गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016

Corruption पर जस्‍टिस चौधरी की टिप्‍पणी: नमक से नमक खाने जैसी नसीहत

justice arun chaudhary of Bombay high court nagpur bench commented over Corruption
अदालत के दरवाजे पर मुकद्दमों की सुनवाई के लिए आवाज लगाने से लेकर अदालत के अंदर बैठे मोहर्रिर और पेशकार तक कौन सा ऐसा कर्मचारी है जो हर व्‍यक्‍ति से रिश्‍वत नहीं वसूलता। फिर चाहे वह वादी हो या प्रतिवादी
बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर बेंच ने Corruption के एक मामले में सुनवाई के दौरान कल इस आशय की गंभीर टिप्‍पणी की कि यदि सरकारी तंत्र Corruption को रोकने में असफल है तो लोगों को टैक्‍स अदा न करके असहयोग आंदोलन छेड़ देना चाहिए।
चूंकि जस्टिस अरुण चौधरी ने यह टिप्‍पणी केस की सुनवाई के चलते की थी इसलिए इसे हाईकोर्ट का आदेश तो नहीं माना जा सकता लेकिन यह जरूर माना जा सकता है कि भ्रष्‍टाचार अब ऐसे पद पर बैठे लोगों को भी लाइलाज बीमारी लगने लगा है जो बहुत कुछ करने में सक्षम हैं। जिनका हर शब्‍द ध्‍यान आकृष्‍ट कराता है और हर टिप्‍पणी अहमियत रखती है।
बेशक न्‍यायालय और न्‍यायाधीशों को सरकारी तंत्र में व्‍याप्‍त खामियों पर टिप्‍पणी करने और आदेश-निर्देश देने का पूरा अधिकार है लेकिन क्‍या कोई न्‍यायालय अथवा न्‍यायाधीश ऐसी ही तल्‍ख टिप्‍पणी अपने यहां फैले बेहिसाब भ्रष्‍टाचार को लेकर करने की हिम्‍मत दिखायेगा।
न्‍यायपालिका इस देश के आम नागरिक की अंतिम आशा है। जब लोगों को चारों ओर से निराशा हाथ लगती है तब भी उसे न्‍यायपालिका से उम्‍मीद बंधी रहती है।
ऐसे में यदि न्‍यायपालिका भी उसी भ्रष्‍टाचार की शिकार हो, जिसे लेकर नागपुर बेंच के जस्‍टिस अरुण चौधरी ने एक गंभीर टिप्‍पणी की है तो लोग क्‍या करें और उससे कैसे निपटें।
कौन नहीं जानता कि आज आम आदमी के लिए किसी भी स्‍तर की न्‍यायपालिका से समय रहते फैसले करा पाना कितना मुश्‍किल है। वो भी तब जबकि तमाम विद्वान न्‍यायाधीश यह मान चुके हैं कि देर से किया गया न्‍याय, किसी अन्‍याय से कम नहीं है। ऐसा न्‍याय न केवल अपनी सार्थकता खो चुका होता है बल्‍कि अनेक सवाल भी खड़े करता है।
माना कि जरूरत से ज्‍यादा काम का बोझ, हर दिन बढ़ता जाता फाइलों का ढेर और व्‍यवस्‍थागत खामियों के कारण समय पर निर्णय देना इतना आसान नहीं है किंतु यदि लाइलाज बीमारी का रूप धारण कर चुके चारों ओर व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार पर यदि कोई जस्‍टिस इतनी गंभीर टिप्‍पणी कर सकते हैं तो न्‍याय व्‍यवस्‍था की खामियों पर भी जरूर कर सकते हैं क्‍योंकि उन खामियों को दूर करना भी उसी तंत्र का काम है, किसी दूसरे का नहीं।
यदि बात करें जिला स्‍तरीय निचली अदालतों की तो वहां भी भ्रष्‍टाचार उसी अनुपात में व्‍याप्‍त है जिस अनुपात में दूसरे भ्रष्‍टतम सरकारी विभागों में फैला हुआ है।
अदालत के दरवाजे पर मुकद्दमों की सुनवाई के लिए आवाज लगाने से लेकर अदालत के अंदर बैठे मोहर्रिर और पेशकार तक कौन सा ऐसा कर्मचारी है जो हर व्‍यक्‍ति से रिश्‍वत नहीं वसूलता। फिर चाहे वह वादी हो या प्रतिवादी
क्‍या विद्वान न्‍यायाधीश उस एक कमरे में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार के इस खुले खेल से अनभिज्ञ हैं जिसे अदालत कहा जाता है और जो न्‍याय का मंदिर कहलाता है।
अपने एकदम बगल में बैठकर खुलेआम रिश्‍वत वसूले जाने का इल्‍म क्‍या विद्वान न्‍यायाधीश को नहीं होता, और यदि नहीं होता तो क्‍या उनके न्‍यायाधीश होने की योग्‍यता पर प्रश्‍नचिन्‍ह नहीं लगाता।
यदि अपने बगल में और एक कमरे के अंदर वसूली जा रही रिश्‍वत को न्‍यायाधीश नहीं रोक सकते तो क्‍या उन्‍हें देश में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार पर टिप्‍पणी करने का कोई नैतिक अधिकार रह जाता है। क्‍या ऐसी न्‍याय व्‍यवस्‍था से न्‍याय की उम्‍मीद की जा सकती है जो अपनी नाक के नीचे हो रहे भ्रष्‍टाचार को रोक पाने में असमर्थ है।
अधिकांश न्‍यायाधीश भी निचली अदालतों से प्रमोशन पाकर उच्‍च और उच्‍चतम न्‍यायालयों तक पहुंचते हैं इसलिए यह नहीं माना जा सकता कि वह निचली अदालतों की भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था से वाकिफ नहीं होते। वह भली-भांति जानते व समझते हैं कि तारीख पर तारीख के खेल का रहस्‍य क्‍या है और कैसे कोई सामर्थ्‍यवान व्‍यक्‍ति किसी मामले को अपने पक्ष में वर्षों-वर्षों तक लटकाये रखने में सफल रहता है।
जिला अदालतों की इस व्‍यवस्‍था से भी शायद ही कोई न्‍यापालिका या न्‍यायाधीश अनभिज्ञ हो जिसके तहत क्‍लैरीकल स्‍टाफ का एक बड़ा हिस्‍सा अवैध रूप से ठेके पर रख लिया जाता है और यह काम कोई अन्‍य नहीं, न्‍यायपालिका के ही कर्मचारी अपनी सुविधा के लिए करते हैं।
