शनिवार, 13 नवंबर 2021

मिशन यूपी: एक-तिहाई मौजूदा विधायकों के टिकट काट सकती है BJP


 यूपी विधानसभा चुनाव को लेकर BJP की ठोस रणनीति तैयार करने के लिए अब केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह खुद एक्टिव होने जा रहे हैं। वह 29 अक्टूबर को लखनऊ पहुंचेंगे और मिशन यूपी को अंजाम देने के लिए पार्टी के दिग्गजों सहित संगठन के दूसरे नेताओं से भी मीटिंग करेंगे। अमित शाह के इस दौरे से यूपी बीजेपी में खलबली मच गई है। दरअसल, इस खलबली की बड़ी वजह यह है कि आगामी विधानसभा चुनाव में बीजेपी अपने एक-तिहाई मौजूदा विधायकों के टिकट काट सकती है। बताया जाता है कि इस बारे में पार्टी ने अपना मन पूरी तरह बना लिया है।

किन नेताओं पर गिरेगी गाज?
जाहिर है कि ऐसे में यह चर्चा शुरू हो गई है कि टिकट गंवाने वालों की लिस्ट में कौन-कौन से नेता का नाम हो सकता है। इन नेताओं की तादाद 100 तक जा सकती है। वैसे बीजेपी सूत्रों का कहना है कि इनमें प्रमुख रूप से वो बीजेपी विधायक शामिल हैं जो 2017 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले दूसरे दलों से बीजेपी में आए थे, लेकिन फिर आलाकमान की उम्मीदों पर खरे नहीं उतर सके। इनमें कुछ ऐसा पार्टी नेता भी शामिल हो सकते हैं जिनका कामकाज संतोषजनक नहीं रहा और वे सीएम योगी आदित्यनाथ और पीएम नरेंद्र मोदी की छवि को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
​इस फैसले से बीजेपी को कितना नुकसान?
वैसे बीजेपी के अंदर इसकी चर्चा भी हो रही है कि कहीं इतनी तादाद में विधायकों के टिकट काटने से चुनाव में पार्टी को नुकसान ना हो। इसका उल्टा असर भी हो सकता है। हालांकि जो लोग मोदी-शाह की चुनावी शैली को जानते हैं, उनका कहना है कि ऐसे खतरे लेने से दोनों दिग्गज बिल्कुल नहीं हिचकते हैं।
​बीजेपी की कुछ ऐसी रणनीति
2017 के चुनाव में बीजेपी की झोली में 312 सीटें आई थीं और 39.67 फीसदी वोट मिले थे। एक बार फिर से बीजेपी उससे बढ़कर जबर्दस्त प्रदर्शन की उम्मीद कर रही है। इसी को ध्यान में रखते हुए बीजेपी ने 1.5 करोड़ नए मेंबर्स जोड़ने का लक्ष्य रखा है। अभी बीजेपी के पास 2.3 करोड़ मेंबर्स हैं और इसकी संख्या बढ़ाने पर पार्टी का पूरा फोकस है।
संभावित नुकसान के लिए यह प्लान
2014 लोकसभा चुनाव में शाह को खुद पीएम मोदी ने ‘मैन ऑफ द सीरीज’ घोषित किया था और शाह ने इसे साबित भी किया था। सवर्ण और गैर यादव-ओबीसी वोटों को एकजुट कर बीजेपी ने करिश्माई प्रदर्शन किया था और यूपी में बीजेपी को नई जिंदगी मिली थी। एक बार फिर से शाह कुछ ऐसी ही रणनीति बनाने में जुटे हैं। बीजेपी मेंबर्स की संख्या बढ़ाना बीजेपी की प्रमुख रणनीतियों में एक है।
​इन नेताओं का टिकट क्यों काट रही बीजेपी?
पार्टी सूत्रों का कहना है कि सीनियर नेता मौजूदा विधायकों के कामकाज का भी आंकलन कर रहे हैं। इसमें विधानसभा क्षेत्र में विधायक की छवि, कामकाज और आम लोगों की राय भी ली जा रही है। इसी आधार पर इन नेताओं के टिकट बरकरार या काटने पर फैसले लिए जाएंगे। यूपी बीजेपी का कहना है कि अभी जो इसको लेकर भी अड़चन या संशय है, शाह के आने से वह दूर हो जाएगी।
-Legend News

राडिया की नीयत में खोट का ही नतीजा है ‘नयति’ का इस “नियति” को प्राप्‍त होना, 5 वर्ष पहले जता दी थी आशंका

 


28 फरवरी 2016 को देश के प्रमुख उद्योगपति रतन टाटा के हाथों जब “2G स्‍पैक्‍ट्रम” घोटाला फेम और “पनामा लीक्‍स” चर्चित महिला लाइजनर “नीरा राडिया” ने योगीराज भगवान श्रीकृष्‍ण की नगरी में ‘नयति’ के नाम से सुपर स्पेशलिटी हॉस्‍पिटल का उद्घाटन कराया था तो ऐसा लगा जैसे ईश्‍वर ने ब्रजवासियों की बात सुन ली क्‍योंकि मथुरा जनपद तब स्‍वास्‍थ्‍य सेवाओं के मामले में काफी पिछड़ा हुआ था।

लेकिन कॉरपोरेट लॉबिस्‍ट नीरा राडिया द्वारा समाजसेवा की आड़ लेकर कृष्‍ण नगरी में खोला गया ‘नयति’ सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल बहुत जल्‍द नित-नए विवादों का केंद्र बन गया लिहाजा Legend News ने 23 जून 2016 को “नीरा राडिया के नयति की नीयत में ही खोट लगता है” शीर्षक से एक खबर प्रकाशित की।
इस खबर से बौखलाकर ‘नयति’ की ओर से उसकी लॉ फर्म ARCINDO Law Advotactes & Solicitors द्वारा लीगल नोटिस भी भेजा गया किंतु Legend News की और से जब इस लॉ फर्म को तथ्‍यों सहित जवाब दिया गया और किसी भी सूरत में कोई खंडन न छापने तथा केस लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार रहने को कहा गया तो ‘नयति’ के प्रबंधतंत्र को सांप सूंघ गया।


