस बावत बातचीत की गई तो वह आरोपी पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु के प्रति सम्‍मानजनक व आदरसूचक शब्‍दों का इस्‍तेमाल करती नजर आईं।
यही कारण है कि 19 दिन बाद तक एक ओर जहां आरोपी पत्रकार पुलिस की पकड़ से दूर है वहीं दूसरी ओर सारी जरूरी कानूनी प्रक्रिया पूरी हो जाने के बाद भी आरोपी के गुर्गे लगातार पीड़िता व उसके परिवार पर समझौते के लिए दबाव बनाने तथा उन्‍हें लोभ-लालच देकर बरगलाने की कोशिश कर रहे हैं।
वह हर रोज लोगों के बीच एक नई अफवाह फैलाते हैं। कभी कहते हैं इतनी रकम लेकर पीड़िता के पिता ने समझौता कर लिया है और कभी कहते हैं कि आरोपी पत्रकार उपमन्‍यु, रेप पीड़िता से शादी करने जा रहा है।
ताज्‍जुब तो तब होता है जब इन अफवाहों की मौखिक पुष्‍टि खुद को बुद्धि का पुतला मानने वाले पत्रकार भी करते हैं और अपने आप को कानून का विशेषज्ञ समझने वाले परंतु उपमन्‍यु छाप कुछ अधिवक्‍ता भी। उपमन्‍यु के दरबारी बहुत से नेता भी इसमें शामिल हैं।
उन्‍हें यह तक नहीं पता कि अब यह केस जिस मुकाम पर जा पहुंचा है, वहां सुलह-समझौते का फिलहाल कोई रास्‍ता नहीं बचा। जो संकरा सा और बेहद जटिल रास्‍ता बचा भी है तो उसके लिए आरोपी पत्रकार उपमन्‍यु को पहले कोर्ट में ट्रायल फेस करना होगा। जाहिर है कि इसके लिए पहले या तो उसकी गिरफ्तारी होगी या फिर उसे न्‍यायालय में समर्पण करना होगा।
कुल मिलाकर अब उपमन्‍यु के लिए अपने स्‍तर पर अथवा अपने रैकेट का हिस्‍सा रहे तथाकथित उद्योगपतियों, बिल्‍डरों, पत्रकारों, नेताओं, शिक्षा माफियाओं व सफेदपोशों के स्‍तर से निपटा पाना संभव नहीं रहा।
संभव है तो यह कि वह अब उसी अंदाज में इस केस का सामना करे जिस अंदाज में ''आजतक'' के कैमरे का किया था।
उसके गुर्गे और उसके यहां इकठ्ठी होने वाली सफेदपोश चापलूसों की जमात को भी यह बात अब समझ लेनी चाहिए कि जुडीशियरी की दलाली करके, अधिकारियों के साथ बैठकर चाय-नाश्‍ता करके, पैसे के बल पर समाजसेवी का ठप्‍पा लगाकर तथा अपने पेशेगत कर्म का सौदा करके बेशक वह काफी समय से कानून को चकमा देते आ रहे हैं किंतु अब उनके चेहरों से भी नकाब उतरने का समय शुरू हो चुका है।
2014 की विदाई और 2015 का आगमन उनके अब तक के कारनामों का लेखा-जोखा सामने लाने को तैयार है।
बस देखना यह है कि किसका हिसाब-किताब पहले सामने आता है और किसका नंबर बाद में लगता है।
मंजिल सैनी तो आज या कल इस जनपद से रुखसत होंगी ही, और हर अधिकारी मंजिल सैनी हो नहीं सकता।
निश्‍चित ही अब इस जनपद में आने वाले अधिकारी तथाकथित सभ्रांत और सफेदपोशों की जमात का हिस्‍सा बनने से पहले एक बार सोचने पर मजबूर जरूर होंगे।
वह जरूर जानना चाहेंगे कि कुछ खास लोग एक जगह एकत्र होकर क्‍यों उनके जैसे पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों को चाय-नाश्‍ते के साथ मिठाई सर्व करते हैं और क्‍यों फिर चुपके से उनकी क्‍लिपिंग बनवा लेते हैं।
ऐसी क्‍लिपिंग जो आज सोशल मीडिया का हिस्‍सा बनकर कई अधिकारियों एवं सफेदपोशों के बीच नापाक रिश्‍ते का सच तो सामने ला ही रही है, साथ ही तमाम उसी तरह के सवाल भी खड़े कर रही है जिस तरह के सवाल बलात्‍कार के आरोपी कमलकांत उपमन्‍यु, एसएसपी मंजिल सैनी सहित उन लोगों को लेकर उठ रहे हैं जिन्‍हें एक गरीब परिवार की पढ़ी-लिखी लड़की का दर्द कतई महसूस नहीं हुआ लेकिन आरोपी का सच सामने आने की चिंता पहले दिन से सताने लगी थी।
बहरहाल, तमाम दबावों के बाद भी कानून काफी हद तक अपना काम कर चुका है और लोगों में इस आशय का संदेश देने में सफल रहा है कि सफेदपोशों की काली जमात का सच भी देर-सबेर सामने जरूर आयेगा।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष  

गुरुवार, 18 दिसंबर 2014

BSNL के GM का घर और दफ्तर सील

नोएडा। 
नोएडा में आज एक बार फिर छापेमारी के बाद हड़कंप मच गया। इस बार छापा भारतीय संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) के महाप्रबंधक (जीएम) के घर और कार्यालय में मारा गया है। यह छापेमारी केंद्रीय अन्‍वेषण ब्यूरो (सीबीआई) की दो विशेष टीम कर रही हैं।
नोएडा के सेक्टर 19 स्थित बीएसएनएल जीएम के ऑफिस में आज सीबीआई की टीम ने छापा मारा। इस दौरान सीबीआई की करीब पांच लोगों की टीम ने ऑफिस के सभी विभागों के कंप्यूटर स्कैन कर डाटा कॉपी कर लिए।
बीसएसएनएल के सूत्रों के मुताबिक सीबीआई टीम खासतौर पर टेंडर संबंधी फाइलों की जांच-पड़ताल कर रही है। सीबीआई टीम को विभाग के कई कामों में घपलेबाजी की आशंका है।
बीएसएनएल महाप्रंबंधक आदेश कुमार गुप्ता के ऑफिस के साथ ही उनके नोएडा सेक्टर-39 स्थित निवास पर भी छापा मारा गया। वहां सीबीआई की दूसरी टीम पहुंची।
सूत्रों के मुताबिक सीबीआई के वरिष्ठ अधिकारी ने फोन पर सीबीआई टीम को निर्देश दिए हैं कि फाइलों की जांच-पड़ताल के दौरान आदेश कुमार गुप्ता को घर से बाहर बिठाकर रखा जाए। ताकि वह जांच को प्रभावित न कर सकें।
इस बाबत आदेश कुमार गुप्ता को घर के बाहर बैठाकर पूछताछ की जा रही है। जबकि उनके घर पर किसी भी आने-जाने पर रोक लगा दी गई है। मामले पर जब अमर उजाला ने सीबीआई अफसरों बातचीत करनी चाही, तो उन्होंने इसे फाइलों की जांच-पड़ताल संबंधी छापेमारी बताया।
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