यह संभव नहीं है कि अवैध रूप से ठेके पर स्‍टाफ रखने जैसा निर्णय न्‍यायपालिका के द्वितीय श्रेणी कर्मचारी अपने स्‍तर से ले लेते हों, निश्‍चत रूप से इसमें संबंधित न्‍यायाधीशों की मूक सहमति शामिल होती होगी अन्‍यथा आज तक किसी न्‍यायाधीश ने कभी इस पर टिप्‍पणी क्‍यों नहीं की।
आम आदमी से इस बावत यदि कोई न्‍यायाधीश उसकी प्रतिक्रिया पूछने बैठें तो उन्‍हें साफ-साफ पता लग सकता है कि वो क्‍या सोचता है।
अदालत की चारदीवारी से बाहर किसी को भी यह कहते सुना जा सकता है कि यहां की तो ईंट-ईंट पैसा मांगती है…और यह भी कि कर्मचारियों द्वारा अदालत के अंदर उगाहे गए पैसों से ”साहब” की भी किचन का खर्चा चलता है।
जो भी हो, लेकिन इसमें शायद ही किसी की राय भिन्‍न होगी कि अदालतों की ईंट-ईंट पैसा मांगती है और तारीख लेने से लेकर न्‍याय पाने तक के लंबे रास्‍ते में पैसों का ढेर ही अंतत: काम आता है। फिर चाहे यह पैसा वकीलों के माध्‍यम से आता-जाता हो अथवा किसी अन्‍य माध्‍यम से।
ऐसा नहीं है कि समूची न्‍यायपालिकाएं और हर वकील इस व्‍यवस्‍था का हिस्‍सा हों या वो इसे स्‍वेच्‍छा से स्‍वीकार कर रहे हों। न्‍यायाधीशों और अधिवक्‍ताओं का एक हिस्‍सा भी इस व्‍यवस्‍था से बेहद दुखी और परेशान है लेकिन वह संख्‍याबल के सामने मजबूर हैं।
संख्‍याबल का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि आज यदि कोई किसी जिला अदालत में मौजूद कुल न्‍यायाधीशों की संख्‍या में से ईमानदार अधिकारियों का नाम पूछने बैठ जाए तो पता लगेगा कि एक हाथ की कुल चार उंगलियों तक पहुंचना मुश्‍किल हो जायेगा। ज्‍यादातर जिला अदालतों में वर्तमान भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था के हिमायतियों की संख्‍या, ईमानदार अधिकारियों को बहुत पीछे छोड़ देगी। जाहिर है कि ऐसे अधिकारियों से न्‍याय पाने के लिए अधिवक्‍ताओं को भी उन्‍हीं के ढर्रे पर चलना पड़ता है अन्‍यथा न वकालत चलेगी और न वकील। दोनों के लिए काले कोट की पहचान बना पाना असंभव हो जायेगा।
भ्रष्‍टाचार के इस खेल में रही-सही कसर वहां पूरी हो जाती है जहां न्‍यायाधीशों के विशेष अधिकार, उनका विवेक और चुनौतियों से परे उनके कर्तव्‍य आड़े आ जाते हैं। वहां आम आदमी हो या खास, सब बेबस होते हैं।
कहने के लिए पूरी न्‍याय प्रक्रिया वादी और प्रतिवादी के लिए तय नियम-कानूनों से भरी पड़ी है किंतु जब बात आती है न्‍यायाधीशों के विशेष अधिकार की, स्‍व विवेक से निर्णय लेने की तो वहां किसी की नहीं चलती। इन्‍हीं विशेषाधिकारों तथा स्‍व विवेकी निर्णयों में ”बहुत कुछ” निहित है। वो न्‍याय व्‍यवस्‍था भी जिसकी अंतिम आशा प्रत्‍येक वादी-प्रतिवादी को होती तो है किंतु जो उसे हासिल नहीं है।
जहां तक प्रश्‍न Bombay high court की नागपुर बेंच के न्‍यायाधीश अरुण चौधरी की Corruption को लेकर की गई टिप्‍पणी का है तो नि:संदेह उनकी टिप्‍पणी व्‍यवस्‍थागत खामियों की भयावहता को उजागर करती है लेकिन उसमें उनकी निजी भावनाओं का समावेश अधिक है, अपेक्षाकृत वास्‍तविकता के क्‍योंकि वास्‍तव में न आम आदमी टैक्‍स देना बंद कर सकता है और न वर्तमान व्‍यवस्‍थाएं भ्रष्‍टाचार के भस्‍मासुर से निपटने की क्षमता रखती हैं।
हो सकता है तो केवल इतना कि आम आदमी के असहयोग आंदोलन से रही-सही व्‍यवस्‍थाओं पर भी अव्‍यवस्‍थाएं हावी हो जाएं। समाज निरंकुश हो जाए और अराजकता पूरे सिस्‍टम पर हावी हो जाए।
व्‍यवस्‍था से आजिज कोई भी शख्‍स या संस्‍था जब कानून-व्‍यवस्‍था को अपने हाथ में ले लेता है अथवा अपने हिसाब से उसका आंकलन करने लगता है तो उसके गंभीर परिणाम देश व समाज दोनों को भुगतने पड़ते हैं।
बेहतर होगा कि न्‍यायपालिकाएं और न्‍यायाधीश भी भ्रष्‍टाचार जैसी गंभीर समस्‍या को न तो सिर्फ सरकारी तंत्र तक सीमित करके देखें और न सिर्फ टिप्‍पणी करके अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर लें।
यदि वाकई भ्रष्‍टाचार को लेकर वो व्‍यथित हैं और इसे कम करना चाहते हैं तो शुरूआत अपने अधिकार और कर्तव्‍यों से करें।
सरकार का हर तंत्र और तंत्र की छोटी से छोटी इकाई जब तक इसकी शुरूआत अपने यहां से नहीं करेगी, तब तक जस्‍टिस अशोक चौधरी जैसे अधिकारियों की टिप्‍पणियों के कोई मायने नहीं होंगे। कोई परिवर्तन नहीं आयेगा। किसी के कानों पर जूं नहीं रेंगेगी, क्‍योंकि एक कड़वा सच यह भी है कि नमक से नमक नहीं खाया जा सकता।
भ्रष्‍टाचार में आकंठ डूबकर भ्रष्‍टाचार मिटाने की बात करना हास्‍यास्‍पद प्रतीत होता है, चाहे वह बात न्‍यायपालिका के स्‍तर से ही क्‍यों न कही गई हो।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

