गुरुवार, 6 फ़रवरी 2020

मथुरा डाॅक्‍टर अपहरण कांड: फिरौती हड़पने पर मथुरा पुलिस की चुप्‍पी सवालों के घेरे में

मथुरा। गेटबंद पॉश कॉलोनी राधापुरम एस्‍टेट निवासी जिस डॉक्‍टर के कथित अपहरण से मिली फिरौती की बड़ी रकम को चंद घंटों में पुलिस ने ठिकाने लगाकर सारा मामला रफा-दफा कर दिया, उसे लेकर अब तमाम सवाल खड़े हो रहे हैं।
सवाल खड़े करने वालों में खुद पुलिस भी है, डॉक्‍टर बिरादरी भी और आम आदमी भी।
इन सवालों का जवाब जानने से पहले इस ”कथित अपहरण” संबंधी पूरे घटनाक्रम पर एक बार फिर गौर करना जरूरी है।
अब तक सामने आई कहानी के अनुसार, एक मशहूर ऑर्थोपेडिक डॉक्‍टर पिछले माह जब अपने क्‍लीनिक से कार द्वारा लौट रहे थे तब नेशनल हाईवे स्‍थित गोवर्धन चौराहे के फ्लाईओवर पर उन्‍हें एक लग्जरी गाड़ी सवार चार बदमाशों ने ओवरटेक करके कब्‍जे में ले लिया और उन्‍हीं के मोबाइल से उनकी पत्‍नी को फोन करके डॉक्‍टर का अपहरण कर लिए जाने की जानकारी दी।
कहानी के मुताबिक कुछ घंटों के अंदर ही डॉक्‍टर की पत्‍नी से 55 लाख की फिरौती वसूलकर बदमाशों ने डॉक्‍टर को मुक्‍त कर दिया।
अखबारों में छपे इस पूरे घटनाक्रम पर भरोसा किया जाए तो 55 लाख रुपए की बड़ी रकम का मात्र चंद घंटों में डॉक्‍टर की पत्‍नी ने इंतजाम कर लिया और इस दौरान डॉक्‍टर को चारों बदमाश उन्‍हीं की गाड़ी में लेकर नेशनल हाईवे पर ही घूमते रहे।
दिल्‍ली-आगरा नेशनल हाईवे का ये वो हिस्‍सा है जहां दिन-रात पुलिस सक्रिय रहती है क्‍योंकि इस पर अनेक होटल, हॉस्‍पीटल, गेस्‍ट हाउस आदि के अलावा इंडस्‍ट्री एरिया भी पड़ता है।
इसके अलावा घटना स्‍थल से बमुश्‍किल 100 मीटर की दूरी पर शहर कोतवाली की रिपोर्टिंग पुलिस चौकी कृष्‍णानगर तथा हाईवे थाने की भी एक पुलिस चौकी है।
सवाल जो अब पूछे जा रहे हैं
अब इस अपहरण को लेकर उन सवालों को समझिए जिनकी वजह से इसे ‘कथित अपहरण’ कहा जा रहा है।
सवाल नंबर एक: क्‍या वाकई डॉक्‍टर का किडनैप हुआ था, या मामला कुछ ऐसा है जिसे छिपाना डॉक्‍टर दंपत्ति और उसके परिवार की मजबूरी था ?
ये सवाल इसलिए पूछा जा रहा है क्‍योंकि पेशेवर बदमाश यदि किसी का अपहरण करते हैं तो वो अपहृत के परिवार से तत्‍काल संपर्क स्‍थापित करने की गलती नहीं करते। पहले वो अपहृत के परिवार और पुलिस की गतिविधि को भांपते हैं, उसके बाद इत्‍मीनान से अपनी डिमांड रखते हैं।
इस मामले में बताया जा रहा है कि बदमाशों ने मात्र दो-ढाई घंटे में फिरौती की रकम वसूल ली और निकल गए, जोकि संभव नहीं है।
सवाल नंबर दो: क्‍या डॉक्‍टर ने अपने घर पर 55 लाख रुपए की बड़ी रकम पहले से रखी हुई थी, और क्‍या उनके कथित अपहरणकर्ताओं को इस बात का इल्‍म था कि डॉक्‍टर के घर पर इतनी बड़ी रकम है ?
ये सवाल इसलिए महत्‍वपूर्ण हो जाता है कि आज के इस दौर में जब बड़े-बड़े व्‍यापारी और उद्योगपति भी इतना कैश अपने घर पर नहीं रखते तो डॉक्‍टर ने इतना पैसा किसलिए रखा हुआ था।
सवाल नंबर तीन: जब डॉक्‍टर, डॉक्‍टर की पत्‍नी और उसके परिजनों में से भी किसी ने पुलिस को अपहरण की जानकारी नहीं दी तो पुलिस को सूचित किसने किया ?
इस सवाल का जवाब पूरे मामले की परतें खोल सकता है क्‍योंकि पुलिस पर फिरौती की रकम में 40 लाख रुपए हड़प जाने का आरोप लगा है।
समाचारों के अनुसार पुलिस ने चारों अपहरणकर्ताओं को गिरफ्त में लेकर और पूरे 55 लाख रुपए बरामद करके जब डॉक्‍टर दंपत्ति से संपर्क किया तो वो एफआईआर दर्ज कराने पर तैयार नहीं हुए लिहाजा पुलिस ने बिना कोई कार्यवाही किए बदमाशों को रिहा कर दिया।
बताया जाता है कि डॉक्‍टर दंपत्ति के रुख ने ही पुलिस के दोनों हाथों में लड्डू दे दिए और इसीलिए उसने 15 लाख बरामद बताकर वो तो डॉक्‍टर दंपत्ति को थमा दिए तथा शेष 40 लाख की फिरौती का बंटवारा कर लिया।
जानकारी के मुताबिक इसके अलावा पुलिस ने बदमाशों को सुरक्षित रिहा करने की एवज में उनसे भी कुछ रकम हथिया ली।
सवाल नंबर चार: जो पुलिस अपने इलाके में मशहूर डॉक्‍टर के अपहरण और उसकी फिरौती वसूलने तक गहरी नींद में थी, उसे अचानक बदमाशों का पूरा ब्‍यौरा उनकी लोकेशन के साथ कैसे मिल गया कि उसने चारों बदमाशों को फिरौती की रकम ठिकाने लगाने से पहले धर दबोचा ?
पुलिस की इस हरकत में यह निहित है कि क्‍या वाकई डॉक्‍टर का अपहरण हुआ या इसके पीछे की पूरी पटकथा पुलिस ने ही बदमाशों के साथ मिलकर लिखी थी ताकि सांप मर जाए और लाठी भी न टूटे।
यदि ऐसा नहीं है तो किसी भी ऐसी संगीन वारदात के बाद हफ्तों-हफ्तों टीम बनाकर अंधेरे में तीर चलाने वाली पुलिस ने कैसे इतनी जल्‍दी चारों बदमाश मय रकम के पकड़ लिए जबकि उनमें से एक बदमाश मेरठ का बताया जाता है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि बदमाशों के साथ सुरक्षित गेम खेलने के लिए कुछ खास पुलिस वालों ने सारा ड्रामा रचा और बड़ी रकम हड़प कर डकार तक नहीं ली।
पुलिस के ही भरोसमंद सूत्रों की मानें तो इस खेल में एक नहीं, दो थानों की पुलिस शामिल रही है और ये दोनों ही थाने नेशनल हाईवे के हैं। इनमें से एक थाने के प्रभारी का मेरठ के बदमाशों से गहरा ताल्‍लुक बताया जाता है।
पुलिस और बदमाशों की जुगलबंदी इस बात से भी जाहिर होती है कि सामान्‍य तौर पर ऐसी किसी वारदात के बाद सीमा विवाद पैदा करके पीड़ित को ‘फुटबॉल’ बना देने वाली पुलिस ने इस मामले में कतई हील-हुज्‍जत न करते हुए घटनास्‍थल हाईवे थाना क्षेत्र में मान लिया जबकि शहर कोतवाली की रिपोर्टिंग चौकी कृष्‍णानगर का भी कुछ क्षेत्र इसमें आता है।
सवाल नंबर पांच: आगरा और लखनऊ में बैठे पुलिस के आला अधिकारियों तक इस अपहरण की बात पहुंचने से पहले डीआईजी/एसएसपी मथुरा को इसकी भनक क्‍यों नहीं लगी ?
गौरतलब है कि पिछले महीने हुई अपहरण और फिरौती की इस बड़ी वारदात का पता आम जनता तथा डॉक्‍टर बिरादरी को भी तब लगा जब 5 फरवरी के प्रमुख अखबारों में यह खबर एडीजी आगरा जोन अजय आनंद के वर्जन सहित छपी।
आश्‍चर्य की बात यह है कि जो खबर छापी गई, वह भी अखबारों के आगरा कार्यालय से छपी थी न कि मथुरा से, और उसके लिए मथुरा के किसी पुलिस अधिकारी का वर्जन तक लेना जरूरी नहीं समझा गया।
और अंतिम सवाल: यदि किसी विशेष कारणवश ऐसा हुआ है तो भी समाचार छप जाने के बाद अब तक मथुरा पुलिस के किसी अधिकारी ने मुंह क्‍यों नहीं खोला ?
जैसा कि एडीजी आगरा जोन अजय आनंद ने कहा, यदि डॉक्‍टर व उसका परिवार अपहरण की एफआईआर दर्ज कराने में रुचि नहीं ले रहा था तो भी इलाका पुलिस को खुद एफआईआर दर्ज कर बदमाशों का चालान करना चाहिए था क्‍योंकि एक बड़ी रकम बरामद की गई थी।
समाचार के अनुसार उच्‍चाधिकारियों द्वारा इस पूरे मामले में मथुरा पुलिस से चार दिन पहले ही जवाब तलब किया जा चुका है, बावजूद इसके मथुरा पुलिस द्वारा न तो कोई कार्यवाही की गई है और न अपनी सफाई में कुछ कहा गया है।
उधर डॉक्‍टर से जुड़े सूत्रों का कहना है कि डॉक्‍टर ने कुछ दिनों पहले ही अपना निजी हॉस्‍पिटल बनाने के लिए कोई बड़ी जमीन महंगे इलाके में खरीदी है।
सूत्रों के मुताबिक इस वारदात का संबंध उस सौदे से भी हो सकता है क्‍योंकि बिना हील-हुज्‍जत आनन-फानन में 55 लाख रुपए की रकम बदमाशों तक कोई यूं ही नहीं पहुंचा सकता।
हो सकता है कि पुलिस को शामिल करने के पीछे भी बदमाशों की कुछ ऐसी ही मंशा रही हो जिससे सेफ गेम खेला जा सके और बाद के लिए कोई कांटा न बचे।
पूर्व में भी होती रही हैं ऐसी वारदातें
विश्‍व प्रसिद्ध इस धार्मिक जनपद में डॉक्‍टर्स के अपहरण और उनसे चौथ वसूली का यह कोई पहला केस नहीं है, और न पहली बार पुलिस तथा बदमाशों की मिलीभगत से रकम एंठने का मामला प्रकाश में आया है।
इससे पहले भी यह सब हुआ है और सीओ स्‍तर के पुलिस अधिकारी जेल भी गए हैं।
कुख्‍यात बदमाशों को मथुरा के डॉक्‍टर बहुत पहले से आकर्षित करते रहे हैं और ऐसे भी मामले सामने आए हैं जब एक डॉक्‍टर ने ही दूसरे डॉक्‍टर की बदमाशों के लिए सुरागरसी अथवा मुखबिरी की है।
जो भी हो लेकिन इस पूरे घटनाक्रम से पर्दा उठना एक ओर जहां इसलिए जरूरी है जिससे पुलिस की छवि और प्रभावित न हो वहीं दूसरी ओर इसलिए भी आवश्‍यक है कि अन्‍य डॉक्‍टर खुद को सुरक्षित महसूस कर सकें।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
http://legendnews.in/mathura-polices-silence-surrounded-by-questions-on-doctor-kidnapping-and-ransom-case/

