रविवार, 5 जून 2016

बड़ा सवाल: कथित सत्‍याग्रहियों को Mathura में ”जवाहर बाग” ही क्‍यों दिया धरने के लिए ?

2 साल पहले Mathura में उद्यान विभाग की 280 एकड़ सरकारी जमीन पर कथित सत्‍याग्रहियों द्वारा लगाया गया मजमा 2 पुलिस अधिकारियों सहित 2 दर्जन लोगों को मौत की नींद सुलाने के बाद समाप्‍त तो हो गया, लेकिन यह मजमा अपने पीछे इतने सवाल छोड़ गया है जो वर्षों तक शासन और प्रशासन का पीछा करते रहेंगे।
मीडिया अपने स्‍तर से इन प्रश्‍नों को आज भी उछाल रहा है और शायद आगे भी उछालता रहे, किंतु अब उसमें वो ताकत नहीं रही जो शासन-प्रशासन को प्रश्‍नों का जवाब देने के लिए बाध्‍य कर सके।
दरअसल, पेशेवर मीडिया की हैसियत फिलहाल उस मदारी की तरह हो गई है जो अपनी डुगडुगी बजाकर लोगों की भीड़ तो इकठ्ठी कर सकता है किंतु उसकी झोली में नया कुछ दिखाने को होता नहीं है।
कल भी मथुरा कांड की रिपोटिंग करने आए एनडीटीवी के रिपोर्टर रवीश रंजन, स्‍टूडियो में बैठे रवीश कुमार को बता रहे थे कि कई बार फोन करने के बावजूद जिलाधिकारी मथुरा राजेश कुमार ने उनका फोन नहीं उठाया।
यह स्‍थिति अकेले किसी एक टीवी रिपोर्टर या अखबार से जुड़े व्‍यक्‍ति की नहीं है। यह स्‍थिति है पूरे मीडिया जगत की है।
सच्‍ची बात तो यह है कि अब शासन और प्रशासन में बैठे लोग मीडिया का इस्‍तेमाल केवल अपनी बात कहने के लिए करते हैं, बात सुनने के लिए नहीं।
मीडिया का सरोकार चूंकि सीधे जनता से होता है और वह वही प्रश्‍न उठाता है जिनके बारे में जनता की जिज्ञासा होती है इसलिए शासन-प्रशासन के लोग उनकी बात न सुनके सिर्फ अपनी बात पूरी करने के साथ उठ खड़े होते हैं जबकि कुछ वर्षों पहले तक ऐसा नहीं था।
तब मीडिया के प्रति भी शासन व प्रशासन की जवाबदेही थी और उसके द्वारा उठाए जाने वाले प्रश्‍नों का वो जवाब देता था। अब जवाबदेही किसी की रह ही नहीं गई, या यूं कहें कि जवाबदेही ओढ़कर कोई फंसना नहीं चाहता।
बहरहाल, इस सब के बावजूद यक्ष प्रश्‍न हमेशा खड़े होते रहे हैं और हमेशा खड़े होते रहेंगे।
mathuraजवाहर बाग प्रकरण में भी कई यक्ष प्रश्‍न खड़े हैं। इस प्रकरण की शुरूआत से समीक्षा की जाए तो सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि कथित सत्‍याग्रहियों को धरना देने के लिए ”जवाहर बाग” उपलब्‍ध होने का प्रस्‍ताव तत्‍कालीन जिलाधिकारी ने अपनी ओर से दिया था अथवा ऐसा कोई प्रस्‍ताव कथित सत्‍याग्रही खुद लेकर पहुंचे थे?
यह प्रश्‍न इसलिए महत्‍वपूर्ण हो जाता है कि उद्यान विभाग के 280 एकड़ क्षेत्र में फैले जवाहर बाग के अंदर धरना-प्रदर्शन करने की इजाजत न तो पहले कभी जिला प्रशासन द्वारा दी गई और न कथित सत्‍याग्रहियों के बाद किसी अन्‍य को इजाजत मिली।
ऐसे में यह सवाल बड़ा हो जाता है कि धरने के लिए आखिर जवाहर बाग ही क्‍यों चुना गया ?
जवाहर बाग न तो मुख्‍य सड़क के किनारे है और न वहां बैठकर जनता से सीधे संवाद किया जा सकता है, फिर धरने के लिए उसका चयन समझ से परे है।
जवाहर बाग को धरने के लिए चयनित करने की तह में यदि जाया जाए तो एक बात जरूर सामने आती है कि जवाहर बाग ही नहीं, मथुरा स्‍थित उद्यान विभाग की सभी जमीनों पर हमेशा ऐसे तत्‍वों की नजर रही है जो शासन-प्रशासन के सहयोग से उन्‍हें कब्‍जाना चाहते हैं।
इस मामले में सबसे बड़ा उदाहरण मथुरा-वृंदावन रोड स्‍थित उद्यान विभाग की करीब 43.15 एकड़ वह जमीन है जिस पर आज ”वात्‍सल्‍य ग्राम” बसा हुआ है। कभी विश्‍व हिन्दू परिषद् की फायरब्रांड नेत्री के रूप में पहचान रखने वाली साध्‍वी ऋतम्‍भरा का ”वात्‍सल्‍य ग्राम”। साध्‍वी ऋतम्‍भरा को उद्यान विभाग की यह बेशकीमती जमीन मात्र 1 रुपया प्रति एकड़ के सालाना पट्टे पर प्रदेश की तत्‍कालीन भाजपा सरकार ने दी थी।
साध्‍वी ऋतम्‍भरा के लिए पहले इस जमीन के पट्टे पर नवंबर 1992 में यूपी के तत्‍कालीन मुख्‍यमंत्री कल्‍याण सिंह ने हस्‍ताक्षर किए थे किंतु बाद में मुलायम सिंह सरकार ने यह पट्टा निरस्‍त कर दिया। इसके बाद जब वर्ष 1999 में रामप्रसाद गुप्‍त के नेतृत्‍व वाली भाजपा की सरकार यूपी पर काबिज हुई तो ऋतम्‍भरा के लिए आखिर इस 43.15 एकड़ जमीन का पट्टा कर दिया गया।
तब से साध्‍वी ऋतम्‍भरा का यही स्‍थाई निवास है और यहीं वह अपने धार्मिक व राजनीतिक क्रिया-कलापों को अंजाम देती हैं। समाज सेवा के नाम पर यदि उनके बारे में मथुरा की जनता से पूछा जाए तो शायद ही कोई कुछ बता पायेगा क्‍योंकि आज तक उन्‍होंने समाज के लिए कोई उल्‍लेखनीय काम किया ही नहीं। उद्यान विभाग की करीब 44 एकड़ जमीन अब पूरी तरह साध्‍वी ऋतम्‍भरा की निजी जागीर बन चुकी है और उसमें उनकी बिना इजाजत के कोई एक पल नहीं ठहर सकता।
जिस देश की आबादी का एक बड़ा हिस्‍सा अपनी पूरी जिंदगी दो कमरों का निजी छोटा सा मकान बनाने के सपने देखते बिता देता हो, उस देश में राजनीतिक संरक्षण प्राप्‍त लोग हजारों मकान बनने लायक जमीन पर इसी तरह कुंडली मारकर बैठे हैं और उनसे कोई सवाल नहीं पूछा जाता।
इसी तरह बात कांग्रेस के शासन में चाहे हरियाणा, पंजाब, राजस्‍थान और दिल्‍ली के अंदर नेशनल हेरल्‍ड अखबार के नाम पर आवंटित बेशकीमती जमीनों की हो अथवा सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट बाड्रा को व्‍यापार करने के लिए हेरफेर करके दी गई जमीनों की, सबका सार यही निकलता है कि जिसकी लाठी, उसकी भैंस। सत्‍ता का लाभ सत्‍ता पर काबिज लोग तो उठाते ही हैं, सत्‍ता के गलियारों तक पैठ बनाने वाले लोग भी खूब उठाते हैं।
इन हालातों में खुद को स्‍वाधीन भारत सुभाष सेना का स्‍वयंभू नेता बताने वाला और बाबा जयगुरुदेव का अनुयायी रामवृक्ष यादव यदि 280 एकड़ के जवाहर बाग को पूरी तरह कब्‍जाने का सपना देखने लगा था, तो कौन सी बड़ी बात थी।
आखिर उसके गुरू बाबा जयगुरुदेव का किसी ने क्‍या बिगाड़ लिया। न तो बाबा जयगुरुदेव के जीते जी उनके द्वारा कब्‍जाई गई सैकड़ों करोड़ रुपए कीमत की जमीन को कोई कब्‍जामुक्‍त करा पाया, और न उनके मरने बाद किसी की हिम्‍मत है कि कोई उधर आंख उठाकर भी देखे। क्‍या यह सब सत्‍ताधारियों के संरक्षण बिना संभव है। क्‍या सत्‍ताधारी लोगों की इस सब में परोक्ष अथवा अपरोक्ष भागीदारी नहीं है।
रामवृक्ष यादव के पीछे कोई तो ऐसी ताकत थी जिसके बल पर वह जिला प्रशासन की नाक के नीचे सैनिक क्षेत्र में 280 एकड़ की जमीन को कब्‍जाने की जुर्रत कर पाया। कोई तो था जिसके कारण जिला प्रशासन उसके सामने तब भी मिमियाता रहा जब कोर्ट ने अधिकारियों के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू कर दी थी।
कोई तो रहा होगा जो हजारों लोगों के खाने-पीने का इंतजाम कर रहा था और उसके लिए अंदर ही अंदर हथियारों का बंदोबस्‍त भी करा रहा था।
बस, यही वो सवाल हैं जिनके उत्‍तर यदि समय रहते मिल जाएं तो न किसी जांच की आवश्‍यकता रह जाती है और न जांच कमीशन की।
बेहद तल्‍ख लेकिन सच्‍ची बात तो यह है कि जवाहर बाग को अब भी कब्‍जामुक्‍त कराने में न हाईकोर्ट के आदेश-निर्देश किसी काम आए और न जिला प्रशासन काम आया। जवाहर बाग यदि अतिक्रमणकारियों के कब्‍जे से मुक्‍त हुआ है तो सिर्फ और सिर्फ एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी तथा एसओ फरह संतोष यादव की शहादत से।
यदि जवाहर बाग को कब्‍जामुक्‍त कराने के लिए इन दोनों पुलिस अफसरों ने अपनी जान नहीं गंवाई होती तो निश्‍चित जानिए कि आज भी रामवृक्ष यादव अपने गुर्गों के साथ जवाहर बाग पर काबिज होता और पुलिस प्रशासन किसी नए बहाने के साथ बाहर खड़ा होकर डंडे फटकार रहा होता।
मुकुल द्विवेदी और संतोष यादव की शहादत ने जवाहर बाग को तो कब्‍जामुक्‍त करा ही दिया, साथ ही उन लोगों के अरमानों पर भी पानी फेर दिया जो इस बेशकीमती जमीन को हड़पने की पूरी प्‍लानिंग कर चुके थे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

कथित सत्‍याग्रहियों को 99 साल के पट्टे पर जवाहर बाग देने की तैयारी कर चुकी थी Akhilesh Government

