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मंगलवार, 23 अगस्त 2022
अन्ना के चेलों ने बहुत जल्द पूरा कर लिया "राजनीति" से "शराबनीति" तक का सफर
बाबूराव हजारे यानी अन्ना हजारे। ये वो शख्सियत है जिसने कई दशक पहले शराब निषेध अभियान की शुरूआत महाराष्ट्र के रालेगण सिद्धि से की थी। हजारे और उनके युवा समूह ने सुधार की प्रक्रिया जारी रखने के लिए शराब के मुद्दे को उठाने का फैसला किया। गांव के मंदिर में आयोजित एक बैठक के तहत ग्रामीणों ने शराब के ठेके बंद करने और शराब पर प्रतिबंध लगाने का संकल्प लिया। चूंकि ये संकल्प मंदिर में किए गए थे इसलिए वे एक तरह से धार्मिक प्रतिबद्धता बन गए। तीस से अधिक शराब बनाने वाली इकाइयों ने स्वेच्छा से अपने प्रतिष्ठान बंद कर दिए। जो लोग सामाजिक दबाव के आगे नहीं झुके उन्हें अपने व्यवसाय बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि हजारे के युवा समूह ने उनके परिसर को तोड़ दिया। बताते हैं कि एक बार अन्ना के युवा समूह ने 3 शराबी ग्रामीणों को खंभों से बांध दिया और फिर हजारे ने खुद सेना की अपनी बेल्ट से उन्हें पीटा। उन्होंने इस सजा को यह कहते हुए उचित भी ठहराया कि "एक माँ अपने बीमार बच्चे को इसलिए कड़वी दवाएँ पिलाती है क्योंकि उसे पता होता है कि वह दवा उसके बच्चे को ठीक कर सकती है। हो सकता है कि बच्चे को दवा पसंद न आए, लेकिन माँ ऐसा इसलिए करती है क्योंकि वह बच्चे की परवाह करती है। शराबियों को दंडित किया गया ताकि उनके परिवारों को नष्ट होने से बचाया जा सके।"
अन्ना ने महाराष्ट्र सरकार से एक कानून पारित करने की अपील की, जिसके तहत 25 फीसदी महिलाओं की मांग पर गांव में शराबबंदी लागू कर दी जाए। 2009 में राज्य सरकार ने इसे दर्शाने के लिए बॉम्बे प्रोहिबिशन एक्ट 1949 में संशोधन किया।
"राजनीति" से "शराबनीति" पहुंचे अन्ना के चेले
एक दशक पूर्व 2011 में अन्ना के ही आंदोलन से उपजे उनके चेले आज 'हर घर तक' पहुंच बनाने वाली अपनी "शराबनीति" को न सिर्फ जायज ठहरा रहे हैं बल्कि उसके लिए किए गए सैकड़ों करोड़ रुपए के घोटाले को राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से जोड़ रहे हैं।
भ्रष्टाचार के खिलाफ खड़े किए गए एक जनआंदोलन की कोख से पैदा हुई आम आदमी पार्टी के नेता अब कहते हैं- वह चूंकि "कट्टर ईमानदार" हैं इसलिए जब तक उनके ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोप साबित न हो जाएं, तब तक कार्रवाई किया जाना राजनीतिक प्रतिशोध है।
वो इस शब्द को गढ़ने से पहले इतना भी विचार नहीं करते कि 'कट्टरवाद' किसी किस्म का हो, अच्छा नहीं माना जाता। पूरा विश्व आज किसी न किसी किस्म के 'कट्टरवाद' का शिकार है। फिर वह कट्टरवादिता धर्म से जुड़ी हो या समाज से। कट्टरवादिता अपने आप में मिलावटी तथा दिखावटी होने का संदेश देती है। कोई व्यक्ति ईमानदार है तो उसका ईमानदार होना ही काफी है, उसके लिए 'कट्टर' नहीं होना पड़ता। आंशिक भ्रष्ट या कट्टर ईमानदार जैसे शब्द खुद एक धोखा हैं।
मजे की बात यह है कि कल तक स्वयं को 'आम आदमी' मानने वाले सड़क से सत्ता तक पहुंचे ये लोग अब अघोषित रूप से यह बताना चाहते हैं कि वो कानून से ऊपर हैं और इसलिए उनके साथ कानून भी विशिष्ट व्यवहार करे।
यही नहीं, इनकी मानें तो इन्हें लेकर होने वाली हर कार्रवाई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सीधा हाथ होता है। मोदी इनसे इतने डरे हुए हैं कि इन्हें नष्ट करना चाहते हैं। इनके दावे पर यकीन किया जाए तो इनका कद इतना बढ़ चुका है जिससे प्रधानमंत्री परेशान हैं और वो दिन-रात इनका ही स्मरण करते हैं।
आश्चर्य भी होता है और हंसी भी आती है जब ये खेत की बात को खलिहान तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। शराब घोटाले को लेकर सीबीआई ने छापामारी शुरू की तो कहा जाने लगा कि हमारी शिक्षा नीति समूचे विश्व में सराही जा रही है इसलिए ये छापामारी की गई है। देखिए न्यूयॉर्क टाइम्स के फ्रंट पेज पर मनीष सिसोदिया की शिक्षा नीति को जगह मिली है इसलिए मोदी सरकार डर गई है। मनीष सिसोदिया की शिक्षा नीति विश्व में सर्वोत्तम है।
भ्रष्टाचार की बात पर ये दूसरे दलों का भ्रष्टाचार गिनाने लगते हैं। बेशक दूध का धुला कोई नहीं लेकिन जिस तरह नमक से नमक नहीं खाया जा सकता, उसी तरह दूसरे को भ्रष्ट बताकर अपना भ्रष्टाचार उचित नहीं ठहराया जा सकता।
जिस पार्टी को अभी राष्ट्रीय पार्टी तक का दर्जा हासिल नहीं है, उसके कर्ता-धर्ता ढिंढोरा पीट रहे हैं कि 2024 में प्रधानमंत्री पद के लिए अरविंद केजरीवाल सीधे नरेंद्र मोदी मुकाबले में आ खड़े हुए हैं इसलिए मोदी सरकार सीबीआई के छापे पड़वा रही है।
अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और राघव चड्ढा जैसे आम आदमी पार्टी के नेता संभवत: यह मान बैठे हैं कि न्यूयॉर्क टाइम्स में खबरें छपवाकर वह एक ओर जहां विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद की उम्मीवारी हासिल कर लेंगे, वहीं दूसरी ओर केंद्र की सत्ता उतनी ही आसानी से प्राप्त कर पाएंगे जितनी कि पंजाब की प्राप्त कर ली थी।
