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शुक्रवार, 15 जनवरी 2021
डॉ. निर्विकल्प अपहरण कांड: मुठभेड़, या फिर फिरौती पचाने और सफेदपोशों को बचाने का मुकम्मल इंतजाम
यूपी STF ने कल एक लाख रुपए के इनामी बदमाश अनूप चौधरी को भी एक मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार दिखाकर डॉ. निर्विकल्प के अपहरण से फिरौती में वसूले गए पूरे 52 लाख रुपए पचाने और उन सफेदपोश अपराधियों को बचा ले जाने का मुकम्मल इंतजाम कर लिया जिनमें कुछ वर्दीधारी तो कुछ बिना वर्दी वाले शामिल रहे थे।मथुरा जनपद के ही थाना नौहझील अंतर्गत गांव कोलाहार निवासी अनूप चौधरी को पुलिस शुरू से डॉ. निर्विकल्प अपहरण केस का मास्टर माइंड बताती रही किंतु सब जानते हैं कि इस अपहरण में मास्टर माइंड कोई था तो वो थी पुलिस और उसके सहयोगी ऐसे सफेदपोश जिन्होंने डॉक्टर को आसान शिकार बताकर 52 लाख रुपए की मोटी रकम चंद मिनटों में वसूल कर ली।
कथित मास्टर माइंड अनूप चौधरी से कल हुई मुठभेड़ की कहानी के मुताबिक उसे STF ने नोएडा में दिल्ली बॉर्डर पर पकड़ा और जब यमुना एक्सप्रेस वे के रास्ते मथुरा के थाना हाईवे लेकर आ रही थी तब उसने सुरीर कोतवाली क्षेत्र में एक सिपाही की पिस्टल छीनकर पुलिस पर फायरिंग करते हुए भागने का प्रयास किया। जवाबी कार्यवाही में अनूप चौधरी घायल हो गया, जिसके बाद उसे जिला अस्पताल मथुरा में उपचार के लिए भर्ती करा दिया गया।
पुलिस और बदमाशों के बीच मुठभेड़ की हर कहानी यूं तो लगभग एक जैसी होती है इसलिए सतही तौर पर इसमें भी कुछ गलत नहीं है परंतु बारीकी से देखेंगे तो पता लगेगा कि ये ‘विशेष मुठभेड़’ दरअसल फिरौती की उस पूरी रकम को पचाने के साथ-साथ उन बावर्दी और सफेदपोश अपराधियों को साफ बचा ले जाने के लिए की गई जिन्होंने डॉ. निर्विकल्प को अगवा कराया।
यहां यह जान लेना जरूरी है कि STF को प्रदेशभर में कहीं से भी गिरफ्तारी करने का अधिकार प्राप्त है लिहाजा STF नोएडा ने अनूप चौधरी को दिल्ली बॉर्डर पर पकड़ लिया लेकिन नोएडा में गिरफ्तारी नहीं दिखाई। आखिर क्यों?
इसी एक सवाल से खड़े हो जाते हैं बहुत से सवाल
जैसे STF चाहती तो नोएडा में ही उससे चौबीस घंटे तो कानूनन पूछताछ कर सकती थी और इस दौरान यह जान सकती थी कि डॉ. निर्विकल्प को उठाने का आइडिया किसने तथा क्यों दिया?
अनूप चौधरी को इस बात की गारंटी किसने दी थी कि डॉ. निर्विकल्प इतनी बड़ी फिरौती देने के बावजूद अपना मुंह नहीं खोलेंगे?
अनूप चौधरी को उसी पॉश कॉलोनी राधापुरम एस्टेट में किसने और किस मकसद से मकान किराए पर दिलवाया जिसमें डॉ. निर्विकल्प रहते हैं?
डॉ. निर्विकल्प को उठाने के बाद चंद घंटों में मिली फिरौती की इतनी बड़ी रकम कहां गई और क्यों व किसके भरोसे उन्होंने डॉक्टर को इस शर्त के साथ रिहा कर दिया कि वह एक महीने के अंदर शेष तयशुदा 50 लाख रुपए और उन तक पहुंचा देंगे?
ऐसे कौन से कारण रहे कि एक हाईप्रोफाइल अपहरण पर मुंह सिलकर बैठने वाली मथुरा पुलिस ने दो महीने बाद अपनी ओर से एफआईआर दर्ज कर एफआईआर लिखाने वाले थाना प्रभारी को ही निलंबित कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। तब भी जबकि इंस्पेक्टर को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश से बहाल कर दिया गया?
इन सब सवालों का जवाब इसमें निहित है कि यदि अनूप चौधरी को STF नोएडा में गिरफ्तार दिखाती तो एक ओर उसे जहां नोएडा पुलिस को भरोसे में लेना पड़ता वहीं दूसरी ओर नोएडा कोर्ट से मथुरा लाने की परमिशन लेनी पड़ती।
ऐसा करने पर डॉ. निर्विकल्प के अपहरण की पूरी सच्ची कथा सामने आने का डर था लिहाजा बिना लिखा-पढ़ी एसटीएफ उसे नोएडा से मथुरा लेकर चल दी, फिर संबंधित थाने पर पहुंचने से पहले मुठभेड़ को अंजाम दिया जिससे सांप मर जाए और लाठी भी न टूटे।
जाहिर है कि मुठभेड़ के बाद आरोपी को जितना जरूरी अस्पताल पहुंचाना था, उतना ही जरूरी उसकी गिरफ्तारी दिखाना भी था ताकि अगले चौबीस घंटों के अंदर उसकी कोर्ट में पेशी की जा सके।
घायलावस्था में पूछताछ का चिरपरिचित पुलिसिया तरीका काम नहीं आने का, और ठीक होने पर अगर पूछताछ करनी जरूरी समझी जाएगी तो कोर्ट से लोकल पुलिस को कस्टडी रिमांड पानी होगी।
रिमांड मिल भी गई तो वो टाइम बाउंड होगी। यानी सब-कुछ उस प्लान के मुताबिक किया गया जिससे केस ‘दाखिल दफ्तर’ हो जाए और किसी के पास उंगली उठाने की गुंजाइश भी न रहे।
एसटीएफ हो या मथुरा पुलिस, ऐसे केस में गुंजाइश छोड़ी भी कैसे जा सकती है जिसमें दो-दो उच्चाधिकारियों का नाम उछला हो और जिसके सूत्रधार वो सफेदपोश हों जिनका रहमो-करम सदा ‘खाकी पर’ बना रहता हो।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शुक्रवार, 8 जनवरी 2021
कोरोना की स्वदेशी वैक्सीन का विरोध करने वाले नेता और पंडित नेहरू की भविष्यवाणी
कोरोना की स्वदेशी वैक्सीन के विरोध से याद आया कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने अपने दौर में मासिक पत्र ‘विक्रम’ के लिए कुछ लेख लिखे थे क्योंकि इस पत्र के संपादक पंडित नेहरू के अभिन्न मित्र पद्मभूषण पंडित सूर्यनारायण व्यास थे।
इनमें से एक लेख में पंडित नेहरू ने लिखा था कि लंदन में बनाए गए ‘मैडम तुसॉद’ के “चैम्बर्स ऑफ हॉरर्स” नामक अनोखे “अजायबघर” की तरह “हिंदुस्तान” में भी कभी न कभी एक “अजायबघर” कायम किया जाएगा।इस अजायबघर में हमारे बहुत से मंत्रियों की मूर्तियां स्थापित की जाएंगी ताकि आने वाली पीढ़ियां यह जान सकें कि इस देश के अंदर कैसे-कैसे ‘नमूने’ सत्ता का सुख भोग कर चले गए।
