शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

बीएड फर्जीवाड़े में जेल जायेंगे मथुरा के भी 20 से अधिक कॉलेज संचालक

-एसआईटी ने कर ली है पूरी जन्‍मकुंडली तैयार -पाई-पाई का हिसाब निकाला और यह भी पता कर लिया कि कैसे पहुंचे ये फर्श से अर्श तक जो समय बीत रहा है, वही बीत रहा है लेकिन इतना तय है कि डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्‍वविद्यालय के बीएड फर्जीवाड़े में शामिल मथुरा के कई कॉलेज संचालक भी अब जेल जाने से बच नहीं पायेंगे।इस फर्जीवाड़े के तहत देश के शिक्षा जगत में अब तक की सबसे बड़ी आपराधिक कानूनी कार्यवाही होने जा रही है।
कोर्ट के आदेश पर जून 2014 से इस फर्जीवाड़े की जांच एसआईटी (विशेष जांच दल) द्वारा जब शुरू की गई तो पता लगा कि इसमें आगरा के डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्‍वविद्यालय से संबद्ध 83 कॉलेज लिप्‍त रहे हैं।
इन कॉलेजों ने विश्‍वविद्यालय के अधिकारी एवं कर्मचारियों के साथ मिलकर 3670 फर्जी रोल नंबर जेनरेट कर दिए और उनके माध्‍यम से जारी बीएड की फर्जी मार्कशीट पर 2700 लोगों को सरकारी शिक्षक की नौकरी भी मिल गई।
इस दुस्‍साहसिक फर्जीवाड़े में एसआईटी ने डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्‍वविद्यालय के दो पूर्व कुलपतियों, कुलसचिवों, शिक्षकों, कर्मचारियों और कॉलेज संचालकों सहित 4000 लोगों को आरोपी बनाया है।
इन घोटालेबाजों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही में जो विलंब हो रहा है, वह सिर्फ इसलिए क्‍योंकि एसआईटी पहले अपनी रिपोर्ट हाई कोर्ट में पेश करेगी और उसके बाद कार्यवाही आगे बढ़ायेगी।
एसआईटी की जांच में जिन जिलों के कॉलेज संचालकों का नाम सामने आया है उनमें एटा, मैनपुरी, फिरोजाबाद, बागपत तथा मेरठ सहित मथुरा का नाम प्रमुख है।
गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों के अंदर शिक्षा का व्‍यवसाय एक ऐसा व्‍यवसाय बन चुका है जिसमें सर्वाधिक लाभ दिखाई देता है। खुद को शिक्षाविद् कहने वाले शिक्षा माफिया ने पैसे की खातिर इस व्‍यवसाय को इतना नीचे गिरा दिया कि आज शिक्षा व्‍यवसाई घृणा के पात्र बन गए हैं।
बात करें यदि मथुरा सहित आगरा मंडल की तो शिक्षण संस्‍थाओं का सर्वाधिक प्रसार इसी क्षेत्र में हुआ क्‍योंकि कभी आगरा यूनीवर्सिटी के नाम से आगरा मंडल ही नहीं संपूर्ण उत्‍तर प्रदेश के शिक्षा जगत को गौरवान्‍वित करने वाली यही यूनिवर्सिटी अब पूरी तरह शिक्षा माफिया के जाल में फंस चुकी थी।
आगरा यूनिवर्सिटी से डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्‍वविद्यालय में तब्‍दील होने के बाद से तो जैसे इस यूनिवर्सिटी को ग्रहण ही लग गया और देखते-देखते यह फर्जीवाड़े तथा घोटालों का पर्याय बन गई।
निश्‍चित रूप से एक गौरवशाली शिक्षण संस्‍था को इस हाल तक पहुंचाने में शासन व प्रशासन का भी भरपूर हाथ रहा क्‍योंकि वह उसकी ओर से पूरी तरह आंखें बंद किए रहे।
शासन-प्रशासन की इस अनदेखी का परिणाम यह रहा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्‍वविद्यालय भ्रष्‍टाचार का पर्याय बन गया और इसका लाभ उठाकर इससे संबद्ध कॉलेज संचालकों ने फर्जीवाड़ा करके करोड़ों रुपए एकत्र कर लिए।
अकेले बीएड के जरिए ही जिन कॉलेज संचालकों ने करोड़ों की संपत्‍ति अर्जित की है, उनमें मथुरा के कॉलेज संचालकों का नाम टॉप पर है।
ये वो कॉलेज संचालक हैं जिनकी कल तक हैसियत स्‍कूटर पर चलने लायक नहीं थी किंतु डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्‍वविद्यालय के अधिकारी व कर्मचारियों की कृपा से आज यह कई-कई लग्‍ज़री गाड़ियां तो निजी तौर पर इस्‍तेमाल करते हैं जबकि कॉलेज के नाम पर दर्जनों गाड़ियां खड़ी कर रखी हैं।
एसआईटी जांच से जुड़े सूत्रों के अनुसार जिन 83 कॉलेजों की इस फर्जीवाड़े में संलिप्‍तता पाई गई है, उनमें मथुरा के कई कॉलेज शामिल हैं।
सीधे-सीधे कहें तो इस घोटाले में मथुरा का करीब-करीब हर वो कॉलेज संचालक संलिप्‍त पाया गया है जो डॉ. भीमराव अंबेडकर विश्‍वविद्यालय से बीएड करा रहा था। एसआईटी के अधिकारियों की मानें तो मथुरा का शायद ही कोई कॉलेज संचालक इस घोटाले में संलिप्‍त न रहा हो।
इन कॉलेजों की संख्‍या 20 से ऊपर बताई जा रही है जो चौमुहां, सैदपुर (बल्‍देव), छाता, कोसी खुर्द (भरतपुर रोड मथुरा), सदर बाजार, फरह, पाली डूंगरा, राया, गोवर्धन चौराहा मथुरा, सेमरी (छाता), शिवपुरी (बाजना), चंदनवन (हाईवे थाना क्षेत्र), महुअन, महावन, मुंडेसी और वृंदावन आदि क्षेत्रों में स्‍थित हैं।
चूंकि इस अरबों रुपए के घोटाले तथा फर्जीवाड़े की जांच उच्‍च न्‍यायालय के आदेश पर एसआईटी द्वारा की गई थी इसलिए उम्‍मीद की जा रही है कि शायद ही कोई घोटालेबाज अब इसकी गिरफ्त में आने से बच पायेगा।
ऐसे में यदि अन्‍य जनपदों सहित बड़ी तादाद में मथुरा के भी तथाकथित सभ्रांत कहलाने वाले कॉलेज संचालक हथकड़ियां पहने नजर आएं तो कोई आश्‍चर्य नहीं होगा क्‍योंकि एसआईटी ने उनकी पाई-पाई का हिसाब निकाल लिया है और यह भी मालूम कर लिया है कि चंद वर्षों के अंदर ये फर्श से अर्श तक आखिर पहुंचे कैसे?
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 14 नवंबर 2015

