शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

कल्‍पतरू ग्रुप का खेल खत्‍म, देश से भागने की कोशिश में है जयकृष्‍ण राणा

मथुरा बेस्‍ड कल्‍पतरू ग्रुप का खेल खत्‍म हो गया लगता है, हालांकि ग्रुप से जुड़े कुछ लोग अब भी विभिन्‍न स्‍तर पर सफाई देने की कोशिश में लगे हैं किंतु अधिकांश लोगों ने ग्रुप का खेल खत्‍म होने की बात स्‍वीकार करनी शुरू कर दी है।
ग्रुप का मथुरा से प्रकाशित एकमात्र सुबह का अखबार कल्‍पतरू एक्‍सप्रेस तो इस महीने की शुरूआत में ही बंद हो गया था किंतु अब बाकी प्रोजेक्‍ट भी बंद होने लगे हैं। अधिकांश प्रोजेक्‍ट के कर्मचारियों ने भी ऑफिस आना छोड़ दिया है और जितने लोग ऑफिस पहुंच भी रहे हैं, वह सिर्फ इस प्रयास में हैं कि किसी भी तरह अपना रुका हुआ वेतन हासिल कर लिया जाए।
ग्रुप से जुड़े सूत्रों के मुताबिक ग्रुप के विभिन्‍न प्रोजेक्‍ट्स तथा कंपनियों में अब तक कार्यरत तमाम लोग ऐसे हैं जिन्‍हें पिछले छ:-छ: महीने से वेतन नहीं मिला। ऐसे लोगों के लिए परिवार का गुजर-बसर करना तक मुश्‍किल हो चुका है। 50-50 हजार रुपया प्रतिमाह के वेतन पर कार्यरत एक-एक व्‍यक्‍ति का इस तरह ग्रुप पर तीन-तीन लाख रुपया बकाया है लेकिन न कोई उनकी ओर देखने वाला है और न सुनने वाला।
बताया जाता है कि ग्रुप का जहाज डूबने की आंशका होते ही ग्रुप के चेयरमैन जयकृष्‍ण राणा की अब तक चमचागीरी करने में लिप्‍त रहे अधिकांश लोग गायब हो चुके हैं। ये वो लोग हैं जिन्‍हें जयकृष्‍ण राणा द्वारा अपना विश्‍वस्‍त तथा वफादार मानते हुए न केवल अच्‍छा खासा वेतन दिया जाता था बल्‍कि लग्‍ज़री गाड़ियां भी उपलब्‍ध करा रखी थीं। जयकृष्‍ण राणा के मुंहलगे कई कर्मचारी तो खुद टाटा सफारी इस्‍तेमाल किया करते थे और परिवार के लिए ग्रुप से ही छोटी गाड़ियां ले रखी थीं।
सूत्रों का कहना है चमचागीरी पसंद करने वाला जयकृष्‍ण राणा अब खुद भी अपने चुरमुरा (फरह) स्‍थित उस ऑफिस में नहीं बैठ रहा जहां कभी पूरे लाव-लश्‍कर तथा निजी सुरक्षा गार्ड्स सहित रुतबे के साथ बैठा करता था।
बताया जाता है कि कल्‍पतरू ग्रुप का जहाज डूबने की जानकारी उसके मथुरा से बाहर के निवेशकों को भी हो चुकी है और वो लोग चुरमुरा पहुंचने लगे हैं।
बताया जाता है कि इन लोगों ने वहीं एक किस्‍म का धरना दे रखा है और यही कारण है कि जयकृष्‍ण राणा चुरमुरा नहीं जा रहा।
दरअसल, उसे मालूम है कि एक ओर कर्मचारी तथा दूसरी ओर निवेशक उससे पैसों की मांग करेंगे जो वह देना नहीं चाहता।
पता लगा है कि मथुरा की चंदन वन कॉलोनी में जयकृष्‍ण राणा ने कोई ऑफिस जैसा गोपनीय निवास बना रखा है, जहां वह अपने खास गुर्गों तथा सुरक्षा बलों के साथ बैठता है। यहां उसके गुर्गों तथा सुरक्षाबलों की इजाजत के बिना परिन्‍दा भी पर नहीं मार सकता। इस ऑफिसनुमा घर की जानकारी बहुत ही कम लोगों को है।
यदि कोई कर्मचारी या निवेशक किसी तरह जानकारी हासिल करके वहां तक पहुंचने का दुस्‍साहस करता है तो राणा के गुर्गे उसे फिर उस ओर मुंह न करने की चेतावनी के साथ लौटा देते हैं। साथ ही यह भी समझा देते हैं कि यदि फिर कभी इधर आने की जुर्रत की तो गंभीर परिणाम भुगतना पड़ सकता है।
राणा के अति निकटस्‍थ सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि राणा सहाराश्री की तरह कानून की गिरफ्त में नहीं आना चाहता और इसके लिए अपने खास लोगों से सलाह-मशविरा कर रहा है।
सूत्रों का कहना है कि जयकृष्‍ण राणा इस फिराक में है कि किसी भी तरह एकबार देश से बाहर निकल लिया जाए और फिर कभी इधर मुड़कर न देखा जाए। इसके लिए राणा ने अपने पसंदीदा एक मुल्‍क में पूरा बंदोबस्‍त भी कर लिया है, बस उसे इंतजार है उस मौके का जिससे वह सबको चकमा देकर बाहर निकल सके।
एक ओर सीक्‍यूरिटीज एंड एक्‍सचेंच बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) का गले तक कस चुका शिकंजा, दूसरी ओर निवेशकों का दबाव और इसके अलावा कर्मचारियों का हर दिन बढ़ता वेतन…इन सबसे निपटने की क्षमता अब कल्‍पतरू ग्रुप और उसके चेयरमैन जयकृष्‍ण राणा में बची नहीं है लिहाजा अब उसके लिए दो ही रास्‍ते शेष हैं।
पहला रास्‍ता है सारी स्‍थिति को सामने रखकर कानूनी प्रक्रिया का सामना करे और दूसरा रास्‍ता है कि सबकी आंखों में धूल झोंककर भाग खड़ा हो।
अब देखना यह है कि जयकृष्‍ण राणा को इनमें से कौन सा रास्‍ता रास आता है, हालांकि उसके गुर्गे अब भी यही कहते हैं कि अखबार भी शुरू होगा और कर्मचारियों को उनका पूरा वेतन भी दिया जायेगा परंतु हालात कुछ और बयां कर रहे हैं।
-लीजेंड न्‍यूज़

गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015

सात भारतीय शहर पोर्न सर्च करने में सबसे अव्वल

नई दिल्ली। बैन हो या न हो लेकिन सात भारतीय शहर पोर्न सर्च करने में अव्वल हैं. भारत में पोर्न सर्च को लेकर गूगल सर्च का जो आंकड़ा सामने आया है, वह काफी चौंकाने वाला है.
गूगल ट्रेंड के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर में पोर्न सर्च करने वाले छह प्रमुख शहर भारत के हैं.
देश की राजधानी दिल्ली में सबसे ज्यादा गूगल पर पोर्न सर्च किया गया. इसके बाद पुणे, मुंबई, हावड़ा, उन्नाव, कुआलालंपुर और बेंगलुरु हैं.
आंकड़ों के मुताबिक लोगों ने कामोत्तेजक चीजें सर्च करने के साथ ही अन्य सामग्री भी सर्च की.
हालांकि समाजशास्त्री ऑनलाइन एक्टिविटी को ऑफलाइन गतिविधियों से जोड़ने से बिल्कुल इंकार करते हैं.
तो इंटरनेट पर ये सब सर्च किया जाता है…
वर्ष 2008 से अब तक ‘एनिमल पोर्न’ सर्च करने में पुणे के लोग आगे हैं. उनके बाद क्रमश: दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु के लोगों ने भी इसे खूब सर्च किया जबकि रेप के वीडियो सर्च करने में कोलकाता के लोग सबसे आगे हैं.
इसके बाद हावड़ा, दिल्ली, अहमदाबाद और पुणे के लोगों ने भी इस कैटेगरी में मौजूदगी दर्ज कराई.
हैरान करने वाली बात ये सामने आई है कि उत्तर प्रदेश के एक छोटा सा शहर उन्नाव में सबसे ज्यादा चाइल्ड पोर्न सर्च किया गया.
ये भी है एक वजह…
हालांकि गूगल ट्रेंड के ये आंकड़े एक खास यूजर ग्रुप के आधार पर लिए गए हैं. साथ ही दुनिया के तमाम शहरों के आंकड़े इसमें शामिल नहीं है, जिसके चलते भारत के शहर सबसे ऊपर हैं. क्रिप्टोग्राफी के एक्सपर्ट अजित हट्टी ने कहा कि ये आंकड़े सही हैं, लेकिन पूरे नहीं क्योंकि चीन, रूस और उत्तरी कोरिया जैसे देशों में गूगल का इस्तेमाल नहीं होता, अगर होता भी है तो बहुत कम. इसके अलावा अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में लोग अलग-अलग सर्च इंजन इस्तेमाल करते हैं.

