गुरुवार, 16 जुलाई 2015

गजब यूपी: भूमाफियाओं ने डीएम का बंगला, रेलवे प्‍लेटफॉर्म ओर सीलिंग ऑफिस बेचा

मुजफ्फरनगर। अखिलेश सरकार में किस कदर माफिया राज कायम है इसका एक उदाहरण तब और देखने में मिला जब भूमाफियाओं ने मुजफ्फरनगर के डीएम का बंगला तक बेच डाला। यही नहीं, इन माफियाओं ने डीएम बंगले के अलावा एक इंटर कॉलेज, एक सेंट्रल स्कूल, सीलिंग ऑफिस, कृषि फार्म और यहां तक कि रेलवे का प्लेटफॉर्म भी बेच दिया।बेची गई इन सरकारी संपत्तियों की कीमत 6 अरब 75 करोड़ रुपए है।
मामले का खुलासा होने पर अब प्रशासन ने पूरे मामले की जांच के आदेश दिए हैं।
फिलहाल इस मामले में 7 लोगों के खिलाफ तहरीर दी गई है, जिनमें से एक मंत्री का भतीजा भी शामिल है।
प्रदेश में भूमाफियाओं का कारोबार कितना अच्छा चल रहा है, इस बात का पता ऐसे चलता है कि कुछ लोगों ने तीन लोगों को डीएम का बंगला बेच दिया।
जिन्हें यह बंगला बेचा गया था, उन्होंने प्रमुख सचिव राजस्व से इस बंगले पर कब्जे की मांग की। इस दावे को जानकर पहले तो प्रशासनिक अधिकारी चौंक गए, डीएम का बंगला खरीदने वाले ने इस खरीदारी के सबूत दिए तो अधिकरियों के सामने इसका खुलासा हुआ।
प्रमुख सचिव (राजस्व) ने तहसीलदार को इस मामले में जांच के आदेश दिए हैं।
तहसीलदार की तहरीर के मुताबिक 26 फरवरी 2003 को चार लोगों ने एक डीड कराई।
इन्होंने आधे दर्जन से ज्यादा सरकारी संपत्तियों के अलावा सड़कों-नालों का शेयर भी अपने पास दिखाया।
इसी डीड के आधार पर मई 2003 में एक और डीड कराई, जिसमें तीन आरोपियों ने अपना पूरा और एक आरोपी ने अपना पांच फीसदी हिस्सा तीन अन्य लोगों को बेच दिया।
इन संपत्तियों की पड़ताल करने पर इनमें से ज्यादातर के सरकारी संपत्ति होने की बात सामने आई। उधर, सरकारी संपत्ति के खरीदार आरोपियों का कहना है कि अगर ये सरकारी संपत्तियां हैं तो इनके दस्तावेज उपलब्ध कराए जाएं।
उन्होंने कहा कि मामला राजस्व परिषद में विचाराधीन है और उसे प्रभावित करने को ही यह कार्यवाही की गई है।

मंगलवार, 14 जुलाई 2015

वसुंधरा सरकार ने भरा था ललित मोदी की ‘वीआईपी उड़ानों’ का बिल

नई दिल्‍ली। मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपी ललित मोदी की ‘वीआईपी उड़ानों’ का बिल राजस्थान की वसुंधरा राजे सरकार और बड़ी कंपनियों ने भरा था. प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और राजस्व खुफिया निदेशालय (डीआरआई) ने यह खुलासा किया है.
बॉम्बार्डियर चैलेंजर 300 विमान का बिल कॉरपोरेट कंपनियों ने अपनी जेब से भरा. ललित मोदी, उनका परिवार और दोस्त अकसर इस विमान का इस्तेमाल करते थे. इसके अलावा मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और अन्य की ओर से इस्तेमाल किए विमान के तीन चार्टर बिलों में से एक का भुगतान राजस्थान सरकार ने किया और बाकी दो अब भी बकाया हैं.
डीआरआई के ‘कारण बताओ’ नोटिस की एक्सक्लूसिव कॉपी से पता चलता है कि कैसे ललित मोदी के निर्देश पर कॉरपोरेट्स और राजस्थान सरकार उनके चार्टर बिलों का भुगतान कर रहे थे .
यात्रियों का रिकॉर्ड रखने वाले दस्तावेज और जीडब्ल्यूपीएल के बिलों से पता चला है कि विमान ने कुल 792 घंटे 50 मिनट का सफर किया. जांच में पता चला है कि विमान का 86 फीसदी इस्तेमाल खुद ललित मोदी ने किया और उनके निर्देश पर ही ये चार्टर बिल दूसरी कंपनियों को भेजे गए.
1. इसमें से 125 घंटे 45 मिनट खुद ललित मोदी, उनके परिवार और दोस्तों ने सफर किया और इसका बिल ललित मोदी के नाम से ही बना.
2. 553 घंटे 10 मिनट तक विमान का इस्तेमाल ललित मोदी, उनके परिवार और दोस्तों ने किया लेकिन इसका बिल दूसरों के नाम से बना.
3. 113 घंटे और 55 मिनट का समय का इस्तेमाल अन्य लोगों ने किया.
ललित मोदी का बिल भरने वाली कंपनियों में हैं- अंसल प्रोपर्टीज, नेट लिंक ब्लू (दुबई की कंपनी है), आनंदा हेरिटे, रेणुका कैलिल, परसेप्ट पिक्चर्स, आदित्य चेलाराम, पवन गोयल, अशोक कुमार गोयल, जूम कम्युनिकेशन, ग्लोबल स्पोर्ट्स ब्रॉडकास्ट सर्विसेस, डीएनए एंटरटेनमेंट नेटवर्क, गो एयरलाइंस प्रा. लि., गेजरी ईस्टर्न लिमिटेड और राजस्थान सरकार.