-एडवोकेट विजयपाल तोमर के प्रयासों ने नहीं पूरी होने दी Akhilesh Government की मंशा
-प्रदेश सरकार का संरक्षण ही बना हुआ था प्रशासन के ढीले रवैये की वजह
-विजयपाल तोमर ने अवमानना की कार्यवाही न की होती तो अब भी खाली न होता जवाहर बाग
मथुरा। 280 एकड़ में फैले उद्यान विभाग के जिस ”जवाहर बाग” से अवैध कब्‍जा हटवाते हुए कल दो जांबाज पुलिस अफसर शहीद हो गए और दर्जनों पुलिसकर्मी गंभीर रूप से घायल हुए हैं, उसे कथित सत्‍याग्रहियों को 99 साल के पट्टे पर देने की प्रदेश सरकार ने पूरी तैयारी कर ली थी।
इस बात का दावा बार एसोसिएशन मथुरा के पूर्व अध्‍यक्ष और इस पूरे मामले को इलाहाबाद हाईकोर्ट तक ले जाने वाले एडवोकेट विजयपाल सिंह तोमर ने किया है।
एडवोकेट विजयपाल सिंह तोमर का कहना है कि यदि वह समय रहते जवाहर बाग पर अवैध कब्‍जे के मामले को हाईकोर्ट में नहीं ले जाते तो प्रदेश सरकार इस बेशकीमती सरकारी जमीन का पट्टा मात्र 1 रुपया सालाना प्रति एकड़ के हिसाब से कथित सत्‍याग्रहियों के नाम कर चुकी होती।
dmएडवोकेट विजयपाल तोमर को इस आशय की जानकारी सारा मामला हाईकोर्ट में ले जाने के तत्‍काल बाद ही हो गई थी और इसीलिए हाईकोर्ट ने उस पर कड़ा संज्ञान लेते हुए शासन प्रशासन को जवाहर बाग खाली कराने के आदेश दिए।
एडवोकेट विजयपाल तोमर के अनुसार मथुरा का जिला प्रशासन पूरी तरह प्रदेश सरकार के दबाव में था और इसीलिए वह चाहते हुए तथा कोर्ट के सख्‍त आदेश होने के बावजूद कथित सत्‍याग्रहियों के खिलाफ कठोर कार्यवाही नहीं कर पा रहा था जबकि प्रशासन के खिलाफ कोर्ट की अवमानना का मामला भी शुरू हो चुका था।
विजयपाल तोमर का कहना है कि कल भी जवाहर बाग को कथित सत्‍याग्रहियों के कब्‍जे से मुक्‍त कराने में अहम भूमिका पुलिस व आरएएफ के उन जवानों ने निभाई है, जो अभी-अभी ट्रेनिंग पूरी करके आए हैं और जिन्‍होंने अपने अफसरों को कथित सत्‍याग्रहियों की एकतरफा फायरिंग में घायल होते व दम तोड़ते देखा था अन्‍यथा पुलिस प्रशासन तो कल भी जवाहर बाग को शायद ही कब्‍जामुक्‍त करा पाता।
हालांकि इस सबके बावजूद एडवोकेट विजयपाल तोमर मथुरा के जिलाधिकारी राजेश कुमार तथा एसएसपी राकेश सिंह को इस बात के लिए धन्‍यवाद देते हैं कि शासन स्‍तर से भारी दबाव में होने पर भी दोनों अधिकारियों ने जवाहर बाग को खाली कराने के लिए हरसंभव प्रयास किया। यह बात अलग है कि शासन के दबाव में वह कब्‍जाधारियों के खिलाफ उतनी सख्‍त कार्यवाही नहीं कर सके, जितनी सख्‍ती की दरकार थी।
एडवोकेट विजयपाल तोमर का कहना है कि यदि पूर्व में ही कब्‍जाधारियों के ऊपर आवश्‍यक बल प्रयोग किया गया होता तो न उन्‍हें इतना असलाह जमा करने का अवसर मिलता और न वो पुलिस प्रशासन पर एकतरफा हमलावर होने की हिम्‍मत जुटा पाते।
जो भी हो, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि जवाहर बाग को खाली करवाने में एडवोकेट विजयपाल तोमर ने बड़ी भूमिका निभाई क्‍योंकि वह जवाहर बाग पर कब्‍जा होने के कुछ समय बाद ही इस मामले को इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय ले गए। उनकी याचिका पर हाईकोर्ट ने 20 मई 2015 को ही सरकारी बाग खाली कराने के आदेश शासन-प्रशासन को दे दिए थे किंतु शासन के दबाव में प्रशासन यथासंभव नरमी बरतता रहा।
हारकर विजयपाल तोमर ने जब शासन-प्रशासन के खिलाफ 22 जनवरी 2016 को न्‍यायालय की अवमानना का केस शुरू किया, तब शासन प्रशासन सक्रिय हुआ लेकिन उसके बाद भी 4 महीने पर्याप्‍त फोर्स का इंतजाम न होने के बहाने गुजार दिए जिससे कब्‍जाधारियों को अपनी ताकत बढ़ाने तथा अवैध असलाह जमा करने का पूरा मौका मिला।
policeएडवोकेट विजयपाल तोमर की बात में इसलिए भी दम लगता है कि कब्‍जा करने वाले कथित सत्‍याग्रहियों का संबंध बाबा जयगुरुदेव में आस्‍था रखने वाले एक गुट से ही बताया जाता है। हालांकि जयगुरुदेव की विरासत पर काबिज लोग इस बात का खंडन करते हैं।
उल्‍लेखनीय है कि जयगुरूदेव धर्म प्रचारक संस्‍था की मथुरा में बेहिसाब चल व अचल संपत्‍ति है। जयगुरूदेव के जीवित रहते तथा अब उसके बाद भी जिन जमीनों पर आज जयगुरूदेव धर्म प्रचारक संस्‍था काबिज है, उनमें से अधिकांश जमीन विवादित हैं और उनके मामले विभिन्‍न न्‍यायालयों में लंबित हैं। इन जमीनों में सर्वाधिक जमीन ओद्यौगिक एरिया की है जिसे कभी उद्योग विभाग ने विभिन्‍न उद्यमियों के नाम एलॉट किया था।
जवाहर बाग पर कब्‍जा करने वाले कथित सत्‍याग्रहियों की प्रमुख मांग में यह भी शामिल था कि जिला प्रशासन उन्‍हें बाबा जयगुरुदेव का मृत्‍यु प्रमाणपत्र उपलब्‍ध कराए। कथित सत्‍याग्रहियों का कहना था कि बाबा जयगुरूदेव की मौत हुई ही नहीं है और जिस व्‍यक्‍ति को उनके नाम पर मृत दर्शाया गया था, वह कोई और था। बाबा जयगुरूदेव को उनके कथित अनुयायियों ने उनकी सारी संपत्‍ति हड़पने के लिए कहीं गायब कर दिया है।
कथित सत्‍याग्रहियों की इस मांग से यह तो साबित होता है कि किसी न किसी स्‍तर पर बाबा जयगुरुदेव तथा उनकी धर्म प्रचारक संस्‍था से कथित सत्‍याग्रहियों का कोई न कोई संबंध जरूर था अन्‍यथा उन्‍हें बाबा जयगुरुदेव की मौत से लेना-देना क्‍यों होता।
इस सबके अतिरिक्‍त सरकारी जमीन कब्‍जाने की उनकी कोशिश भी जयगुरूदेव व उनके अनुयायियों की मंशा से मेल खाती है।
अब सवाल यह खड़ा होता है कि जवाहर बाग को 2 साल से कब्‍जाए बैठे कथित सत्‍याग्रहियों के पास हर दिन हजारों लोगों के लिए रसद का इंतजाम कहां से हो रहा था। कौन कर रहा था यह इंतजाम ?
इस सवाल का जवाब आज 2 साल बाद भी जिला प्रशासन के पास क्‍यों नहीं है। यही वो सवाल है जिससे एडवोकेट विजयपाल तोमर के इस दावे की पुष्‍टि होती है कि कथित सत्‍याग्रहियों को प्रदेश सरकार का संरक्षण प्राप्‍त था और प्रदेश सरकार जवाहर बाग को उन्‍हें 99 साल के पट्टे पर देने की पूरी तैयारी कर चुकी थी।
यूं भी कथित सत्‍याग्रहियों का नेता कभी बाबा जयगुरुदेव के काफी निकट रहा था, इस बात की पुष्‍टि तो हो चुकी है लिहाजा आज जयगुरुदेव की विरासत पर काबिज लोग भले ही कथित सत्‍याग्रहियों से अपना कोई संबंध न होने की बात कहें लेकिन उनकी बात पूरी तरह सच नहीं है।
कथित सत्‍याग्रहियों की कार्यशैली से साफ जाहिर था कि वह उसी तरह जवाहर बाग की 280 एकड़ सरकारी जमीन पर काबिज होना चाहते थे जिस तरह बाबा जयगुरुदेव के रहते उनके अनुयायियों ने वर्षों पूर्व मथुरा के इंडस्‍ट्री एरिया तथा नेशनल हाईवे नंबर- 2 के इर्द-गिर्द की सैकड़ों एकड़ जमीन कब्‍जा ली थी और जिस पर आज तक मुकद्दमे चल रहे हैं।
स्‍वयं बाबा जयगुरुदेव का भी आपराधिक इतिहास था।