लेख के मुताबिक उस आने वाले स्वर्ण युग में अध्यापक अपने छात्रों को इन नेताओं की आदमकद मूर्तियां दिखाकर बताएंगे कि ऐसे-ऐसे लोग हमारे देश के मंत्री रहे थे। यहां तक कि इनमें से कई के हाथों में तो राज्यों की कमान भी रही थी और वो अपने से कहीं अधिक बुद्धिमान लोगों पर हुकूमत करते थे।
अध्यापक अपने छात्रों को बताएंगे कि उस जमाने में योग्यता, प्रतिभा, ज्ञान अथवा जनता को प्रभावित करने जैसे गुणों के आधार पर किसी को सत्ता नहीं मिलती थी, बल्कि भेड़ों की तरह जनता को हांकने की क्षमता रखने वाला ही पद के योग्य समझा जाता था।
वह विद्यार्थियों को यह भी बताएंगे कि उस युग में सच्चाई के साथ देश सेवा करने की मंशा रखना और सिद्धांतों को लेकर दृढ़ता दिखाना ऐसे अवगुण थे जिनसे शासन के भूखे नेता खुद तो हमेशा दूर रहते ही थे, साथ ही ऐसे शासकों का अकारण विरोध करते थे।
पंडित नेहरू ने इस लेख में यह भी लिखा है कि इन नेताओं को किसी विषय, विभाग और आविष्कारों के बारे में उतनी भी जानकारी नहीं होगी जितनी कि किसी कुली या मजदूर को ‘मंगलग्रह’ के बारे में हो सकती है।
अंत में पंडित नेहरू लिखते हैं कि… ”और आने वाले युग का विद्यार्थी इन नेताओं की आदमकद मूर्तियां देखकर यह सोचने पर मजबूर होगा कि जिन राजनीतिज्ञों एवं मंत्रियों को अत्यधिक बुद्धिमान समझा जाता रहा, वो वास्तव में कितने बुद्धिहीन तथा अक्ल से अंधे थे।
उस दौर के विद्यार्थियों को ऐसी जनता पर भी आश्चर्य होगा जो शेर की खाल ओढ़कर सत्ता हासिल करने वाले इन ‘गीदड़ों’ से शासित होती रही।
पंडित नेहरू के बारे में इस बात से तो कोई इंकार नहीं कर सकता कि वो कुशल राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ अच्छे दूरदृष्टा भी थे, किंतु आज जिस तरह कोरोना जैसे घातक वायरस की वैक्सीन का वो नेता विरोध कर रहे हैं जिन्होंने कभी देश व प्रदेश के बड़े-बड़े पदों को सुशोभित किया है, उन्हें देखकर लगता है कि देश के प्रथम प्रधानमंत्री संभवत: बहुत काबिल ‘भविष्यवक्ता’ भी रहे होंगे।
बहरहाल, आज जिस तरह एक महामारी से मुकाबले के लिए देश के वैज्ञानिकों ने बहुत कम समय में वैक्सीन तैयार करके समूचे विश्व को चौंका दिया है, उस पर गर्व करने की बजाय सत्तापक्ष के अंधे विरोध पर उतारू देश के कुछ नेता पंडित नेहरू की लेखनी और उनकी दूरदृष्टि को शत-प्रतिशत सच साबित अवश्य कर रहे हैं।
ये बात और है कि लंदन में बने मैडम तुसॉद के “चैम्बर्स ऑफ हॉरर्स” नामक अनोखे “अयाबघर” की कमी फिलहाल हिंदुस्तान की जनता को खल रही है। उम्मीद है कि पंडित नेहरू की यह भविष्यवाणी भी जल्द पूरी होगी।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
रविवार, 3 जनवरी 2021
डॉ. निर्विकल्प अपहरण कांड: क्या फिरौती के पूरे 52 लाख रुपए बदमाशों के साथ मिलकर हड़प गई पुलिस?
10 दिसंबर 2019 को रात करीब 8 बजे मथुरा के मशहूर ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. निर्विकल्प का अपहरण कर वसूली गई 52 लाख रुपयों की फिरौती के पूरे 52 लाख रुपए क्या बदमाशों के साथ मिलकर पुलिस हड़प गई, या अब भी कोई उम्मीद बाकी है?इस सवाल का संभावित जवाब तो “LEGEND NEWS” ने 13 फरवरी 2020 को ही अपनी इस खबर में जिसका लिंक नीचे दिया जा रहा है, दे दिया था किंतु फिर भी एक उम्मीद है कि योगीराज में शायद पुलिस इतनी आसानी से फिरौती की इतनी बड़ी रकम पचा न पाए।
“डॉ. निर्विकल्प अपहरण कांड: खेल खतम… पैसा हजम… जनता बजाए ताली” शीर्षक से 13 फरवरी 2020 को लिखी गई खबर को पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक कीजिए-
http://legendnews.in/dr-nirvikalp-kidnapping-case-khel-khatam-paisa-hazam-janta-bajaye-taali/
http://legendnews.in/dr-nirvikalp-kidnapping-case-khel-khatam-paisa-hazam-janta-bajaye-taali/
पुलिस द्वारा दर्ज की गई एफआईआर के मुताबिक हाईवे थाना क्षेत्र की गेटबंद पॉश कालॉनी राधापुरम एस्टेट निवासी डॉ. निर्विकल्प का अपहरण 10 दिसंबर 2019 को रात करीब 8 बजे थाना क्षेत्र के ही गोवर्धन फ्लाईओवर से तब कर लिया गया था जब वो महोली रोड स्थित अपने क्लीनिक से घर लौट रहे थे।
बताया जाता है कि डॉक्टर की रिहाई 52 लाख रुपए की फिरौती वसूलने के बाद की गई, बावजूद इसके न तो डॉक्टर ने इसकी FIR कराना जरूरी समझा और न पुलिस ने कोई एक्शन लिया लेकिन ‘अपहरण’ अच्छा-खासा चर्चा में बना रहा।
मथुरा और आगरा से लेकर लखनऊ तक फजीहत होने पर हाईवे थाना पुलिस ने पूरे दो महीने बाद 11 फरवरी 2020 की रात 10 बजकर 53 मिनट पर IPC की धारा 364 A के तहत एक एफआईआर दर्ज की।
हाईवे थाने के तत्कालीन प्रभारी इंस्पेक्टर जगदंबा सिंह की ओर से दर्ज कराई गई इस एफआईआर में सनी मलिक पुत्र देवेन्द्र मलिक निवासी न्यू सैनिक विहार कॉलोनी थाना कंकरखेड़ा मेरठ, महेश पुत्र रघुनाथ निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा, अनूप पुत्र जगदीश निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा तथा नीतेश उर्फ रीगल पुत्र नामालूम निवासी भोपाल मध्यप्रदेश (हाल निवासी दिल्ली एनसीआर) को नामजद किया गया।
इस मामले का एक दिलचस्प पहलू यह भी रहा कि डॉ. निर्विकल्प के अपहरण की अपनी ओर से FIR दर्ज कराने वाले इंस्पेक्टर जगदंबा सिंह को उसी दिन तत्काल प्रभाव से तत्कालीन एसएसपी शलभ माथुर ने निलंबित कर दिया।
ये बात और है कि विगत माह इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंस्पेक्टर जगदंबा सिंह को बहाल करने का आदेश दिया, जिसके बाद से वह ड्यूटी पर हैं लेकिन केस के बारे में कुछ बताने को तैयार नहीं।