आखिर ‘नयति’ ने भविष्‍य में शिकायतें ठीक करने का आश्‍वासन देकर जैसे-तैसे अपनी साख बचाने में ही भलाई समझी।
बहरहाल, 5 साल पहले अपनी खबर के माध्‍यम से “लीजेण्‍ड न्‍यूज़” द्वारा लिखी गईं वो लाइनें अब सच साबित होती दिखाई दे रही हैं जिनमें आशंका जताई गई थी कि यही हाल रहा तो ‘नयति’ बहुत जल्‍द बंद हो जाएगा क्‍योंकि नयति के मालिकानों का मथुरा जैसे विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक स्‍थान पर अत्‍याधुनिक सुविधाओं से युक्‍त हॉस्‍पिटल खोलने का मकसद चाहे जो भी हो, कम से कम जनसेवा तो नहीं लगता।
23 जून 2016 को लिखी गई इस पूरी खबर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्‍लिक करके पढ़ सकते हैं-
https://bhrashtindia.blogspot.com/2016/06/blog-post_23.html
अब नई खबर यह है कि “नयति हॉस्‍पिटल” में फिलहाल ताला डाल दिया गया है क्‍योंकि उस पर एक ओर जहां बिजली विभाग का 01 करोड़ 33 लाख रुपयों का भारी-भरकम बिल बकाया है वहीं दूसरी ओर स्‍टाफ को भी कई माह से वेतन नहीं दिया गया है। हालांकि हॉस्‍पिटल में ताला लगने का कारण ‘नियति’ का प्रबंधतंत्र कुछ और बता रहा है। उसका कहना है कि हॉस्‍पिटल में मरम्‍मत आदि का काम कराए जाने की वजह से उसे 3 महीने के लिए बंद किया गया है किंतु इस कथन में सच्‍चाई कम प्रतीत होती है क्‍योंकि नयति द्वारा बताए गए 3 माह के समय में से पूरे दो माह का समय बीत चुका है और हॉस्‍पिटल में ऐसी कोई गतिविधि नजर नहीं आ रही जिससे उसके दोबारा खुलने की संभावना महसूस होती हो।
जो भी हो, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि ‘नियति’ आज जिस दशा को प्राप्‍त है उसके पीछे तमाम लोगों की बद्दुआओं के साथ-साथ मालिकानों की ‘बदनीयती’ एक बड़ा कारण है अन्‍यथा ऐसा न होता कि अनेक शिकायतों के बावजूद ‘नयति’ के प्रबंधतंत्र पर किसी पीड़ित के आंसुओं का कोई प्रभाव न पड़ता और वो वर्षों तक मनमानी करते हुए हॉस्‍पिटल को सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाने का जरिया बनाए रखते।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

रविवार, 17 अक्टूबर 2021

मथुरा-वृंदावन सीट पर इस बार वैश्‍य समाज भी करेगा बड़ी दावेदारी, कई लोग लाइन में


 उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों की विधिवत घोषणा भले ही अभी नहीं हुई है किंतु राजनीति की बिसात पर मोहरे बिछाने का खेल पूरी तरह शुरू हो चुका है।

महाभारत नायक योगीराज भगवान श्रीकृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली होने के कारण धार्मिक दृष्‍टि से मथुरा जिले का विश्‍वभर में अपना एक विशिष्‍ट स्‍थान तो है ही, लेकिन राजनीति के क्षेत्र में भी यह जिला कम महत्‍व नहीं रखता।
यही कारण है कि 2014 और 2019 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी ने सिने अभिनेत्री हेमा मालिनी को मथुरा से चुनाव लड़वाया क्‍योंकि किसी भी कीमत पर वह इस सीट को खोना नहीं चाहती थी।
इसी प्रकार 2017 में अखिलेश यादव को यूपी की सत्ता से बेदखल करने के लिए भाजपा ने बहुत सोच-समझकर उम्‍मीदवारों का चयन किया।
अगर बात करें मथुरा जनपद की तो यहां की सर्वाधिक प्रतिष्‍ठित और भाजपा को पिछले कई चुनावों से लगातार हार का मुंह दिखाने वाली मथुरा-वृंदावन विधानसभा सीट पर पार्टी प्रवक्‍ता श्रीकांत शर्मा को उतारा गया।
भाजपा का यह दांव सफल भी रहा और अपराजेय समझे जाने वाले कांग्रेस प्रत्‍याशी प्रदीप माथुर पहली बार चुनाव हार गए, जबकि प्रदीप माथुर ने कांग्रेस के बुरे दिनों में भी इस सीट पर जीत का परचम लहराया था।
श्रीकांत शर्मा शहरी सीट पर चुनाव जीते तो उन्‍हें उनके कद के मुताबिक योगी सरकार ने ऊर्जा जैसे अहम विभाग का मंत्री बनाया। ऊर्जा मंत्री के तौर पर श्रीकांत शर्मा ने अपने क्षेत्र की जनता को बेशक निराश नहीं किया और बिजली की बदहाल व्‍यवस्‍था को न सिर्फ पटरी पर लाए बल्‍कि भविष्‍य के लिए भी कई योजनाओं की नींव रखी।
इस सब के बावजूद श्रीकांत शर्मा एक ओर जहां मथुरा-वृंदावन की जनता से सामंजस्‍य बैठाने में असफल रहे वहीं दूसरी ओर पार्टीजनों के बीच भी अपनी छवि बरकरार नहीं रख सके लिहाजा धीरे-धीरे पार्टी कार्यकर्ता उनसे दूर होते गए।
स्‍थिति‍ यहां तक जा पहुंची कि इसी साल जनवरी माह में 4 दिवसीय प्रवास पर वृंदावन आए संघ प्रमुख मोहन भागवत को मथुरा की 3 सीटों पर प्रत्‍याशी बदलने की सलाह देनी पड़ी।
बताया जाता है कि इन 3 सीटों में मथुरा-वृंदावन विधानसभा क्षेत्र की सीट भी शामिल है क्‍योंकि संघ प्रमुख को अपने सूत्रों से ऐसा ही फीडबैक मिला था। संघ को मिले फीडबैक के मुताबिक पार्टी को स्‍थानीय स्‍तर पर कई-कई गुटों में बांट देने का काम भी श्रीकांत शर्मा ने बखूबी पूरा किया है। ऐसे में यदि इन्‍हें एक मौका और दिया गया तो कोई आश्‍चर्य नहीं कि भाजपा की मथुरा इकाई 2022 के चुनाव में हाथ झटक कर खड़ी हो जाए।
संघ प्रमुख की सलाह और स्‍थिति‍-परिस्‍थ‍ित‍ियों के मद्देनजर 2022 के लिए मथुरा-वृंदावन विधानसभा सीट पर वैश्‍य समाज बड़ी दावेदारी जताने का मन बना चुका है।
पार्टी के ही सूत्र बताते हैं कि इस समाज के कई प्रभावशाली लोगों ने इसके लिए अपनी-अपनी बिसात बिछानी शुरू कर दी है और उन लोगों तक बात पहुंचाई जाने लगी है जिनकी टिकट वितरण में बड़ी भूमिका होगी।
सूत्रों की मानें तो वैश्‍य समुदाय के लोगों ने पार्टी हाईकमान तक इस आशय का भी संदेश भेजा है कि मथुरा जिले की 5 विधानसभा सीटों में से अनारक्षित 4 सीटों पर किसी वैश्‍य प्रत्‍याशी की दावेदारी नहीं है, किंतु इस समुदाय का उम्‍मीदवार मथुरा-वृंदावन सीट निकालने का माद्दा रखता है इसलिए इसे लेकर विचार किया जाए।
इसके अलावा यह भी माना जा रहा है कि मथुरा-वृंदावन सीट पर एकबार फिर डॉ. अशोक अग्रवाल अपना भाग्‍य आजमाने जा रहे हैं इसलिए उनकी काट के लिए किसी वैश्‍य को मैदान में उतारना मुफीद होगा।
गौरतलब है कि 2022 के चुनावों में चूंकि समाजवादी पार्टी और राष्‍ट्रीय लोकदल मिलकर चुनाव लड़ने जा रहे हैं इसलिए डॉ. अशोक अग्रवाल इस गठबंधन के संयुक्‍त प्रत्‍याशी हो सकते हैं।
वैश्‍य समुदाय के सूत्र बताते हैं कि मथुरा-वृंदावन सीट पर टिकट की दावेदारी के लिए समाज की ओर से चार लोग प्रयासरत हैं और उनमें से दो लोग आरएसएस के माध्‍यम से अपना नाम आगे बढ़ा रहे हैं।
अब देखना यह होगा कि क्या भाजपा हाईकमान इस सीट को लेकर मिली संघ की सलाह को अहमियत देगा, और क्या वाकई श्रीकांत शर्मा के प्रति नाराजगी का फीडबैक काम करेगा, क्‍योंकि भाजपा भी अब अपने पत्ते फेंटने में इतनी माहिर हो चुकी है कि आसानी से उसे ऐसी हर बात हजम नहीं होती।
जो भी हो, लेकिन इतना तय है कि श्रीकांत शर्मा को 2022 का चुनाव लड़ने से पहले पार्टी के अंदर ही उन लोगों से लड़ना होगा जो उनकी स्‍वाभाविक दावेदारी को खुली चुनौती देने की पूरी तैयारी कर चुके हैं और इसके लिए तुरुप का इक्‍का इस्‍तेमाल करने से चूकना नहीं चाहते।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