हर चार में से एक महिला देखती है पोर्न फिल्‍म

पोर्न फिल्में देखने वाले हर चार लोगों में से एक महिला होती है. हालिया हुए एक सर्वे में ये बात सामने आई है. सर्वे में कहा गया है कि दुनिया की सबसे बड़ी पोर्नोग्राफी साइट्स पर लॉग-इन करने वालों में हर चौथी यूजर एक महिला होती है. पोर्न फिल्मों का एक बड़ा दर्शक वर्ग 35 साल से कम उम्र की महिलाओं का है.
पोर्न हब साइट्स पर जाकर फिल्में देखने वाले लोगों में 24 प्रतिशत महिलाएं होती हैं, जिससे ऐसे वीडियोज के व्यू 78 बिलियन तक पहुंच जाते हैं. रिसर्च में कहा गया है कि स्मार्टफोन इसकी एक प्रमुख वजह है. मौजूदा दौर की लगभग हर महिला के पास स्मार्टफोन है जिस पर पोर्न फिल्में देखना काफी आसान है.
ये आंकड़े वेबसाइट्स के ट्रैफिक और एनालिटिक्स डाटा के आधार पर तैयार किए गए हैं. स्टडी में पाया गया है कि इन वेबसाइट्स पर 60 प्रतिशत यूजर मोबाइल से आता है. 7 प्रतिशत लोग अपने टैबलेट पर और 33 फीसदी लोग कंप्यूटर पर पोर्न फिल्में देखते हैं. वेबसाइट्स से प्राप्त डाटा के मुताबिक, सोमवार के दिन महिला यूजर्स सबसे अधिक होती हैं जबकि शनिवार को उनकी संख्या तुलनातमक रूप से काफी कम होती है.
पोर्न साइट के 60 प्रतिशत व्यूअर्स 35 साल से कम उम्र के हैं. वे रात को 11 बजे के बाद इन साइट्स को खोलते हैं और 10 मिनट तक इन साइट्स पर बने रहते हैं. वहीं 35 से ऊपर के लोग एक घंटे पहले इन साइट्स पर लॉग इन करते हैं लेकिन वे 35 से कम उम्र वालों की तुलना में ज्यादा वक्त तक साइट पर बने रहते हैं.
साइट पर सर्च किए जाने वाले नामों में रिएलिटी स्टार किम करदाशियां सबसे आगे हैं. उनके सेक्स टेप वीडियो को अब तक 93 मिलियन से ज्यादा बार देखा जा चुका है और ये अब भी साइट का सबसे ज्यादा देखा जाने वाला वीडियो है. 2007 में उनका ये वीडियो लीक हुआ था. अपने पति केन्या वेस्ट के साथ उनका न्यूड फोटोशूट भी काफी मशहूर हुआ था.
पोर्नहब के मुताबिक, यूरोप में सबसे अधिक ब्रिटेन के लोग पोर्न फिल्में देखते हैं. यूजर्स के मामले में अमेरिका और कनाडा ही इससे आगे हैं. क्विट पोर्न एडिक्शन जोकि यूके की एक काउंसलिंग कंपनी है उसने भी कुछ ऐसे ही डाटा दिए हैं. सर्विस कंपनी का कहना है कि उनके पास आने वाली हर तीसरी क्‍लाइंट एक महिला होती है.