राजनीति में आए हैं तो सत्ता के ख्वाब देखने में कोई बुराई नहीं है लेकिन सूरज की ओर ऊपर मुंह करके थूकने से सूरज तक नहीं पहुंचा जा सकता। वो थूक खुद के थोबड़े पर ही आकर गिरता है, यह सर्वविदित है। चेहरे पर कालिख लगी हो तो शीशा साफ करने से काम नहीं चलता।
राजनीति में कोई व्यक्ति या कोई दल अजेय नहीं होता। उत्थान और अवसान एक सतत प्रक्रिया है और उससे हर एक को गुजरना होता है, किंतु आम आदमी पार्टी के नेताओं की प्रॉब्लम यह है कि वो कुएं को तालाब नहीं, समुद्र समझ बैठे हैं।
दिल्ली और पंजाब जीतकर वो समझ रहे हैं कि वो देश ही नहीं, दुनिया के ऐसे नायाब हीरे हैं जिनकी चमक ने सबको चौंधिया दिया है। रसोली अपनी आंखों में हैं और दोष दूसरे में ढूंढ रहे हैं।
तमाम बुध्दिजीवी समय-समय पर ये सलाह देते रहे हैं कि यदि किसी को जरूरत से ज्यादा अभिमान हो जाए तो उसे अपनी जड़ों की ओर देख लेना चाहिए। इससे भ्रम दूर होने में मदद मिल सकती है।
बेहतर होगा कि अन्ना के आंदोलन की उपज आम आदमी पार्टी के नेता एकबार फिर अन्ना की शरण में जाकर बैठें और उनसे पूछें कि क्या वो हर किस्म के आरोप-प्रत्यारोपों से परे हैं, क्या वो भ्रष्टाचार प्रूफ हैं, क्या वो कानून से ऊपर हैं। उम्मीद ही नहीं पूरा विश्वास है कि अन्ना उनके इस मुगालते को दूर कर देंगे।
हो सकता है कि अन्ना अपने मंदिर के किसी कोने में ले जाकर इन्हें उनकी खोई हुई वो सूरत और सीरत भी दिखा दें जिसे सामने रखकर इन्होंने अन्ना को धोखा दिया और कभी राजनीति में न आने का वायदा करके राजनीति को ही पेशा बना लिया।
रही बात दिल्ली की तो वो अभी बहुत दूर है। दिल्ली के अधीन होने में और दिल्ली हासिल करने में बहुत फर्क होता है। अलबत्ता 'तिहाड़' बहुत नजदीक नजर आ रही है। इसे जितनी जल्दी समझ लें, उतना अच्छा है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
बुधवार, 20 जुलाई 2022
योगी जी... देखिए तो कि भ्रष्टाचार पर आपकी जीरो टॉलरेंस नीति का मथुरा पुलिस ने कैसा मजाक बनाया है?
हालांकि इसकी भनक लगते ही एक ओर जहां एसएसपी मथुरा अभिषेक यादव ने विभागीय जांच के आदेश देते हुए संबंधित थाना प्रभारी इंस्पेक्टर अजय कौशल और चौकी प्रभारी सतोहा योगेश नागर को निलंबित कर दिया वहीं दूसरी ओर आईजी आगरा जोन नचिकेता झा ने भी जिले में तैनात आईपीएस अधिकारी (एएसपी) संदीप मीणा को जांच सौंपी है, लेकिन यहां सवाल यह पैदा होता है कि किसी इतने गंभीर मामले में क्या केवल विभागीय जांच कराया जाना पर्याप्त है?
पूरे पुलिस विभाग को शर्मिंदा करने और योगी सरकार के आदेश-निर्देशों को बेखौफ होकर ताक पर रखने के इस मामले में प्रथम दृष्ट्या संलिप्त दिखाई दे रहे पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की जानी चाहिए?
बताया जाता है भ्रष्टाचार के इस पूरे नायाब खेल की सूचना लखनऊ में बैठे बड़े अधिकारियों को भी लग चुकी है, और वो आगरा तथा मथुरा के बड़े अधिकारियों की कार्रवाई पर पूरी नजर बनाए हुए हैं।
क्या है पूरा मामला
घटनाक्रम के अनुसार मथुरा जनपद के मलाईदार थानों में शुमार हाईवे थाना पुलिस ने विगत 11 जुलाई को साइबर क्राइम करने वाले गिरोह के 19 सदस्यों को मुखबिर की सूचना पर एकसाथ धर-दबोचा।
पुलिस के लिए सिरदर्द बना हुआ है साइबर क्राइम
यहां यह जान लेना जरूरी है कि सोशल मीडिया के इस दौर में साइबर क्राइम पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है और इसीलिए हर जनपद में पुलिस का एक साइबर सेल काम भी कर रहा है।
ये बात अलग है कि अपराधियों के हमेशा पुलिस से दो कदम आगे चलने तथा पुलिस के पास उनकी तुलना में संसाधनों के अभाव की वजह से पुलिस को साइबर अपराधियों से निपटने में दिक्कतें पेश आती हैं।
यही कारण है कि हर दिन कोई न कोई व्यक्ति कहीं न कहीं साइबर अपराधियों का शिकार होता है।
पैसे लेकर छोड़ दिए सभी 19 अपराधी
पुलिस भी इस बात से भली-भांति परिचित है और उच्च अधिकारी इनकी धर-पकड़ के लिए परेशान भी रहते हैं, बावजूद इसके मथुरा के थाना हाईवे की पुलिस ने साइबर अपराधियों के इस पूरे गिरोह को लाखों रुपए लेकर छोड़ दिया और अपने अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं लगने दी।
विभागीय सूत्र बताते हैं कि हाईवे थाना पुलिस ने गिरोह के सभी 19 सदस्यों को छोड़ने की एवज में दलालों के माध्यम से प्रति सदस्य करीब डेढ़ लाख रुपया वसूला। दलालों को क्या मिला, इसकी जानकारी होना बाकी है।
थाना पुलिस के इस योजनाबद्ध भ्रष्टाचार का अंदाज लगाने के लिए यह जान लेना काफी है कि थाने में कुछ देर रखने के बाद इन सभी 19 अपराधियों को थाना परिसर में पीछे की ओर बने कमरों में रखा गया, जिससे मामला चुपचाप निपटाने में आसानी हो।
छोड़े गए अपराधियों के नाम
रविकांत पुत्र श्रीचंद निवासी गांव नवादा थाना हाईवे, जितेन्द्र पुत्र राजकुमार निवासी अलीगढ़, गिर्राज पुत्र रवीन्द्र निवासी एटा, विनोद पुत्र नवी निवासी असम, सैकुल पुत्र रेशम, साहिल पुत्र अब्दुल, तस्लीम पुत्र नसरू, रॉबिन पुत्र रेशम, हमीद पुत्र आशू, मकसूद पुत्र कमरुद्दीन, साहिल पुत्र आयन, भाकिल पुत्र मोहन्दा, सुहैल पुत्र याकतअली, साबिर पुत्र अनवर, ताहिर पुत्र जाकिर, सकलम पुत्र मोहन्दा, इरशाद पुत्र महमूदा और राशिद।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार जांच अधिकारी आईपीएस संदीप मीणा ने इस मामले में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करते हुए थाने के सीसीटीवी कैमरे की फुटेज हासिल कर ली है और उसमें ये अपराधी आते व जाते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसके अलावा जांच अधिकारी को एक साक्ष्य सतोहा चौकी के रजिस्टर से प्राप्त हुआ है।