शुक्रवार, 31 जनवरी 2020

देशभर के सभी ”संरक्षित” मानसिक रोगियों को समर्पित


जिस तरह भोजन के लिए भूख… सोने के लिए नींद और रोने के लिए भावनाएं या संवेदनाएं होना जरूरी है, उसी तरह आजादी के लिए गुलाम होना भी जरूरी है।
जो गुलाम नहीं है, और फिर भी आजादी की मांग करता है तो निश्‍चित जानिए कि उसका मानसिक संतुलन दुरुस्‍त नहीं है।
अब जरा विचार कीजिए कि भूख होने के बावजूद कोई भोजन नहीं कर पा रहा, नींद आने पर भी सो नहीं पा रहा और भरपूर भावनाओं के बाद भी रो नहीं रहा तो इसका क्‍या मतलब हो सकता है।
इसका सीधा सा मतलब केवल एक है कि वह शारीरिक अथवा मानसिक रूप से बीमार है।
दुनिया की हर पैथी का डॉक्‍टर उसे देखे बिना भी यह बता सकता है कि ये लक्षण किसी न किसी गंभीर बीमारी के हैं। अब बीमारी है तो उसका उपचार आवश्‍यक है।
चूंकि उपचार की पद्धति और प्रक्रियाएं अलग-अलग होती हैं लिहाजा उनका एक्‍शन तथा रिएक्‍शन भी अलग-अलग तरीकों से सामने आता है।
जैसे कि कुछ लोग धरना-प्रदर्शन करके रिएक्‍शन दे रहे हैं तो कुछ लोग लोकतंत्र को खतरे में बताकर दे रहे हैं। कोई हिटलरशाही बता रहा है तो कोई मोदी-शाही कह रहा है।
हर क्रिया की प्रतिक्रिया होती है, यह वैज्ञानिक तथ्‍य है। इसलिए उनकी क्रिया पर प्रतिक्रियाएं भी आ रही हैं।
बहरहाल, इस सबके बीच सवाल फिर वहीं खड़ा होता है कि आजादी मांगने या छीनने के लिए पहली शर्त है गुलामी।
जिस देश में सीएम से लेकर पीएम तक को और लोअर कोर्ट एवं हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट को भी गरियाने की पूरी छूट प्राप्‍त हो। जहां सजायाफ्ता आतंकियों के पक्ष में न सिर्फ खड़े होने बल्‍कि आधी रात को भी सर्वोच्‍च न्‍यायालय खुलवाने का अधिकार हो। चुनी हुई सरकार को कठघरे में खड़ा करने का अवसर हो और संसद के दोनों सदनों से पारित कानूनों के खिलाफ सड़क पर उतरने से कोई रोक न हो, उस देश में छीन के आजादी लेने का नारा मर्ज को न सही किंतु मरीज को तो पहचान ही रहा है।
माना कि अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता का अधिकार संविधान प्रदत्त है, किंतु हर अधिकार में कुछ कर्तव्‍य भी निहित होते हैं।
भारतीय संविधान के भाग 4(क) अनुच्छेद 51(क) के तहत नागरिकों के मौलिक कर्तव्य कुछ इस प्रकार हैं:
1. प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह संविधान का पालन और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्र ध्वज व राष्ट्र गान का आदर करे।
2. स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे।
3. भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे।
4. देश की रक्षा करे।
5. भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे।
6. हमारी सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका निर्माण करे।
7. प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसका संवर्धन करे।
8. वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञानार्जन की भावना का विकास करे।
9. सार्वजनिक संपत्ति को सुरक्षित रखे।
10. व्यक्तिगत एवं सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे।
11. अभिवावक/ संरक्षक 6 से 14 वर्ष के बच्चों को प्राथमिक शिक्षा प्रदान करे।