मंगलवार, 19 जनवरी 2016

UP चुनाव: 2017 को लेकर राजनैतिक दलों में उत्‍साह किंतु जनता निरुत्‍साह

2017 में होने वाले उत्‍तर प्रदेश विधानसभा चुनावों की दुंदुभि बज चुकी है। भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस सहित रालोद ने भी अपनी-अपनी चालें चलना शुरू कर दिया है। समाजवादी पार्टी जहां फिर से सत्‍ता पर काबिज होने का ख्‍वाब पाले बैठी है वहीं बहुजन समाज पार्टी अपनी खोई हुई सत्‍ता हासिल करना चाहती है। भारतीय जनता पार्टी स्‍वर्णिम दिन लौटने की आश में नित-नए जतन कर रही है और कांग्रेस को उम्‍मीद है कि उसके पक्ष में कोई चमत्‍कार हो न हो परंतु वह बिहार चुनावों की तरह सम्‍मानजनक स्‍थान बना सकती है। इधर राष्‍ट्रीय लोकदल भी किसी न किसी के सहारे अपनी जमीन पा लेने की जुगत में है।
मथुरा, काशी, विश्‍वनाथ…तीनों लेंगे एकसाथ का नारा एकबार फिर आकर्षक पैक में बुलंद किया जाने लगा है।
मथुरा में फिलहाल भाजपा का एक भी विधायक नहीं है। कुल पांच विधायकों में से आज की तारीख में तीन बसपा के खेमे में हैं जबकि एक कांग्रेस तथा एक रालोद के पास है।
सत्‍ताधारी समाजवादी पार्टी कभी यहां अपना खाता खोलने में सफल नहीं रही। न लोकसभा में और न विधानसभा में।
नरेन्‍द्र मोदी की हवा के चलते 2014 के लोकसभा चुनावों में गुजरे जमाने की ड्रीमगर्ल हेमा मालिनी ने भाजपा की टिकट पर चुनाव जरूर जीत लिया किंतु जीत दर्ज करने के बाद से वह ”जनता जनार्दन” की जगह एक दूसरे ही जनार्दन पर भरोसा किए बैठी हैं।
जहां तक बतौर सांसद हेमा मालिनी की मथुरा के लिए उपलब्‍धियों का सवाल है तो वह जुबानी जमाखर्च ज्‍यादा हैं, हकीकत कम। कागजी घोड़े तो दौड़ाए जा रहे हैं किंतु उनका नतीजा उल्‍लेखनीय नहीं है।
कृष्‍ण की जन्‍मभूमि के वासियों का आयातित जनप्रतिधियों को लेकर पूर्व में भी अनुभव अच्‍छा नहीं रहा है। बात चाहे मनीराम बागड़ी की हो या डॉ. सच्‍चिदानंद हरि साक्षी की, जयंत चौधरी की हो अथवा हेमा मालिनी की। मथुरा की जनता को सभी ने निराश किया और यही कारण है कि साक्षी महाराज को छोड़कर इनमें से कोई यहां दोबारा जीत दर्ज नहीं कर पाया।
मथुरा की जनता को कभी जवाहर लाल नेहरू नेशनल अरबन रिन्‍यूअल मिशन के नाम पर ठगा गया तो कभी एनसीआर में शामिल कराने के नाम पर। कभी तीर्थस्‍थल घोषित कराने की आड़ लेकर जनभावनाओं का दोहन किया गया और कभी यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने के बहाने।
हेमा मालिनी के लिए मथुरा में वोट मांगने आए नरेन्‍द्र मोदी ने भी यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने का वादा स्‍थानीय जनता से किया था किंतु सत्‍ता पर काबिज होने के 20 महीनों बाद तक यमुना की दयनीय दशा में कोई सुधार नहीं हुआ। हुआ है तो केवल इतना कि यमुना 2014 के बाद से कुछ और अधिक मैली हो गई है।
यूं यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने का संकल्‍प राष्‍ट्रीय लोकदल के युवराज जयंत चौधरी ने भी लिया था लेकिन वह यमुना तो दूर, मथुरा की ओर भी मुंह करके सोना भूल गए।
अब मथुरा-वृंदावन को हैरिटेज सिटी बनाने का शिगूफा छोड़ा गया है लेकिन यमुना के शुद्धीकरण की कोई योजना नहीं है।
कृष्‍ण जन्‍मभूमि से चंद कदमों की दूरी पर इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश-निर्देशों की खुलेआम धज्‍जियां उड़ाकर हर दिन अनगिनित पशुओं का कत्‍ल किया जाता है। इन पशुओं का रक्‍त नाले-नालियों के जरिए सीधे यमुना में जाकर गिरता है। शराब और मांस की बिक्री पर भी कोई पाबंदी नहीं है।
सड़कें बदहाल हैं और ऊपर से हर रोज लगने वाला जाम, आम व खास… हर आदमी को बेहाल किए हुए है। ताज ट्रपेजियम जोन में होने के बावजूद बिजली के न आने का कोई समय निर्धारित है और न जाने का। हल्‍की ठंड के इस दौर में भी हर रोज कई-कई घंटों के लिए बिजली की अघोषित कटौती की जाती है।
अगर बात करें पूरे सूबे की तो हर जिले का कमोबेश यही हाल है। समाजवादी कुनबे के लिए विशिष्‍ट स्‍थान रखने वाले कुछ जिलों की बात यदि छोड़ दें तो पूरे प्रदेश में बिजली, पानी, सड़क व यातायात व्‍यवस्‍था करीब-करीब एक जैसी है। कानून-व्‍यवस्‍था मजाक बनकर रह गई है।
ऐसा नहीं है कि इसका संबंध सिर्फ और सिर्फ समाजवादी पार्टी की सरकार से हो, इससे पहले भी उत्‍तर प्रदेश में जो भी पार्टी सत्‍ता पर काबिज रही, उसने कुछ ऐसा काम नहीं किया जिससे उत्‍तर प्रदेश में कोई आमूल-चूल परिवर्तन हुआ हो।
यही कारण है कि उत्‍तर प्रदेश की स्‍थिति हर चुनाव के बाद बद से बदतर होती गई जबकि सत्‍ता पर काबिज होने वाले दलों की माली हालत में अभूतपूर्व सुधार हुआ। सपा और बसपा के नेताओं पर आय से अधिक संपत्‍ति के केस लंबित होना इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। इस बीच कभी माया की मूर्तियां सुर्खियों में रही तो कभी यादवों का यादव सिंह। इस सबके अलावा यूपी जहां थी, वहीं है। फर्क केवल इतना है कि बसपा के शासन में रिजर्व कोटे के अधिकारियों की तूती बोलने लगती है और समाजवादी पार्टी के रहते यादवों की।
इन्‍हीं सब कारणों से 2017 के विधानसभा चुनावों को लेकर आम जनता में कोई उत्‍साह दिखाई नहीं दे रहा जबकि राजनीतिक दलों ने कमर कसनी शुरू कर दी है। हालांकि चुनावों में अभी करीब सवा साल शेष है लेकिन लगता नहीं कि जनता में कोई उत्‍साह पैदा हो सकेगा।
जनता में उत्‍साह पैदा होने की संभावना इसलिए क्षीण दिखाई देती है कि उन्‍हीं दलों की दलदल है और वही नेता हैं। वही नीतियां हैं और वही कार्यपद्धति। सूरतें बदल जाती हैं किंतु सीरतें नहीं बदलतीं।
2017 से भी लोगों को कोई ऐसी उम्‍मीद नहीं रही जिसे लेकर उत्‍तर प्रदेश के उत्‍तम प्रदेश की ओर कदम बढ़ते दिखाई दें।
समाजवादी पार्टी सत्‍ता से बेदखल हो जाए या बनी रहे। बसपा आ जाए या न आए। भाजपा एक बार और सत्‍ता पर काबिज हो जाए अथवा रालोद किसी के साथ नया गठबंधन कर ले, जनता को क्‍या फर्क पड़ने वाला है। जन आकांक्षाओं पर खरा उतरने की परवाह किसी को नहीं।
सभी राजनीतिक दल जानते हैं कि जनता विकल्‍पहीन है और उनके पास विकल्‍प ही विकल्‍प हैं। संविधान प्रदत्‍त अधिकार हों या कर्तव्‍य, राजनीतिक दलों के लिए वह वरदान हैं जबकि जनता के लिए वह अभिषाप बनकर रह गए हैं।
ऐसे में 2017 के चुनाव सत्‍ता परिवर्तन के लिए बेशक अहमियत रखते हों किंतु व्‍यवस्‍था परिवर्तन की कोई उम्‍मीद दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती।
जनता के पास रहेगा तो यही रटा-रटाया जुमला कि कोऊ नृप होय, हमें का हानि। वो जिस हाल में 2012 में थी, 2007 में थी, उसी हाल में 2017 के बाद भी रहेगी।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी

मंगलवार, 12 जनवरी 2016

45 हजार करोड़ के Pearl Group घोटाले की जांच में युवी और भज्‍जी शामिल!

Pearl Group Scam: are yuvi and bhajji involve ?
नई दिल्‍ली। 45 हजार करोड़ के Pearl Group घोटाले की जांच में क्रिकेटर युवराज सिंह और हरभजन सिंह के नाम सामने आए हैं। पर्ल ग्रुप घोटाले की जांच अब तेज हो गई है और इसमें कई फिल्मी सितारों सहित क्रिकेटरों पर भी शिकंजा कस सकता है।
घोटाले की जांच कर रहे ईडी और सीबीआई उन हस्तियों की लिस्ट तैयार कर रही है जिन्हें पर्ल कंपनी से फायदा मिला।
खेल जगत से अब तक इस जांच में युवराज सिंह और हरभजन सिंह के नाम सामने आए हैं। बता दें कि इन दोनों ही खिलाड़ियों को कंपनी ने प्लाट गिफ्ट लिए थे।
पर्ल ग्रुप के चेयरमैन निर्मल सिंह भंगू समेत पर्ल ग्रुप के चार गिरफ्तार अधिकारियों से पूछताछ में पता चला है कि घोटाले की एक बड़ी रकम आईपीएल मैचों के जरिए क्रिकेटरों और फिल्म स्टारों पर खर्च की गई। जांच के दौरान यह भी पता चला है कि पर्ल ग्रुप ने आईपीएल 4 के अलावा सुपर फाइट लीग और गोल्फ प्रीमियर लीग और कबड्डी में पैसे लगाए थे।
आरोप हैं कि पर्ल ग्रुप ने एक-दो नहीं बल्कि एक हजार से अधिक सिस्टर कंपनियों के माध्यम से देश भर में जमीनों की खरीद- फरोख्त की है।
गौरतलब है कि पर्ल ग्रुप के सीएमडी निर्मल सिंह भंगू और कंपनी के तीन शीर्ष अधिकारी सीबीआई हिरासत में हैं। उन्हें 10 जनवरी को दिल्ली में मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया जहां से अदालत ने निर्मल सिंह भंगू और तीनों बड़े अधिकारियों को 19 जनवरी तक सीबीआई की हिरासत में भेज दिया।