पुलिस द्वारा दर्ज FIR के घटनाक्रम पर भरोसा करें तो 10 दिसंबर 2019 की रात करीब 8 बजे हुई इस वारदात का पता बीट सूचना के जरिए हाईवे थाना प्रभारी को 11 फरवरी 2020 की दोपहर में लगा।
पुलिस का दावा है कि FIR दर्ज किए जाने के बाद जब डॉ. निर्विकल्प से पुलिस ने पूछताछ की तब उन्होंने बताया कि बदमाशों ने उनके ही मोबाइल फोन से उनकी पत्नी डॉ. भावना को फोन करके 52 लाख रुपए की फिरौती वसूलकर नेशनल हाईवे स्थित सिटी हॉस्पीटल के पास मुक्त कर दिया।
मथुरा पुलिस पर आरोप
11 फरवरी 2020 को हाईवे थाना पुलिस द्वारा लिखाई गई एफआईआर से पहले मथुरा पुलिस पर जो आरोप लग रहे थे उनके अनुसार घटना के तत्काल बाद पुलिस को डॉ. के अपहरण और फिरौती का पता ही नहीं लग चुका था, बल्कि बदमाश भी उसकी गिरफ्त में आ चुके थे।
पुलिस ने बदमाशों को मिली फिरौती के पूरे 52 लाख रुपए उनसे छीनकर उसका बंदरबांट कर लिया क्योंकि डॉ. दंपत्ति कोई केस दर्ज कराने को तैयार नहीं थे। बदले में बदमाशों को अभयदान दे दिया गया।
बताया जाता है कि इस बंदरबांट में मथुरा जनपद के दो उच्च पुलिस अधिकारियों का नाम भी सामने आया लिहाजा जांच के दौरान आगरा जोन के एडीजी अजय आनंद तथा आईजी ए. सतीश गणेश ने उनके बयान भी दर्ज किए परंतु उसके बाद सबकुछ दबा दिया गया।
हां, लकीर पीटने के लिए मथुरा पुलिस एक आरोपी नितेश उर्फ रीगल को मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से पकड़ लाई। मध्यप्रदेश पुलिसकर्मी के पुत्र नितेश के अनुसार उसने अपने पिता के कहने पर मध्यप्रदेश पुलिस के सामने ही सरेंडर किया था न कि मथुरा पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया।
उसने बताया कि मध्यप्रदेश से ही उसे यहां लाया गया है और इसलिए यहां की पुलिस ने उसके साथ कोई अभद्र व्यवहार करना तो दूर, हाथ तक नहीं लगाया।
दूसरे आरोपी सनी मलिक ने मेरठ पुलिस से सांठगांठ करके खुद को तमंचे में वहां गिरफ्तार करवा लिया लेकिन मथुरा पुलिस उसकी रिमांड तक नहीं ले सकी क्योंकि उससे पुलिस के बहुत से राज तो खुलते ही, साथ ही कई उच्च पुलिस अधिकारियों की भी नौकरी पर बन आती।
तीसरे आरोपी महेश को कई महीनों बाद एसटीएफ ने मथुरा में ही धर दबोचा लेकिन एक लाख रुपए का ईनाम घोषित किए जाने के बाद भी मास्टर माइंड अनूप चौधरी आज तक पुलिस की पकड़ से बाहर है।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि डॉक्टर निर्विकल्प से फिरौती में वसूले गए 52 लाख रुपए गए कहां।
अब तक की पुलिसिया कार्यप्रणाली से तो यही लगता है कि पुलिस अपने हिस्से की और बदमाश अपने हिस्से की फिरौती डकार गए। जो मामूली रकम नितेश उर्फ रीगल से बरामद दिखाई भी है, वह उसे देर-सवेर कोर्ट से मिल ही जानी है क्योंकि डॉ. निर्विकल्प तो फिरौती देने की बात कोर्ट में स्वीकार करने से रहे।
फिरौती ही क्या, हो सकता है कि डॉ. निर्विकल्प तो अपने अपहरण की बात से भी कोर्ट में मुकर जाएं क्योंकि जब उन्होंने एफआईआर ही नहीं लिखाई तो वो अपहरण की बात क्यों स्वीकार करने लगे।
कुल मिलाकर निष्कर्ष यह निकलता है कि डॉ. निर्विकल्प के अपहरण से लेकर 52 लाख रुपए की फिरौती वसूलने जैसी दुस्साहसिक वारदात को अंजाम देने वाले सारे लोग आज मौज कर रहे हैं क्योंकि समय की काफी गर्द इस मामले की फाइलों पर जम चुकी है।
आरोपी नीतेश के खुलासे पर गौर करें तो डॉ. निर्विकल्प का अपहरण न सिर्फ पूर्व नियोजित था बल्कि पूरी ‘सेटिंग’ से किया गया था इसलिए चारों नामजद इस बात से आश्वस्त थे कि बिना हील-हुज्जत डॉक्टर के यहां से रुपए मिल ही जाएंगे।
किसकी सेटिंग से यह सारा खेल खेला, इसकी जानकारी तभी संभव है जब सनी और अनूप को गिरफ्त में लेकर पुलिस इस राज से पर्दा उठाने में रुचि ले।
नितेश के अनुसार डॉ. निर्विकल्प की गाड़ी में टक्कर मारने के बाद वह खुद भी तब आश्चर्यचकित रह गया था जब डॉ. निर्विकल्प की पत्नी डॉ. भावना मात्र 15 से 20 मिनट के अंदर पूरे 52 लाख रुपए लेकर आ गईं।
दरअसल, यह केस खुलता तो बहुत से चेहरों से नकाब उतरना तय था। मसलन अपहरणकर्ता न तो डॉक्टर निर्विकल्प के परिचित थे और न उनसे उनकी कोई रंजिश थी, फिर उन्हें डॉक्टर को अगवा करने को किसने व क्यों कहा।
बदमाशों द्वारा फोन करने के बाद मात्र 15 से 20 बीस मिनट के अंदर डॉ. निर्विकल्प की पत्नी डॉ. भावना किसके कहने पर पुलिस को सूचित किए बिना 52 लाख रुपए की बड़ी रकम बदमाशों को देने अकेली जा पहुंची। वो भी तब जबकि डॉ. भावना के घर की दीवार उनके अपने पिता के घर से सटी हुई है लेकिन उन्होंने किसी मदद नहीं ली।
इस सबके अलावा कुछ अन्य लोगों ने भी पुलिस और डॉक्टर निर्विकल्प व उनके परिवार को साधे रखने में बड़ी भूमिका निभाई थी। ये भूमिका निभाने के पीछे आखिर उनका मकसद क्या था और क्यों वो नहीं चाहते थे कि अपहरण के मूल मकसद का पता लगे।
जो भी हो, इसमें दो राय नहीं कि अब भी यदि डॉ. निर्विकल्प के अपहरण का खुलासा होता है तो 52 लाख रुपए की रकम सहित उन बड़े कारनामों से भी पर्दा उठ सकता है जिसे पुलिस, बदमाश और सफेदपोश लोगों का कॉम्बिनेशन अक्सर अंजाम देता आया है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
बताया जाता है कि डॉक्टर की रिहाई 52 लाख रुपए की फिरौती वसूलने के बाद की गई, बावजूद इसके न तो डॉक्टर ने इसकी FIR कराना जरूरी समझा और न पुलिस ने कोई एक्शन लिया लेकिन ‘अपहरण’ अच्छा-खासा चर्चा में बना रहा।
मथुरा और आगरा से लेकर लखनऊ तक फजीहत होने पर हाईवे थाना पुलिस ने पूरे दो महीने बाद 11 फरवरी 2020 की रात 10 बजकर 53 मिनट पर IPC की धारा 364 A के तहत एक एफआईआर दर्ज की।