रविवार, 12 जुलाई 2015

दिल्‍ली में 27 सरकारी आवास कब्‍जा रखे हैं कलाकारों ने

नई दिल्ली। सरकारी आवासों पर देश के बुजुर्ग और दिग्गज कलाकारों ने कब्जा जमा रखा है, इनमें कथक सम्राट पंडित बिरजू महाराज, संतूर वादक भजन सोपोरी जैसे नाम शामिल हैं। तीन साल के लिए आवंटित होने वाले टाईप-4 और 5 श्रेणी के इन सरकारी आवासों पर 36 सालों से कलाकारों का कब्जा है। कई पुराने कलाकारों की मौत के बाद भी परिजनों ने आवास खाली नहीं किया है।
सरकारी आवासीय व्यवस्था की देखरेख करने वाला शहरी विकास मंत्रालय भी इन कलाकारों से घर खाली कराने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। इतना जरूर है कि हर छह माह में मंत्रालय इन मकानों को खाली करने का एक नोटिस जरूर जारी कर देता है। पुराने लोगों के मकान न छोड़ने से नई पीढ़ी के कलाकारों को सरकारी आवास मयस्सर नहीं हो पा रहा है।
प्रतिष्ठित कलाकारों के लिए दिल्ली में 40 मकानों का कोटा है। इनमें से 27 पर कलाकार या उनके परिजनों का डेरा है। मकान उन्हीं कलाकारों को देने का प्रावधान है, जिनके पास राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में घर नहीं है। उन्हें यह घर तीन साल के लिए दिया जाता है। विशेष हालात में अवधि तीन साल बढ़ाई जा सकती है। कलाकारों की मासिक आमदनी 20 हजार से अधिक नहीं होनी चाहिए।
2008 में कैबिनेट की आवासीय समिति ने शर्त जोड़ दी कि कलाकार की उम्र 40-60 साल के बीच होनी चाहिए। उनकी मृत्यु होने पर परिजन छह माह में घर खाली कर देंगे। नए कलाकारों के लिए मकान आवंटन को कमेटी हर छह माह पर बैठक करेगी। समिति की अध्यक्षता संस्कृति मंत्रालय के सचिव करते हैं। मंत्रालय के संयुक्त सचिव (संगीत नाटक अकादमी), ललित कला अकादमी, साहित्य अकादमी के सचिव, नेशनल स्कूल आफ ड्रामा और संपत्ति विभाग के निदेशक सदस्य हैं।
इन कलाकारों का कब्जा
भजन सोपोरी – संतूर (11 साल)
भारती शिवाजी – मोहिनीयट्टम (27 साल)
पंडित बिरजू महाराज – कथक (36 साल)
डी देवराज – प्रिंट मेकिंग (24 साल)
एफडब्ल्यू डागर – ध्रुपद (16 साल)
गीतांजलि लाल – कथक (26 साल)
जीआर इरान्ना – पेंटर (11 साल)
गुलाम सिद्दीक खान – गायन (24 साल)
गुरु जितेंद्र – कथक (26 साल)
एचके बेहरा – ओडिसी (26 साल)
जतिन दास – पेंटर (26 साल)
गुरु जयारामा राव – कुचिपुड़ी (16 साल)
जॉय माइकल – थिएटर (25 साल)
कमलिनी – कथक (11 साल)
केआर सुब्बाना – पेंटर (11 साल)
मायाधर राउत – ओडिसी (26 साल)
मोहन महर्षि – थिएटर (11 साल)
राजा रेड्डी – कुचिपुड़ी (21 साल)
रानी सिंहल – भरतनाट्यम (11 साल)
रीता गांगुली – गजल (25 साल)
एस कनक – भरतनाट्यम (11 साल)
सुनील कोठारी – क्रिटिक (11 साल)
सुरजीत सेन – ब्राडकास्टर (24 साल)
साबरी खान – सारंगी (24 साल)
स्वर्गवासी हो चुके उस्ताद
असद अली खान – रुद्रवीणा (20 साल रहे और चार साल से परिवार के लोग रहते हैं)
उस्ताद आरएफके डागर – ध्रुपद (9 साल रहे और अब चार साल से परिवार के लोग रहते हैं)
उस्ताद अली विलायत – सितार (24 साल रहे और अब 11 साल से परिवार के लोग रहते हैं)