शनिवार, 3 अक्टूबर 2015

कल्‍पतरू ग्रुप का अखबार कल्‍पतरू एक्‍सप्रेस बंद

-रातों-रात सड़क पर आ गए सैकड़ों पत्रकार और कर्मचारी -चार महीने से ग्रुप ने नहीं दिया पत्रकारों व कर्मचारियों को वेतन-ग्रुप पर 6 हजार करोड़ की देनदारी-सरकार और सेबी ने भी कस रखा है शिकंजा -चुरमुरा ऑफिस भी पूरी तरह कर्ज में डूबा
मथुरा से प्रकाशित सुबह का एकमात्र अखबार कल्‍पतरू एक्‍सप्रेस आखिर बंद हो गया। पिछले चार दिनों से उसका प्रकाशन बंद है।
अगस्‍त 2010 में शुरू हुआ दैनिक कल्‍पतरू एक्‍सप्रेस मथुरा के कस्‍बा फरह स्‍थित चुरमुरा से प्रकाशित होता था लेकिन मात्र पांच साल में अखबार का प्रकाशन बंद हो जाने के कारण उसमें कार्यरत सैकड़ों कर्मचारी सड़क पर आ गए क्‍योंकि अखबार के मालिकानों ने कर्मचारियों को अखबार बंद किये जाने की कोई पूर्व सूचना नहीं दी थी।
बताया जाता है कि कल्‍पतरू ग्रुप के प्रकाशन दैनिक कल्‍पतरू एक्‍सप्रेस के मालिकानों ने पिछले जून महीने से अखबार के कर्मचारियों को वेतन नहीं दिया है किंतु कर्मचारी यह उम्‍मीद पाले बैठे थे कि देर-सवेर उन्‍हें उनका वेतन दे दिया जायेगा।
अखबार से जुड़े सूत्रों की मानें तो अखबार का लखनऊ संस्‍करण अब भी प्रकाशित हो रहा है जो एक प्रमुख दैनिक अखबार की प्रेस में छपवाया जाता है जबकि मथुरा के चुरमुरा में अखबार की अपनी प्रेस है।
चुरमुरा से प्रकाशित कल्‍पतरू एक्‍सप्रेस मथुरा जनपद के अलावा महानगर आगरा, अलीगढ़, हाथरस, इटावा, औरैया तथा कासगंज आदि तक प्रसारित किया जाता था और इन सभी जिलों में कल्‍पतरू के ब्‍यूरो ऑफिस थे किंतु अखबार बंद होने के बाद उन पर भी ताला लगने की आशंका व्‍यक्‍त की जा रही है।
सबसे बड़ी समस्‍या इन सभी जिलों में मिलाकर काम करने वाले उन सैकड़ों पत्रकारों तथा अन्‍य दूसरे कर्मचारियों के सामने खड़ी हो गई है जो रातों-रात बेरोजगार हो गए और वो भी उस स्‍थिति में जब पिछले चार महीने से उन्‍हें वेतन नहीं मिला था।
बताया जाता है मुख्‍य रूप से चिटफंड कंपनी संचालित करने वाले कल्‍पतरू ग्रुप के मुखिया जयकृष्‍ण सिंह राणा को अपना जहाज डूबने का अंदेशा तभी हो गया था जब अगस्‍त 2010 में उसने कल्‍पतरू एक्‍सप्रेस के नाम से सुबह का अखबार निकालना शुरू किया था।
दरअसल, जयकृष्‍ण सिंह राणा ने अखबार की शुरूआत ही अपनी चिटफंड कंपनी तथा खुद को सरकार व सिक्‍यूरिटीज एंड एक्‍सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) की वक्रदृष्‍टि से बचाये रखने के लिए की थी और वह पांच साल तक उसमें सफल भी रहे किंतु अखबार निकालने का कोई अनुभव न होने तथा चाटुकार व अनुभवहीन लोगों की फौज के हाथ में ही अखबार की कमान सौंप देने के कारण अखबार की हालत दिन-प्रतिदिन बिगड़ती गई।
विश्‍वस्‍त सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार आज की तारीख में कल्‍पतुरू ग्रुप पर कुल मिलाकर करीब 6 हजार करोड़ रुपयों की देनदारी है जिसे चुका पाना ग्रुप के लिए संभव नहीं है, हालांकि उसने काफी पैसा जमीन-जायदाद में निवेश कर रखा है किंतु अधिकांश जमीन-जायदादों पर विभिन्‍न फाइनेंस कंपनियों एवं बैंकों का कर्ज है।
मथुरा के फरह में चुरमुरा स्‍थित जिस भूखंड तथा इमारत से अखबार का प्रकाशन होता था, वह समूची जायदाद भी कर्ज में डूबी हुई है और बैंकों ने उसकी रिकवरी के प्रयास शुरू कर दिए हैं।
यह भी पता लगा है कि अखबार के अलावा कल्‍पतरू मोटल्‍स लिमिटेड नामक कल्‍पतरू ग्रुप की दूसरी कंपनी भी खस्‍ताहाल हो चुकी है और उसके कर्मचारियों को भी समय पर वेतन नहीं दिया जा रहा।
कल्‍पतरू ग्रुप के व्‍यवहार से क्षुब्‍ध उसके बहुत से कर्मचारी तो अब कानूनी कार्यवाही करने की तैयारी करने लगे हैं क्‍योंकि उन्‍हें किसी स्‍तर से कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया जा रहा।
”लीजेंड न्‍यूज़” ने भी इन सभी मामलों में कल्‍पतरू ग्रुप का पक्ष जानने की काफी कोशिशें कीं किंतु कोई व्‍यक्‍ति ग्रुप का पक्ष रखने के लिए सामने नहीं आया।
ग्रुप से जुड़े अधिकारी और कर्मचारियों का यहां तक कहना है कि यही हाल रहा तो ग्रुप के मुखिया तथा निदेशकों का हाल सहाराश्री के मुखिया सुब्रत राय सहारा जैसा होने की प्रबल संभावना है।
उनका कहना है कि जब अकूत संपत्‍ति के मालिक सहाराश्री सुब्रत राय एक लंबे समय से जेल की सलाखों के पीछे होने के बावजूद 10 हजार करोड़ रुपए सुप्रीम कोर्ट में जमा नहीं करा पा रहे तो कल्‍पतरू ग्रुप के मुखिया जयकृष्‍ण सिंह राणा 6 हजार करोड़ रुपए कैसे चुका पायेंगे।
जाहिर है कि ऐसे में उनका भी हश्र सहाराश्री जैसा होने की पूरी संभावना है लेकिन अफसोस की बात यह है कि उनके साथ सैकड़ों वो कर्मचारी भी बर्बादी के कगार पर जा पहुंचे हैं जिनका कोई दोष नहीं है और जो सिर्फ और सिर्फ अपनी जॉब के लिए उनके कारनामों की ओर से आंखें बंद करके अपनी ड्यूटी को अंजाम देते रहे।
-लीजेंड न्‍यूज़

