शुक्रवार, 4 मार्च 2016

जिस Kanhaiya को अपनी मां से लगाव नहीं, उसे भारत मां से लगाव क्‍यों होगा

राष्‍ट्रद्रोह के आरोपी जेएनयू छात्र संघ के अध्‍यक्ष Kanhaiya की सशर्त कोर्ट से रिहाई के बाद जेएनयू कैंपस में उसके द्वारा दिए गए भाषण को (जिसे उसने अपना 23 दिनों का अनुभव बताया है) न सिर्फ अरविंद केजरीवाल और दिग्‍विजय सिंह जैसे भाजपा के घोर विरोधी नेताओं ने जमकर सराहा है बल्‍कि मीडिया ने भी भरपूर तरजीह दी है।
कन्‍हैया कुमार ने जेल से छूटने के बाद कल जो कुछ जेएनयू कैंपस में कहा, उसे यदि गौर से सुना और समझा जाए तो दो बातें साफ नजर आती हैं।
इनमें से पहली बात तो यह कि वह अपने ऊपर लगे राष्‍ट्रद्रोह के आरोप की सफाई देता दिखाई दिया न कि जेएनयू की गतिविधियों पर। और दूसरी यह है कि उसका कृत्‍य ऐसा अपराध है जिसे उचित ठहराना आसान नहीं होगा, यह वह समझ चुका है।
कन्‍हैया कुमार का कल यह कहना कि हम भारत से नहीं भारत में आजादी चाहते हैं, इस बात का प्रमाण है।
कन्‍हैया कुमार किस तरह की आजादी का पक्षधर है, इसे बताने का और अपनी बात रखने का अब उसे कोर्ट में पूरा मौका मिलेगा लिहाजा अब कोर्ट के बाहर उसकी इन सफाइयों का कोई मतलब नहीं कि वह किससे तथा कैसी आजादी चाहता है।
कन्‍हैया कुमार ने एक और बात जो प्रधानमंत्री मोदी के संदर्भ में कही कि वह अपने मन की बात करते हैं लेकिन दूसरों के मन की बात नहीं सुनते। कन्‍हैया का यह जुमला कांग्रेस तथा उसके राष्‍ट्रीय उपाध्‍यक्ष राहुल गांधी के चिर-परिचित जुमले की नकल है और इससे साफ जाहिर है कि वह जेल यात्रा के बाद कांग्रेस की विचारधारा से खासा प्रभावित हो चुका है।
कन्‍हैया कुमार कहता है कि मोदी जी अपने मन की बात करते हैं लेकिन दूसरों के मन की बात नहीं सुनते। कन्‍हैया कुमार को यह भी बताना चाहिए कि उसने जेएनयू छात्रसंघ का अध्‍यक्ष होने के नाते भी मोदी जी को कितनी बार छात्रों के मन की बात बताने का प्रयास किया और उसके लिए कौन-कौन से संवैधानिक तथा काननूी रास्‍ते इस्‍तेमाल किए। राष्‍ट्रद्रोह के आरोप में पकड़े जाने से पहले उसने मोदी जी तक कब और किस मंच से अपनी बात पहुंचाने की कोशिश की।
अपनी गिरफ्तारी और राष्‍ट्रद्रोह के अपने ऊपर लगे आरोप को लेकर भी प्रधानमंत्री मोदी को सीधे जिम्‍मेदार ठहराने का उसका प्रयास अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी और राहुल गांधी@Congress.com सरीखा है।
जिस तरह अरविंद केजरीवाल अपनी खांसी ठीक न हो पाने और राहुल गांधी अब तक सिंगल होने के लिए भी प्रधानमंत्री मोदी को ही जिम्‍मेदार ठहराते हैं, उसी तरह कन्‍हैया कुमार जैसा अदना सा एक यूनिवर्सिटी का नेता भी खुद की गिरफ्तारी के लिए मोदी जी को जिम्‍मेदार ठहरा रहा है। जैसे मोदी जी प्रधानमंत्री न होकर दिल्‍ली पुलिस के सब इंस्‍पेक्‍टर हों और उनके पास केवल यही काम रह गया हो।
दरअसल, अरविंद केजरीवाल हों या दिग्‍विजय सिंह, कन्‍हैया कुमार हों या मनीष सिसौदिया, इन सब की अपनी-अपनी हीन भावनाएं हैं। केजरीवाल बनारस में मोदी के खिलाफ चुनाव लड़कर ऐसा प्रयास कर भी चुके हैं कि किसी तरह वह मोदी के आसपास कहीं खड़े हो पाएं किंतु जब उन्‍हें उस प्रयास में सफलता नहीं मिली तो गाल बजाना शुरू कर दिया।
लुटेरे से महर्षि बने बाल्‍मीकि के बारे में कहा जाता है कि जब आदतन उन्‍होंने राम-राम जपने में असमर्थता जाहिर की तो किसी संत ने उनसे कहा कि तुम मरा-मरा जपो। वह अपने आप राम-राम बन जाता है।
इसी को लेकर एक चौपाई है कि ”उलटा नाम जपत जग जाना, बाल्‍मीकि भए ब्रह्म समाना”।
शायद यही कारण है कि केजरीवाल से लेकर कन्‍हैया तक और दिग्‍गी से लेकर मनीष तक…सब के सब अपने साथ हुई घटना-दुर्घटनाओं के लिए मोदी जी को जिम्‍मेदार ठहराने में लगे रहते हैं। उन्‍हें अब अपने राजनीतिक उद्धार का यही मार्ग आसान लगता है।
कन्‍हैया की मानें तो वह देश को लूटने वालों से आजादी चाहते हैं। यदि कन्‍हैया के कथन में रत्‍तीभर भी सच्‍चाई है तो उन्‍हें यह भी बताना चाहिए कि वो कौन लोग हैं जो देश को लूट रहे हैं और किस-किस ने अब तक देश को लूटा।
यूं भी देश को लूटने वालों से आजादी चाहने का उनका आशय क्‍या है, यह भी आमजन की समझ से परे है। क्‍या कन्‍हैया कुमार या उनका छात्र संगठन तथा उनके जैसे कथित बुद्धिजीवी क्‍या अब तक देश को लूटने वालों की गुलामी करते रहे हैं और अब उनसे आजादी चाहते हैं। कन्‍हैया को यह भी साफ करना चाहिए।
कन्‍हैया कुमार का यह कहना कि विरोध की सभी योजनाएं नागपुर में तैयार होती हैं और हम देश को बर्बाद करने वालों के खिलाफ एकजुट होकर रहेंगे, यह सब-कुछ कांग्रेसी स्‍क्रिप्‍ट का हिस्‍सा है।
बेहतर होता कि वह जमानत मांगने के लिए कोर्ट के सामने गिड़गिड़ाने की जगह कोर्ट को यह बताता कि असली राष्‍ट्रद्रोही जेएनयू से नहीं आरएसएस के नागपुर मुख्‍यालय से पैदा होते हैं और उन्‍होंने देश पर जबरन कब्‍जा कर लिया है।
कन्‍हैया को यह भी बताना चाहिए कि जहां देश को टुकड़े-टुकड़े करने की बात हो रही थी, वहां वह क्‍या कर रहा था।
कहीं ऐसा तो नहीं कि ”भारत से नहीं, भारत में आजादी” मांगने के नए जुमले की तरह ”देश के टुकड़े-टुकड़े” करने वाले नारे को भी जस्‍टीफाई करने के लिए कन्‍हैया व उसके साथियों ने कोई नई परिभाषा गढ़ ली हो।
संसद हमले के दोषी आतंकी अफजल गुरू की फांसी को न्‍यायिक हत्‍या बताने वालों के बारे में तो पहले ही कहा जा चुका है कि वो सब कहने वाले बाहरी तत्‍व थे।
कन्‍हैया या उसके हिमायती क्‍या यह बतायेंगे कि यदि उनके घर में घुसकर कोई बाहरी व्‍यक्‍ति ऐसा गैरकानूनी कार्य कर जाता है जो संगीन अपराध की श्रेणी में आता हो तो क्‍या उसके लिए उनकी जिम्‍मेदारी नहीं बनती। छात्रसंघ की क्‍या यह जिम्‍मेदारी नहीं है कि वह बाहरी आपराधिक तत्‍वों से यूनीवर्सिटी को महफूज रखे।
प्रधानमंत्री के सत्‍यमेव जयते पर तंज कसने वाले कन्‍हैया कुमार को यदि संविधान में उल्‍लिखित सत्‍यमेव जयते पर इतना ही भरोसा है तो देश के अंदर आजादी के लिए भी संविधान प्रदत्‍त अधिकारों के दायरे में रहकर काननू सम्‍मत लड़ाई लड़े न, उसे इससे कौन रोक रहा है। संविधान और काननू किसी जेएनयू की चारदीवारी के गुलाम तो नहीं। फिर सारी गतिविधियां उस चारदीवारी के अंदर ही क्‍यों।
कहीं इसलिए तो नहीं कि कथित आजादी की मांग करने वाले, आतंकवादियों तथा नक्‍सलियों के समर्थक कन्‍हैया कुमार तथा उसके जैसे छात्र यह भली प्रकार जानते हैं कि उनके कृत्‍य किसी भी तरह संवैधानिक व कानूनी नहीं है और उन्‍हें जेएनयू के कैंपस की दरकार है। जेएनयू की चारदीवारी ही उन्‍हें उनके संविधान विरोधी गैरकानूनी कृत्‍यों के लिए संरक्षण दे सकती है।
इसी प्रकार कालेधन को लेकर कन्‍हैया कुमार के उद्गार, हर-हर मोदी के नारे पर तंज, महंगाई पर कटाक्ष और टीवी में घुसकर मोदी का सूट पकड़कर उनसे हिटलर व मुसोलिनी के बारे में बात करने जैसी इच्‍छा का प्रकट करना यह साबित करता है कि कन्‍हैया के पास अपनी कोई सोच नहीं है। जो कुछ है वह कांग्रेस, वामपंथी और केजरीवाल जैसे मौकापरस्‍तों की देन है जिन्‍होंने जेएनयू के हर कृत्‍य का आंख बंद करके समर्थन किया।
