शनिवार, 13 मई 2017

So Sorry: अखिलेश में गुजरात के गधों से भी कम दिमाग है, वह बेवकूफ हैं…

उत्तर प्रदेश के पदच्‍युत मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव में गुजरात के गधों जितना भी दिमाग नहीं हैं, यह उन्‍होंने कल के अपने बयान से खुद-ब-खुद सिद्ध कर दिया।
यह कहना है गुजरात के शहीद लांस नायक गोपाल सिंह भदौरिया के पिता मुनीम सिंह का। लांस नायक गोपाल सिंह भदौरिया इसी साल जम्मू-कश्मीर में आतंकियों से लोहा लेते हुए शहीद हुए थे।
नाराज मुनीम सिंह ने तो यहां तक कह दिया कि एक आदमी जो अपने पिता का नहीं हो सका, वह देश का क्या होगा?
उन्होंने कहा, ‘उत्तर प्रदेश में उन्होंने हिंदू और मुस्लिमों को बांटा। ऐसे ही ठाकुरों, ब्राह्मणों और राजपूतों को बांटा। इसी बांटने वाली राजनीति के कारण उन्हें सत्ता से बेदखल किया गया। उन्होंने पूर्व में गुजरात के गधों को लेकर बात की थी और आज साबित कर दिया है कि उनके पास एक गधे के बराबर भी दिमाग नहीं है।’
एयरफोर्स से बतौर नॉन कमिशंड ऑफिसर के तौर पर सेवानिवृत होने वाले नरेंद्र देसाई कहते हैं, ‘अखिलेश यादव ने जो कहा वह बेवकूफी की हद है। शहीद सिर्फ शहीद होता है भले ही वह यूपी, बिहार या कहीं और का हो। यह बहुत घृणित बयान है, इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, चाहे यह कोई आम आदमी कहे या फिर कोई पूर्व सीएम।’
उल्‍लेखनीय है कि उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कल कहा था कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, दक्षिण भारत और देश के दूसरे हिस्से के जवानों ने शहादत दी है। कोई मुझे बता सकता है कि गुजरात का कोई जवान देश की रक्षा के लिए शहीद हुआ हो?
अखिलेश यादव ने बुधवार को कहा था कि गुजरात के किसी जवान ने आज तक शहादत नहीं दी है।
गुजरात के शहीद लांस नायक गोपाल सिंह भदौरिया के पिता मुनीम सिंह और एयरफोर्स से बतौर नॉन कमिशंड ऑफिसर सेवानिवृत होने वाले नरेंद्र देसाई ने अखिलेश यादव के इसी बयान पर अपनी तीखी प्रतिक्रिया दी है।
उन्‍होंने पूछा है कि अखिलेश यादव क्या आप जानते हैं?
1- विजयवाड़ा के नजदीक साबरकांठा जिले के मात्र 6500 की जनसंख्‍या वाले कोडियावाड़ा में 1,200 से अधिक लोग भारतीय सेना के लिए अपनी सेवाएं दे रहे हैं। 700 परिवार वाले इस गांव में हर परिवार से एक से अधिक सदस्य सेना में है।
2- गुजरात में मार्च 31 तक 26,656 पूर्व सर्विसमैन थे और 3,517 शहीदों की विधवाएं। इनमें से 6,223 तो सिर्फ अहमदाबाद से ही थे। गुजरात के 39 बेटों को वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। गुजरात के 20 बेटों ने आंतकियों से लोहा लेते हुए अपनी जान गंवाई और 24 बेटों ने देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए प्राणों का बलिदान किया।
1999 के करगिल युद्ध में शहीद हुए मुकेश राठौड़ की पत्नी राजश्री का कहना है, ‘अखिलेश का बयान हमारे लिए दिल तोड़ने वाला है।
कहते हैं कि कमान से निकला हुआ तीर और जुबान से निकले हुए शब्‍द, वापस नहीं लिए जा सकते। अखिलेश यादव ने जो बोल दिया सो बोल दिया।
बहरहाल, अखिलेश के इस बयान ने एक रहस्‍य पर से पर्दा जरूर उठा दिया।
वह रहस्‍य जिसे अखिलेश ने ही यूपी के चुनावों में कांग्रेस के युवराज राहुल गांधी से दोस्‍ती करके गठबंधन के रूप में क्रिएट किया था।
अब शायद लोगों को समझ में आ गया होगा कि अखिलेश और राहुल की दोस्‍ती का आधार पार्टी के धरातल पर न होकर बुद्धि के धरातल पर था।
यह बात अलग है कि अखिलेश की बुद्धि का पता उनके चुनाव हारने के बाद लगा है और राहुल की बुद्धि का आंकलन कांग्रेस के साथ-साथ देश ने भी बहुत पहले ही कर लिया था। यह भी एक इत्‍तिफाक है कि दोनों युवराज अपनी अंतिम शिक्षा विदेश से प्राप्‍त करके आए थे।
यूपी को ”इनका साथ” कितना पसंद आया, यह बताने की तो अब कोई जरूरत रह नहीं गई अलबत्‍ता यह बताना शायद आवश्‍यक हो गया है कि पढ़ाई देश में हो अथवा विदेश में, दिमाग के अंदर उतनी ही समा पाती है जितना दिमाग आपके पास होता है। बाकी तो सब सिर के ऊपर से निकल जाती है।
वैसे भी पढ़ाई और शिक्षा दो अलग-अलग चीजें हैं। अखिलेश यादव पढ़े-लिखे हो सकते हैं किंतु शिक्षित नजर नहीं आते। शिक्षा प्राप्‍त की होती तो गुजरात से शहीद हुए जवानों की बावत कुछ तो पता होता।
उन्‍होंने तो सीधे-सीधे न सिर्फ सवाल दाग दिया बल्‍कि जवाब भी दे दिया।
पहले कहा, कोई मुझे बता सकता है कि गुजरात का कोई जवान देश की रक्षा के लिए शहीद हुआ हो?
फिर बोले, गुजरात के किसी जवान ने आज तक शहादत नहीं दी है।
मुझे तो लगता है कि वह भारत के भौगोलिक ज्ञान से भी शून्‍य हैं। उन्‍हें शायद ही पता हो कि भारत कितना बड़ा है और उसकी सीमाएं कहां-कहां तक फैली हुई हैं।
ऐसा भी संभव है कि यूपी के मुख्‍यमंत्री पद पर रहते हुए उन्‍हें यूपी में ही संपूर्ण भारत के दर्शन होते रहे हों और इसीलिए वह कभी प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी को चुनौती देते थे तो कभी गुजरात के गधों का विज्ञापन देखकर भड़क जाते थे।
रही-सही कसर राहुल गांधी से उस दोस्‍ती ने पूरी कर दी जिसकी खातिर वह अब भी गुनगुना रहे हैं कि ”ये दोस्‍ती हम नहीं तोड़ेंगे”।
गोस्‍वामी तुलसीदास सैकड़ों साल पहले कह गए थे कि ”जाकों प्रभु दारुण दु:ख दैहीं, ताकी मति पहले हर लैहीं”।
अखिलेश के बयानों को सुनकर अब ऐसा लगने लगा है कि वह एक ओर जहां समाजवादी पार्टी को इतिहास बना देने वाले आखिरी युवराज साबित होंगे वहीं दूसरी ओर समाजवादी कुनबे के लिए अंतिम मुख्‍यमंत्री।
बताते हैं कि उनके बचपन का नाम टीपू है जिसे लेकर वह हमेशा खुद के टीपू सुल्‍तान होने का मुगालता पालते रहे। टीपू तो सामान्‍य बोलचाल की भाषा में टीपने वाले यानि नकल करने वाले को भी कहते हैं।
अक्‍ल के इस्‍तेमाल में अखिलेश, राहुल गांधी की नकल कर रहे हैं या अपनी बुआ मायावती की, यह तो वही बता सकते हैं लेकिन इतना तो कोई भी बता सकता है कि उनके पास अक्‍ल बहुत इफराती नहीं है।
ऐसे में शहीद लांस नायक गोपाल सिंह भदौरिया के पिता मुनीम सिंह द्वारा अखिलेश को गुजरात के गधों से भी कम अक्‍ल बताना और एयरफोर्स से ऑफिसर के तौर पर सेवानिवृत होने वाले नरेंद्र देसाई द्वारा बेवकूफ की संज्ञा देना, कोई अतिशयोक्‍ति नजर नहीं आती।
सच तो यह है कि चाहे किसी शहीद का पिता हो अथवा चाहे कोई सेवानिवृत आर्मी अफसर, अखिलेश जैसे बयानवीरों को इससे ज्‍यादा शलीन शब्‍दों में जवाब दे नहीं दे सकता क्‍योंकि इनके लिए इतना तो बनता है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