हाईवे थाने के तत्कालीन प्रभारी इंस्पेक्टर जगदंबा सिंह की ओर से दर्ज कराई गई इस एफआईआर में सनी मलिक पुत्र देवेन्द्र मलिक निवासी न्यू सैनिक विहार कॉलोनी थाना कंकरखेड़ा मेरठ, महेश पुत्र रघुनाथ निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा, अनूप पुत्र जगदीश निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा तथा नीतेश उर्फ रीगल पुत्र नामालूम निवासी भोपाल मध्यप्रदेश (हाल निवासी दिल्ली एनसीआर) को नामजद किया गया।
इस मामले का एक दिलचस्प पहलू यह भी रहा कि डॉ. निर्विकल्प के अपहरण की अपनी ओर से FIR दर्ज कराने वाले इंस्पेक्टर जगदंबा सिंह को उसी दिन तत्काल प्रभाव से तत्कालीन एसएसपी शलभ माथुर ने निलंबित कर दिया।
ये बात और है कि विगत माह इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंस्पेक्टर जगदंबा सिंह को बहाल करने का आदेश दिया, जिसके बाद से वह ड्यूटी पर हैं लेकिन केस के बारे में कुछ बताने को तैयार नहीं।
पुलिस द्वारा दर्ज FIR के घटनाक्रम पर भरोसा करें तो 10 दिसंबर 2019 की रात करीब 8 बजे हुई इस वारदात का पता बीट सूचना के जरिए हाईवे थाना प्रभारी को 11 फरवरी 2020 की दोपहर में लगा।
पुलिस का दावा है कि FIR दर्ज किए जाने के बाद जब डॉ. निर्विकल्प से पुलिस ने पूछताछ की तब उन्होंने बताया कि बदमाशों ने उनके ही मोबाइल फोन से उनकी पत्नी डॉ. भावना को फोन करके 52 लाख रुपए की फिरौती वसूलकर नेशनल हाईवे स्थित सिटी हॉस्पीटल के पास मुक्त कर दिया।
मथुरा पुलिस पर आरोप
11 फरवरी 2020 को हाईवे थाना पुलिस द्वारा लिखाई गई एफआईआर से पहले मथुरा पुलिस पर जो आरोप लग रहे थे उनके अनुसार घटना के तत्काल बाद पुलिस को डॉ. के अपहरण और फिरौती का पता ही नहीं लग चुका था, बल्कि बदमाश भी उसकी गिरफ्त में आ चुके थे।
पुलिस ने बदमाशों को मिली फिरौती के पूरे 52 लाख रुपए उनसे छीनकर उसका बंदरबांट कर लिया क्योंकि डॉ. दंपत्ति कोई केस दर्ज कराने को तैयार नहीं थे। बदले में बदमाशों को अभयदान दे दिया गया।
बताया जाता है कि इस बंदरबांट में मथुरा जनपद के दो उच्च पुलिस अधिकारियों का नाम भी सामने आया लिहाजा जांच के दौरान आगरा जोन के एडीजी अजय आनंद तथा आईजी ए. सतीश गणेश ने उनके बयान भी दर्ज किए परंतु उसके बाद सबकुछ दबा दिया गया।
हां, लकीर पीटने के लिए मथुरा पुलिस एक आरोपी नितेश उर्फ रीगल को मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से पकड़ लाई। मध्यप्रदेश पुलिसकर्मी के पुत्र नितेश के अनुसार उसने अपने पिता के कहने पर मध्यप्रदेश पुलिस के सामने ही सरेंडर किया था न कि मथुरा पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया।
उसने बताया कि मध्यप्रदेश से ही उसे यहां लाया गया है और इसलिए यहां की पुलिस ने उसके साथ कोई अभद्र व्यवहार करना तो दूर, हाथ तक नहीं लगाया।
दूसरे आरोपी सनी मलिक ने मेरठ पुलिस से सांठगांठ करके खुद को तमंचे में वहां गिरफ्तार करवा लिया लेकिन मथुरा पुलिस उसकी रिमांड तक नहीं ले सकी क्योंकि उससे पुलिस के बहुत से राज तो खुलते ही, साथ ही कई उच्च पुलिस अधिकारियों की भी नौकरी पर बन आती।
तीसरे आरोपी महेश को कई महीनों बाद एसटीएफ ने मथुरा में ही धर दबोचा लेकिन एक लाख रुपए का ईनाम घोषित किए जाने के बाद भी मास्टर माइंड अनूप चौधरी आज तक पुलिस की पकड़ से बाहर है।
ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि डॉक्टर निर्विकल्प से फिरौती में वसूले गए 52 लाख रुपए गए कहां।
अब तक की पुलिसिया कार्यप्रणाली से तो यही लगता है कि पुलिस अपने हिस्से की और बदमाश अपने हिस्से की फिरौती डकार गए। जो मामूली रकम नितेश उर्फ रीगल से बरामद दिखाई भी है, वह उसे देर-सवेर कोर्ट से मिल ही जानी है क्योंकि डॉ. निर्विकल्प तो फिरौती देने की बात कोर्ट में स्वीकार करने से रहे।
फिरौती ही क्या, हो सकता है कि डॉ. निर्विकल्प तो अपने अपहरण की बात से भी कोर्ट में मुकर जाएं क्योंकि जब उन्होंने एफआईआर ही नहीं लिखाई तो वो अपहरण की बात क्यों स्वीकार करने लगे।
कुल मिलाकर निष्कर्ष यह निकलता है कि डॉ. निर्विकल्प के अपहरण से लेकर 52 लाख रुपए की फिरौती वसूलने जैसी दुस्साहसिक वारदात को अंजाम देने वाले सारे लोग आज मौज कर रहे हैं क्योंकि समय की काफी गर्द इस मामले की फाइलों पर जम चुकी है।
आरोपी नीतेश के खुलासे पर गौर करें तो डॉ. निर्विकल्प का अपहरण न सिर्फ पूर्व नियोजित था बल्कि पूरी ‘सेटिंग’ से किया गया था इसलिए चारों नामजद इस बात से आश्वस्त थे कि बिना हील-हुज्जत डॉक्टर के यहां से रुपए मिल ही जाएंगे।
किसकी सेटिंग से यह सारा खेल खेला, इसकी जानकारी तभी संभव है जब सनी और अनूप को गिरफ्त में लेकर पुलिस इस राज से पर्दा उठाने में रुचि ले।
नितेश के अनुसार डॉ. निर्विकल्प की गाड़ी में टक्कर मारने के बाद वह खुद भी तब आश्चर्यचकित रह गया था जब डॉ. निर्विकल्प की पत्नी डॉ. भावना मात्र 15 से 20 मिनट के अंदर पूरे 52 लाख रुपए लेकर आ गईं।
दरअसल, यह केस खुलता तो बहुत से चेहरों से नकाब उतरना तय था। मसलन अपहरणकर्ता न तो डॉक्टर निर्विकल्प के परिचित थे और न उनसे उनकी कोई रंजिश थी, फिर उन्हें डॉक्टर को अगवा करने को किसने व क्यों कहा।
बदमाशों द्वारा फोन करने के बाद मात्र 15 से 20 बीस मिनट के अंदर डॉ. निर्विकल्प की पत्नी डॉ. भावना किसके कहने पर पुलिस को सूचित किए बिना 52 लाख रुपए की बड़ी रकम बदमाशों को देने अकेली जा पहुंची। वो भी तब जबकि डॉ. भावना के घर की दीवार उनके अपने पिता के घर से सटी हुई है लेकिन उन्होंने किसी मदद नहीं ली।