पेट्रोल तथा डीजल की तस्‍करी को बढ़ावा दे रही है अखिलेश सरकार

-वैट की असंगत नीति के चलते यूपी में पेट्रोल व डीजल दूसरे राज्‍यों से काफी महंगा
-बॉर्डर के पेट्रोल पंप संचालक भी तस्‍करी का पेट्रोल-डीजल बेचने पर मजबूर
-उत्तर प्रदेश पेट्रोलियम ट्रेडर्स एसोसिएशन ने मुख्य सचिव के सामने उठाया मुद्दा
-जुलाई में भी पेट्रोलियम ट्रेडर्स एसोसिएशन ने की थी हड़ताल
क्‍या आपको मालूम है कि अखिलेश यादव के नेतृत्‍व वाली समाजवादी पार्टी की सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर वैल्‍यू एडड टैक्‍स यानि वैट की जिस पॉलिसी को अपना रखा है उसके कारण उत्‍तर प्रदेश में पेट्रोल तथा डीजल की न सिर्फ कीमतें देश के अधिकांश राज्‍यों से काफी अधिक हैं बल्‍कि इसी कारण यहां पड़ोसी राज्‍यों से इन पदार्थों की बड़े पैमाने पर तस्‍करी की जा रही है।
पड़ोसी राज्‍यों हरियाणा, राजस्‍थान और दिल्‍ली में उत्‍तर प्रदेश की अपेक्षा पेट्रोल व डीजल की कीमतें काफी कम होने के कारण इन पदार्थों की सर्वाधिक तस्‍करी इन राज्‍यों से की जा रही है और उसका खामियाजा भुगत रहे हैं इन राज्‍यों की सीमा पर स्‍थापित पेट्रोल व डीजल पंपों के अधिकृत विक्रेता।
गत माह जुलाई में उत्‍तर प्रदेश के करीब 6300 पेट्रोल पंप संचालकों ने इस मुद्दे को लेकर हड़ताल भी की थी किंतु उसका कोई प्रभाव सरकार पर नहीं पड़ा लिहाजा उत्तर प्रदेश पेट्रोलियम ट्रेडर्स एसोसिएशन ने मुख्य सचिव आलोक रंजन के साथ हुई बैठक के दौरान फिर इस मुद्दे को उठाया है।
दरअसल, 22 जुलाई को उत्‍तर प्रदेश सरकार ने अपने एक निर्णय द्वारा पेट्रोल और डीजल पर प्रति लीटर वैट निर्धारित कर दिया जो इन पदार्थों की बेस कीमत का क्रमश: 26.8 प्रतिशत तथा 17. 5 प्रतिशत बैठता है।
इसके अलावा मथुरा रिफाइनरी को कच्‍चे तेल की सप्‍लाई लेने पर 5 प्रतिशत प्रवेश अलग से देना होता है। इस तरह उत्‍तर प्रदेश में पेट्रोल व डीजल उपभोक्‍ताओं को प्रति लीटर क्रमश: करीब 18 प्रतिशत तथा 11 प्रतिशत टैक्‍स देना पड़ता है जो दूसरे राज्‍यों से काफी अधिक है और जिस कारण यहां पेट्रोल व डीजल के दाम पड़ोसी राज्‍यों से भी बहुत ज्‍यादा हैं।
उत्‍तर प्रदेश सरकार की इस नीति का तेल माफिया जमकर लाभ उठा रहे हैं और वो पड़ोसी राज्‍यों से उत्‍तर प्रदेश में पेट्रोल व डीजल की तस्‍करी करके करोड़ों रुपए कमाने में लगे हैं जबकि उत्‍तर प्रदेश के बॉर्डर वाले पेट्रोल पंप संचालक या तो हाथ पर हाथ रखकर बैठने पर मजबूर हैं या फिर तस्‍करी का तेल बेचने को बाध्‍य हैं।
यूपी के बॉर्डर पर पेट्रोल पंप संचालित करने वाले लोगों का कहना है कि वैट की असंगत नीति के कारण पड़ोसी राज्‍यों की तुलना में यूपी के अंदर पेट्रोल और डीजल की कीमतें इतनी अधिक ज्‍यादा हो जाती हैं कि वह हमें प्रति लीटर मिलने वाले कुल लाभ से भी पांच-पांच, छ:- छ: गुना अधिक बैठती हैं। इन हालातों में तेल माफिया का सक्रिय होना तथा पेट्रोल पंप संचालकों का उन्‍हें सहयोग करना स्‍वाभाविक है।
देश की प्रमुख तेल कम्पनियों ने भी अपनी रिपोर्ट में इस बात का खुलासा किया है कि उत्‍तर प्रदेश के सीमावर्ती राज्‍यों विशेषकर राजस्‍थान, हरियाणा तथा दिल्‍ली से तेल माफियाओं ने उत्‍तर प्रदेश में खुलेआम पेट्रोल की बिक्री शुरू कर दी है जिससे यूपी के बॉर्डर वाले पंपों पर तेल की बिक्री न के बराबर हो रही है.
गौरतलब है कि उत्‍तर प्रदेश में आने वाला कच्चा तेल सबसे पहले मथुरा रिफाइनरी को मिलता है और इसके बाद यहां से पेट्रोल व डीजल तैयार होकर प्रदेशभर को सप्‍लाई किया जाता है.
पेट्रोल पंपों पर तेल की बिक्री के दौरान उपभोक्‍ताओं से वह पांच फीसदी प्रवेश कर भी वसूला जाता है जिसे मथुरा रिफाइनरी कच्‍चे तेल पर चुकाती है. इस प्रकार उत्‍तर प्रदेश के उपभोक्‍ताओं को पेट्रोल व डीजल की सर्वाधिक कीमत चुकानी पड़ती है.
आश्‍चर्य की बात यह है कि महंगाई नियंत्रित न हो पाने के लिए आये दिन केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करने वाली यूपी की अखिलेश सरकार इस मामले में न तो उत्तर प्रदेश पेट्रोलियम ट्रेडर्स एसोसिएशन की बात सुन रही है और न इस बात पर ध्‍यान दे रही है कि वैट को लेकर उसकी असंगत नीति के चलते पेट्रोलियम पदार्थों की तस्‍करी बढ़ रही है तथा बॉर्डर पर स्‍थित पेट्रोल पंप संचालकों को उसका बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ रहा है।
यही नहीं, वैट की इस असंगत नीति के चलते दूसरे राज्‍यों से हो रही पेट्रोल व डीजल की तस्‍करी के कारण प्रदेश सरकार के खजाने को भी चूना लग रहा है लेकिन लगता है कि अखिलेश सरकार जायज वैट के जरिए अच्‍छा राजस्‍व हासिल करने की जगह नाजायज वैट लगाकर तेल माफियाओं को लाभान्‍वित करना ज्‍यादा मुनासिब समझ रही है।
कहीं ऐसा न हो कि अखिलेश सरकार की तेल माफियाओं को सीधा लाभ पहुंचाने तथा तेल की तस्‍करी को बढ़ावा देने वाली यह नीति 2017 के विधानसभा चुनावों में उसी पर भारी पड़ जाए क्‍योंकि तेल की बढ़ी हुई कीमतों का सीधा संबंध महंगाई से भी है और महंगाई से आम जनता किस कदर आजिज आ चुकी है, इससे अखिलेश सरकार भली-भांति परिचित है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुक्रवार, 6 नवंबर 2015