सोमवार, 28 सितंबर 2015

खतरनाक संकेत है खाकी के खौफ का खत्‍म होते जाना

खाकी के खौफ का खत्‍म होते जाना उत्‍तर प्रदेश के लिए एक खतरनाक संकेत है। हालांकि प्रदेश की सत्‍ता पर काबिज समाजवादी पार्टी ऐसा नहीं मानती। मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव की मानें तो प्रदेश की कानून-व्‍यवस्‍था जहां दूसरे प्रदेशों से बेहतर है, वहीं पुलिस भी विपरीत परिस्‍थितियों के बावजूद अच्‍छा काम कर रही है।
मुख्‍यमंत्री और समाजवादी पार्टी क्‍या कहती है, इस पर फिलहाल गौर न करके वास्‍तविकता पर ध्‍यान दिया जाए तो पुलिस की प्रदेश में कहीं न कहीं आए दिन होने वाली मजामत यह साबित करने के लिए काफी है कि खाकी का अब न तो इकबाल बुलंद रहा और न उसका बदमाशों के मन में खौफ बाकी है।
अब सवाल यह पैदा होता है कि ऐसी परिस्‍थितियां पैदा कैसे हुईं कि जिस खाकी के खौफ से कभी बड़े-बड़े कुख्‍यात बदमाशों की जान सूख जाती थी, उसी खाकी पर अब खास ही नहीं आम आदमी भी हमलावर हो जाता है।
नि: संदेह ऐसी परिस्‍थितियां पैदा न तो एकसाथ पैदा हुईं हैं और न किसी एक कारण से बनी हैं। इन परिस्‍थितियों के पैदा होने में जितना हाथ राजनेताओं का है, उतना ही पुलिस की उस कार्यप्रणाली का भी है जो अत्‍याचार की श्रेणी में आती है।
पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए कोर्ट से मिले आदेश-निर्देश धूल फांक रहे हैं क्‍योंकि यदि उन आदेश-निर्देशों पर अमल हो जाता है तो पुलिस फिर राजनेताओं के हाथ की कठपुतली नहीं रह जायेगी।
राजनीति और राजनेताओं से संरक्षण प्राप्‍त पुलिस कभी आमजन के लिए निष्‍पक्ष नहीं हो सकती और राजनेता यही चाहते भी हैं।
पुलिस के अचार-व्‍यवहार संबंधी तमाम खामियों को छोड़कर यदि जिक्र किया जाए सिर्फ उसके राजनीतिक दुरुपयोग का तो स्‍थिति इतनी अधिक भयावह है कि ऐसा लगता है जैसे ऊपर से नीचे तक पुलिस का राजनीतिकरण हो चुका है।
बात चाहे पुलिस अधिकारी व कर्मचारियों के ट्रांसफर-पोस्‍टिंग की हो अथवा उनके द्वारा की जाने वाली तफ्तीशों की, हर एक पर राजनीति हावी है। जोनल, रीजनल ही नहीं जिले तक में पुलिस अधिकारियों की पोस्‍टिंग राजनीतिक समीकरणों के हिसाब से की जाती है। थाने और चौकियां भी राजनीतिक दखलंदाजी के शिकार हैं और उन पर जाति विशेष का वर्चस्‍व कायम है।
प्रदेश में शायद ही कोई थाना-चौकी ऐसा बचा हो जिसमें प्रभारी से लेकर दीवान, मोहर्रिर व बीट के सिपाही तक जातिगत आधार पर बंटे हुए न हों।
ये लोग बदमाशों को भी उसी चश्‍मे से देखते हैं कि कौन सा बदमाश किस जाति से ताल्‍लुक रखता है अथवा उसे किस राजनीतिक दल का संरक्षण प्राप्‍त है। बदमाशों के खिलाफ कार्यवाही से पहले इन बातों पर गौर किया जाता है।
जाहिर है कि इन हालातों के चलते कई-कई खेमों में बंटा हुआ फोर्स जब कहीं किसी की गिरफ्तारी या दबिश के लिए प्रोग्राम बनाता है तो एकओर जहां उसकी सूचना पहले से लीक हो जाती है वहीं दूसरी ओर वांछित और अपराधी तत्‍वों को पुलिस पर हमलावर होने के लिए भी प्रोत्‍साहित किया जाता है।
बेशक इससे किन्‍हीं खास पुलिसजनों का अपने प्रतिद्वंदी पुलिसकर्मी से बदला लेने का मकसद पूरा हो जाता हो किंतु वैमनस्‍यता काफी बढ़ जाती है।
पुलिसजन बहुत अच्‍छी तरह जानते हैं पुलिस पार्टी पर हमलावर होने तथा उसकी मजामत करने का दुस्‍साहस बड़े से बड़ा बदमाश तब तक नहीं करता जब तक कि उसे पुलिस के अंदर से ही प्रोत्‍साहन न मिले किंतु ठोस सबूतों के अभाव में गद्दारों का कुछ नहीं बिगड़ता।
अधिकारी भी जांच के नाम पर लीपापोती करके मामले को रफा-दफा करने में विश्‍वास ज्‍यादा रखते हैं, ठोस कार्यवाही में कम लिहाजा कुछ दिनों बाद मामला ठंडा पड़ जाता है।
अगर ठंडा नहीं पड़ता तो कुछ दिनों बाद पुलिस मजामत की कोई दूसरी नई घटना हो जाती है और फिर ध्‍यान उस पर केंद्रित हो जाता है।
मथुरा जिले की ही बात करें तो पुलिस मजामत की तमाम घटनाएं आज तक पहेली बनी हुई हैं और उनका अनावरण नहीं हो पाया है जबकि कुछ घटनाओं में तो पुलिसजन जान से हाथ धो बैठे हैं जबकि कुछ में अंग-भंग हुए हैं।
यहां गौरतलब यह भी है कि भले ही समाजवादी पार्टी के शासनकाल में ऐसी घटनाएं कुछ बढ़ जाती हों या जाति विशेष का वर्चस्‍व कायम रहता हो किंतु इससे पूरी तरह निजात किसी पार्टी के शासन में नहीं मिलती।
हर सत्‍ता में कुछ खास तत्‍वों का बोलबाला रहता है और वो अनुशासन को ताक पर रखकर पूरी मनमानी करने से बाज नहीं आते।
जाहिर है कि इन हालातों में खाकी का खौफ रहेगा भी कैसे। जब मेंड़ ही खेत को खाने पर आमादा हो, तो उसे भगवान भी नहीं बचा सकते।
कुछ ऐसे ही स्‍थितियों के चलते आज खाकी अपनी जान बचाकर काम करने को मजबूर है और बदमाश बेखौफ होकर खाकी को अपना निशाना बनाते हैं।
खाकी की ट्रांसफर-पोस्‍टिंग से लेकर उसके अंदर तक समा चुके जातिगत राजनीति के कीटाणुओं का यदि समय रहते सफाया नहीं किया गया तो तय मानिए कि खाकी कहीं की नहीं रहेगी तथा उसकी मजामत होने का सिलसिला न केवल इसी प्रकार जारी रहेगा बल्‍कि साल-दर-साल बढ़ता जायेगा।
- सुरेंद्र चतुर्वेदी