मूल रूप से इटावा जनपद के बकेवर थाना क्षेत्र अंतर्गत गांव खितौरा निवासी बाबा जयगुरुदेव के पिता का नाम रामसिंह था। बाबा पर उनके गृह जनपद ही नहीं, लखनऊ में भी आपराधिक मुकद्दमे दर्ज हुए और उनमें सजा हुई। मुकद्दमा अपराध संख्‍या 226 धारा 379 थाना कोतवाली इटावा के तहत बाबा को 13 अक्‍टूबर सन् 1939 में छ: माह के कारावास की सजा हुई। इसके बाद लखनऊ के थाना वजीरगंज में अपराध संख्‍या 318 धारा 381 के तहत 25 नवम्‍बर सन् 1939 को डेढ़ वर्ष के सश्रम कारावास की सजा सुनाई गई।
यह बात दीगर है कि बाबा जयगुरुदेव ने जब से आध्‍यात्‍मिक दुनिया में खुद को स्‍थापित किया, तब से कभी कानून के लंबे हाथ भी उनके गिरेबां तक नहीं पहुंच सके।
इस दौरान एक सभा में खुद को नेताजी सुभाष चन्‍द्र बोस बताने पर बाबा का भारी अपमान हुआ और आपातकाल में उन्‍हें जेल की हवा भी खानी पड़ी लेकिन उसके बाद वोट बैंक की राजनीति के चलते इंदिरा गांधी तक बाबा के दर पर आने को मजबूर हुईं।
गौरतलब है कि बाबा जयगुरुदेव और उनकी धर्मप्रचारक संस्‍था से समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता और मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव के चाचा शिवपाल यादव का नाम जुड़ता रहा है। शिवपाल यादव समय-समय पर बाबा के पास आते भी रहते थे। कहा जाता है कि बाबा के उत्‍तराधिकारी के तौर पर उनके ड्राइवर पंकज को काबिज कराने में भी शिवपाल यादव की अहम भूमिका रही है। वही पंकज जो आज पंकज बाबा के नाम से बाबा के उत्‍तराधिकारी बने बैठे हैं।
प्रदेश की सत्‍ता पर काबिज समाजवादी कुनबे की बाबा जयगुरुदेव से निकटता का एक बड़ा कारण बाबा जयगुरुदेव का सजातीय होना भी रहा है।
उधर जिस ग्रुप से कथित सत्‍याग्रहियों का संबंध बताया जा रहा है, उस ग्रुप के तार उस उमाकांत तिवारी से भी जाकर जुड़ते हैं जो कभी बाबा जयगुरुदेव का दाहिना हाथ हुआ करता था और जिसकी मर्जी के बिना बाबा जयगुरुदेव एक कदम आगे नहीं बढ़ते थे।
जिस दौरान बाबा जयगुरूदेव और उनकी संस्‍था का उमाकांत तिवारी सर्वेसर्वा हुआ करता था, उन दिनों भी शिवपाल यादव का मथुरा स्‍थित जयगुरुदेव आश्रम में आना-जाना था इसलिए ऐसा संभव नहीं है कि शिवपाल यादव तथा समाजवादी कुनबा उमाकांत तिवारी से अपरिचित हो।
बताया जाता है कि जवाहर बाग 99 साल के पट्टे पर दूसरे गुट को दिलाने के पीछे भी समाजवादी कुनबे की यही मंशा थी कि एक ओर इससे जहां दोनों गुटों के बीच का विवाद हमेशा के लिए खत्‍म हो जायेगा, वहीं दूसरी ओर दूसरा गुट भी इस तरह समाजवादी पार्टी के कब्‍जे में होगा। पूर्व में भी समाजवादी पार्टी द्वारा दोनों गुटों के बीच इसीलिए समझौते के प्रयास किए गए बताए।
दरअसल, जवाहर बाग की 280 एकड़ जमीन कलक्‍ट्रेट क्षेत्र में आगरा रोड पर है और इसलिए बेशकीमती है। पूरी जमीन फलदार वृक्षों से अटी पड़ी है और इससे सालाना करोड़ों रुपए की आमदनी होती रही है। यह जमीन सेना की छावनी के क्षेत्र से भी जुड़ी है और पूरा प्रशासनिक अमला इसी के इर्द-गिर्द सिमटा हुआ है। यहां तक कि जिले की जुडीशियरी भी यहीं रहती है।
अब जरा विचार कीजिए कि ऐसे क्षेत्र में कैसे तो अवैध कब्‍जा हो गया और कैसे कथित सत्‍याग्रहियों ने इतनी ताकत इकठ्ठी कर ली कि पुलिस-प्रशासन पर बेखौफ हमलावर हो सकें।
जाहिर है कि यह सब किसी सामर्थ्‍यवान का संरक्षण पाए बिना संभव नहीं है।
कल एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी तथा एसओ फरह संतोष कुमार सिंह की शहादत के बाद सक्रिय हुए पुलिस प्रशासन ने जितनी तादाद में जवाहर बाग से अवैध असलाह बरामद किया है, वह न तो एक-दो दिन में एकत्र होना संभव है और ना ही किसी के संरक्षण बिना संभव है। पुलिस प्रशासन की ठीक नाक के नीचे इतनी बड़ी संख्‍या में अवैध हथियारों का जखीरा इकठ्ठा कर लेना, इस बात का ठोस सबूत है कि कथित सत्‍याग्रहियों को उच्‍च स्‍तर से संरक्षण प्राप्‍त था।
जहां तक सवाल कल के घटनाक्रम का है तो आज उत्‍तर प्रदेश के डीजीपी जाविद अहमद ने प्रेस कांफ्रेस में मथुरा हिंसा के तहत कुल 24 लोगों के मारे जाने की पुष्‍टि की है।
उधर अपुष्‍ट खबरों तथा अफवाहों का बाजार गर्म है। कोई कह रहा है सैकड़ों की संख्‍या में सत्‍याग्रही भी मारे गए हैं और उनकी लाशें गायब कर दी गई हैं। कोई कह रहा है कि जिन पुलिसकर्मियों को सत्‍याग्रही उठा ले गए थे, उनका अब तक पता नहीं है।
इसी प्रकार कथित सत्‍याग्रहियों के नेता रामवृक्ष यादव की भी कोई खबर जिला प्रशासन नहीं दे रहा इसलिए उसे लेकर भी अफवाहों का बाजार गर्म है। कहा जा रहा है कि उसे कल ही पुलिस ने गोलियों से भून दिया था। अपने अफसरों की शहादत से आक्रोशित पुलिसजनों ने उसके ऊपर कारतूसों की पूरी मैगजीन खाली कर दी थी। एक अफवाह यह भी है कि हाईवे स्‍थित नीरा राडिया के नयति हॉस्‍पीटल में भी लाशों का ऐसा ढेर देखा गया है जिसकी शिनाख्‍त करने वाला कोई नहीं है।
सच्‍चाई क्‍या है और कभी वह सामने आयेगी भी या नहीं, इस बारे में तो कुछ भी कहना मुमकिन नहीं है लेकिन एक बात जरूर कही जा सकती है कि पुलिस-प्रशासन पिछले चार महीनों से जिस मंथर गति के साथ कार्यवाही कर रहा था, उसके पीछे कोई न कोई शक्‍ति जरूर थी। चार महीने की कोशिशों के बाद भी कथित सत्‍याग्रहियों को खदेड़ने के लिए शासन स्‍तर से पर्याप्‍त सुरक्षाबल उपलब्‍ध न कराना, किसी न किसी सोची-समझी रणनीति की ओर इशारा करता है।
मथुरा की जनता और सत्‍याग्रहियों के खिलाफ पिछले काफी समय से आवाज बुलंद करने वाले विभिन्‍न सामाजिक व राजनीतिक संगठनों का भी मानना है कि यदि सारा मामला मथुरा की पुलिस व प्रशासन के जिम्‍मे छोड़ दिया जाता और वह बिना दबाव के अपने स्‍तर से कार्यवाही करते तो न 2 जांबाज पुलिस अफसरों को अपनी जान से हाथ धोने पड़ते और न इतना रक्‍तपात हुआ होता।
पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों के बीच से भी छनकर आ रही खबरें इस बात की पुष्‍टि करती हैं कि 2017 में प्रस्‍तावित प्रदेश के विधानसभा चुनाव तथा उनके मद्देनजर वोट की राजनीति को देखते हुए शासन स्‍तर से जिला प्रशासन को इस आशय की स्‍पष्‍ट हिदायत दी गई थी कि कथित सत्‍याग्रहियों के खिलाफ किसी प्रकार की सख्‍ती न बरती जाए।
प्रदेश सरकार को डर था कि जवाहर बाग को खाली कराने के लिए बरती गई सख्‍ती 2017 के चुनावों में वोट की राजनीति को प्रभावित कर सकती है और उसका लाभ विपक्षी दल उठा सकते हैं।
पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों के बीच की इन खबरों में इसलिए भी सत्‍यता मालूम होती है क्‍योंकि एक चारदीवारी के अंदर सिमटे बैठे मात्र तीन-चार हजार कथित सत्‍याग्रहियों के सामने जिस तरह मथुरा का जिला प्रशासन असहाय व लाचार नजर आ रहा था, वह किसी की भी समझ से परे था। ऐसा लग रहा था जैसे पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी अपनी कुर्सी व मथुरा में अपनी तैनाती बचाने के लिए ही कवायद कर रहे थे, न कि 280 एकड़ में फैले सरकारी जवाहर बाग को खाली कराने की कोशिश में लगे थे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