दरअसल, चौकी प्रभारी सतोहा ने किसी आंशका के चलते इन सभी 19 आरोपियों का नाम चौकी के रजिस्टर में दर्ज कर लिया था क्योंकि अपराधियों की धरपकड़ में वह भी शामिल थे। संभवत: इसीलिए चौकी प्रभारी सतोहा योगेश नागर अब खुद को पूरी तरह निर्दोष बता रहे हैं और कह रहे हैं कि मैं अधिकारियों के सामने पूरा सच लेकर आऊंगा।
ऐसे में एक सवाल यह और उठता है कि बिना ठोस कार्रवाई हुए और लाखों रुपए हड़प कर एकसाथ 19 साइबर अपराधियों को छोड़ देने जैसे संगीन मामले में एफआईआर दर्ज किए बिना क्या पूरा सच सामने आ पाएगा। या मथुरा के ही डॉ. निर्विकल्प अपहरण काण्ड की तरह ये भी फाइलों में दब कर रह जाएगा।
क्या है डॉ. निर्विकल्प का अपहरण काण्ड
10 दिसंबर 2019 को रात करीब 8 बजे हाईवे थाना क्षेत्र में ही गोवर्धन चौराहे के फ्लाई ओवर पर मथुरा के मशहूर ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. निर्विकल्प का अपहरण कर उनसे वसूली गई 52 लाख रुपयों की फिरौती को इलाका पुलिस हड़प गई और बदमाश छोड़ दिए गए।
जब इस मामले में शोर-शराबा हुआ तो पूरे दो महीने बाद 11 फरवरी 2020 की रात 10 बजकर 53 मिनट पर हाईवे थाना पुलिस ने अपनी ओर से IPC की धारा 364 A के तहत एक एफआईआर दर्ज की।
हाईवे थाने के तत्कालीन प्रभारी इंस्पेक्टर जगदंबा सिंह की ओर से दर्ज कराई गई इस एफआईआर में सनी मलिक पुत्र देवेन्द्र मलिक निवासी न्यू सैनिक विहार कॉलोनी थाना कंकरखेड़ा मेरठ, महेश पुत्र रघुनाथ निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा, अनूप पुत्र जगदीश निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा तथा नीतेश उर्फ रीगल पुत्र नामालूम निवासी भोपाल मध्यप्रदेश (हाल निवासी दिल्ली एनसीआर) को नामजद किया गया।
इस पूरे प्रकरण का एक दिलचस्प पहलू यह भी रहा कि डॉ. निर्विकल्प के अपहरण की अपनी ओर से FIR दर्ज कराने वाले इंस्पेक्टर जगदंबा सिंह को उसी दिन तत्काल प्रभाव से तत्कालीन एसएसपी शलभ माथुर ने निलंबित कर दिया। जिन्हें बाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के आदेश पर बहाल भी कर दिया गया।
नामजद अपराधियों को पुलिस ने पकड़ा भी, लेकिन उन 52 लाख रुपए का कुछ पता नहीं लगा जिन्हें अपराधियों को फिरौती के रूप में देने की पुष्टि खुद डॉ निर्विकल्प कर चुके थे।
बहरहाल, अब देखना यह होगा कि लाखों रुपए लेकर साइबर क्राइम के गिरोह से जुड़े डेढ़ दर्जन अपराधियों को छोड़ने का यह संगीन मामला भी डॉ. निर्विकल्प अपहरण काण्ड की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा या फिर ईमानदार पुलिस अफसरों के रहते किसी ऐसे अंजाम तक पहुंचेगा, जिसके बाद कोई थाना या चौकी प्रभारी इतना बड़ा दुस्साहर न कर सके और योगी सरकार की भ्रष्टाचार के मामले में अपनाई गई जीरो टॉलरेंस की नीति का इस तरह मजाक न उड़ा पाए।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
गुरुवार, 7 जुलाई 2022
अग्निपथ… अग्निपथ… अग्निपथ, कौन कहता है ‘नाम में क्या रखा है’… नाम में ही सब कुछ रखा है
‘अग्नि’ का तो धर्म ही जलना और जलाना होता है। हालांकि वह भी राहत प्रदान करती है, बशर्ते उसका उपयोग समय और परिस्थितियों के अनुकूल हो। अग्नि से खेलने वाले अक्सर अपने हाथ जला बैठते हैं। फिलहाल कुछ अराजक तत्व अग्नि से खेल रहे हैं। वो देश जलाने पर आमादा हैं। राजनीतिज्ञ उन्हें पेट्रोल की तरह यूज कर रहे हैं, और वो यूज हो रहे हैं।
ये बात अलग है कि आज नहीं तो कल, उनकी समझ में जरूर आएगा कि पवित्रता की प्रतीक अग्नि का ‘दुरूपयोग’ किस कदर उनके ‘भविष्य पर भारी’ पड़ गया।
कमियां किसी भी योजना में हो सकती हैं… या कहें कि निकाली जा सकती हैं इसलिए केंद्र सरकार की अग्निपथ योजना अपवाद नहीं हो सकती लेकिन इसके विरोध की आड़ में देश को जला डालने की मंशा सिर्फ और सिर्फ देश द्रोह है, इसके अलावा कुछ नहीं।
आम आदमी के पैसों से जुटाई गई सरकारी संपत्ति को मात्र इसलिए फूंक डालना कि कोई योजना पसंद नहीं आई या उसे समझने व समझाने में कोई चूक हो गई, कहां की समझदारी है।
आमजन की सुविधा के लिए दौड़ रही बसों और ट्रेनों को आग के हवाले कर देने वाले कैसे कभी ‘शूरवीर’ हो सकते हैं। अपनी बुद्धि और विवेक को गिरवी रखकर सड़कों पर अराजकता फैला रहे राजनीतिक साजिश के शिकार इन तत्वों की शर्मनाक हरकतें इन्हें आत्मघाती रास्ते पर ले जा रही हैं।
बेशक…बेशक पिछले कुछ वर्षों से देश को किसी न किसी षड्यंत्र में उलझाने की कोशिशें लगातार जारी हैं। बात चाहे नागरिकता (संशोधन) कानून (सीएए) की हो या फिर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) की, नए कृषि कानूनों की हो अथवा कश्मीर से धारा 370 और अनुच्छेद 35A के प्रावधानों को निरस्त करने की, सबके विरोध का तरीका कमोबेश एक जैसा ही रहा है। मकसद ये कि किसी भी तरह ऐसी अराजक स्थितियां पैदा कर दी जाएं कि लोगों को सोचने-समझने का मौका ही न मिले और वो सबके लिए सरकार को कठघरे में खड़ा कर दें।