यहां यह गौर करना जरूरी है कि संविधान प्रदत्त अधिकारों का दुरुपयोग करने और छीनकर आजादी लेने की धमकी देने वाले क्‍या अपने इन 11 संवैधानिक कर्तव्‍यों का निर्वहन कर रहे हैं। यदि कर रहे हैं तो कितने कर्तव्‍यों का कर रहे हैं।
रही बात अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता अथवा आजादी की, तो उसकी भी सीमा होती है। सीमा रेखा क्रॉस करते ही स्‍वतंत्रता भी अपराध की श्रेणी में शामिल हो जाती है।
उदाहरण के लिए अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता के नाम पर किसी को गाली तो नहीं दी जा सकती। पहनने की आजादी के अधिकार से कोई निर्वस्‍त्र नहीं घूम सकता क्‍योंकि यह आजादी लोगों को मनमुताबिक लिबास पहनने के लिए है, न कि ‘न पहनने’ के लिए।
बहुत से लोगों को तो थूकने की, मूतने की और हगने की भी आजादी चाहिए। मतलब वो जहां चाहें थूक सकें, जिस स्‍थान पर चाहें लघुशंका निवारण करें और कहीं भी दीर्घशंका से निवृत हो सकें।
इनकी अपनी दलीलें हैं। सड़क पर चलते हुए या किसी वाहन में बैठे-बैठे थूकने वाले की मानें तो वह अपने मुंह से अपने देश की सड़क पर थूक रहा है, इससे आपत्ति कैसी।
यदि उसका थूक किसी दूसरे के ऊपर गिर भी रहा है तो यह उसकी अपनी समस्‍या है, उसे अपना मुंह बचाकर खुद चलना चाहिए।
सरेआम लघुशंका करने वालों को टोकिए तो वह कहेंगे कि सरकार ने हर चार कदम पर मूत्रालय क्‍यों नहीं बनवाए, अब नहीं बनवाए तो हम इसके लिए जिम्‍मेदार थोड़े ही हैं।
खुली हवा में नाली-नाले और नदी-तलाब के किनारे या खेत-खलिहान में ‘निपटने’ वालों को घोर आपत्ति है कि सरकार ‘स्‍वच्‍छ भारत अभियान’ के तहत घर-घर व गांव-गांव शौचालय क्‍यों बनवा रही है।
उनका घर, उनका गांव, उनके खेत और उन्‍हीं के खलिहान… लेकिन उन्‍हीं की स्‍वतंत्रता का हनन। उन्‍हें भी मन मुताबिक मल-मूत्र विसर्जन की आजादी चाहिए। सरकार कौन होती है, उन्‍हें दायरे में बांधने वाली।
दिल्‍ली का शाहीन बाग और लखनऊ का घंटाघर हो या जामिया तथा जेएनयू व एएमयू। यहां प्रदर्शन करने वालों में और खुलेआम थूकने, मूतने एवं हगने की आजादी मांगने वालों में कोई अंतर नहीं है।
अंतर इसलिए नहीं है कि ये सब के सब किसी न किसी स्‍तर पर मानसिक रोगी हैं। इन्‍हें अपने संविधान प्रदत्त अधिकारों का तो ज्ञान है परंतु कर्तव्‍यों का नहीं। अधूरा ज्ञान हमेशा नाश की निशानी होता है। या यूं कहें कि पतन के रास्‍ते पर ले जाता है।
सवा सौ करोड़ से अधिक की आबादी वाले विश्‍व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश में मुठ्ठीभर लोगों का मानसिक रूप से विक्षिप्‍त हो जाना कोई आश्‍चर्य नहीं, परंतु आश्‍चर्य तब होता है जब कुछ ऐसे लोग अपने-अपने स्‍वार्थों की पूर्ति के लिए इन्‍हें लगातार बरगलाते रहते हैं, जिन्‍हें आज तक बुद्धिजीवी माना जाता रहा है। जिन्‍हें बड़े-बड़े पुरस्‍कारों से नवाजा गया है।
शायद इसीलिए भारत विश्‍व में अकेला ऐसा देश होगा जहां के नागरिक उस कानून का विरोध कर रहे हैं जो उन्‍हीं के हित में बनाया गया है।
यही नहीं, यह दुनिया का एकमात्र देश होगा जहां के कुछ नागरिक 70 साल से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी उस बहुमूल्‍य आजादी का अपमान कर रहे हैं जिसे पाने के लिए अनगिनत लोग बलिदान हुए।
ऐसा न होता तो नक्‍सलवाद, उग्रवाद, आतंकवाद भी नहीं होते और न ऐसे युवा होते जो गुलामी का स्‍वाद चखे बिना छीन के आजादी लेने का नारा देकर भी कहते हैं कि देश का लोकतंत्र एवं संविधान खतरे में है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुक्रवार, 10 जनवरी 2020

नीरा राडिया के ‘नयति’ ने ‘लीजेंड न्‍यूज़’ को दिया था लीगल नोटिस, जब करारा जवाब मिला तो चुप्‍पी साध ली

वैसे तो कॉरपोरेट लॉबिस्‍ट नीरा राडिया द्वारा समाजसेवा की आड़ लेकर कृष्‍ण नगरी मथुरा में  खोला गया ‘नयति’ सुपर स्पेशलिटी नामक हॉस्पिटल अपने शुरूआती दिनों से ही विवादित रहा है, किंतु इन दिनों उसकी चर्चा उस घटना के कारण हो रही है जिसका सीधा संबंध सत्ताधारी दल भाजपा के मथुरा महानगर अध्‍यक्ष विनोद अग्रवाल से है।
नीरा राडिया और राजेश चतुर्वेदी के ‘नयति’ हॉस्‍पिटल में विनोद अग्रवाल के साथ हुई इस घटना के लिए कौन जिम्‍मेदार है, इसका नतीजा निकालने से पहले उन परिस्‍थितियों पर गौर किया जाना जरूरी हो जाता है जिन परिस्‍थितियों में कोई भी व्‍यक्‍ति हॉस्‍पिटल जाता है अथवा उसे जाना पड़ता है।
इसके अलावा किसी भी निष्‍कर्ष तक पहुंचने के लिए यह जानना भी अति आवश्‍यक है कि कारण जो हों परंतु ‘नयति’ लगातार विवादों में क्‍यों रहता है ?
दरअसल, इसके पीछे हॉस्‍पिटल संचालकों की हर किसी को दबाब में रखने की मानसिकता है। फिर चाहे वह किसी मरीज के परिजन हों या तीमारदार, अथवा उन्‍हें देखने के लिए हॉस्‍पिटल पहुंचने वाले नाते-रिश्‍तेदार, दोस्‍त और परिचित।
‘नयति’ के संचालकों की दबाव बनाकर अपने पक्ष में करने की नीति का ही हिस्‍सा है मीडिया से जुड़े लोगों को भी साम-दाम-दंड और भेद के जरिए अपने अनुकूल लिखने को मजबूर करना।
नयति ने यही हथकंडा वर्ष 2018 में ‘लीजेंड न्‍यूज़’ पर तब अपनाया जब Legendnews.in द्वारा 23 जून 2016 को ”नीरा राडिया के ”नयति” की ”नीयत” में ही खोट लगता है” शीर्षक से एक खबर प्रकाशित की गई।
पूरी खबर पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्‍लिक कीजिए-
https://bhrashtindia.blogspot.com/2016/06/blog-post_23.html
Legendnews.in पर यह खबर प्रकाशित होने के पूरे दो वर्ष बाद यानी 01 जुलाई 2018 को नीरा राडिया के ‘नयति’ की ओर से उसकी लॉ फर्म ARCINDO Law Advotactes & Solicitors द्वारा यह लीगल नोटिस भेजा गया-