इस सबके अलावा कुछ अन्य लोगों ने भी पुलिस और डॉक्टर निर्विकल्प व उनके परिवार को साधे रखने में बड़ी भूमिका निभाई थी। ये भूमिका निभाने के पीछे आखिर उनका मकसद क्या था और क्यों वो नहीं चाहते थे कि अपहरण के मूल मकसद का पता लगे।
जो भी हो, इसमें दो राय नहीं कि अब भी यदि डॉ. निर्विकल्प के अपहरण का खुलासा होता है तो 52 लाख रुपए की रकम सहित उन बड़े कारनामों से भी पर्दा उठ सकता है जिसे पुलिस, बदमाश और सफेदपोश लोगों का कॉम्बिनेशन अक्सर अंजाम देता आया है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
रविवार, 27 दिसंबर 2020
‘उधार के सिंदूर’ से मथुरा में मांग सजाती भाजपा, क्या 2022 में ‘सदा सुहागन’ का आशीर्वाद ले पाएगी?
कड़वा है लेकिन सच है। उधार के सिंदूर से मांग तो सजाई जा सकती है पर ‘सदा सुहागन’ रहने का आशीर्वाद नहीं पाया जा सकता। जनप्रतिनिधियों के मामले में मथुरा का हाल भी कुछ ऐसा ही है।कहने को तो जनपद की कुल जमा पांच विधानसभाओं में से चार पर भाजपा के विधायक काबिज हैं परंतु उनमें से दो उधार के सिंदूर हैं। उधार के सिंदूर का रंग कुछ ज्यादा ही चटख होता है इसलिए उसकी शिनाख्त कराना जरूरी नहीं होता, पब्लिक सबको जानती भी है और पहचानती भी है।
बाकी बचे दो। ये यूं तो ‘स्वयंवर’ करके मथुरा लाए गए थे लेकिन उन पर सौहबत का रंग इस कदर चढ़ा कि सारी कलई उतर गई लिहाजा आज पब्लिक की आंखों में बुरी तरह खटक रहे हैं।
पार्टी के एक नेता ने पिछले दिनों इनमें से एक की तारीफ में कसीदे गढ़ते हुए अपना अनुभव कुछ इस तरह बताया- ”भाईसाहब…मैंने अपने जीवन में ऐसा विधायक नहीं देखा जो किसी के काम ही न आता हो।
काम छोटा हो या बड़ा, विधायक जी सामने वाले को हाजमे की ऐसी पुड़िया थमाते हैं कि वह पलटकर उनकी ओर मुंह भी नहीं करता। दोबारा आने की बात ही छोड़ दें।
वैसे ये हैं बहुत ऊर्जावान, परंतु उनकी सारी ऊर्जा और सारा करंट खुद को ऊर्जावान बनाए रखने के काम आ रहा है। क्या मजाल कि जनता उनकी ऊर्जा से कतई कुछ हासिल कर ले।
करे भी कैसे, वो आम जनता के इतने नजदीक आते ही नहीं कि कोई उनकी ऊर्जा का सदुपयोग कर सके। उनका सीधा फंडा है, अपना काम बनता, फिर भाड़ में जाए जनता। इसका उन्होंने मुकम्मल इंतजाम कर भी रखा है। पार्टीजनों के लिए ‘मजबूरी का नाम महात्मा गांधी’ है इसलिए बेचारे ‘मरा-मरा’ की रट इतनी तीव्र गति से लगा रहे हैं कि वो भी ‘राम-राम’ सुनाई दे रहा है।
दूसरे विधायक जी की बात करें तो उनके बारे में पार्टी के लोगों का कहना है कि उन्हें ओढ़ें या बिछाएं। पहले भी मिट्टी के माधौ थे, आज भी वैसे ही हैं। विधायक जरूर बन गए लेकिन उन्हें कोई आसानी से विधायक मानने को तैयार नहीं है। उनके लिए उनका चुनाव क्षेत्र ही प्रदेश की राजधानी है और ‘निज निवास’ है विधानसभा। इससे ऊपर उन्होंने न तो कभी सोचा, और न सोचने की कोई उम्मीद दिखाई देती है।
जब पार्टीजनों की उनके बारे में इतनी उत्तम राय है तो जनता किस मुंह से कुछ कहे। भूले-भटके कोई कभी कुछ मुंह खोलता भी है तो जवाब मिलता है कि विपक्ष के नाम पर यहां है क्या जो चिंता की जाए। मोदी-योगी जिंदाबाद…फिर हम जैसों को काम करने की जरूरत ही क्या है।
अब बात ‘उधार के सिंदूरों’ की
घाट-घाट का पानी पीकर भाजपा की बहती गंगा में हाथ धोने वाले एक विधायक जी तो जैसे सम्मानित होने के लिए ही पैदा हुए है। उन्होंने उसके लिए बाकायदा अपना एक ऐसा ‘निजी गैंग’ गठित कर रखा है जो उन्हें कहीं न कहीं और किसी न किसी बहाने सम्मानित करता रहता है। क्षेत्र की जनता उन्हें बाजरे और गन्ना के खेतों में तलाशती है लेकिन वो पाए जाते हैं किसी ऐसे मॉल या होटल में जहां उनका ‘सम्मान’ समारोह चल रहा होता है। चले भी क्यों नहीं, भाजपा जितना ख्याल ‘बावफाओं’ का रखती है उससे कहीं अधिक ‘बेवफा’ उसे प्रिय हैं।
वफादारों की विवशता यह है कि वो बेचारे हर हाल में ‘कमल ककड़ी’ से लटके रहते हैं। 2022 में भी वो वहीं लटके पाए जाएंगे, फिर पार्टी चाहे उधार के सिंदूरों को रिपीट करे या न करे। वफादारी का यही तकाजा है।
चौथे और अंतिम विधायक जी, अपनी पूर्ववर्ती सरकार में रहते हुए ही समझ गए थे कि येन-केन-प्रकारेण अपने हृदय ‘कमल’ को खिलाना है क्योंकि ऐसा न करने पर ‘दुर्गति’ को प्राप्त होना तय है।
कारनामे ही कुछ ऐसे रहे कि बात सीबीआई तक जा पहुंची। सगे-संबंधियों और इष्ट-मित्रों के साथ दोनों हाथ ऐसी लूट की कि लुटेरे व चोर-उचक्के भी शरमा जाएं लेकिन ‘चौर कर्म’ को भी ‘चौर कला’ का दर्जा हासिल है इसलिए उच्चकोटि के चोर मौका मिलने पर अपनी कला का प्रदर्शन करने से नहीं चूकते। इन्होंने भी पूरे गिरोह के साथ अपनी कला का मुजाहिरा किया और कुर्ते में जेबें बढ़ाते चले गए।
सुना है उनकी इस कलाकारी को देखते हुए मथुरा के सीडीओ कार्यालय में सीबीआई ने एक सेल्फ को बाकायदा सील किया हुआ है ताकि सनद रहे और वक्त जरूरत काम आए। पार्टी ने भी उनकी महत्ता के मद्देनजर महकमा तो अलॉट कर रखा है परंतु झुनझुने के साथ। जब तक दोनों हाथों से ये विधायक जी पार्टी का झुनझुना बजाते रहेंगे, तब तक सीडीओ ऑफिस की सील लगी रहेगी। झुनझुना छूटा नहीं कि सील खुली नहीं। सील खुली तो घर की खिड़की जेल में जाकर खुलेगी, यह तय है।
जो भी हो लेकिन इस सबके बीच बेचारे कर्तव्यनिष्ठ, कर्मनिष्ठ और सत्यनिष्ठ पार्टीजन उस दिन के इंतजार में हैं जब पार्टी भी समझेगी कि उधार के सिंदूर से मांग तो सजाई जा सकती है पर ‘सदा सुहागन’ रहने का आशीर्वाद नहीं पाया जा सकता।