रविवार, 29 मई 2016

UP elections: इस बार ”मुन्‍ना भाइयों” पर निर्भर होंगे अधिकांश उम्‍मीदवार

राजनीतिक दृष्‍टिकोण से देश के सबसे बड़े राज्‍य उत्‍तर प्रदेश में अगले साल चुनाव होने हैं। राजनीति के पंडितों का तो यहां तक कहना है कि साल 2016 के जाते-जाते भी यूपी में चुनाव हो सकते हैं।
चुनाव जब भी हों…समय पर हों या समय से पहले हों…यह तो चुनाव आयोग को तय करना है लेकिन एक बात जो तय है, वह यह कि इस बार चुनावी मैदान में उतरने वाले विभिन्‍न राजनीतिक दलों के उम्‍मीदवारों की परीक्षा पिछले सभी चुनावों से कुछ भिन्‍न होगी।
यह परीक्षा इसलिए भिन्‍न होगी क्‍योंकि सूबे के अधिकांश उम्‍मीदवार इस परीक्षा में पास होने के लिए अपने-अपने ”मुन्‍ना भाइयों” पर निर्भर होंगे। यानि परीक्षा के लिए फॉर्म (नामांकन) तो उम्‍मीदवार ही भरेंगे किंतु परदे के पीछे से परीक्षा कोई और दे रहा होगा।
सर्वविदित है कि पिछले सभी चुनावों की तुलना में आगामी चुनावों के दौरान सोशल मीडिया एक बड़ी भूमिका निभाएगा लिहाजा प्रत्‍येक राजनीतिक दल सर्वाधिक जोर सोशल मीडिया पर सक्रियता को लेकर दे रहा है।
भारतीय जनता पार्टी ने तो बाकायदा घोषणा कर दी है कि पार्टी से टिकिट पाने का ख्‍वाब देखने वालों को सोशल साइट्स पर कम से कम 25 हजार फॉलोअर्स जुटाने होंगे।
दूसरे राजनीतिक दल भी अपने-अपने संभावित उम्‍मीदवारों से कुछ ऐसी ही अपेक्षा कर रहे हैं।
संभावित उम्‍मीदवार भी इस सच्‍चाई से वाकिफ हो चुके हैं इसलिए वो फेसबुक, टि्वटर, लिंक्‍डइन तथा गूगल प्‍लस जैसी सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सक्रिय दिखाई देते हैं लेकिन अधिकांश संभावित उम्‍मीदवारों के साथ समस्‍या यह है कि वह स्‍वयं सोशल मीडिया को ऑपरेट करना नहीं जानते।
अर्थात परीक्षा फॉर्म (नामांकन) भले ही उम्‍मीदवार भरेंगे लेकिन असल परीक्षा होगी उन ”मुन्‍ना भाइयों” की जिन्‍हें उम्‍मीदवारों द्वारा सोशल मीडिया को हेंडिल करने के लिए हायर किया जाएगा।
दरअसल, इन चुनावों में जीत का सेहरा उसी के सिर बंधेगा जिसकी ओर युवा वोटर का झुकाव हो जाएगा। वही युवा वोटर जिसके लिए सोशल मीडिया अब माई-बाप बन चुका है। जो एकबार को पारिवारिक सदस्‍यों से दूर रह सकता है किंतु सोशल मीडिया से दूर रहने की कल्‍पना भी नहीं कर सकता। सोशल मीडिया से ही उसके दिन की शुरूआत होती है और सोशल मीडिया से ही वह गुड नाइट करके स्‍वीट ड्रीम देखने बिस्‍तर पर पहुंचता है। इस वोटर की न तो टीवी पर समाचार देखने में कोई रुचि है और न वो अखबार पढ़ता है। उसके लिए देश-दुनिया की जानकारी से अपडेट रहने का एकमात्र माध्‍यम सोशल मीडिया बन चुका है।
शायद इसीलिए प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी अपनी लगभग हर स्‍पीच में बताते हैं कि हमारा देश, दुनिया का सबसे युवा देश है। देश की आबादी में 65 प्रतिशत हिस्‍सा उन युवकों का है जो एवरेज 35 वर्ष की उम्र के हैं।
गौरतलब है कि यह वही वर्ग है जो अपटेड रहने के लिए ही नहीं, हर सामाजिक व राजनीतिक गतिविधि की जानकारी के लिए सोशल मीडिया पर निर्भर है।
वह लाइक और कमेंट्स भी सोशल मीडिया पर चल रहे ट्रेंड के मुताबिक देता है। उसकी हवा का रुख उसी से तय होता है क्‍योंकि उसके लिए अब दुनिया वहीं तक सिमट चुकी है।
उम्‍मीदवारों के सामने चुनौती भी यही होगी कि कौन कितनी अधिक संख्‍या में इस वर्ग को प्रभावित करता है क्‍योंकि अधिकांश उम्‍मीदवार सोशल मीडिया पर सक्रियता के लिए ”मुन्‍ना भाइयों” पर निर्भर होंगे।
बेशक, इसका एक बड़ा कारण राजनीतिक लोगों की व्‍यस्‍तता होती है लेकिन कड़वा सच यह भी है कि सभी राजनीतिक दलों के अधिकांश उम्‍मीदवार उस आयु वर्ग से आते हैं जिसमें उनके लिए सोशल मीडिया तो दूर कंम्‍यूटर, लैपटॉप अथवा स्‍मार्ट फोन को हैंडिल करना किसी सिरदर्द से कम नहीं। यही कारण है कि शासन से प्राप्‍त लैपटॉप भी जनप्रतिनिधियों के नहीं, उनकी दूसरी या तीसरी पीढ़ी के काम आ रहे हैं।
इस विषय पर हांडी में पक रहे चावलों का हाल एक दाने से जान लेने की तरह यदि सूबे के राजनीतिक जगत का हाल जानने के लिए विश्‍व प्रसिद्ध जनपद मथुरा को ही देख लें तो तस्‍वीर काफी हद तक साफ हो जाती है।
मथुरा में कुल पांच विधानसभा क्षेत्र हैं। फिलहाल यहां की शहरी सीट पर कांग्रेस पार्टी से विधायक प्रदीप माथुर काबिज हैं जो फर्राटेदार अंग्रेजी तो बोलते हैं लेकिन कंम्‍यूटर ऑपरेट करने में उतने दक्ष नहीं हैं। इसके लिए उन्‍होंने स्‍टाफ रखा हुआ है और वही उनके सोशल मीडिया अकाउंट को हैंडिल करता है।
गोवर्धन क्षेत्र से बसपा के विधायक राजकुमार रावत के लिए कंम्‍यूटर ऑपरेट करना टेढ़ी खीर है। समय की मांग के अनुरूप वह फेसबुक आदि पर दिखाई तो देते हैं किंतु अपना अकाउंट खुद हैंडिल नहीं कर सकते।
छाता क्षेत्र से राष्‍ट्रीय लोकदल के टिकट पर चुनाव जीतने के बाद पिछले दिनों बसपा ज्‍वाइन कर लेने वाले ठाकुर तेजपाल कहने को तो अध्‍यापक हैं लेकिन कंम्‍यूटर ऑपरेट करना कभी उनके वश की बात नहीं रही। यदि वह इस बार चुनाव मैदान में उतरते हैं तो जाहिर है कि सोशल मीडिया को हैंडिल करना उनके लिए मुश्‍किल पेश करेगा। ये काम या तो उनके पुत्र करेंगे, या फिर स्‍टाफ से काम चलाना होगा। हालांकि कहा ये जा रहा है कि इस बार वह छाता क्षेत्र की अपनी विरासत अपने पुत्र को सौंपने जा रहे हैं।
गोकुल क्षेत्र से रालोद विधायक पूरन प्रकाश कहने को तो खासे शिक्षित हैं किंतु सोशल मीडिया के मामले में वह भी अपने पुत्रों पर निर्भर हैं। अब चुनावों के दौरान उनके पुत्र इसके लिए कितना समय निकाल पाते हैं, यह देखने वाली बात होगी अन्‍यथा उन्‍हें भी अंतत: ”मुन्‍ना भाइयों” पर निर्भर होना पड़ेगा।
इसी प्रकार मांट विधानसभा क्षेत्र से विधायक श्‍यामसुंदर शर्मा भी कम पढ़े-लिखे नहीं हैं लेकिन कंप्‍यूटर ऑपरेट करना उनके लिए भी किसी सिरदर्द से कम नहीं। हो सकता है कि दंत चिकित्‍सक की डिग्रीधारी उनके पुत्र उनके लिए सोशल मीडिया हैंडिल करते हों किंतु चुनावों में उन्‍हें भी यह काम किसी पेशेवर के हवाले करना होगा। यानि होंगे वह भी किसी न किसी ”मुन्‍ना भाई” पर ही निर्भर।
इन वर्तमान विधायकों के अलावा समाजवादी पार्टी से शहरी सीट पर प्रमुख दावेदार अशोक अग्रवाल कहने को तो बालरोग विशेषज्ञ हैं किंतु कंप्‍यूटर से वह उतने ही दूर भागते हैं जितनी दूर कोई पत्रकार, डॉक्‍टरी से भागता है।
शहरी सीट पर बसपा के अब तक घोषित उम्‍मीदवार योगेश द्विवेदी का कंप्‍यूटर से जानकारी भर का वास्‍ता है। यह बात अलग है कि वह स्‍टाफ के माध्‍यम से सोशल साइट्स विशेषत: फेसबुक पर सक्रिय नजर आते हैं।
भाजपा ने यूं तो अभी अपने उम्‍मीदवारों की कोई संभावित लिस्‍ट जारी नहीं की है लेकिन बात करें पिछले प्रत्‍याशी डॉ. देवेन्‍द्र शर्मा की तो पीएचडी होने के बावजूद कंप्‍यूटर ऑपरेट करना तथा सोशल मीडिया को खुद हैंडिल करना उनके लिए भी बड़ी समस्‍या है।
भाजपा के नवनियुक्‍त जिला अध्‍यक्ष और तीन मर्तबा मथुरा के सांसद रहे चौधरी तेजवीर सिंह के लिए कंप्‍यूटर ऑपरेट करना, काला अक्षर भैंस बराबर सरीखा है। पढ़े-लिखे वह भी हैं लेकिन कंप्‍यूटर से वह कभी तालमेल नहीं बैठा पाए। मोबाइल फोन का इस्‍तेमाल उनके लिए कॉल सुनने अथवा करने भर तक सीमित है। इससे आगे उनका उससे भी वास्‍ता नहीं।
इन चंद उदाहरणों के अतिरिक्‍त लगभग सभी पार्टियों के जिला व शहर अध्‍यक्ष ही नहीं प्रदेश व राष्‍ट्र स्‍तर के पदाधिकारियों का भी कंप्‍यूटर ज्ञान या तो नाममात्र का है या फिर उनके लिए भी वह हौवा बना हुआ है।
इन हालातों में यूपी के आगामी चुनाव उम्‍मीदवारों के साथ-साथ पार्टियों की भी दोहरी परीक्षा लेने वाले हैं क्‍योंकि जो तबका उनकी जीत में अहम भूमिका निभाने जा रहा है, उसकी दुनिया सोशल मीडिया तक सिमट चुकी है और जो चुनाव मैदान में उतरने वाले हैं, उनके लिए सोशल मीडिया किसी काले जादू से कम नहीं। हारकर ”मुन्‍ना भाइयों” को हायर करना ही एकमात्र रास्‍ता बचता है।
अब देखना यह होगा कि यह ”मुन्‍ना भाई” किसकी लुटिया डुबोते हैं और किसकी नैया पार लगाते हैं क्‍योंकि गुजारा तो इनके बगैर होने से रहा।
-Legend News

शुक्रवार, 27 मई 2016

जब यमुना में यमुना जल ही नहीं, तो प्रदूषण मुक्‍ति की कवायद किसलिए ?