यूं भी बेगूसराय से दिल्‍ली आए कन्‍हैया कुमार के चाचा ने टीवी पर यह खुलेआम स्‍वीकार किया था कि वह स्‍वयं और उनका परिवार वामपंथी विचारधारा से प्रभावित रहे हैं।
कन्‍हैया हर-हर मोदी के नारे की आड़ में मोदी पर तो देश को ठगने का आरोप लगाता है किंतु उस कांग्रेस के बारे में कुछ नहीं कहता जिसने गरीबी हटाओ का नारा देकर देश से गरीब को ही हटा दिया।
कांग्रेस की दृष्‍टि में गरीब अब सिर्फ उस चिड़िया का नाम है जिसे पकड़कर वह राजनीति-राजनीति खेलने के लिए अपने पिटारे में रखती है और अमेठी में उसे निकालकर वहां कभी लंच तो कभी डिनर आयोजित कर लेती है।
मोदी को तो जुम्‍मा-जुम्‍मा चार दिन हुए हैं सत्‍ता संभाले, इससे पहले और उससे भी पहले हमेशा कांग्रेस का शासन रहा देश पर। तब किसी कन्‍हैया कुमार ने क्‍यों नहीं कहा कि उसे भारत से नहीं, भारत में आजादी चाहिए। जब यूपीए सरकार ने अफजल गुरू को फांसी देने से पहले उसके परिजनों को सूचित करने जैसी कानूनी जिम्‍मेदारी भी नहीं निभाई, तब जेएनयू के छात्र क्‍यों सोते रहे।
आंगनवाड़ी कार्यकत्री के रूप में कन्‍हैया कुमार की मां को जो कुछ पैसा मिलता है, वह कहां से आता है। क्‍या कोई इसके बारे में बात करेगा। यदि कन्‍हैया कुमार को सरकार और सरकारी तौर-तरीकों से इतनी ही नफरत है तो वह सरकारी खजाने के पैसे से अपने परिवार की दाल-रोटी को बंदोबस्‍त कैसे सहन कर रहा है। किसी भी व्‍यवस्‍था के प्रति घृणा पालना आसान है लेकिन उस व्‍यवस्‍था को सुधारने में अपनी घृणा का सद्उपयोग करना बेहद कठिन।
यदि गैरकानूनी और असंवैधानिक तरीके ही कन्‍हैया की नजर में उपयुक्‍त हैं तो हरियाणा में जाटों द्वारा आरक्षण मांगने के लिए अपनाया गया तरीका भी सही ठहराया जा सकता है। वह भी कह सकते हैं कि सरकार किसी की नहीं सुनती इसलिए हमने कानून अपने हाथ में ले लिया।
और हां, कन्‍हैया के तथाकथित उद्गगारों का एक महत्‍वपूर्ण पहलू यह भी है कि उसने जेल से छूटकर अपनी मां की बात की। बताया कि उसने लंबे समय बाद फोन पर अपनी मां से आज बात की है। दूसरे छात्रों से भी कहा कि वह अपनी-अपनी मां से बात करते रहें।
कन्‍हैया का कथन साफ बताता है कि जिस मां ने आंगनबाड़ी कार्यकत्री के रूप में मिलने वाली मामूली सी धनराशि से कन्‍हैया को जेएनयू में पढ़ने लायक बनाया, वह जेल यात्रा से पहले अपनी उस मां के साथ फोन पर भी बात नहीं करता था।
उस मां से जिसने कल ही कन्‍हैया के लिए दिए गए अपने संदेश में कहा था कि उसे गद्दारों से दूर रहना चाहिए। यानि कन्‍हैया की मां को भी जेएनयू में हुए घटनाक्रम के अंदर कहीं न कहीं गद्दारी दिखाई दे रही है।
कन्‍हैया का कथन इतना बताने के लिए काफी है कि जब उसे अपनी जन्‍मदात्री को लेकर इतना भी लगाव नहीं था कि नियमित रूप से उसका हाल-चाल जान ले तो उसे भारत मां से लगाव क्‍यों होने लगा। उसे क्‍यों इस बात की चिंता होने लगी कि उसकी मां ने उसे कैसे पाला, उसके देश ने उसे क्‍या दिया। उसे तो चिंता है इस बात की कि उसे आजादी चाहिए। उसके मन की आजादी। वैसी आजादी जैसी वह अपनी मां से तो पा चुका था किंतु देश से नहीं मिल पा रही थी। मां को कभी न पूछने की आजादी, उसका हाल-चाल न जानने की आजादी। कन्‍हैया जैसों को ऐसी ही आजादी देश से चाहिए।
आज बेशक वह भयवश पुलिस और न्‍यायपालिका में भरोसे की बात कर रहा है लेकिन उसे इन पर भरोसा है नहीं। हकीकत यह है कि वह डर गया है। वह जान चुका है कि न्‍यायपालिका भी देश को नुकसान पहुंचाने वाले और उसे तोड़ने का ख्‍वाब देखने वाले किसी कृत्‍य का समर्थन नहीं कर सकती।
वह खूब समझ रहा है कि उसे जो 6 महीने के लिए जमानत दी गई है, उसमें लगाई गई शर्तें तस्‍दीक करती हैं कि उसका कृत्‍य कोई सामान्‍य भूल नहीं है। उसमें से प्रथमदृष्‍या देशद्रोह की बू तो आ ही रही है। भले ही वह अभी साबित नहीं हुआ है लेकिन ऐसा भी नहीं है कि वह पूरी तरह इन्‍नोसेंट साबित हो चुका हो।
जमानत के साथ जुड़ी शर्तें न केवल अपराध की गंभीरता दर्शाती हैं बल्‍कि कन्‍हैया कुमार पर व्‍यक्‍तिगत रूप से यह जिम्‍मेदारी भी डालती हैं कि वह इन 6 महीनों में साबित करे कि उसका देश के प्रति नजरिया क्‍या है।
कन्‍हैया कुमार का यह कहना कि वह किसी राजनीतिक दल से जुड़ा नहीं है और उसकी अपनी विचारधारा है, सफेद झूठ से अधिक कुछ नहीं।
यदि ऐसा है तो उसने कल जिस तरह भाजपा और मोदी पर निशाना साधा, अपनी गिरफ्तारी के लिए सुब्रह्मण्‍यम स्‍वामी को जिम्‍मेदार ठहराया, उसी तरह यह भी बताना चाहिए था कि देश के टुकड़े-टुकड़े करने का सपना देखने वाले तथा अफजल गुरू की फांसी को न्‍यायिक हत्‍या बताने वालों के साथ राहुल गांधी व कांग्रेस का खड़ा होना कितना उचित था।
जहां तक सवाल कन्‍हैया द्वारा अपने भाषण में किसान और जवान दोनों को भाई बताते हुए सीमा पर तैनात फौजियों को सलाम करने का है तो यह उसी प्रकार के खालिस राजनीतिक स्‍टंट का हिस्‍सा है जिस प्रकार के स्‍टंट प्रत्‍येक नेता करता है।
कन्‍हैया कुमार क्‍या बनना चाहता है और उसकी महत्‍वाकांक्षा कितनी बड़ी है, यह तो मैं नहीं जानता किंतु इतना जरूर कह सकता हूं कि जेल यात्रा के बाद वह एक बड़ा नेता बनने का सपना अपनी आंखों में पाल चुका है और उसके मुंह से कल निकला एक-एक शब्‍द इसकी पुष्‍टि करता है।
वह जानता है कि कोई न कोई केजरीवाल, दिग्‍विजय, राहुल गांधी, मनीष सिसौदिया या सीताराम येचुरी उसे अपने कंधे पर बैठा लेगा और तब वह उसके कांधे का इस्‍तेमाल उस राजनीति की सीढ़ियों चढ़ने में बखूबी करेगा जो उसकी महत्‍वाकांछा अथवा हवस का पूरा करेगी। शुरूआत हो चुकी है।
बस इंतजार है तो उस एक अदद मौके का जिसे भुनाया जा सके।
लालू जैसे चारा घोटाले के दोषी भी कहते हैं कि जेल यात्रा उतनी बुरी भी नहीं होती, जितनी बताई जाती है।
कन्‍हैया को भी लग रहा होगा कि उसके लिए तो 23 दिन का जेल का सफर, उसकी जिंदगी का टर्निंग प्‍वाइंट बन गया। इसलिए वह अनुभव बांटने लगा। सबके अपने-अपने अनुभव हैं। लालू यादव के अपने और केजरीवाल व कन्‍हैया कुमार के अपने। अफजल गुरू अपना अनुभव बांटने को रहा नहीं अन्‍यथा केजरीवाल एक ट्वीट उसके अनुभव पर भी न्‍यौछावर जरूर करते।
जैसे कन्‍हैया के उद्गगारों पर केजरीवाल ने इस आशय का ट्वीट किया है- मैंने कहा था मोदी जी से कि छात्रों से पंगा मत लो। नहीं माने, अब भुगतें।
किंतु केजरीवाल यह भी जान लें कि जेएनयू के जुमले देश की आवाज नहीं हो सकते और जेएनयू के छात्रों की कुटिल सोच समूचे देश के छात्रों की सोच नहीं होती।
ठीक उसी तरह जैसे दिल्‍ली कभी देश नहीं हो सकती और लाख कोशिशों के बावजूद दिल्‍ली का ”आधा मुख्‍यमंत्री” देश का प्रधानमंत्री नहीं हो सकता।
केजरीवाल हो या Kanhaiya, अभिव्‍यक्‍ति की आजादी का फायदा उठाकर प्रधानमंत्री को बात-बात के लिए कोस तो सकते हैं लेकिन मोदी नहीं बन सकते क्‍योंकि कोई एक ही नरेन्‍द्र दामोदार दास मोदी पैदा होता है और कोई एक नरेन्‍द्र मोदी ही पीएम बन सकता है।
जान लें कि संविधान की तरह प्रधानमंत्री भी एक ही होता है…और नरेन्‍द्र मोदी समूचे देश के प्रधानमंत्री हैं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