सोमवार, 4 अक्टूबर 2021

लखीमपुर खीरी कांड: सूखे में बारिश का मजा, बिन बादल बरसात… यूपी चुनाव के लिए मौका ही मौका…

चुनाव का मौसम हो तो सियासी दल फ्रंटफुट पर खेलते हैं। लोगों के दिलों को छूने वाले वोट बैंक वाले मुद्दों को सूंघकर खुद को जनता का हितैषी साबित करने की होड़ लग जाती है। लखीमपुर खीरी में रविवार को किसानों को कथित तौर पर कुचलकर मार डालने की खबर आई तो देशभर में किसान आंदोलित हो गए लेकिन अगले कुछ ही घंटों में नेताओं ने इतनी आक्रामकता दिखाई कि राजनीतिक पार्टियों ने पूरे विरोध को ‘हाइजैक’ कर लिया। सोशल मीडिया हो या टीवी चैनल, हर जगह पार्टियों के प्रदर्शन छाए हुए हैं।

यूपी में अगले कुछ महीनों के अंदर चुनाव होने हैं, सभी राजनीतिक पार्टियां अपनी टीमें खड़ी करने में जुटी हैं। मुद्दे राष्ट्रीय हों या क्षेत्रीय, पार्टियां संभल-संभलकर आगे बढ़ रही हैं। किसान आंदोलन का वोट बैंक पर असर कम से कम हो, बीजेपी इसके लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही थी, तभी लखीमपुर खीरी कांड ने उसके लिए नई चुनौती खड़ी कर दी। ताक में बैठे विपक्ष को अच्‍छा मौका मिल गया। आधी रात के बाद से कांग्रेस ही नहीं, सपा, बसपा, AAP और दूसरे दल भी अपने-अपने तरीके से किसानों के समर्थन में उतर आए हैं। बीजेपी के विजय रथ को रोकने के लिए पार्टियां इस मुद्दे को अपने लिए ‘संजीवनी’ समझ रही हैं क्यों किसानों से ज्यादा पार्टियां लखीमपुर कांड को लपक रही हैं। आइए हर पार्टी के हिसाब से इसे समझते हैं।
पहले बात कांग्रेस की
अंदरूनी कलह में उलझी कांग्रेस पार्टी ने लखीमपुर-खीरी कांड के बाद थोड़ी राहत की सांस ले रही होगी। पहले मीडिया का पूरा फोकस पंजाब और छत्तीसगढ़ पर था, जहां से पार्टी के लिए टेंशन देने वाली खबरें ही आ रही थीं। पंजाब में भी अगले साल चुनाव है, वहां कैप्टन अमरिंदर सिंह को हटाकर कांग्रेस ने दलित नेता चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम बनाया। पहले लगा कि यह सिद्धू की सियासी विजय है, पर कुछ ही दिन में ऐसा टकराव बढ़ा कि उन्होंने पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। कहा गया कि पंजाब में सब कुछ राहुल-प्रियंका गांधी के निर्देश पर हो रहा है। ऐसे में उनकी नेतृत्व क्षमता पर भी सवाल उठने लगे। G-23 के नेता भी खुलकर केंद्रीय नेतृत्व के विरोध में बोलने लगे थे। अब ऐसे में लखीमपुर-खीरी कांड हो गया। यूपी चुनाव से पहले मौका देख महासचिव प्रियंका गांधी ने सुबह का इंतजार किए बगैर रात में ही लखीमपुर जाने का प्लान बना लिया। सुबह जब तक लोगों की नींद खुलती उनके रौद्र रूप वाला वीडियो वायरल हो चुका था।
वीडियो में वह पुलिस अफसर से वह कहती सुनी जा सकती हैं, ‘तुम मेरा अपहरण करोगे… ये है लीगल स्टेटस तुम्हारा। मत समझो कि मैं नहीं समझती। अरेस्ट करो… हम खुशी से जाएंगे तुम्हारे साथ। तुम जो जबरदस्ती ढकेल रहे हो न, इसमें आप फिजिकल असॉल्ट, किडनैप और छेड़छाड़ करने की कोशिश कर रहे हो…. समझती हूं मैं सब कुछ। छूकर देखो मुझे…जाकर अपने अफसरों से और मंत्रियों से जाकर वारंट लाओ।’ ऐसा लगता है कि इस अंदाज से प्रियंका हताश और निराश कांग्रेस कार्यकर्ताओं को ताकत देने की कोशिश कर रही हैं।
इससे पहले जब 2019 में सोनभद्र हत्याकांड हुआ था तो प्रियंका गांधी पीड़ितों से मिलने पर अड़ गई थीं। उस समय उनके इस कदम को दादी इंदिरा गांधी से जोड़कर देखा गया था। ‘बेलछी नरसंहार’ की घटना से जोड़कर तुलना की जा रही थी। समझा जाता है कि आपातकाल के बाद जनता का विश्वास खो चुकी इंदिरा गांधी जब 1977 का चुनावी हारीं तो बेलछी की घटना के बाद उनका वहां जाना एक बार फिर से उनके राजनीतिक कद को बढ़ाने वाला साबित हुआ। सोनभद्र कांड के बाद अब लखीमपुर कांड के लिए भी जिस तरह से प्रियंका गांधी ने तेवर दिखाए हैं, उससे कांग्रेस के लोग काफी जोश में आ गए हैं।
कुछ समय पहले पंजाब में सीएम पद के दावेदार माने जा रहे वरिष्ठ कांग्रेसी नेता सुनील जाखड़ ने 3 अक्टूबर 2021 को प्रियंका गांधी को हिरासत में लेने के मामले की तुलना 3 अक्टूबर 1977 के घटनाक्रम से कर डाली। दरअसल, तब जनता पार्टी की सरकार में 3 अक्टूबर के दिन इंदिरा गांधी को भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार कर लिया था। हालांकि बाद में सबूतों के अभाव में कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। जाखड़ ने लिखा, ‘अगर श्रीमती इंदिरा गांधी की 3 अक्टूबर 1977 को गिरफ्तारी से जनता पार्टी सरकार की विदाई का मार्ग प्रशस्त हुआ तो 3 अक्टूबर 2021 को प्रियंका गांधी को हिरासत में लेना बीजेपी सरकार के सफाये की शुरुआत बनेगी।’ यह साफ-साफ बताता है कि इतिहास दोहराने का सपना पालकर किसान आंदोलन के मुद्दे को पूरी तरह भुनाना चाहती है।
यही वजह है कि यूपी के प्रभारी बनाए गए छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल को फौरन रायपुर से और पंजाब के उप मुख्यमंत्री रंधावा को चंडीगढ़ से लखनऊ के लिए उड़ने को कहा गया। यह बात अलग है कि किसी भी नेता के प्लेन को लखनऊ में लैंड करने की इजाजत नहीं मिली। कांग्रेस की पूरी कोशिश है कि जनता और मीडिया का पूरा फोकस लखीमपुर और किसानों के मुद्दों पर केंद्रित रखा जा सके जिससे बीजेपी को घेरने का उसे मौका मिल सके। वैसे भी उसे आंतरिक संकट से नुकसान ही हो रहा था।
…और सपा के लिए एक सुनहरी मौका