यमुना नदी को प्रदूषण मुक्‍त कराने के लिए 17 वर्ष पूर्व इलाहाबाद हाईकोर्ट में मथुरा के प्रसिद्ध हिंदूवादी नेता गोपेश्‍वरनाथ चतुर्वेदी ने जो जनहित याचिका दायर की थी और जिसे काफी गंभीरता से लेते हुए हाईकोर्ट ने तमाम दिशा-निर्देश जारी किए थे, क्‍या आज वो याचिका तथा उसके आधार पर दिए गए सारे दिशा-निर्देश कोई मायने रखते हैं ?
क्‍या इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा सन् 1998 में दिए गए ये आदेश-निर्देश ही आज विभिन्‍न सरकारी व गैर सरकारी इकाइयों तथा राज्‍य व केंद्र सरकारों के मुलाजिमों के लिए हर साल करोड़ों रुपए हड़प जाने का जरिया बने हुए हैं ?
क्‍या यमुना को प्रदूषण मुक्‍त करने व कराने के नाम पर ऊपर से नीचे तक जो खेल खेला जा रहा है, वह सिर्फ और सिर्फ आम जनता की आंखों में धूल झोंकते हुए धार्मिक भावनाओं को कैश करने का माध्‍यम है ?
क्‍या यमुना को प्रदूषण मुक्‍त रखने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के बाद अब नेशनल ग्रीन ट्रिब्‍यूनल (एनजीटी) में दायर की गई याचिका का कोई औचित्‍य है ?
ये चार सवाल हैं, जो यमुना की वर्तमान दशा और उसके लिए किए जा रहे प्रयासों की दिशा तय करते हैं। इन सवालों में ही यमुना की प्रदूषण मुक्‍ति का सच छिपा है।
सबसे पहले बात करते हैं सवाल नंबर एक की, जो यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने के लिए 17 वर्ष पूर्व दायर की गई याचिका तथा उसके आधार पर शासन-प्रशासन को दिए गए दिशा-निर्देशों से जुड़ा है।
वर्ष 1998 में जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के अंदर यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने के लिए याचिका दायर की गई थी, तब यमुना नदी का इतना बुरा हाल नहीं था। तब यमुना में जितना पानी दिखाई देता था, उसमें काफी मात्रा यमुना के वास्‍तविक जल की भी रहा करती थी और इसलिए उसमें जलचरों को स्‍वछंद विचरण करते देखा जाता था। धार्मिक आस्‍था रखने वाले लोग भी तब बेखौफ होकर यमुना जल में न केवल स्‍नान किया करते थे बल्‍कि नियमित रूप से उसका पान (आचमन) भी करते थे।
यही कारण था कि इलाहाबाद हाइकोर्ट ने तब यमुना को प्रदूषण मुक्‍त रखने के लिए जो आदेश-निर्देश दिए उनमें प्रमुख रूप से मथुरा की पशु वधशाला को पूरी तरह बंद करने तथा यमुना में गिरने वाले नालों को टेप करने की बात थी। इस कार्य के लिए कोर्ट ने मथुरा के एक एडीएम को नोडल अधिकारी नियुक्‍त करते हुए उन्‍हें न्‍यायिक अधिकारों तक से सुसज्‍जित किया।
शुरूआती दिनों में ऐसा लगा भी कि कोर्ट के आदेश-निर्देशों की गंभीरता के मद्देनजर प्रशासन सख्‍त रुख अपनायेगा और यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने का सिलसिला शुरू होगा किंतु जैसे-जैसे समय बीतता गया, वैसे-वैसे सच्‍चाई सामने आने लगी।
मथुरा में दरेसी रोड पर चलने वाली पशु वधशाला बंद तो हुई, किंतु सिर्फ कागजों पर। हकीकत में यह हुआ कि जिस पशु वधशाला में पहले नगर पालिका की इजाजत से एक निर्धारित संख्‍या में पशुओं का कटान किया जाता था, वहां अब बेहिसाब पशु काटे जाने लगे क्‍योंकि अब पशु कटान करने वालों को किसी से इजाजत लेने की जरूरत नहीं रह गई थी।
इसी प्रकार पहले जहां बाकायदा एक जगह पर पशु वधशाला हुआ करती थी और केवल उसी जगह पशुओं का कटान होता था, वहीं अब इस कार्य को करने वालों ने गली-गली, मौहल्‍ला-मौहल्‍ला और यहां तक कि घर-घर में पशु काटना शुरू कर दिया।
दूसरी ओर यमुना एक्‍शन प्‍लान के तहत आने वाले करोड़ों रुपए का बंदरबांट होने लगा और यमुना में गिरने वाले नाले-नालियों की टेपिंग का कार्य भी फाइलों तक सीमित होकर रह गया।
इन 17 वर्षों में जनसंख्‍या कहां से कहां जा पहुंची और उसी अनुपात में यमुना का प्रदूषण भी नित नए रिकॉर्ड कायम करता रहा। एक स्‍थिति ऐसी आ गई कि यमुना में दिखाई देने वाला जल, यमुना जल न होकर मात्र रासायनिक कचरा तथा मानव निर्मित गंदगी के अलावा कुछ नहीं था।
17 साल बाद अब जबकि एक बार फिर यमुना को प्रदूषण मुक्‍त रखने के लिए एनजीटी में याचिका दायर की गई है और एक बार आदेश-निर्देशों की श्रृंखला शुरू होती नजर आ रही है, तब बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि जिस यमुना में यमुना का जल ही नहीं है। जो दिखाई दे रहा है, वह मात्र नाले-नालियों व औद्योगिक इकाइयों की गंदगी भर है तो आखिर किसे प्रदूषण मुक्‍त कराने की कवायद की जा रही है ?
तब इलाहाबाद हाईकोर्ट से लेकर आज एनजीटी तक में याचिका दायर करने वाले गोपेश्‍वरनाथ चतुर्वेदी भी यह स्‍वीकार करते हैं कि हथिनी कुंड (हरियाणा) के बाद यमुना में जल के नाम पर अब जो कुछ दिखाई दे रहा है, उसमें एक बूंद भी यमुना जल नहीं है। जो कुछ है वह सिर्फ गंदगी है।
लेकिन गोपेश्‍वर नाथ चतुर्वेदी का कहना यह है कि यमुना को प्रदूषण मुक्‍त करने की आड़ में एसटीपी तथा एसपीएस संचालन के लिए जो ठेका हर साल उठाया जा रहा है और जिसकी अब तक मात्र खानापूर्ति करके करोड़ों रुपए का बंदरबांट किया जाता रहा है, वह कम से कम संचालित तो किए जाएंगे।
उनकी मानें तो एनजीटी के डर से ही प्रशासन सक्रिय हो रहा है और पालिका प्रशासन जवाब देने पर मजबूर है, लेकिन गोपेश्‍वरनाथ चतुर्वेदी यह नहीं बता पाते कि अब जबकि यमुना में यमुना के जल का अंश ही नहीं है तो एसटीपी तथा एसपीएस संचालन का क्‍या लाभ।
यमुना में यमुना का जल प्रवाहित न हो पाने तक क्‍यों नहीं एसटीपी तथा एसपीएस संचालन जैसी प्रक्रिया ही समाप्‍त कर देनी चाहिए जिससे हर साल भ्रष्‍टाचार की भेंट चढ़ रहे करोड़ों रुपए तो बचाए जा सकें।
इसके अलावा लोगों को यह भी समझ में आना चाहिए कि 17 वर्ष पूर्व इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यमुना को प्रदूषण मुक्‍त रखने के लिए जो आदेश-निर्देश दिए थे, वो अब अपनी सार्थकता खो चुके हैं क्‍योंकि यमुना में यमुना जल ही शेष नहीं रहा।
अब बात सवाल नंबर दो की, जिसके तहत यमुना प्रदूषण मुक्‍ति के काम से जुड़े लगभग सभी सरकारी व गैर सरकारी संगठन कई चरणों का पैसा डकार चुके हैं और पैसा खाने का यह खेल अब भी जारी है।
आश्‍चर्य की बात तो यह है कि ”जे नर्म” के नाम से पहचानी जाने वाली जवाहर लाल नेहरू नेशनल अरबन रिन्‍यूअल मिशन नामक केंद्र सरकार की योजना में भी इन तत्‍वों ने यमुना को प्रदूषण मुक्‍त करने के लिए 104 करोड़ रुपया स्‍वीकृत करा लिया किंतु उसका क्‍या हश्र हुआ, यह तो सबके सामने है लेकिन पैसा कहां गया, यह किसी को पता नहीं।
सवाल नंबर तीन के जवाब में यह साफ है कि यमुना को प्रदूषण मुक्‍त करने व कराने के नाम पर ऊपर से नीचे तक खेला जा रहा खेल केवल जनभावनाओं का दोहन तथा धार्मिक भावनाओं को कैश करने का उपक्रम है क्‍योंकि इसी से वोट की राजनीति भी जुड़ी है और इसी से अनेक लोगों के निजी हित सध रहे हैं।
तमाम संगठन और उनके पदाधिकारी आज यमुना प्रदूषण के मुद्दे पर अपनी दुकान जमा चुके हैं और उनके लिए यह अच्‍छे-खासे व्‍यवसाय का रूप ले चुका है। यमुना प्रदूषण को लेकर उठ खड़े हुए संगठनों की संख्‍या और सबके द्वारा अपनी-अपनी ढपली से अपना-अपना अलग राग अलापना, खुद-ब-खुद इसकी पुष्‍टि करता है अन्‍यथा यदि सबका मकसद एक है तो सबके राग-द्वेष अलग-अलग क्‍यों हैं।
अब चौथे और अंतिम सवाल पर आते हैं क्‍योंकि यह एनजीटी में दायर की गई उस नई याचिका से ताल्‍लुक रखता है जिसने फिर से लोगों में यमुना प्रदूषण मुद्दे को लेकर उम्‍मीद की नई किरण पैदा कर दी है।
इस सवाल का एक ही जवाब हो सकता है। और जवाब यह है कि जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पिछले 17 सालों से धूल फांक रहे हैं, तो क्‍या एनजीटी के आदेश कुछ कर पाएंगे।
गौरतलब है कि एनजीटी में दायर की गई याचिका का मुद्दा फिलहाल एसटीपी तथा एसपीएस के संचालन से जुड़ा है, न कि इससे कि यमुना में यमुना का जल शेष है भी या नहीं। अर्थात एनजीटी के आदेश-निर्देश अधिकतम यमुना में गिरने वाली गंदगी को साफ करा सकते हैं। उस गंदगी को साफ करके यमुना के नदी होने का भ्रम पैदा करा सकते हैं लेकिन यमुना जल नहीं दिला सकते।
कुल मिलाकर यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट से शुरू की गई कवायद एनजीटी तक आते-आते आज गंदे पानी को साफ करके ही यमुना नदी का भ्रम पैदा करा देने के संतोष पर आकर खड़ी हो गई है।
जहां तक सवाल यमुना को प्रदूषण मुक्‍त करने व कराने का है तो याचिकाकर्ता गोपेश्‍वरनाथ चतुर्वेदी और उनके सहायक व कृष्‍ण जन्‍मस्‍थान सेवा संस्‍थान के जनसंपर्क अधिकारी विजय बहादुर सिंह दोनों मानते हैं कि यमुना के मामले में केंद्रीय जल संसाधन मंत्री साध्‍वी उमा भारती भी गाल बजाने के अतिरिक्‍त कुछ नहीं कर रहीं।
बेहतर होगा कि जहर से जहर को मारने वाली चिर-परिचित चिकित्‍सा पद्धति पर अमल करते हुए दलगत राजनीति से इतर जनता भी 2017 के चुनाव में यमुना को मुद्दा बनाकर उसी पार्टी के लिए वोट करे जो पार्टी चुनावों से पूर्व यमुना में अविरल यमुना जल को प्रवाहित करने तथा फिर उसे निर्मल बनाए रखने की दिशा में ठोस कदम उठाती दिखाई दे।
खालिस वोट की राजनीति के इस दौर में वोट को ही हथियार बनाकर जब तक जनता यमुना प्रदूषण को चुनावी मुद्दा नहीं बनायेगी, तब तक हर आदेश-निर्देश का इसी प्रकार मजाक उड़ाया जाता रहेगा और इसी प्रकार पतित पावनी यमुना पतितों के पाप ढोती रहेगी।
आज उसका अस्‍तित्‍व हरियाणा से आगे समाप्‍त हुआ है, कल हरियााणा से ऊपर भी समाप्‍त हो सकता है। तब पहाड़ों के रास्‍ते दिखाकर लोग संभवत: यह बताने लगें कि कभी यहां से होकर यमुना नदी गुजरा करती थी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बुधवार, 11 मई 2016

पौने दो करोड़ रुपए के घपले में शामिल Chairman मनीषा गुप्‍ता को आखिर कौन बचा रहा है?