UP: ठेके पर सरकार …या सरकार पर नकल का ठेका

समाजवादी कुनबे के चश्‍मो चिराग और UP के मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव पर यूं तो यह कहावत इन दिनों सटीक बैठती है कि बुझता हुआ दीया रौशनी ज्‍यादा करता है लेकिन यहां तो उक्‍त कहावत भी सिर्फ जुबानी जमाखर्च ही मालूम पड़ती है।
चूंकि 2017 के विधानसभा चुनाव लगभग सामने आ खड़े हुए हैं और सभी राजनीतिक दलों ने मिशन 2017 पर काम करना भी शुरू कर दिया है लिहाजा सूबे के सीएम अखिलेश यादव भी इन दिनों पूरी ताकत के साथ अपनी सरकार का बखान करने में लगे हैं।
बात चाहे कानून-व्‍यवस्‍था की हो अथवा विकास कार्यों की, अखिलेश यादव की मानें तो उन्‍होंने उत्‍तर प्रदेश को इतना उत्‍तम प्रदेश बना दिया है कि जितना पिछली कोई सरकार नहीं बना सकी।
अखिलेश के जुबानी जमाखर्च पर यकीन कर भी लिया जाता यदि हर रोज उनके दावों की पोल खोलने वाला कोई न कोई वाकया सामने न आ खड़ा होता।
उदाहरण के लिए इन दिनों यूपी में माध्‍यमिक शिक्षा बोर्ड की परीक्षाएं चल रही हैं। ये परीक्षाएं एक लंबे समय से नकल माफियाओं द्वारा संचालित की जाती हैं, उत्‍तर प्रदेश सरकार तो बस जैसे इनका टेंडर निकालती है। बोर्ड की परीक्षाओं के नाम पर शिक्षा का मजाक और शिक्षा व्‍यवसाय का घिनौना रूप इस दौरान खुलेआम देखा जा सकता है।
बोर्ड परीक्षाओं के लिए सेंटर बनाए जाने से शुरू हुआ यह खेल नकल द्वारा पास की गई परीक्षाओं पर जाकर वहां खत्‍म होता है जहां पीढ़ी-दर-पीढ़ी जाहिलों की एक पूरी फौज खड़ी कर दी जाती है। यही फौज फिर कभी कहीं किसी नौकरी में भर्ती के समय तो कभी आरक्षण की मांग के नाम पर किए जाने वाले आंदोलन के वक्‍त उपद्रवियों में तब्‍दील होती दिखाई देती है।
विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी मथुरा में आज ”लीजेंड न्‍यूज़” को कुछ ऐसे चित्र मिले जिनसे पूरी तरह स्‍पष्‍ट होता है कि यूपी में बोर्ड परीक्षाएं कितना बड़ा मजाक बनकर रह गई हैं और किस तरह समाजवादी पार्टी की सरकार शिक्षा माफियाओं के सामने या तो बेबस है या फिर उनसे मिली हुई है।
बोर्ड परीक्षाओं के नाम पर चल रहे नकल माफियाओं के इस काले धंधे को देखकर ऐसा लगता है जैसे प्रदेश में शासन नाम की कोई चीज है ही नहीं। और जब शासन ही नहीं होगा तो प्रशासन कहां होगा।
अगर यह राजनीतिक मुद्दा होता तो संभवत: अखिलेश सरकार इस स्‍थिति के लिए भी विपक्ष को जिम्‍मेदार ठहरा देती किंतु दुर्भाग्‍य से यह पूरी तरह कानून-व्‍यवस्‍था का मुद्दा है।
ऐसा नहीं है कि नकल का यह खेल सिर्फ समाजवादी सरकार की उपज हो और बसपा या दूसरे दलों के शासनकाल में परिस्‍थितियां कुछ अलग रही हों, लेकिन इस समय यूपी में अखिलेश के नेतृत्‍व वाली वो समाजवादी सरकार काबिज है जो दावा करती है कि उसके जैसी बेहतर कानून-व्‍यवस्‍था देश के कई दूसरे राज्‍यों में नहीं है।
यूपी बोर्ड की परीक्षाओं में चल रहा नकल का यह खेल इसलिए अत्‍यंत घातक है क्‍योंकि इससे तथाकथित पढ़े-लिखों की वो जमात तैयार हो रही है जो आगे आने वाले समय में शासन-प्रशासन के लिए चुनौती बनेगी। उसके पास बोर्ड का सर्टीफिकेट तो होगा लेकिन शिक्षा से उसका दूर-दूर तक कोई वास्‍ता नहीं होगा।
अखिलेश सरकार अब इस मामले में कुछ कर भी नहीं सकती क्‍योंकि उसमें इसके लिए इच्‍छाशक्‍ति ही नहीं है और नकल माफिया के पास हर तरह की शक्‍ति है।
उनके पास धनबल भी है और बाहुबल भी। उन्‍हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि अखिलेश यादव क्‍या करते हैं और मुलायम सिंह यादव क्‍या कहते हैं। उन्‍हें मतलब है तो इस बात से कि बोर्ड परीक्षाओं में नकल कराने के लिए ली गई उनकी ठेकेदारी इसी प्रकार चलती रहे।
उनकी ठेकेदारी कैसी चल रही है, इसका प्रत्‍यक्ष प्रमाण मथुरा के एक कॉलेज से लिए गए चित्रों के रूप में आपके सामने है।
-लीजेंड न्‍यूज़