शुक्रवार, 25 दिसंबर 2015

टके-टके पर बिक रही हैं अखबारों की नीति और नैतिकता

This night have Not any morningआगरा से प्रकाशित दैनिक हिन्‍दुस्‍तान अखबार के कल यानि 22 दिसंबर 2015 के अंक में फ्रंट पेज पर एक विज्ञापन प्रकाशित किया गया है। आधे पेज के इस विज्ञापन का मजमून कुल इतना है कि ”22 दिसंबर है साल की सबसे लंबी रात”। इसे दें कुछ एक्‍स्‍ट्रा टाइम।
इन लाइनों के नीचे एक ”कपल” का ”संभोगरत” चित्र है और उसके नीचे लिखा है-”इस रात की सुबह नहीं”। दरअसल, यह विज्ञापन ”कोहेनूर कॉन्‍डोम” का है।
”हिन्‍दुस्‍तान टाइम्‍स” समूह का यह हिंदी अखबार देश के न केवल सबसे पुराने अखबारों में से एक है बल्‍कि इसके प्रधान संपादक ”शशि शेखर” अक्‍सर अपने लेखों में नीति और नैतिकता की बड़ी-बड़ी नसीहतें अन्‍य दूसरे अखबार के संपादकों से कहीं अधिक देते नजर आते हैं।
बेशक आज लगभग हर बड़े अखबार का संपादक अपने मालिकों की व्‍यावसायिक जरूरतों के सामने अपनी नीति-नैतिकता को ताक पर रखकर ही काम करने के लिए मजबूर होता है किंतु दैनिक हिन्‍दुस्‍तान के प्रधान संपादक शशि शेखर अपने हर लेख में खुद को दूसरे संपादकों तथा मीडिया कर्मियों से इतर साबित करने का प्रयास करते हैं।
ऐसे में सवाल यह पैदा होता है कि क्‍या अपनी नौकरी बचाए रखने तथा मालिकों के लिए एक अदद अश्‍लील विज्ञापन से होने वाली आय के लिए शशि शेखर जैसे लोग किसी भी हद तक जा सकते हैं?
वैसे हिन्‍दुस्‍तान अखबार या उसके संपादक शशि शेखर, प्रिंट मीडिया की दुनिया में कोई अपवाद नहीं हैं क्‍योंकि तमाम तथाकथित बड़े अखबार यही सब कर रहे हैं किंतु क्‍या इसे केवल इसलिए जायज ठहराया जा सकता है कि दूसरे अखबार यह सब कर रहे हैं तो दैनिक हिन्‍दुस्‍तान क्‍यों नहीं कर सकता।
छपे हुए शब्‍दों का बहुत सम्‍मान होता है, अपेक्षाकृत बोले हुए शब्‍दों के। अखबार में विज्ञापन छापने की भी अपनी गाइड लाइंस हैं और उनका पालन करना हर अखबार के प्रकाशक और संपादक की जिम्‍मेदारी है। गाइड लाइंस का अतिक्रमण करना अपराध की श्रेणी में आता है और इसके लिए प्रकाशक व संपादक दोनों जिम्‍मेदार माने जाते हैं।
इस सबके अलावा भी फिल्‍मों में आपत्‍तिजनक सीन पर हो-हल्‍ला मचाने से लेकर विधानसभा में किसी विधायक द्वारा अपने मोबाइल पर ‘पोर्न’ देखने तक पर हंगामा काटने वाले अखबार नवीस क्‍या चंद रुपयों के विज्ञापन की खातिर सारी नीति-नैतिकता भूल जाते हैं।
सामाजिक सुधार के ठेकेदार ऐसे अखबार मालिकों और संपादकों से क्‍या कोई यह पूछ सकता है कि एक अदद विज्ञापन के पैसों में बिकने वाली उनकी नीति-नैतिकता आखिर समाज को क्‍या सिखा रही है और किस आधार पर वह समाज में बढ़ रहे यौन अपराधों के लिए केवल व्‍यवस्‍थागत खामियों को दोष देने का काम करते हैं।
पहले पन्‍ने की बात यदि छोड़ दें और अधिकांश तथाकथित बड़े अखबारों के अंदर छपने वाले क्‍लासीफाइड विज्ञापनों के पन्‍ने को देखें तो भी ऐसा लगता है जैसे वह अखबार न होकर उस आम सड़क की दीवार हों, जिस पर कोई भी कुछ भी प्रचारित करने के लिए स्‍वतंत्र है।
”छोटा लिंग निराश क्‍यों…लिंगवर्धक यंत्र फ्री…जैसे विज्ञापनों से भरे हुए इन अधिकांश तथाकथित बड़े अखबारों के पन्‍ने वशीकरण, जादू-टोने, तंत्र-मंत्र आदि के शर्तिया इलाज का भी भरपूर प्रचार-प्रसार करते हैं और महिला दोस्‍त बनाने वालों के विज्ञापन छापकर सैक्‍स रैकेट चलाने वालों की भी पूरी मदद करते हैं।
हालांकि यह सारे काम देश का इलैक्‍ट्रॉनिक मीडिया भी बखूबी कर रहा है लेकिन प्रिंट मीडिया इसके लिए ज्‍यादा जिम्‍मेदार इसलिए है क्‍योंकि आज भी प्रिंट मीडिया को इलैक्‍ट्रॉनिक मीडिया की अपेक्षा अधिक विश्‍वसनीयता हासिल है।
मीडिया की स्‍वतंत्रता उस अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता का हिस्‍सा है जो संविधान प्रदत्‍त अधिकारों की श्रेणी में आती है किंतु इसका यह अर्थ कतई नहीं कि स्‍वतंत्रता की आड़ लेकर मीडिया अपने अधिकारों का अतिक्रमण व्‍यावसायिक हित साधने के लिए करने लगे।
सच तो यह है कि ऐसा करने वाले मीडिया हाउसेस उस आम आदमी से कहीं ज्‍यादा बड़े अपराधी हैं जो अपने गैरकानूनी कार्यों को जायज ठहराने के लिए मजबूरी का सहारा लेता है या फिर सारा दोष व्‍यवस्‍था के माथे मढ़ देता है।
पैसा कमाने के लिए अखबार के पहले पन्‍ने पर भी अश्‍लील विज्ञापन छापने से परहेज न करने वाले अखबार मालिक समाज में तेजी से फैल रहे यौन अपराधों के लिए उतने ही जिम्‍मेदार हैं जितने कि दूसरे असामाजिक तत्‍व।
समय की मांग है कि जनहित में ऐसे अखबार मालिकों के खिलाफ स्‍वत: संज्ञान लेते हुए एक ओर जहां सरकार को कठोर कदम उठाने चाहिए वहीं दूसरी ओर प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया को भी इनके खिलाफ सख्‍त कार्यवाही अमल में लानी चाहिए ताकि अखबारों को विज्ञापन की आड़ में सस्‍ती कामुक सामग्री परोसने से रोका जाए और अखबार अपनी मान-मर्यादा को इतना न गंवा दें कि लोग घरों में अखबार मंगाने से परहेज करने लगें।
-लीजेंड न्‍यूज़ विशेष