मथुरा में नीरा राडिया के प्रभाव का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि तमाम स्‍थानीय अधिवक्‍ता ”नयति” के इस लीगल नोटिस का जवाब तक देने को तैयार नहीं थे।
आखिर युवा और तेज-तर्रार वकील प्रशांत सरीन ने Legendnews.in में प्रकाशित समाचार को बारीकी से पढ़कर जब ARCINDO Law Advotactes & Solicitors काउंटर जवाब दिया तो जैसे सांप सूंघ गया, क्‍योंकि ‘नयति’ का नोटिस न सिर्फ तथ्‍यों से परे था बल्‍कि इस मंशा के साथ भेजा गया था कि लीजेंड न्‍यूज़ उसका खंडन करके ‘नयति’ की प्रशंसा में समाचार प्रकाशित करने लगे जैसा कि कई तथाकथित बड़े अखबार कर भी रहे हैं।
इस पूरे घटनाक्रम का एक रोचक पहलू यह रहा कि लीजेंड न्‍यूज़ की ओर से एडवोकेट प्रशांत सरीन द्वारा ‘नयति’ की लॉ फर्म को नोटिस का जवाब देते ही नीरा राडिया के अनेक शुभचिंतक संपर्क साधने में जुट गए जिससे मामला ”रफा-दफा” किया जा सके।
आखिर किसी तरह बात बनती न देख भविष्‍य में शिकायतें ठीक करने का आश्‍वासन देकर काम चला लिया।






बहरहाल, कलेंडर में तारीखें बदलती रहीं किंतु ‘नयति’ की ‘नीयत’ में बदलाव होता दिखाई नहीं दे रहा। आज भी कोई महीना तो क्‍या, कोई सप्‍ताह भी शायद ही ऐसा बीतता हो जब ‘नयति’ से जुड़े विवाद सामने न आते हों। ये विवाद बदसलूकी से लेकर लंबा-चौड़ा बिल बनाने सहित अन्‍य कई तरह के होते है।आश्‍चर्य की बात यह है कि विवाद किसी किस्‍म का हो और किसी स्‍तर से हो लेकिन गलती हमेशा दूसरे पक्ष की होती है। ‘नयति’ हमेशा उसी तरह पाक-साफ होता है जिस तरह उसकी संचालक नीरा राडिया ‘पाक-साफ’ हैं।
-Legend News
http://legendnews.in/nayati-of-neera-radia-gave-a-legal-notice-to-legend-news-when-the-reply-was-given-it-was-silent/