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव योगी सरकार पर लगातार हमले करते रहे हैं। लखीमपुर जाने के उनके प्लान की आहट मिलते ही पुलिस प्रशासन ने उन्हें और दूसरे सपा नेताओं को नजरबंद कर लिया। अखिलेश नहीं माने और सड़क पर आकर कार्यकर्ताओं के साथ धरने पर बैठ गए। उधर, उनके घर के बाहर पुलिस की एक जीप में आग लगा दी गई। तड़के से प्रियंका लाइमलाइट में थीं, लेकिन 10 बजते-बजते मीडिया के सारे कैमरे अखिलेश पर फोकस कर चुके थे। अखिलेश यादव ने मांग थी कि केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा को इस्तीफा देना चाहिए और पीड़ितों के परिजनों को 2 करोड़ रुपये की मदद दी जानी चाहिए। इतना ही नहीं, लखनऊ में आवास से जब पुलिस ने अखिलेश को हिरासत में लिया तो सैकड़ों की संख्या जमे समर्थकों ने पुलिस की गाड़ी को घर लिया। सपा के झंडे और टोपी के साथ पहुंचे लोगों ने एक तरफ जिंदाबाद के नारे लगाए तो दूसरी तरफ मीडिया के सामने झंडे भी लहराते दिखे जिससे टीवी के सामने बैठी करोड़ों जनता को यह संदेश जाए कि सपा के लोग सड़क पर उतरकर किसानों का समर्थन कर रहे हैं।
लखीमपुर खीरी जिले के तिकोनिया क्षेत्र में रविवार को उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा के पैतृक गांव जाने के दौरान हुए संघर्ष में चार किसानों समेत आठ लोगों की मौत हुई है।
सच तो यह है कि चुनाव में काफी कुछ अब नैरेटिव पर सेट होने लगा है। ऐसे में सभी पार्टियां जनता का परसेप्शन अपने प्रति पॉजिटिव रखना चाहती हैं। 2012-17 के कार्यकाल के दौरान युवाओं को लैपटॉप, गोमती रिवर फ्रंट, एक्सप्रेसवे जैसे कई मुद्दों पर चर्चा बटोरने वाली सपा की ओर से ये आरोप लगाया जाता रहा है कि यूपी में योगी सरकार ने उसके ही शुरू किए गए कामों को अपना नाम दे दिया है। अखिलेश के सामने इस चुनाव में चुनौती बढ़ने वाली है क्योंकि उसका कोर वोट बैंक समझे जाने वाले मुस्लिम और यादव वोटों में भी सेंध लगाने की बीजेपी और ओवैसी की पार्टी कोशिश कर रही हैं। ऐसे में सपा किसान आंदोलन के सहारे अपने पक्ष में माहौल बनाने की तैयारी में है।
यूपी के मैदान में इस बार AAP भी हैं…
यूपी में इस बार आम आदमी पार्टी भी चुनाव लड़ रही है। 24 घंटे आपूर्ति के साथ घरेलू उपभोक्ताओं को 300 यूनिट फ्री बिजली का वादा किया गया है। AAP के नेता दिल्ली के मॉडल को यूपी में लागू करने की बात कर रहे हैं। दिल्ली जैसी फ्री बिजली, बेहतर शिक्षा और फ्री इलाज की बात कर केजरीवाल-सिसोदिया की टीम चुनाव में करिश्मा करने का दावा कर रही है। ऐसे में उनके नेताओं के लिए लखीमपुर कांड में खुद को जनता के करीब ले जाने का बेहतर मौका दूसरा नहीं हो सकता था। केजरीवाल से लेकर सिसोदिया और संजय सिंह सभी नेता एक्टिव हो गए और ट्विटर पर वीडियो लाकर योगी सरकार पर बरसने लगे।
यूपी के सुल्तानपुर से ताल्लुक रखने वाले संजय सिंह रात में ही लखीमपुर के लिए निकल चुके थे। उन्हें विसवां चुंगी सीतापुर के पास 2.30 बजे गिरफ्तार कर लिया गया। संजय सिंह ने इस जानकारी को ट्वीट भी किया। रात में पुलिस से नोकझोंक का उनका वीडियो भी ट्विटर पर छा गया। आप के नेता और कार्यकर्ता रीट्वीट करने लगे। AAP के ट्विटर हैंडल से सीधे बीजेपी पर हमला करते हुए कहा गया, ‘किसानों के परिवार के ये आंसू भारी पड़ेंगे BJP वालो!’।
AAP की कोशिश है कि अगले चुनाव में दिल्ली मॉडल, किसान आंदोलन के सहारे ज्यादा से ज्यादा सीटें अपनी झोली में लाई जा सकें क्योंकि पार्टी को पता है कि जातिगत समीकरण साधने में सभी पार्टियां लगी हैं और वह तरीके उनके काम नहीं आएगा। वैसे भी दिल्ली बॉर्डर पर किसानों के हित में व्यवस्था कर आप ने आंदोलन के पहले दिन से समर्थन दे रखा है। उसे यूपी के साथ-साथ पंजाब भी देखना है।
बसपा के मिश्रा जी भी आक्रामक
बीएसपी ने भी ट्वीट कर बीजेपी सरकार को घेरा। बसपा सुप्रीमो मायावती ने सिलसिलेवार ट्वीट कर सुप्रीम कोर्ट से स्वत: संज्ञान लेने की मांग की। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और राज्यसभा सांसद एससी मिश्र को रविवार देर रात लखनऊ में उनके निवास पर नजरबंद कर दिया गया। यूपी में अनुसूचित जाति और जनजाति के इर्द-गिर्द घूमती बसपा की राजनीति इस बार अपने पुराने समीकरण पर लौटती दिख रही है। ब्राह्मणों को साधने के लिए बसपा ने प्रबुद्ध सम्मेलन शुरू किया है। बसपा को 2014 लोकसभा चुनाव के बाद 2017 विधानसभा और फिर 2019 लोकसभा चुनाव की तरह 2022 में जातिगत समीकरण के फेल होने का डर सता रहा है। केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद जातीय ऐंगल फेल रहे हैं। ऐसे में मायावती की कोशिश है कि वह खुद को किसानों के समर्थन में खड़ा दिखाएं और अगले चुनाव में पार्टी के लिए जीत की राह प्रशस्त हो सके।
ओवैसी और दूसरे दल भी मैदान में
मुसलमानों के बड़ी भूमिका में आने की बात करते हुए ओवैसी की पार्टी AIMIM भी यूपी चुनाव में कूद चुकी है। अयोध्या से चुनावी दौरे का आगाज हो या मुसलमानों का हितैषी बनने की कोशिश, ओवैसी यूपी की सियासत में एक मजबूत किरदार बनना चाहते हैं। ऐसे में उन्होंने लखीमपुर घटना पर फौरन ट्वीट कर न्यायिक जांच की मांग कर डाली। उन्होंने कहा कि जान गंवाने वाले 8 लोगों के परिवारों को मुआवज़ा दिया जाए। इसके साथ ही उन्होंने तीनों कृषि कानून को जल्द से जल्द वापस लेने की मांग की है।
मुश्किल में बीजेपी
किसान आंदोलन के बीच लखीमपुर में किसानों की हत्या पर राजनीतिक दल बड़े हों या छोटे, इस समय सबके निशाने पर बीजेपी है। विपक्षी ही नहीं, कुछ अपने भी योगी सरकार के लिए मुश्किल बढ़ाने वाले साबित हो रहे हैं। इनमें से एक हैं बीजेपी सांसद वरुण गांधी। उन्होंने एक लंबा लेटर लिखकर योगी सरकार से सख्त कार्रवाई की मांग की है। उन्होंने लेटर में साफ लिखा कि एक दिन पहले अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी की जयंती मनाई गई और दूसरे दिन लखीमपुर खीरी में जिस तरह से ”हमारे अन्नदाताओं” की हत्या की गई, वह सभ्य समाज में अक्षम्य है। इससे बीजेपी पर प्रेशर बढ़ रहा है। वह इस मुद्दे को ज्यादा खींचना नहीं चाहती।
ऐसे में हो सकता है किसानों से जुड़ा मामला होने के कारण पार्टी और केंद्रीय नेतृत्व निष्पक्ष जांच का हवाला देते हुए आरोपी मोनू मिश्रा के पिता केंद्रीय गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी का इस्तीफा भी ले ले। हालांकि बड़ा सवाल फिर भी यही है कि क्या किसान आंदोलन से बीजेपी विरोध की भड़की आग चुनाव तक शांत हो पाएगी?

- सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुक्रवार, 24 सितंबर 2021

मुफ़्त के माल पर कई विभाग कर रहे हैं हाथ साफ, 4 की जगह 14 यूनिट… फर्जी राशन कार्ड… रबर के अंगूठे और डिजिटल हेराफेरी


 महामारी के दौर में सरकार द्वारा गरीबों की भलाई के लिए शुरू की गई मुफ़्त राशन बांटने की योजना न केवल राशन माफिया के लिए वरदान साबित हो रही है बल्‍कि इससे कई विभागों की तो जैसे लॉटरी निकल पड़ी है और इन विभागों में बेठे भ्रष्‍टाचारियों के वारे-न्‍यारे हो चुके हैं।

यही कारण है कि आए दिन मुफ़्त के इस माल का बीच सड़क पर बंटरबांट होने के बावजूद किसी के कानों पर जूं नहीं  रेंग रही और सब-कुछ बड़े इत्‍मीनान से चल रहा है।
यूं तो सरकारी राशन में घपला और घोटाला किया जाना कोई नई बात नहीं है किंतु कोरोना काल में जब से सरकार ने मुफ़्त राशन बांटने की योजना शुरू की है, तब से राशन माफिया की चांदी ही चांदी हो रही है।
मुफ़्त के इस सरकारी माल पर हाथ साफ करने का कारनामा जाहिर है कि जिला आपूर्ति विभाग की मिलीभगत के बिना संभव नहीं हो सकता इसलिए राशन माफिया सर्वाधिक सक्रिय यहीं रहता है।
फर्जी राशन कार्ड से प्रारंभ होने वाला यह खेल यूनिट बढ़ाने तथा रबर के अंगूठे इस्‍तेमाल करने के कारनामे से होता हुआ डिजिटल हेराफेरी पर जाकर भ्रष्‍टाचार की ऐसी ठोस बुनियाद बनाता है जिसके जरिए पांचों उंगलियां घी में और सिर कड़ाही में का मुहावरा चरितार्थ होते देर नहीं लगती।
विभागीय सूत्र बताते हैं 4 यूनिट के राशन पर 14 यूनिट का माल हड़पने के लिए एक ओर जहां रबर के अगूंठों का इस्‍तेमाल किया जाता है वहीं दूसरी ओर कंप्यूटर के डेटा में भी हेराफेरी की जाती है।
इस पूरे खेल की तह में जाने पर मिली जानकारियां इतनी चौंकाने वाली हैं कि किसी को भी आसानी से भरोसा नहीं हो सकता।
चूंकि राशन हड़पने की सारी प्रक्रिया जिला आपूर्ति विभाग से शुरू होकर यहीं खत्‍म होती है इसलिए बात चाहे ‘मुखबिरी’ की हो या बंटवारे की, इस विभाग की संलिप्‍तता के बिना संभव नहीं।
जिला आपूर्ति कार्यालय से सर्वप्रथम कुछ खास तत्‍वों को ये सूचना लीक की जाती है कि किस गोदाम से कितना फर्जी राशन किस जिले पहुंचाया जा रहा है। फिर वो तत्‍व पुलिस के सहयोग से बीच सड़क पर घेराबंदी करके माल ले जाने वाले से सौदेबाजी करते हैं।
बताया जाता है कि हर महीने इस तरह लाखों रुपए की अतिरिक्‍त कमाई की जाती है और सारे ”मौसेरे भाई” अपना-अपना किरदार बड़ी चालाकी से निभाते हुए सरकार को बेखौफ होकर चूना लगा रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक इस पूरे भ्रष्‍टाचार का सबसे बड़ा हिस्‍सा जिला आपूर्ति कार्यालय हड़पता है। उसके बाद नंबर आता है माल की घेराबंदी करने वालों का और इलाका पुलिस का। कहीं-कहीं इस बंदरबांट में उच्‍च पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारी भी शामिल होते हैं क्‍योंकि पकड़े जाने पर लीपापोती करने में उनकी भूमिका अहम साबित होती है।
विभागीय सूत्र ही बताते हैं कि मुफ़्त के राशन में हो रहे भारी भ्रष्‍टाचार का आलम यह है कि इसे पकड़ने के लिए किसी ‘रॉकेट साइंस’ की जरूरत नहीं है। सरकार चाहे तो सिर्फ किसी भी राशन डीलर के क्षेत्र से कुल यूनिट्स और जिला आपूर्ति कार्यालय में दर्ज उसके टोटल यूनिट्स का मिलान करा ले।
सूत्रों का दावा है कि मात्र इतने भर से राशन माफिया का पूरा काला चिठ्ठा जांच एजेंसी के सामने होगा, और सामने होंगे वो सभी सफेदपोश अधिकारी जो यदा-कदा इसकी अवैध बिक्री में लिप्‍त प्‍यादों को पकड़कर वजीर को बचाने का काम करते हैं ताकि मुफ़्त के माल पर हाथ साफ करने की प्रक्रिया अनवरत जारी रहे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

शनिवार, 4 सितंबर 2021

नामचीन खिलाड़ियों की पैसे और शोहरत के लिए “विराट भूख” आखिर कहां जाकर खत्‍म होगी?

 


 आज ऐसे समय जबकि टोक्यो पैरालंपिक में हमारे खिलाड़ी अपने बेहतरीन प्रदर्शन से देश का नाम ऊंचा कर रहे हैं, ये सवाल एक ओर जहां दिलो-दिमाग में हलचल पैदा करता है वहीं दूसरी ओर मन को दुखी भी करता है किंतु सवाल लाज़िमी है।