मथुरा नगर पालिका की Chairman मनीषा गुप्‍ता पर करीब पौने दो करोड़ रुपए के घपले में शामिल होने का आरोप है। मनीषा गुप्‍ता पर ये आरोप नीचे से ऊपर तक तमाम जांच पूरी हो जाने के बाद लगे हैं।
जांच करने वाले तीनों अधिकारियों अपर जिलाधिकारी कानून-व्‍यवस्‍था/प्रभारी अधिकारी स्‍थानीय निकाय एस. के. शर्मा, जिलाधिकारी राजेश कुमार तथा कमिश्‍नर आगरा मंडल प्रदीप भटनागर द्वारा पालिका अध्‍यक्ष मनीषा गुप्‍ता सहित घोटाले में लिप्‍त पाए गए सभी अधिकारी व कर्मचारियों के खिलाफ शासन से कार्यवाही की संस्‍तुति भी की जा चुकी है, बावजूद इसके अब तक कार्यवाही नहीं की गई जिससे साफ जाहिर है कि पालिका को करोड़ों रुपए का चूना लगाने वालों के सिर पर किसी न किसी का हाथ जरूर है।
मनीषा गुप्‍ता के खिलाफ कार्यवाही की संस्‍तुति किए जाने के बावजूद अब तक कुछ न किया जाना इसलिए और आश्‍चर्यजनक है क्‍योंकि मनीषा गुप्‍ता भाजपा से हैं जबकि प्रदेश में शासन समाजवादी पार्टी का है तथा प्रदेश के नगर विकास मंत्री वो आजम खां हैं, जो भाजपा के नाम से भी खासी चिढ़ रखते हैं।
नगर पालिका में हुए इस बड़े घोटाले का सच तब सामने आया जब पालिका के ही एक पूर्व सभासद हेमंत अग्रवाल ने घपले की जांच कराने के लिए कमिश्‍नर आगरा मंडल से पत्राचार किया।
इस शिकायती पत्र के मुताबिक यह घपला नगर पालिका परिषद मथुरा द्वारा एसटीपी व एसपीएस के संचालन हेतु उठाए गए ठेके में भारी अनियमितताएं करके किया गया और इसमें पालिका अध्‍यक्ष मनीषा गुप्‍ता के अतिरिक्‍त अधिशासी अधिकारी के. पी. सिंह, अवर अभियंता (जलकल) के. आर. सिंह, सहायक अभियंता उदयराज, लेखाकार विकास गर्ग तथा लिपिक टुकेश शर्मा शामिल थे।
कमिश्‍नर आगरा मंडल प्रदीप भटनागर ने पूर्व सभासद के शिकायती पत्र पर जिलाधिकारी मथुरा को सक्षम अधिकारी से जांच कराने के आदेश कर दिए। इस आदेश के आधार पर जिलाधिकारी मथुरा ने अपर जिलाधिकारी कानून-व्‍यवस्‍था/प्रभारी अधिकारी स्‍थानीय निकाय एस. के. शर्मा को घोटाले की जांच सौंप दी।
अपर जिलाधिकारी ने जांच में पाया कि यमुना किनारे बने नगर पालिका मथुरा के एसटीपी एवं एसपीएस के संचालन हेतु जो निविदा 24 जून 2014 तक आमंत्रित की गई, उसकी बहुत सी शर्तों को दरकिनार कर फरीदाबाद (हरियाणा) की फर्म मै. स्‍टील इंजीनियर्स की 01 करोड़ 74 लाख 13 हजार 400 सौ रुपए की निविदा स्‍वीकार कर ली गई और 30 जून 2014 को कार्यादेश भी जारी कर दिया गया जबकि निविदा डालने वालों में एक फर्म पंप इंजीनियर्स एवं ट्रेडर्स मथुरा से थी तथा एक अन्‍य फर्म मैसर्स लॉर्ड कृष्‍णा एण्‍टरप्राइजेस, लुधियाना (पंजाब) से थी।
जांच में यह भी पता लगा कि निविदा के लिए 22 फरवरी 2014 को नगर पालिका परिषद की बोर्ड बैठक में जो नियम व शर्तें निर्धारित की गईं थीं, उनके अनुसार निविदा उसी फर्म को दी जा सकती थी जिसका रजिस्‍ट्रेशन मथुरा नगर पालिका में हो अथवा उसके द्वारा निविदा पाने के एक सप्‍ताह में यहां रजिस्‍ट्रेशन करा लिया जाए।
इस शर्त में पर्याप्‍त सुविधा होने पर भी फरीदाबाद (हरियाणा) की फर्म मै. स्‍टील इंजीनियर्स ने निविदा पाने के बाद कभी नगर पालिका मथुरा में अपना रजिस्‍ट्रेशन कराना जरूरी नहीं समझा।
इसके अलावा नियमों के विपरीत फर्म का चरित्र प्रमाण पत्र हरियाणा का था और हैसियत प्रमाण पत्र तथा वाणिज्‍य कर प्रमाणपत्र भी हरियाणा से ही बने थे।
इस दौरान पालिका द्वारा हैसियत की राशि पहले 50 लाख, फिर 25 लाख और उसके बाद फिर 50 लाख रुपए की गई और इसके लिए समाचार पत्रों में विज्ञापन कराया गया।
उल्‍लेखनीय है कि हैसियत व चरित्र प्रमाण पत्र को लेकर जारी शासनादेश के अनुसार दो लाख या उससे अधिक प्रत्‍येक सरकारी कार्य, ठेका अथवा निविदा किसी विभाग द्वारा तब तक स्‍वीकार नहीं की जा सकती जब तक आयकर व व्‍यापार कर विभाग, जिला मजिस्‍ट्रेट तथा पुलिस अधीक्षक की ओर से निविदादाता के पक्ष में अनापत्‍ति प्रमाण पत्र (एनओसी) निर्गत न कर दिया गया हो।
इसी प्रकार निविदादाता के पक्ष में जब तक जिले के पुलिस कप्‍तान द्वारा चरित्र प्रमाण पत्र तथा डीएम द्वारा निविदादाता की आर्थिक क्षमता और पूर्व में उसके द्वारा किए गए कार्यों को लेकर निर्धारित प्रमाण पत्र जारी न कर दिया जाए, तब तक उसके नाम निविदा नहीं की जा सकती।
अपर जिलाधिकारी ने जांच में पाया कि लुधियाना की फर्म मैसर्स लॉर्ड कृष्‍णा एण्‍टरप्राइजेस को हैसियत प्रमाण पत्र न होने तथा चरित्र प्रमाण पत्र भी नौकरी के लिए ही मान्‍य होने के बावजूद उसकी निविदा स्‍वीकार कर ली गई।
इसी प्रकार द्वारिकापुरी कॉलोनी मथुरा की फर्म मै. पंप इंजीनियर्स एंड ट्रेडर्स की हैसियत 35 लाख रुपए तक ही होने पर भी उसकी निविदा भी स्‍वीकार कर ली गई जबकि बोर्ड के प्रस्‍ताव में हैसियत 50 लाख रुपए निर्धारित थी।
इन अनियमितताओं से स्‍पष्‍ट है कि मथुरा तथा लुधियाना की फर्मों ने हरियाणा की फर्म के पक्ष में म्‍यूचुअल अंडरस्‍टेंडिंग के तहत निविदा डालीं और नगर पालिका परिषद ने पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार हरियाणा की फर्म को निविदा जारी कर दी। निविदा के लिए निर्धारित हैसियत की राशि में भी बार-बार फेरबदल करना नगर पालिका की मंशा को साफ जाहिर करता है।
यही नहीं, अपर जिलाधिकारी ने जांच में यह भी पाया कि निविदा प्राप्‍त करने वाली फर्म के प्रोप्राइटर तो कर्मवीर मेहता हैं लेकिन निविदा में हैसियत प्रमाण पत्र श्रीमती सुमन मेहता के नाम है जो उनकी पत्‍नी हैं।
निविदा पाने वाली फर्म और निविदा देने वाली संस्‍था नगर पालिका मथुरा की बदनीयत इससे इसलिए स्‍पष्‍ट होती है क्‍योंकि डिफॉल्‍टर होने की स्‍थिति में पत्‍नी होने के बावजूद कानूनन सुमन मेहता, कर्मवीर मेहता के किसी कार्य के लिए उत्‍तरदायी नहीं मानी जा सकतीं।
इसके अलावा अपर जिलाधिकारी ने जांच में यह निष्‍कर्ष निकाला कि टेक्‍नीकल बिड तथा फाइनेन्‍सियल बिड के नियमों में भी घपला किया गया और टेक्‍नीकल बिड को स्‍वीकृत करने का कोई भी आदेश न तो टेंडर कमेटी द्वारा पारित किया गया और ना ही पालिका परिषद अथवा पालिका बोर्ड द्वारा उस पर कोई निर्णय लिया गया।
जांच के दौरान एक और अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण बात यह पता लगी कि निविदा पाने वाली हरियाणा की फर्म मै. स्‍टील इंजीनियर्स ने श्रम विभाग में अपने कर्मचारियों की कुल संख्‍या 16 दिखा रखी है जो मथुरा की एसटीपी व एसपीएस संचालन के लिहाज से काफी कम थी।
मथुरा नगर पालिका क्षेत्र में कुल एक दर्जन एसपीएस हैं और दो एसटीपी हैं। आठ-आठ घंटे की शिफ्ट के अनुसार चौबीसों घंटे इनका संचालन करने के लिए कुल 84 कर्मचारियों की जरूरत पड़ती है। ऐसे में मात्र 16 कर्मचारियों वाली फर्म को ठेका दे देना अपने आप में सवाल खड़े करता है। वो भी तब जबकि ठेका पाने वाली फर्म की पत्रावली पर कर्मचारियों की संख्‍या का कोई उल्‍लेख ही न किया गया हो।
जांच अधिकारी एडीएम के अनुसार, ठेका उठाने की तारीख 30 जून 2014 से लेकर जांच रिपोर्ट देने की तिथि 13 अप्रैल 2015 तक, प्रशासनिक अधिकारियों ने कई बार एसटीपी व एसपीएस के संचालन का निरीक्षण किया लेकिन इस दौरान प्राय: स्‍टेशन बंद पाए गए तथा गंदगी सीधे यमुना में गिरती मिली।
नगर पालिका ने एसटीपी व एसपीएस संचालन के लिए किसी कमेटी का भी गठन नहीं किया जबकि नगर पालिका अधिनियम 1916 की धारा 104 के अनुसार पालिका कार्यों के अनुरक्षण व सत्‍यापन हेतु सभासदों की एक कमेटी बनाया जाना जरूरी है।
जांच अधिकारी ने जिलाधिकारी को प्रेषित अपनी रिपोर्ट में साफ-साफ लिखा है कि इन हालातों के चलते 01 करोड़ 74 लाख 13 हजार 400 सौ रुपए की बड़ी धनराशि का दुरुपयोग होना संभावित प्रतीत होता है और जिसके लिए नगर पालिका परिषद मथुरा की अध्‍यक्ष श्रीमती मनीषा गुप्‍ता, अधिशाषी अधिकारी के. पी. सिंह सहित अवर अभियंता (जलकल) के. आर सिंह, सहायक अभियंता उदयराज, लेखाकार विकास गर्ग, तथा लिपिक टुकेश शर्मा समान रूप से दोषी हैं।
जांच अधिकारी के मुताबिक ठेकेदार को भुगतान की गई 01 करोड़ 74 लाख 13 हजार 400 सौ रुपए की बड़ी धनराशि संबंधित लोगों से वसूल किया जाना उचित प्रतीत होता है।
अपर जिलाधिकारी एस. के. शर्मा की इस जांच और दोषियों से पैसा वसूलने की संस्‍तुति को क्रमश: जिलाधिकारी राजेश कुमार एवं कमिश्‍नर आगरा मंडल प्रदीप भटनागर ने भी सही पाया तथा शासन से दोषियों के खिलाफ सख्‍त कार्यवाही करने की सिफारिश की लेकिन एक साल से ऊपर का समय बीत जाने के बाद भी किसी दोषी के खिलाफ अब तक कोई कार्यवाही नहीं हुई जिससे इतना तो पता लगता है कि दोषियों को अखिलेश की सरकार में किसी न किसी का संरक्षण अवश्‍य मिला हुआ है।
करीब पौने दो करोड़ रुपए के घोटाले में लिप्‍त इन प्रभावशाली दोषियों के खिलाफ शासन स्‍तर से कार्यवाही न होने पर 12 दिसंबर 2015 को नागरिक कल्‍याण समिति (रजि.) मथुरा के अध्‍यक्ष उमेश भारद्वाज तथा सचिव राजीव कुमार सिंह ने प्रदेश के मुख्‍यमंत्री को भी एक पत्र लिखा और भ्रष्‍टाचार, अनियमितता एवं पद के दुरूपयोग के इस पूरे प्रकरण की जांच सतर्कता विभाग अथवा सीबीआई से कराने की मांग की क्‍योंकि जांच में दोषी पाए गए अधिशाषी अधिकारी के. पी. सिंह बिना किसी कार्यवाही के अवकाश प्राप्‍त कर चुके हैं। जिलाधिकारी कार्यालय से मूल जांच पत्रावली गायब कर दी गई है, नगर पालिका परिषद ने निविदा पाने वाली फर्म मै. स्‍टील इंजीनियर्स को ब्‍लैकलिस्‍टेड तक नहीं किया है और चालू वित्‍त वर्ष में बिना ठेका उठाए उसी से न केवल कार्य कराए जा रहे हैं बल्‍कि उसे भुगतान भी किया जा रहा है। जांच में दोषी पाए गए सहायक अभियंता लगातार अपना कार्य कर रहे हैं जिसमें करोड़ों रुपए के भुगतान शामिल हैं।
जहां तक सवाल एसटीपी व एसपीएस के संचालन का है तो वह अब भी जांच रिपोर्ट की स्‍थिति को प्राप्‍त हैं, जिस कारण गंदगी सीधे यमुना में गिर रही है।
12 दिसंबर 2015 को मुख्‍यमंत्री के नाम प्रेषित इस शिकायती पत्र पर भी कोई कार्यवाही न होने से क्षुब्‍ध नागरिक कल्‍याण समिति (रजि.) मथुरा ने इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय की शरण ली, जिस पर उच्‍च न्‍यायालय ने याचियों से नेशनल ग्रीन ट्रिब्‍यूनल (NGT) में जाने का परामर्श दिया है।
अब नागरिक कल्‍याण समिति कानून-व्‍यवस्‍था की इस बदहाली, उच्‍च अधिकारियों की जांच रिपोर्ट तथा लोकतंत्र को मजाक बनाकर रख देने वाली व्‍यवस्‍था के खिलाफ नेशनल ग्रीन ट्रिब्‍यूनल (NGT) में जाने की तैयारी कर रही है।
पौने दो करोड़ रुपए के घपले में दोषी पाई गईं नगर पालिका अध्‍यक्ष मनीषा गुप्‍ता से जब ”लीजेंड न्‍यूज़” ने अपना पक्ष रखने को कहा तो उनके पति राजेश गुप्‍ता ने सारे प्रकरण को राजनीति से प्रेरित बताया किंतु तकनीकी तौर पर सफाई देने में असमर्थता प्रकट की।
राजेश गुप्‍ता की मानें तो उनके व उनकी पत्‍नी के राजनीतिक विरोधी इस मामले को अब इसलिए तूल दे रहे हैं क्‍योंकि उनकी पत्‍नी मथुरा-वृंदावन विधानसभा सीट से भाजपा के संभावित उम्‍मीदवारों में प्रबल दावेदार हैं। उनकी पत्‍नी ने चूंकि मथुरा नगर पालिका का संचालन काफी बेहतर तरीके से किया है इसलिए पूरी उम्‍मीद है कि वह भाजपा की टिकट पर मथुरा-वृंदावन विधानसभा क्षेत्र से 2017 का चुनाव लड़ेंगी।
दूसरी ओर नगर पालिका में हुए इस बड़े घोटाले की शिकायत करने वालों का कहना है कि मनीषा गुप्‍ता के पास अभी करीब सवा साल का कार्यकाल शेष है, ऐसे में यदि उनके खिलाफ समय रहते ठोस कार्यवाही नहीं की गई तो वह मथुरा नगर पालिका को पता नहीं कितने करोड़ का चूना और लगा देंगी क्‍योंकि केंद्र व प्रदेश सरकार से मथुरा नगर पालिका क्षेत्र में सैकड़ों करोड़ रुपए के विकास कार्य कराया जाना प्रस्‍तावित है।
रहा सवाल भाजपा की टिकट पर मथुरा-वृंदावन विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ने के ख्‍वाब संजोने का, तो उनका यह ख्‍वाब शायद ही कभी पूरा हो। हां, यह जरूर हो सकता है कि उससे पहले मनीषा गुप्‍ता और उनके सहयोगी जेल यात्रा कर लें क्‍योंकि लखनऊ अभी बहुत दूर है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