रविवार, 5 जनवरी 2020

उत्तर प्रदेश में भ्रष्‍टाचार की कहानी, खुद योगी आदित्‍यनाथ की जुबानी

योगी आदित्यनाथ  के नेतृत्‍व वाली उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार ने यूं तो भ्रष्‍टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की पॉलिसी पहले दिन से अपना रखी है किंतु ‘मुंह लग चुके रिश्‍वत के खून’ को ‘सरकारी मशीनरी’ इतनी आसानी से छोड़ने वाली नहीं है, इस बात को योगी जी शायद स्‍वयं भी अब ढाई साल बीत जाने के बाद अच्‍छी तरह समझ पाए हैं।
UPPCL का PF घोटाला हो या पुलिस में ट्रांसफर-पोस्‍टिंग के नाम पर आ रही पैसे के लेन-देन की खबरें, नगर पालिकाओं एवं नगर निगमों में चल रहा खेल हो अथवा विकास प्राधिकरणों की भ्रष्‍टाचार को पालने-पोषने वाली नीति, इन सभी ने योगी जी को यह समझने में मदद की है कि भ्रष्‍टाचारियों के कॉकश को तोड़ पाना उतना आसान नहीं है जितना वो समझे बैठे थे।
संभवत: इसीलिए गत शुक्रवार को लखनऊ के लोकभवन में आवास एवं शहरी नियोजन विभाग की प्रस्‍तावित शमन योजना को देखकर सीएम योगी आदित्‍नाथ ने अधिकारियों से कहा कि वह अलग-अलग टीमें बनाकर अवैध निर्माण को चिन्‍हित कर शमन शुल्‍क वसूलें। इसके लिए एक पारदर्शी व्‍यवस्‍था बनाई जाए ताकि इसकी आड़ में अवैध कमाई न की जा सके।
सीएम योगी ने यह भी कहा कि जिन अधिकारियों के कार्यकाल में अवैध कॉलोनियों बसाई गई हैं और बेखौफ अवैध निर्माण हुए हैं, उनकी जवाबदेही तय की जाए क्‍योंकि ये निर्माण विवाद के बड़े कारण बने हुए हैं।
योगी आदित्‍नाथ का यह कथन स्‍पष्‍ट करता है कि उन्‍हें आवास एवं शहरी नियोजन विभाग में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार की जानकारी तो है ही, वह इतना भी जानते हैं कि इससे जुड़े लोगों के संरक्षण से ही अवैध कॉलोनियां तथा अवैध निर्माण होते हैं।
वैसे देखा जाए तो भ्रष्‍टाचार को लेकर जीरो टॉलरेंस की नीति पर चलने वाली योगी आदित्‍यनाथ सरकार ने आवास एवं शहरी नियोजन विभाग में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार को महसूस करने में जरूरत से ज्‍यादा वक्‍त लगा दिया अन्‍यथा ‘पब्‍लिक डोमेन’ में विकास प्राधिकरण का नाम बहुत पहले से ‘विनाश प्राधिकरण’ प्रचलित है और नगर पालिकाओं को ‘नरक पालिका’ कहा जाता है।
उत्तर प्रदेश इस देश का सबसे बड़ा सूबा है इसलिए इसके एक-एक शहर और कस्‍बे की कुंडली निकालना थोड़ा जटिल है, लेकिन उन प्रमुख शहरों से प्रदेश की स्‍थिति को भलीभांति समझा जा सकता है जिन पर योगी सरकार का पूरा ‘फोकस’ बना हुआ है।
ऐसे ही शहरों में शुमार है योगीराज भगवान श्रीकृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली का गौरव प्राप्‍त विश्‍व विख्‍यात धार्मिक नगरी मथुरा।
एक ओर हरियाणा तथा दूसरी ओर राजस्‍थान की सीमा से लगा एवं राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के करीब और यमुना नदी के किनारे बसा यह तीर्थस्‍थल चूंकि पर्यटन की दृष्‍टि से भी अंतर्राष्‍ट्रीय ख्‍याति प्राप्‍त है लिहाजा वर्षभर यहां लोगों का आगमन बना रहता है।
इसके अलावा यह जनपद निवेशकों को भी आकर्षित करता रहा है इसलिए यहां जमीनी कारोबार पिछले कुछ वर्षों के अंदर काफी फला-फूला है।
किसी भी प्रदेश के विकास में वहां की डेवलपमेंट अथॉरिटी का बड़ा हाथ होता है इसलिए मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण का भी दायरा बढ़ाते हुए योगी सरकार ने एक ऐसे अधिकारी को उसका उपाध्‍यक्ष नियुक्‍त किया जो ब्रज तीर्थ विकास परिषद उत्तर प्रदेश का मुख्य कार्यपालक अधिकारी यानी CEO भी है।
यही नहीं, प्रदेश सरकार ने ब्रज तीर्थ विकास परिषद उत्तर प्रदेश के अध्‍यक्ष पद पर अवकाश प्राप्‍त आईपीएस अधिकारी शैलजाकांत मिश्र को तैनात किया।
यहां यह जान लेना जरूरी है कि ये दोनों अधिकारी मथुरा के मिजाज से भलीभांति परिचित हैं।
पीपीएस अधिकारी नागेन्‍द्र प्रताप की अब तक की नौकरी का एक बड़ा हिस्‍सा मथुरा-आगरा में ही कटा है और शैलजाकांत मिश्र भी पूर्व में मथुरा पुलिस के मुखिया रहे हैं।
शैलजाकांत मिश्र का ‘देवरहा बाबा’ और उनके आश्रम से भी गहरा नाता रहा इसलिए मथुरा से जाने के बावजूद उनका इस तीर्थस्‍थल तथा ब्रजवासियों से संबंध कभी टूटा नहीं।
‘योगीराज’ में इन दोनों अधिकारियों को पर्याप्‍त अधिकार मिले हुए हैं, साथ ही मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण और ब्रज तीर्थ विकास परिषद एक-दूसरे के पूरक हैं। बावजूद इसके जनपद का कितना व कैसा विकास हुआ है, इसके बारे में कुछ बताने की जरूरत नहीं रह जाती।
ब्रज तीर्थ विकास परिषद के दोनों आला अधिकारियों ने मथुरा-वृंदावन-गोवर्धन या बरसाना का कोई उल्‍लेखनीय विकास भले ही न किया हो परंतु आरोप-प्रत्‍यारोप में बराबर जरूर उलझे हुए हैं।
जहां तक सवाल विकास प्राधिकरण का है तो सैकड़ों अवैध कॉलोनियों का जाल इस धर्मनगरी में फैला हुआ है। अधिकृत पॉश कॉलोनियों में भी मनमाना निर्माण कार्य कराने के लिए बिल्‍डर और मकान मालिक स्‍वतंत्र हैं।