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

बीएड फर्जीवाड़े में जेल जायेंगे मथुरा के भी 20 से अधिक कॉलेज संचालक

-एसआईटी ने कर ली है पूरी जन्‍मकुंडली तैयार -पाई-पाई का हिसाब निकाला और यह भी पता कर लिया कि कैसे पहुंचे ये फर्श से अर्श तक जो समय बीत रहा है, वही बीत रहा है लेकिन इतना तय है कि डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्‍वविद्यालय के बीएड फर्जीवाड़े में शामिल मथुरा के कई कॉलेज संचालक भी अब जेल जाने से बच नहीं पायेंगे।इस फर्जीवाड़े के तहत देश के शिक्षा जगत में अब तक की सबसे बड़ी आपराधिक कानूनी कार्यवाही होने जा रही है।
कोर्ट के आदेश पर जून 2014 से इस फर्जीवाड़े की जांच एसआईटी (विशेष जांच दल) द्वारा जब शुरू की गई तो पता लगा कि इसमें आगरा के डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्‍वविद्यालय से संबद्ध 83 कॉलेज लिप्‍त रहे हैं।
इन कॉलेजों ने विश्‍वविद्यालय के अधिकारी एवं कर्मचारियों के साथ मिलकर 3670 फर्जी रोल नंबर जेनरेट कर दिए और उनके माध्‍यम से जारी बीएड की फर्जी मार्कशीट पर 2700 लोगों को सरकारी शिक्षक की नौकरी भी मिल गई।
इस दुस्‍साहसिक फर्जीवाड़े में एसआईटी ने डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्‍वविद्यालय के दो पूर्व कुलपतियों, कुलसचिवों, शिक्षकों, कर्मचारियों और कॉलेज संचालकों सहित 4000 लोगों को आरोपी बनाया है।
इन घोटालेबाजों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही में जो विलंब हो रहा है, वह सिर्फ इसलिए क्‍योंकि एसआईटी पहले अपनी रिपोर्ट हाई कोर्ट में पेश करेगी और उसके बाद कार्यवाही आगे बढ़ायेगी।
एसआईटी की जांच में जिन जिलों के कॉलेज संचालकों का नाम सामने आया है उनमें एटा, मैनपुरी, फिरोजाबाद, बागपत तथा मेरठ सहित मथुरा का नाम प्रमुख है।
गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों के अंदर शिक्षा का व्‍यवसाय एक ऐसा व्‍यवसाय बन चुका है जिसमें सर्वाधिक लाभ दिखाई देता है। खुद को शिक्षाविद् कहने वाले शिक्षा माफिया ने पैसे की खातिर इस व्‍यवसाय को इतना नीचे गिरा दिया कि आज शिक्षा व्‍यवसाई घृणा के पात्र बन गए हैं।
बात करें यदि मथुरा सहित आगरा मंडल की तो शिक्षण संस्‍थाओं का सर्वाधिक प्रसार इसी क्षेत्र में हुआ क्‍योंकि कभी आगरा यूनीवर्सिटी के नाम से आगरा मंडल ही नहीं संपूर्ण उत्‍तर प्रदेश के शिक्षा जगत को गौरवान्‍वित करने वाली यही यूनिवर्सिटी अब पूरी तरह शिक्षा माफिया के जाल में फंस चुकी थी।
आगरा यूनिवर्सिटी से डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्‍वविद्यालय में तब्‍दील होने के बाद से तो जैसे इस यूनिवर्सिटी को ग्रहण ही लग गया और देखते-देखते यह फर्जीवाड़े तथा घोटालों का पर्याय बन गई।
निश्‍चित रूप से एक गौरवशाली शिक्षण संस्‍था को इस हाल तक पहुंचाने में शासन व प्रशासन का भी भरपूर हाथ रहा क्‍योंकि वह उसकी ओर से पूरी तरह आंखें बंद किए रहे।
शासन-प्रशासन की इस अनदेखी का परिणाम यह रहा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्‍वविद्यालय भ्रष्‍टाचार का पर्याय बन गया और इसका लाभ उठाकर इससे संबद्ध कॉलेज संचालकों ने फर्जीवाड़ा करके करोड़ों रुपए एकत्र कर लिए।
अकेले बीएड के जरिए ही जिन कॉलेज संचालकों ने करोड़ों की संपत्‍ति अर्जित की है, उनमें मथुरा के कॉलेज संचालकों का नाम टॉप पर है।
ये वो कॉलेज संचालक हैं जिनकी कल तक हैसियत स्‍कूटर पर चलने लायक नहीं थी किंतु डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्‍वविद्यालय के अधिकारी व कर्मचारियों की कृपा से आज यह कई-कई लग्‍ज़री गाड़ियां तो निजी तौर पर इस्‍तेमाल करते हैं जबकि कॉलेज के नाम पर दर्जनों गाड़ियां खड़ी कर रखी हैं।
एसआईटी जांच से जुड़े सूत्रों के अनुसार जिन 83 कॉलेजों की इस फर्जीवाड़े में संलिप्‍तता पाई गई है, उनमें मथुरा के कई कॉलेज शामिल हैं।
सीधे-सीधे कहें तो इस घोटाले में मथुरा का करीब-करीब हर वो कॉलेज संचालक संलिप्‍त पाया गया है जो डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्‍वविद्यालय से बीएड करा रहा था। एसआईटी के अधिकारियों की मानें तो मथुरा का शायद ही कोई कॉलेज संचालक इस घोटाले में संलिप्‍त न रहा हो।
इन कॉलेजों की संख्‍या 20 से ऊपर बताई जा रही है जो चौमुहां, सैदपुर (बल्‍देव), छाता, कोसी खुर्द (भरतपुर रोड मथुरा), सदर बाजार, फरह, पाली डूंगरा, राया, गोवर्धन चौराहा मथुरा, सेमरी (छाता), शिवपुरी (बाजना), चंदनवन (हाईवे थाना क्षेत्र), महुअन, महावन, मुंडेसी और वृंदावन आदि क्षेत्रों में स्‍थित हैं।
चूंकि इस अरबों रुपए के घोटाले तथा फर्जीवाड़े की जांच उच्‍च न्‍यायालय के आदेश पर एसआईटी द्वारा की गई थी इसलिए उम्‍मीद की जा रही है कि शायद ही कोई घोटालेबाज अब इसकी गिरफ्त में आने से बच पायेगा।
ऐसे में यदि अन्‍य जनपदों सहित बड़ी तादाद में मथुरा के भी तथाकथित सभ्रांत कहलाने वाले कॉलेज संचालक हथकड़ियां पहने नजर आएं तो कोई आश्‍चर्य नहीं होगा क्‍योंकि एसआईटी ने उनकी पाई-पाई का हिसाब निकाल लिया है और यह भी मालूम कर लिया है कि चंद वर्षों के अंदर ये फर्श से अर्श तक आखिर पहुंचे कैसे?
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 14 नवंबर 2015