सवाल यही है कि पैसे और शोहरत के लिए नामचीन खिलाड़ियों की “विराट भूख” आखिर कहां जाकर खत्‍म होगी?
दरअसल 02 सितंबर को खबर आई कि भारतीय क्रिकेट कप्‍तान विराट कोहली ने अपने इंस्‍टाग्राम पर जो एक पोस्‍ट शेयर किया, उसे लेकर देश की विज्ञापन नियामक एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया (ASCI) की ओर से उन्‍हें नोटिस भेजा गया है। हालांकि ASCI का नोटिस मिलने के बाद कोहली ने अपनी इंस्टा पोस्ट एडिट कर दी थी।
यहां यह जान लें कि सोशल मीडिया साइट पर जिन सेलिब्रिटी के बहुत से फ़ॉलोअर होते हैं, वह अपने चाहने वालों को प्रभावित करने के लिए पोस्ट डालते हैं। इसे इनफ्लुएंसर मार्केटिंग कहते हैं। अपने प्रशंसकों तक इस तरह की एक मार्केटिंग पोस्ट पहुंचाने के लिए विराट कोहली को करीब “पांच करोड़” रुपये मिलते हैं।
इंस्टा पर यूनिवर्सिटी की तारीफ
विराट कोहली ने पिछले 27 जुलाई को अपने इंस्टाग्राम पर एक मार्केटिंग पोस्ट डाली। तीन फोटो की यह पोस्ट एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी के उन छात्रों के बारे में है जो टोक्यो ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। पहले फोटो में विराट ने लिखा, “टोक्यो ओलंपिक में भारत की ओर से भेजे गए कुल खिलाड़ियों में से 10 फ़ीसदी इसी यूनिवर्सिटी से हैं। यह एक रिकॉर्ड है। उम्मीद करता हूं कि इस यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट भारतीय क्रिकेट टीम का भी हिस्सा बनेंगे।”
ASCI का नोटिस
अगली दो फोटो में यूनिवर्सिटी का पोस्टर था। इनमें उन 11 खिलाड़ियों के नाम थे जो टोक्यो ओलंपिक के दौरान भारतीय दल का हिस्सा रहे। कोहली ने अपनी इस इंस्टा पोस्ट में यूनिवर्सिटी का नाम भी मेंशन किया। यह वास्तव में एक पेड पोस्ट थी, और इसे ही इनफ्लुएंसर मार्केटिंग कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि क्रिकेटर विराट कोहली ने इंस्टाग्राम पर इस पोस्ट को डालने के लिए यूनिवर्सिटी से पैसे लिए हैं। इसके बाद कोहली को ASCI ने नोटिस भेज दिया।
विज्ञापन की गाइडलाइन्स
ASCI की गाइडलाइन्स के मुताबिक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर ने अगर कोई पेड पोस्ट डाली है, तो उन्हें अपने फ़ॉलोअर को यह बताना होगा कि यह पोस्ट विज्ञापन कैंपेन का हिस्सा है। विराट कोहली ने यूनिवर्सिटी वाली पोस्ट में कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं किया था। इसी वजह से कोहली को ASCI का नोटिस भेजा गया। ASCI के नोटिस के बाद कोहली ने इंस्टा पोस्ट को एडिट कर उसमें पार्टनरशिप का टैग लगा दिया।
विराट कोहली की वर्तमान कुल संपत्ति
जानकारी के अनुसार विराट कोहली की वर्तमान कुल संपत्ति एक हजार करोड़ रुपए से अधिक है और महज विज्ञापनों के जरिए वह लगभग 200 करोड़ रुपए सालाना अर्जित करते हैं।
इसके अलावा विराट कोहली चूंकि भारतीय क्रिकेट टीम के कप्‍तान हैं इसलिए उन्‍हें बीसीसीआई से ग्रेड A मिला हुआ है। यानी वो A ग्रेड के खिलाड़ी हैं। ऐसे में विराट को 7 करोड़ रुपये प्रति वर्ष सैलरी के रूप में प्राप्‍त होता है। उन्‍हें 1 टेस्ट मैच खेलने के लिए 15 लाख, 1 वनडे खेलने के लिए 6 लाख और एक टी20 मैच खेलने के लिए 3 लाख रुपयों की राशि दी जाती है। इस तरह विराट कोहली के वेतन आंकड़ा प्रति वर्ष लगभग 24 करोड़ रुपए बैठता है।
आईपीएल से भी करोड़ों कमाते हैं कोहली
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार विराट कोहली अब IPL में महेंद्र सिंह धोनी से भी ज्यादा फीस ले रहे हैं। रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के कप्तान विराट कोहली सैलरी के मामले में एमएस धोनी से आगे निकल गए हैं। कोहली को जहां साल में 15 करोड़ रुपए मिलते हैं, वहीं धोनी को 12.5 करोड़ ही मिल रहे हैं। ऐसे में विराट करोड़ों रुपए अतिरिक्‍त केवल आईपीएल से कमा लेते हैं।
इतना सब होने के बावजूद विराट कोहली द्वारा पंजाब की लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के विज्ञापन वाली पोस्‍ट को ASCI की गाइडलाइन्स के खिलाफ जाकर पोस्‍ट करना, यह जाहिर करता है कि वो अपनी इस कमाई को छिपाना चाहते थे। सीधे अर्थों में कहें तो वो इस कमाई पर बनने वाले सरकारी टैक्‍स को चुराने की मंशा रखते थे। ये बात अलग है कि ASCI से नोटिस मिलने के बाद उन्‍होंने न सिर्फ अपनी पोस्‍ट डिलीट कर दी, बल्‍कि उसमें पार्टनरशिप का टैग भी लगा दिया।