जो कुछ आज एक खास तबके द्वारा ‘अग्निपथ योजना’ के लिए कहा जा रहा है कि किसी को भरोसे में नहीं लिया… किसी से पूछा नहीं… युवाओं को समझाया नहीं, ठीक यही बातें उन सभी सरकारी योजनाओं के लिए कही गई थीं जिनका हिंसक विरोध सड़कों पर उतर कर किया गया। उद्देश्य केवल यही रहा कि किसी भी तरह अपने हिंसक प्रदर्शनों और देश की जनता को बंधक बनाने की अपनी शर्मनाक करतूतों को जायज ठहराया जा सके। कभी किसी सड़क को महीनों नहीं, साल-दोसाल के लिए घेरकर तो कभी राष्ट्रीय राजमार्गों तथा अन्य सड़कों पर अराजकता फैलाकर।
एक बार को यह मान भी लिया जाए कि सरकार का हर निर्णय गलत है, और उसे जनहित की समझ नहीं हैं। विशेष रूप से वर्तमान सरकार को तो कतई नहीं है। तो भी क्या विरोध का वो रास्ता सही कहा जा सकता है जिससे करोड़ों की आबादी बेवजह न सिर्फ परेशान होती हो, बल्कि उसकी जान इसलिए सांसत में फंसी रहती हो कि कब किस जगह कुछ असामाजिक तत्व हाथों में डंडे लेकर खड़े मिल जाएंगे।
कब कहीं से पथराव होने लगेगा और कब बसों और ट्रेनों को फूंकने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। सड़कों पर जलते हुए टायर तथा वाहन, दुकानों में तोड़फोड़ और यहां तक कि बूढ़े- बच्चे व बीमार राहगीरों के साथ मारपीट का खौफनाक मंजर दिखाई देने लगेगा।
लोकतंत्र पर खतरे की दुहाई देने और संविधान एवं कानून-व्यवस्था में आस्था का ढोंग करने वाले खास तत्व इन दिनों न्यायालयों के उन निर्णयों पर भी सवाल उठाने से परहेज नहीं करते, जो उनके माफिक न हों।
अग्निपथ हो या कोई अन्य सरकारी योजना, यदि उसमें खामी दिखाई दे रही है तो उसे संवैधानिक तरीकों से चुनौती दी जा सकती है। उस पर कोर्ट के जरिए रोक भी लगवाई जा सकती है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं। फिर इतना हंगामा क्यों?
रही बात अग्निपथ योजना की, तो शूरवीर अपने शौर्य का प्रदर्शन करने के लिए हमेशा मौके की तलाश में रहते हैं। फिर वो मौका किसी रास्ते से मिले। शूरवीर न तो सड़क पर निर्दोष लोगों को परेशान करते हैं और न राष्ट्र की संपदा को आग के हवाले करने जैसे किसी कृत्य को अंजाम देते हैं। सच तो यह है कि वो सैनिक बनने लायक हैं ही नहीं, जो ऐसा कर रहे हैं। सैनिक तो सपने भी राष्ट्ररक्षा के देखता है।
सच्चे सैनिक के लिए कोई पथ ‘अग्निपथ’ नहीं होता। जो होता है वो शौर्यपथ होता है। वो अग्निवीर भी नहीं हो सकता, हां शूरवीर हो सकता है इसलिए सरकार को पुनर्विचार ही करना है तो योजना के नाम पर करे क्योंकि नाम में बहुत कुछ रखा है।
– सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शनिवार, 7 मई 2022
कॉपी-पुस्तक छोड़ गए हैं… सोच रहा हूं क्या होगा, आज सुबह बच्चे बस्तों में पत्थर लेकर निकले हैं
मथुरा (उत्तर प्रदेश) के गांव मलिकपुर में 15 नवम्बर 1953 को जन्मे ग़ज़लकार अशोक रावत ने कभी एक शेर लिखा था-
कॉपी-पुस्तक छोड़ गए हैं, सोच रहा हूं क्या होगा।
आज सुबह बच्चे बस्तों में पत्थर लेकर निकले हैं।।
अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से इंजिनियरिंग करने के बाद सरकारी सेवा में रहे अशोक रावत ने ये शेर कब और किस संदर्भ में लिखा था, इतना तो नहीं मालूम अलबत्ता यह तय है कि पत्थरबाजी को लेकर कुछ लोगों का इतिहास है बहुत पुराना।
धारा 370 हटा लेने के बाद हालांकि कश्मीर में हालात काफी बदले हैं, या कहें कि नियंत्रित हुए हैं परंतु देश के विभिन्न हिस्सों की ताजा हिंसक घटनाएं बताती हैं कि पत्थरबाजों का मिज़ाज नहीं बदला।
आश्चर्य के साथ-साथ ये शोध का भी विषय है कि आखिर इन सभी घटनाओं में समानता क्यों है? यानी कि अपनी उपद्रवी सोच के साथ सुरक्षाबलों को भी टारगेट करना।
सुरक्षाबलों से पत्थरबाजों के बैर का ताल्लुक कहीं सांप्रदायिक तो नहीं, अन्यथा कौन नहीं जानता कि सुरक्षाबल तो सबकी हिफ़ाज़त के लिए हैं।
यदि ऐसा है तो यह प्रवृत्ति न सिर्फ बेहद खतरनाक है बल्कि इस बात का संकेत भी है कि सुरक्षाबलों पर ये तत्व भरोसा नहीं करते।
बेशक आज सुरक्षाबल एक बड़े राजनीतिक टूल की तरह इस्तेमाल किए जाने लगे हैं किंतु फिर भी यह नहीं कहा जा सकता कि सांप्रदायिकता से उनका कोई ताल्लुक है।
फिर कौन है जो सांप्रदायिक सोच के साथ उपद्रवियों को सुरक्षाबलों के खिलाफ खड़ा कर रहा है और यह बताना चाहता है कि जो भी उनके सामने आएगा, वह उनके निशाने पर होगा। फिर चाहे वह कानून-व्यवस्था के रखवाले ही क्यों न हों।
गौर करेंगे तो पता चलेगा कि सुरक्षाबलों पर हमलावर होने का मुद्दा, सांप्रदायिकता की आड़ में बड़ी चालाकी से छिपाया जा रहा है जबकि पिछले दिनों हुईं सभी हिंसक घटनाओं का शिकार लोगों से कहीं अधिक सुरक्षाबल हुए हैं। विशेष रूप से राज्य पुलिस, क्योंकि वही सबसे पहले सामने आकर खड़ी होती है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि किन्हीं तत्वों द्वारा देश में पत्थरबाजी की भी ट्रेनिंग उसी प्रकार दी जा रही हो जिस प्रकार सीमा पार आतंकवाद की ट्रेनिंग बाकायदा कैंप लगाकर दी जाती है।