शुक्रवार, 3 जुलाई 2015

मथुरा एआरटीओ से खुलेआम चौथ मांग रहे हैं एक स्‍थानीय विधायक

मथुरा। एक स्‍थानीय विधायक जनपद में तैनात एक एआरटीओ से चौथ मांग रहे हैं। चौथ वसूली के लिए माननीय विधायक पिछले काफी समय से लगातार एआरटीओ का न सिर्फ मानसिक उत्‍पीड़न कर रहे हैं बल्‍कि उनके खिलाफ शासन में लगातार झूठी शिकायतें भी कर रहे हैं। विधायक महोदय इस एआरटीओ पर आयेदिन इस बात का दबाव भी बनाते हैं कि वह उनसे उनकी कोठी पर आकर मिले अन्‍यथा जपनद से अपना बोरिया-बिस्‍तर समेटने की तैयारी कर ले।
फिलहाल नाम न छापने की शर्त पर एआरटीओ ने बताया कि विधायक द्वारा उनसे चौथ वसूल करने की कोशिश का सिलसिला उस दिन से शुरू हुआ जिस दिन उन्‍होंने उनकी एक लग्‍जरी गाड़ी के रजिस्‍ट्रेशन में कम पैसे दिये जाने पर उसका तकादा उनके घर तक भेज दिया था।
एआरटीओ के मुताबिक अभी तो वह इस कोशिश में हैं कि विधायक जी को अपने स्‍तर से मामले की गंभीरता समझा सकें किंतु यदि विधायक जी अपनी हरकतों से बाज नहीं आये और जिद पर अड़े रहे तो वह सार्वजनिक रूप से विधायक जी की असलियत बताने के साथ-साथ उनके खिलाफ एफआईआर कराने से भी नहीं चूंकेंगे, जिसके लिए पर्याप्‍त साक्ष्‍य एकत्र कर लिये गये हैं।
एआरटीओ ने ”लीजेंड न्‍यूज़” को बताया कि करीब एक साल पहले विधायक जी ने उनसे अपनी एक लग्‍जरी गाड़ी का रजिस्‍ट्रेशन कराने को कहा। इस गाड़ी के लिए उन्‍होंने एक खास ”फेंसी नंबर” (जैसे 4200, 4300, 4400 या 4500) की मांग की जो उन्‍हें उपलब्‍ध करा दिया गया।
बताया जाता है कि विधायक जी के पास जो गाड़ियां हैं या जो अब तक रही हैं, उन सभी गाड़ियों का नंबर वही रहा है जिसकी मांग उन्‍होंने एआरटीओ से की थी।
यहां तक तो सब ठीक था किंतु बात तब बिगड़ी जब विधायक जी ने गाड़ी का रजिस्‍ट्रेशन कराने के लिए जो पैसे दिये वह काफी कम थे।
एआरटीओ द्वारा यह बताये जाने पर कि जो पैसे आपको बताये गये हैं उनमें एक भी पैसा अतिरिक्‍त नहीं है और सारे पैसों की रसीद आपको दी जायेगी, विधायक जी भड़क गये और पचास हजार रुपयों की एक गड्डी फेंक कर यह कहते हुए चले आये कि रजिस्‍ट्रेशन पेपर मेरी कोठी पर भिजवा देना।
एआरटीओ ने गाड़ी का रजिस्‍ट्रेशन तो करा दिया और विधायक जी का सम्‍मान रखते हुए गाड़ी का रजिस्‍ट्रेशन पेपर भी उनकी कोठी पर भेज दिया लेकिन उनका गुनाह यह था कि उन्‍होंने साथ ही करीब साढ़े बाईस हजार रुपए बकाया होने की वो स्‍लिप भी भेज दी जो विधायक जी कम दे आये थे।
कई महीने तक चक्‍कर कटवाने के बाद विधायक जी ने एआरटीओ के कर्मचारी को गाड़ी के रजिस्‍ट्रेशन का बकाया साढ़े बाईस हजार रुपया तो दे दिया लेकिन यहीं से उन्‍होंने एआरटीओ को सबक सिखाने का मन बना लिया।
इसके बाद विधायक जी ने पहले तो मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव की सचिव के रूप में परिवहन विभाग को देख रहीं आईएएस अनीता सिंह से एआरटीओ की झूठी शिकायत की और मथुरा से उनका तबादला करने को कहा, जिस पर अनीता सिंह ने इस आशय के आदेश कर दिये कि जांच के उपरांत कार्यवाही कर अवगत करायें।
बताया जाता है कि एआरटीओ का उत्‍पीड़न करने की बात संज्ञान में आने पर जनपद के ही एक अन्‍य विधायक और पूर्व मंत्री ने एआरटीओ का तबादला रुकवाने में सहयोग किया तथा मुख्‍यमंत्री की सचिव को सच्‍चाई से अवगत कराया।
यहां यह भी जान लेना जरूरी है कि मथुरा जनपद में सत्‍ताधारी दल समाजवादी पार्टी का कोई विधायक नहीं है। जो पांच विधायक मथुरा जपनद से हैं, उनमें दो राष्‍ट्रीय लोकदल से, एक कांग्रेस से, एक बहुजन समाज पार्टी से जबकि एक निर्दलीय हैं।
जाहिर है कि एआरटीओ का उत्‍पीड़न करने तथा उनसे चौथ वसूलने की कोशिश करने वाले विधायक जी भी विपक्ष से ताल्‍लुक रखते हैं।
खुद की पंचम तल तक सीधे एप्रोच बताने वाले विधायक जी जब एआरटीओ का तबादला कराने में सफल नहीं हुए तो उन्‍होंने एआरटीओ को आये दिन कोई न कोई काम बताना और उनकी आड़ में विभागीय उच्‍च अधिकारियों से उनकी शिकायत करना शुरू कर दिया।
बताया गया कि एक विभागीय उच्‍च अधिकारी ने एआरटीओ से कहा कि विधायक जी तुम्‍हारे पीछे पड़े हैं, उनसे सीधे बात क्‍यों नहीं कर लेते कि वो क्‍या चाहते हैं।
एआरटीओ ने अधिकारी की सलाह मानते हुए विधायक जी के एक खास आदमी से संपर्क साधकर कहा कि विधायक जी बेवजह नाराज हैं और मेरी शिकायत करते रहते हैं, उनसे पूछो कि आखिर क्‍या चाहते हैं।
विधायक जी के इस खास आदमी ने जब उनसे बात की तो विधायक जी ने कहा कि उसने मेरी गाड़ी के रजिस्‍ट्रेशन का पूरा पैसा वसूल लिया, अब जब तक मैं उससे उसका दस गुना नहीं वसूल लूंगा चैन से नहीं बैठूंगा। उससे कहो कि खैर चाहता है तो कोठी पर आकर मिल ले।
इतनी जानकारी मिलते ही एआरटीओ ने समझदारी से काम लेना शुरू कर दिया और उनके आदमी से कहा कि इतनी सी बात के लिए विधायक जी नाराज हो रहे हैं। जो पैसा मैंने लिया था, वो गाड़ी के रजिस्‍ट्रेशन का था जिसकी पूरी रसीद कटती है। बाकी उनकी सेवा करने को हमने कहां मना किया, वह सीधे बताएं कि उन्‍हें क्‍या चाहिए।