12 घंटे अंधेरे में डूबा रहा ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा का चुनाव क्षेत्र, पंडों पर CM के कमेंट को लेकर भी श्रीकांत शर्मा की सफाई नाकाफी

https://legendnews.in/constituency-of-energy-minister-shrikant-sharma-dipped-in-darkness-for-12-hours/
मात्र एक तार टूटने पर उत्तर प्रदेश के ऊर्जा मंत्री और सरकार के प्रवक्‍ता श्रीकांत शर्मा के चुनाव क्षेत्र का सर्वाघिक पॉश इलाका पूरे 12 घंटे अंधेरे में डूबा रहा जबकि प्रदेश सरकार शहरी क्षेत्र को 24 घंटे, तहसील मुख्‍यालय को 20 घंटे और ग्रामीण क्षेत्रों को 16 घंटे बिजली देने का दावा कर रही है।
यह हाल तो तब है जबकि मथुरा के ही कस्‍बा गोवर्धन का ‘गांठौली’, ऊर्जा मंत्री का पैतृक गांव है और मथुरा जनपद विश्‍व पटल पर महाभारत नायक योगीराज श्रीकृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली के रूप में न सिर्फ विशिष्‍ट स्‍थान रखता है बल्‍कि उस ताज ट्रिपेजियम जोन का भी हिस्‍सा है जहां निर्बाध विद्युत आपूर्ति के आदेश सर्वोच्‍च न्‍यायालय द्वारा दिए हुए हैं।
अब इसे दिया तले अंधेरे की संज्ञा दें अथवा दुष्यंत कुमार के इस शेर से जोड़ें कि-
कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये।
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये।।
कल रात करीब साढ़े दस बजे मामूली सी हवा क्‍या चली, उसने प्रदेश सरकार के दावे की भी हवा निकाल कर रख दी। वृंदावन फीडर से पोषित शहर के सर्वाधिक पॉश इलाकों में शुमार कॉलोनियां राधापुरम्, राधापुरम् एस्‍टेट और राधापुरम् एस्‍टेट ऐक्‍सटेंशन सहित कृष्‍णा नगर आदि का समूचा क्षेत्र अंधेरे में पूरी तरह डूब गया। 42 डिग्री तक तापमान वाली भीषण गर्मी के इस दौर में पहले तो लोग सोचते रहे कि हवा कम होते ही रोज की तरह बिजली आ जाएगी किंतु बिजली ने पूरी रात इंतजार में कटवा दी।
सुबह 7 बजे और फिर 8 बजे दो बार 15-15 मिनट के लिए बिजली चमकी लेकिन फिर गई तो साढ़े दस बजे यानि पूरे 12 घंटे बाद ही सामान्‍य हो सकी।
इस बारे में पूछे जाने पर विद्युत विभाग के शहरी एसई प्रदीप मित्तल ने बताया कि रात को हवा चलने पर गोकुल रेस्‍टोरेंट के पास ओवरहेड लाइन का तार टूट गया था, जिसे रात में हमारे कर्मचारी तलाश नहीं पाए। सुबह तार जोड़ दिया गया लेकिन फिर एकसाथ लोड बढ़ जाने के कारण सप्‍लाई बाधित करनी पड़ी।
गौरतलब है कि इसी क्षेत्र में स्‍थित राधा वैली कॉलोनी में ऊर्जा मंत्री ने अपने लिए किराए का एक आवास ले रखा है परंतु वहां की बिजली हवा चलने के एक घंटे बाद ही सुचारू हो गई। अधिकारियों की मानें तो ऊर्जा मंत्री की कॉलोनी को सप्‍लाई ”गौर केंद्र” नामक औद्योगिक क्षेत्र से मिलती है इसलिए वहां कोई समस्‍या खड़ी नहीं हुई।
वैसे ऊर्जा मंत्री ने राधा वैली में अपना अस्‍थाई निवास मथुरा की शहरी सीट से चुनाव लड़ने के दौरान बनाया था क्‍योंकि उन पर बाहरी होने का ठप्‍पा लगाया जा रहा था।
ऐसा इसलिए क्‍योंकि ऊर्जा मंत्री गोवर्धन के गांव गांठौली को करीब दो दशक पहले राम-राम कहकर चले गए और तभी अचानक सामने आए जब उनका नाम मथुरा की शहरी सीट से चुनाव लड़ने के लिए घोषित किया गया।
ऊर्जा मंत्री के चुनाव क्षेत्र का एक बड़ा हिस्‍सा 12 घंटे इस भीषण गर्मी में बिजली के लिए तरसता रहा किंतु ऊर्जा मंत्री को इसकी खबर भी लगी या नहीं लगी, इसकी खबर देने वाला कोई नहीं है।
”लीजेंड न्‍यूज़” ने ऊर्जा मंत्री के मोबाइल नंबर 09999476555 पर बात करने की कोशिश की तो फोन रिसीव करने वाले उनके किसी निजी सचिव ने कहा कि हमने नोट कर लिया है, थोड़ी देर में मंत्री जी से आपकी बात करा देंगे लेकिन शाम तक मंत्री जी या उनके किसी नुमाइंदे से भी जवाब नहीं मिला।
यहां उल्‍लेखनीय है कि बिजली को एक बड़ा मुद्दा बनाकर सत्‍ता पर काबिज होने वाली भाजपा सरकार के ऊर्जा मंत्री और मुख्‍यमंत्री ने भी इस आशय के आदेश विभागीय अधिकारियों को दे रखे हैं कि सामान्‍यत: तो बिजली की आपूर्ति में बाधा आनी ही नहीं चाहिए और आती भी है तो उसका तत्‍काल समाधान होना चाहिए। रात में तो बिजली की आपूर्ति शत-प्रतिशत सुनिश्‍चित होनी चाहिए।
इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रदेश में योगी आदित्‍यनाथ की सरकार बनने के बाद बिजली की आपूर्ति में उल्‍लेखनीय सुधार हुआ है किंतु कल रात जिस तरह मात्र एक तार टूटने पर 12 घंटे सप्‍लाई ठप्‍प रही उसने लोगों को सोचने पर मजबूर कर दिया है।
लोगों के सोचने पर मजबूर होने का एक कारण यह भी है कि अभी तो आंधी रूपी हवाओं के चलने का यह प्रथम चरण है, अभी तो करीब दो महीने काफी तेज आंधियां भी आ सकती हैं और हवाएं भी चल सकती हैं। इसके बाद बारिश का दौर शुरू हो जाएगा और ऐसे में यदि बिजली विभाग इसी गति से काम करेगा तो ”अखिलेश राज” का अहसास होते देर नहीं लगेगी।