रविवार, 28 फ़रवरी 2016

सांसदों के चंगुल में Parliament

अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता, असहिष्‍णुता, धर्मनिरपेक्षता तथा सर्वधर्म समानता जैसे कुछ शब्‍द इन दिनों देश की सारी समस्‍याओं पर हावी हैं। तमाम समस्‍याएं एक तरफ और इन चार शब्‍दों की महत्‍ता एक तरफ। सब-कुछ जैसे इन्‍हीं चार शब्‍दों के इर्द-गिर्द सिमट कर रह गया है। सब-कुछ ठहर गया है, ठप्‍प हो गया है।
लोकसभा ठप्‍प, राज्‍यसभा ठप्‍प और इनके साथ अनेक वो बिल भी ठप्‍प जिनके पास होने का इंतजार देश की जनता पिछले चार संसद सत्रों से कर रही है।
ऐसा लगता है जैसे आमजन के मताधिकार से विशिष्‍टजन की श्रेणी को प्राप्‍त माननीयों ने ही संसद को बंधक बना लिया। वह उनके चंगुल में फंस चुकी है। आश्‍चर्य की बात तो यह है कि जनप्रतिनिधि कहलाने वाले इन लोगों ने उन मुद्दों पर संसद को बंधक बना रखा है जिनका आमजन से दूर-दूर तक कोई वास्‍ता है ही नहीं। आमजन का वास्‍ता है उन समस्‍याओं से जिनका समाधान करने के लिए इन्‍हें संसद के अंदर बैठने का अधिकार उसने दिया था, किंतु आज वही आमजन के लिए समस्‍या बन बैठे हैं।
अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता, असहिष्‍णुता, धर्मनिरपेक्षता तथा सर्वधर्म समानता जैसे भारी-भरकम शब्‍दों से आमजन का क्‍या लेना-देना। उसके लिए यह सारे शब्‍द बेमानी हैं। बेमानी इसलिए हैं कि उसका तो सारा समय निजी समस्‍याओं का समाधान करने में बीत जाता है। वो निजी समस्‍याएं जिन्‍हें जन साधारण की भाषा में नून, तेल लकड़ी का बंदोबस्‍त करना कहते हैं। जो अपने घर में ही बीबी-बच्‍चों के सामने भी खुद की भावनाएं अभिव्‍यक्‍त नहीं कर पाते, वह क्‍या जानें अभिव्‍यक्‍ति की भी कोई स्‍वतंत्रता होती है। वह क्‍या समझें कि देश के संविधान ने उन्‍हें अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता जैसा कोई अधिकार भी दे रखा है।
असहिष्‍णुता से तो ऐसे लोग ताजिंदगी परिचित ही नहीं होते क्‍योंकि कम खाना और गम खाना उन्‍हें तभी से घुट्टी में पिला दिया जाता है जब वो होश संभालने लायक होते हैं। सहिष्‍णुता ही उनके जीवन का मंत्र बन जाता है। बाकी जो कुछ उनके जीवन में असहिष्‍णु घटता है, वह कानून-व्‍यवस्‍था की समस्‍या होती है न कि सामाजिक समस्‍या।
जैसे-तैसे जीवन जीने की जद्दोजहद में धर्मनिरपेक्षता उनके खून के अंदर इस कदर घुल जाती है कि वह कभी उसके परे जाकर सोचने लायक नहीं रहते। सर्वधर्म समानता ऐसे लोगों की दिनचर्या का हिस्‍सा होती है। उनकी जुबान राम-राम के जवाब में राम-राम और अस्सलामालेकुम के जवाब में वालेकुम सलाम खुद-ब-खुद कह बैठती है।
हां, आम लोगों से इतर इन शब्‍दों के परिपेक्ष्‍य में यदि बात करें खास लोगों की तो उनके लिए ऐसे शब्‍द विशेष अहमियत रखते हैं। विशेष इसलिए कि इनमें से एक-एक शब्‍द संसद ठप्‍प कराने, दंगा भड़काने, आमजन को जाति व धर्म के नाम पर बांटने तथा देश को कई दशकों पीछे ले जाने की ताकत रखता है। और इन सबसे ऊपर भरपूर राजनीति करने का अवसर प्रदान करता है।
यही कारण है कि इन दिनों ऐसे शब्‍दों को उछालकर देश को खूब छला जा रहा है अन्‍यथा कौन नहीं जानता कि इन शब्‍दों की आड़ में खेला जा रहा घिनौना खेल किसी नतीजे तक नहीं पहुंचा सकता।
जिस अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता को हथियार बनाकर आज कई राजनीतिक दल संसद को ठप्‍प किए हुए हैं, क्‍या वह नहीं जानते कि कोई भी स्‍वतंत्रता किसी दूसरे को आहत करने का अधिकार नहीं देती। अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता के नाम पर किसी एक को दूसरों के लिए गालियां देने का अधिकार नहीं मिल जाता। ऐसी स्‍वतंत्रता फिर कानून-व्‍यवस्‍था का विषय बन जाती है।
माना कि देश के हर नागरिक को अपनी इच्‍छानुसार जीवन जीने तथा खाने-पीने तथा रहने का भी अधिकार संविधान ने दिया है किंतु यदि कोई सड़क पर इसलिए निर्वस्‍त्र घूमना चाहे कि उसे संविधान में जैसे-चाहे रहने का अधिकार प्राप्‍त है तो क्‍या उसकी इस दलील से सहमत हुआ जा सकता है। यही बात खान-पान पर भी लागू होती है। हर व्‍यक्‍ति अपने अधिकारों का इस्‍तेमाल करने के लिए स्‍वतंत्र है लेकिन अपने दायरे में रहकर। तब तक, जब तक कि कोई अन्‍य उससे आहत नहीं होता। दूसरों को आहत करने के लिए प्रयोग किया जाने वाला कोई भी अधिकार, अधिकारों के अतिक्रमण की श्रेणी में आता है। ऐसे में यह कहना कि अभिव्‍यक्‍ति की आजादी के संविधान प्रदत्‍त अधिकार की आड़ लेकर कोई देश को टुकड़े-टुकड़े करने का नारा देने को भी स्‍वतंत्र है…खालिस घटिया, ओछी व बेशर्म राजनीति के अलावा कुछ नहीं है।
संसद पर हमले के सर्वोच्‍च न्‍यायालय से दोष सिद्ध अपराधी की सजा को लेकर उंगली उठाना और देश की कानून-व्‍यवस्‍था को चुनौती देना यदि अभिव्‍यक्‍ति की आजादी है तो ऐसी आजादी हर हाल में छीन लेना ही देश व समाज दोनों के लिए बेहतर है।
घोर आश्‍चर्य की बात है कि कश्‍मीर की आजादी तक जंग जारी रखने का नारा देने वालों का समर्थन वो लोग करते हैं जो कभी लुटियन जोन में अलॉट हुए एक सरकारी बंगले पर हमेशा-हमेशा के लिए अनाधिकृत कब्‍जा बनाए रखना चाहते हैं।
ऐसे लोग अब राष्‍ट्रद्रोह को अपने तरीके से परिभाषित करने में लगे हैं। देश के टुकड़े-टुकड़े करने का नारा देना राष्‍ट्रद्रोह है या नहीं, इसका निर्णय अब कोर्ट को क्‍यों नहीं करने देते। पुलिस को जो उचित लगा, वो उसने किया। यदि पुलिस ने गलत किया है तो कोर्ट उसे भी सबक जरूर सिखायेगी किंतु कोर्ट का निर्णय आने से पहले ही अपने तरीके से राष्‍ट्रद्रोह को परिभाषित करना क्‍या समूची व्‍यवस्‍था पर ही प्रश्‍नचिन्‍ह लगाना नहीं है।
इसी प्रकार असहिष्‍णुता को मुद्दा बनाकर संसद का पूरा एक सत्र बर्बाद कर दिया गया। प्रचारित किया गया कि मोदी राज में देश बहुत असहिष्‍णु हो गया है। दिमाग के दिवालियेपन या उसके शातिर दुरुपयोग का इससे निकृष्‍ट कोई उदाहरण शायद ही दूसरा हो।
पूरे का पूरा कोई देश असहिष्‍णु कैसे हो सकता है। व्‍यक्‍ति विशेष भी किसी खास मामले में असहिष्‍णु हो जाता है तो कई मामलों में वही व्‍यक्‍ति पूरी सहिष्‍णुता का परिचय देता है। एक कोई बात किसी व्‍यक्‍ति को बुरी लगती है लेकिन वही बात दूसरे व्‍यक्‍ति को उतनी बुरी नहीं लगती या बुरी ही नहीं लगती। सहिष्‍णुता और असहिष्‍णुता प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति के अपने विचारों पर निर्भर करती है। ज्‍यादा से ज्‍यादा चंद लोगों का समूह किसी बात के प्रति सहिष्‍णु या असहिष्‍णु हो सकता है किंतु पूरा देश कभी किसी मुद्दे पर एकराय नहीं हो सकता।
जिस देश में ओसामा बिन लादेन जैसे कुख्‍यात अंतर्राष्‍ट्रीय आतंकवादी को सम्‍मान पूर्वक संबोधित करने की छूट हो, जिस देश में बटला हाउस के आतंकवादियों को निर्दोष बताने की सुविधा हो, जिस देश में संसद हमले के दोषी अफजल गुरू को मौत की सजा के कई साल बाद भी क्‍लीनचिट देने का अधिकार प्राप्‍त हो, और जिस देश में इतना सब-कुछ करने वाले तत्‍व पूर्ण सम्‍मान के साथ जी रहे हों, उस देश को असहिष्‍णु कहना सहिष्‍णुता को कलंकित करने की असफल कोशिश के अतिरिक्‍त कुछ नहीं माना जा सकता।
जहां किसी एक धर्म से जुड़े व्‍यक्‍ति की हत्‍या पर नजरिया कुछ और हो और दूसरे धर्म के व्‍यक्‍ति की हत्‍या पर नजरिया ही बदल जाए, जहां अपराध व अपराधियों को भी जाति-धर्म व संप्रदाय के अलग-अलग चश्‍मों से देखा जाए और आपराधिक घटनाओं पर पूरी निर्लज्‍जता के साथ राजनीति करने का अवसर हो, वहां धर्मनिरपेक्षता की बातें करना क्‍या किसी षड्यंत्र का हिस्‍सा नहीं। क्‍या ऐसी कोशिश भी राष्‍ट्रद्रोह की श्रेणी में नहीं आनी चाहिए।
बेशक हमारे देश का कानून बहुत पुराना है और कई कानून आउटडेटेड हो चुके हैं लिहाजा वो अपना मकसद पूरा करने लायक नहीं रहे। तो क्‍या इसका मतलब यह है कि हर व्‍यक्‍ति उन्‍हें अपने तरीके से परिभाषित करने लगे और उन्‍हें लेकर न्‍यायपालिका पर भी उंगली उठा सके।
यदि ऐसा है तो निश्‍चित ही उन कानूनों की परिभाषा न सिर्फ स्‍पष्‍ट की जाए और जरूरी हो तो बदली भी जाए ताकि फिर कोई उमर खालिद, कोई कन्‍हैया कुमार या उसके साथी खुलेआम देश के टुकड़े-टुकड़े होने तक जंग जारी रखने का ऐलान न कर सकें। खुलेआम देश की कानून-व्‍यवस्‍था को चुनौती न दे सकें।
ताकि फिर कोई नेता राजनीति का सहारा लेकर या कोई राजनीतिक दल पक्ष-विपक्ष के अधिकारों से अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता का हवाला देकर देश के गद्दारों का समर्थन न कर सके। किसी को इतना अधिकार न हो कि जिस कश्‍मीर के लिए अनगिनित बलिदान दिए जा चुके हैं, जिसकी खातिर देश के सैनिक विकट से विकट परिस्‍थितयों में ड्यूटी को अंजाम दे रहे हों, जहां आए दिन आतंकवादी निर्दोष लोगों का खून बहा रहे हों, उस कश्‍मीर की आजादी के सपने देखने वालों के साथ खड़े नजर आ सकें।
अब समय आ गया है कि ऐसे हर कानून की नए सिरे से व्‍याख्‍या हो अन्‍यथा आज देश की संसद ठप्‍प है, कल देश ही पूरी तरह ठप्‍प हो जायेगा।
अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता, तथाकथित असहिष्‍णुता, धर्म निरपेक्षता और सर्वधर्म समानता की इतनी बड़ी कीमत नहीं चुकाई जा सकती। पूरे के पूरे राष्‍ट्र को राष्‍ट्रद्रोहियों के हवाले इसलिए नहीं किया जा सकता कि राष्‍ट्रद्रोह को लेकर उनका नजरिया भिन्‍न है और वो खुद को सरकार, कानून-व्‍यवस्‍था और न्‍यायपालिका से भी ऊपर समझते हैं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