रविवार, 20 सितंबर 2015

यूपी: रिश्वतखोरी का सुनियोजित तंत्र चला रहा था यादव सिंह

लखनऊ। नोएडा का निलंबित मुख्य अभियंता यादव सिंह कथित तौर पर रिश्वतखोरी का पूरा सुनियोजित तंत्र चला रहा था, जिसमें प्राधिकरण में कई अधिकारियों तक घूस की तय राशि पहुंचती थी।
सूत्रों ने बताया कि आयकर विभाग और सीबीआई समेत अनेक एजेंसियों की जांच के दौरान यह बात सामने आई कि सिर्फ सिंह तक ही रिश्वत नहीं पहुंचती थी बल्कि विभाग के अन्य अधिकारियों को बड़े व्यवस्थित तरीके से पैसा पहुंचता था, जिसका विस्तृत रिकॉर्ड रखा जाता था।
जांच में शामिल सूत्रों को एक डायरी मिली है जिससे पता चलता है कि ठेकेदारों से कथित तौर पर कुल ठेके की कीमत का करीब पांच से 10 प्रतिशत लिया जाता था, जिसे सिंह के अधीन काम करने वाले अधिकारियों में बांटा जाता था। सबसे निचले स्तर के अधिकारी को 0.05 से 0.10 प्रतिशत यानी 100 रुपये में पांच से 10 पैसे तक मिलते थे। कुल रिश्वत 50 लाख रुपये या इससे अधिक होती थी।
जांचकर्ताओं के अनुसार, कथित तौर पर अलग-अलग वरिष्ठता के आठ स्तर पर अधिकारियों को रिश्वत दी जाती थी, जिनमें सिंह सबसे ऊपर थे। एजेंसी एक फोन से हुए संदेशों और कॉल के आदान-प्रदान का भी अध्ययन कर रही है, जिसे सिंह का ही बताया जाता है।
सूत्रों के मुताबिक, सीबीआई दो कंपनियों- मैक्कॉन इंफ्रा प्राइवेट लिमिटेड और मीनू क्रियेशन्स के स्वामित्व का ब्यौरा भी देख रही है जो कथित तौर पर सिंह के रिश्तेदारों और साथियों से जुड़ी हैं। कोलकाता की अनेक कंपनियां और रीयल एस्टेट डवलपर भी जांच के घेरे में हैं।
सीबीआई के सूत्रों के अनुसार, उन्हें आयकर विभाग से दस्तावेज मिले हैं और दोनों विभाग इस मुद्दे पर समन्वय के साथ काम कर रहे हैं।
सीबीआई यादव सिंह, उनकी पत्नी कुसुमलता, बेटे सनी यादव और बेटी गरिमा भूषण से पूछताछ कर रही है। इन सभी के नाम सिंह के खिलाफ एजेंसी द्वारा दर्ज प्राथमिकियों में संदिग्ध के तौर पर दर्ज हैं।