यदि ऐसा नहीं है तो कश्मीर से लेकर करौली तथा खरगोन, और जहांगीरपुरी से लेकर जोधपुर तक की घटनाओं में इतनी समानता कैसे है।
हो सकता है कि वोट की राजनीति तथा तुष्टिकरण की नीति के चलते फिलहाल यह सवाल पीछे छूट जाए किंतु तय जानिए कि इस एक सवाल का जवाब ही देश की शांति का मार्ग प्रशस्त करने वाला साबित होगा, वर्ना ये सिलसिला यहीं रुकने वाला नहीं।
सब जानते हैं कि कश्मीर में पत्थरबाजी बाकायदा एक कारोबार का रूप ले चुकी थी। उसके लिए कौन फंडिंग करता था और कहां से फंड आता था, ये भी अब किसी से छिपा नहीं।
देश के विभिन्न हिस्सों में हुईं ताजा हिंसक घटनाओं में एक और बात समान रूप से सामने आई है कि उपद्रवियों के साथ बाहरी तत्व शामिल थे। ये वो लोग थे जिन्हें क्षेत्रीय लोग न तो जानते थे और न पहले कभी इलाके में देखा गया था। ऐसे में यह समझना बहुत मुश्किल नहीं कि जो कुछ हुआ, वह किसी बड़ी साजिश का हिस्सा था।
ये साजिश कहां से और किसके द्वारा रची जा रही है, जिस दिन इसका खुलासा हो जाएगा उस दिन सारी पर्तें उघड़ती चली जाएंगी अन्यथा अभी तो शुरूआत है। आगे-आगे देखिए… होता है क्या।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
सोमवार, 14 मार्च 2022
मथुरा के एक सरकारी विभाग में “भ्रष्टाचार” का ठेका, पढ़कर झटका लग सकता है लेकिन हकीकत यही है
अब आप खबर के ऊपर लगी तस्वीरों को देखिए। ये तस्वीरें हैं मथुरा (यूपी) के कलक्ट्रेट स्थित रजिस्ट्री कार्यालय की, जहां कार्यालय के अलग-अलग पटल पर बैठे हैं ये चेहरे। इन चेहरों में से कोई ऐसा नहीं है जो सरकारी मुलाजिम हो किंतु रजिस्ट्री कार्यालय का काम इनके बिना करा पाना संभव नहीं है।
मथुरा जनपद में कुल पांच रजिस्ट्री कार्यालय हैं जिनमें से मुख्य है सदर तहसील का कलक्ट्रेट स्थित कार्यालय, जहां दो सब रजिस्ट्रार हैं। यहां सब रजिस्ट्रार प्रथम के पद पर एके त्रिपाठी और सब रजिस्ट्रार द्वितीय के पद पर विजय कुमार पांडे फिलहाल नियुक्त हैं।
इनके अतिरिक्त मांट, छाता और महावन तहसीलों के रजिस्ट्री कार्यालयों में एक-एक सब रजिस्ट्रार की तैनाती रहती है।
सदर तहसील के सब रजिस्ट्रार प्रथम एके त्रिपाठी के स्टाफ में नवल, देव, आरिफ, अतुल, राजू, रवि, शंकर और रजा कार्यरत हैं जबकि सब रजिस्ट्रार द्वितीय के अधीन हैं हेमवीर, केके, नेत्रपाल, यामीन, राहुल तथा विजय।
घोर आश्चर्य की बात यह है कि एक दर्जन से अधिक इन नामों में से कोई ऐसा नहीं है जो सरकारी मुलाजिम हो, या जिसे उत्तर प्रदेश सरकार ने स्थायी अथवा अस्थायी तौर पर नियुक्ति दी हो लेकिन ये रजिस्ट्री कार्यालय में इस शान के साथ कुर्सी पर काबिज मिलेंगे जैसे सरकारी दामाद हों।
कार्यालय के अलग-अलग पटल पर बैठे ये अवैध मुलाजिम एक ओर जहां बड़ी बेशर्मी के साथ हर जायज काम के लिए भी खुलेआम रिश्वत मांगते हैं वहीं तमाम नाजायज काम करके सरकार को प्रति माह करोड़ों रुपए के राजस्व की हानि पहुंचाते हैं।
रिश्वत मांगने या कहें कि पैसा झपटने में ये अवैध कर्मचारी इतने माहिर हैं कि काम कैसा भी और किसी का भी हो, इनको भेंट दिए बिना न तो कोई काम करा सकता है और न इनकी नजरों से बच के आ सकता है।
सामान्य तौर पर किसी तृतीय या चतुर्थ श्रेणी के सरकारी कर्मचारी को जितना वेतन महीने में एकबार मिलता है, उतना तो रजिस्ट्री कार्यालय का एक-एक अवैध कर्मचारी हर रोज अपनी जेबों में भरकर ले जाता है।
जाहिर है कि भ्रष्टाचार से होने वाली ये वो कमाई है जो ऊपर तक हिस्सा पहुंचाने के बाद बचती है और जिस पर सिर्फ और सिर्फ अवैध कर्मचारी का हक होता है। ऐसे में इनके अधिकारियों की अकूत कमाई का अंदाज लगाना कोई मुश्किल काम नहीं।
योगीराज भगवान श्रीकृष्ण की पावन जन्मस्थली का मुख्य रजिस्ट्री कार्यालय तो एक उदाहरण है अन्यथा बात करें जनपद की बाकी तीन तहसीलों के रजिस्ट्री कार्यालयों की या फिर प्रदेश भर के रजिस्ट्री कार्यालयों की, तो सब जगह कमोबेश स्थितियां यही मिलेंगी। यानी हर जगह भ्रष्टाचार के ठेके बेखौफ और बेझिझक चलते मिलेंगे, वो भी उस योगीराज में जिसने भ्रष्टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति अख्तियार की हुई है और जिसे सख्ती से लागू करने की बात कहकर 2022 में भी वापसी की है।
मथुरा या प्रदेश के किसी भी रजिस्ट्री कार्यालय में अवैध कमाई के कितने रास्ते होते हैं और किसकी कितनी कीमत तय है, इसका विस्तृत विवरण अगली बार…
कौन उठाता है भ्रष्टाचार का ये ठेका, और कौन करता है अवैध नियुक्तियां
रजिस्ट्री कार्यालय के ही सूत्र बताते हैं कि यहां अवैध तौर पर कार्यरत कर्मचारियों की जानकारी यूं तो सभी उच्च अधिकारियों को है किंतु इनकी नियुक्तियों में प्रमुख भूमिका सहायक स्टांप आयुक्त की होती है जो विकास प्राधिकरण में बैठते हैं।
जाहिर है कि सब रजिस्ट्रारों की सहमति के बिना या उनकी जानकारी के बगैर ये नियुक्तियां संभव नहीं हैं लिहाजा वो दूध के धुले नहीं हो सकते।
सूत्र बताते हैं कि किसी भी उच्च प्रशासनिक अधिकारी का कभी रजिस्ट्री कार्यालय में आकस्मिक निरीक्षण के लिए न आना और न अवैध नियुक्तियों को लेकर कभी किसी जिम्मेदार अधिकारी से कोई जवाब तलब करना, यह समझने के लिए काफी है कि स्थितियां किस हद तक बिगड़ी हुई हैं।