पेट्रोल तथा डीजल की तस्‍करी को बढ़ावा दे रही है अखिलेश सरकार

-वैट की असंगत नीति के चलते यूपी में पेट्रोल व डीजल दूसरे राज्‍यों से काफी महंगा
-बॉर्डर के पेट्रोल पंप संचालक भी तस्‍करी का पेट्रोल-डीजल बेचने पर मजबूर
-उत्तर प्रदेश पेट्रोलियम ट्रेडर्स एसोसिएशन ने मुख्य सचिव के सामने उठाया मुद्दा
-जुलाई में भी पेट्रोलियम ट्रेडर्स एसोसिएशन ने की थी हड़ताल
क्‍या आपको मालूम है कि अखिलेश यादव के नेतृत्‍व वाली समाजवादी पार्टी की सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर वैल्‍यू एडड टैक्‍स यानि वैट की जिस पॉलिसी को अपना रखा है उसके कारण उत्‍तर प्रदेश में पेट्रोल तथा डीजल की न सिर्फ कीमतें देश के अधिकांश राज्‍यों से काफी अधिक हैं बल्‍कि इसी कारण यहां पड़ोसी राज्‍यों से इन पदार्थों की बड़े पैमाने पर तस्‍करी की जा रही है।
पड़ोसी राज्‍यों हरियाणा, राजस्‍थान और दिल्‍ली में उत्‍तर प्रदेश की अपेक्षा पेट्रोल व डीजल की कीमतें काफी कम होने के कारण इन पदार्थों की सर्वाधिक तस्‍करी इन राज्‍यों से की जा रही है और उसका खामियाजा भुगत रहे हैं इन राज्‍यों की सीमा पर स्‍थापित पेट्रोल व डीजल पंपों के अधिकृत विक्रेता।
गत माह जुलाई में उत्‍तर प्रदेश के करीब 6300 पेट्रोल पंप संचालकों ने इस मुद्दे को लेकर हड़ताल भी की थी किंतु उसका कोई प्रभाव सरकार पर नहीं पड़ा लिहाजा उत्तर प्रदेश पेट्रोलियम ट्रेडर्स एसोसिएशन ने मुख्य सचिव आलोक रंजन के साथ हुई बैठक के दौरान फिर इस मुद्दे को उठाया है।
दरअसल, 22 जुलाई को उत्‍तर प्रदेश सरकार ने अपने एक निर्णय द्वारा पेट्रोल और डीजल पर प्रति लीटर वैट निर्धारित कर दिया जो इन पदार्थों की बेस कीमत का क्रमश: 26.8 प्रतिशत तथा 17. 5 प्रतिशत बैठता है।
इसके अलावा मथुरा रिफाइनरी को कच्‍चे तेल की सप्‍लाई लेने पर 5 प्रतिशत प्रवेश अलग से देना होता है। इस तरह उत्‍तर प्रदेश में पेट्रोल व डीजल उपभोक्‍ताओं को प्रति लीटर क्रमश: करीब 18 प्रतिशत तथा 11 प्रतिशत टैक्‍स देना पड़ता है जो दूसरे राज्‍यों से काफी अधिक है और जिस कारण यहां पेट्रोल व डीजल के दाम पड़ोसी राज्‍यों से भी बहुत ज्‍यादा हैं।
उत्‍तर प्रदेश सरकार की इस नीति का तेल माफिया जमकर लाभ उठा रहे हैं और वो पड़ोसी राज्‍यों से उत्‍तर प्रदेश में पेट्रोल व डीजल की तस्‍करी करके करोड़ों रुपए कमाने में लगे हैं जबकि उत्‍तर प्रदेश के बॉर्डर वाले पेट्रोल पंप संचालक या तो हाथ पर हाथ रखकर बैठने पर मजबूर हैं या फिर तस्‍करी का तेल बेचने को बाध्‍य हैं।
यूपी के बॉर्डर पर पेट्रोल पंप संचालित करने वाले लोगों का कहना है कि वैट की असंगत नीति के कारण पड़ोसी राज्‍यों की तुलना में यूपी के अंदर पेट्रोल और डीजल की कीमतें इतनी अधिक ज्‍यादा हो जाती हैं कि वह हमें प्रति लीटर मिलने वाले कुल लाभ से भी पांच-पांच, छ:- छ: गुना अधिक बैठती हैं। इन हालातों में तेल माफिया का सक्रिय होना तथा पेट्रोल पंप संचालकों का उन्‍हें सहयोग करना स्‍वाभाविक है।
देश की प्रमुख तेल कम्पनियों ने भी अपनी रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया है कि उत्‍तर प्रदेश के सीमावर्ती राज्‍यों विशेषकर राजस्‍थान, हरियाणा तथा दिल्‍ली से तेल माफियाओं ने उत्‍तर प्रदेश में खुलेआम पेट्रोल की बिक्री शुरू कर दी है जिससे यूपी के बॉर्डर वाले पंपों पर तेल की बिक्री न के बराबर हो रही है.
गौरतलब है कि उत्‍तर प्रदेश में आने वाला कच्चा तेल सबसे पहले मथुरा रिफाइनरी को मिलता है और इसके बाद यहां से पेट्रोल व डीजल तैयार होकर प्रदेशभर को सप्‍लाई किया जाता है.
पेट्रोल पंपों पर तेल की बिक्री के दौरान उपभोक्‍ताओं से वह पांच फीसदी प्रवेश कर भी वसूला जाता है जिसे मथुरा रिफाइनरी कच्‍चे तेल पर चुकाती है. इस प्रकार उत्‍तर प्रदेश के उपभोक्‍ताओं को पेट्रोल व डीजल की सर्वाधिक कीमत चुकानी पड़ती है.
आश्‍चर्य की बात यह है कि महंगाई नियंत्रित न हो पाने के लिए आये दिन केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करने वाली यूपी की अखिलेश सरकार इस मामले में न तो उत्तर प्रदेश पेट्रोलियम ट्रेडर्स एसोसिएशन की बात सुन रही है और न इस बात पर ध्‍यान दे रही है कि वैट को लेकर उसकी असंगत नीति के चलते पेट्रोलियम पदार्थों की तस्‍करी बढ़ रही है तथा बॉर्डर पर स्‍थित पेट्रोल पंप संचालकों को उसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।
यही नहीं, वैट की इस असंगत नीति के चलते दूसरे राज्‍यों से हो रही पेट्रोल व डीजल की तस्‍करी के कारण प्रदेश सरकार के खजाने को भी चूना लग रहा है लेकिन लगता है कि अखिलेश सरकार जायज वैट के जरिए अच्‍छा राजस्‍व हासिल करने की जगह नाजायज वैट लगाकर तेल माफियाओं को लाभान्‍वित करना ज्‍यादा मुनासिब समझ रही है।
कहीं ऐसा न हो कि अखिलेश सरकार की तेल माफियाओं को सीधा लाभ पहुंचाने तथा तेल की तस्‍करी को बढ़ावा देने वाली यह नीति 2017 के विधानसभा चुनावों में उसी पर भारी पड़ जाए क्‍योंकि तेल की बढ़ी हुई कीमतों का सीधा संबंध महंगाई से भी है और महंगाई से आम जनता किस कदर आजिज आ चुकी है, इससे अखिलेश सरकार भली-भांति परिचित है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