ऊर्जा मंत्री से मथुरा की जनता इसलिए भी अपेक्षा रखती है क्‍योंकि सांसद हेमा मालिनी स्‍थानीय जनप्रतिनिधि बनने के बावजूद स्‍वप्‍नसुंदरी ही बनी हुई हैं जबकि उनके कार्यकाल का आधे से अधिक हिस्‍सा बीत चुका है।
कहने को भाजपा ने यहां एक मीडिया प्रभारी और एक मीडिया प्रमुख भी बना रखा है लेकिन उनकी सक्रियता सिर्फ और सिर्फ किसी बड़े नेता के आगमन पर दिखाई देती है। सामान्‍य तौर पर मीडिया से उनकी दूरी किसी विशिष्‍ट व्‍यक्‍ति की तरह बनी रहती है जबकि भाजपा विशिष्‍ट और अति विशिष्‍ट कल्‍चर से मुक्‍त होने की हिमायती है। हालांकि मीडिया प्रमुख संजय शर्मा को जब यह जानकारी दी गई कि शहर का एक बड़ा क्षेत्र मात्र तार टूटने के कारण 12 घंटे अंधेरे में डूबा रहा तो उन्‍होंने कहा कि वह ऊर्जा मंत्री को इस बात से अवगत कराएंगे।
अब देखना होगा कि ऊर्जा मंत्री उनकी बात को कितनी गंभीरता से लेते हैं और भविष्‍य में इस भीषण गर्मी के चलते इस तरह की पुनरावृत्ति होने से रोक पाते हैं या नहीं।
बहरहाल, 2022 भले ही दूर हो लेकिन 2019 बहुत दूर नहीं है। श्रीकांत शर्मा हों या दूसरे विधायक और मंत्री, वीआपी कल्‍चर से मुक्‍त रहने का प्रदर्शन करने भर से काम नहीं चलेगा। वास्‍तविकता के धरातल पर आकर महसूस भी कराना होगा कि वह हर सुख-दुख में जनता के साथ खड़े हैं। पत्रकार तो क्‍या, किसी आमजन का भी नंबर मंत्री के निजी सचिव द्वारा नोट कर लेना उसी सरकारी कल्‍चर का हिस्‍सा है जिससे मुक्‍ति की बात तो भाजपा कर रही है, लेकिन मुक्‍त होती नजर नहीं आ रही।
अब बात मथुरा के ”पंडों” को लेकर दी गई सफाई पर
हाल में यूपी के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ ने अपने आगरा दौरे पर मथुरा व आगरा में सक्रिय ”लपकों” के साथ पंडों को भी जोड़ते हुए उनके खिलाफ अभियान चलाने की बात कही जबकि लपकों और पंडों को किसी भी तरह एकसाथ नहीं जोड़ा जा सकता।
देश के हर प्रमुख धार्मिक स्‍थल पर पंडे होते हैं, जो दरअसल पुरोहित हैं। पूरब से पश्‍चिम तक और उत्तर से दक्षिण तक इन पुरोहितों का अपने यजमानों से एक ओर जहां आत्‍मिक रिश्‍ता होता है वहीं दूसरी ओर इनका उनके साथ पारिवारिक संबंध रहता है। यह एक-दूसरे के घर आते-जाते हैं। एक-दूसरे के यहां ठहरते हैं और उनके सुख-दुख में सहभागी बनते हैं।
परहित सोचने वाले को पुरोहित कहा जाता है और पुरोहितों की इसी सोच ने देशभर में उन्‍हें हमेशा मान-सम्‍मान दिलाया है। यजमान नया हो अथवा पुराना, पुरोहित हमेशा उसके हित में ही लगा रहता है।
इसके ठीक विपरीत ”लपके” वह तत्‍व हैं जिनका एकमात्र मकसद किसी न किसी तरह यात्री, पर्यटक एवं सैलानियों का आर्थिक दोहन करना होता है। मथुरा में यह तत्‍व धर्म की आड़ लेकर इस काम को करते हैं तो आगरा जैसे पर्यटन स्‍थल पर अवैध गाइड के रूप में।
जाहिर है कि मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ द्वारा लपकों और पंडों को एक ही श्रेणी में रखकर किए गए कमेंट से मथुरा-वृंदावन सहित आसपास के सभी प्रमुख धार्मिक स्‍थलों के पुराहितों को ठेस लगना स्‍वाभाविक था लिहाजा सभी ने अपने-अपने तरह से योगी जी के कमेंट पर विरोध प्रदर्शन किया।
यहां सबसे महत्‍वपूर्ण और गौर करने वाली बात यह है कि प्रदेश के ऊर्जा मंत्री और सरकार के प्रवक्‍ता श्रीकांत शर्मा भी जिस कौशिक परिवार से ताल्‍लुक रखते हैं उसका भी पारंपरिक व्‍यवसाय पुरोहिताई करना ही रहा है। कहने का अर्थ यह है कि वह या उनके परिवार में से किसी ने कभी पंडागीरी की हो अथवा न की हो किंतु हैं वह भी पंडा ही। ऐसे में उनके द्वारा मुख्‍यमंत्री के बचाव में मात्र इतना कह देना कि सरकार पंडा-पुरोहितों का पूरा सम्‍मान करती है, पर्याप्‍त नहीं है।
सरकार के प्रवक्‍ता की हैसियत से उन्‍हें आगे आकर मुख्‍यमंत्री को पंडों और लपकों का भेद बताना चाहिए और मथुरा जनपद के पुरोहितों से वायदा करना चाहिए कि भविष्‍य में ऐसी चूक नहीं होगी।
हो सकता है कि योगी आदित्‍यनाथ पंडों और लपकों में भारी फर्क से अनभिज्ञ हों लेकिन एक पुरोहित परिवार का हिस्‍सा होने के नाते ऊर्जा मंत्री व सरकार के प्रवक्‍ता श्रीकांत शर्मा को योगी जी के सामने स्‍थिति स्‍पष्‍ट करनी चाहिए न कि अपने स्‍तर पर बयान देकर सतही रूप से मामले को रफा-दफा करने का प्रयास करना चाहिए।
श्रीकांत शर्मा का यह पहला चुनाव था और पहली ही बार उन्‍हें मंत्रिपद प्राप्‍त हुआ है। उनसे पूर्व भी मथुरा से निर्वचित अनेक विधायक विभिन्‍न मंत्री पदों को सुशोभित करते रहे हैं किंतु आज उनकी राजनीति अवसान पर है।
बेहतर होगा कि श्रीकांत शर्मा उनके असमय राजनीतिक अवसान के कारणों को अपने जेहन में रखें अन्‍यथा यह तो जानते ही होंगे कि मथुरा को तीन लोक से न्‍यारी नगरी की उपमा भी प्राप्‍त है। पार्टी के 14 साल के वनवास को खत्‍म हुए अभी तो चौदह सप्‍ताह भी नहीं हुए। अभी मथुरा की जनता को उनकी दरकार है, फिर उन्‍हें मथुरा की दरकार होगी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