”गिफ्ट” के सहारे ”हाथी” की सवारी का सपना कितना सच

इस चित्र में बसपा सुप्रीमो मायावती को जो हाथी ”गिफ्ट” किया जा रहा है, वह सोने का है या चांदी का अथवा किसी अन्‍य धातु का…इसका तो पता नहीं लेकिन चित्र देखने से लगता है कि उक्‍त हाथी निश्‍चित ही बहिनजी की पसंद वाला और उनकी गरिमा के अनुकूल रहा होगा क्‍योंकि न तो मायावती को ऐरा-गैरा हाथी देने की हिमाकत कोई कर सकता है और न मायावती किसी ऐरे-गैरे के हाथों से हाथी की भेंट ले सकती हैं। आखिर वो हाथी ही तो है जिसने मायावती को चार-चार बार सूबे की सवारी करवा दी और बड़ों-बडों को धूल फांकने पर मजबूर कर दिया।
यह हाथी अष्‍टधातु का भी हो सकता है क्‍योंकि इसे देने वाले की भी हैसियत कम नहीं है।
बहिनजी को हाथी भेंट करने वाले सज्‍जन से मथुरा जनपद भली-भांति परिचित है क्‍योंकि यह बहिन मायवती के अति करीबियों में शुमार वृंदावन नगर पालिका की पूर्व अध्‍यक्ष पुष्‍पा शर्मा के पुत्र योगेश द्विवेदी हैं। वही योगेश द्विवेदी जो बसपा की ही टिकट पर 2014 का लोकसभा चुनाव मथुरा से लड़े थे किंतु जीत नहीं पाए।
इस बार वह मथुरा-वृंदावन विधानसभा क्षेत्र से अब तक बसपा की उम्‍मीदवारी का दावा कर रहे हैं। बसपा ने भी अब तक कुछ ऐसे ही संकेत दे रखे हैं कि योगेश द्विवेदी मथुरा-वृंदावन से उनके उम्‍मीदवार होंगे। हालांकि बसपा के संकेत कितने भरोसेमंद होते हैं, इसे डॉ. अशोक अग्रवाल अच्‍छे से जानते हैं। वही डॉ. अशोक अगवाल जो योगेश द्विवेदी की ही तरह आज सपा के मथुरा-वृंदावन सीट से उम्‍मीदवार हैं किंतु कभी बसपा के निष्‍ठावान सिपाही माने जाते थे। बसपा ने उन्‍हें भी योगेश द्विवेदी की ही तरह अंत तक अपना संभावित प्रत्‍याशी बनाए रखा। यहां तक कि डॉ. अशोक अग्रवाल ने नामांकन भरने की पूरी तैयारी के साथ विश्रामघाट जाकर अपने लाव-लश्‍कर के साथ यमुना पूजन भी कर डाला।
यमुना पूजन के बाद अचानक लखनऊ से आकाशवाणी हुई कि मथुरा-वृंदावन से बसपा के टिकट पर चुनाव डॉ. अशोक अग्रवाल की जगह देवेन्‍द्र गौतम उर्फ गुड्डू भइया चुनाव लड़ेंगे। डॉ. अशोक अग्रवाल ने इस आकाशवाणी के खिलाफ यथासंभव प्रयास किया लेकिन उनकी पतंग लखनऊ से काटकर गुड्डू भइया के हाथ में थमा दी गई थी लिहाजा डॉ. साहब के सारे प्रयास बेकार साबित हुए। डॉ. साहब, गुड्डू भइया की चरखी पकड़कर उनकी पतंग के पैंच देखते रह गए।
कहा जाता है कि पार्टी से चुनाव लड़ने की हरी झंडी पाने के लिए डॉ. अशोक अग्रवाल ने भी बहिनजी को इसी तरह कई हाथी भेंट किए थे जिस तरह योगेश द्विवेदी कर रहे हैं लेकिन कोई हाथी फिर काम नहीं आया। पार्टी के लोगों का कहना है कि बहिनजी ने सारे हाथियों का डॉ. अशोक अग्रवाल को किश्‍तों में ”रिटर्न गिफ्ट” दे दिया।
तब से डॉ. अशोक अग्रवाल समाजवादी हो गए, और समाजवादी पार्टी की ओर से पिछला विधानसभा चुनाव भी लड़ लिए। ये बात अलग है कि मुलायम के कुनबे की इस पार्टी के लिए कृष्‍ण की भूमि अब तक ऊसर साबित हुई है लिहाजा डॉ. अशोक बहुत कम मतों से तीसरे नंबर पर रहे। इस बार वह फिर पूरी तैयारी में हैं।
यह सर्वविदित है कि बहिनजी के दरबार में इस पुरानी कहावत पर पूरी तरह अमल होता है कि समझदार लोग राजा, गुरू और तीर्थस्‍थान से मुलाकात करने कभी खाली हाथ नहीं जाते। अपनी हैसियत के अनुसार पत्र-पुष्‍प की भेंट लेकर ही मिलते हैं। ऐसे में योगश द्विवेदी बहिनजी से खाली हाथ मिलते भी कैसे। हाथी चूंकि पार्टी का चुनाव चिन्‍ह भी है और बहिनजी को अति प्रिय भी है इसलिए हाथी से अच्‍छी भेंट कोई हो नहीं सकती थी।
योगेश द्विवेदी ने बहिनजी को जो हाथी भेंट किया, पता नहीं उसका नंबर कौन सा था लेकिन फोटो देखकर इतना अवश्‍य पता लग रहा है कि इस हाथी की भेंट तब चढ़ाई गई थी जब मथुरा के कद्दावर जाट नेता चौधरी लक्ष्‍मीनारायण भी हाथी की पूंछ पकड़कर अपनी राजनीतिक वैतरणी पार करने में लगे थे।
इन दिनों चौधरी लक्ष्‍मीनारायण कमल का फूल लेकर चल रहे हैं और उसी के बल पर उनकी धर्मपत्‍नी ममता चौधरी मथुरा जिला पंचायत की अध्‍यक्ष बनी बैठी हैं।
राजनीति की बिसात पर खेले जाने वाले शतरंज के खेल में प्‍यादों की अहमियत तो बहुत होती है किंतु उनके ”सिर” हमेशा खेल खेलने वालों के हाथ रहते हैं।
यही कारण है कि कभी बसपा के निष्‍ठावान कार्यकर्ता डॉ. अशोक अग्रवाल आज समाजवादी पार्टी के निष्‍ठावान सिपाही हैं और थोड़े दिनों पहले तक हाथी के झंडे वाली हूटर लगी गाड़ी पर लालबत्‍ती लगाए मंत्री पद को सुशोभित करने वाले चौधरी लक्ष्‍मीनाराण के कंधों पर भाजपा का कमल खिलाने की जिम्‍मदारी है।
खैर, योगेश द्विवेदी का हाथी यूपी के विधानसभा चुनावों तक किस करवट बैठता है, यह तो बता पाना फिलहाल संभव नहीं है लेकिन उनका बहिन जी को हाथी भेंट करता हुआ चित्र यह जरूर बताता है कि उम्‍मीदवारी की घोषणा चाहे जिस समय भी होती हो लेकिन उम्‍मीदवारी की प्रत्‍याशा में पता नहीं कितने हाथी और कब-कब भेंट करने पड़ते हैं।
ऊंट तो किसी पार्टी का चुनाव चिन्‍ह है नहीं इसलिए ”ऊंट के मुंह में जीरा” वाली कहावत यहां बेमानी है परंतु नई कहावत यह जरूर बनती है कि हाथी की सवारी के लिए हाथी को केले या गन्‍ना खिलाने का मतलब टिकट पाने की गारंटी कतई नहीं है।
हाथी का पेट बहुत बड़ा होता है, हाथी की भूख भी बहुत बड़ी होती है। ऐसे में जो उसके पेट की भूख समय पर पूरी तरह शांत कर सके, उसकी क्षुधा मिटा सके, हाथी उसका होता है। बाकी तो अंतिम सत्‍य वही है कि ”जाकौ हाथी, वाकौ नाम…चाहे घूम-फिर आवै गांव-गांव।
-लीजेंड न्‍यूज़