शर्त की आड़ में विकास प्राधिकरण से करोड़ों के टेंडर का बंदरबांट

सोलह कला अवतार, महाभारत नायक यशोदानंदन श्रीकृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली के विकास प्राधिकरण ने इस विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक शहर का कितना विकास कराया है, इसे लेकर एक-दो नहीं अनेक प्रश्‍न खड़े हो सकते हैं किंतु विकास प्राधिकरण में समय-समय पर तैनात रहे अधिकारियों का अपना कितना विकास हुआ है, इसे लेकर सिर्फ एक ही प्रश्‍न खड़ा होता है और वह है कि क्‍या कोई अधिकारी ऐसा रहा है जिसका यहां अपना विकास न हुआ हो ?
विकास प्राधिकरण के अधिकारियों से जुड़ा उनके निजी विकास का ताजा मामला 12 सितंबर 2015 को अखबारों में जारी उस अल्‍पकालीन निविदा का है जिसके तहत करीब 14 करोड़ के कार्यों का बंटवारा दो दिन पूर्व ऑफिस आवर्स बीत जाने के बाद रात के अंधेरे में कर दिया गया।
शाम ढलने के बाद टेंडर खोले जाने की भनक मिलने पर पहुंचे मीडियाकर्मियों ने जब ऐसा किए जाने की वजह जाननी चाही तो हमेशा की तरह कोई अधिकारी मुंह खोलने को तैयार नहीं हुआ और सिर्फ इतना कहकर मीडिया कर्मियों को टरका दिया गया कि दिन के वक्‍त दूसरे कार्यों में व्‍यस्‍तता के चलते टेंडर नहीं खोले जा सके।
करोड़ों रुपए के इन विकास कार्यों हेतु 12 सितंबर को जारी निविदा तथा 4 नवंबर को किए गए बंटवारे का सबसे महत्‍वपूर्ण पहलू यह है कि यह सारे कार्य मात्र चार ठेकेदारों के बीच बांट दिए गए और उन्‍हें ही काम दिए जाने का पुख्‍ता इंतजाम निविदा निकालने वाले दिन यानि 12 सितंबर 2015 को ही एक शर्त के साथ कर दिया गया।
इस शर्त के मुताबिक निविदा में वर्णित क्रम संख्‍या 1 से लेकर 12 तक के कार्य उसी पंजीकृत ठेकेदार को दिए जायेंगे जिसके पास अपना हॉटमिक्‍स प्‍लांट होगा।
इस शर्त को जोड़ने के पीछे की वजह का पता करने तथा ऐसा कोई नियम, कानून अथवा शासनादेश जारी होने के संबंध में जानकारी करने के लिए विकास प्राधिकरण के सचिव एस बी सिंह तथा चीफ इंजीनियर आर के शर्मा सहित कई अधिकारियों से संपर्क साधने का कई-कई बार प्रयास किया गया किंतु किसी ने बात करने की जहमत नहीं उठाई।
विकास प्राधिकरण में तैनात विकास पुरुषों से कोई जवाब न मिल पाने पर ‘लीजेंड न्‍यूज़’ ने जब अपने स्‍तर से छानबीन की तो बहुत ही चौंकाने वाली बातें सामने आईं।
प्रदेश के दूसरे विकास प्राधिकरणों और अन्‍य सरकारी विभागों से पता लगा कि किसी कार्य को कराने के लिए हॉटमिक्‍स प्‍लांट अथवा दूसरे किन्‍हीं उपकरणों का ठेकेदार के पास होना या न होना जरूरी नहीं है, जरूरी है तो केवल मानकों के अनुरूप कार्य की गुणवत्‍ता।
रहा सवाल निविदा के साथ ऐसी कोई शर्त जोड़ देने का तो उसके पीछे एकमात्र कारण अधिकारियों की बदनीयती ही होती है ताकि वो उसकी आड़ में अपने पसंदीदा ठेकेदारों को काम आवंटित कर सकें क्‍योंकि उन्‍हें पहले से मालूम होता है कि किस ठेकेदार के पास उनकी शर्त को पूरी करने का इंतजाम है और कौन उस शर्त को पूरी कर पाने में असमर्थ साबित होगा।
सरकारी विभागों में ही तैनात दूसरे बड़े अधिकारियों की मानें तो विकास प्राधिकरण सहित दूसरे सभी ऐसे विभागों में ठेकेदारी के लिए पंजीयन और ग्रेडिंग तभी होती है जब संबंधित ठेकेदार उसके लिए जरूरी सभी शर्तों को पूरा करता हो, फिर इस तरह अलग से कोई शर्त थोपने का मकसद सिर्फ और सिर्फ शर्त की आड़ लेकर निजी स्‍वार्थ पूरे करना ही होता है।
कुछ अधिकारियों ने बताया कि इस तरह की शर्तें अब विकास प्राधिकरण ही नहीं, पीडब्‍ल्‍यूडी आदि दूसरे सरकारी विभाग भी थोपने लगे हैं जबकि इसका कोई औचित्‍य नहीं है क्‍योंकि जिसे काम देना होता है उसके लिए अधिकारी इस आशय की छूट भी दे देते हैं कि वह किसी दूसरे ठेकेदार से उस उपकरण संबंधी प्रपत्र अपने नाम लिखवाकर दे सकता है जबकि इस छूट का उल्‍लेख निविदा में नहीं किया जाता।
ईमानदार अधिकारियों का तो यहां तक कहना है कि कल को यदि विकास प्राधिकरण ऐसी भी शर्तें थोपने लगे कि उसके यहां से काम उन्‍हीं ठेकेदारों को आवंटित किया जायेगा जो निर्माण में जरूरी सभी सामग्री का उत्‍पाद खुद करते हों, तो क्‍या यह उचित होगा। ऐसे में क्‍या इस विभाग का काम करने के लिए कोई ठेकेदार उपलब्‍ध होगा।
सच तो यह है कि ऐसी शर्तें थोपकर विकास प्राधिकरण अथवा दूसरे सरकारी विभागों के अधिकारी पूर्व नियोजित योजना के तहत अपने स्‍वार्थ की सिद्धि करते हैं ताकि उनके अपने चहेते ठेकेदार ही टेंडर डाल सकें और उन्‍हीं के बीच सारा काम बांट दिया जाए।
जाहिर है कि ऐसा करने से पहले ”इस हाथ दे, उस हाथ ले” की प्रक्रिया भी पूरी कर ली जाती है और टेंडर डालने से लेकर टेंडर निकालने तक का कार्य मात्र औपचारिकता निभा कर पूरा कर लिया जाता है।
अब यह औपचारिकता ऑफिस आवर्स में दिन के वक्‍त पूरी की जाए अथवा रात के अंधेरे में, इससे क्‍या फर्क पड़ता है।
रहा प्रश्‍न ऐसी प्रक्रियाओं पर चंद मीडियाकर्मियों के सवाल उठाने का तो जहां ऊपर से नीचे तक पूरा विभाग आकंठ भ्रष्‍टाचार में लिप्‍त हो, वहां चंद मीडियाकर्मियों के सवाल उठाने से होता क्‍या है।
जिन्‍हें जवाब देना जरूरी है और जिनके जवाब सुनना भी जरूरी है, वह सब न केवल प्रक्रिया से संतुष्‍ट हैं बल्‍कि अधिकारियों के विकास से भी संतुष्‍ट हैं।
-लीजेंड न्‍यूज़ विशेष
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