इसके बाद विधायक जी ने खुद फोन करके एआरटीओ से कहा कि कोठी पर आकर मिल लो। शाम 4 से 5 बजे के बीच आ जाओ।
इस बीच एआरटीओ ने विधायक के खास आदमी से पूछा कि विधायक जी यह तो बताएं कि कितना पैसा चाहते हैं, ताकि मैं इंतजाम करके ला सकूं। खास आदमी द्वारा यह बताये जाने पर कि कितने का तो मुझे पता नहीं लेकिन वह कह रहे थे कि पार्टी फंड के नाम पर लेना है।
दरअसल, विधायक की मंशा का पता लगते ही एआरटीओ ने उनकी व उनके खास आदमी की कॉल रिकॉर्ड करना शुरू कर दिया, जिससे सारी बातें स्‍पष्‍ट हो सकें।
विधायक द्वारा निर्धारित किये गये समय से थोड़ा लेट हो जाने पर एआरटीओ ने उनके खास आदमी को फोन करके बताया कि नोएडा चले जाने की वजह से वह इंग्‍लिश टाइम पर नहीं पहुंच सके, थोड़ा लेट हो गये हैं। विधायक जी से पूछ लें कि अब आ जाएं। इसके बाद विधायक जी के खास आदमी ने उनसे दस मिनट में जवाब देने को कहा। यह सारा वाकया बीते कल यानि 2 जुलाई का है।
दस मिनट से पहले ही खास आदमी ने बताया कि विधायक जी रात को दस बजे या सुबह 9 बजे मिलने को कह रहे हैं। बाकी समय आगन्‍तुकों की भीड़ रहती है इसलिए मिलना संभव नहीं होगा।
इस बातचीत के तुरंत बाद खुद विधायक जी ने खुद करीब पौने पांच बजे एआरटीओ को फोन किया और कहा कि उनके घर पर इस समय सत्‍यनारायण की पूजा चल रही है लिहाजा वह रात 10 बजे या सुबह 9 बजे आ जाएं।
रात में बहुत देर से पहुंच पाने में असमर्थता जताने तथा आज यानि 3 जुलाई को सुबह 10 बजे से डीएम साहब के साथ कोई मीटिंग में व्‍यस्‍त होने संबंधी जानकारी देने पर विधायक जी ने एआरटीओ से कहा कि मैं तुम्‍हारे लिए रात का समय आधा घंटा पहले का रख देता हूं लेकिन आज ही मिल लो।
एआरटीओ ने विधायक से रात साढ़े नौ बजे मिलने को कह तो दिया लेकिन मिलने नहीं पहुंचे क्‍योंकि वह उनकी मंशा जान चुके थे।
रात ठीक साढ़े नौ बजे फिर विधायक जी ने एआरटीओ को फोन किया और पूछा कि वह आये क्‍यों नहीं। इस पर एआरटीओ ने आने में असमर्थता जाहिर करते हुए कहा कि वह किसी और दिन मिल लेंगे।
इस संबंध में जब ”लीजेंड न्‍यूज़” ने उत्‍तर प्रदेश के परिवहन मंत्री और मथुरा जनपद के प्रभारी मंत्री दुर्गाप्रसाद यादव से बात की तो उन्‍होंने कहा कि सत्‍ता पक्ष या विपक्ष का कोई जनप्रतिनिधि किसी अधिकारी से पार्टी फंड में पैसा लेने का हकदार नहीं है। माननीय विधायक जो कर रहे हैं, वह सीधे-सीधे चौथ वसूली की परिभाषा में आता है।
यह निश्‍चित ही एक गंभीर मामला है और यदि एआरटीओ इसकी शिकायत करते हैं तो उस पर पूरा संज्ञान लिया जायेगा। एआरटीओ चाहें तो विधायक के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज करा सकते हैं।
उल्‍लेखनीय है कि उत्‍तर प्रदेश के ही जनपद मिर्जापुर में 12 जून के दिन आरटीओ चुन्‍नीलाल को अपने कैंप कार्यालय में बुलाकर दुर्व्‍यवहार करने तथा मारपीट करने के मामले में प्रदेश के बाल विकास पुष्‍टाहार राज्‍य मंत्री कैलाश चौरसिया सहित तीन लोगों के खिलाफ केस रजिस्‍टर्ड करने का आदेश वहां की सीजेएम कोर्ट ने हाल ही में दिया है।
आरटीओ से मंत्री महोदय द्वारा दुर्व्‍यवहार व मारपीट करने के इस मामले में परिवहन विभाग के कर्मचारियों ने कई दिन तक आंदोलन भी किया था लेकिन कटरा कोतवाली पुलिस ने मंत्री महोदय के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की। मजबूरीवश आरटीओ को कोर्ट की शरण लेनी पड़ी और तब वहां से एफआईआर दर्ज करने के आदेश हुए।
जो भी हो, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं कि कृष्‍ण की जन्‍मस्‍थली से सत्‍ताधारी समाजवादी पार्टी का कोई विधायक न होने तथा संगठन में भी कोई दमदारी न होने के कारण उक्‍त विधायक इसका भरपूर दुरुपयोग कर रहे हैं।
मथुरा जनपद में हर विकास कार्य का श्रेय लेने के लिए पहचान बना चुके उक्‍त विधायक का दावा है कि अखिलेश सरकार में भी वह सब-कुछ करा सकते हैं। पंचम तल के दरवाजे उनके लिए हर वक्‍त खुले रहते हैं और मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव हों या सपा के कद्दावर मंत्री शिवपाल सिंह तथा प्रोफेसर रामगोपाल यादव, कोई उनकी बात नहीं टाल सकता। यहां तक कि मुलायम सिंह भी उनका अतिरिक्‍त सम्‍मान करते हैं।
अब देखना यह है कि पंचम तल तक पहुंच रखने वाले ये विधायक जी चौथ न देने की कसम खा चुके एआरटीओ से अपनी कथनी के मुताबिक अपनी गाड़ी के रजिस्‍ट्रेशन का दस गुना पैसा वसूल पाते हैं या फिर उन्‍हें एआरटीओ के सामने मुंह की खानी पड़ती है।
डर ये भी है कि विधायक जी की जिद भरी हरकत कहीं उन्‍हें और नीचा न दिखा दे और अब तक जो कथित छवि उन्‍होंने अपनी बना रखी है, वह राजनीति के चौथेपन में मटियामेट न हो जाए।
-लीजेंड न्‍यूज़ विशेष