यदि किसी बिल्‍डर को तीन मल्टी स्‍टोरी इमारत खड़ी करने की इजाजत मिली है तो उसने विकास प्राधिकरण की मिलीभगत से छ: मल्टी स्‍टोरी इमारतें खड़ी कर ली हैं लिहाजा उन्‍हें लेकर वैसे ही विवाद लंबित हैं जिनका जिक्र सीएम योगी आदित्‍यनाथ ने अपनी मीटिंग में अधिकारियों से किया।
होटल, गेस्‍ट हाउस, मैरिज होम्‍स, अत्‍याधुनिक आश्रम, व्‍यावसायिक शोरूम आदि का निर्माण धड़ल्‍ले से वाहन पार्किंग की जगह छोड़े बिना हो रहा है।
नया बस अड्डा क्षेत्र, पुराने बस अड्डे का इलाका, मसानी-हाईवे लिंक रोड, वृंदावन का रमणरेती रोड, गोवर्धन-मथुरा मार्ग तथा आन्‍यौर परक्रिमा मार्ग सहित शहर का व्‍यस्‍ततम इलाका और नेशनल हाईवे व शहर दोनों से सटा हुआ कृष्‍णा नगर का मार्केट इसका प्रत्‍यक्ष उदाहरण हैं।
समूचा शहर और यहां तक कि मथुरा की सीमा के अंदर वाला नेशनल हाईवे भी इसी कारण पूरे-पूरे दिन जाम से जूझता रहता है।
सर्वविदित है कि जेब भारी हो तो मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण से कैसा भी नक्‍शा पास कराना कोई मुश्‍किल काम नहीं है।
रिहायशी इलाके में टू व्‍हीलर, थ्रीव्‍हीलर, फोर व्‍हीलर और यहां तक कि ट्रैक्‍टर्स तक के शोरूम बने खड़े हैं क्‍योंकि विकास प्राधिकरण के अधिकारी सिर्फ और सिर्फ अपना विकास करने में मस्‍त हैं।
इन शोरूम्‍स में परमीशन के बिना अपनी जरूरत के हिसाब से परिवर्तन होते भी हर कोई देख सकता है सिवाय विकास प्राधिकरण के। मॉल, इंस्‍टीट्यूट एवं शिक्षण संस्‍थाएं हों या व्‍यावसायिक इमारतें, किसी के लिए एनओसी लिए बिना विकास प्राधिकरण से परमीशन लेना आसान है।
तकरीबन यही स्‍थिति नगर पालिकाओं एवं नगर निगमों की है। प्रदेशभर में इनकी कार्यप्रणाली बदनाम है क्‍योंकि यहां की ईंट-ईंट पैसा मांगती है।
मथुरा-वृंदावन जैसे विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक स्‍थल का विकास प्राधिकरण, हड़िया के चावल की तरह उदाहरण मात्र है वरना पूरे प्रदेश की स्‍थिति इससे कुछ अलग नहीं है। यूपी के “राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र” (एनसीआर) से लेकर प्रदेश की राजधानी लखनऊ तक के हालात कमोबेश एक जैसे हैं और इसीलिए मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ ने शहरी नियोजन विभाग की बैठक में अधिकारियों को स्‍पष्‍ट आदेश दिए कि अवैध निर्माण ध्‍वस्‍त करने या शमन शुल्‍क वसूलने की आड़ में अनैतिक कमाई का धंधा और जोर-शोर से शुरू न हो।
सीएम योगी आदित्‍यनाथ ने भले ही अधिकारियों को कितने ही सख्‍त आदेश-निर्देश क्‍यों न दिए हों, परंतु जमीनी हकीकत इससे बदलने वाली नहीं हैं।
शिकायत और जांच से शुरू होने वाला सिलसिला जब तक किसी नतीजे पर पहुंचता है तब तक तो सरकारें बदल जाती हैं।
नोएडा के बुद्धा सर्किट में लगी मूर्तियों के भ्रष्‍टाचार की जांच हो या फिर गोमती रिवर फ्रंट के निर्माण में हुए घोटाले की, नतीजा सबके सामने है।
सरकार बनने पर मायावती को जेल भेजने का ऐलान करने वाले सपा के तत्‍कालीन मुखिया मुलायम सिंह आज किसी लायक नहीं रहे तथा पिता की कृपा से अपरिपक्‍व उम्र में मुख्‍यमंत्री बनने वाले अखिलेश यादव पिछले विधानसभा चुनाव में मायावती की उंगली पकड़ कर सत्ता पाने का ख्‍वाब पालते दिखे।
इससे पहले पूर्ण बहुमत के साथ यूपी की बागडोर संभालने वाली बसपा प्रमुख मायावती ने कल्‍पना भी नहीं की थी कि पूर्ण बहुमत के साथ ही कभी सपा भी सरकार बना सकती है।
इनमें से किसी ने शायद ही यह सोचा हो कि सपा-बसपा के नायाब गठबंधन को धता बताकर जनता भाजपा का पूरे सम्‍मान के साथ राजतिलक कर देगी।
और शायद ही किसी के दिमाग में यह बात भी आई हो कि गेरुआ वस्‍त्र पहननने वाला गोरखनाथ मंदिर का एक महंत देश के सबसे बड़े प्रदेश की सत्ता संभालेगा।
राजनीति में उलटबांसियों का यह खेल ही उसे जितना रोचक बनाता है, उतना ही चौंकाता भी है।
ढाईसाल से अधिक का ”योगीराज” बीत चुका है। इसे आधा गिलास भरा और आधा गिलास खाली जैसी स्‍थिति भी कह सकते हैं। आधे से अधिक का समय बीत जाने पर भी यदि भ्रष्‍टाचार के मामले में जीरो टॉलरेंस की नीति परवान नहीं चढ़ पाई तो इतना तय है कि आगे आने वाले ढाई साल बहुत आसान नहीं होंगे।
योगी आदित्‍यनाथ को यदि वाकई भ्रष्‍टाचारियों पर प्रभावी अंकुश लगाना है तो उन्‍हें ‘सत्ता के मठ’ से स्‍वयं बाहर आना होगा। हड़िया के पूरे चावल न सही, किंतु कुछ चावलों को देखकर पता करना होगा कि अधिकारी उनके आदेश-निर्देशों की तपिश महसूस कर भी रहे हैं या नहीं।
कहीं ऐसा तो नहीं तो भ्रष्‍टाचार की जीरो टॉलरेंस वाली उनकी नीति को ही हथियार बनाकर अधिकारी व कर्मचारी दोनों हाथों से लूट करने में लगे हों। सख्‍ती का असर कई मर्तबा इस रूप में भी सामने आता है, यह कोई रहस्‍योद्घाटन नहीं है।
योगी सरकार को समय रहते यह भी समझना होगा रेत की तरह समय हाथ से फिसलता जा रहा है जबकि अभी बहुत सी चुनौतियों शेष हैं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