शर्त की आड़ में विकास प्राधिकरण से करोड़ों के टेंडर का बंदरबांट

सोलह कला अवतार, महाभारत नायक यशोदानंदन श्रीकृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली के विकास प्राधिकरण ने इस विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक शहर का कितना विकास कराया है, इसे लेकर एक-दो नहीं अनेक प्रश्‍न खड़े हो सकते हैं किंतु विकास प्राधिकरण में समय-समय पर तैनात रहे अधिकारियों का अपना कितना विकास हुआ है, इसे लेकर सिर्फ एक ही प्रश्‍न खड़ा होता है और वह है कि क्‍या कोई अधिकारी ऐसा रहा है जिसका यहां अपना विकास न हुआ हो ?
विकास प्राधिकरण के अधिकारियों से जुड़ा उनके निजी विकास का ताजा मामला 12 सितंबर 2015 को अखबारों में जारी उस अल्‍पकालीन निविदा का है जिसके तहत करीब 14 करोड़ के कार्यों का बंटवारा दो दिन पूर्व ऑफिस आवर्स बीत जाने के बाद रात के अंधेरे में कर दिया गया।
शाम ढलने के बाद टेंडर खोले जाने की भनक मिलने पर पहुंचे मीडियाकर्मियों ने जब ऐसा किए जाने की वजह जाननी चाही तो हमेशा की तरह कोई अधिकारी मुंह खोलने को तैयार नहीं हुआ और सिर्फ इतना कहकर मीडिया कर्मियों को टरका दिया गया कि दिन के वक्‍त दूसरे कार्यों में व्‍यस्‍तता के चलते टेंडर नहीं खोले जा सके।
करोड़ों रुपए के इन विकास कार्यों हेतु 12 सितंबर को जारी निविदा तथा 4 नवंबर को किए गए बंटवारे का सबसे महत्‍वपूर्ण पहलू यह है कि यह सारे कार्य मात्र चार ठेकेदारों के बीच बांट दिए गए और उन्‍हें ही काम दिए जाने का पुख्‍ता इंतजाम निविदा निकालने वाले दिन यानि 12 सितंबर 2015 को ही एक शर्त के साथ कर दिया गया।
इस शर्त के मुताबिक निविदा में वर्णित क्रम संख्‍या 1 से लेकर 12 तक के कार्य उसी पंजीकृत ठेकेदार को दिए जायेंगे जिसके पास अपना हॉटमिक्‍स प्‍लांट होगा।
इस शर्त को जोड़ने के पीछे की वजह का पता करने तथा ऐसा कोई नियम, कानून अथवा शासनादेश जारी होने के संबंध में जानकारी करने के लिए विकास प्राधिकरण के सचिव एस बी सिंह तथा चीफ इंजीनियर आर के शर्मा सहित कई अधिकारियों से संपर्क साधने का कई-कई बार प्रयास किया गया किंतु किसी ने बात करने की जहमत नहीं उठाई।
विकास प्राधिकरण में तैनात विकास पुरुषों से कोई जवाब न मिल पाने पर ‘लीजेंड न्‍यूज़’ ने जब अपने स्‍तर से छानबीन की तो बहुत ही चौंकाने वाली बातें सामने आईं।
प्रदेश के दूसरे विकास प्राधिकरणों और अन्‍य सरकारी विभागों से पता लगा कि किसी कार्य को कराने के लिए हॉटमिक्‍स प्‍लांट अथवा दूसरे किन्‍हीं उपकरणों का ठेकेदार के पास होना या न होना जरूरी नहीं है, जरूरी है तो केवल मानकों के अनुरूप कार्य की गुणवत्‍ता।
रहा सवाल निविदा के साथ ऐसी कोई शर्त जोड़ देने का तो उसके पीछे एकमात्र कारण अधिकारियों की बदनीयती ही होती है ताकि वो उसकी आड़ में अपने पसंदीदा ठेकेदारों को काम आवंटित कर सकें क्‍योंकि उन्‍हें पहले से मालूम होता है कि किस ठेकेदार के पास उनकी शर्त को पूरी करने का इंतजाम है और कौन उस शर्त को पूरी कर पाने में असमर्थ साबित होगा।
सरकारी विभागों में ही तैनात दूसरे बड़े अधिकारियों की मानें तो विकास प्राधिकरण सहित दूसरे सभी ऐसे विभागों में ठेकेदारी के लिए पंजीयन और ग्रेडिंग तभी होती है जब संबंधित ठेकेदार उसके लिए जरूरी सभी शर्तों को पूरा करता हो, फिर इस तरह अलग से कोई शर्त थोपने का मकसद सिर्फ और सिर्फ शर्त की आड़ लेकर निजी स्‍वार्थ पूरे करना ही होता है।
कुछ अधिकारियों ने बताया कि इस तरह की शर्तें अब विकास प्राधिकरण ही नहीं, पीडब्‍ल्‍यूडी आदि दूसरे सरकारी विभाग भी थोपने लगे हैं जबकि इसका कोई औचित्‍य नहीं है क्‍योंकि जिसे काम देना होता है उसके लिए अधिकारी इस आशय की छूट भी दे देते हैं कि वह किसी दूसरे ठेकेदार से उस उपकरण संबंधी प्रपत्र अपने नाम लिखवाकर दे सकता है जबकि इस छूट का उल्‍लेख निविदा में नहीं किया जाता।
ईमानदार अधिकारियों का तो यहां तक कहना है कि कल को यदि विकास प्राधिकरण ऐसी भी शर्तें थोपने लगे कि उसके यहां से काम उन्‍हीं ठेकेदारों को आवंटित किया जायेगा जो निर्माण में जरूरी सभी सामग्री का उत्‍पाद खुद करते हों, तो क्‍या यह उचित होगा। ऐसे में क्‍या इस विभाग का काम करने के लिए कोई ठेकेदार उपलब्‍ध होगा।
सच तो यह है कि ऐसी शर्तें थोपकर विकास प्राधिकरण अथवा दूसरे सरकारी विभागों के अधिकारी पूर्व नियोजित योजना के तहत अपने स्‍वार्थ की सिद्धि करते हैं ताकि उनके अपने चहेते ठेकेदार ही टेंडर डाल सकें और उन्‍हीं के बीच सारा काम बांट दिया जाए।
जाहिर है कि ऐसा करने से पहले ”इस हाथ दे, उस हाथ ले” की प्रक्रिया भी पूरी कर ली जाती है और टेंडर डालने से लेकर टेंडर निकालने तक का कार्य मात्र औपचारिकता निभा कर पूरा कर लिया जाता है।
अब यह औपचारिकता ऑफिस आवर्स में दिन के वक्‍त पूरी की जाए अथवा रात के अंधेरे में, इससे क्‍या फर्क पड़ता है।
रहा प्रश्‍न ऐसी प्रक्रियाओं पर चंद मीडियाकर्मियों के सवाल उठाने का तो जहां ऊपर से नीचे तक पूरा विभाग आकंठ भ्रष्‍टाचार में लिप्‍त हो, वहां चंद मीडियाकर्मियों के सवाल उठाने से होता क्‍या है।
जिन्‍हें जवाब देना जरूरी है और जिनके जवाब सुनना भी जरूरी है, वह सब न केवल प्रक्रिया से संतुष्‍ट हैं बल्‍कि अधिकारियों के विकास से भी संतुष्‍ट हैं।
-लीजेंड न्‍यूज़ विशेष

सोमवार, 2 नवंबर 2015

क्‍या अनऑथराइज्‍ड है जेएसआर ग्रुप की अशोका सिटी ?

विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक शहर मथुरा में प्राइम लोकेशन पर बनाया गया जेएसआर ग्रुप का होम प्रोजेक्‍ट ”अशोका सिटी” क्‍या अनऑथराइज्‍ड और गैरकानूनी है ?यह सवाल आज फिर इसलिए खड़ा हुआ क्‍योंकि ”जेएसआर ग्रुप” द्वारा आज सभी प्रमुख समाचार पत्रों में अपने आवासीय प्रोजेक्‍ट ”अशोका सिटी” का जो विज्ञापन दिया गया है, उसमें कहीं इस बात का उल्‍लेख नहीं है कि यह प्रोजेक्‍ट डेवलपमेंट अथॉर्टी से अप्रूव्‍ड है।
चूंकि पूर्व में भी जेएसआर ग्रुप के इस प्रोजेक्‍ट को लेकर भ्रांतियां उत्‍पन्‍न होती रही हैं और उन भ्रान्‍तियों का किसी स्‍तर पर कहीं से निराकरण नहीं किया गया लिहाजा आज उनका विज्ञापन भी नए सिरे से लोगों के बीच भ्रांति उत्‍पन्‍न कर रहा है।
दीपावली जैसे बड़े त्‍यौहार से ठीक 10 दिन पहले दिये गए इस विज्ञापन में बुकिंग एमाउंट 2 लाख 70 हजार रुपए लिखा है, जिससे जेएसआर ग्रुप का मकसद तो साफ हो जाता है किंतु यह साफ नहीं है कि वह किस आधार पर अपने इस आवासीय प्रोजक्‍ट के लिए लोन सुविधा उपलब्‍ध करा रहे हैं।
बताया जाता है कि देश की राजधानी दिल्‍ली को ताज नगरी आगरा से जोड़ने वाले राष्‍ट्रीय राजमार्ग नंबर दो पर मथुरा में गोवर्धन चौराहे के अति निकट बनाया गया बहुमंजिला आवासीय परिसर ”अशोका सिटी” तभी से विवादित रहा है जब इसकी बुनियाद रखी गई थी और इसीलिए न केवल समय-समय पर इसके मालिकाना हक बदलते रहे बल्‍कि मालिकों के खिलाफ अपहरण जैसे संगीन मामले भी दर्ज हुए।
”अशोका सिटी” के निर्माण पर शक के बादल इसलिए और गहरा जाते हैं कि इसकी असलियत के बारे में कोई कुछ बताने को तैयार नहीं होता। यहां तक कि डेवलेपमेंट अथॉर्टी ”मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण” भी चुप्‍पी साधे हुए है।
हालांकि विभागीय सूत्र बताते हैं कि इसके अनधिकृत निर्माण और उसे अधिकृत बनाने के प्रयास में अपनाए गए गैरकानूनी हथकंडों से कमिश्‍नर आगरा मंडल तथा जिलाधिकारी मथुरा भी भली-भांति परिचित हैं और उन्‍होंने अपने-अपने स्‍तर से काफी सख्‍ती बरत रखी है किंतु फिलहाल ऐसी कोई कार्यवाही अमल में नहीं लाई जा सकी जिससे जनसामान्‍य के बीच स्‍थिति स्‍पष्‍ट हो सके।
इन हालातों में विज्ञापन को देखकर बहुत से लोगों का उलझ जाना स्‍वाभाविक है। तमाम लोग तो इस उम्‍मीद पर बुकिंग एमाउंट भी जमा करा बैठेंगे कि बाकी रकम का इंतजाम उन बैंकों और फाइनेंस एजेंसियों से हो ही जायेगा जिनका हवाला जेएसआर ग्रुप ने अपने विज्ञापन में दिया है।
अब यहां एक और महत्‍वपूर्ण सवाल यह खड़ा होता है कि क्‍या किसी अनधिकृत और गैरकानूनी होम प्रोजेक्‍ट पर कोई बैंक अथवा फाइनेंस कंपनी ऋण उपलब्‍ध करा सकती है?
इस संबंध में जब ”लीजेंड न्‍यूज़” ने जानकारी की तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं।
इन बातों में सबसे अहम बात तो यह है कि हर बैंक और हर फाइनेंस कंपनी ने होम लोन के मामले में अपने-अपने निजी नियम बना रखे हैं। स्‍टेट बैंक ऑफ इंडिया को छोड़कर कई बैंकें अनधिकृत तथा गैरकानूनी होम प्रोजेक्‍ट पर भी लोन केवल यह देखकर उपलब्‍ध करा देती हैं कि ऋण लेने वाले से वसूली हो जाने का उन्‍हें पूरा भरोसा है। फिर चाहे ऋण लेने वाला अनधिकृत प्रोजेक्‍ट के कारण बुरी तरह फंस जाए और उसका एक अदद अपने घर का सपना सिर्फ सपना बनकर रह जाए।
बताया जाता है कि अनधिकृत होम प्रोजेक्‍ट पर ऋण देने के मामले में सबसे उदार नियम निजी बैंकों तथा निजी फाइनेंस कंपनियों ने बना रखे हैं। संभवत: इसीलिए ”जेअएआर ग्रुप” की ”अशोका सिटी” पर ऋण उपल्‍ब्‍ध कराने वालों में एक भी राष्‍ट्रीय बैंक का नाम नहीं है।
जो नाम दिए गए हैं उनमें आईसीआईसीआई तथा एचडीएफसी जैसी निजी बैंकें तथा इंडिया बुल्‍स, डीएचएफएल तथा टाटा केपीटल जैसी फाइनेंस कंपनियां शामिल हैं।
”जेएसआर ग्रुप” की ”अशोका सिटी” के विज्ञापन में उसके अधिकृत या अनधिकृत होने का कोई उल्‍लेख न होने के संदर्भ पर जब विज्ञापन के अंदर दिए गए कांटेक्‍ट नंबर से संपर्क साधा गया तो किसी पूजा नाम की लड़की ने फोन रिसीव किया किंतु वह कोई भी संतोषजनक जवाब देने में असमर्थ रही।
दरअसल, अशोका सिटी तो एक उदाहरण है अन्‍यथा कृष्‍ण की इस पावन भूमि में ऐसे होम प्रोजेक्‍ट की संख्‍या अच्‍छी-खासी है जो आकर्षक विज्ञापनों तथा आसानी से ऋण उपलब्‍ध कराने की आड़ में आमजन के सपनों से खिलवाड़ करके अपनी जेबें भर रहे हैं और बैंकें ही नहीं डेवलेपमेंट अथॉर्टी भी चुप्‍पी साधकर इसमें उनका पूरा सहयोग कर रही हैं। चूंकि बैंकों का अपना स्‍वार्थ है और डेवलेपमेंट अथॉर्टी में ऊपर से लेकर नीचे तक स्‍वार्थ ही स्‍वार्थ है इसलिए कोई कुछ बोलने या सुनने को तैयार नहीं होता।
रही बात उस जन सामान्‍य की जो बिल्‍डर्स और बैंकों की चाल में फंसकर एक ओर जहां अपनी जिंदगीभर की जमा पूंजी लुटा बैठता है और दूसरी ओर अपने एक अदद घर के सपने को बिखरते देखता है तो उससे किसी को कोई वास्‍ता नहीं।
फिर चाहे वह ताजिंदगी उस ऋण की किश्‍तें अदा करता रहे जिसे लेने के बाद उसने अपने घर का सपना देखा था।
-लीजेंड न्‍यूज़ विशेष