सोमवार, 8 मई 2017

योगी आदित्‍यनाथ ”एक्‍शन” में लेकिन मथुरा भाजपा ”डिप्रेशन” में

उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ ”एक्‍शन” में हैं लेकिन मथुरा भाजपा ”डिप्रेशन” में है। लगता है जैसे कि सूबे की सत्ता से ”वनवास” का समय पूरा होने के बाद अब मथुरा भाजपा ”अज्ञातवास” पर है।
मथुरा में भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश उपाध्‍यक्ष को एसएसपी मुकुल गुप्‍ता इसलिए अपने ऑफिस से दो वरिष्‍ठ भाजपा नेताओं के सामने गिरफ्तार करा देते हैं क्‍योंकि वह एसएसपी को आइना दिखाने की कोशिश करते हैं किंतु मथुरा भाजपा का कुछ पता नहीं रहता। एक कार्यकर्ता को एक दरोगा बुरी तरह पीट देता है लेकिन मथुरा की भाजपा चुप्‍पी साधे बैठे रहती है।
वृंदावन की महिलाओं के अश्‍लील फोटो सोशल साइट पर डाले जा रहे हैं और यह काम एक गिरोह द्वारा किया जा रहा है, पीड़ित महिलाएं कभी थाने के तो कभी समाज सेवकों और नेताओं के चक्‍कर काट रही हैं लेकिन मथुरा भाजपा निष्‍क्रिय है।
पीड़ित महिलाओं को पुलिस उसी तरह मीठी गोली देकर बहला रही है जिस तरह समाजवादी शासन में बहला चुकी है लेकिन मथुरा भाजपा के किसी नेता ने पुलिस से जवाब तलब करना जरूरी नहीं समझा।
भारतीय जनता युवा मोर्चा के प्रदेश उपाध्‍यक्ष को अपने कार्यालय से पकड़वाकर उनका शांति भंग करने की धारा 151 में चालान कराने वाले एसएसपी मोहित गुप्‍ता इस संवेदनशील मामले में कहते हैं कि जांच चल रही है, हरकत करने वालों को गिरफ्तार करने के प्रयास जारी हैं जबकि पीड़ित महिलाओं का कहना है कि इस घ्रणित अपराध को अंजाम देने वाले वृंदावन के अंदर ही छिपे हैं।
सत्‍ताधारी भारतीय जनता पार्टी के स्‍थानीय विधायक और मंत्री कहने को तो पार्टी कार्यालय पर बारी-बारी से जनशिकायतों के लिए मजमा लगाते हैं लेकिन उन जनशिकायतों का निवारण होना तो दूर, खुद विधायक और मंत्रियों की बात भी अधिकारी सुनने को तैयार नहीं। कभी बल्‍देव क्षेत्र के विधायक पूरन प्रकाश को पार्टी कार्यालय के निकट बने शौचालय का ताला तोड़ना पड़ता है तो कभी तत्‍कालीन डीएम का तबादला होने जैसी थोथी दलील देनी पड़ती है।
आश्‍चर्य की बात तो यह है कि बल्‍देव क्षेत्र के विधायक पूरन प्रकाश को जिस सार्वजनिक शौचालय का ताला तोड़ना पड़ा, उसकी चाभी उस नगर पालिका प्रशासन के कब्‍जे में थी जिस पर भाजपा नेत्री मनीषा गुप्‍ता काबिज हैं। विधायक पूरन प्रकाश पूर्व में पालिका प्रशासन से शौचालय का ताला खुलावाने को कह चुके थे लेकिन किसी के कान पर जूं नहीं रेंगी।
विश्‍व हिंदू परिषद के नेता और पूर्व आर्मी अफसर कैप्‍टिन हरिहर शर्मा अपने शहीद पुत्र की पत्‍नी के नाम जमीन को दंबंगों के अवैध कब्‍जे से मुक्‍त कराने के लिए कभी पुलिस की तो कभी अपनी ही पार्टी के विधायकों की गणेश परिक्रमा कर रहे हैं लेकिन कहीं से राहत मिलती नजर नहीं आ रही पर मथुरा भाजपा चुप्‍पी साधे बैठी है।
भाजपा के ही फायर ब्रांड हिंदूवादी नेता और यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट तथा एनजीटी में याचिका दाखिल करने वाले गोपेश्‍वर नाथ चतुर्वेदी को अधिकारियों से शिकायत करनी पड़ रही है कि आज भी अवैध रूप से बूचड़ खाने चल रहे हैं और अवैध बूचड़खाने चलाने वालों ने पूर्व में सील किए गए कट्टीघर की दीवार तोड़ दी है लेकिन मथुरा भाजपा के स्‍तर से उनका साथ देने कोई खड़ा नहीं होता।
होता है तो यह कि मीट की जिन अवैध दुकानों को बंद कराने के लिए सपा तथा उससे पहले बसपा के शासन में भी भाजपा के कुछ लोग एड़ी-चोटी का जोर लगाते रहे, उन्‍हें जब प्रदेश का निजाम बदलने के बाद हवा का रुख देखकर जिला प्रशासन ने बंद कराया तो भाजपा नेत्री मनीषा गुप्‍ता के नेतृत्‍व वाले नगर पालिका प्रशासन ने मानकों को ताक पर रखकर उनके लिए लाइसेंस जारी कर दिया। अब चंद भाजपाई उन लाइसेंसों को निरस्‍त कराने की कोशिश कर रहे हैं किंतु मथुरा भाजपा जीत की खुमारी उतारने में व्‍यस्‍त है।
योगी सरकार और उसके नुमाइंदे ऊर्जा मंत्री श्रीकांत शर्मा द्वारा बार-बार कहे जाने के बावजूद बिजली विभाग गरीबों को बिना पैसे बिजली कनैक्‍शन देने के लिए तैयार नहीं है लेकिन मथुरा भाजपा हाथ पर हाथ रखे बैठी है।
मथुरा भाजपा की कमान संभाले बैठे चौधरी तेजवीर सिंह तीन बार सांसद रह चुके हैं, लिहाजा उनकी कार्यप्रणाली से जिले की जनता बखूबी परिचित है। मथुरा में भाजपा को ”इतिहास बनाने वालों” की सूची के वह टॉपर रहे हैं लेकिन प्रदेश भाजपा को उनमें पता नहीं ऐसा क्‍या नजर आ रहा है कि वह उन्‍हें ही खेवनहार समझे बैठी है।
सब जानते हैं कि जो चौधरी तेजवीर सिंह तीन बार की अपनी सांसदी के दौरान किसी समस्‍या का समाधान कराने में सफल नहीं हुए, वो जिलाध्‍यक्ष के रूप में ऐसा क्‍या कर लेंगे जिसकी जनता को भाजपा से उम्‍मीद की जा रही है।
प्रदेश के कबीना मंत्री और छाता क्षेत्र से विधायक लक्ष्‍मीनारायण चौधरी को पार्टी के जिला कार्यालय में जनसुनवाई के दौरान एक फरियादी ने बताया कि उसकी पत्रावली पर एडीएम वित्त से लेकर तहसीलदार तक ने काम करने के आदेश जारी कर रखे हैं लेकिन एक लेखपाल उस पर कुंडली मारकर बैठा है।
फरियादी के अनुसार लेखपाल का कहना है कि तुमने भाजपा को वोट दिया है इसलिए अब भाजपा वालों से ही काम करा लो।
सदर तहसील के इस लेखपाल को वहां से हटाकर छाता तहसील भेजने का मौखिक आदेश मंत्री चौधरी लक्ष्‍मीनारायण ने तत्‍कालीन डीएम नितिन बंसल को दिया ताकि वह निष्‍पक्ष काम में रुकावट न बने किंतु डीएम ने मंत्री जी का आदेश एक कान से सुना और दूसरे कान से निकाल दिया।
इसके बाद यही फरियादी प्रदेश के ऊर्जा मंत्री, सरकार के प्रवक्‍ता और मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के विधायक श्रीकांत शर्मा से उनके राधा वैली स्‍थित मकान पर आकर मिला और अपनी व्‍यथा तथा प्रशासन की कथा बताई, जिस पर ऊर्जा मंत्री ने पूरी ऊर्जा से दावा किया कि 24 घंटों के अंदर समस्‍या का समाधान हो जाएगा। कल ऊर्जा मंत्री के दावे को 24 घंटे बीत गए लेकिन नतीजा अब भी ढाक के तीन पात है।
यह हाल तो तब है जबकि जिलाध्‍यक्ष चौधरी तेजवीर सिंह हर शिकायत का लेखा-जोखा रखने की बात कहते हैं और बताते हैं कि कृत कार्यवाही का ब्‍यौरा भी ले रहे हैं।
जिलाध्‍यक्ष की मानें तो जिस विभाग द्वारा काम नहीं किया जाएगा, उस विभाग की शिकायत मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ से की जाएगी।
अब जिलाध्‍यक्ष को कौन समझाए कि यदि योगी आदित्‍यनाथ को ही सारी शिकायतों का निस्‍तारण कराना होता तो क्‍यों वह अधिकारियों को कोई आदेश-निर्देश देते और क्‍यों यह कहते कि जनप्रतिनिधियों को जनता की शिकायतें न सिर्फ सुननी हैं बल्‍कि उनका निराकरण भी करना व कराना है।
योगी आदित्‍यनाथ के स्‍तर से ही सब-कुछ होगा तो संगठन की जिला कार्यकारिणी क्‍या करेगी, क्‍या वह केवल मंत्रियों के आगमन पर उनके इर्द-गिर्द खड़े होकर फोटो खिंचवाती रहेगी ताकि सनद रहे और वक्‍त जरूरत काम आए।
कल की ही अपनी लखनऊ मीटिंग में योगी आदित्‍यनाथ ने कार्यकताओं से कहा है कि मंत्रियों का स्‍वागत करने और उन्‍हें मालाएं पहनाने तक सीमित मत रहो। जनता के बीच जाकर उसकी समस्‍याओं का समाधान करो क्‍योंकि सत्‍ता हमें मौज करने के लिए नहीं मिली है। जनता ने भरोसा किया है अत: उसके भरोसे का मान रखो किंतु लगता है कि मथुरा भाजपा ऊंचा सुनती है। उसे लखनऊ की आवाज सुनाई नहीं देती।
यह हाल तो तब है जबकि नगर निकाय के चुनाव सिर पर हैं और भाजपा नेत्री मनीषा गुप्‍ता के नेतृत्‍व वाले नगर पालिका प्रशासन पर पौने दो करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप शासन स्‍तर पर तथा एनजीटी में लंबित है। आम जन तो क्‍या, खुद भाजपाई भी मनीषा गुप्‍ता के कार्यकाल से खुश नहीं हैं। चेयर पर्सन मनीषा गुप्‍ता पर भ्रष्‍टाचार के आरोप लगाने वालों में भाजपाई ही आगे रहे हैं।
माना कि मोदी जी का मुखौटा फिलहाल जमकर बिक रहा है और उसके सामने शिकवा-शिकायतें फीकी पड़ जाती हैं किंतु नगर निकाय के बाद 2019 का लोकसभा चुनाव भी सामने है। स्‍वप्‍न सुंदरी सांसद ने तीन साल से ऊपर का समय तो यह बताकर निकाल लिया कि यूपी में भाजपा की सरकार न होने के कारण वह अपेक्षित काम नहीं कर सकीं किंतु अब यह डायलॉग काम आने वाला नहीं है। अब उन्‍हें भी कुछ करके दिखाना होगा वर्ना जनता उसी तरह ठेंगा दिखा देगी जिस तरह जयंत चौधरी को दिखाया था।
स्‍वप्‍न सुंदरी तो स्‍वप्‍न सुंदरी हैं, हो सकता है उन्‍हें आगे की जीत-हार से कोई खास फर्क न पड़े लेकिन चौधरी तेजवीर सिंह एंड पार्टी और तमाम दूसरे स्‍थानीय भाजपा नेता आगे आने वाले परिणामों से जरूर प्रभावित होंगे। प्रभावित तो मोदी जी और विश्‍व की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भाजपा भी होगी इसलिए बेहतर है कि समय रहते सच्‍चाई को जान लें और समझ लें कि आमजन को कथा-पटकथा से ज्‍यादा मतलब नहीं होता। उसे मतलब होता है तो अपने काम से। काम के लिए आराम हराम है, और यही मंत्र मोदी जी का है तथा यही योगी जी का भी।
योगी जी की तरह एक्‍शन में रहोगे तो रिएक्‍शन नहीं होगा लेकिन यदि इसी प्रकार डिप्रेशन में बने रहे जैसे कि सत्ता पर काबिज होने के लगभग डेढ़ महीने बाद तक बने हुए हो तो तय जानिए कि रिएक्‍शन बड़ा भी हो सकता है।
जिलाध्‍यक्ष तेजवीर सिंह तो जनता के एक्‍शन और रिएक्‍शन दोनों का स्‍वाद भली प्रकार चख चुके हैं लिहाजा उनसे उम्‍मीद की जाती है कि लॉलीपॉप पकड़ाने की राजनीति समय रहते त्‍याग देंगे अन्‍यथा जनता के पास भाजपा को त्‍यागने के बहुत मौके होंगे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