2022 के चुनाव बहुत दूर नहीं है। बमुश्किल सवा साल बाद वो दिन देखने को मिल जाएगा जब एकबार फिर चौराहे पर काठ की हांड़ी चढ़ानी होगी। तब देखना यह होगा कि पार्टी उधार के इन्हीं सिंदूरों को रिपीट करेगी अथवा सदा सुहागन का जन आशीर्वाद पाने के लिए सात जन्मों का साथ निभाने वालों को मौका देगी।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
बड़ी चौथ वसूली न होने पर खोली गई यूपी के छात्रवृत्ति घोटाले की पोल, सही दिशा में जांच आगे बढ़ने पर ‘मथुरा’ के कई प्रभावशाली जाएंगे जेल
उत्तर प्रदेश के जिस छात्रवृत्ति एवं क्षतिपूर्ति घोटाले में मथुरा के समाज कल्याण अधिकारी सहित तीन विभागीय कर्मचारियों को निलंबित किया गया है, उसकी बुनियाद में दरअसल बड़ी चौथ वसूली का वो प्रयास रहा है जो परवान नहीं चढ़ सका और जिसके कारण इसे सामने लाना प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया।यूपी में छात्रवृत्ति एवं क्षतिपूर्ति घोटाले की बात करें तो इसकी शुरूआत डेढ़ दशक से भी पहले हो चुकी थी किंतु तब इसमें समाज कल्याण विभाग और स्कूल-कॉलेज संचालक ही संलिप्त थे। जैसे-जैसे इसकी जानकारी जनसमान्य और नेतानगरी तक पहुंची, वैसे-वैसे इसके तार बाहरी तत्वों से भी जुड़ने लगे।
देश का एक बड़ा प्रदेश है उत्तर प्रदेश, और उत्तर प्रदेश का एक छोटा पर धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण जिला है मथुरा। लेकिन डेढ़ दशक पहले तक इस धार्मिक महत्व वाले जिले में शिक्षा के नाम पर कुछ खास नहीं था। यही कारण रहा कि यहां शिक्षा व्यवसाइयों द्वारा छात्रवृत्ति की आड़ में की जा रही लूट से भी लोग अनभिज्ञ थे।
सन् 2000 में जब पहली बार मथुरा को एक निजी इंजीनियरिंग कॉलेज की सौगात मिली तो उसके बाद जैसे यहां शिक्षा व्यवसाय को पंख लग गए। देखते-देखते कृष्ण की यह नगरी एक ओर जहां तकनीकी शिक्षा का एक हब बनने लगी वहीं दूसरी ओर छात्रवृत्ति हड़पने वालों की संख्या भी तेजी से बढ़ी।
छात्रवृत्ति के खेल का खुलासा होने पर शिक्षा व्यवसाइयों से इतर लोग भी इसमें रुचि लेने लगे।
बताया जाता है कि इसी रुचि के तहत सत्ता के गलियारों में खासा प्रभाव रखने वाले एक स्थानीय व्यक्ति ने शिक्षा व्यवसाइयों से छात्रवृत्ति घोटाले से की जा रही कमाई में हिस्सा मांगना शुरू कर दिया। शिक्षा व्यवसाइयों ने भी उसका ध्यान रखा और वो उसे आंशिक हिस्सा देने लगे परंतु घोटाले से मिलने वाली बड़ी रकम के कारण आगे बात बनी नहीं रह सकी।
बताते हैं कि सत्ता प्रतिष्ठान तक पहुंच रखने वाले ‘इस व्यक्ति’ ने शिक्षा व्यवसाइयों के सामने प्रति संस्थान पांच लाख रुपए प्रति वर्ष की मांग रखी जिसे उन्होंने ठुकरा दिया क्योंकि घोटाले में अन्य तत्वों की हिस्सेदारी भी बढ़ने लगी थी।
बस यहीं से खेल बिगड़ना शुरू हुआ और बात जा पहुंची शिकायत के रूप में सदन के पटल तक।
विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार छात्रवृत्ति घोटाले में सर्वाधिक कमाई वर्ष 2009 से लेकर 2016 तक हुई। इस दौरान शिक्षा व्यवसायी तो फर्श से अर्श तक पहुंचे ही, अधिकारी एवं कर्मचारियों से लेकर उन तत्वों ने भी खूब मलाई मारी जो इस खेल की तह तक पहुंच चुके थे।
यही वो दौर था जब छात्रवृत्ति घोटाले ने तमाम लोगों की हैसियत बढ़ाई और जो कल तक बमुश्किल जीवन यापन करते देखे जाते थे, वो स्कूल-कॉलेजों के मालिक बन बैठे।
भ्रष्टाचार की बुनियाद पर खड़े किए गए इन शिक्षण संस्थानों में पहले जहां बीएड और पॉलिटेक्निक ही घोटाले का प्रमुख आधार थे वहीं देखते-देखते इसका दायरा ITI और BTC व बीएससी से लेकर इंजीनियरिंग एवं फार्मा सहित दर्जनों दूसरे क्षेत्रों तक विस्तार ले चुका था।
आज स्थिति ये है कि प्रदेश का शायद ही कोई शिक्षण संस्थान छात्रवृत्ति घोटाले में लिप्त न हो। फिर चाहे वह कोई स्कूल हो, कॉलेज हो या यूनिवर्सिटी ही क्यों न हो।
मथुरा के समाज कल्याण अधिकारी भले ही फिलहाल मात्र 23 करोड़ रुपए का घोटाला पकड़ में आने पर निलंबित किए गए हों परंतु कड़वा सच यह है कि एक-एक शिक्षण संस्थान इस खुली लूट में इतना ही पैसा प्रतिवर्ष हड़पता रहा है। अकेले मथुरा जनपद में इसके जरिए सरकारी खजाने का सैकड़ों करोड़ रुपया हजम किया जा चुका है और प्रदेश स्तर पर तो इसका आंकड़ा हजारों करोड़ रुपए है।
भ्रष्टाचार के मामले में जीरो टॉलरेंस की नीति पर चलने वाली योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली यूपी सरकार यदि घोटाले की परतें सही तरीके से खोलने में सफल हो जाए और अधिकारी अपनी जांच की दिशा लक्ष्य पर निर्धारित करते हुए रखें तो तय जानिए कि सरकारी खेमे के साथ-साथ निजी शिक्षा के अनेक बड़े नामचीन व्यवसायी न सिर्फ मथुरा में बल्कि प्रदेश स्तर पर जेल की सलाखों के पीछे होंगे।
साथ ही वो तत्व भी बेनकाब हो सकते हैं जिन्होंने छात्रवृत्ति की लूट में हिस्सेदारी ली और चौथवसूली करते रहे।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि छात्रवृत्ति घोटाले की दिशा यदि सही रहती है तो इसमें लिप्त शिक्षा व्यवसाइयों के अलावा वो सारे तत्व सामने होंगे जो पिछले डेढ़ दशक से सरकारी खजाने को दोनों हाथों से लूटते रहे और जिन्होंने शिक्षा जैसे पवित्र ध्येय का चेहरा इतना बिगाड़ दिया जिससे जनसामान्य ‘शिक्षा माफिया’ जैसा एक नया शब्द गढ़ने पर मजबूर हुआ।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
रविवार, 22 नवंबर 2020
बड़ा सवाल: ऊर्जा मंत्री की अधिकारियों पर ‘चल’ नहीं रही, या वो पब्लिक को ‘चला’ रहे हैं?