रविवार, 28 जून 2015

शांति भूषण का दावा: आडवाणी चाहते थे कायम रहे आपातकाल लगाने की ताकत

नई दिल्‍ली। देश के अंदर आपातकाल लगाने वाली पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ मुकद्दमा लड़ने और जीतने वाले वकील शांति भूषण ने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा है कि बीजेपी के सीनियर लीडर लालकृष्ण आडवाणी चाहते थे कि सरकार के पास आपातकाल लगाने की ताकत मौजूद रहे।
लालकृष्ण आडवाणी ने इसके लिए संविधान के 44वें संशोधन का विरोध किया था।
शांति भूषण का बयान इसलिए भी अहम है क्योंकि आडवाणी इमरजेंसी के खिलाफ खुलकर बोलते रहे हैं। पिछले दिनों आडवाणी ने आशंका जताई थी कि देश में फिर से आपातकाल लग सकता है।
इमरजेंसी और राजनीतिक से जुड़े सवालों को लेकर रू-ब-रू हुए पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील शांति भूषण से। पेश है बातचीत के मुख्य अंशः
सवाल- 40 साल पहले 25 जून 1975 को कांग्रेस की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश पर आपातकाल थोपा था। अब आप जब मुड़कर देखते हैं तो लोकतंत्र को किस मायने में मजबूत और किस मायने में कमजोर पाते हैं?
जवाब- उस समय संविधान में ही प्रावधान था कि सरकार अपनी जरूरत के अनुसार जनाधिकारों को छीन सकती है इसलिए इंदिरा ने इतनी आसानी से मुल्क को तानाशाही के शासन में धकेल दिया। अब ऐसा नहीं है। 1977 में मैं जब कानून मंत्री बना तो 44वां संविधान संशोधन हुआ। संशोधन में दर्ज हुआ कि आपातकाल लगाए जाने के बावजूद भी संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 को खत्म नहीं किया जाएगा जबकि 1975 में इंदिरा ने इन्हीं दोनों अनुच्छेदों को हम से ले लिया। अनुच्छेद 19 में दो बेहद महत्वपूर्ण अधिकार हैं। पहला, अभिव्यक्ति का अधिकार जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता भी शामिल है और दूसरा है बिना हथियार शांतिपूर्वक एकत्रित होकर विरोध करने का अधिकार। वहीं अनुच्छेद 21 के तहत प्रावधान है कि अगर किसी को गलत तरीके से गिरफ्तार किया जाए तो वह अदालत में ‘हैबियस कॉरपस याचिका’ दाखिल कर अदालत से रिहाई की अपील कर सकता है। साफ है कि अब कोई सरकार आपातकाल लगाकर जनता के बुनियादी अधिकारों पर ताला नहीं जड़ सकती ।
सवाल- 1975 के बाद क्या कभी ऐसा हुआ जब आपको लगा हो कि अगर 44वां संविधान संशोधन नहीं हुआ होता देश में आपातकाल लग सकता था?
जवाब- साल 2011 में अन्ना आंदोलन से खौफजदा कांग्रेस सरकार दोबारा देश पर आपातकाल लाद सकती थी। एक हफ्ते के भीतर जिस तरह देश में भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन फैला उससे सरकार आपातकाल के बाद पहली बार घबराई थी। जनता से लेकर मीडिया तक कोई उनके साथ नहीं था, कांग्रेस पार्टी के नेताओं का आत्मविश्वास लगातार डांवाडोल हो रहा था। वे इतने घबराए कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की ज्वाइंट ड्राफ्टिंग कमेटी की मांग तक को मान गए जिसके बारे में उनका कहना था कि यह गैर संवैधानिक है। पर 44वें संशोधन के बाद अब सरकार के पास ऐसा कोई अधिकार ही नहीं है कि वह अभिव्यक्ति, प्रेस की आजादी और अदालत जाने के अधिकार को छीन सके।
सवाल- तो क्या देश में अब आपातकाल असंभव है?
जवाब- बेशक, देश में आपातकाल असंभव है। यहां तक कि प्रधानमंत्री मोदी भी बहुमत के सरकार के बूते आपातकाल दोहराना चाहें तो वह एक दिवास्वप्न ही साबित होगा। लोगों की लोकतांत्रिक चेतना, मीडिया और संचार माध्यमों की पकड़ देश में विद्रोह करा देगी पर आपातकाल को नहीं सह पाएगी।
सवाल- पर आप लोगों ने संविधान संशोधन के दौरान आपातकाल का प्रावधान ही क्यों नहीं खत्म कर दिया?
जवाब- आपातकाल से सरकार को कुछ अधिकार मिलते हैं। अगर कोई सरकार आपातकाल लगाकर लोकतंत्र को खत्म नहीं कर पाती और वह आपातकाल देश के मुश्किल वक्त की जरूरत है, फिर इसमें मुझे कोई बुराई नहीं जान पड़ती। उस पर ज्यादा हायतौबा नहीं मचाया जाना चाहिए। कई बार आपातकाल देश के लिए जरूरी भी हो सकता है, रेयर ऑफ द रेयरेस्ट मामलों में, खासकर युद्ध की स्थितियों में।