जवाहर बाग कांड का जिन्‍न ”रामवृक्ष” फिर बोतल से बाहर, CBI के सामने चुनौती

मथुरा का जवाहर बाग कांड आज ठीक साढ़े 10 महीने बाद एकबार फिर तब सुर्खियों में आ गया जब पता लगा कि उक्‍त कांड को अंजाम देने वाले तथाकथित सत्‍याग्रहियों के सरगना रामवृक्ष यादव के कथित शव का डीएनए उसके लड़के से मैच नहीं कर रहा।
पुलिस ने रामवृक्ष यादव के कथित शव का डीएनए टेस्‍ट हैदराबाद फोरेंसिक साइंस लेबोरेट्री से कोर्ट के आदेश पर इसलिए करवाया था क्‍योंकि कोर्ट ने उपद्रव के दौरान रामवृक्ष के मारे जाने का पुलिसिया दावा पूरी तरह खारिज कर दिया था।
विभिन्‍न याचिकाओं के आधार पर कोर्ट द्वारा रामवृक्ष के शव को लेकर व्‍यक्‍त की गई शंका आज हैदराबाद फोरेंसिक साइंस लेबोरेट्री की रिपोर्ट के बाद सही साबित हुई।
ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यह पैदा होता है कि जिस व्‍यक्‍ति के अवशेषों को पुलिस ने रामवृक्ष का शव बताकर कहानी गढ़ी, वह शव रामवृक्ष का नहीं था तो रामवृक्ष गया कहां और जिसके शव को रामवृक्ष का बताया गया, वह शव आखिर किसका था?
इसके अलावा भी कई अन्‍य महत्‍वपूर्ण सवाल खड़े होते हैं। मसलन, पुलिस को किसी का भी शव रामवृक्ष का बताने की जरूरत क्‍या थी?
क्‍या पुलिस जानती थी कि वह रामवृक्ष के शव को लेकर झूठा दावा कर रही है और यदि उसने यह झूठा दावा किया तो किसे बचाने के लिए किया जबकि पुलिस के ही दो जांबाज अफसरों की रामवृक्ष व उसके गुर्गों ने जवाहर बाग के अंदर घेरकर बेरहमी से हत्‍या कर दी थी।
जाहिर है कि इन सभी प्रश्‍नों के उत्तर यदि कोई दे सकता है तो वही तत्‍कालीन पुलिस अफसर दे सकते हैं जिन्‍होंने जवाहर बाग कांड को अंजाम दिलाने में जाने-अनजाने बड़ी भूमिका अदा की।
2 जून 2016 से पहले के दो सालों में जिन-जिन पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों ने मथुरा को सुशोभित किया, उन्‍होंने ही इस कांड की पटकथा अपने-अपने हिसाब से लिखी नतीजतन अदना सा रामवृक्ष एक ऐसा विषवृक्ष बन बैठा जिसे उखाड़ फेंकना बहुत भारी पड़ गया।
फिलहाल, जवाहर बाग कांड की जांच हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई द्वारा की जा रही है लिहाजा अब सच्‍चाई का पता लगाने की जिम्‍मेदारी सीबीआई पर है। सीबीआई के लिए निश्‍चित ही इस कांड की परतें उघाड़ना किसी चुनौती से कम नहीं होगा क्‍योंकि इसकी जड़ें एक ओर जहां राजनीतिक गलियारों से जुड़ी हैं वहीं दूसरी ओर ब्‍यूरोक्रेट्स से ताल्‍लुक रखती हैं।
बताया जाता है कि रामवृक्ष यादव को गायब करने का मकसद ही यह था कि किसी भी प्रकार उसके राजनीतिक संरक्षणदाताओं का खुलासा न हो पाए और न यह पता लग पाए कि रामवृक्ष की योजना में कौन-कौन पर्दे के पीछे से शामिल था।
सर्वविदित है कि जिस प्रकार रामवृक्ष ने पूरे दो साल तक पुलिस व प्रशासनिक अधिकारियों को उनकी नाक के नीचे रहकर खुली चुनौती दी और अपना पूरा साम्राज्‍य खड़ा किया, वह उसके अकेले के बस की बात नहीं थी। सैकड़ों लोगों की भोजन व्‍यवस्‍था करना भी आसान काम नहीं था। हथियारों से लेकर वाहनों तक का जखीरा उसने यूं ही इकठ्ठा नहीं कर लिया होगा। कोई तो होगा जिसने एक सामान्‍य कद काठी के बुजुर्ग को इतनी पॉवर दे रखी थी कि वह समूचे जिले के सरकारी अमले को अपनी ठोकर पर रखता था और उनकी खुलेआम बेइज्‍जती करता था।
हजारों करोड़ रुपए मूल्‍य की जिस सरकारी जमीन पर वह अवैध रूप से काबिज था, उसकी बाउंड्री के अंदर बिना उसकी इजाजत के घुसने की कोई हिम्‍मत नहीं करता था।
2 जून 2016 की शाम एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी तथा एसओ फरह संतोष यादव ने जब रामवृक्ष की मर्जी के खिलाफ जवाहर बाग की बाउंड्री तोड़कर घुसने की हिम्‍मत दिखाई तो उसने दोनों अफसरों की जान ले ली।
ज़रा अंदाज लगाइए कि रामवृक्ष व उसके गुर्गों का रूप कितना वीभत्‍स रहा होगा कि इन दोनों पुलिस अफसरों के हमराह तक उनका साथ छोड़कर भाग खड़े हुए।
बहरहाल, इसमें शायद ही किसी को शक हो कि यदि जवाहर बाग कांड का पूरा सच किसी तरह सामने आ गया तो बहुत से ऐसे चेहरे बेनकाब होंगे जिनका उस समय की सत्ता से सीधा संबंध रहा है। फिर वो चाहे राजनेता हों अथवा नौकरशाह।
रहा सवाल इस बात का कि क्‍या रामवृक्ष जीवित है, तो इसकी संभावना बहुत कम है क्‍योंकि पुलिस इतनी कच्‍ची गोलियां कभी नहीं खेलती।
पुलिस के तत्‍कालीन अफसर भली प्रकार जानते थे कि यदि रामवृक्ष जिंदा बच गया तो वह सबका कच्‍चा चिठ्ठा खोल देगा, और कच्‍चा चिठ्ठा एकबार सामने आ गया तो उसके परिणाम बहुत दूरगामी होंगे।
यह बात अलग है कि जिस व्‍यक्‍ति के अवशेषों को पुलिस ने रामवृक्ष का शव बताकर सारी कहानी का पटाक्षेप करना चाहा, वह रामवृक्ष का नहीं निकला।
सच तो यह है कि पुलिस सबकुछ पहले से जानती थी और उसने रामवृक्ष को लेकर भी जो कहानी गढ़ी, वह पूर्व नियोजित थी।
पुलिस जानती थी कि रामवृक्ष उसके लिए जितना बड़ा सिरदर्द जिंदा रहते बना रहा, उतना ही मरने के बाद उस स्‍थिति में बन जाता जिस स्‍थिति में उसे उसका पोस्‍टमॉर्टम कराना पड़ता।
पुलिस ने इसीलिए रामवृक्ष के जिंदा रहने अथवा मारे जाने को एक रहस्‍य बनाकर छोड़ दिया। पुलिस बहुत अच्‍छी तरह जानती थी कि इस रहस्‍य से पर्दा उठाना किसी के लिए आसान नहीं होगा। सीबीआई के लिए भी नहीं।
-लीजेंड न्‍यूज़

रविवार, 9 अप्रैल 2017

सबसे बड़ी चुनौती: क्‍या पुलिस का DNA बदल पाएगी योगी सरकार ?