बीजेपी के कद्दावर नेताओं में शामिल प्रदेश के ऊर्जा मंत्री और योगी सरकार के प्रवक्ता श्रीकांत शर्मा की अब अधिकारियों पर ‘चल’ नहीं रही या वो ऐसा दिखाकर पब्लिक को ‘चला’ रहे हैं?यह सवाल 17 नवंबर को ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ के आगरा संस्करण में छपी उस खबर के बाद पूछा जा रहा है जिसके अनुसार ऊर्जा मंत्री श्रीकांत ने वृंदावन कुंभ मेले की तैयारियों को लेकर स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा बरती जा रही ढील पर नाराजगी जताते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक पत्र लिखा है और इस संबंध में उनसे अनुरोध किया है कि वह अधिकारियों को निर्देशित करें।
अखबार के पृष्ठ 3 पर छपी इस खबर के मुताबिक 16 फरवरी 2021 से 28 मार्च 2021 तक 41 दिन वृंदावन में यमुना किनारे चलने वाले इस कुंभ मेले की अब तक कोई भौतिक प्रगति नहीं है जिस कारण साधु-संतों सहित स्थानीय जनमानस निराश व आक्रोशित है।
खबर के अनुसार ऊर्जा मंत्री ने मुख्यमंत्री को भेजे पत्र में लिखा है कि जिला प्रशासन, ब्रज तीर्थ विकास परिषद के मुख्य कार्यपालक अधिकारी तथा अन्य एजेंसियों को परस्पर समन्वय स्थापित कर कुंभ मेले को भव्य बनाने और समय से कार्य पूर्ण कराने के लिए आदेशित किया जाए।
17 नवंबर को छपी इस खबर के बाद ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ में ही आज यानी 19 नवंबर के दिन एक और खबर छपी है जिसके मुताबिक ब्रज तीर्थ विकास परिषद के सीईओ एवं कुंभ मेला अधिकारी तथा मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष नागेन्द्र प्रताप यादव ने बीते कल (बुधवार) को मेला स्थल का निरीक्षण किया।
इस दौरान उन्होंने जल निगम एवं नगर निगम के अधिकारियों को कुंभ मेला शुरू होने से पहले सभी व्यवस्थाएं पूरी करने के निर्देश देते हुए मेला क्षेत्र में सीवर का पानी फिर से भर दिए जाने पर नाराजगी जताई।
इसके अलावा मेला अधिकारी नागेन्द्र प्रताप यादव ने संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखकर यमुना के दोनों ओर अतिक्रमण हटवाने तथा पार्किंग के लिए जमीन का चयन करने को भी कहा है।
नागेन्द्र प्रताप ने यह निरीक्षण कार्य ऊर्जा मंत्री द्वारा सीएम योगी को पत्र लिखने के बाद ही क्यों किया, यह तो वही जानते होंगे अलबत्ता नेता नगरी में चर्चाएं अच्छी-खासी हैं।
गौरतलब है कि नागेन्द्र प्रताप यादव एक ओर जहां मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष और ब्रज तीर्थ विकास प्ररिषद के सीईओ हैं वहीं दूसरी ओर ‘उज्जवल ब्रज’ नामक संस्था से भी जुड़े हैं जो ब्रज के विकास हेतु पंजीकृत कराई गई है।
कुल मिलाकर पहले से तीन-तीन बड़ी जिम्मेदारियां निभाते चले आ रहे नागेन्द्र प्रताप पर वृंदावन कुंभ मेला अधिकारी की भी अतिरिक्त जिम्मेदारी है।
बहरहाल, ऊर्जा मंत्री और योगी सरकार के प्रवक्ता श्रीकांत शर्मा का कुंभ मेले की तैयारियों में ढील बरतने पर स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ सीधे मुख्यमंत्री को शिकायती पत्र लिखना बहुत कुछ कहता है, वो भी तब जबकि 2022 में यूपी विधानसभा के चुनाव प्रस्तावित हैं।
मथुरा की जिस विधानसभा सीट से कांग्रेस के लगातार 15 साल विधायक रहे प्रदीप माथुर को हराकर श्रीकांत शर्मा सन् 2017 में भाजपा की टिकट पर विधायक निर्वावित हुए हैं, वह मथुरा-वृंदावन विधानसभा सीट ही है।
कस्बा गोवर्धन के मूल निवासी श्रीकांत शर्मा का इस तरह मथुरा न सिर्फ गृह जनपद है बल्कि निर्वाचन क्षेत्र भी है। ऐसे में श्रीकांत शर्मा का स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों को लेकर मुख्यमंत्री को लिखा गया पत्र समझ से परे है।
लोगों का मत है कि इस पत्र के दो मतलब निकलते हैं। जिसमें पहला तो ये कि श्रीकांत शर्मा का योगीराज में कद घट रहा है इसलिए प्रशासनिक अधिकारियों पर उनकी पकड़ ढीली पड़ रही है और वह श्रीकांत शर्मा की बात को तरजीह नहीं दे रहे।
इसके अलावा एक दूसरा मतलब यह भी निकलता है कि ऊर्जा मंत्री की खुद कुंभ मेले की तैयारियों में कोई रुचि नहीं है इसलिए वो पत्र लिखकर स्थानीय नागरिकों एवं साधु-संतों की नाराजगी से पल्ला झाड़ रहे हैं और उन्हें ‘चलता’ कर रहे हैं। हालांकि इसमें पहले वाली बात ज्यादा दमदार लगती है क्योंकि अधिकारी कई मौकों पर उनसे भारी पड़ते दिखाई दिए हैं।
यूं भी काफी समय बाद मथुरा में कोई जिलाधिकारी इतने लंबे समय तक तैनात रहा है, जिस कारण उनकी सत्ता के गलियारों में मजबूत पकड़ के खासे चर्चे हैं।
बताया जाता है कि जिलाधिकारी आसानी से किसी को भाव नहीं देते, फिर चाहे सत्ताधारी दल का कोई नेता हो, मंत्री हो या फिर मीडियाकर्मी ही क्यों न हों।