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2015

कल्‍पतरू ग्रुप ने रियल एस्‍टेट में भी किया सैकड़ों करोड़ का घोटाला, कई बैंक फंसे

-आम आदमी के साथ-साथ कई बैंक भी फंसे जयकृष्‍ण राणा के जाल में
-1600 एकड़ में फैला है राणा के साम्राज्‍य का जाल
कल्‍पतरू ग्रुप की रियल एस्‍टेट कंपनी ‘कल्‍पतरू बिल्‍डटेक कॉर्पोरेशन लिमिटेड’ का भी सैकड़ों करोड़ का ऐसा घोटाला सामने आया है जिसमें न सिर्फ कई बैंक फंस गए हैं बल्‍कि तमाम वो लोग भी शिकार हुए हैं जिन्‍होंने कभी अपने लिए एक अदद घर का सपना देखा था।
विश्‍वस्‍त सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार मथुरा के कस्‍बा फरह में दिल्‍ली से मथुरा और आगरा को जोड़ने वाले राष्‍ट्रीय राजमार्ग नंबर-2 पर ‘कल्‍पतरू बिल्‍डटेक कॉर्पोरेशन लिमिटेड’ (KBCL) का करीब 1600 एकड़ जमीन पर साम्राज्‍य फैला हुआ है।
कल्‍पतरू ग्रुप के मुखिया जयकृष्‍ण राणा ने यहीं अपने अखबार कल्‍पतरू एक्‍सप्रेस से लेकर मॉटेल्‍स लिमिटेड, वृंदावन सीक्‍यूरिटीज लिमिटेड, कल्‍पतरू इंश्‍योरेंस कार्पोरेशन लिमिटेड, कल्‍पतरू डेरी प्रोडक्‍ट प्राइवेट लिमिटेड, कल्‍पतरू मेगामार्ट लिमिटेड, कल्‍पतरू इन्‍फ्राटेक प्राइवेट लिमिटेड, कल्‍पतरू फूड प्रोडक्‍ट प्राइवेट लिमिटेड, कल्‍पतरू लैदर प्रोडक्‍ट प्राइवेट लिमिटेड तथा कल्‍पतरू एग्री इंडस्‍ट्रीज लिमिटेड का जाल फैला रखा है।
निजी सुरक्षा गार्डों तथा गुर्गों के घेरे में इसी साम्राज्‍य के अंदर कभी राजा-महाराजाओं की तरह बैठने वाला जयकृष्‍ण राणा अब जब कभी यहां आता भी है तो दबेपांव आता है ताकि ज्‍यादा लोगों को उसके आने की भनक न लग जाए।
बताया जाता है कि अपनी करीब एक दर्जन कंपनियों के इस जाल में जयकृष्‍ण राणा ने विभिन्‍न स्‍तर के लोगों को फंसाकर उन्‍हें सैकड़ों करोड़ रुपए का चूना लगाया है और अब वह कैसे भी अपने मूलधन को इससे निकालने की कोशिश में दिन-रात एक कर रहे हैं। उन्‍हें जहां इसकी मौजूदगी का पता लगता है, वो वहीं पहुंच जाते हैं।
जयकृष्‍ण राणा की रियल एस्‍टेट कंपनी ‘कल्‍पतरू बिल्‍डटेक कॉर्पोरेशन लिमिटेड’ (केबीसीएल) द्वारा फरह में जो प्रोजेक्‍ट खड़ा किया जा रहा है, उसमें भारी घोटाले का पता लगा है।
सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार यहां जयकृष्‍ण राणा और उसके गुर्गों ने बाकायदा एक साजिश के तहत अपने एजेंट्स के माध्‍यम से एक-एक मकान तथा एक-एक प्‍लॉट का सौदा कई-कई लोगों से करके उनसे करोड़ों रुपए हड़प लिए हैं। इनमें से कुछ लोग तो ऐसे हैं जो फ्लैट या प्‍लॉट का 90 प्रतिशत पैसा केबीसीएल के नाम कर चुके हैं और जब रजिस्‍ट्री कराने को हैं तो पता लगा है कि उस फ्लैट या प्‍लॉट के तो कई-कई दावेदार हैं और सब के सब किसी तरह अपने नाम रजिस्‍ट्री कराने के फेर में हैं।
ऐसे लोग जयकृष्‍ण राणा से तो सीधे मुलाकात कर नहीं पाते लिहाजा उन एजेंट्स के पास चक्‍कर लगाने को मजबूर हैं जिन्‍होंने अपनी रोजी-रोटी की खातिर राणा की रियल एस्‍टेट कंपनी के लिए काम किया था।
हालांकि आज ऐसे अधिकांश लोग राणा से अलग हो चुके हैं क्‍योंकि उन्‍हें भी पैसा मिलना तो दूर, सिरदर्द मिल रहा है। जिन फ्लैट्स या प्‍लॉट्स का पैसा उन्‍होंने अपने कमीशन तथा वेतन की खातिर लिया, उसे तो जयकृष्‍ण राणा की रियल एस्‍टेट कंपनी हड़प गई लेकिन सिरदर्द बेचारे एजेंट्स को दे दिया।
यही नहीं, यहां तक पता लगा है कि जिस प्रकार राणा और उसके कॉकस ने एक-एक फ्लैट तथा प्‍लॉट कई-कई लोगों को बेच खाए, उसी प्रकार अपनी जमीन पर कई-कई संस्‍थानों से फायनेंस भी करा रखा है और उसके शिकार बैंकों सहित निजी फायनेंसर भी हुए हैं।
अब चूंकि राणा और उसके कल्‍पतरू ग्रुप का सारा खेल सामने आ चुका है लिहाजा आम और खास आदमी तथा बैंक व फायनेंस कंपनियां किसी भी प्रकार अपना पैसा वसूल करने की कोशिश में हैं।
बताया जाता है कि इन दिनों राणा के विभिन्‍न ठिकानों पर इन्‍हीं सब कारणों से अक्‍सर झगड़े होते देखे जा सकते हैं।
जयकृष्‍ण राणा से जुड़े सूत्रों की मानें तो राणा और कल्‍पतरू ग्रुप का यह हाल इसलिए हुआ क्‍योंकि उसने अपनी चिटफंड कंपनी से लेकर विभिन्‍न कंपनियों के माध्‍यम से एकत्र किए गए पैसे को अपनी निजी संपत्‍ति की तरह इस्‍तेमाल किया और राजा-महाराजाओं की तरह लुटाया।
बताया जाता है कि राणा ने अपनी कंपनियों में जहां ऐसे-ऐसे लोगों को डायरेक्‍टर बना रखा है जो कहीं चपरासी बनने की योग्‍यता नहीं रखते वहीं ऐसे अनेक लोगों को लग्‍जरी गाड़ियां उपलब्‍ध करा रखी हैं, जो राणा की चरण वंदना करने में माहिर थे। उनकी सबसे बड़ी योग्‍यता सिर्फ और सिर्फ राणा को अपनी चापलूसी के बल पर प्रसन्‍न रखना थी।
राणा के कॉकस में शामिल लोगों का ही कहना है कि एक खास कंपनी की विशेष लग्‍जरी गाड़ी इतनी बड़ी तादाद में एकसाथ शायद ही कहीं अन्‍यत्र देखने को मिल सकें, जितनी राणा और उसके चापलूसों के पास देखी जा सकती हैं।
बेहिसाब फिजूलखर्ची और हर स्‍तर पर की गई धोखाधड़ी के चलते राणा भी समझ चुका है कि अब उसके कल्‍पतरू ग्रुप को डूबने से कोई बचा नहीं पायेगा और इसलिए वह खुद को सुरक्षित करने की कोशिशों में लगा है। उसे उस मौके की तलाश है जिसका लाभ उठाकर वह किसी तरह यहां से निकल सके और सारे झंझट उन लोगों के लिए छोड़ जाए जिन्‍होंने उसके जहाज के डूबने का अंदेशा होते ही, उससे किनारा कर लिया।
अब देखना केवल यह है कि राणा अपने मकसद में सफल होकर सुरक्षित निकल जाता है या उसे भी अंतत: सहाराश्री सुब्रत राय सहारा की तरह किसी सरकारी सुरक्षा में पनाह मिलती है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