गोरखनाथ पीठ के महंत और उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ के सामने अब यदि सबसे बड़ी चुनौती कोई है तो वह है राज्‍य पुलिस की उसके DNA से निर्मित छवि को बदलना। वह छवि जो स्‍वतंत्र भारत में भी ठीक वैसी ही है, जैसी स्‍वतंत्रता से 86 साल पहले उसके गठन के समय थी।
पुलिस की छवि को लेकर कोई ”अपवाद” भी नहीं है। पुलिस का चरित्र देशभर में कमोबेश एक जैसा है। फिर चाहे उत्तर प्रदेश हो या बिहार, राजस्‍थान हो या मध्‍यप्रदेश, उत्तराखंड हो या पश्‍चिम बंगाल, जम्‍मू-कश्‍मीर हो अथवा तमिलनाडु, दिल्‍ली हो या दूसरे केंद्र शासित प्रदेश।
कश्‍मीर से लेकर कन्‍या कुमारी तक पुलिस के समान आचार-व्‍यवहार एवं चाल-चरित्र का कारण जानने से पहले उसका डीएनए जानना जरूरी है।
दरअसल, 1861 में बने पुलिस अधिनियम के मुताबिक ही देश के अधिकांश राज्यों की पुलिस आज भी काम कर रही है। फिरंगियों ने ये अधिनियम आम जनता का दमन करने के लिए ही बनाया था। 1857 के विद्रोह की किसी भी सूरत में पुनरावृत्ति न हो इसलिए खाकी को ऐसे खौफ से सुसज्‍जित किया गया जिसके सामने कोई सिर उठाने की जुर्रत न कर पाए।
1947 में देश स्‍वतंत्र हो गया लेकिन पुलिस अधिनियम जस का तस बना रहा। यानि उसके डीएनए में कोई बदलाव नहीं हुआ। यह डीएनए ही पुलिस को आम पब्‍लिक का दमन करने के लिए प्रेरित करता था इसलिए वह आज तक वही कर रही है।
कुछ राज्यों ने नए अधिनियम बनाकर पुलिस को संचालित करने की कोशिश की लेकिन वह सफल नहीं हुए क्‍योंकि उनके नए अधिनयम, पुराने अधिनियम से बहुत अलग नहीं थे।
करीब 243286 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले और 2011 की जनगणना के मुताबिक लगभग 20 करोड़ से ज्यादा जनसंख्या वाले उत्तर प्रदेश को न केवल देश, बल्कि पूरी दुनिया के लिए सबसे बड़ा एकल पुलिस बल होने का गौरव प्राप्त है।
उत्तर प्रदेश पुलिस के महानिदेशक कहने को तो 75 जिलों में 33 सशस्त्र बटालियनों, खुफिया, जांच, भ्रष्टाचार निरोधी, तकनीकी, प्रशिक्षण, अपराध विज्ञान इत्यादि से संबन्धित विशेषज्ञ प्रकोष्ठ/शाखाओं में फैले करीब 2.5 लाख कर्मियों की कमान संभालते हैं किंतु हकीकत यह है कि अनुशासन के लिए पहचाना जाने वाला पुलिस बल अब अधिकारियों के नियंत्रण से बाहर होता जा रहा है।
जरूरत से ज्‍यादा राजनीतिक दखल, भ्रष्‍टाचार, जातिवाद और अनुशासनहीनता के चलते पुलिस किस कदर निरंकुश हो चुकी है इसका अंदाज वर्तमान डीजीपी जावीद अहमद के कथन से लगाया जा सकता है।
प्रदेश पुलिस के मुखिया ने कल ही यह स्‍वीकारा है कि पुलिस में काफी लोगों की अपराधियों से सांठगांठ है। पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश अर्थात मेरठ, मुजफ्फरनगर, गाजियाबाद, नोएडा, मथुरा, आगरा आदि में उन्‍होंने ऐसे पुलिसकर्मियों की भरमार बताई है जो अपराधियों से मिले हुए हैं। योगी सरकार की सख्‍ती को देखते हुए हालांकि उन्‍होंने ऐसे पुलिसजनों की सूची तैयार कर उनके खिलाफ कठोर कार्यवाही करने की बात कही है किंतु यह काम इतना आसान नहीं है।
मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ द्वारा पिछले तीन दिनों से लगातार लगाए जा रहे जनता दरबार में सर्वाधिक शिकायतें पुलिस को लेकर ही आई हैं। ये शिकायतें बता रही हैं कि हत्‍या, अपहरण, लूट, बलात्‍कार, डकैती, ड्रग्‍स की तस्‍करी तथा जमीनों पर कब्‍जे जैसी संगीन आपराधिक वारदातों में पुलिस ने न केवल अपराधियों को संरक्षण दिया बल्‍कि आवश्‍यकता पड़ने पर सक्रिय भूमिका भी निभाई।
स्‍वतंत्रता के 69 सालों बाद पुलिस की छवि सुधरने की बजाय दिन-प्रतिदिन वीभत्‍स होते जाने का एक अन्‍य प्रमुख कारण उसकी वह ”थ्‍योरी” भी है जिसे कांटे से कांटा निकालने का नाम दिया जाता है।
पिछले ढाई दशक में पुलिस ने इस थ्‍योरी को जैसे आत्‍मसात कर लिया है अन्‍यथा इससे पूर्व पुलिस अपराधियों की धर-पकड़ के लिए मुखबिरों का बड़े पैमाने पर इस्‍तेमाल करती थी। मुखबिर भी इसके लिए पुलिस से आर्थिक व सामाजिक संरक्षण प्राप्‍त करते थे।
कांटे से कांटा निकालने की थ्‍योरी के तहत पुलिस ने मुखबिरों की जगह बदमाशों का इस्‍तेमाल करना शुरू कर दिया। एक बदमाश की पीठ पर हाथ रखकर वह या तो खुद उससे दूसरे बदमाश को मरवाने लगी या फिर उसके कंधे पर बंदूक रखकर चलाने लगी। पुलिस की इस थ्‍योरी पर चलने का परिणाम यह हुआ कि उसके कुख्‍यात अपराधियों से संबंध प्रगाढ़ होते गए। रही-सही कसर अपराधियों के राजनीतिककरण ने पूरी कर दी। सत्ता के साथ पुलिस की निष्‍ठा जुड़ गई और फिर यही निष्‍ठा सत्ता पर काबिज होने वाले जाति विशेष के लोगों से जुड़ने लगी। देखते-देखते पुलिस बल जातिगत खांचों में बंट गया। सत्ता बदलने के साथ पुलिसजनों की नेमप्‍लेट पर जाति को प्रमुखता से दर्शाने का जैसे रिवाज चल पड़ा।
सत्ता के गलियारों तक अदना से अदना पुलिसकर्मी की पहुंच ने उसके मन से अधिकारियों का भय दूर कर दिया और अधिकारी भी यह सोचने पर मजबूर हो गए कि पता नहीं कौन कब उनके ऊपर भारी पड़ जाए। उच्‍चाधिकारियों की बात तो दूर थाने तथा चौकियों पर भी तैनाती सीधे ऊपर से होने लगी और अधिकारी सिर्फ कागजी घोड़े बनकर रह गए।
पुलिस के पहले से दोषयुक्‍त डीएनए में अनुशासनहीनता की इस मिलावट ने हालात कुछ ऐसे बना दिए कि वह अपने सूत्र वाक्‍य ‘परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम’ से पूरी तरह भटक गई।
गीता जैसे धार्मिक ग्रंथ के एक श्‍लोक से लिए गए इस सूत्र वाक्‍य में निहित ”सज्जन व्यक्तियों की रक्षा और दुष्टों का नाश”, पुलिस के लिए सिर्फ थाने-चौकियों की दीवारों पर उकेरने भर के लिए रह गया।
सच तो यह है कि पुलिस का आचरण समय के साथ अपने सूत्र वाक्‍य से ठीक उलट दिखाई देने लगा लिहाजा सज्‍जन व्‍यक्‍ति पुलिस से जबर्दस्‍त खौफ खाने लगे और दुष्‍टजन उनके सहोदर बन बैठे।
पिछले कुछ समय से तो आलम ऐसा हो गया है कि पुलिस किसी सज्‍जन व्‍यक्‍ति को इज्‍ज़त देना जानती ही नहीं, यदि देनी भी पड़े तो पता नहीं रहता कि वह कितनी देर उसकी इज्‍ज़त अफजाई करेगी। किसी को भी अश्‍लील गालियां देना, चाहे जब मारपीट शुरू कर देना और विरोध करने पर बंद कर देने की धमकी देना तो एक तरह से पुलिस के चिर-परिचित हथकंडे बन गए हैं। पुलिस न किसी सीनियर सिटीजन को इज्‍ज़त बख्‍शना जानती है और न महिला व बच्‍चों को। कानून उसके लिए एक ऐसा हथियार बन गया है जिसे वह अपनी सुविधानुसार तोड़-मरोड़ कर इस्‍तेमाल करती है।
भारतीय जनता पार्टी ने अपनी चुनावी रैलियों में कानून का राज स्‍थापित करने की बात पुरजोर कही थी और कानून-व्‍यवस्‍था की बदहाली को ही एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया था।
इसमें कोई दो राय नहीं कि यदि योगी सरकार आमजन के साथ-साथ पुलिस से भी कानून-व्‍यवस्‍था का अनुपालन कराने में सफल हो गई तो आधी से अधिक समस्‍याओं का समाधान बिना किसी हस्‍तक्षेप के हो जाएगा।
अपराधों में पुलिस की संलिप्‍तता, अपराधियों से उसकी मिलीभगत और उससे उपजी अव्‍यवस्‍था यदि काबू में आ गई तो न जमीन से जुड़े अपराध होंगे और न लूट, डकैती, हत्‍या, बलात्‍कार आदि संगीन अपराधों के पीड़ित दर-दर की ठोकरें खाएंगे।
लेकिन सवाल यह पैदा होता है कि क्‍या पुलिस के मूल चरित्र को बदलना इतना आसान है ?
यह सवाल ही वह चुनौती है जो स्‍वतंत्रता के बाद से अब तक हर सरकार के सामने खड़ी है और जिसे पूरा करने की कवायद में तमाम सरकारें चली गईं।
अब पहली बार एक गेरूआ वस्‍त्रधारी और महंत की उपाधि से विभूषित योगी को राजपाठ की कमान मिली है तो आमजन की उम्‍मीदों को भी पंख लगे हैं। वह पुलिस से साधुता की तो नहीं, लेकिन व्‍यावहारिकता की आस अवश्‍य लगा रही है। यदि योगी का राज आमजन की इस उम्‍मीद पर खरा उतरता है तो नि:संदेह उत्तर प्रदेश, उत्तम प्रदेश में तब्‍दील होता नजर आएगा और इसी प्रकार 2022 में भी योगी की जय-जयकार होगी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