सोमवार, 15 फ़रवरी 2016

दूत भेजने भर से UP फतह नहीं होगी मोदी जी

UP में चुनावी किला फतह करने के लिए लगभग सभी राजनीतिक दलों का मिशन-2017 शुरू हो चुका है। बसपा और भाजपा जहां UP में अपनी खोई हुई सत्‍ता पाना चाहती हैं, वहीं समाजवादी पार्टी चाहती है कि उसका कब्‍जा इसी तरह बरकरार रहे।
कांग्रेस की मंशा इस विशाल सूबे में बिहार जैसे चुनावी नतीजे निकालने की है तो राष्‍ट्रीय लोकदल की कोशिश है कि उसकी डूब चुकी नैया को किसी तिनके का सहारा मिल जाए और वह फिर सतह पर आ खड़ी हो।
इसके अलावा बिहार जैसे परिणाम दोहराने के लिए एक अलग प्रयास UP में भी महागठबंधन बनाने का हो रहा है और उसके लिए जेडी-यू के शरद यादव सक्रिय हो चुके हैं।
बहरहाल, एक लंबे समय से यूपी की सत्‍ता पाने में असफल रही भारतीय जनता पार्टी के लिए उत्‍तर प्रदेश के आगामी चुनाव, लगभग जीवन-मरण का प्रश्‍न बन चुके हैं क्‍योंकि बिहार उनके हाथ से पहले ही निकल गया है।
बिहार में करारी हार के बाद यह कहा जाने लगा कि मोदी जी का तिलिस्‍म टूट रहा है और अब जनता सिर्फ नारेबाजी अथवा चुनावी घोषणाओं के झांसे में आकर किसी को सत्‍ता नहीं सौंपने वाली।
मोदी जी का तिलिस्‍म टूटा है या नहीं, यह बता पाना भले ही फिलहाल संभव न हो किंतु एक बात तय है कि भारतीय जनता पार्टी और मोदी सरकार दोनों को बिहार की हार ने सोचने पर मजबूर जरूर कर दिया।
संभवत: यही कारण है कि UP के मिशन 2017 को फतह करने के लिए मोदी सरकार ने जनता के बीच अपने दूत भेजना तय किया।
मोदी सरकार के ये दूत समूचे उत्‍तर प्रदेश में घूम-घूमकर देखेंगे कि यहां केंद्र सरकार की योजनाएं किस स्‍थिति में हैं। योजनाओं की प्रगति संतोषजनक है या नहीं, उनका समुचित क्रियान्‍वयन हो पा रहा है या नहीं, और राज्‍य सरकार उनके क्रियान्‍वयन में अपेक्षित सहयोग कर रही है अथवा नहीं।
दूत के रूप में मोदी सरकार के मंत्री इस कार्य को करेंगे, और इसके लिए प्रत्‍येक मंत्री को दो-दो लोकसभा क्षेत्रों की जिम्‍मेदारी सौंपी गई है। मंत्रीगण 17 फरवरी को सीधे प्रधानमंत्री तक इस बावत अपनी रिपोर्ट पहुंचायेंगे।
इसी जिम्‍मेदारी का निर्वहन करने के लिए कृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली मथुरा में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह को भेजा जा रहा है।
विश्‍व विख्‍यात धार्मिक जनपद होने का गौरव प्राप्‍त मथुरा, उत्‍तर प्रदेश के ऐसे चुनावी क्षेत्रों में शुमार है जहां से प्राप्‍त रिपोर्ट हांडी के एक चावल की तरह पूरे सूबे का राजनीतिक हाल बता सकती है। बशर्ते की रिपोर्ट लेने और देने में पूरी ईमानदारी बरती जाए।
भाजपा के अति वाचाल नेताओं में शामिल केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह मिशन 2017 के तहत मथुरा जनपद से क्‍या रिपोर्ट लेकर जाते हैं और प्रधानमंत्री उसे किस रूप में लेते हैं, यह तो आने वाला वक्‍त ही बतायेगा अलबत्‍ता मथुरा की जनता मोदी सरकार के डेढ़ साला कार्य पर क्‍या कहती है, इसकी बानगी अवश्‍य मिलने लगी है।
अगर बात करें मथुरा की सांसद और गुजरे जमाने में बॉलीवुड से ‘ड्रीम गर्ल’ का खिताब प्राप्‍त अभिनेत्री हेमा मालिनी की तो उनसे जनता निश्‍चित तौर पर निराश है।
लोगों की मानें तो हेमा मालिनी के ”दूर-दर्शन” करना जितना आसान है, साक्षात्‍कार करना उतना ही कठिन। दूर-दर्शन पर आरओ सिस्‍टम बेचते उन्‍हें कभी भी और किसी भी चैनल पर देखा जा सकता है लेकिन किसी समस्‍या के लिए उनसे रुबरू होना आसान नहीं है। डेढ़ साल से होटल के एक कमरे को ही बतौर कार्यालय और ऑफिस इस्‍तेमाल करने वाली ‘ड्रीम गर्ल’ वास्‍तव में मथुरा की जनता के लिए अब तक ड्रीम गर्ल ही साबित हुई हैं।
जिस तरह वह पहले अपनी कोई फिल्‍म रिलीज होने के बाद पर्दे पर दिखाई देती थीं, उसी तरह अब मथुरा में किसी विशेष कार्यक्रम होने पर ही दिखाई देती हैं। आम जनता को तो पता ही नहीं चलता कि उनकी सांसद कब आईं और कब गईं।
इस बारे में एक ऐसे व्‍यक्‍ति की टीस काबिले गौर है जिसका कहना था कि उसने मोदी जी के आह्वान पर हेमा मालिनी के लिए यह सोचकर मतदान किया था कि वह इस धार्मिक जनपद को उसका गौरवशाली स्‍थान दिलायेंगी।
इस व्‍यक्‍ति के मुताबिक उसने मथुरा की समस्‍याओं के संदर्भ में सांसद हेमा मालिनी से एक-दो बार नहीं, कई बार मिलने का प्रयास किया किंतु हर बार उसे असफलता ही मिली।
इसी तरह के विचार अन्‍य तमाम लोगों ने व्‍यक्‍त किए और बताया कि मथुरा की जनता ने भले ही सम्‍मान पूर्वक हेमा को अपना प्रतिनिधि चुनकर लोकसभा में भेजा हो लेकिन चुने जाने के बाद हेमा ने मथुरा की जनता के लिए अपना एक ऐसा प्रतिनिधि चुन लिया है जो उन्‍हें जनता से दूर करता है।
जनार्दन शर्मा नामक हेमा मालिनी का यह प्रतिनिधि जनता के लिए किसी भी पैमाने से जनार्दन साबित नहीं हो रहा।
हेमा मालिनी के दूर से ही दर्शन लाभ संभव होने को लेकर कुछ अन्‍य व्‍यक्‍तियों की टिप्‍पणी भी बहुत कुछ कहती है।
उनके अनुसार इस तरह तो हेमा मालिनी को पर्दे पर वह पहले भी देखते रहे हैं, अभिनेत्री के रूप में उन्‍हें पहले से जानते भी हैं और पहचानते भी हैं। फिर उनके सांसद होने का क्‍या लाभ।
सांसद होने के नाते लोग उन्‍हें अपनी समस्‍याओं से अवगत कराना चाहते हैं, मथुरा के विकास की योजनाएं जानना चाहते हैं। वह उनसे पूछना चाहते हैं कि उनके लिए वोट मांगने आए मोदी जी ने यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने का जो वायदा किया था, उसका क्‍या हुआ।
मथुरा की जनता अपनी सांसद से यह भी पूछना चाहती है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेशों को ताक पर रखकर कृष्‍ण जन्‍मभूमि से चंद कदम दूरी पर घर-घर में पशुओं का अवैध कटान कब तक होता रहेगा। कब तक उन पशुओं का रक्‍त नाले-नालियों के माध्‍यम से सीधे यमुना के जल में समाहित होता रहेगा।
मथुरा में जलभराव की समस्‍या का समाधान होगा भी या नहीं और यहां बिजली, पानी आदि की किल्‍लत कभी खत्‍म हो पायेगी अथवा नहीं। मथुरा की सीमा में पड़ने वाला करीब 90 किलोमीटर लंबा राष्‍ट्रीय राजमार्ग और साथ ही अत्‍याधुनिक यमुना एक्‍सप्रेस वे कभी यात्रियों के लिए सुरक्षित हो पायेगा या नहीं।
जाहिर है कि ऐसी ही तमाम समस्‍याओं के बारे में मथुरा की जनता अपनी सांसद से तभी पूछ पायेगी जब वह उनसे मिल सकेगी, किंतु उनसे मिलना संभव ही नहीं है। सांसद चुने जाने के बाद डेढ़ साल में कभी सांसद महोदया ने मीडिया से भी कोई संपर्क स्‍थापित नहीं किया। कभी कोई प्रेस कॉफ्रेंस नहीं की और ना किसी मीडियाकर्मी के सामने अपनी योजनाओं का खुलासा किया।
हां, इस बीच मुंबई में वह अपनी डांस अकादमी के लिए महाराष्‍ट्र सरकार द्वारा आवंटित करोड़ों रुपए कीमत की जमीन के लिए जरूर मीडिया की सुर्खियां बनीं।
मथुरा में डेढ़ साल के दौरान उन्‍होंने ऐसा कोई काम नहीं किया जिसे रेखांकित करके भारतीय जनता पार्टी मिशन 2017 के लिए वोट मांग सके।
मोदी सरकार के दूत गिरिराज सिंह मथुरा के बावत चाहे जैसी रिपोर्ट प्रधानमंत्री को सौंपें और चाहे जिस रूप में पेश करें किंतु इतना तय है कि प्रधानमंत्री पद के प्रत्‍याशी की हैसियत से मोदी जी ने मथुरा की जनता से जो वायदे किए थे उन्‍हें हेमा मालिनी द्वारा पूरा करना तो दूर, उस दिशा में आगे भी बढ़ती नजर नहीं आ रहीं।
रहा सवाल, केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रहीं करीब एक दर्जन योजनाओं का तो वह भी बदहाली को प्राप्‍त हैं।
मथुरा की जनता का पूर्व में भी बाहरी जनप्रतिनिधियों के संबंध में अनुभव अच्‍छा नहीं रहा। हेमा मालिनी से पूर्व रालोद के युवराज चौधरी जयंत ने भी कृष्‍ण नगरी की जनता को निराश ही किया और उनसे पूर्व भाजपा की ही टिकट पर दो बार सांसद रहे स्‍वामी साक्षी महाराज ने भी।
मथुरा से इतर दूसरे जनपदों से मिल रहीं रिपोर्ट्स भी बताती हैं कि मोदी जी के नाम पर UP की जनता ने उम्‍मीद से कहीं अधिक भाजपा को जितने लोकसभा सदस्‍य दिए, उनमें से अधिकांश की कार्यप्रणाली अब तक जनअपेक्षाओं के अनुरूप नहीं रही है। ज्‍यादातर जनपदों में ऐसे कोई उल्‍लेखनीय विकास कार्य नहीं हुए हैं जो भाजपा की जीत का आधार बन सकें।
यूपी के चुनावों में अब भी करीब एक साल का समय बाकी है इसलिए बेहतर होगा कि भारतीय जनता पार्टी अपने सांसदों को जनअपेक्षाओं के अनुरूप सक्रिय करे और उन्‍हें जनता के बीच भेजकर फीडबैक ले, न कि केंद्रीय मंत्रियों की रिपोर्ट से काम चलाए।
सुरक्षा गार्डों से घिरे केंद्रीय मंत्री न तो एक या दो दिन में दो जनपदों की वास्‍तविक स्‍थिति का आंकलन कर सकते हैं और न केवल अधिकारियों और अपनी पार्टी के पदाधिकारियों से सच्‍चाई जान सकते हैं।
एक-दो दिन में दो जनपदों की जनता के मिजाज का रुख भांपने की कोशिश करना, सिर्फ लकीर पीटने की कोशिश करने जैसा है। ऐसी कोशिशों से मिशन 2017 फतह होने वाला नहीं है। यह बात भाजपा और मोदी जी जितनी जल्‍दी समझ लें, अच्‍छा है अन्‍यथा जिस तरह सांसद बनने के बावजूद हेमा मालिनी मथुरा की जनता के लिए ड्रीम गर्ल ही साबित हो रही हैं उसी तरह UP की जनता भी भाजपा और मोदी सरकार को सपने भले ही दिखा दे किंतु उन्‍हें हकीकत नहीं बनने देगी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