सवाल- फिर आडवाणी की आशंका ‘दुबारा भी लगाया जा सकता है आपातकाल’ का क्या आधार है?
जवाब- नेता दो तरह के होते हैं। एक वो जो सिर्फ अपना और अपनी पार्टी का फायदा देखते हैं, दूसरे वो जिन्हें स्टेट्समैन कहते हैं। अटल बिहारी वाजपेयी स्टेट्समैन थे जबकि लालकृष्ण आडवाणी अपना भला चाहने वालों में हैं। जनता पार्टी की सरकार में जब वो मेरे साथ कैबिनेट मंत्री थे, तब भी उन्होंने 42 वें संशोधन का विरोध किया। वकील राम जेठमलानी और आडवाणी जी का कहना था कि 42वें संशोधन का हू-ब-हू लागू किया जाए अन्यथा उसे पूरे तौर पर खत्म कर दिया जाए। मेरा कहना था जो उसकी अच्छी चीजें हैं उसे लेने में हर्ज क्या है? कैबिनेट ने उनके सुझाव को तवज्जो नहीं दी थी। अब 40 साल बाद उन्हें आपातकाल का डर सता रहा है। मुझे लगता है कि आडवाणी जी ने संविधान का 44वां संशोधन पढ़ा ही नहीं, अन्यथा ऐसा नहीं कहते। मेरा विनम्र सुझाव है कि एक बार वह संशोधन को ध्यान से पढ़ लें, जवाब उन्हें स्वत: मिल जाएगा।
सवाल- कई नेता, राजनीतिक विश्लेषक मान रहे हैं, लिख रहे हैं कि देश में अघोषित आपातकाल जैसी स्थितियां हैं?
जवाब- देखिए,सरकारों के काम करने के दो तरीके हैं। पहला लोकतांत्रिक होकर, सबको शामिल कर और दूसरा है अकेले के फैसले को ही नियम बताकर। लोकतांत्रिक तरीके में विकास की गति थोड़ी धीमी रहती है लेकिन समाज के सभी वर्गों का ख्याल रखा जाता है। वहीं अकेले की शासन प्रणाली में व्यक्ति ही कानून और अध्यादेश हो जाता है, हालांकि विकास की गति तेज होती है। मोदी सरकार भी फिलहाल एकल नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ रही है। अपने ही मंत्रियों-नेताओं के पर कतर रही है, मगर इसे अघोषित आपातकाल कहने की बजाए प्रैक्टिस कह सकते हैं। जैसे-जैसे लोगों का मन पकता जाएगा मोदी के तेवर भी बिखरते जाएंगे।
सवाल- आपको इंदिरा गांधी के खिलाफ पैरवी के लिए खड़े होने का मौका कैसे मिला?
जवाब- 1971 के लोकसभा चुनाव के दौरान मैं उत्तर प्रदेश का एडवोकेट जनरल था। तभी मुझसे राजनारायण मिले। उन्होंने याचिका में मुख्य मुद्दा ‘केमीकली टिंटेड बैलेट पेपर’ का उठाया था। उनका कहना था कि इंदिरा ने बैलेट पर रूस से मंगाए केमीकल का इस्तेमाल किया है। इस संदर्भ में उन्होंने लखनऊ के एक-दो वैज्ञानिकों से मेरी मुलाकात कराई। वैज्ञानिकों ने अल्ट्रा वॉयलेट किरणों के जरिए कुछ दिखाया पर मैंने कहा, इससे कुछ नहीं होना है। फिर मैंने कुछ आधार बनाए। चुनावी सभाओं-प्रचारों में सरकारी धन का दुरुपयोग, एयरफोर्स के हेलीकॉप्टरों से इंदिरा का चुनावी दौरा, अदालत में मुद्दा बना जिसके आधार पर 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 1971 के चुनाव को अवैध और अमान्य करार दिया।
सवाल- तो क्या इंदिरा गांधी गलत तरीके से जीती थीं?
जवाब- सरकारी धन का इस्तेमाल किया था पर जीत की वजह कुछ और थी। इंदिरा ने कहा, ‘ये लोग कहते हैं इंदिरा हटाओ, मैं कहती हूं गरीबी हटाओ।’ और दूसरा उन्होंने निजी बैंकों का सरकारीकरण कर दिया। ये दोनों आपस में जुड़ गए। इंदिरा के प्रचार तंत्र से गरीबों ने पूछा कैसे हटेगी गरीबी, उनका जवाब था इसलिए तो निजी बैंकों को सरकारी किया है। गरीबों को लगा अब बैंक सरकारी हो गए, जो रुपए पहले एक आदमी के थे वो सबके हो गए। इसकी तुलना आप मोदी सरकार के उस वादे से कर सकते हैं जिसमें उन्होंने कहा था कि स्विस बैंक से कालाधन लाकर हर व्यक्ति के खाते में 15 लाख जमा होंगे।
सवाल- लोग मोदी की तुलना इंदिरा गांधी से करते हैं?
जवाब- मैं भी मानता हूं कि मोदी में बहुत कुछ इंदिरा गांधी जैसा है। संसाधनों पर पकड़, निर्णय पर एकाधिकार, विरोध करने वालों को हाशिए पर डालना, मजबूत नेताओं को कमजोर बनाते जाना और सबके ऊपर छा जाने की फितरत जैसी तमाम चीजें इंदिरा जैसी दिखती हैं पर वह इंदिरा का आपातकाल नहीं लागू कर सकते कि वह 1975 में नहीं बल्कि 2014 में शासन कर रहे हैं।
क्या है संविधान का 44 वां संशोधन?
संविधान में 44वां संविधान संशोधन 1977 में किया गया था। संशोधन में दर्ज किया गया कि देश में आपातकाल लगाए जाने के बावजूद भी संविधान के अनुच्छेद 19 और 21 को खत्म नहीं किया जाएगा।