शुक्रवार, 11 सितंबर 2015

बड़ा खुलासा: यादव सिंह की कंपनी का शेयर होल्‍डर है मुलायम का सांसद भतीजा

लखनऊ। नोएडा अथॉरिटी के चीफ रहे अरबपति इंजीनियर यादव सिंह की कंपनी का शेयर होल्‍डर है मुलायम सिंह का सांसद भतीजा अक्षय यादव। सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव की फैमिली के इस बिजनेस कनेक्शन का खुलासा आज ही हुआ है।
जानकारी के मुताबिक मुलायम के भाई और सपा के राष्ट्रीय महासचिव रामगोपाल यादव के बेटे अक्षय यादव, अरबपति इंजीनियर यादव सिंह की कंपनी के शेयर होल्डर हैं। अक्षय के अलावा उनकी पत्नी रिचा यादव के शेयर भी इस कंपनी में हैं। सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के मुताबिक मुलायम के भतीजे और फिरोजाबाद के मौजूदा सांसद अक्षय यादव ने यादव सिंह की फर्म से प्रॉफिट गेन किया है। अक्षय यादव को शेयर बेचने के बाद कंपनी की ओर से ये दिखाया गया कि इसने 16 लाख 45 हजार शेयरों को 990 रुपए प्रति शेयर के हिसाब से बेचा है।
यादव सिंह के असिस्टेंट के जरिए हुई थी डील
अक्षय यादव ने यादव सिंह के असिस्टेंट राजेश मनोचा के जरिए कंपनी के साथ डील की थी। इसके तहत मई 2014 में दिल्ली की कंपनी एनएम बिल्डवेल के 9 हजार 995 शेयर खरीदे थे। अक्षय यादव की पत्नी रिचा यादव के पास भी इस कंपनी के शेयर हैं। अक्षय यादव ने जिस कंपनी के शेयर खरीदे थे, उसकी जमीन की कीमत 1.58 करोड़ रुपए थी जबकि कंपनी बिल्डिंग की कीमत 1.57 करोड़ रुपए बताई गई है। वहीं, जब डील के समय कंपनी ने अक्षय यादव को एक शेयर की कीमत 10 रुपए दिखाई, जिससे मुलायम के भतीजे अक्षय ने महज एक लाख रुपए में कंपनी के 10 हजार शेयर खरीद लिए।
इनकम टैक्स डिपार्टमेंट खंगाल चुका है कंपनी के डिटेल
फाइनेंस मिनिस्ट्री के सोर्स बताते हैं कि यादव सिंह की इस एनएम बिल्डवेल कंपनी के खिलाफ इनकम टैक्स डिपार्टमेंट और ईडी आय से अधिक संपत्ति के मामले में जांच कर चुका है। यह भी बताया जा रहा है कि जब पिछले साल इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने यादव सिंह के नोएडा स्थित घर पर रेड डाली थी, तब उनकी लक्जरी कार से जो 10 करोड़ रुपए मिले थे, वो रुपए यादव सिंह के असिस्टेंट राजेश मनोचा के ही थे। राजेश मनोचा इंफ्रा लिमिटेड कंपनी का भी डायरेक्टर रह चुका है। यादव सिंह के केस में सीबीआई इस कंपनी पर भी नजर रखे हुए है।
क्या कहती है सपा?
इस मामले में अक्षय यादव के चाचा और प्रदेश के कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव ने कहा कि “यादव सिंह के खिलाफ सीबीआई जांच का आदेश हो चुका है और यूपी सरकार भी अपनी तरफ से जांच करा रही है इसलिए इस पर कोई कमेंट करना ठीक नहीं होगा।”
क्या कहती है बीजेपी?
बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक ने कहा, “यह तो साफ जाहिर था कि सपा नेताओं के शह की वजह से यादव सिंह का भ्रष्टाचार फलफूल रहा था। इसी कारण यादव सिंह के भ्रष्टाचार की जांच से यूपी सरकार कतरा रही थी। उनके मुताबिक, जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ेगी कई सपा नेताओं के नाम सामने आयेंगे।”
जिसके हाथ सीबीआई, उसके हाथ सपाई
कांग्रेस प्रवक्ता सुरेन्द्र राजपूत ने इस मामले पर केंद्र की एनडीए सरकार और प्रदेश की सपा सरकार पर चुटकी लेते हुए कहा,“जिसके हाथ सीबीआई, उसके हाथ सपाई।” उन्होंने कहा कि राज्य सरकार कैसे शासन-प्रशासन का गलत फायदा उठाती है, ये इसका उदाहरण है। उन्होंने कहा कि यादव सिंह के जरिए हुए इस भ्रष्टाचार में गलत तरीके से खरीदी गई सभी संपत्तियां सरकार को जब्त करनी चाहिए और इस मामले की व्यापक जांच होनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि पिछली बसपा सरकार भी इसी तरह के भ्रष्टाचार की वजह से अपने अंजाम तक पहुंची थी, ये सरकार भी उसी नक़्शे-कदम पर चलती नजर आ रही है।
नोएडा अथॉरिटी के अरबपति चीफ इंजीनियर यादव सिंह मामले की जांच सीबीआई कर रही है। हाईकोर्ट लखनऊ बेंच में चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एसएन शुक्ला इस बारे में आदेश दे चुके हैं। इस मामले में सीबीआई जांच को लेकर आईजी अमिताभ ठाकुर की पत्नी नूतन ठाकुर ने पीआईएल दायर की थी। नूतन ठाकुर ने बताया था कि यादव सिंह मामले की जांच एसआईटी, ईडी और इनकम टैक्स कर रही थी, जो अपने अपने क्षेत्र की स्पेशलिस्ट है और ऐसे में यादव सिंह पर सिर्फ जुर्माना लगा कर छोड़ दिया जाता। यादव सिंह के साम्राज्य का पता सिर्फ सीबीआई ही लगा सकती है। यही वजह रही कि मैंने सीबीआई जांच की मांग की, जिसे हाई कोर्ट ने मान लिया।
सरकार ने सीबीआई जांच का किया विरोध
राज्य सरकार ने यादव सिंह की सीबीआई जांच का विरोध किया था। सरकार कह रही थी कि इस मामले में ज्युडिशियल कमेटी जांच कर रही है, उसकी रिपोर्ट आने तक इंतजार कर लिया जाए। हाई कोर्ट ने कहा ज्युडिशियल कमेटी की अपनी सीमाएं हैं। यही वजह है कि कोर्ट ने सीबीआई जांच का आदेश दिया।