यह कथा है या व्‍यथा…दर्शन हैं या प्रदर्शन…मुक्‍ति का उपक्रम अथवा आसक्‍ति का क्रम ?

मृत्‍यु के भय तथा भौतिकता की अंधी दौड़ से मुक्‍ति का मार्ग दिखाने वाली श्रीमद्भागवत कथा  यदि व्‍यासपीठ पर विराजमान कथावाचक व आयोजक के रूप में मौजूद यजमान, दोनों के लिए ही व्‍यवसाय बन जाए और दोनों को ही मृत्‍यु के भय से मुक्‍त न कर सके तो निश्‍चित ही ऐसी ”कथा” सिर्फ ”व्‍यथा” बनकर रह जाती है।
सनातन धर्म में उल्‍लिखित अठारह पुराणों में से एक श्रीमद्भागवत कथा व्‍यासजी के पुत्र शुकदेव ने राजा परीक्षित को तब सुनाई थी जब वह तक्षक नाग से बुरी तरह भयभीत थे और मृत्‍यु का भय उनका किसी प्रकार पीछा नहीं छोड़ रहा था।
पौराणिक कथाओं के अनुसार तक्षक पाताल के आठ नागों में से एक कश्यप नामक नाग का पुत्र था और कद्रु के गर्भ से उत्पन्न हुआ था। श्रृंगी ऋषि का शाप पूरा करने के लिये राजा परीक्षित को अंतत: इसी ने काटा था।
राजा परीक्षित, तक्षक को लेकर इस कदर भयभीत थे कि श्रीमद्भागवत कथा भी उन्‍हें उस भय से मुक्‍त नहीं कर पा रही थी इसलिए कथा के सातवें और अंतिम दिन शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को एक दृष्‍टांत सुनाया जो इस प्रकार था-
शुकदेव ने राजा परीक्षित को बताया कि शिकार के लिए निकला एक राजा अचानक आई तेज आंधी व तूफान के कारण जंगल में भटक गया। राजा के सैनिक भी उससे बिछुड़ गए। रात अधिक होने पर किसी एक आसरे की तलाश में राजा जब जंगल के अंदर भटक रहा था तो उसे दूर किसी झोंपड़ी में दीपक की लौ टिमटिमाती दिखाई थी।
थका-हारा और भयभीत राजा जब वहां पहुंचा तो उसने देखा कि झोंपड़ी के अंदर जगह-जगह हाड़-मांस तथा रक्‍त और पीव (मवाद) आदि बिखरा पड़ा है। तेज दुर्गंध फूट रही है। लेकिन कोई दूसरा उपाय न होने के कारण राजा ने आवाज लगाई तो अंदर से कोई कृषकाय वृद्ध बाहर निकला।
राजा ने वृद्ध को अपना परिचय दिया और एक रात झोंपड़ी के अंदर बिताने की इजाजत मांगी।
राजा के अनुरोध पर वृद्ध ने राजा से कहा, राजन मुझे तो आपके यहां ठहरने पर कोई आपत्‍ति नहीं है किंतु क्‍या आप हाड़-मांस तथा रक्‍त व पीव (मवाद) से सनी झोंपड़ी में रात बिता सकेंगे।
राजा के तैयार हो जाने पर वृद्ध ने कहा, ठीक है राजन। लेकिन मेरी एक शर्त है। शर्त यह है कि सूर्योदय होते ही आप यहां से चले जायेंगे। एक पल भी नहीं रुकेंगे।
राजा बोला, कैसी बातें करते हो। मैं कोई दूसरा उपाय न होने के कारण जैसे-तैसे रात काटने के लिए रुक रहा हूं। ऐसे में भला में सुबह क्‍यों ठहरुंगा।
इस वार्तालाव के बाद राजा उस झोंपड़ी में रुक गया। सूर्योदय होने पर राजा को नित्‍य कर्मों से निवृत होने की जरूरत महसूस हुई। थके-हारे राजा ने सोचा क्‍यों न निवृत होकर ही चला जाए, रास्‍ते में पता नहीं हालात कैसे हों।
एक ओर राजा जाने में देरी कर रहा था और दूसरी ओर वृद्ध, राजा से बार-बार अनुरोध कर रहा था कि वह अपने वचन के अनुसार अब झोंपड़ी छोड़ दें क्‍योंकि सूर्योदय कब का हो चुका है।
शुकदेव अभी अपना दृष्‍टांत पूरा भी नहीं कर पाए थे कि राजा परीक्षित ने उन्‍हें बीच में टोकते हुए पूछा- कौन राजा ऐसा मूर्ख था जो हाड़-मांस तथा रक्‍त व पीव (मवाद) से सनी दुर्गंधयुक्‍त झोंपड़ी छोड़ने को तैयार नहीं था। नित्‍यकर्म तो जंगल में कहीं भी निपटाए जा सकते थे।
राजा परीक्षित के इस प्रश्‍न पर शुकदेव जी ने उससे कहा- वह राजा तुम्‍हीं हो परीक्षित।
मनुष्‍य का पूरा शरीर हाड़-मांस से बना है। हाड़-मांस के अंदर रक्‍त व पीव की भरमार है। शरीर के अंदर तमाम दुर्गंधयुक्‍त अवशिष्‍ट मौजूद हैं, बावजूद इसके वह शरीर का मोह नहीं त्‍याग पाता।
वह भली प्रकार जानता है कि जिस प्रकार मनुष्‍य पुराने वस्‍त्र त्‍यागकर नए वस्‍त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्‍मा पुरानी देह त्‍यागकर नई देह धारण करती है किंतु सब-कुछ जानते व समझते हुए वह न तो मृत्‍यु के भय से मुक्‍त हो पाता है और ना ही भौतिकता की अंधी दौड़ से। जबकि मृत्‍यु ही एकमात्र शास्‍वत सत्‍य है। अब राजा परीक्षित समझ चुके थे।
लेकिन इस कलियुग में भागवत कथा के श्रवण को मुक्‍ति का एकमात्र मार्ग बताने वाले कथावाचक और उनके आयोजक यजमान क्‍या वास्‍तव में भागवत कथा का उद्देश्‍य पूरा कर पा रहे हैं। क्‍या वो स्‍वयं भी मृत्‍यु और भौतिकता की अंधी दौड़ से मुक्‍त हो पाते हैं।
गत दिनों वृंदावन में श्री प्रियाकांत जू महाराज मंदिर का भव्‍य लोकार्पण समारोह संपन्‍न हुआ है। यह लोकार्पण समारोह भाजपा के राष्ट्रीय अध्‍यक्ष अमित शाह के कर कमलों से संपन्‍न हुआ। अमित शाह के अतिरिक्‍त भी मंदिर के इस लोकार्पण समारोह में तमाम केंद्रीय मंत्री और प्रदेश के मंत्री शामिल हुए। लोकसभा अध्‍यक्ष सुमित्रा महाजन ने भी आयोजन में शिरकत की। उसके बाद से श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन चल रहा है जिसकी व्‍यासपीठ पर देवकी नंदन ठाकुर विराजमान हैं।