प्रशांत भूषण ने साबित किया, ”बुद्धिजीवी” भी मूर्ख हो सकते हैं

मूर्ख होने के लिए ”श्रमजीवी” होना आवश्‍यक नहीं है, ”बुद्धिजीवी” भी मूर्ख हो सकते हैं। सीधे शब्‍दों में कहें तो सुप्रीम कोर्ट के किसी प्रसिद्ध वकील का भी मूर्ख होना संभव है और जिसे जनसामान्‍य उसकी पेशेगत मजबूरी के मद्देनजर मूर्ख मानते रहे हों, वह किसी मुकाम पर जीनियस साबित हो सकता है। बात सिर्फ अवसर या संदर्भ उपस्‍थित होने की है।
मूर्खता या बुद्धिमत्ता का आंकलन किसी के पेशे अथवा उसकी पेशेगत प्रसिद्धि से नहीं करना चाहिए, यह बात सुप्रीम कोर्ट के मशहूर वकील प्रशांत भूषण ने एकबार फिर साबित कर दी है।
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार द्वारा गठित किए गए पुलिस के ”एंटी रोमियो स्‍क्‍वॉयड” पर टिप्पणी करने के चक्‍कर में प्रशांत भूषण ने योगीराज भगवान श्रीकृष्‍ण को ही न सिर्फ ”लेजेंड्री ईव टीजर” बता डाला बल्‍कि योगी सरकार को इस आशय की चुनौती भी दी कि यदि उनमें हिम्‍मत है तो वह इस स्‍क्‍वॉयड का नाम ”एंटी कृष्‍ण स्‍क्‍वॉयड” रख कर देखें।
सुप्रीम कोर्ट के न्‍यायाधीश रहे मार्कन्‍डेय काटजू ने कुछ समय पहले कहा था कि हिंदुस्‍तान की 90 प्रतिशत आबादी मूर्खों से भरी पड़ी है। काटजू की कही बात तब अतिशयोक्‍ति महसूस हुई थी, किंतु अब लगता है कि शायद वह सही कह रहे थे।
कोई अस्‍त्र-शस्‍त्र उठाए बिना महाभारत जैसे भीषण युद्ध के नायक की उपाधि प्राप्‍त करने वाले तथा 16 हजार रानियां रखकर भी योगीराज कहलाने वाले जिन भगवान श्रीकृष्‍ण के चरित्र पर आज उनके जन्‍म से पांच हजार साल बाद तक विश्‍व के तमाम देश रिसर्च कर रहे हों, अर्जुन को दिए गए जिनके उपदेशों का एक-एक श्‍लोक आज भी लोगों का जीवन दर्शन बना हुआ हो, उनके चरित्र की तुलना शेक्‍सपीयर के एक पात्र रोमियो से वही व्‍यक्‍ति कर सकता जिसका बुद्धि से दूर-दूर तक कभी कोई वास्‍ता ही न रहा हो।
ऐसा लगता है कि प्रशांत भूषण के पास जितनी भी बौद्धिक क्षमता थी, वह उन्‍होंने कानून की किताबें पढ़ने और धाराएं रटने में लगा दी। इसके इतर उन्‍होंने कभी कुछ जानने व समझने की कोशिश नहीं की।
प्रशांत भूषण ने यह तो साबित कर दिया कि भगवान श्रीकृष्‍ण को समझने की क्षमता उनमें दूर-दूर तक नहीं है, साथ ही उन्‍होंने यह भी जाहिर करा दिया कि वह व्‍यावहारिक ज्ञान से महरूम हैं।
व्‍यावहारिक ज्ञान का ताल्‍लुक रोजमर्रा में पड़ने वाले उन क्रिया-कलापों एवं आचार-विचारों से होता है जो किसी किताब में नहीं लिखे होते। जिन्‍हें हर व्‍यक्‍ति को वक्‍त और परिस्‍थितियों के हिसाब से समझना पड़ता है। व्‍यावहारिक ज्ञान यह भी बताता है कि कौन सी बात कब कहनी है और किस तरह कहनी है। गलत वक्‍त पर कही गई कथित सही बात भी अनादर अथवा बेइज्‍जती का कारण बन सकती है।
प्रशांत भूषण तो खुद इसके भुक्‍तभोगी भी हैं। कश्‍मीर पर अपने निजी विचार व्‍यक्‍त करके वह इसका अनुभव कर चुके हैं।
प्रशांत भूषण की भगवान श्रीकृष्‍ण पर की गई टिप्‍पणी को लेकर कांग्रेसी नेता जीशान हैदर ने उनके खिलाफ लखनऊ के हजरत गंज थाने में धारा 295/A और 153/A के अंतर्गत मामला दर्ज करा दिया है।
जीशान हैदर ने इस बावत पुलिस को दी गई अपनी तहरीर में लिखा है कि भगवान श्रीकृष्ण पूरे विश्व में न सिर्फ करोड़ों हिंदुओं बल्कि समस्त मानव जाति के प्रेरणास्रोत हैं।
यहां गौर करने लायक है यह बात कि प्रशांत भूषण के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराने वाले जीशान हैदर न केवल प्रमुख विपक्षी दल कांग्रेस से ताल्‍लुक रखते हैं बल्‍कि मुस्‍लिम समुदाय से हैं।
जाहिर है कि जिस व्‍यावहारिक ज्ञान की अपेक्षा बुद्धिजीवियों से की जाती है, उससे सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध अधिवक्‍ता प्रशांत भूषण का तो कोई संबंध नजर नहीं आया अलबत्‍ता एक नेता ने यह साबित अवश्‍य कर दिया कि कृष्‍ण का चरित्र जाति व धर्मों से भी परे तथा निर्विवाद रूप से अनुकरणीय है।
वैसे भी इतिहास ऐसे इस्‍लामिक धर्मावलंबियों, फनकारों तथा साहित्‍यकारों से भरा पड़ा है जिन्‍होंने श्रीकृष्‍ण को अपनी साधना का अंग बनाकर रखा। अनेक सूफी-संतों ने कृष्‍ण का अपने-अपने तरीके से गुणगान किया क्‍योंकि कृष्‍ण का चरित्र किसी धर्म अथवा जाति विशेष का प्रतिनिधित्‍व नहीं करता। कृष्‍ण ने तो अपनी हर लीला में, अपने प्रत्‍येक क्रिया-कलाप में मानव मात्र की भलाई का संदेश दिया है।
यही कारण है कि श्रीमद्भागवत गीता में श्रीकृष्‍ण द्वारा अर्जुन को माध्‍यम बनाकर दिए गए उपदेश सिर्फ युद्ध के लिए प्रेरणा न होकर एक ऐसा जीवन दर्शन थे जिनमें मानव मात्र का कल्‍याण निहित था।
संभवत: इसीलिए हजारों साल बाद भी ”गीता” एक सर्वमान्‍य ग्रंथ बनी हुई है और श्रीकृष्‍ण सर्वमान्‍य अवतार।
दुनिया के पता नहीं कितने देश गीता और कृष्‍ण को समझने की अनवरत चेष्‍टा जरूर कर रहे हैं किंतु किसी ने न तो कभी कृष्‍ण के चरित्र पर उंगली उठाई और न कभी उनकी कही हुई गीता पर।
”ओशो” के नाम से प्रसिद्ध विवादास्‍पद धर्मगुरू आचार्य रजनीश ने भी अपनी मशहूर किताब ”कृष्‍ण मेरी दृष्‍टि” में कृष्‍ण को आश्‍चर्यजनक व्‍यक्‍तित्‍व बताया है। एक ऐसा व्‍यक्‍तित्‍व जिसकी व्‍याख्‍या करना संभव नहीं है।
जो एक ही साथ योगी भी है और भोगी भी, नर्तक भी हो और योद्धा भी, ग्‍वाला भी है और राजा भी, उत्‍कट प्रेमी भी है और पूरी तरह निर्मोही भी।
महान इतने कि ”सेस, गनेस, दिनेस, महेस, सुरेसहु जाहि निरंतर ध्‍यावें…और लघु इतने कि ”ताहि अहीर की छोहरियां छछिया भरि छाछ पै नाच नचावें”।
प्रशांत भूषण ने कृष्‍ण के बारे में अपने विचार व्‍यक्‍त करके एक ओर जहां यह बता दिया कि किताबी जानकारी डिग्रियां तो दिला सकती है किंतु ज्ञान का माध्‍यम नहीं बन सकती वहीं दूसरी ओर यह भी जाहिर कर दिया कि अपराधियों के प्रति उनके मन में हमेशा ही सहानुभूति उमड़ती है, फिर चाहे वह फांसी की सजा प्राप्‍त कुख्‍यात आतंकवादी याकूब मेनन हो अथवा सड़क पर लड़कियों एवं महिलाओं के मान-सम्‍मान से खिलवाड़ करने वाले अपराधी तत्‍व।
प्रशांत भूषण की आतंकवादियों और अपराधियों के प्रति ऐसी सहानुभूति ही काफी है यह समझने के लिए कि उनकी मानसिकता और सोच क्‍या है तथा उनकी बुद्धि का किस हद तक दिवाला निकला हुआ है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

आखिर कितनी तर्कसंगत हैं योगी आदित्‍यनाथ को लेकर विपक्ष और मीडिया की आशंकाएं ?