बुधवार, 27 अप्रैल 2016

Mission 2017: एक अनार और सौ बीमार की कहावत चरितार्थ कर रही है मथुरा-वृंदावन सीट

मथुरा। Mission 2017 के  तहत बेशक यूपी के विधानसभा चुनाव होने में लगभग पूरा एक साल बाकी है किंतु जहां तक सवाल राजनीतिक सरगर्मियों का है, तो वह काफी तेजी पकड़ती नजर आ रही हैं।
सबसे अधिक तेजी उन लोगों के बीच दिखाई दे रही है जो 2017 में चुनाव लड़ने का मन बना चुके हैं और उसके लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। ऐसे लोग किसी खास पार्टी का टिकट पाने की कोशिश में उस पार्टी के पहले से तय उम्‍मीदवारों का टिकट कटवाने के लिए भी बाकायदा बोली लगा रहे हैं।
राजनीति के महारथियों की मानें तो उत्‍तर प्रदेश में इस बार मुख्‍य मुकाबला भाजपा और बसपा के बीच होने जा रहा है। समाजवादी पार्टी चाहे जितना दम भर ले किंतु जनता उसके काम-काज से खुश नहीं है। विशेष तौर पर कानून-व्‍यवस्‍था की बदहाली, भ्रष्‍टाचार, जाति विशेष का दबदबा और बिजली की भारी किल्‍लत ने समाजवादी पार्टी की छवि को काफी प्रभावित किया है।
कांग्रेस तथा राष्‍ट्रीय लोकदल फिलहाल इस परिदृश्‍य में दूर-दूर तक नजर नहीं आ रहीं। कांग्रेस में यही पता नहीं लग पा रहा कि 2017 के लिए यूपी में उम्‍मीदवारों का चयन पार्टी के नए नवेले चुनाव विशेषज्ञ प्रशांत किशोर करेंगे या पार्टी हाईकमान। प्रशांत किशोर कांग्रेस को शायद भाजपा अथवा जद (यू) जैसी डिमांडिंग पार्टी समझ बैठे हैं, जिनके लिए काम करने के बाद वह एक ”ब्रांड” बनकर उभरे जबकि सच यह है कि कांग्रेस की टिकट पर यूपी में तो कोई आसानी से चुनाव लड़ने तक को तैयार नहीं होता।
रही बात चौधरी अजीत सिंह वाले राष्‍ट्रीय लोकदल की तो उसके बावत अभी इतना भी नहीं पता कि उनका ऊंट किस करवट बैठेगा। वह नीतीश के झण्‍डे तले चुनाव लड़ेंगे या अपना झण्‍डा लेकर।
इन हालातों के मद्देजनर राजनीति के महारथियों की यह बात सही प्रतीत होती है कि यूपी में मुख्‍य मुकाबला भाजपा और सपा के बीच ही होना है।
चूंकि कृष्‍ण की नगरी मथुरा का उत्‍तर प्रदेश में अलग महत्‍व है और यहां की राजनीतिक दशा व दिशा से समूचे पश्‍चिमी उत्‍तर प्रदेश का आंकलन किया जाता है इसलिए मथुरा पर एक ओर जहां प्रमुख पार्टियों के हाईकमान की निगाहें केंद्रित रहती हैं, वहीं दूसरी ओर चुनाव लड़ने के इच्‍छुक लोग भी अपनी नजरें गड़ाए रहते हैं।
राजनीतिक नजरिए से मथुरा इस मायने में भी खास है कि कई-कई बार सत्‍ता पर काबिज रहने के बावजूद समाजवादी पार्टी आज तक इस विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक जनपद के अंदर कभी अपना खाता तक नहीं खोल पाई।
पिछले चुनावों में मांट क्षेत्र से सपा ने अखिलेश के परम मित्र संजय लाठर को चुनाव मैदान में उतारा था और उन्‍हें जिताने के लिए पूरी ताकत भी झोंक दी थी, किंतु नतीजा वही ढाक के तीन पात रहा।
यही कारण है कि समाजवादी पार्टी की तमाम कोशिशों के बावजूद मथुरा में सपा का टिकट मांगने वाले ना के बराबर हैं। सपा के इतिहास में सर्वाधिक मत पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान मथुरा-वृंदावन क्षेत्र से उम्‍मीदवार डॉ. अशोक को मिले थे लेकिन फिर भी वह सीट नहीं निकाल पाए जबकि पिछले चुनावों में सपा की प्रदेश के अंदर हवा रही।
भाजपा और बसपा के मुख्‍य मुकाबले वाले इस जनपद में बसपा ने मथुरा-वृंदावन की सीट पर अब तक पुष्पा शर्मा के पुत्र योगेश द्विवेदी का नाम फाइनल किया हुआ है जबकि गोवर्धन से सिटिंग विधायक राजकुमार रावत का लड़ना तय है। मांट से श्‍यामसुंदर शर्मा तथा छाता से ठाकुर तेजपाल के नाम पर मोहर लगी हुई है। बल्‍देव (सुरक्षित) से भी नाम लगभग फाइनल किया जा चुका है। इस सबके बाद भी बहुत से लोग इन संभावित उम्‍मीदवारों की दावेदारी को चुनौती देने में लगे हैं और इनकी टिकट कटवाने का भरसक प्रयास कर रहे हैं। इन पांच नामों में भी सारा दारोमदार मथुरा-वृंदावन की सीट पर है। कई लोग तो योगेश द्विवेदी का टिकट कटवाने के लिए बहिनजी के दरबार में बाकायदा बोली लगाने को तैयार हैं। वह उन्‍हें इसके लिए मुंह मांगी कीमत अदा करने को तत्‍पर हैं। हालांकि पार्टी सूत्रों से बताया यह जा रहा है कि योगेश द्विवेदी का टिकट कटना आसान नहीं होगा क्‍योंकि योगेश द्विवेदी की माताजी तथा वृंदावन नगर पालिका की पूर्व अध्‍यक्ष पुष्‍पा शर्मा ने बहिनजी के दरबार में गहरी पैठ बना रखी है और लगातार वह पार्टी को अपने योगदान से सींचती रही हैं जिस कारण बहिनजी भी उनकी मुरीद हैं।
लोकसभा चुनाव 2014 के दौरान मोदी लहर में मथुरा का दबदबा रहने के कारण 2017 के विधान सभा चुनावों के लिए भाजपा से उम्‍मीदवारी का दावा करने वालों की फेहरिस्‍त सर्वाधिक लंबी है। इस फेहरिस्‍त में भी मथुरा-वृंदावन सीट से चुनाव लड़ने के इच्‍छुकों की संख्‍या चौंकाने वाली है।
यहां भी मथुरा-वृंदावन यानि शहरी सीट पर दावेदारी करने वालों की संख्‍या सबसे अधिक है। पिछली बार बहुत कम मतों से इस सीट को गंवाने वाले डॉ. देवेन्‍द्र शर्मा की दावेदारी तो स्‍वाभाविक है ही, उनके अलावा पूर्व मंत्री रविकांत गर्ग भी इस बार चुनाव लड़ने का पूरा मन बना चुके हैं।
इधर नगर पालिका अध्‍यक्ष मनीषा गुप्‍ता भी मथुरा-वृंदावन से टिकट मांग रही हैं। इस मामले में एक रोचक पहलू हालांकि यह जुड़ा हुआ है कि मथुरा के अंदर किसी पार्टी का कोई ऐसा नेता कभी विधायक नहीं बन पाया है जिसने नगर पालिका की अध्‍यक्षी कर ली हो किंतु मनीषा गुप्‍ता फिर भी स्‍वयं को प्रबल दावेदार मान रही हैं।
वरिष्‍ठ भाजपा नेता एस. के. शर्मा भी टिकट के दावेदारों में प्रमुख हैं और भाजपा छोड़कर रालोद का दामन थाम लेने वाले मुरारी अग्रवाल भी एक बार फिर दूसरे दावेदारों को चुनौती दे रहे हैं।
इनके अतिरिक्‍त हर विधानसभा चुनाव में मथुरा-वृंदावन से एक नाम सोहन लाल कातिब का भी उछलता है। बताया जाता है कि इस बार भी सोहन लाल कातिब पूरा जोर लगा रहे हैं।
वृंदावन से भी कुछ नाम दावेदारों की सूची में शामिल हैं और यही कारण है कि प्रदेश भाजपा अध्‍यक्ष बनने के बाद जब पहली बार केशव प्रसाद मौर्य बिहारी जी मंदिर के दर्शनार्थ यहां आए तो भाजपा की मथुरा व वृंदावन इकाई में साफ-साफ पाले खिंचे हुए दिखाई दिए। यहां तक कि केशव प्रसाद मौर्य को बाहर निकलने के लिए रास्‍ता बदलना पड़ा और उसके बाद वृंदावन की इकाई ने जिला अध्‍यक्ष डॉ. डी पी गोयल के खिलाफ बाकायदा मोर्चा खोल दिया। बताया जाता है कि डी पी गोयल खुद भी विधानसभा चुनाव लड़ने के इच्‍छुक हैं।
भारतीय जनता पार्टी का अब तक का इतिहास यह बताता है कि वह अपने उम्‍मीदवार ऐन वक्‍त पर तय करती है किंतु इस मर्तबा हवा का रुख कुछ और कह रहा है। हो सकता है कि इस बार उम्‍मीदवारों की घोषणा पहले की अपेक्षा जल्‍दी कर दी जाए।
जो भी हो, लेकिन भाजपा और बसपा में मथुरा-वृंदावन सीट के लिए टिकट पाने वालों ने अपनी-अपनी बिसात बि‍छानी शुरू कर दी हैं। उनके लिए शह और मात का खेल शुरू हो चुका है। ऐसा भी कह सकते हैं कि उनके लिए हार और जीत की पहली लड़ाई तो अभी से जारी है क्‍योंकि टिकट मिलेगा तभी चुनाव लड़ पायेंगे। टिकट नहीं मिला तो पूरे पांच साल के लिए लाइन में लगे रहने के अलावा कोई चारा नहीं रह जायेगा।
अब देखना यह है कि उठा-पटक और पटखनी देने तथा दिलाने के इस खेल में अंतत: जीत किसकी होती है और कौन अपना भाग्‍य आजमाने की टिकट पाने में सफल रहता है।
दिलचस्‍प यह है कि इन दिनों भाजपा तथा बसपा में तो एक अनार और सौ बीमार वाली कहावत पूरी तरह चरितार्थ हो रही है। 2017 आते-आते यह अनार किसके हाथ लगता है और कौन मन मारकर चुप बैठने के लिए मजबूर होता है, यह नजारा भी काफी रोचक रहने वाला है।
-Legendnews
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