मथुरा-वृंदावन में भी ब्‍याज पर लगा है आसाराम का करोड़ों रुपया

-रियल एस्‍टेट तथा सर्राफा कारोबार से जुड़े लोगों के पास है यह रुपया
-देशभर में 500 कारोबारियों को बांट रखा है आसाराम ने अपना पैसा
-सिर्फ ब्‍याज से है आसाराम की 300 करोड़ रुपए सालाना की आमदनी
Crores rupees of Asaram Bapu on interest in Mathura-Vrindavan नाबालिग से बलात्‍कार के आरोपी आसाराम बापू ने अपनी अकूत संपत्‍ति का एक हिस्‍सा देश के जिन शहरों में ब्‍याज पर उठा रखा है, उनमें मथुरा-वृंदावन भी शामिल हैं।
आसाराम बापू ने अन्‍य शहरों की तरह मथुरा-वृंदावन में भी अपना पैसा रियल एस्‍टेट तथा सर्राफा कारोबार से जुड़े लोगों को मोटी ब्‍याज पर दिया हुआ है।
यूं तो आसाराम ने अपने पैसे को ब्‍याज पर उठाने की जिम्‍मेदारी इंदौर (मध्‍य प्रदेश) निवासी चाय और रियल एस्टेट कारोबारी मोहन लुधियानी को सौंप रखी है जो आसाराम ट्रस्ट का भी पूरा कामकाज संभालता है किंतु मथुरा-वृंदावन में ब्‍याज पर दिए गए पैसों का जिम्‍मा कुछ स्‍थानीय लोगों ने भी ले रखा है। ये लोग आसाराम के तथाकथित भक्‍त बताए जाते हैं।
देशभर के करीब 500 बड़े कारोबारियों में से मथुरा-वृंदावन के कारोबारियों को भी आसाराम बापू द्वारा ब्‍याज पर करोड़ों रुपए दिए जाने का खुलासा मध्य प्रदेश के इंदौर में 16 जगहों पर चल रही इनकम टैक्‍स की जांच से हुआ है।
छापे से पता लगा है कि आसाराम ने अपनी करीब 10 हजार करोड़ रुपए की कुल संपत्‍ति में से करीब 1677 हजार करोड़ रुपए देशभर के कारोबारियों को ब्‍याज पर बांट रखे हैं जिनसे उसे लगभग 300 करोड़ रुपए की सालाना आमदनी होती है। हालांकि समाचार लिखे जाने तक छापामार कार्यवाही जारी थी लिहाजा कार्यवाही पूरी होने के बाद रकम का यह आंकड़ा बढ़ भी सकता है।
गौरतलब है कि दो साल पहले आसाराम की गिरफ्तारी के समय आसाराम के आश्रम से पुलिस को 42 बोरे दस्तावेज मिले थे। इन दस्‍तावेजों में किस-किस को कितना रुपया चलाने के लिए दिया है, इसका जिक्र था। इसके साथ ही पूरे देश में फैली प्रॉपर्टी की जानकारी भी दस्‍तावेजों में थी। इनकम टैक्स डिपार्टमेंट अब इनकी जांच कर रहा है।
इंदौर में केशव नाचानी के यहां आयकर छापे से भी काफी दस्तावेज मिले थे। इनमें ब्लैक मनी के सबूत थे। इसी आधार पर सूरत की टीम ने दिल्ली इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के साथ मिलकर छापे की प्लानिंग बनाई।