मंगलवार, 24 दिसंबर 2019

CAA और NRC की आड़ में एकबार फिर जिन्‍ना सी जिद और नेहरू सी महत्‍वाकांक्षा को पूरा करने का षड्यंत्र

जिन्‍ना की जिद और नेहरू की महत्‍वाकांक्षा को पूरा करने के लिए अखंड भारत को खंड-खंड करने का जो सिलसिला 1947 में प्रारंभ किया गया था, उसका नया अध्‍याय लिखने की कोशिश है CAA और NRC की आड़ लेकर कराए जा रहे हिंसक प्रदर्शन।
तर्क-वितर्क और कुतर्कों के बीच देश के कई हिस्‍सों में जारी हिंसा से एक बात तो बड़ी आसानी के साथ समझी जा सकती है कि इस समय जो कुछ हो रहा है या सही मायनों में कहें तो किया जा रहा है, वह पूर्व नियोजित है…आकस्‍मिक नहीं।
गौर करें तो पूरी तरह स्‍पष्‍ट हो जाएगा कि जिस वक्‍त नागरिकता संसोधन बिल (CAB) को पास कराने के लिए लोकसभा और राज्‍यसभा में बहसों का दौर चल रहा था, ठीक उसी समय कुछ ऐसे लोग जिन्‍हें यह मालूम था कि वह बिल को पास होने से रोक नहीं सकते, सरकार के खिलाफ हिंसात्‍मक प्रदर्शन की तैयारी में लगे थे।
यहां यह जान लेना भी जरूरी है कि इतने बड़े पैमाने पर हिंसक प्रदर्शन की तैयारी मात्र इन्‍हीं दो दिनों में नहीं हो गई, इसकी बुनियाद 2014 से तभी रखी जाने लगी थी जब केंद्र में पहली बार नरेन्‍द्र मोदी के नेतृत्‍व वाली सरकार बनी।
दिमाग पर जोर डालें तो साफ-साफ दिखाई देने लगेगा कि किस तरह मोदी सरकार को पहले दिन से बार-बार कठघरे में खड़ा करने के प्रयास किए जाते रहे। कभी असहिष्‍णुता के नाम पर तो कभी अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता का राग अलापकर। कभी सूटबूट की सरकार बताकर तो कभी मुस्‍लिम विरोधी प्रचारित करके।
सत्ता की खातिर नरेन्‍द्र मोदी से वैमनस्‍यता का घृणित खेल इतना आगे जा पहुंचा कि विभिन्‍न न्‍यायालयों के निर्णयों को भी मोदी सरकार की कार्यप्रणाली से जोड़ा जाने लगा।
सर्वोच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायाधीशों की अपने ही बॉस से रोस्‍टर प्रणाली को लेकर तनातनी भी मोदी सरकार से जोड़ दी गई। उसके लिए सीजेआई दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग तक लाने का प्रयास किया गया।
तीन तलाक के लिए कानून बनाने का आदेश देश की सर्वोच्‍च अदालत ने दिया किंतु प्रचारित यह किया गया कि इसके लिए मोदी सरकार की मुस्‍लिम विरोधी मानसिकता जिम्‍मेदार है।
इतने से भी काम नहीं चला तो 2019 के लोकसभा चुनावों में ”चौकीदार चोर” है का अत्‍यंत निम्‍नस्‍तरीय नारा बुलंद किया गया और पूरी बेशर्मी के साथ उसे जायज ठहराने की कोशिश भी की गई।
इस सबके बावजूद 2019 में मोदी सरकार को मिले भारी बहुमत ने जब सारे अरमानों पर पानी फेर दिया तो नए सिरे से षड्यंत्रों का ताना-बाना बुना जाने लगा।
इन षड्यंत्रों को परवान चढ़ाने की कोशिश सबसे पहले तब की गई जब सरकार ने जम्‍मू-कश्‍मीर से धारा 370 को समाप्‍त कर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों के रूप में विभाजित कर दिया।
एक अस्‍थाई धारा को संविधान सम्‍मत प्रावधानों के तहत हटाने के बावजूद विपक्ष और खासकर कांग्रेस ने आसमान सिर पर उठा लिया। लोकसभा और राज्‍यसभा में जमकर हंगामा किया गया और सड़कों पर धरने-प्रदर्शनों की अगुवाई की। सुप्रीम कोर्ट से लेकर श्रीनगर तक यह जताने में कोई कसर नहीं छोड़ी कि देश को आग में झोंकने का काम किया गया है।
जब कहीं कोई सफलता नहीं मिली और थक-हारकर बैठने के लिए मजबूर होना पड़ा तो अयोध्‍या पर आने वाले सर्वोच्‍च न्‍यायालय के निर्णय को लेकर हवा दी जाने लगी। कहा जाने लगा कि मंदिर पर यदि हिंदुओं के पक्ष में निर्णय नहीं आया तो सरकार उसे पलट देगी। मोदी सरकार कानून बनाकर मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्‍त करेगी।
बहरहाल, अयोध्‍या पर आए सुप्रीम कोर्ट के सर्वसम्‍मत निर्णय ने अरमानों पर पानी फेर दिया क्‍योंकि उसके विरोध में कहीं से कोई आवाज नहीं उठी। हालांकि फिर भी उकसाने का काम चालू रहा लिहाजा चंद लोग यह कहने लगे कि सुप्रीम कोर्ट ने अपना निर्णय सबूतों को दरकिनार कर धार्मिक आस्‍था के मद्देनजर दिया है।
बाद में इन्‍हीं लोगों ने रिव्‍यू पिटीशन दाखिल कर एकबार पुन: अयोध्‍या विवाद को जिंदा रखने का प्रयास किया परंतु सभी रिव्‍यू पिटीशन सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दीं।
यही कारण रहा कि जैसे ही मोदी सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में नागरिकता संशोधन बिल लाई वैसे ही उसे लेकर अफवाहों का बाजार गर्म करना शुरू कर दिया गया। NRC को नागरिकता संशोधन बिल यानी CAB से जोड़कर इस आशय का प्रचार किया जाने लगा कि यह दोनों एक-दूसरे के पूरक और मुस्‍लिमों को देश से खदेड़ने की योजना का हिस्‍सा हैं।
पूरे-पूरे दिन CAB पर संसद के दोनों सदनों में बहस होने के बाद नागरिकता संशोधन बिल पास हुआ और राष्‍ट्रपति के हस्‍ताक्षर से इसने कानून का रूप लिया तो विपक्ष को अपने अरमानों पर फिर से पानी फिरता दिखाई देने लगा।
यही कारण रहा कि एक ओर वह हिंसक प्रदर्शनों को परोक्ष समर्थन देकर अपनी मंशा पूरी करने में जुट गया वहीं दूसरी ओर सुप्रीम कोर्ट से लेकर राष्‍ट्रपति तक के पास दौड़ा परंतु राहत कहीं से न मिलनी थी और न मिली।
कितने आश्‍चर्य की बात है कि जिस बिल को पूरे संवैधानिक तौर-तरीकों से संसद के दोनों सदनों में पास कराया गया, उसे अब भी असंवैधानिक और अलोकतांत्रिक घोषित कर देशभर में आग लगाने की कोशिश की जा रही है।
नागरिकता संशोधन कानून अर्थात CAA को लेकर हिंसक प्रदर्शन करने वाले इसके बारे में कितना जानते हैं, इसकी पुष्‍टि मीडिया द्वारा उनसे पूछे जा रहे सवालों से बखूबी हो रही है।
जामिया मिल्‍लिया इस्‍लामिया, अलीगढ़ मुस्‍लिम यूनिवर्सिटी, जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी यानी जेएनयू और अन्‍य कुछ शिक्षण संस्‍थानों के छात्रों की बात छोड़ दी जाए तो आज हजारों की तादाद में जगह-जगह प्रदर्शन करने वाले इतना भर नहीं बता पा रहे कि वो किस संबंध में तथा क्‍यों प्रदर्शन करने आए हैं। हालांकि बड़ी-बड़ी यूनिवर्सिटी के छात्र भी यह बताने में असमर्थ हैं कि CAA और NRC किस तरह एक-दूसरे के पूरक हैं और किस तरह भारतीय मुसलमानों के खिलाफ हैं।
हिंसक प्रदर्शनों में लिप्‍त और सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वाले राजनीतिक संरक्षण प्राप्‍त इन उपद्रवी तत्‍वों को यदि कुछ पता है तो मात्र इतना कि उन्‍हें मोदी सरकार का विरोध करना है क्‍योंकि उनके मुताबिक यह सरकार मुस्‍लिम विरोधी है।
उनके पास इस प्रश्‍न का कोई जवाब नहीं है कि वो किस आधार पर मोदी सरकार को मुस्‍लिम विरोधी बता रहे हैं और उनके पास इसके लिए क्‍या तर्क है।
सच तो यह है कि धार्मिक आधार पर देश का बंटवारा कराने वाली और सात दशक से तुष्‍टीकरण की राजनीति करने वाली पार्टी को अब यह समझ में आ चुका है कि उसके लिए मोदी के रहते सत्ता में वापसी का कोई रास्‍ता शायद ही मिले इसलिए किसी भी तरह मोदी को हटाया जाए।
जिन रास्‍तों से देश की सबसे पुरानी पार्टी सर्वाधिक लंबे समय तक सत्ता सुख भोगती रही, मोदी सरकार ने क्रमश: उन सभी रास्‍तों को बंद कर दिया है। यदि कोई रास्‍ता बचा भी है, तो उसे बंद करने की पूरी तैयारी उसने कर रखी है।
अर्श से फर्श पर आई स्‍वतंत्रता सेनानियों की पार्टी को समझ में नहीं आ रहा कि वह उसकी जड़ों तक मठ्ठा डालने वाली मोदी की नीतियों से आखिर कैसे पार पाए। कैसे उसके अकाट्य तर्कों का जवाब दे और कैसे अपने डूबते जहाज को बचाए।
जाहिर है कि उसे इस सबके लिए अंतिम सहारे के रूप में वहीं लौटना पड़ रहा है जहां से उसकी शुरूआत हुई थी। मतलब धार्मिक आधार पर बंटवारे की राजनीति पर।
जिन्‍ना की जिद और नेहरू की महत्‍वाकांक्षा को पूरा करने के लिए अखंड भारत को खंड-खंड करने का जो सिलसिला 1947 में प्रारंभ किया गया था, उसका नया अध्‍याय लिखने की कोशिश है CAA और NRC की आड़ लेकर कराए जा रहे हिंसक प्रदर्शन।
किसी भी हिंसक प्रदर्शन के लिए भीड़ से अच्‍छा कोई हथियार नहीं होता क्‍योंकि भीड़ बेदिमाग होती है। संभवत: इसीलिए हर राजनीतिक दल अपना मंसूबा पूरा करने को भीड़ का सहारा लेता है और उसे नाम देता है जनसमर्थन का।
चूंकि भीड़ बेदिमाग होती है इसलिए कई बार वह उकसाने वालों पर ही भारी पड़ जाती है। भीड़ को हथियार बनाकर शिकार करने वाले तब खुद उसके हाथों शिकार होते देखे गए हैं। दुनिया के तमाम मुल्‍क इसकी पुष्‍टि करते हैं।
बेहतर होगा कि लोकतंत्र और संविधान की दुहाई देकर भीड़ को उकसाने वाले राजनीतिक दल जितनी जल्‍दी हो यह समझ जाएं कि हथियार सिर्फ हत्‍या और सुरक्षा के लिए नहीं होते, आत्‍महत्‍या के कारण भी वही बनते हैं।
और अंत में एक बिन मांगी सलाह कि हो सके तो आत्‍मघाती खोखले मुद्दों को हथियार बनाने की जगह यह विचार कीजिए कि इस दयनीय दशा तक कैसे और क्‍यों पहुंचे।
माना कि राजनीति आज की तारीख में एक विशुद्ध पेशा है, सेवा नहीं परंतु पेशे के सफल संचालन को भी पेशेवर रुख अख्‍यतियार करना पड़ता है। गैर पेशेवर तरीका अंतत: कहीं का नहीं छोड़ता।
रहा सवाल CAA और NRC का, तो देर-सवेर ठीक उसी तरह इनकी अहमियत वर्ग विशेष को भी समझ में आ जाएगी जिस तरह 370 हटने की अहमियत कश्‍मीरियों को समझ में आ गई।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 14 दिसंबर 2019

अबे चल हट…तू 5 हजार रुपए घंटे वाला प्रवक्‍ता, मैं 10 हजार रुपए Per Hour वाला Spokes Person