भारतीय क्रिकेट टीम के कप्‍तान कोहली अकेले ऐसे खिलाड़ी नहीं है जिनकी “विराट भूख” चर्चा का विषय बनी हो। पूर्व कप्‍तान महेंन्‍द्र सिंह धोनी से लेकर भारत रत्‍न सचिन तेंदुलकर तक तमाम ऐसे क्रिकेटर हैं जो अन्‍य स्‍त्रोतों से अपनी कमाई के कारण विवादों में रहे हैं।
जिन सचिन तेंदुलकर को तत्‍कालीन केंद्र सरकार ने नियम बदलकर ‘भारत रत्‍न’ जैसे देश के सर्वोच्‍च सम्‍मान से नवाजा, वो भी आज तक पैसों की खातिर किसी भी चैनल पर निजी विज्ञापन करते देखे जा सकते हैं। वो भी तब जबकि टीवी पर दिखाए जाने वाले अधिकांश विज्ञापन भ्रामक होते हैं और उनका बड़ी हस्‍तियों से प्रचार कराने के पीछे एकमात्र मकसद 135 करोड़ लोगों को गुमराह करके अपना उत्‍पाद बेचना होता है।
महेन्‍द्र सिंह धोनी तो कई विवादित कंपनियों का विज्ञापन करने, साथ ही उनमें अपना पैसा निवेश करने के लिए भी जाने जाते हैं। अपनी व्‍यावसायिक बुद्धि से वह इन कंपनियों से दोहरी कमाई करते हैं। यही कारण है कि उनके ऊपर इन कंपनियों को लेकर उंगलियां ही नहीं उठीं, केस तक दर्ज हुए।
पैसों के लिए हवस की हद तक जाने वाले ये खिलाड़ी शोहरत के भी उतने ही भूखे हैं और इसलिए वह ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ते जिनसे उन्‍हें सस्‍ती लोकप्रियता हासिल होती हो।
हाल ही में हार्दिक पांड्या द्वारा अपनी 5 करोड़ रुपए मूल्‍य की कलाई घड़ी का फूहड़ प्रदर्शन भी यह दिखाता है कि सामान्‍य और अति सामान्‍य पृष्‍ठभूमि से आने वाले इन खिलाड़ियों की मानसिकता कितनी छोटी तथा पैसा कमाने की इनकी हवस कितनी बड़ी होती है।
आश्‍चर्य की बात यह भी है कि शिक्षा के नाम पर औपचारिकता पूरी करने वाले ये खिलाड़ी व्‍यावसायिकता के लिए इतने तीक्ष्‍ण बुद्धि साबित होते हैं कि बड़े से बड़े कारोबारी और उद्योगपति कहीं नहीं टिकते।
अन्‍य खिलाड़ियों को भी है पैसे और शोहरत की “विराट भूख”
क्रिकेटर्स के अतिरिक्‍त बात करें अन्‍य खेलों से जुड़े खिलाड़ियों की तो वो भी इस मामले में कम नहीं हैं। भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल कुछ समय पहले तब चर्चा में आईं थीं जब उनके विदेश दौरे पर उनके साथ उनकी मां को सरकारी खर्चे से भेजने में आनाकानी की गई। साइना नेहवाल ने बाकायदा इसके लिए रोष जाहिर किया।
इसी प्रकार कुश्‍ती, टेनिस सहित अन्‍य खेलों से जुड़े खिलाड़ी भी समय-समय पर सुख-सुविधाओं को लेकर अपना रोना रोते देखे गए हैं। वह भी तब जबकि जीत हासिल करने के बाद केंद्र व राज्‍य सरकारें इनके ऊपर जहां पैसे की बारिश करती हैं वहीं इन्‍हें अच्‍छी-खासी नौकरियां भी मुहैया कराती हैं जिससे इनका भविष्‍य हमेशा हमेशा के लिए सुरक्षित हो जाता है।
इतना सब होने के बाद भी बहुत से खिलाड़ी तो अपने लिए पदक व सम्‍मान तक मांगने से नहीं हिचकते और उनकी अपने लिए मांग इतनी बेशर्मी के साथ करते हैं जैसे यह उनका हक हो या देश के लिए खेलकर अथवा कोई पदक अर्जित करके वह देश तथा देशवासियों पर अहसान कर रहे हों।
माना कि खिलाड़ी हर देश की शान होते हैं और उनकी उपलब्‍धियां देश के मान-सम्‍मान को बढ़ाने का काम करती हैं किंतु इसका यह मतलब तो नहीं कि दौलत, शोहरत और इज्‍जत की भूख इतनी बढ़ा ली जाए कि गैरकानूनी तरीके अख्‍तियार करने से भी परहेज न हो या वो लोगों की आखों में खटकने लगे।
कोरोना काल ने देश के एक बड़े तबके की रोजी-रोटी का जरिया छीन लिया। बहुत से लोगों के सामने अचानक आ खड़ी हुई भविष्‍य की चिंता उन्‍हें सोने नहीं दे रही। अभी तो यह भी नहीं पता कि इस महामारी की कितनी लहरें आना बाकी हैं और उन परिस्‍थितियों में लोग किस तरह अपना घर-परिवार चलाएंगे लेकिन लगता है अरबों रुपए हर साल कमाने वाले हमारे खिलाड़ी इतने संवेदनाहीन हो चुके हैं कि उन्‍हें अपने अलावा किसी और के बारे में सोचने की भी फुर्सत नहीं है।
सैकड़ों रुपए प्रति लीटर की कीमत का पानी पीने वाले विराट कोहली को क्या मालूम नहीं कि आज भी देश में लाखों गांव ऐसे हैं जहां पीने के लिए सामान्‍य पानी तक उपलब्‍ध नहीं है।
हो सकता है कि फ्रांस से आयातित बेशकीमती पानी पीना विराट कोहली की किसी “शारीरिक अथवा मानसिक” मजबूरी का हिस्‍सा हो लेकिन उन्‍हें यह नहीं भूलना चाहिए कि वो जिस देश के वासी हैं, उस देश के लोगों की बहुत छोटी-छोटी जरूरतें भी ताजिंदगी पूरी नहीं होतीं।
फिर भी यदि वो उनके लिए कुछ नहीं कर सकते तो न करें किंतु अपनी बेजा हरकतों से न तो उनका दिल दुखाएं और न ऐसी हरकतों में लिप्‍त हों जिनसे साफ जाहिर होता हो कि वो टैक्‍स चोरी की कोशिश करके देश के साथ धोखा करने का मौका छोड़ना नहीं चाहते।
- सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