इसे यूं भी समझा जा सकता है सर्वाधिक कमाई वाले सरकारी विभागों में शुमार रजिस्ट्री कार्यालय के अवैध कर्मचारी ही अधिकारियों की वो दुधारू गाय हैं जो हर रोज उनके साथ-साथ विकास प्राधिकरण को भी मोटी कमाई करने तथा कमाई के नए-नए ‘ठिकाने’ तलाश कर देते हैं।
किसी भी जिले में कलक्ट्रेट वो जगह होती है जहां पुलिस व प्रशासन के आला अफसर बैठते हैं। यहीं से आमजन को न्याय मिलता है, किंतु जब पूरे कुएं में भी भांग घुली हो तो किससे शिकायत और कैसी शिकायत।
कहते हैं मथुरा तीन लोक से न्यारी है। शायद इसीलिए कभी एक ‘रामवृक्ष यादव’ नाम का दुबला-पतला शख्स अपने गुर्गों के साथ यहां आया था और सरकारी जवाहर बाग की सैंकड़ों एकड़ बेशकीमती जमीन पर वर्षों काबिज रहा।
इसी कलक्ट्रेट पर ऐसे ही बड़े-बड़े अधिकारियों की नाक के नीचे उसने जवाहर बाग में नंगा नाच किया, और जब उच्च न्यायालय की सख्ती के बाद अधिकारी उसे अवैध कब्जे से बेदखल करने पर मजबूर हुए तो दो पुलिस अफसरों को जान गंवानी पड़ी।
आज बेशक कोई सरकारी जमीन किसी के अवैध कब्जे में न सही किंतु वैध को अवैध तथा अवैध को वैध बताकर लोगों को खुलेआम लूटने और सरकारी खजाने को चूना लगाने का खेल बदस्तूर जारी है।
साथ ही जारी है एक ऐसे प्रदेश में अवैध नियुक्तियों के जरिए भ्रष्टाचार को ठेके पर उठाने का कारनामा, जहां नौकरी के लिए लाखों युवा दर-दर की ठोकरें खाते देखे जा सकते हैं।
यह सब इसलिए हो पा रहा है क्योंकि शिकवा-शिकायत के बावजूद भ्रष्टाचार के इन ठेकेदारों का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता। बिगड़ना तो दूर, कोई यह तक पूछने वाला नहीं कि भ्रष्टाचार को ठेके पर देने की कारस्तानी किसकी शह पर तथा किसकी कलम से हो रही है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
सोमवार, 24 जनवरी 2022
यमुना मैया कहे पुकार, हर प्रत्याशी धोखेबाज़
पतित पावनी यमुना, जीवन दायिनी यमुना, कलकल करती यमुना और अब दिन-प्रतिदिन कलुषित होती यमुना। कालिंदी और कृष्ण ही हैं समूचे विश्व में मथुरा की पहचान। कभी कालिया रूपी नाग के कलुष से कालिंदी को मुक्त कराने वाले कृष्ण भी आज कलियुग के कालियाओं से जैसे हार मान बैठे हैं। बावजूद इसके यमुना का धार्मिक महत्व कम होता दिखाई नहीं देता। तभी तो लोकतंत्र के हर पर्व पर विभिन्न राजनीतिक दल व उनके प्रत्याशी यमुना के धार्मिक महत्व और उससे जुड़ी जनभावनाओं को भुनाने में पीछे नहीं रहते।
जन्म-जन्मातरों के पापों से मुक्ति दिलाने वाली करोड़ों जनमानस की आराध्य यमुना अब चुनावी नैया पार कराने का जरिया बन चुकी है। ये बात अलग है कि चुनावी मौसम में अंजुलि भरकर यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का संकल्प लेने वाले नेता चुनाव बीत जाने के बाद उसकी ओर पलटकर देखना तक गवारा नहीं करते।
एकबार फिर लोकतंत्र का पर्व विधानसभा चुनावों के रूप में सामने है। एकबार फिर यमुना पूजन करके पर्चा दाखिल करने वाले विभिन्न राजनीतिक दलों के उम्मीदवार चुनावी वैतरिणी पार करने को सक्रिय हैं, किंतु इस बार एक फर्क है। फर्क यह है कि अब किसी भी दल के प्रत्यााशी पर आम जनता का भरोसा नहीं रहा। पिछले विधानसभा चुनावों तक जो थोड़ा-बहुत भरोसा कायम था, वह भी अब पूरी तरह उठ चुका है। हालांकि पिछली बार किसी प्रत्यााशी को यमुना पूजन कराने के लिए कोई पुरोहित खड़ा नहीं हुआ। हुआ तो इतना कि जिस दिन विधायक प्रदीप माथुर यमुना पूजन करने जा रहे थे, उस दिन उनके खिलाफ यमुना किनारे पोस्टकर चस्पा किए गए, बाद में पुलिस द्वारा वो पोस्टर बलपूर्वक हटवा दिए गए।
प्रदीप माथुर के खिलाफ पोस्टर चस्पा किए जाने की वजह शायद यह रही कि यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने में लगे लोगों को सर्वाधिक उम्मीद उन्हीं से थी, लेकिन कई बार विधायक बनने के बाद भी उन्होंने यमुना के लिए कुछ नहीं किया।
करीब आठ साल पहले की बात है, जब केंद्र में प्रदीप माथुर की पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार काबिज हुआ करती थी। तब यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने के लिए बाबा जयकृष्ण दास ने हजारों लोगों के साथ मथुरा से दिल्ली कूच किया था। बाबा जयकृष्ण दास के नेतृत्व में यमुना भक्तों की इस फौज को आगे बढ़ते देख एकबार तो केंद्र सरकार के भी हाथ-पैर फूल गए थे लेकिन फिर उसने इस फौज को पीछे धकेलने के लिए अपनी बिसात बिछानी शुरू की, और उसके लिए मोहरा बनाया गया उस समय के कांग्रेसी विधायक प्रदीप माथुर को।
प्रदीप माथुर ने बाबा जयकृष्ण दास के सामने तत्कालीन केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत से वार्तालाप कर यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का कथित ठोस प्रस्ताव पेश किया, जिसे बाबा ने सहर्ष स्वीकार कर लिया। बाबा जयकृष्ण दास को जाल में फंसता देखते ही प्रदीप माथुर और केंद्र सरकार के दूसरे नुमाइंदों ने बाबा को इस बात पर राजी कर लिया कि वह अपने साथ चल रहे लोगों को आश्वस्त कर लौटने को कहेंगे। हुआ भी यही, लिहाजा फरीदाबाद पहुंचते-पहुंचते यमुना भक्तों का कारवां बिखर चुका था। केंद्र सरकार और उनके कांग्रेसी नुमाइंदों की चाल कामयाब हो चुकी थी, जबकि बाबा जयकृष्णद दास किसी भी चाल से पूरी तरह अनभिज्ञ थे।