अबे चल हट…तू 5 हजार रुपए घंटे वाला क्षेत्रीय पार्टी का प्रवक्‍ता, मैं 10 हजार रुपए Per Hour वाला नेशनल पार्टी का Spokes Person……….. तेरी मेरे सामने क्‍या औकात।
चौंकिए मत, अब लगभग दिन-दिनभर चलने वाली Tv debates में पार्टिसिपेट कर रहे लोग एक-दूसरे को यह सब कहते-सुनते नजर आएं तो आश्‍चर्य मत कीजिएगा, क्‍योंकि गंदा है पर धंधा है। पापी पेट का सवाल है।
सरकार किसी की हो, कभी प्‍याज तो कभी पेट्रोल-डीजल की कीमतों को लेकर रोते हुए मुंह मांगे दामों पर पिज्‍जा-बर्गर खाने वाले ‘हम लोग’ फ्री में फाइट देखने के इतने आदी हैं कि ‘नूरा कुश्‍ती’ को भी असलियत मानकर टकटकी लगाए बैठे रहते हैं।
इतना ही नहीं, उसके बाद अपना निठल्‍ला चिंतन लेकर सोशल मीडिया पर आवारा सांड़ों की तरह विचरण करने जा पहुंचते हैं ताकि किसी से भिड़कर सींगों की खुजली मिटा सकें।
वहां मुंह से न सही शब्‍दों से ऐसी जुगाली करते हैं कि भले ही उसकी दुर्गंध संबंधों को तार-तार करके रख दे किंतु पीछे हटने को तैयार नहीं होते।
मजे की बात यह है कि इतना सब-कुछ हम बिना यह जाने करते हैं कि हर डिबेट प्रायोजित है। हर प्रवक्‍ता, हर विशेषज्ञ, हर विश्‍लेषक बिकाऊ है। इन-फैक्‍ट एंकर से लेकर प्रवक्‍ता तक और विशेषज्ञ से लेकर विश्‍लेषक तक सब बिकाऊ हैं।
बहुत जल्‍द डेढ़ सौ करोड़ का आंकड़ा छूने जा रही देश की आबादी के एक बड़े हिस्‍से को शायद ही यह ज्ञान प्राप्‍त हो कि सुबह से शाम तक विभिन्‍न टीवी चैनलों पर बहस का हिस्‍सा बनने वाले लोग हमारी-तुम्‍हारी तरह फोकटिया नहीं हैं। वो हर घंटे की कीमत वसूलते हैं।
National party के Spokes Person को एक घंटे की बहस में भाग लेने का 10 हजार रुपया मिलता है और क्षेत्रीय दलों के प्रवक्‍ता पांच-पांच देकर निपटा दिए जाते हैं।
अब जरा विचार कीजिए कि एक राष्‍ट्रीय पार्टी का प्रवक्‍ता सुबह से शाम तक यदि चार चैनलों को निपटा दे तो 40 हजार रुपए की दिहाड़ी पूरी हो गई।
क्षेत्रीय पार्टी का प्रवक्‍ता भी 20 हजार रुपए दिनभर में पीट लेता है। यानी राष्‍ट्र के नाम पर मात्र एक महीने में एक करोड़ बीस लाख की कमाई और क्षेत्रीय होकर भी राष्‍ट्रभर की दुहाई देकर 60 लाख रुपए महीने की आमदनी। हर्र लगे न फिटकरी, रंग चोखा।
विशेषज्ञ और विश्‍लेषक भले ही अपनी-अपनी औकात के हिसाब से बिकते हों परंतु बिकाऊ सब होते हैं। जनहित में बहस करने की फुरसत किसी को नहीं।
रही बात एंकर की तो उसे चैनल की पॉलिसी मेंटेन रखते हुए ‘मैढ़ा’ लड़ाने का ही वेतन मिलता है। उसका अपना कोई दीन-धर्म नहीं होता। वह ‘जैसी ढपली वैसा राग’ का अनुकरण कर अपने कर्तव्‍य की पूरे दिन इतिश्री करता रहता है।
जो कल तक किसी चैनल पर ‘ताल ठोक’ रहा था वह आज ‘दंगल’ करा रहा है। जो ‘आर-पार’ कर रहा था, वो ‘हल्‍ला बोल’ रहा है। किसी चैनल पर ‘मास्‍टर स्‍ट्रोक’ लगाया जा रहा है तो कोई ‘ललकार’ रहा है।
नाम भी ऐसे कि भोजपुरिया फिल्‍मों के टाइटिल तक लजा जाएं। सबका अपना-अपना ‘एजेंडा’ है, बस नाम का फर्क है।
कह भले ही लो कि नाम में क्‍या रखा है, लेकिन बंधु नाम में ही बहुत कुछ रखा है तभी तो ऐसे बेढंगे नाम ढूंढ-ढूंढकर रखे जाते हैं और फिर उन नामों को सार्थक करते हुए उनके अनुरूप बहसें कराई जाती हैं। पैसा फेंककर तमाशा देखने और दिखाने का यह चलन कितने दिन और चलेगा, यह बता पाना तो मुश्‍किल है किंतु यह जरूर बताया जा सकता है कि जल्‍द ही इन बहसों का रूप परिवर्तन होने वाला है।
ढर्रे पर चल रही बहसों से पब्‍लिक को ऊब होने लगी है। खट्टी डकारें आने लगी हैं। जायका नजर नहीं आता, इसलिए वह चेंज चाहती है।
चैनल भी जनता की बेहद मांग पर अति शीघ्र इन बहसों में गाली-गलौज का तड़का लगाने की जुगत भिड़ा रहे हैं। बस मौके की तलाश है।
‘कुछ मीठा हो जाए’ की तर्ज पर ‘कुछ तीखा हो जाए’ टीवी मार्केट में उतारने की योजना है। गाली-गलौज न सही लेकिन इतना तो हो कि प्रवक्‍ताओं, विशेषज्ञों एवं विश्‍लेषकों के पैकेज की भरपाई की जा सके।
ऐसा ही कुछ कि अबे चल हट…बहुत देखे तेरे जैसे पांच-पांच हजार रुपल्ली पर बिकने वाले। जिस दिन मेरी तरह दस हजार रुपए घंटे मिलने लगें उस दिन मुझसे बात करना। अभी तेरी औकात नहीं है मुझसे बहस करने की।
विशेषज्ञ और विश्‍लेषक भी इसी अंदाज में एक-दूसरे की औकात बताते हुए रिटायरमेंट का लुत्फ लेते रहेंगे।
मार-पिटाई के सीन अगली प्‍लानिंग के लिए छोड़े जा सकते हैं क्‍योंकि उसके बाद चैनलों के पास कुछ बचेगा नहीं।
जाते-जाते एकबार और जान लो। ये घंटे-घंटेभर में हजारों रुपए छापकर ले जाने वाले जो लोग आपको चैनलों पर एक-दूसरे के जानी दुश्‍मन दिखाई देते हैं वो कैमरा ऑफ होते ही साथ बैठकर कॉफी सिप करने लगते हैं।
दिमाग पर बिना यह जोर डाले कि ‘चार पैसे’ देकर मेंढ़े लड़ाने वाले चैनल भी आपनी-अपनी टीआरपी के लिए सारे देश को लड़ा रहे हैं।
हो सके तो आप ही अपने दिमाग पर जोर डाल लेना कि आपको इस सबसे आखिर क्‍या मिल रहा है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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