भागवत वक्‍ता देवकी नंदन ठाकुर ही इस अतिभव्‍य प्रियाकांत जू महाराज के सर्वे-सर्वा हैं जिसका निर्माण विश्‍व शांति सेवा चैरिटेबल ट्रस्‍ट द्वारा बेहिसाब पैसा लगाकर किया गया है। लोकार्पण से पूर्व ही लााखों रुपए खर्च करके समारोह का भारी-भरकम प्रचार हुआ और दर्जनों विशिष्‍ट व अति विशिष्‍ट अतिथियों के आगमन की सूचना दी गई।
देवकी नंदन ठाकुर अकेले ऐसे भागवत वक्‍ता नहीं हैं जो अपनी कथा को भव्‍य और दिव्‍य बनाने का उपाय कर रहे हों, सभी प्रमुख भागवत वक्‍ता यही करते हैं। मृत्‍यु के भय और भौतिकता की अंधी दौड़ से मुक्‍ति का मार्ग दिखाकर जीवन के प्रति वैराग्‍य का भाव पैदा करने वाली भागवत कथा इस कलिकाल में बहुत अच्‍छे व्‍यवसाय का रूप धारण कर चुकी है। ऐसे व्‍यवसाय में परिवर्तित हो चुकी है जिसकी सफलता सौ प्रतिशत तय है।
यही कारण है कि देखते-देखते अनेक कथावाचक करोड़पति ही नहीं, अरबपति भी बन चुके हैं। बहुत से भागवत वक्‍ता तो विभिन्‍न व्‍यवसायों में अपना पैसा निवेश करने को बाध्‍य हैं अन्‍यथा उस पर कुदृष्‍टि पड़ने का खतरा मंडराने लगता है।
करोड़ों रुपए कीमत वाली लग्‍जरी गाड़ियों में घूमने, हवाई यात्राएं करने तथा देश-विदेश में भागवत कथा के भव्‍य व दिव्‍य आयोजन कराने वाले भागवत वक्‍ताओं के भौतिक सुख तो सर्वविदित हैं हीं, अब उनकी विशिष्‍ट दिखने की चाह भी सामने आने लगी है।
इसी प्रकार मृत्‍यु के भय से मुक्‍त कराने वाली श्रीमद्भागवत कथा, संभवत: उन्‍हें स्‍वयं को भय से मुक्‍त नहीं करा पा रही।
यदि ऐसा नहीं है तो किसी भागवत कथा के पंडाल से बाहर दर्जनों निजी सुरक्षा गार्डों की तैनाती किसलिए।
गौरतलब है कि देवकी नंदन ठाकुर जिस पंडाल में भागवत कथा कह रहे हैं, उस पंडाल से बाहर दर्जनों निजी सुरक्षा गार्डों की तैनाती की गई है। यह तैनाती किसलिए है और किसके लिए है, इसका जवाब या तो कथा के आयोजक दे सकते हैं या फिर व्‍यासपीठ पर विराजमान देवकी नंदन ठाकुर।
कारण जो भी हो, लेकिन एक बात तो यह तय है कि इस दौर में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन सिर्फ और सिर्फ व्‍यावसायिक रूप धारण कर चुका है और उसका धार्मिक रूप पूरी तरह तिरोहित हो गया है।
जिस तरह व्‍यावसायिक सफलता की गारंटी के कारण जगह-जगह कुकरमुत्‍तों की तरह निजी स्‍कूल व कॉलेज खड़े हो गए हैं, उसी तरह धार्मिक व्‍यवसाय में सफलता की गारंटी के कारण गली-गली और मोहल्‍ले-मोहल्‍ले भागवत कथा वक्‍ता पैदा हो गए हैं।
बहुत समय नहीं बीता जब भागवत कथा पर आये हुए चढ़ावे का खुद के लिए इस्‍तेमाल करना कथा वाचक एक प्रकार का पाप मानते थे लेकिन आज वही कथा वाचक भागवत के चढ़ावे से अपनी तिजोरियां भर रहे हैं। भक्‍ति व वैराग्‍य की ओर उन्‍मुख करने वाला ग्रंथ भौतिक सुखों की प्राप्‍ति का साधन बन गया है।
मृत्‍यु के भय से मुक्‍त कराने वाली कथा के आयोजन में दर्जनों निजी सुरक्षा गार्डों की तैनाती की जाती है।
कथा के आयोजन का ऐसा भव्‍य व दिव्‍य प्रदर्शन किसी परीक्षित को मृत्‍यु के भय से मुक्‍ति के लिए न होकर कथा वाचक में भक्‍ति और तमाम भौतिक सुखों में आसक्‍ति के लिए प्रेरित करता है।
भागवत कथा के व्‍यावसाईकरण का ही परिणाम है कि अब अनेक कथावाचक और आयोजक इसके आयोजन में बाकायदा हिस्‍सेदारी तय करते हैं। लाभ का बंटवारा उसी हिस्‍सेदारी के अनुपात से होता है क्‍योंकि धंधे के लिए भी धर्म से बड़ी कोई आड़ नहीं हो सकती। कालेधन की खपत के लिए धार्मिक आयोजन सबसे अधिक सुरक्षित रहते हैं। न कोई सवाल और न कोई जवाब। प्रायोजक भी खुश और आयोजक भी। ऊपर से चारों ओर जय-जयकार। धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्‍व का कल्‍याण हो…क्‍योंकि सभी के कल्‍याण में निहित है आयोजक और प्रायोजक दोनों का कल्‍याण।
ये कलियुग नहीं ये करयुग है…इस हाथ दे, उस हाथ ले। व्‍यासपीठ पर विराजमान कलियुग के शुकदेव और आयोजक के रूप में मौजूद यजमान राजा परीक्षित भली-भांति इस सत्‍य को जान चुके हैं कि यह दौर मुक्‍ति का नहीं आसक्‍ति का है। भौतिक सुखों से आसक्‍ति का दौर।
मुक्‍त होकर क्‍या मिलेगा, जो भी मिलेगा लिप्‍त होकर मिलेगा। इसलिए वह मौका मिलते ही कथा के साथ अपनी व्‍यथा सुनाने में देर नहीं करते ताकि भक्‍ति में लीन श्रोता कथा से अधिक उनकी व्‍यथा सुनकर व्‍यथित हो जाएं और सम्‍मोहित होकर पूरी तरह समर्पित हो सकें। उनके लिए भागवत कथा से बड़ा सत्‍य कथा वाचक की व्‍यथा हो जाए। फिर वो व्‍यथा, प्रियाकांत जू के बेमिसाल मंदिर का निर्माण कराना हो अथवा पंडाल के बाहर निजी सुरक्षा गार्डों की तैनाती हो। मंदिर के लोकार्पण में सत्‍ताधारी नेताओं की मौजूदगी का इंतजाम हो या फिर उनके माध्‍यम से सत्‍ता के गलियारों तक अपनी मजबूत पकड़ का प्रदर्शन करना हो।
इस दर्शन और प्रदर्शन के खेल में भागवत कथा अपना महत्‍व खो रही है या कथा वाचक अपना, फिलहाल यह तो कह पाना संभव नहीं है लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि दर्शन व प्रदर्शन का यह तमाशा बहुत दिनों तक नहीं चल पायेगा और जल्‍दी ही धर्म को धंधा बनाने वाले तथाकथित ”ठाकुरों” की यह जमात बेनकाब होगी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 6 फ़रवरी 2016