दिखावे के लिए बाबा सहित कुछ चुनिंदा लोगों की केंद्रीय जल संसाधन मंत्री हरीश रावत से मीटिंग कराई गई और इस मीटिंग में यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का पूरा खाका भी खड़ा किया गया।
दरअसल, यह खाका ही यमुना एवं यमुना के लिए आंदोलनरत लोगों के खिलाफ एक ऐसा षड्यंत्र था जिसके कारण यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का पूरा आंदोलन न सिर्फ ठप्प पड़ गया बल्कि वह पहले दोफाड़ हुआ और फिर कई फाड़ होकर लक्ष्य से ही भटक गया।
उधर, वर्ष 2009 के लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के सहयोग से राष्ट्रीय लोकदल के युवराज जयंत चौधरी अपना पहला चुनाव मथुरा से लड़ने उतरे। जयंत चौधरी ने विश्राम घाट पर हजारों लोगों की मौजूदगी में यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का संकल्प लिया, वह लाखों मत के अंतर से चुनाव जीते भी, परंतु यमुना के लिए कुछ नहीं कर पाए। चुनावों के दौरान मथुरा की जनता से यहीं घर बसाकर रहने का वायदा करने वाले जयंत चौधरी ने चुनाव जीतने के बाद न जनता की सुध ली और न यमुना की। उनके अपने लोग भी उनसे एक मुलाकात को पूरे पांच साल तरसते रहे। भाजपा के सहयोग से चुनाव जीतने वाले जयंत चौधरी के पिता व उनकी पार्टी रालोद के मुखिया चौधरी अजीत सिंह ने इस बीच कांग्रेस से पैक्ट करके अपने लिए जरूर केंद्र में मलाईदार मंत्रीपद हासिल कर लिया और सत्तासुख भोगते रहे।
यही कारण रहा कि 2014 और फिर 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा की प्रत्याशी तथा बॉलीवुड में स्वप्न सुंदरी का खिताब प्राप्त अभिनेत्री हेमा मालिनी भारी मतों से विजयी रहीं।
मथुरा की जनता ने नरेन्द्र मोदी के चेहरे पर अभिनेत्री हेमा मालिनी को दो मर्तबा बड़ी जीत दिलाई, बावजूद इसके हेमा मालिनी भी दूसरे नेताओं की तरह यमुना के साथ छलावा करने से नहीं चूकीं।
2014 में हेमा मालिनी को जिताने की अपील करने मथुरा आए खुद नरेन्द्र मोदी ने चुनावी रैली में यमुना प्रदूषण का मुद्दा उठाया और ब्रजवासियों को भरोसा दिया कि यदि सत्ता उनके पास आती है तो वह प्राथमिकता के आधार पर यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का काम करेंगे। उनकी अपील पर हेमा मथुरा से दो बार सांसद चुनी गईं और खुद मोदी भी तब से लगातार प्रधानमंत्री के पद पर काबिज हैं लेकिन यमुना के साथ छल किए जाने का सिलसिला अब भी नहीं टूटा।
मथुरा की सांसद हेमा मालिनी, पांच में से चार विधायक भाजपा के, इनमें से दो विधायक मंत्री, मथुरा नगर निगम के मेयर मुकेश आर्यबंधु भाजपा से और जिला पंचायत भी भाजपा का कब्जा, परंतु केंद्र एवं प्रदेश में सत्ताधारी दल के नेताओं की इतनी बड़ी फौज भी नाले-नालियों का गंदा पानी आज तक सीधा यमुना के अंदर गिरने से नहीं रोक सकी।
अब इन चुनावों में मथुरा-वृंदावन विधानसभा सीट पर फिर से भाजपा ने ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा को चुनाव मैदान में उतारा है जबकि उनके सामने हैं कांग्रेस के रटे-रटाए चेहरे प्रदीप माथुर, भाजपा से बगावत करके उतरे बहुजन समाज पार्टी के प्रत्याशी एसके शर्मा।
पिछले पूरे कार्यकाल में कबीना मंत्री श्रीकांत शर्मा यूं तो एक रस्म अदायगी की तरह यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने की बात कहीं-कहीं करते सुनाई पड़ते रहे लेकिन उनकी बात में किसी स्तर पर दम नजर नहीं आया
रहा सवाल बसपा के प्रत्याशी एसके शर्मा का, तो वह जरूर यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने का वायदा कर रहे हैं किंतु कौन नहीं जानता कि वर्तमान परिस्थितियों में बसपा प्रत्याशी की हैसियत से उनका वादा किसी मजाक से कम नहीं है। वैसे उनकी पार्टी ने पहले भी कभी यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने के किसी प्रयास में कोई रुचि नहीं दिखाई।
शहरी सीट के इतर अन्य चार सीटों गोवर्धन, मांट, छाता तथा बल्देव में अपना भाग्य आजमा रहे प्रत्याशी तो यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने के वायदे से भी खुद को पूरी तरह अलग रखते हैं। उनको लगता है कि यमुना के बारे में बात करना सिर्फ और सिर्फ मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के विधायक की जिम्मेदारी है अन्यथा मांट क्षेत्र से 8 बार विधायक रहे श्याम सुंदर शर्मा का चुनावी क्षेत्र मांट भी यमुना किनारे बसा हुआ है छाता क्षेत्र की विधायकी से कबीना मंत्री तक की कुर्सी हासिल करने वाले चौधरी लक्ष्मीानाराण का चुनाव क्षेत्र भी यमुना की खादरों का हिस्सा है।
बल्देव (सुरक्षित) से पिछली बार भाजपा की टिकट पर लड़कर चुनाव जीतने वाले पूरन प्रकाश इस बार भी भाजपा के उम्मीमदवार हैं। बल्देव क्षेत्र भी यमुना से अछूता नहीं है और इसके मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा यमुना किनारे बसता है किंतु पूरन प्रकाश ने यमुना को प्रदूषण मुक्त कराने की दिशा में कभी कोई प्रयास नहीं किया।