शनिवार, 27 जून 2015

फर्जीवाड़ा: एक ही वक्त पर 9 कॉलेजों में पढ़ा रही थी टीचर

गोरखपुर। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर यूनिवर्सिटी से जुड़े डिग्री कॉलेजों में पढ़ाने वाली 100 महिला टीचर मुश्किल में हैं। इनमें से हर एक टीचर एक ही समय में अलग-अलग कॉलेजों में पढ़ाती पाई गई हैं। फर्जीवाड़े की आरोपी एक टीचर तो एक ही समय पर अलग-अलग जिलों में फैले नौ डिग्री कॉलेजों में पढ़ाती पाई गई है। यूनिवर्सिटी ने पहले ऐसी 10 महिला टीचरों के खिलाफ कार्यवाही करने का फैसला किया है।
फर्जीवाड़े का खुलासा उस वक्त हुआ, जब गृह विज्ञान विषय के परीक्षकों की कमी हुई। कुलपति प्रो. अशोक कुमार ने जब मातहतों से जानकारी ली तो पता चला कि 259 कॉलेजों में गृह विज्ञान पढ़ाने के लिए 325 टीचर हैं। कॉलेजों से जब सभी टीचरों के बारे में जानकारी मंगाई गई तो पता चला कि एक ही नाम की टीचर कई कॉलेजों में एक ही वक्त पर पढ़ा रही है।
35 कॉलेजों में पढ़ा रहीं 10 टीचर
कार्यवाही के लिए तैयार पहली लिस्ट में जिन 10 शिक्षिकाओं का नाम है, वे 35 अलग-अलग कॉलेजों में पढ़ा रही हैं। इस सवाल का जवाब कोई नहीं दे सकेगा कि शिक्षिका एक से दूसरे और दूसरे से तीसरे कॉलेज तक एक ही वक्त पर किस तरह से पहुंचती हैं।
अलग-अलग जिलों में एक ही वक्त मौजूद
जिन महिला टीचरों पर कार्यवाही की तैयारी है, उनमें डॉ. किरण यादव का नाम भी शामिल है। यूनिवर्सिटी को जांच से पता चला कि वह नौ कॉलेजों में गृह विज्ञान पढ़ाती हैं। एक ही वक्त पर वह देवरिया जिले के तीन कॉलेजों के अलावा गोरखपुर, महराजगंज, कुशीनगर और बस्ती के भी एक-एक कॉलेज में क्लास लेती दिखाई गई हैं। बाकी टीचरों की सूची भी गड़बड़झाले की पोल खोल देती है।
क्या कहते हैं कुलपति?
डीडीयू गोरखपुर यूनिवर्सिटी के कुलपति डॉ. अशोक कुमार का कहना है कि सख्त कार्यवाही की जाएगी ताकि भविष्य में इस तरह के फर्जीवाड़े को रोका जा सके।
यूनिवर्सिटी प्रशासन ने इस मामले में अब तक 35 कॉलेजों को नोटिस जारी किया है। इनसे जवाब न मिलने या जवाब के संतोषजनक न होने पर सख्त कार्यवाही करने का भरोसा कुलपति दे रहे हैं। संबंधित शिक्षिकाओं को अयोग्य घोषित कर कॉलेज की संबद्धता भी खत्म की जा सकती है। कुलपति ने इसके साथ ही सभी कॉलेजों और उनमें पढ़ाने वाले शिक्षक-शिक्षिकाओं का डाटा बैंक बनाने का भी आदेश दिया है ताकि इस तरह के फर्जीवाड़े को रोका जा सके।
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