‘दलालों’ के कॉकस से घिरी हैं मथुरा की सांसद हेमामालिनी

-2017 में प्रस्‍तावित उत्‍तर प्रदेश विधानसभा के चुनावों में खुद एक समस्‍या न बन जाएं मथुरा की विशिष्‍ट सांसद
-आमजन तो क्‍या, पार्टीजन तक सांसद से नहीं कर सकते मुलाकात
-मथुरा की जनता के लिए आज भी स्‍वप्‍न सुंदरी ही हैं सांसद हेमामालिनी
-डेढ़ साल के कार्यकाल में नहीं हुआ कोई उल्‍लेखनीय काम
-आयातित सांसद से निराश होने लगी जनता और पार्टी कार्यकर्ता
देश की मशहूर अभिनेत्री और योगीराज भगवान श्रीकृष्‍ण की विश्‍व प्रसिद्ध जन्‍मस्‍थली मथुरा से सांसद हेमामालिनी को मथुरा में एक ऐसे कॉकस ने घेर रखा है, जिसे जनसामान्‍य की भाषा में ‘दलाल’ कहा जाता है।
2014 में जब लोकसभा चुनाव हुए तो भाजपा के सामने कृष्‍ण की नगरी में एक अदद चेहरा ऐसा सामने नहीं था जिस पर वह दांव लगा पाती, इसलिए मजबूरन उसे अभिनेत्री हेमामालिनी को आयातित करना पड़ा।
मथुरा में भाजपा के लिए सूखे की स्‍थिति 2009 के लोकसभा चुनावों में भी थी लिहाजा तब उसने राष्‍ट्रीय लोकदल के युवराज जयंत चौधरी को समर्थन देकर ब्रजवासियों के प्रति अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर ली।
जयंत चौधरी भारी मतों से चुनाव तो जीत गए लेकिन अपने संसदीय क्षेत्र को उन्‍होंने पिकनिक स्‍पॉट की तरह इस्‍तेमाल करना शुरू कर दिया। किसानों के मसीहा का पौत्र, किसान व आमजन से दिन-प्रतिदिन दूर होता गया नतीजतन उसे अगले चुनाव में हेमामालिनी से बुरी तरह पराजित होना पड़ा।
चूंकि 2014 का लोकसभा चुनाव पूरी तरह नरेन्‍द्र मोदी को सामने रखकर लड़ा गया इसलिए आयातित होने के बावजूद हेमामालिनी चुनाव जीत गईं जबकि आयातित सांसदों के मामले में मथुरा वासियों का अनुभव अच्‍छा नहीं रहा है।
हरियाणा से आयातित किए गए मनीराम बागड़ी के बाद डा. सच्‍चिदांनद हरिसाक्षी महाराज और जयंत चौधरी तक जितने भी बाहरी नेताओं ने मथुरा की जनता का प्रतिनिधित्‍व किया, सभी ने निराश किया।
यही कारण है कि कुंवर नटवर सिंह से लेकर कुंवर विश्‍वेन्‍द्र सिंह और चौधरी चरण सिंह की पत्‍नी गायत्री देवी से लेकर उनकी पुत्री ज्ञानवती जैसों को मथुरा की जनता ने नकारा भी किंतु 2014 में मोदी जी पर भरोसा करके बाहरी होने के बावजूद हेमामालिनी के सिर जीत का सेहरा बंधवा दिया।
हेमा मालिनी से कृष्‍ण की पावन जन्‍मभूमि के वाशिंदों को बहुत उम्‍मीदें थीं क्‍योंकि हेमामालिनी के साथ खुद मोदी जी का भरोसा जुड़ा था। मोदी जी ने मथुरा की चुनावी सभा में इस भरोसे को कायम रखने का वादा भी किया।
आज जबकि केंद्र में मोदी जी की सरकार बने डेढ़ साल पूरा होने को आया तो पता लग रहा है कि मथुरा की सांसद हेमामालिनी एक ऐसे कॉकस से घिर चुकी हैं जो न केवल ब्रजवासियों से किए गए मोदी जी के वायदे को खोखला साबित करता है बल्‍कि ऐसे हालात पैदा कर रहा है जो उत्‍तर प्रदेश में प्रस्‍तावित 2017 के विधानसभा चुनावों में हेमामालिनी तथा भाजपा पर भारी पड़ सकते हैं।
दरअसल, मथुरा में हेमामालिनी की दुनिया सिर्फ आधा दर्जन ऐसे चापलूसों तक सीमित है जिनका न कोई जन सरोकार है और ना सामाजिक सरोकार। यहां तक कि भाजपा में अपनी पूरी उम्र खपा चुके कार्यकर्ताओं तक से हेमामालिनी इन चापलूसों के कारण अनभिज्ञ हैं।
चापलूसों का यह कॉकस हेमामालिनी को आज भी यहां सिर्फ एक सिने स्‍टार ही बनाकर रखना चाहता है और इसलिए जनता उन्‍हें जनप्रतिनिधि की भूमिका में देखने को तरस रही है।
दरअसल, इस कॉकस का निजी लाभ इसी में है कि हेमामालिनी यहां सिर्फ स्‍वप्‍न सुंदरी के अपने चिर-परिचित खिताब तक सीमित रहें और पार्टी कार्यकर्ताओं तथा आमजन से दूरी बनाकर रखें।
वह भली-भांति जानते व समझते हैं कि यदि हेमामालिनी मथुरा की सच्‍चे अर्थों में जनप्रतिनिधि बन गईं तो उनकी दलाली की दुकान बंद हो जायेगी तथा हेमामालिनी की आड़ में उनके द्वारा किए जा रहे गोरखधंधे सामने आ जायेंगे।
भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्‍व फिलहाल तो बिहार विधानसभा के चुनावों में व्‍यस्‍त है किंतु इसके तुरंत बाद उत्‍तर प्रदेश पर उसका ध्‍यान पूरी तरह केंद्रित हो जायेगा क्‍योंकि उत्‍तर प्रदेश राजनीति के लिहाज से कितनी अहमियत रखता है, इसे भाजपा तथा आरएसएस अच्‍छी तरह से समझते हैं।