ऐसे में गोवर्धन सीट पर चुनाव लड़ने जा रहे प्रत्याशियों से कोई उम्मीद कैसे की जा सकती है क्योंकि उनके अपने चुनाव क्षेत्र का यमुना से कोई सीधा संबंध नहीं है। उनके लिए यमुना प्रदूषण मुक्ति के काम से पल्ला झाड़ना बहुत आसान है।
सच तो यह है कि नेता चाहे कोई पुराना हो अथवा नया, वो जानता है कि यमुना के नाम पर जनभावनाओं का दोहन करना तथा उसकी आड़ लेकर जितने संभव हों उतने वोट बटोरना काफी आसान है इसलिए वह यमुना की बात करता है। वह खूब समझता है कि चुनाव बीत जाने के बाद यमुना प्रदूषण का मुद्दा अगले चुनाव तक के लिए ठंडे बस्ते में चला जाना है। रह-रह कर इसके लिए कोई आवाज़ यदि उठती भी है तो उसे उसी प्रकार अनसुना किया जा सकता है जिस प्रकार अब तक किया जाता रहा है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
बुधवार, 12 जनवरी 2022
गठबंधन के बावजूद अखिलेश को जयंत पर भरोसा नहीं, चुनाव बाद पाला बदलने की आशंका
पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जिन सीटों पर पहले चरण में ही मतदान होना है उनके लिए पर्चा दाखिल करने की शुरूआती तारीख लगभग सिर पर है, किंतु कई मुलाकातों के बाद भी अब तक राष्ट्रीय लोकदल और समाजवादी पार्टी के बीच टिकटों का बंटवारा नहीं हो सका है।
गठबंधन का ऐलान किए काफी समय हो जाने के बावजूद टिकटों के बंटवारे में जो सबसे बड़ी बाधा आ रही है, वह है सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव का आरएलडी सुप्रीमो जयंत चौधरी पर वो भरोसा न कर पाना जिसकी सर्वाधिक दरकार है।
दरअसल, अखिलेश यादव जयंत चौधरी पर आंख बंद करके इसलिए भरोसा नहीं करना चाहते क्योंकि आरएलडी का इतिहास उन्हें इसकी इजाजत नहीं देता।
अखिलेश यादव ही नहीं, सब जानते हैं कि सत्ता में साझेदारी की खातिर आरएलडी ने हमेशा अपने सहयोगियों को धोखा दिया है। जब-जब सत्ता और विपक्ष में से किसी एक को चुनने की नौबत आरएलडी के सामने आई है, तब-तब उसने सत्ता का चुनाव किया है।
हालांकि यह पहली बार है जब जयंत चौधरी आरएलडी के सर्वेसर्वा की हैसियत से चुनाव मैदान में हैं लिहाजा उनके पास अपने बड़ों की गलती से सीख लेने का अवसर भी है परंतु यह सवाल अभी भविष्य के गर्भ में है कि वह इस पर खुद को कितना खरा साबित कर पाते हैं।
संभवत: यही कारण है कि अखिलेश अपना हर कदम फूंक-फूंक कर रख रहे हैं। फिर बात चाहे चौधरी चरण सिंह के पोते और चौधरी अजीत सिंह के पुत्र चौधरी जयंत की हो या फिर अपने सगे चाचा शिवपाल यादव अथवा सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के मुखिया ओमप्रकाश राजभर की।
अखिलेश यादव ने तमाम लानत-मलामत को दरकिनार कर जिस तरह समाजवादी पार्टी की कमान पूरी तरह अपने हाथ में ली और चाचा शिवपाल को भी नाकों चने चबवाकर अपने सामने समर्पण करने को बाध्य कर दिया, उससे साफ जाहिर है कि राजनीति उनके लिए अब एक मंझे हुए खिलाड़ी का खेल बन चुकी है जबकि जयंत को अभी साबित करना है कि वह अपनी राजनीतिक विरासत को संभाल भी पाते हैं या नहीं।
बहरहाल, इन्हीं स्थिति-परिस्थितियों के मद्देनजर एक ओर जहां जयंत चौधरी चाहते हैं कि वह अखिलेश यादव से जितना अधिक संभव हो सीटें झटक लें वहीं अखिलेश यादव उन्हें ऐसा कोई मौका नहीं देना चाहते जिससे वो चुनाव बाद फ्रंट फुट पर खेलने की स्थिति में हों।
बताया जाता है कि अखिलेश और जयंत के बीच सीटों के बंटवारे से अधिक जिस मुद्दे को लेकर कशमकश चल रही है, वह है गठबंधन के प्रत्याशियों को किन-किन सीटों पर किस ‘सिंबल’ से चुनाव लड़ाया जाए।
अखिलेश यादव अपने दोनों हाथों में लड्डू रखकर चलना चाहते हैं जिससे चुनाव बाद पछताने की नौबत न आए। वह चाहते हैं कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आरएलडी के प्रभाव वाली अधिकांश सीटों पर समाजवादियों को आरएलडी के सिंबल पर चुनाव मैदान में उतारें और जहां सपा व आरएलडी का मिला-जुला प्रभाव है वहां वह अपने सिंबल का इस्तेमाल कर चुनाव लड़ें। इस तरह उनके साथ आगे चलकर धोखा खाने की संभावना काफी क्षीण हो जाएगी।
उधर जयंत चौधरी चाहते हैं कि आरएलडी के हिस्से में न सिर्फ ज्यादा सीटें आएं बल्कि अपने और समाजवादी पार्टी के मिले-जुले प्रभाव वाली अधिकांश सीटों पर वह आरएलडी के सिंबल का इस्तेमाल करें।
राजनीतिक नजरिए से देखें तो दोनों अपनी-अपनी जगह सही हैं किंतु मौके की नजाकत दोनों को मजबूर कर रही है।
जयंत चौधरी को लगता है कि कृषि कानूनों के खिलाफ खड़े किए गए कथित किसान आंदोलन से भाजपा के प्रति उपजी किसानों की नाराजगी का उनकी पार्टी इन चुनावों में अच्छा लाभ ले सकती है लेकिन अखिलेश यादव का मानना है कि भाजपा के मुख्य मुकाबले में वही हैं इसलिए चुनावी समर का पूरा ताना-बाना समाजवादी पार्टी के इर्द-गिर्द ही बुना जाना चाहिए।
इसके अलावा अखिलेश किसी भी सहयोगी दल के लिए ऐसा कोई मौका नहीं देना चाहते जिसका प्रयोग कर वह अखिलेश के ‘किंग’ बनने की राह का रोड़ा बन जाए और खुद ‘किंग मेकर’ की भूमिका में आ खड़ा हो।
ऐसे में बस देखना बाकी है तो इतना कि गांठों के इस बंधन (गठबंधन) को लेकर खेले जा रहे खेल का बड़ा खिलाड़ी अंतत: कौन साबित होता है और कमान से छूटे कितने तीर चुनाव बाद उसके अपने तरकश की शोभा बढ़ाते हैं।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी



