सोमवार, 8 दिसंबर 2014

पत्रकार उपमन्‍यु के खिलाफ बलात्‍कार का केस दर्ज

मथुरा। 
उत्‍तर प्रदेश जर्नलिस्‍ट एसोसिएशन के प्रदेश उपाध्‍यक्ष, ब्रज प्रेस क्‍लब के अध्‍यक्ष तथा छावनी परिषद् मथुरा के पूर्व उपाध्‍यक्ष पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु पर एमबीए पास एक लड़की ने अपने साथ दुराचार तथा यौन उत्‍पीड़न सहित अपने परिचितों को जान से मारने की धमकी देने जैसे संगीन आरोप लगाये हैं।
पीड़ता का आरोप है कि कमलकांत उपमन्‍यु वर्ष 2013 में उसके घर के पास ही जब अपना एक दूसरा घर बनवा रहा था तब उसने उसके परिवार से संबंध बना लिये। इसके बाद वह उनके साथ जयपुर घूमने चला गया और वहीं उसने सर्वप्रथम अप्राकृतिक यौन संबंध स्‍थापित किये तथा मुंह खोलने पर पूरे परिवार को बर्बाद करने की धमकी दी।



पीड़िता के अनुसार इसके बाद उसके साथ तब से लेकर अब तक कमलकांत उपमन्‍यु खुद तो जबरन दुराचार करता ही रहा, इसके अतिरिक्‍त अन्‍य लोगों से भी संबंध बनवाने की कोशिश करने लगा। 
कमलकांत उपमन्‍यु के हनुमान नगर स्‍थित घर के निकट ही रहने वाली इस लड़की के अनुसार अपने साथ काफी समय तक हुए इस अत्‍याचार की तहरीर उसने 3 दिसंबर की दोपहर को ही एसएसपी ऑफिस पहुंचकर दे दी थी। तहरीर देने के बाद एसएसपी मंजिल सैनी ने उन्‍हें शाम को मिलने के लिए कहा और जब वह शाम को पहुंची तो उसकी तहरीर पर जांच के आदेश कर दिए।
लड़की और उसके परिजनों का कहना है कि जांच के नाम पर पुलिस ने कमलकांत उपमन्‍यु को मेरे ऊपर हर तरह से दबाव बनाने, मुझे डराने व धमकाने तथा तहरीर वापस लेने के लिए बाध्‍य करने का पूरा अवसर दिया किंतु जब मैंने पुलिस की इस हरकत से राष्‍ट्रीय महिला आयोग को अवगत कराया तथा उन्‍हें एसएसपी मंजिल सैनी तथा पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु की निकटता के साक्ष्‍य उपलब्‍ध कराते हुए शिकायती पत्र भेजा और न्‍याय न मिलने की स्‍थिति में संसद पर आत्‍मदाह कर लेने का एसएमएस प्रसारित किया तब 6 दिसंबर की शाम बमुश्‍किल कमलकांत उपमन्‍यु के खिलाफ थाना हाईवे में आईपीसी की धारा 376 व 506 मुकद्दमा अपराध संख्‍या 944/ 2014 के तहत एफआई आर दर्ज की गई।
पीड़ित लड़की के अधिवक्‍ता प्रदीप राजपूत ने इस संबंध में बताया कि खुद एक महिला होने के बावजूद एसएसपी मंजिल सैनी द्वारा कमलकांत उपमन्‍यु को लगातार बचाने के प्रयासों की वजह उनके कमलकांत से निकट संबंध होना बताया जाता है।
उन्‍होंने बताया कि बहुजन समाज पार्टी की ओर से लोकसभा का चुनाव लड़ चुके कमलकांत उपमन्‍यु ने सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक की अपनी प्रोफाइल वॉल पर जो सैंकड़ों फोटो लगा रखे हैं, उनमें एसएसपी मंजिल सैनी को भी उसके साथ खड़े हुए तथा उसके निजी पारिवारिक कार्यक्रम में शिरकत करते हुए देखा जा सकता है।
अधिवक्‍ता प्रदीप राजपूत ने बताया कि पीड़ता ने कमलकांत उपमन्‍यु व एसएसपी की निकटता साबित करने वाले वह फोटो मीडिया को भी प्रकाशित करने के उद्देश्‍य से भेजे हैं ताकि आमजनता को पता लग सके कि क्‍यों एक महिला एसएसपी एक युवती के साथ दुराचार के आरोपी का खुलेआम पक्ष लेकर उसे बचा रही हैं।
अधिवक्‍ता प्रदीप राजपूत का कहना है कि कमलकांत उपमन्‍यु के खिलाफ मुकद्दमा दर्ज भले ही कर लिया गया है किंतु पुलिस अब तक उसके घर दबिश देने भी नहीं पहुंची जिस कारण वह खुलेआम अपने हनुमान नगर स्‍थित घर पर न केवल पंचायत कर रहा है बल्‍कि लड़की व उसके परिजनों को बदनाम करने में लगा है।
उन्‍होंने बताया कि कल भी पूरे दिन लड़की के घर पर कमलकांत उपमन्‍यु की ओर से कई नेता और पत्रकार समझौते के लिए दबाव डालने पहुंचे थे और जब लड़की के परिवार ने समझौता करने से स्‍पष्‍ट इंकार कर दिया तो ऊंच-नीच समझाने की आड़ में धमकी देकर चले आए।
एडवोकेट प्रदीप राजपूत ने यह भी बताया कि वह आज इस बारे में एसएसपी से मिलकर उन्‍हें अवगत करायेंगे, साथ ही जल्‍द से जल्‍द पीड़ित लड़की के सीआरपीसी की धारा 164 के तहत बयान दर्ज कराने, उसका मेडिकल करवाने तथा आरोपी को शीघ्र गिरफ्तार करने की मांग करेंगे।
इस संबंध में आरोपी पत्रकार कमलकांत उपमन्‍यु से उनका पक्ष जानने की कोशिश की गई पर उनसे संपर्क स्‍थापित नहीं हो सका।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष

शनिवार, 6 दिसंबर 2014

अब कोर्ट सामने लायेगा JSR के पूरे खेल का सच!

मथुरा। 
जेएसआर ग्रुप की कॉलोनियों अशोका सिटी और अशोका हाइट्स में एक अदद फ्लैट का सपना देखने वाले तथा इनमें निवेश करके दस-बीस लाख रुपए कमा लेने की उम्‍मीद पाले बैठे लोगों के लिए खतरे की घंटी बज चुकी है। ग्रुप के साइलेंट हिस्‍सेदार संजय देशवानी के साथ हुई घटना का नतीजा भले ही अभी पुलिस की जांच का मोहताज हो किंतु इसमें कोई दो राय नहीं कि अशोका सिटी तथा अशोका हाइट्स का निर्माण भ्रष्‍टाचार में आकंठ डूबी व्‍यवस्‍था के तहत हुआ और इसका नतीजा अच्‍छा नहीं निकलने वाला।
जेएसआर ग्रुप के प्रोजेक्‍ट की पैमाइश का आदेश तो कमिश्‍नर आगरा मण्‍डल ने डीएम मथुरा को दे ही दिया है लेकिन अभी बहुत कुछ होना बाकी है।
इस बहुत-कुछ में अशोका सिटी एवं अशोका हाइट्स के निर्माण को लेकर बरती गई अनियमितताएं तो शामिल हैं ही, साथ ही आटे में नमक की जगह नमक में आटा मिलाकर बड़ा खेल करने का भी खुलासा होगा।
नि:संदेह इस पूरे खेल का पर्दाफाश होने पर न सिर्फ जेएसआर ग्रुप के हिस्‍सेदारों की बदनीयती सामने आयेगी बल्‍कि मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के अधिकारी एवं कर्मचारियों का ऐसा काला चिठ्ठा भी सार्वजनिक होगा कि वो अपने निजी आर्थिक हित साधने के लिए जनहित को किस प्रकार ताक पर रखकर आंखें बंद किए रहते हैं।
जेएसआर ग्रुप की इमारतों के निर्माण में मनमानी किये जाने की शिकायतें लगातार एमवीडीए के अधिकारियों को मिल रहीं थीं और समाचारों के माध्‍यम से भी इसकी सूचना प्राप्‍त होती रही परंतु हर शिकायत तथा हर समाचार को प्राधिकरण की भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था ने अपने हित साधने का जरिया बना लिया। जितनी शिकायतें बढ़ती गईं और जितने समाचार प्रकाशित हुए, उतनी ही अधिकारियों की डिमांड में इजाफा होता गया।
इस तरह जेएसआर ग्रुप की कॉलोनियों में मकान खरीदने वालों तथा निवेशकों को इस हाल तक पहुंचाने के लिए एमवीडीए कम जिम्‍मेदार नहीं है क्‍योंकि उसने कभी किसी को इन कॉलोनियों के निर्माण की असलियत बताना मुनासिब नहीं समझा अन्‍यथा जिन प्रोजेक्‍ट्स के भूखंडों की पैमाइश अब कमिश्‍नर के आदेश पर कराने की तैयारी हो रही है, क्‍या उनकी पैमाइश तभी नहीं हो जानी चाहिए थी जब इनका निर्माण शुरू हुआ था तथा बराबर शिकायतें सामने आ रही थीं।
जब इन इमारतों की लंबाई बढ़ रही थी और जब इनमें पार्किंग की व्‍यवस्‍था, ग्रीनरी तथा दूसरी जरूरी सुविधाओं को दरकिनार कर केवल कंक्रीट के कबूतरखाने तैयार किये जा रहे थे, तब एमवीडीए क्‍यों सो रहा था।
आज हाल यह है कि एमवीडीए में किसी अधिकारी से कोई जेएसआर ग्रुप की इन इमारतों के बावत जानकारी करने का प्रयास करता है तो उसे सांप सूंघ जाता है। वह कुछ भी बताने को तैयार नहीं होता। किसी मीडिया पर्सन द्वारा सवाल पूछे जाने पर अधिकारी पहले तो उसे टालने का प्रयास करते हैं और अगर बात बनती नहीं दिखती तो फिर फोन उठाना ही बंद कर देते हैं। आरटीआई का जवाब देना तो एमवीडीए अपनी तौहीन समझता है। यदि मजबूरीवश किसी आरटीआई का जवाब देना ही पड़ जाए तो आधी-अधूरी अथवा अस्‍पष्‍ट सूचना देकर जानकारी मांगने वाले को गुमराह कर दिया जाता है।
जेएसआर ग्रुप के साइलेंट पार्टनर संजय देशवानी के बेटे केशव देशवानी द्वारा किये गये खुलासे से तो यह भी जाहिर होता है कि जेएसआर ग्रुप के हिस्‍सेदारों ने अपने प्रोजेक्‍ट के अवैध फ्लैट्स को बेचने के लिए वो दुस्‍साहस किया है जो अब तक शायद ही किसी बिल्‍डर ने किया हो। फ्लैट बुक कराने वालों को बैंक से फाइनेंस कराने के लिए इन लोगों ने बैंक के कुछ कर्मचारियों से सांठगांठ करके वहां प्रोजेक्‍ट का फर्जी नक्‍शा तक दाखिल करा रखा है।
ऐसे में जिन लोगों ने बैंक से अपने फ्लैट के लिए कर्ज ले लिया है और जो सपनों के घर में शिफ्ट होने का इंतजार कर रहे हैं, उनके सामने बड़ी मुसीबत खड़ी होने वाली है।
केशव देशवानी का कहना अगर पूरी तरह सच है तो बात केवल अवैध निर्माण की न होकर इतने बड़े घोटाले की है जिसमें बिल्‍डर तथा एमवीडीए के साथ-साथ कुछ बैंकें, आर्किटेक्‍ट और यहां तक कि चार्टर्ड एकाउंटेंट की भी बड़ी भूमिका सामने आयेगी।
बताया जाता है कि भ्रष्‍टाचार और घोटालों की बुनियाद पर खड़ी इन इमारतों के पूरे खेल का पर्दाफाश कराने के लिए कुछ निवेशक तथा फ्लैट मालिक न्‍यायालय में जाने की तैयारी कर रहे हैं।
यदि ऐसा होता है तो निश्‍चित ही पूरा सच सामने आयेगा लेकिन इस सच की आंच में बहुत से लोग झुलस सकते हैं।
यह भी संभव है कि सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह ग्रेटर नोएडा व नोएडा में निर्माणाधीन करीब 20 हजार फ्लैट्स को पूरी तरह अवैध मानते हुए उन्‍हें ध्‍वस्‍त करने के आदेश दे दिए, उसी तरह कहीं जेएसआर के अवैध निर्माण को ध्‍वस्‍त करने का आदेश भी न दे दिया जाए।
गौरतलब है कि ग्रेटर नोएडा व नोएडा में जिन फ्लैट्स को गिराने के आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिए हैं, उनका निर्माण तो जेपी, अजनारा एवं आम्रपाली जैसे नामचीन ग्रुप ने कराया था। फिर जेएसआर ग्रुप की तो हैसियत ही क्‍या है।
ये बात अलग है कि जब तक जिसका भी चमड़े का सिक्‍का चलता रहता है, तब तक वह न किसी की सुनने को तैयार होता है और न मानने को। जिस समय कानून सही मायनों में शिकंजा कसने लगता है, उस समय दिन में तारे नजर आते भी देर नहीं लगती।
जेएसआर ग्रुप में फ्लैट लेने वालों तथा निवेशकों को भी संभवत: कानून का ही सहारा है।
और हां, संजय देशवानी के साथ कुछ हुआ हो या न हुआ हो परंतु जो कुछ अब तक अखबारों की सुर्खियां बना है, उसने बहुत से लोगों के कान जरूर खड़े कर दिए हैं।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष  

गुरुवार, 4 दिसंबर 2014

संजय का अब तक पता नहीं, पुलिस ने गठित की टीम, JSR के सबसे बड़े हिस्‍सेदार थे संजय-कन्‍हैया

मथुरा। 
2 दिसंबर की रात को होडल से लौटते वक्‍त लापता हुए जेआरएस ग्रुप के निदेशक संजय देशवानी का फिलहाल कोई पता न तो पुलिस को लग पाया है और ना ही संजय के परिजनों को कहीं से कोई सूचना मिली है।
इस बीच संजय के पुत्र केशव देशवानी द्वारा ग्रुप के ही छ: अन्‍य हिस्‍सोदारों को हत्‍या के उद्देश्‍य से अपहरण की आशंका में नामजद कराये जाने के बाद कल एसएसपी मंजिल सैनी तथा एसपी सिटी सिटी ने सभी आरोपियों को तलब कर देर रात तक पूछताछ की।
बताया जाता है कि पूछताछ के दौरान ग्रुप के हिस्‍सेदार सभी आरोपियों ने संजय के बारे में कोई भी जानकारी होने से इंकार किया।
ग्रुप के एक हिस्‍सेदार और आरोपी नवीन कात्‍याल ने एसपी सिटी को बताया कि 2 दिसंबर की शाम संजय उनके पास होडल आए थे और उसके बाद बस से लौटने की कहकर चले गये।
नवीन कात्‍याल के मुताबिक संजय देशवानी अपने कपड़े के कारोबार से होडल आने-जाने में बस का इस्‍तेमाल किया करते थे, अपनी कार का प्रयोग वह बहुत जरूरी होने पर ही करते थे।
पुलिस के सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार फिलहाल सभी नामजदों को पुलिस ने इस हिदायत के साथ छोड़ दिया है कि वह पुलिस को सहयोग करें तथा अपने स्‍तर से संजय का पता लगाने की कोशिश करें ताकि जल्‍द से जल्‍द इस मामले का पटाक्षेप हो सके।
इसके अलावा पुलिस ने संजय देशवानी का पता लगाने के लिए अपनी एक टीम गठित की है जो उनकी कॉल डीटेल तथा उनके अन्‍य व्‍यापारिक संबंधों के आधार पर उनका पता लगाने में जुटी है।
जहां तक सवाल संजय देशवानी और कन्‍हैया खत्री का जेएसआर ग्रुप में हिस्‍सेदारी को लेकर है तो ग्रुप के ही लोगों ने उनकी 50 प्रतिशत हिस्‍सेदारी होने की पुष्‍टि की है।
यही हिस्‍सेदारी संजय व कन्‍हैया ने ग्रुप के अन्‍य हिस्‍सेदारों को सरेंडर की थी और जिसे पैसों के अभाव में उन्‍होंने जयंती लाला के नाम से मशहूर जयंती अग्रवाल को बेच दी।
दरअसल, पूरे जेएसआर ग्रुप में जयंती लाला से पहले कुल सात हिस्‍सेदार हुआ करते थे।
इनमें सबसे बड़ी 25-25 प्रतिशत की हिस्‍सेदारी संजय देशवानी तथा कन्‍हैया खत्री के नाम थी जबकि नवीन कात्‍याल, सतपाल नागपाल, विजय गोयल तथा विकेश गोयल 10-10 प्रतिशत के भागीदार थे। इन सब के अलावा 10 प्रतिशत की हिस्‍सेदारी होडल के ही डीड रायटर (लिखिया) नरेश बंसल की थी जिनका अब तक इस पूरे घटनाक्रम में कहीं नाम नहीं आया है।
ग्रुप के सूत्र बताते हैं संजय व कन्‍हैया की हिस्‍सेदारी खरीदने के बाद जयंती लाला इस ग्रुप के सबसे बड़े शेयर होल्‍डर हो गये और अधिकांश फैसलों में उनका दखल हो गया।
सूत्रों के अनुसार जयंती लाला ने संजय व कन्‍हैया की कुल 50 प्रतिशत हिस्‍सेदारी में से साढ़े सैंतीस प्रतिशत का भुगतान कर दिया है और अब केवल साढ़े बारह प्रतिशत भुगतान शेष है।
ग्रुप के लोगों ने इस तरह की अफवाहों का खण्‍डन किया कि संजय ने अशोका सिटी के कुछ फ्लैटस का सौदा किया था और उनकी एडवांस रकम संजय ने ले रखी थी।
ग्रुप के ही लोगों का कहना था कि संजय या कन्‍हैया के पास ग्रुप की कोई रकम शेष नहीं है अलबत्‍ता जयंती लाला को उनका साढ़े बारह प्रतिशत शेष भुगतान करना है जो किसी कारणवश तय समय पर नहीं हो पाया और जिसे लेकर गलतफहमी पैदा हुई।
ग्रुप के लोगों की मानें तो उन्‍हें संजय के परिजनों से पूरी सहानुभूति है और वह चाहते हैं कि शीघ्र से शीघ्र संजय की सकुशल वापसी हो जाए।
उधर संजय के साथी और ग्रुप के दूसरे बड़े हिस्‍सेदार रहे कन्‍हैया खत्री ने बताया कि उन्‍हें अथवा संजय के परिजनों को अब तक संजय का कोई पता कहीं से नहीं लग पाया है और न इस संबंध में कोई सूचना मिली है। उनका कहना था कि पुलिस को कहीं से कोई सूचना मिली हो तो उसकी जानकारी फिलहाल हमारे पास नहीं है।
उनका कहना था कि सुबह सीओ सिटी अनिल यादव ने मुझे और संजय के पुत्र केशव को फोन पर कोतवाली आने के लिए सूचित किया था लिहाजा हम वहीं जा रहे हैं।
जेएसआर ग्रुप में हुए इस अप्रत्‍याशित घटनाक्रम को लेकर पुलिस, संजय के परिजन, कन्‍हैया खत्री तथा ग्रुप के बाकी हिस्‍सेदार तो परेशान हैं हीं, वो लोग भी काफी परेशान हैं जिन्‍होंने ग्रुप के किसी प्रोजेक्‍ट में निवेश कर रखा है या फ्लैट्स बुक करा रखे हैं।
उनकी परेशानी का कारण यह है कि उन्‍हें कोई पूरी सच्‍चाई बताने वाला नहीं है और वह छन-छन के आ रहीं तरह-तरह की खबरों पर ही निर्भर हैं।
उन्‍हें डर है कि ग्रुप के बीच कोई बड़ा विवाद होने की स्‍थिति में उनका पैसा न फंस जाए अथवा जिस एक अदद आशियाने का सपना देखा था, वह सपना बन कर ही न रह जाए।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष     

JSR ग्रुप के निदेशक संजय देशवानी के अपहरण में ग्रुप के जयंती लाला सहित 6 हिस्‍सेदार नामजद

मथुरा। 
रियल एस्‍टेट कंपनी जेएसआर ग्रुप के निदेशक संजय देशवानी के कल रात से गायब होने के मामले में आज नया मोड़ तब आ गया जब उनके पुत्र केशव देशवानी ने कंपनी के ही आधा दर्जन हिस्‍सेदारों के खिलाफ अपने पिता को अगवा करने का आरोप लगाते हुए एफआईआर दर्ज करा दी।
आज सुबह केशव देशवानी ने जेएसआर ग्रुप के एक बड़े हिस्‍सेदार जयंती लाला, उनके बेटे हेमंत, विजय गोयल, विकेश गोयल, नवीन कात्‍याल तथा सतपाल नागपाल को कोतवाली में तहरीर देकर नामजद कराया।
ग्रुप के एक अन्‍य हिस्‍सेदार कन्‍हैया खत्री ने इस बारे में लीजेण्‍ड न्‍यूज़ को जानकारी देते हुए बताया कि मैंने और संजय ने कुछ समय पूर्व होडल निवासी तथा ग्रुप के पार्टनर विजय गोयल, विकेश गोयल, नवीन कात्‍याल तथा सतपाल नागपाल को अपना हिस्‍सा सरेण्‍डर किया था। इन लोगों ने हमारे हिस्‍से की कुछ रकम देने के बाद शेष भुगतान समय-समय पर करते हुए दिसंबर 2014 तक पूरा भुगतान करने का वायदा किया था किंतु फिर भुगतान देने में आनाकानी करने लगे।
कन्‍हैया खत्री के मुताबिक उन्‍होंने जब इस बारे में अपने स्‍तर से जानकारी की तो मालूम हुआ कि विजय गोयल, विकेश गोयल, नवीन कात्‍याल तथा सतपाल नागपाल ने हमारा हिस्‍सा जयंती लाला को बेच दिया है।
कन्‍हैया ने बताया कि जब हमने जयंती लाला से संपर्क किया तो उन्‍होंने और उनके लड़के हेमंत ने हमें धमकियां देना शुरू कर दिया और दोबारा तकादा करने पर परिणाम भुगतने की चेतावनी भी दी।
कन्‍हैया खत्री का कहना था कि इसके बाद मुझे व संजय देशवानी को लगातार प्रत्‍यक्ष व अप्रत्‍यक्ष रूप से धमकियां मिलने लगीं और हमारा पीछा किया जाने लगा जिसकी जानकारी संजय ने अपने परिजनों से भी की और अपने साथ कुछ अनहोनी होने का अंदेशा जताया।
कन्‍हैया के अनुसार जयंती लाला न केवल आर्थिक रूप से काफी सक्षम हैं बल्‍कि राजनीतिक रूप से भी काफी प्रभावशाली हैं और प्रदेश की प्रमुख राजनीतिक हस्‍तियों से उनके गहरे ताल्‍लुकातों की जानकारी सभी को है।
उन्‍होंने कहा कि जयंती लाला के प्रभाव का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि जो व्‍यक्‍ति कभी एक सरकारी विभाग में मामूली सा कर्मचारी हुआ करता था आज वह करोड़पति नहीं, अरबपतियों की सूची में शामिल किया जाता है।
जयंती लाला ने जेएसआर ग्रुप की हिस्‍सेदारी के अलावा कई अन्‍य कारोबारों में भी अच्‍छा खासा पैसा निवेश कर रखा है जिसमें रियल एस्‍टेट के अतिरिक्‍त विभिन्‍न सरकारी विभागों के ठेके लेना भी शामिल है।
इस बारे में लीजेण्‍ड न्‍यूज़ ने जयंती लाला और उनके पुत्र से अपना पक्ष रखने के लिए संपर्क करने का काफी प्रयास किया लेकिन किसी से संपर्क नहीं हो सका।
ग्रुप के एक अन्‍य हिस्‍सेदार तथा संजय देशवानी के अपहरण में आरोपी बनाये गये होडल निवासी नवीन कात्‍याल से जब इस पूरे प्रकरण की जानकारी चाही तो उन्‍होंने बताया कि संजय व कन्‍हैया का हिस्‍सा हमसे जयंती लाला ने खरीदा था और कुछ रकम का भुगतान करने के बाद शेष पूरी रकम किश्‍तों में दिसंबर 2014 तक चुका देने का वायदा किया था किंतु समय पर भुगतान नहीं किया गया लिहाजा हम संजय एवं कन्‍हैया को शेष रकम का भुगतान नहीं कर पाए।
नवीन कात्‍याल ने बताया जयंती लाला के रुख को देखकर हम दो लोगों यानि मैंने तथा सतपाल नागपाल ने भी अपनी हिस्‍सेदारी बेचने का मन बना लिया और काफी समय से ग्रुप के प्रोजेक्‍ट्स पर आना-जाना छोड़ दिया।
जब इस बात की जानकारी जयंती लाला को हुई तो उन्‍होंने हमसे कहा कि आप लोगों का हिस्‍सा भी मैं खरीद लूंगा, लेकिन आप दिसंबर माह तक रुक जाएं।
नवीन कात्‍याल ने बताया कि हम दोनों हिस्‍सेदार तो दिसंबर में जयंती लाला द्वारा संजय व कन्‍हैया के हिस्‍से की शेष रकम का भुगतान किये जाने तथा फिर हमारा हिस्‍सा खरीदने का इंतजार कर रहे थे किंतु इससे पहले यह घटना हो गई।
नवीन कात्‍याल का कहना था कि हमारा नाम एफआईआर में केवल इसलिए लिखाया गया है क्‍योंकि हम संजय व कन्‍हैया का भुगतान जयंती लाला से समय पर नहीं करा सके।
कात्‍याल का कहना था कि हम तो फिलहाल दो तरफ से फंसे हुए हैं। एक तरफ जयंती लाला से संजय व कन्‍हैया का हिसाब कराना है और दूसरी ओर अपनी हिस्‍सेदारी भी समाप्‍त करनी है।
उधर संजय के लापता होने के बाद दर्ज कराई गई एफआईआर में अपहरण व हत्‍या की आशंका जताये जाने के बाद एसएसपी ने सभी छ: आरोपियों को पूछताछ के लिए तलब किया है और बताया जाता है समाचार लिखे जाने तक उनसे पूछताछ चल रही थी।
दूसरी ओर संजय के बेटे केशव तथा कन्‍हैया खत्री ने पुलिस को जानकारी दी है कि जयंती लाला के लड़के हेमंत ने उन्‍हें भी जान से मारने की धमकी दी है।
गौरतलब है जेएसआर ग्रुप शुरू से किसी न किसी कारण विवादों में रहा है। इसके द्वारा खड़ी की गई अशोका हाइट्स और निर्माणाधीन प्रोजेक्‍ट अशोका सिटी में अवैध फ्लैट्स व टावर बनाये जाने का मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि अब एक हिस्‍सेदार के लापता होने की खबर आ गई।
बताया जाता है जयंती लाला ने जेएसआर ग्रुप के अवैध निर्माण को अपने रसूख के बल पर वैध करा लेने के भरोसे से इस प्रोजेक्‍ट में हाथ डाला था किंतु वह संभवत: अपने मकसद में सफल नहीं हो पाए। ऐसी भी चर्चा है कि कमिश्‍नर आगरा मंडल की जिन अवैध निर्माणों को लेकर त्‍यौरियां चढ़ी हुई हैं और वह जिनके खिलाफ कार्यवाही अमल में लाना चाहते हैं, उनमें से एक जेएसआर ग्रुप का अशोका सिटी नामक प्रोजेक्‍ट भी है।
इस मामले में काफी समय से ग्रुप व एमवीडीए के अधिकारियों की अंडर टेबिल बातचीत जारी थी किंतु उसमें संभवत: पूरी सफलता नहीं मिल सकी।
सच्‍चाई जो भी हो, लेकिन इतना जरूर है कि इस धार्मिक जनपद में रियल एस्‍टेट का कारोबार अवैध निर्माण के साथ-साथ आपराधिक गतिविधियों की ओर भी बढ़ने लगा है।
कोषदा बिल्‍कॉन के दो हिस्‍सेदारों में हुआ विवाद आज तक खत्‍म होने का नाम नहीं ले रहा और उसमें नित-नये आरोप-प्रत्‍यारोप लगाये जा रहे हैं। दोनों ओर से कई एफआईआर दर्ज हो चुकी हैं और कई प्रार्थनापत्र विभिन्‍न विभागों में लंबित हैं।
यदि यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब रियल एस्‍टेट के धंधे में इस्‍तेमाल किये जाने वाले हथकंडे, उनके अपने कारोबारियों के लिए ही गले का फंदा बन जायेंगे और यह विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक जनपद इस मामले में भी पहचाना जाने लगेगा।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष 

रविवार, 30 नवंबर 2014

MVDA के ईमानदार VC का भ्रष्‍ट विकास!

महाभारत नायक योगीराज श्रीकृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली और विश्‍व विख्‍यात धार्मिक जिला मथुरा में एमवीडीए के उपाध्‍यक्ष पद पर तैनात पीसीएस अधिकारी नागेन्‍द्र प्रताप उसी तरह के ईमानदार हैं जिस तरह पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह हुआ करते थे।
कमिश्‍नर आगरा मण्‍डल प्रदीप भटनागर ने अपने निरीक्षण में मथुरा के चार अवैध निर्माणों को सील करवाकर यह साबित कर दिया कि मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण में ऊपर से नीचे तक भ्रष्‍टाचार का बोलबाला है और यहां तैनात अधिकारी अपने-अपने तरीके से इस भ्रष्‍टाचार को भरपूर प्राश्रय दे रहे हैं।
यहां ध्‍यान देने की बात यह है कि कमिश्‍नर प्रदीप भटनागर को इन अवैध निर्माणों पर कार्यवाही करने के लिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के अधिकारियों को लगभग खदेड़ कर भेजना पड़ा अन्‍यथा बेहिसाब शिकवा-शिकायतों के बावजूद ये अधिकारी अवैध निर्माण को लेकर आंखें बंद किये बैठे थे।
उल्‍लेखनीय है कि विकास प्राधिकरण मथुरा-वृंदावन के उपाध्‍यक्ष नागेन्‍द्र प्रताप यादव को सत्‍ताधारी समाजवादी पार्टी के परिवार का अंग माना जाता है और कहा जाता है कि वह शासन स्‍तर से कुछ भी कराने में सक्षम हैं।
इसी प्रकार सचिव श्‍याम बहादुर सिंह की भी मथुरा जैसे मलाईदार प्राधिकरण में पोस्‍टिंग तथा उपाध्‍यक्ष नागेन्‍द्र प्रताप यादव से सेटिंग यह साबित करती है कि उनकी शासन स्‍तर पर पहुंच कम नहीं है।
ऐसे में इन दोनों अधिकारियों को लेकर यह सवाल पैदा होना स्‍वाभाविक है कि फिर उक्‍त अधिकारी किसलिए प्राधिकरण के क्षेत्र में अवैध निर्माण पर जिंदा मक्‍खी निगल रहे थे और क्‍यों सारी शिकायतों को पी रहे थे?
जाहिर है कि दोनों अधिकारियों के लगातार ऐसा करने के पीछे कोई न कोई निजी स्‍वार्थ जरूर रहा होगा अन्‍यथा प्राधिकरण के उपाध्‍यक्ष जिन नागेन्‍द्र प्रताप की गिनती ईमानदार अधिकारियों में की जाती है, वह क्‍यों खुद तथा अपने अधीनस्‍थों को भ्रष्‍टाचार की बुनियाद पर एक-दो नहीं अनेक इमारतें खड़ी कराते देखने के बाद भी अब तक चुप्‍पी साधे बैठे रहे।
गौरतलब है कि मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने कल कमिश्‍नर के आदेश पर जिन चार अवैध निर्माणों के खिलाफ कार्यवाही की है, वह तो मात्र उदाहरण भर हैं। सच तो यह है कि ऐसे अवैध निर्माणों की मथुरा, वृंदावन तथा गोवर्धन में लंबी फेहरिस्‍त है जबकि यह तीनों स्‍थान प्राधिकरण के कार्यक्षेत्र का हिस्‍सा हैं।
मथुरा में राष्‍ट्रीय राजमार्ग नंबर दो पर खड़ी की जा रही कई कॉलोनियों में पास नक्‍शे के इतर काफी अवैध निर्माण कराया जा चुका है और कॉलोनाइजर इस अवैध निर्माण को प्राधिकरण से अप्रूव्‍ड घोषित कर बेच भी चुके हैं पर प्राधिकरण के अधिकारी तमाशबीन बने हुए हैं। बताया जाता है कि इन सबको वैध कराने के लिए अधिकारियों एवं बिल्‍डर्स के बीच लंबे समय से बार्गेनिंग चल रही है। प्रति अवैध फ्लैट के हिसाब से करोड़ों की डील हुई है। प्राधिकरण के ही सूत्र बताते हैं कि कुछ पर मोहर लग चुकी है और कुछ पर लगना बाकी है।
यही हाल वृंदावन का है। वृंदावन में चूंकि फ्लैट, विला तथा भवनों की मांग काफी ज्‍यादा है इसलिए वृंदावन में अवैध निर्माण मथुरा से कहीं अधिक संख्‍या में चल रहा है। यहां कोई बिल्‍डर मल्‍टी स्‍टोरी बिल्‍डिंग की छत पर ही हैलीपैड की सुविधा देने का प्रचार कर रहा है तो कोई अपने प्रोजेक्‍ट को विश्‍व स्‍तरीय सुविधाओं से सुसज्‍जित करने का प्रचार करके लोगों की जेब तराश रहा है लेकिन न कोई देखने वाला है और न सुनने वाला।
आश्‍चर्य की बात तो यह है कि प्राधिकरण के क्षेत्र में और कृष्‍ण जन्‍मभूमि के सर्वाधिक संवेदनशील यलो व ग्रीन जोन में निर्माणाधीन इन बहुमंजिला रिहायशी इमारतों के नक्‍शे किस स्‍तर पर और कैसे पास हो रहे हैं, पास हैं भी या नहीं, हैं तो कितनी मंजिल तक के नक्‍शे पास हैं, इन सवालों के जवाब देने वाला कोई नहीं।
दरअसल विकास प्राधिकरण के संरक्षण में भ्रष्‍टाचार की बुनियाद पर इन इमारतों की लंबाई तथा इनकी संख्‍या बढ़ते जाने का एक प्रमुख कारण और है। यह कारण है प्राधिकरण और बिल्‍डर्स को यह पता होना कि मीडिया की कमजोरी क्‍या है।
सर्वविदित है कि मीडिया की कमजोरी हैं विज्ञापन, इसलिए विकास प्राधिकरण और बिल्‍डर्स अपने-अपने स्‍तर से मीडिया को विज्ञापन की पंजीरी बांटकर उसका मुंह बंद करते रहते हैं। चूंकि मीडिया ही उनके इस कारनामे तथा बिल्‍डर्स व अधिकारियों की सांठगांठ को उजागर कर सकता है लिहाजा वह मीडिया की इस कमजोरी का पूरा लाभ उठा  रहे हैं।
मीडिया इसी में खुश रहता है कि उसे बिल्‍डर भी विज्ञापन देता है और प्राधिकरण भी, बाकी जनता जाये भाड़ में। जनता से उसे मिलना भी क्‍या है। यूं भी अब अखबार और अखबार नवीसों का जनहित से कोई सीधा वास्‍ता रह नहीं गया। जनहितकारी होने का ढोंग वह उसी स्‍थिति-परिस्‍थिति में करते हैं जब वैसा करना उनकी बाध्‍यता हो जाती है। जैसे कल कमिश्‍नर के आदेश पर अवैध निर्माण सील करने के बाद तो खबरें प्रकाशित की गईं हैं किंतु इससे पहले मीडिया अपने मुंह पर खुद सील लगाये हुए था जबकि उसे सब-कुछ पता था।
ये बात दीगर है कि जिन इमारतों में अवैध निर्माण चल रहा है उनमें से अधिकांश शहर के उन लोगों की है जिनसे मीडिया व मीडियाकर्मी समय-समय पर ऑब्‍लाइज होते रहते हैं या जिनके लिए ऐसे लाइजनर सक्रिय हैं जो मीडिया को मैनेज करके रखते हैं।
कल भी जो इमारतें सील हुई हैं उनमें से दो इमारतों का स्‍वामित्‍व ऐसे तत्‍वों के पास है जिनकी प्रशासन तथा मीडिया में तूती बोलती है। वह दिन को रात कह दें तो मीडिया वही कहता है और रात को दिन बता दें तो मीडिया वह रटने लगता है।
यही कारण है कि मथुरा में अवैध निर्माण बेहिसाब बढ़ता जा रहा है क्‍योंकि प्रशासन, मीडिया तथा बिल्‍डर्स का गठजोड़ सबको खुली चुनौती देने में सक्षम है।
आज एमवीडीए के उपाध्‍यक्ष नागेन्‍द्र प्रताप हैं तथा सचिव श्‍याम बहादुर सिंह, कल इनकी जगह कोई दूसरे अधिकारी हो सकते हैं लेकिन न तो मीडिया बदलने वाला है और न वो कॉकस जो हर अधिकारी को अपने चंगुल में ले लेता है।
भ्रष्‍ट अधिकारी तो इनकी राह देखते हैं लेकिन ईमानदारी का तमगा लगाये बैठे तथा शासन तक पहुंच रखने वाले नागेन्‍द्र प्रताप जैसे अधिकारी भी इस कॉकस से बच नहीं पाते।
माना कि कमिश्‍नर ने बहुत सी शिकायतों के मद्देनजर चार अवैध निर्माण कार्यों के खिलाफ इन अधिकारियों को कार्यवाही करने पर मजबूर कर दिया लेकिन उन तमाम इमारतों का क्‍या जो अब भी सारे नियम-कानूनों को खुली चुनौती दे रही हैं और आमजन के व्‍यवस्‍था में भरोसे का मजाक उड़ा रही हैं। झूठे प्रचार के जरिए इन्‍हें खड़ा करने वाले आमजन की जेब काट रहे हैं और मीडिया इसमें उनका सहयोग कर जनता के भरोसे का खून कर रहा है।
रीयल एस्‍टेट और प्राधिकरण के गठजोड़ से बने इस कॉकस के हाथ फिलहाल तो कानून से भी अधिक शक्‍तिशाली प्रतीत होते हैं। कमिश्‍नर प्रदीप भटनागर भी इस तल्‍ख सच्‍चाई को भली-भांति जानते होंगे।
हो सकता है इनमें से कल कोई उन्‍हें अपनी ताकत का अहसास कमिश्‍नर साहब को भी करा दे तथा फिर सब-कुछ उसी प्रकार ढर्रे पर चलने लगे जैसा अब तक चला आ रहा था.... बेशक कमिश्‍नर साहब ने एक कंकड़ फैंककर उथल-पुथल मचा दी है।
यदि ऐसा होता है तो कोई आश्‍चर्य नहीं....आश्‍चर्य तो तब होगा जब कल जिन इमारतों को सील किया गया है, उनकी सील न टूट पाए और दूसरी भी ऐसी तमाम इमारतें सील कर दी जाएं।
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ विशेष        
 

सोमवार, 24 नवंबर 2014

ममता हैं सारधा चिटफंड घोटाले की सबसे बड़ी लाभार्थी: कुणाल

कोलकाता। 
तृणमूल कांग्रेस से निलंबित सांसद व सारधा चिटफंड घोटाले के आरोपी कुणाल घोष ने राज्य की मुखिया ममता बेनर्जी पर आरोप लगाते हुए कहा है कि वह इस घोटाले की सबसे बड़ी लाभार्थी हैं। उन्होंने कहा है कि ममता को उनके सामने बैठाकर संयुक्त रूप से पूछताछ की जानी चाहिए। गौरतलब है कि घोष ने कुछ ही दिन पहले जेल में नींद की गोलियां खाकर आत्महत्या करने की कोशिश की।
उन्होंने धमकी दी थी कि अगर सीबीआई ने घोटाले के असली आरोपियों को गिरफ्तार नहीं किया तो वह आत्महत्या कर लेंगे। घोष द्वारा की गई आत्महत्या की कोशिश के बाद राज्य सरकार ने कारागार मंत्री एचए सफवी को पद से हटा दिया था। सारधा घोटाले में नाम आने के बाद कुणाल घोष ही वह शख्स हैं जिन्होंने मामले से बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का संबंध होने की बात कही थी।

दिल्‍ली के 300 जज लैपटॉप घोटाले में शामिल, जांच शुरू

नई दिल्‍ली। 
दिल्ली की निचली अदालतों के करीब 300 जज लैपटॉप खरीदने में बरती गई अनियमितताओं को लेकर जांच की जद में हैं। साल 2013 में दिल्ली सरकार और दिल्ली हाईकोर्ट ने लैपटॉप खरीदने के लिए फंड जारी किया था मगर अधिकांश जजों ने कंप्यूटर और लैपटॉप्स के पैसों से अपने घर के लिए टीवी और होम थिएटर खरीद लिए।
दिल्ली हाईकोर्ट की चीफ जस्टिस जी. रोहिणी ने हाईकोर्ट के 3 जजों का पैनल बनाया है, जो इन जजों द्वारा खर्च किए गए पैसे की जांच कर रहा है। पैनल जजों द्वारा लैपटॉप्स खरीदने के बाद जमा करवाए गए डॉक्यूमेंट्स की जांच कर रहा है।
इस स्कीम के तहत जजों को कंप्यूटर व अन्य इन्फ्रास्ट्रक्चर अपडेट करने के लिए 1 लाख 10 हजार रुपये तक की रकम खर्च करनी थी। इस स्कीम के पीछे विचार यह था कि जज अपनी सुविधा के हिसाब के कंप्यूटर, लैपटॉप्स या आईपैड ले सकें ताकि केसों को निबटाने की रफ्तार बढ़ जाए।
जांच कर रहे पैनल ने न्यायिक अधिकारियों को मेमो जारी किए हैं और पूछा है कि आपने पैसे किस तरह से खर्च किए। एक सूत्र ने बतायाा, 'सभी जज शुरुआत में जांच की जद में थे लेकिन अब करीब 300 जजों पर शक है कि उन्होंने अनियमितता बरती। पाया गया कि इनमें से कुछ ने टीवी या होम थिएटर सिस्टम खरीद लिए।'
यह मामला तब सामने आया जब रुटीन विजिलेंस इन्क्वायरी की गई। चीफ जस्टिस और अन्य सीनियर जजों को सबूत दिखाए गए, तब जाकर हरकत में आते हुए चीफ जस्टिस जी. रोहिणी ने जांच के लिए 3 सीनियर जजों का एक पैनल बनाया।
सूत्रों के मुताबिज जांच पैनल की तरफ से जारी मेमो का जवाब देते हुए कई जजों ने बताया है कि उन्होंने क्या खरीदा है। इसके लिए कुछ ने अपने डेबिट/क्रेडिट कार्ड्स की डीटेल्स भी अटैच की हैं ताकि दिखाया जा सके कि जितने का बिल है उतनी ही पेमेंट भी हुई है। जांच पैनल वेंडर्स की जानकारी भी चेक कर रहा है।
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