DM बुलंदशहर बी. चन्द्रकला समेत 29 IAS अधिकारी डिफाल्टर, नहीं दिया संपत्‍ति का ब्‍यौरा

अपनी दबंग छवि की वजह से न सिर्फ यूपी बल्कि देश भर में युवाओं के बीच बेहद लोकप्रिय बुलंदशहर की DM बी. चन्द्रकला समेत 29 IAS अधिकारी अपनी संपत्ति का ब्यौरा देने में डिफाल्टर साबित हुए हैं।
हाल ही में अपने साथ सेल्फी खिंचवाने वाले युवक को जेल भिजवाने पर सुर्खियाँ बटोर रहीं बी. चन्द्रकला के अलावा 6 अन्य महिला आईएएस अधिकारी अपनी संपत्ति का ब्यौरा देने में असफल रही हैं।
गौरतलब है कि सिविल सेवा अधिकारियों को वर्ष 2014 के लिए 15 जनवरी 2015 तक अपनी संपत्ति का रिकॉर्ड प्रस्तुत करना था लेकिन एक वर्ष बीतने के बावजूद अभी तक इन अधिकारियों ने अपना ब्यौरा उपलब्ध नहीं कराया है।
2015 के लिए राज्य सरकार को 28 फरवरी तक सभी पदस्थ आईएएस अधिकारियों को संपत्ति का ब्यौरा उपलब्ध कराना है। ब्यौरा उपलब्ध न कराये जाने के बावत जब डीएम बुलंदशहर से जानकारी लेने की कोशिश की गई तो उधर से जवाब मिला कि मैडम अभी व्यस्त हैं ।
सास ससुर ने लखनऊ में दिया 55 लाख के फ़्लैट का गिफ्ट
अगर केंद्र सरकार के सामान्य प्रशासन एवं प्रशिक्षण विभाग के द्वारा दी गई जानकारी को देखा जाए तो पता चलता है कि बी चन्द्रकला की संपत्ति वर्ष 2011-12 केवल 10 लाख रुपए थी, जो कि वर्ष 2013-14 में लगभग एक करोड़ हो गई। 2011-12 में अपने गहने बेचकर और तनख्वाह के पैसे से चन्द्रकला ने आन्ध्र प्रदेश के उप्पल में 10 लाख का फ़्लैट ख़रीदा था। आज के समय में बी. चन्द्रकला के पास लखनऊ के सरोजिनी नायडू मार्ग पर अपनी बेटी कीर्ति चन्द्रकला के नाम से 55 लाख का फ़्लैट मौजूद है जिसके बारे में उन्होंने दावा किया है कि यह फ़्लैट उनके सास ससुर ने उन्हें गिफ्ट किया है। इसके अलावा आन्ध्र प्रदेश के अनुपनगर में भी उन्होंने 30 लाख का एक मकान अपने पैसे से ख़रीदा है जिससे वो 1.50 लाख रुपए सालाना की कमाई का दावा करती हैं। उनके पति रुमुलू अजमीरा के नाम एक खेती की जमीन भी करीम नगर में है।
पदोन्नति न देने का है प्रावधान
आन्ध्र प्रदेश के उस्मानिया विश्वविद्यालय से स्नातक और इसी विश्वविद्यालय से दूरस्थ शिक्षा के तहत परास्नातक करने वाली बी चन्द्रकला द्वारा संपत्ति का ब्यौरा न दिए जाने को लेकर यूपी कैडर के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि समय से संपत्ति का ब्यौरा न दिया जाना आश्चर्यजनक है। बी. चन्द्रकला जैसी अधिकारी से इन गंभीर विषयों की अवहेलना करने की उम्मीद कत्तई नहीं थी।
गौरतलब है कि सिविल सेवा नियमावली में यह साफ़ उल्लखित है की जो भी आईएएस अधिकारी प्रतिवर्ष 31 जनवरी तक अपनी संपत्ति का ब्यौरा उपलब्ध नहीं कराएगा उन्हें पदोन्नति नहीं दी जाएगी और अखिल भारतीय सेवा के अंतर्गत वरिष्ठ पदों के लिए उनका नाम भी आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।
डिफाल्टर अधिकारियों की यह है सूची
नीचे उन आईएएस अधिकारियों की सूची दी गई हैं जिन्होंने आज की तारीख तक (2014 के लिए) अपनी संपत्ति का ब्यौरा सरकार को उपलब्ध नहीं कराया है।
1 Ms. Loretta Mary Vas (UP:1977)
2 Shri Shailesh Krishna (UP:1980)
3 Shri Rakesh Sharma (UP:1981)
4 Dr. Hari Krishna (UP:1981)
5 Dr. Surya Pratap Singh (UP:1982)
6 Shri Raj Pratap Singh (UP:1983)
7 Shri Atul Bagai (UP:1983)
8 Shri P V Jagan Mohan (UP:1987)
9 Shri Katru Rama Mohana Rao (UP:1994)
10 Shri Pragyan Ram Mishra (UP:1996)
11 Ms. Rita Singh (UP:1997)
12 Shri Anil Raj Kumar (UP:2000)
13 Shri Ajay Deep Singh (UP:2002)
14 Shri Sharad Kumar Singh (UP:2002)
15 Shri Bhagelu Ram Shastri (UP:2003)
16 Smt. Kanak Tripathi (UP:2003)
17 Shri Anita Srivastava (UP:2004)
18 Shri Suresh Kumar-I (UP:2004)
19 Shri Digvijay Singh (UP:2004)
20 Ms. S. Mathu Shalini (UP:2008)
21 Ms. B. Chandrakala (UP:2008)
22 Shri Vaibhav Shrivastava (UP:2009)
23 Shri Ashutosh Niranjan (UP:2010)
24 Ms. Neha Sharma (UP:2010)
25 Shri Andra Vamsi (UP:2011)
26 Ms. Chandni Singh (UP:2013)
27 Shri Raj Kamal Yada (UP:2013)
28 Shri Sunil Kumar Verma (UP:2013)
29 Shri Ravindra Kumar Mander(UP:2013)
-लीजेंड न्‍यूज़

शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016

वाह रे सेलेब्रिटी...UP सरकार से इन्‍हें भी चाहिए 50 हजार रु. की मासिक पेंशन

लखनऊ। क्रिकेट के ज़रिये करोड़ों रुपए कमाने वाले भारतीय क्रिकेट टीम के आल-राउंडर सुरेश रैना, मशहूर फिल्म अभिनेता और सांसद राज बब्बर सहित 100 से अधिक यश भारती सम्मान पाने वालों ने 50 हज़ार रुपये मासिक पेंशन के लिए आवेदन पत्र भेजा है.
उत्तर प्रदेश सरकार ने ये पेंशन योजना यश भारती और पद्म सम्मान पाने वाले उन लोगों के लिए शुरू की थी जिनका जन्मस्थान या कर्मभूमि उत्तर प्रदेश में हो.
यश भारती से सम्मानित 141 लोगों को प्रदेश के संस्कृति विभाग द्वारा पेंशन के लिए आवेदन पत्र का प्रारूप भेजा गया था.
आवेदन की अंतिम तारीख 31 जनवरी थी. इनमे से 108 लोगों ने पेंशन के लिए आवेदन किया है.
अमिताभ बच्चन, जया बच्चन और उनके बेटे अभिषेक बच्चन भी यश भारती से सम्मानित हैं लेकिन वे पेंशन लेने से मना कर चुके हैं.
पेंशन मांगने वाले अन्य लोग में राज बब्बर की पत्नी नादिरा बब्बर, अभिनेता जिमी शेरगिल, नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी, शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी, रंगकर्मी राज बिसारिया, लोकगायिका मालिनी अवस्थी, क्रिकेटर मोहम्मद कैफ इत्यादि शामिल हैं.
संस्कृति विभाग की प्रमुख सचिव अनीता मेश्राम ने कहा कि अभी उन्होंने आवेदन पत्र नहीं देखे हैं इसलिए किस-किसने पेंशन के लिए फॉर्म भरा है ये बता पाना अभी मुमकिन नहीं है लेकिन इसी विभाग की अधिकारी अनुराधा गोयल ने इस बात की पुष्टि की है कि सुरेश रैना सहित 108 लोगों ने यश भारती पेंशन योजना के लिए आवेदन पत्र भेजा है.
अनुराधा गोयल ने बताया, “कुछ लोगों का कहना है कि ये लोग अमीर हैं, इन लोगों को पेंशन की क्या ज़रुरत है?
लेकिन इस पेंशन के लिए आर्थिक योग्यता आधार नहीं रखी गई है. इसे पाने के लिए व्यक्ति का गरीब होना ज़रूरी नहीं है.”
पिछले साल शुरू हुई इस योजना के लिए प्रदेश के बजट में अभी तक कोई प्रावधान नहीं था लेकिन अनुपूरक बजट के ज़रिये वो कमी पूरी कर दी गई है.
अनीता मेश्राम के अनुसार पेंशन उस दिन से दी जाएगी जिस दिन से आवेदन पत्र पर आदेश पारित किया जाएगा.
गोयल ने आवेदकों के फॉर्म दिखाने से मना कर दिया.
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