मंगलवार, 24 अगस्त 2021

इलाहाबाद HC के चौंकाने वाले आंकड़े, 1.8 लाख से ज्यादा आपराधिक अपीलें लंबित


इलाहाबाद हाई कोर्ट के ऐसे चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं जिनसे पता चला है कि HC में 1.8 लाख से ज्यादा आपराधिक अपीलें लंबित हैं।

सुप्रीम कोर्ट में दिए गए डाटा के बाद ये आंकड़े सामने आए हैं। इनसे पता चला है कि हाई कोर्ट का डिस्पोजल रेट मात्र 18 फीसदी का है।
इन आंकड़ों का मतलब यह है कि किसी को ट्रायल कोर्ट से सजा होती है और वह सजा के खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाता है, उसे अपने मामले का फैसला करने के लिए 35 साल इंतजार करना पड़ सकता है। इसके अलावा अगर वह जघन्य अपराधों में शामिल है, जहां जमानत मिलना वैसे भी मुश्किल है तो उसे न्याय की प्रतीक्षा में कई वर्षों तक जेल में रहना पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट कर रही सुनवाई
पीठ उन हजारों दोषियों को छुड़ाने के तरीकों की जांच कर रही है, जो अपनी अपील पर सुनवाई का इंतजार कर रहे यूपी की विभिन्न जेलों में बंद हैं। राज्य सरकार के हलफनामे के अनुसार वर्तमान में इलाहाबाद HC में 1990 के दशक की अपीलों की सुनवाई की जा रही है और उसके बाद दायर अपीलों पर सुनवाई की जा रही है।
2019 में निपटाई गई थीं 5,231 अपीलें
आंकड़ों के अनुसार मामलों के निपटान के मामले में सबसे अच्छा साल 2019 था। हाई कोर्ट ने तब रिकॉर्ड 5,231 आपराधिक अपीलों पर फैसला किया। इन आंकड़ों के आधार पर हाई कोर्ट को 1.8 लाख से अधिक मामलों को निपटाने में लगभग 35 साल लगेंगे और वह भी तब जब भविष्य में दायर की गई कोई नई अपील पर विचार नहीं किया जाएगा।
1990 की अपीलें भी पेडिंग
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह चौंकाने वाला डाटा जस्टिस संजय किशन कौल और हृषिकेश रॉय की बेंच के सामने रखा गया। आंकड़ों से पता चला कि कई अपीलें 1990 की भी पेडिंग हैं जिन पर फाइनल हियरिंग होनी है। बीते पांच वर्षों में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 16,279 आपराधिक अपीलों पर सुनवाई की तो इस दौरान 41,151 नई अपीलें दायर हुईं।
आधी सजा काट लेने वालों को मिल सकती है जमानत
यूपी की विभिन्न जेलों में बंद 7,214 दोषी ऐसे हैं जिन्होंने अपनी दस साल की सजा पूरी भी कर ली। कई मामलों में लोग 14 वर्षों से जेल में बंद हैं और जमानत मिलने का इंतजार कर रहे हैं। अपर महाधिवक्ता गरिमा प्रसाद ने कहा कि अगर किसी दोषी ने अपनी आधी सजा काट ली है तो उसे जमानत दी जा सकती है।
हालांकि आदतन अपराधियों पर यह लागू नहीं होता, क्योंकि वह जेल से बाहर आकर फिर से अपराध को अंजाम दे सकते हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट में अभी न्यायाधीशों के 160 पद स्वीकृत हैं जबकि 93 न्यायाधीश कार्यरत हैं।
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