महंत योगी आदित्‍यनाथ द्वारा उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही न केवल विपक्ष बल्‍कि मीडिया भी तरह-तरह की आशंकाएं व्‍यक्‍त कर रहा है। विपक्ष जहां योगी आदित्‍यनाथ की ताजपोशी को आरएसएस का एजेंडा बता रहा है वहीं मीडिया कुछ ऐसा प्रचार-प्रसार कर रहा है जैसे कोई अनहोनी हो गई हो।
योगी आदित्‍यनाथ पर यूं तो बहुत पहले से मीडिया काफी कठोर रहा है और उनके हर बयान को सिर्फ और सिर्फ सांप्रदायिक चश्‍मे से देखता रहा है, लेकिन अब वह उन्‍हें कतई समय देने के लिए तैयार नहीं है।
योगी आदित्‍यनाथ ने उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री पद की शपथ भले ही कल दोपहर सवा दो बजे ली हो किंतु मीडिया ने उन्‍हें 18 मार्च की शाम तभी से टारगेट करना शुरू कर दिया था जब मुख्‍यमंत्री पद के लिए उनके नाम की घोषणा की गई।
जहां तक सवाल विपक्ष द्वारा योगी को उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्‍य के मुख्‍यमंत्री बतौर न पचा पाने का है, तो यह बात समझ में आती है क्‍योंकि पहले तो भाजपा की अप्रत्‍याशित जीत ने विपक्ष को कहीं का नहीं छोड़ा और फिर योगी की ताजपोशी ने उनके जले पर नमक छिड़कने का काम किया परंतु यदि बात करें मीडिया की तो ऐसा लगता है कि जैसे मीडिया भी एक प्रतिपक्ष बनकर रह गया है। उसने भाजपा और मोदी के अंधे विरोध में अपने सोचने व समझने की शक्‍ति खो दी है।
तभी तो राजनीति के ककहरे की जो छोटी सी सीख योगी आदित्‍यनाथ के क्षेत्र से ताल्‍लुक रखने वाले मुस्‍लिम संप्रदाय के लोगों को है, उसे भी मीडिया समझने को तैयार नहीं है।
योगी आदित्‍यनाथ के इलाके से संबंध रखने वाले मुस्‍लिमों का साफ-साफ कहना है कि योगी अपने बयानों में जो कुछ अब तक कहते रहे हैं, वो वोट बैंक की और चुनावी राजनीति का हिस्‍सा है न कि वह उनके व्‍यक्‍तित्‍व का परिचय देता है।
इन मुस्‍लिमों ने हर मीडिया पर्सन से यही कहा है कि योगी के दरबार में बिना किसी भेदभाव के लोगों की समस्‍याओं का समाधान किया जाता रहा है और उनके पास समस्‍या लेकर जाने वालों में मुस्‍लिम समुदाय के लोगों की बड़ी संख्‍या रहती है।
यही नहीं, योगी के स्‍थाई निवास गोरखनाथ मंदिर प्रांगण में जो दुकानें आवंटित हैं, उनमें से 60 प्रतिशत दुकानें मुस्‍लिमों को दी हुई हैं। गोरखनाथ मंदिर भी मुस्‍लिम बाहुल्‍य क्षेत्र में स्‍थित है किंतु योगी के आचार-व्‍यवहार को लेकर कभी उस क्षेत्र के मुस्‍लिमों को कोई आपत्ति नहीं हुई। योगी का लगातार पांच बार सांसद निर्वाचित होना और हर निर्वाचन में जीत का अंतर बढ़ते जाना इस बात की पुष्‍टि करता है कि योगी को लेकर विपक्ष या मीडिया चाहे जितना भ्रमित हो किंतु उनके अपने क्षेत्र में किसी को कोई भ्रम नहीं है।
गोरखनाथ मंदिर पर हर साल मकर संक्रांति के दौरान आयोजित होने वाले ‘खिचड़ी मेले’ में लाखों लोग आते हैं ओर पूरे एक महीने तक रहते भी हैं.
इस मेले में हर जाति, धर्म और संप्रदाय के लोगों की भारी तादाद में उपस्‍थिति मठ की कट्टर हिंदूवादी छवि को तोड़ती है जबकि मुस्लिम शासन काल में हिन्दुओं और बौद्धों के अन्य सांस्कृतिक केन्द्रों की भांति इस पीठ को भी कई बार भीषण कठिनाइयों का सामना करना पड़ा।
इसकी व्यापक प्रसिद्धि के कारण विक्रमी चौदहवीं सदी में भारत के मुस्लिम सम्राट अलाउद्दीन खिलजी ने अपने शासन काल में इस मठ को नष्ट किया और साधक व योगी बलपूर्वक मठ से निष्कासित कर दिए।
सत्रहवीं और अठारहवीं सदी में अपनी धार्मिक कट्टरता के कारण मुग़ल शासक औरंगजेब ने इसे दो बार नष्ट किया। क़रीब 52 एकड़ के सुविस्तृत क्षेत्र में स्थित इस मंदिर का रूप व आकार-प्रकार परिस्थितियों के अनुसार समय-समय पर बदलता रहा है। वर्तमान में गोरक्षनाथ मंदिर की भव्यता और पवित्र रमणीयता अत्यन्त कीमती आध्यात्मिक सम्पत्ति है। प्रतिदिन मंदिर में स्‍थानीय लोगों के अतिरिक्‍त भारत के सुदूर प्रांतों से भी असंख्य लोगों की भीड़ पर्यटकों व यात्रियों के रूप में आती है।
अब यदि बात करें इन विधानसभा चुनावों में भाजपा द्वारा वोटों की खातिर ध्रुवीकरण की राजनीति पर, तो कौन सा ऐसा राजनीतिक दल है जो ध्रुवीकरण की राजनीति नहीं करता। कांग्रेस ने देश और विभिन्‍न प्रदेशों में इतने लंबे समय तक शासन वोटों का ध्रुवीकरण करके ही किया। क्षेत्रीय पार्टियां भी यही करती रही हैं।
उत्तर प्रदेश की दोनों प्रमुख क्षेत्रीय पार्टियों बसपा व सपा की पूरी राजनीति वोटों के ध्रुवीकरण पर टिकी रही है। बसपा ने तो इन चुनावों में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की खुली अवहेलना करके मुस्‍लिमों के ध्रुवीकरण की पूरी कोशिश की और बड़ी मात्रा में मुस्‍लिम प्रत्‍याशियों को खड़ा किया। मायावती ने अपने चुनावी मंचों से बेझिझक मुस्‍लिमों का आह्वान किया और दलितों के एक वर्ग को भी डराया।
उत्तर प्रदेश के अलावा बिहार, पश्‍चिम बंगाल, दिल्‍ली, पंजाब आदि कौन सा ऐसा राज्‍य है जहां के शासक ध्रुवीकरण की राजनीति न करते रहे हों।
इस सब के इतर देखा जाए तो भाजपा पहली ऐसी पार्टी है जिसने तीन तलाक की मुखालफत और नोटबंदी व समान नागरिक संहिता की वकालत करने का दुस्‍साहस दिखाया। ये बात अलग है कि विपक्ष के भारी दुष्‍प्रचार के बाद भी यह सारे मुद्दे भाजपा के लिए मुफीद साबित हुए और अब कहा जा रहा है कि मुस्‍लिम महिलाओं ने भी इन चुनावों में भाजपा के लिए मतदान किया है।
उत्तर प्रदेश एक ऐसा राज्‍य है जिसके इर्द-गिर्द सारे देश की राजनीति घूमती है। ऐसे में भाजपा ने योगी आदित्‍यनाथ को उत्तर प्रदेश की कमान सौंपने से पहले राजनीति के सारे गुणा-भाग जरूर लगाए होंगे क्‍योंकि भाजपा नहीं चाहेगी कि वर्षों बाद समाप्‍त हुआ उसका वनवास, उपहास बनकर रह जाए।
योगी आदित्‍यनाथ जो कल तक मुंह से आग उगलने के लिए पहचाने जाते थे, उन्‍होंने मुख्‍यमंत्री का पद संभालने के साथ सबसे पहले अपनी कैबिनेट को हिदायत दी है कि मीडिया को वह नहीं, इसके लिए अधिकृत मंत्री ब्रीफ करेंगे। योगी ने बाकायदा दो मंत्रियों श्रीकांत शर्मा और सिद्धार्थनाथ सिंह को इसकी जिम्मेदारी सौंप दी है। श्रीकांत शर्मा व सिद्धार्थनाथ सिंह पहले से राष्‍ट्रीय प्रवक्‍ता की जिम्‍मेदारी संभालते चले आ रहे हैं।
योगी का अपनी कैबीनेट को दिया गया यह संदेश स्‍पष्‍ट करता है कि वह पद की गरिमा को बखूबी समझ रहे हैं और उसकी जिम्‍मेदारी का अहसास भी कर रहे हैं।
संभवत: इसीलिए उन्‍होंने मुख्‍यमंत्री पद की शपथ लेने से पूर्व ही प्रदेश पुलिस के मुखिया को इस आशय का आदेश दे दिया था कि जीत के जश्‍न में निरंकुश होने वालों से सख्‍ती के साथ निपटें। कानून-व्‍यवस्‍था से खिलवाड़ करने की इजाजत किसी को नहीं मिलनी चाहिए।
योगी ने यह आदेश कुछ स्‍थानों से आ रहीं उन खबरों के आधार पर दिया था जहां जीत के जश्‍न में वर्ग विशेष के खिलाफ नारेबाजी की बात बताई गई थी।
योगी का इतनी जल्‍दी एक्‍शन में आना यह बताता है कि उन्‍हें अपनी प्रचारित की गई कथित कट्टरवादी छवि का भी अच्‍छी तरह इल्‍म है और वह इसके लिए विपक्ष और मीडिया को कोई मौका नहीं देना चाहते।
सबका साथ, सबका विकास पर चलते हुए भाजपा के संकल्‍प पत्र पर पूरी तरह अमल करने की बात उन्‍होंने अपनी पहली प्रेस कांफ्रेंस में भी कही।
इन सब बातों पर गौर करें तो साफ लगता है कि जिस तरह केंद्र में नरेन्‍द्र मोदी के नेतृत्‍व वाली सरकार का गठन होने के साथ विपक्ष ने मुस्‍लिमों के अंदर भय का वातावरण उत्पन्‍न करने की कोशिश की थी, उसी तरह की कोशिश वह अब योगी की ताजपोशी के बाद कर रहा है क्‍योंकि उसके तो नीचे से लगभग पूरी जमीन ही खिसक चुकी है। प्रमुख विपक्षी पार्टियां जहां से चली थीं, आज फिर वह वहीं आकर खड़ी हो गई हैं। योगी यदि पार्टी की उम्‍मीदों पर खरे साबित हुए और जनभावनाओं के अनुरूप शासन की कमान संभालने में सफल रहे तो सपा व बसपा जैसी पार्टियों का वजूद तक खतरे में पढ़ जाएगा। कांग्रेस की दुर्गति का अंदाज लगाने को तो इतना ही काफी है कि उसे अपना दल से भी कम सीटें मिली हैं, और वो भी तब जबकि उसने बड़े ढोल-नगाड़े पीटकर समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया था। यह साथ यूपी की जनता को कितना पसंद आया, इसका अब जिक्र करने की भी जरूरत नहीं रह गई।
बेहतर होगा कि विपक्ष और मीडिया अब योगी-राज को बेवजह शंका की दृष्‍टि से देखने की बजाय उनके काम को देखे और नकारात्‍मक प्रचार-प्रसार व बयानबाजी की प्रवृत्ति से बाहर निकल कर धरातल पर होने वाले कामों की समीक्षा करे ताकि एक स्‍वस्‍थ परंपरा कायम हो सके और उत्तर प्रदेश की जनता भी उस परंपरा का लाभ उठाकर भ्रम की स्‍थिति से बच सके।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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