इनकम टैक्‍स डिपार्टमेंट की टीम फिलहाल इंदौर में गुडरिक चाय कंपनी के मालिक लुधियानी और लुधियानी से जुड़े बिल्डर अनिल अग्रवाल, शशि भूषण खंडेलवाल, विजय अग्रवाल, तेजिंदर सिंह घुम्मन, निर्मल अग्रवाल, विष्णु गोविंद राम शर्मा, केशव नाचानी के यहां छापामार कार्यवाही कर रही है। इसके साथ ही घनश्यामदास एंड कंपनी, श्रुति स्नेक्स प्रालि, ओएसिस डेवलपर्स, श्रीराम बिल्डर्स, अपोलो रियल एस्टेट प्रालि, कोन्कोर्ड टी पैकिंग प्रालि, डिजिना रियल एस्टेट डेवलपर्स और जीएसएमटी रियल एस्टेट डेवलपर्स की भी जांच हो रही है। भोपाल में रविंद्र सिंह भाटेजा पर भी कार्यवाही जारी है। इंदौर-भोपाल के साथ ही इनकम टैक्स विभाग सूरत, बड़ौदा, अहमदाबाद, मुंबई, पुणे, कोलकाता, जयपुर और दिल्ली में भी कार्यवाही कर रहा है।
इनकम टैक्‍स विभाग से जुड़े सूत्रों की मानें तो इन बड़े शहरों के बाद मथुरा-वृंदावन जैसे धार्मिक स्‍थानों पर छापामार कार्यवाही की जायेगी और पता लगाया जायेगा कि आसाराम बापू का कितना रुपया यहां लगा है और किन-किन कारोबारियों पर है।
यह भी पता लगा है कि मथुरा-वृंदावन की तरह ही आसाराम बापू ने उत्‍तराखंड के कई धार्मिक शहरों में कारोबारियों को मोटा पैसा ब्‍याज पर दे रखा है।
उल्‍लेखनीय है कि राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली तथा एनसीआर से सटे होने और देश के प्रमुख धार्मिक स्‍थलों में शुमार होने की वजह से मथुरा-वृंदावन के रियल एस्‍टेट कारोबार में पिछले कुछ वर्षों के अंदर काफी उछाल आया है।
मथुरा-वृंदावन को प्रॉपर्टी में निवेश के लिहाज से भी काफी बेहतर माना जाता है और इसीलिए यहां रियल एस्‍टेट के नामचीन नाम अपने प्रोजेक्‍ट खड़े कर चुके हैं।
सैंकड़ों एकड़ में फैली इनकी कॉलोनियां और उनके अंदर दी जा रही सुविधाएं इस बात का सबूत हैं कि उनके निर्माण में तो मोटी लागत आती ही है, साथ ही खरीदार भी सामान्‍य व्‍यक्‍ति नहीं हो सकता।
यही नहीं, रियल एस्‍टेट के अरबों रुपए के इस कारोबार को स्‍थापित करने के लिए रियल एस्‍टेट कंपनियों को हर समय पैसों की जरूरत बनी रहती है और उन्‍हें यह पैसा आसाराम बापू जैसे धर्म के तथाकथित व्‍यापारियों से ही आसानी के साथ हासिल हो सकता है।
इन कारोबारियों को ब्‍याज पर पैसा देने वाला आसाराम बापू अकेला धार्मिक व्‍यापारी नहीं है। मथुरा-वृंदावन में अरबों रुपए लगाकर मठ, मंदिर व आश्रम बनाने वाले दूसरे सुनामधन्‍य तथाकथित साधु-संतों ने भी अपना तमाम रुपया रियल एस्‍टेट में लगा रखा है।
अब देखना यह है कि आसाराम के यहां इनकम टैक्‍स विभाग की छापामारी से खुली इस पोल का दायरा मथुरा-वृंदावन में कहां-कहां तक फैलता है और कौन-कौन उसके निशाने पर आता है।
सूत्रों की मानें तो इस छापामारी के बाद मथुरा-वृंदावन के कई सफेदपोश कारोबारियों के चेहरे बेनकाब होंगे क्‍योंकि आसाराम का अधिकांश पैसा काले धन की श्रेणी में आता है।
ऐसे में इन सफेदपोश कारोबारियों को आसाराम का पैसा ब्‍याज पर लेने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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