जहां तक प्रश्न ब्रज तीर्थ विकास परिषद से जुड़े प्रमुख अधिकारियों नागेन्द्र प्रताप और शैलजाकांत मिश्र का है तो उनकी कार्यप्रणाली को लेकर ऊर्जा मंत्री ने भले ही पहली बार सार्वजनिक तौर पर नाराजगी व्यक्त की हो किंतु आम जनता तथा विभिन्न समाजसेवी संगठनों सहित जागरूक लोगों में पहले से काफी नाराजगी है, बावजूद इसके हर बार उनका पलड़ा भारी साबित हुआ है।
यहां गौर करने वाली बात यह भी है कि आईपीएस अधिकारी शैलजाकांत मिश्र और प्रशासनिक अधिकारी नागेन्द्र प्रताप यादव का मथुरा से बहुत गहरा लगाव लगातार बना हुआ है।
नागेन्द्र प्रताप यादव जहां मथुरा में ही एसडीएम और एडीएम भी रहे हैं वहीं शैलजाकांत मिश्र करीब तीन दशक पहले बतौर पुलिस अधीक्षक यहां तैनाती रही। इसी दौरान वह ‘देवरिया बाबा’ के नाम से मशहूर संत ‘देवरहा बाबा’ के संपर्क में आए और फिर उनका निरंतर सानिध्य प्राप्त करने के लिए मथुरा-वृंदावन के होकर रह गए। उनकी तैनाती कहीं भी रही हो परंतु मथुरा आना उनका कम नहीं हुआ। फिलहाल ब्रज तीर्थ विकास परिषद के मुखिया की हैसियत से वो यहां सेवारत हैं।
शैलजाकांत मिश्र का दावा है कि देवरहा बाबा ने उन्हें मथुरा में तैनाती के दौरान ही ऐसा आशीर्वाद दिया था जिसके कारण उन्हें ब्रज तीर्थ विकास परिषद के मुखिया की हैसियत से दोबारा यहां सेवा करने का मौका मिल रहा है। ये बात और है कि लोग उनकी सेवा को संदिग्ध मानते हैं और सेवा की आड़ में मेवा हासिल करने का आरोप भी लगाते हैं।
जो भी हो, किंतु इसमें दो राय नहीं कि जिलाधिकारी सर्वज्ञराम मिश्र से लेकर ब्रज तीर्थ विकास परिषद के मुखिया शैलजाकांत मिश्र तक और तीन-तीन सरकारी जिम्मेदारियां निभा रहे नागेन्द्र प्रताप यादव सहित कई अन्य प्रशासनिक अधिकारियों की सत्ता के गलियारों में कहीं तो कोई ऐसी पकड़ है जिसके बूते वह श्रीकांत शर्मा जैसे कद्दावर मंत्री व भाजपा नेता की बात को दरकिनार करने का माद्दा रखते हैं।
यदि ऐसा नहीं है और श्रीकांत शर्मा आम जनता और साधु-संतों को गुमराह करने के उद्देश्य से मुख्यमंत्री को शिकायती पत्र लिखकर कोई खेल कर रहे हैं तो तय जानिए कि आगामी चुनाव उनके लिए इतना आसान नहीं होगा क्योंकि उन्हें लेकर भी जनता को बहुत शिकायतें हैं।
ये भी कह सकते हैं कि उनका अपना मतदाता हो या पार्टी का कार्यकर्ता, कम से कम उनसे खुश तो नहीं है। बेहतर होगा कि ऊर्जा मंत्री उनके अंदर निहित ऊर्जा को कम आंकने की भूल न करें अन्यथा चुनावों में उसका करंट मुश्किल में डाल सकता है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शनिवार, 7 नवंबर 2020
नीरा राडिया के नयति हेल्थकेयर पर 300 करोड़ रुपए की धोखाधड़ी का मामला दर्ज
नई दिल्ली। दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच ने मामला दर्ज कर दो फर्मों के खिलाफ जांच शुरू की है, जिसमें नयति हेल्थकेयर (Nayati Healthcare) भी शामिल है, जिसकी चेयरपर्सन और प्रमोटर नीरा राडिया हैं। गुरुग्राम की हेल्थ फर्म के साथ-साथ ईओडब्ल्यू की एफआइआर में दर्ज एक अन्य कंपनी नारायणी इन्वेस्टमेंट प्राइवेट लिमिटेड पर 300 करोड़ रुपये से अधिक की धनराशि के दुरुपयोग का आरोप लगाया गया है जो एक ऋण के माध्यम से प्राप्त की गई थी। नयति और नारायणी पर गुरुग्राम और विमहंस हॉस्पिटल दिल्ली के प्रिमामेद हॉस्पिटल परियोजनाओं (Primamed Hospital Projects) में 2018-2020 के बीच 312.50 करोड़ रुपये की राशि के गबन और जालसाजी का आरोप लगाया गया है।दिल्ली के ऑर्थोपेडिक सर्जन राजीव के शर्मा ने यह शिकायत दर्ज की है। सूत्रों के अनुसार फर्मों ने विभिन्न प्रसिद्ध ठेकेदारों के नाम पर फर्जी खाते खोलकर और इन खातों में सीधे लोन मनी ट्रांसफर करके लोन से करोड़ों का गबन किया। राजीव शर्मा ने अपनी शिकायत में आरोप लगाया कि 400 करोड़ रुपये से अधिक के ऋण और इक्विटी मनी को बेशर्मी से निकाल दिया गया है जबकि गुरुग्राम अस्पताल के बिल्डिंग की हालत पहले से भी बदतर हो गई है।
इस संबंध में अन्य जांच की प्रक्रिया अभी है जारी
नयति हेल्थकेयर ने बाद में इस मामले को लेकर एक बयान जारी किया। डॉ. शर्मा बोर्ड के सदस्य होने के नाते कंपनी के सभी कार्यों के लिए एक पार्टी और हस्ताक्षरकर्ता थे। मतभेदों के कारण जो गतिविधियों के एक फोरेंसिक ऑडिट के संचालन के लिए पीछा किया गया था। डॉ. राजीव शर्मा के तहत पिछला प्रबंधन, गलतबयानी और दुर्भावना के कुछ मामले सामने आए। इन मुद्दों को डॉ. शर्मा के साथ उठाया गया था और विधिवत रूप से पुलिस को एक शिकायत (SIC) के रूप में सूचित किया गया था। इस संबंध में अन्य जांच की प्रक्रिया अभी जारी है।
-एजेंसियां
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