भाजपा के लिए यूपी में 2017 का चुनाव यूं भी विशेष अहमियत रखता है क्‍योंकि यूपी के ही वाराणसी से पीएम नरेंद्र मोदी सांसद हैं। यूपी की जनता ने मोदी जी को अपेक्षा से अधिक सीटें दीं और जिस कारण भाजपा को स्‍पष्‍ट बहुमत हासिल हुआ।
अब सवाल यह पैदा होता है कि जिस प्रकार 2014 के लोकसभा चुनावों से पहले मथुरा की राजनीतिक जमीन भाजपा के लिए बंजर हो चुकी थी और चौधरी तेजवीर की हार के बाद उसके लिए यहां किसी भी चुनाव में जीत का अकाल पड़ गया था, उस पर तो मोदी जी के चेहरे ने एकबार फिर आशा की किरण पैदा करा दी लेकिन क्‍या भाजपा उत्‍तर प्रदेश के आगामी चुनावों में उसे दोहरा पायेगी।
बेशक अभी उत्‍तर प्रदेश के चुनावों में करीब-करीब डेढ़ साल का समय बाकी है किंतु हेमामालिनी के मथुरा में डेढ़ साल के कार्यकाल को सामने रखकर यदि देखा जाए तो विधानसभा चुनावों के लिए शेष डेढ़ साल बहुत मामूली समय लगता है।
अपने डेढ़ साल के संसदीय कार्यकाल में हेमामालिनी ने ऐसा कोई कार्य नहीं किया जिसे रेखांकित किया जा सके। बात चाहे पीएम के स्‍वच्‍छ भारत अभियान की हो अथवा मथुरा को उसका गौरवशाली स्‍वरूप प्रदान करने की, हर मामले में मथुरा विकास को अब भी तरस रहा है। सड़कें पहले ही तरह बदहाल हैं। पानी-बिजली की समस्‍या यथावत है।
भाजपा के ही कुछ सूत्रों से पता लगा है कि हेमामालिनी मथुरा के लिए बहुत-कुछ करना चाहती हैं लेकिन उन्‍हें हर वक्‍त घेरकर बैठा रहने वाला दलालों का कॉकस कुछ करने नहीं देता। वह उन्‍हें अपने चश्‍मे से वह दिखाता है, जो दिखाना चाहता है। वह बताता है, जो बताना चाहता है।
यही कारण है कि मोदी जी तथा उनकी टीम के आह्वान पर सारे गिले शिकवे त्‍यागकर मथुरा के जिन भाजपाइयों ने हेमामालिनी के चुनावों में जी जान लगाकर मेहनत की और नतीजा पार्टी के पक्ष में निकालकर दिया, वही आज हेमामालिनी से मिलने तक को तैयार नहीं क्‍योंकि उनसे मिलने में पहले उनका कॉकस आड़े आता है।
जाहिर है कि जब निष्‍ठावान तथा समर्पित पार्टीजनों को ही अपनी सांसद से मिलने में कोई रुचि इसलिए न रही हो क्‍योंकि उनके मान-सम्‍मान व स्‍वाभिमान को ठेस पहुंचाई जाती है तो आम जनता अपनी सांसद से मुलाकात करने तक की हिम्‍मत कैसे कर सकती है। कैसे वह अपनी समस्‍याएं उस तक पहुंचा सकती है।
कैसे वह उस मथुरा के सर्वाधिक महंगे होटलों में शुमार एक होटल के कमरे का दरवाजा खटखटा सकती है जिसमें उनकी सांसद ठहरती हैं और जहां तक पहुंचने से पहले किसी को भी दलालों के उस कॉकस से मुखातिब होना पड़ता है जो खुद को सांसद से कहीं अधिक विशिष्‍ट समझता हो और मानता हो कि काठ की हड़िया ऐसे ही बार-बार चढ़ती रहेगी।
इसमें कोई दो राय नहीं कि सांसद के इर्द-गिर्द बैठे कॉकस के लिए न 2017 के विधानसभा चुनाव कोई मायने रखते हैं और न 2019 के लोकसभा चुनाव, उसके लिए मतदाता आज सिर्फ और सिर्फ याचक जितनी हैसियत रखता है और पार्टी के कर्मठ कार्यकर्ता निजी चाकर जितनी, लेकिन भाजपा तथा उसकी मथुरा से सांसद हेमामालिनी के लिए नि:संदेह इन सब का बहुत महत्‍व होगा क्‍योंकि राजनीति में उनका अपना वजूद इसी सब पर टिका है।
यह वो फिल्‍मी दुनिया नहीं है जहां स्‍वप्‍न सुंदरी बनकर वर्षों-वर्षों तक लोगों के दिलों पर राज किया जा सकता है, यह राजनीति है…और राजनीति का रास्‍ता उन खेत-खलिहानों की पगडंडियों से होकर जाता है जिन पर मेहनतकश किसान अपना पसीना बहाता है, शहर की उन टूटी-फूटी सड़कों से होकर संसद तक पहुंचाता है जिन पर आम आदमी इस उम्‍मीद के साथ गुजरता है कि कभी कोई मोदी अपना वादा निभायेगा, कभी कोई जनप्रतिनिधि अपना कर्तव्‍य समझेगा।
माना कि अब तक कोई जनप्रतिनिधि जन आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतरा, और हेमामालिनी भी कोई अपवाद नहीं हैं किंतु हेमामालिनी से पहले मथुरा की जनता को कोई ऐसा सांसद भी नहीं मिला जिसे समस्‍याएं बताना तो दूर, मुलाकात कर पाना भी एक समस्‍या रहा हो।
इससे पहले कि आगामी विधानसभा चुनावों में भाजपा के लिए मथुरा की विशिष्‍ट सांसद ही खुद एक समस्‍या बन जाएं, पार्टी के शीर्ष नेतृत्‍व तथा सांसद हेमामालिनी को स्‍थिति की गंभीरता समय रहते समझनी होगी।
यदि समय रहते समस्‍या नहीं समझी गई तो तय मानिए कि मथुरा में भाजपा को अच्‍छे दिन दिखाई देने से रहे…और मथुरा विधानसभा में यथास्‍थिति रहने का सीधा मतलब है कि प्रदेश में कोई उल्‍लेखनीय उपलब्‍धि संभव नहीं हो पायेगी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

कल्‍पतरू ग्रुप का खेल खत्‍म, देश से भागने की कोशिश में है जयकृष्‍ण राणा

मथुरा बेस्‍ड कल्‍पतरू ग्रुप का खेल खत्‍म हो गया लगता है, हालांकि ग्रुप से जुड़े कुछ लोग अब भी विभिन्‍न स्‍तर पर सफाई देने की कोशिश में लगे हैं किंतु अधिकांश लोगों ने ग्रुप का खेल खत्‍म होने की बात स्‍वीकार करनी शुरू कर दी है।
ग्रुप का मथुरा से प्रकाशित एकमात्र सुबह का अखबार कल्‍पतरू एक्‍सप्रेस तो इस महीने की शुरूआत में ही बंद हो गया था किंतु अब बाकी प्रोजेक्‍ट भी बंद होने लगे हैं। अधिकांश प्रोजेक्‍ट के कर्मचारियों ने भी ऑफिस आना छोड़ दिया है और जितने लोग ऑफिस पहुंच भी रहे हैं, वह सिर्फ इस प्रयास में हैं कि किसी भी तरह अपना रुका हुआ वेतन हासिल कर लिया जाए।
ग्रुप से जुड़े सूत्रों के मुताबिक ग्रुप के विभिन्‍न प्रोजेक्‍ट्स तथा कंपनियों में अब तक कार्यरत तमाम लोग ऐसे हैं जिन्‍हें पिछले छ:-छ: महीने से वेतन नहीं मिला। ऐसे लोगों के लिए परिवार का गुजर-बसर करना तक मुश्‍किल हो चुका है। 50-50 हजार रुपया प्रतिमाह के वेतन पर कार्यरत एक-एक व्‍यक्‍ति का इस तरह ग्रुप पर तीन-तीन लाख रुपया बकाया है लेकिन न कोई उनकी ओर देखने वाला है और न सुनने वाला।
बताया जाता है कि ग्रुप का जहाज डूबने की आंशका होते ही ग्रुप के चेयरमैन जयकृष्‍ण राणा की अब तक चमचागीरी करने में लिप्‍त रहे अधिकांश लोग गायब हो चुके हैं। ये वो लोग हैं जिन्‍हें जयकृष्‍ण राणा द्वारा अपना विश्‍वस्‍त तथा वफादार मानते हुए न केवल अच्‍छा खासा वेतन दिया जाता था बल्‍कि लग्‍ज़री गाड़ियां भी उपलब्‍ध करा रखी थीं। जयकृष्‍ण राणा के मुंहलगे कई कर्मचारी तो खुद टाटा सफारी इस्‍तेमाल किया करते थे और परिवार के लिए ग्रुप से ही छोटी गाड़ियां ले रखी थीं।
सूत्रों का कहना है चमचागीरी पसंद करने वाला जयकृष्‍ण राणा अब खुद भी अपने चुरमुरा (फरह) स्‍थित उस ऑफिस में नहीं बैठ रहा जहां कभी पूरे लाव-लश्‍कर तथा निजी सुरक्षा गार्ड्स सहित रुतबे के साथ बैठा करता था।
बताया जाता है कि कल्‍पतरू ग्रुप का जहाज डूबने की जानकारी उसके मथुरा से बाहर के निवेशकों को भी हो चुकी है और वो लोग चुरमुरा पहुंचने लगे हैं।
बताया जाता है कि इन लोगों ने वहीं एक किस्‍म का धरना दे रखा है और यही कारण है कि जयकृष्‍ण राणा चुरमुरा नहीं जा रहा।
दरअसल, उसे मालूम है कि एक ओर कर्मचारी तथा दूसरी ओर निवेशक उससे पैसों की मांग करेंगे जो वह देना नहीं चाहता।
पता लगा है कि मथुरा की चंदन वन कॉलोनी में जयकृष्‍ण राणा ने कोई ऑफिस जैसा गोपनीय निवास बना रखा है, जहां वह अपने खास गुर्गों तथा सुरक्षा बलों के साथ बैठता है। यहां उसके गुर्गों तथा सुरक्षाबलों की इजाजत के बिना परिन्‍दा भी पर नहीं मार सकता। इस ऑफिसनुमा घर की जानकारी बहुत ही कम लोगों को है।
यदि कोई कर्मचारी या निवेशक किसी तरह जानकारी हासिल करके वहां तक पहुंचने का दुस्‍साहस करता है तो राणा के गुर्गे उसे फिर उस ओर मुंह न करने की चेतावनी के साथ लौटा देते हैं। साथ ही यह भी समझा देते हैं कि यदि फिर कभी इधर आने की जुर्रत की तो गंभीर परिणाम भुगतना पड़ सकता है।
राणा के अति निकटस्‍थ सूत्रों का तो यहां तक कहना है कि राणा सहाराश्री की तरह कानून की गिरफ्त में नहीं आना चाहता और इसके लिए अपने खास लोगों से सलाह-मशविरा कर रहा है।
सूत्रों का कहना है कि जयकृष्‍ण राणा इस फिराक में है कि किसी भी तरह एकबार देश से बाहर निकल लिया जाए और फिर कभी इधर मुड़कर न देखा जाए। इसके लिए राणा ने अपने पसंदीदा एक मुल्‍क में पूरा बंदोबस्‍त भी कर लिया है, बस उसे इंतजार है उस मौके का जिससे वह सबको चकमा देकर बाहर निकल सके।
एक ओर सीक्‍यूरिटीज एंड एक्‍सचेंच बोर्ड ऑफ इंडिया (सेबी) का गले तक कस चुका शिकंजा, दूसरी ओर निवेशकों का दबाव और इसके अलावा कर्मचारियों का हर दिन बढ़ता वेतन…इन सबसे निपटने की क्षमता अब कल्‍पतरू ग्रुप और उसके चेयरमैन जयकृष्‍ण राणा में बची नहीं है लिहाजा अब उसके लिए दो ही रास्‍ते शेष हैं।
पहला रास्‍ता है सारी स्‍थिति को सामने रखकर कानूनी प्रक्रिया का सामना करे और दूसरा रास्‍ता है कि सबकी आंखों में धूल झोंककर भाग खड़ा हो।
अब देखना यह है कि जयकृष्‍ण राणा को इनमें से कौन सा रास्‍ता रास आता है, हालांकि उसके गुर्गे अब भी यही कहते हैं कि अखबार भी शुरू होगा और कर्मचारियों को उनका पूरा वेतन भी दिया जायेगा परंतु हालात कुछ और बयां कर रहे हैं।
-लीजेंड न्‍यूज़
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