सोमवार, 7 नवंबर 2022

होटल अग्निकांड: क्या ''बसेरा ग्रुप'' के मालिक को बचाव का मौका दे रही है मथुरा पुलिस?

 क्या "बसेरा ग्रुप" के मालिक रामकिशन अग्रवाल को मथुरा पुलिस बचाव का मौका दे रही है? 


यह सवाल इसलिए खड़ा होता है कि बसेरा ग्रुप के वृंदावन स्‍थित होटल 'वृंदावन गार्डन' में हुए अग्निकांड को आज पांचवां दिन है, लेकिन अब तक इसके जिम्‍मेदार किसी आरोपी की गिरफ्तारी पुलिस नहीं कर सकी है जबकि इस अग्निकांड ने होटल के ही दो कर्मचारियों की जान ले ली और एक की हालत गंभीर है। 
यह सवाल इसलिए भी किया जा रहा है क्योंकि दुर्घटना वाले दिन पहले तो वृंदावन पुलिस ने FIR में ही लीपापोती करने का प्रयास किया और 'नामजदगी' की जगह 'स्‍वामी प्रबंधक' होटल 'वृंदावन गार्डन' लिखकर सबको गुमराह करने की कोशिश की किंतु 'लीजेण्‍ड न्यूज' ने जब पुलिस की इस 'कारस्तानी' को 'हाईलाइट' किया तब अगले दिन बसेरा ग्रुप ऑफ होटल के मालिक रामकिशन अग्रवाल, प्रबंधक ऋषि कुंतल तथा एक अन्‍य कर्मचारी सतीश पाठक को नामजद किया। 
अग्निशमन अधिकारी की ओर से आईपीसी की धारा 304 और 308 के तहत दर्ज कराए गए इस मामले में 'नामजदगी' के बावजूद पांचवें दिन तक कोई गिरफ्तारी नहीं हुई है। 
पुलिस दे रही है मौका 
बताया जा रहा है कि जिले की पुलिस ही नहीं, प्रशासन को भी विभिन्न माध्‍यमों से ऑब्‍लाइज करने वाला बसेरा ग्रुप का मालिक रामकिशन अग्रवाल लखनऊ तक पहुंच रखता है और इसीलिए पुलिस उस पर हाथ डालने की हिम्मत नहीं कर रही। 
सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार सत्ता के गलियारों तक पैठ बना चुका रामकिशन अग्रवाल तीन स्‍तर पर अपने बचाव की कोशिश में लगा है। उसकी पहली कोशिश तो यह है कि पुलिस की तफ्तीश में ही उसे क्लीन चिट मिल जाए और वह साफ बच निकले। रामकिशन अग्रवाल की दूसरी कोशिश है कि हाई कोर्ट से उसे अरेस्‍ट स्‍टे या अग्रिम जमानत प्राप्‍त हो जाए। 
यदि इनमें से कुछ भी संभव नहीं होता तो रामकिशन अग्रवाल राजनीतिक प्रभाव से इस मामले की जांच सीबीसीआईडी के हवाले कराना चाहता है जिससे एक ओर गिरफ्तारी की आशंका से मुक्‍ति मिले तथा दूसरी ओर मामला ठंडे बस्‍ते के हवाले हो जाए क्योंकि सीबीसीआईडी की जांच ऐसे लोगों के लिए बहुत मुफीद साबित होती है, साथ ही उसकी जांच का तरीका किसी केस की गर्मी को शांत करने का पूरा मौका उपलब्‍ध कराता है। 
खबर के साथ लगा वर्ष 2014 का फोटो यह बताने के लिए काफी है कि रामकिशन अग्रवाल की सत्ता में पहुंच कब से तथा किस स्‍तर तक है। इस फोटो में वह किसी कार्यक्रम के दौरान यूपी के तत्‍कालीन राज्यपाल राम नाइक जी को गाय की प्रतिमा भेंट करते दिखाई दे रहा है। 
यूं भी किसी इतने बड़े कारोबारी से, जिससे पुलिस-प्रशासन समय-समय पर ऑब्‍लाइज होता रहता हो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई करना उसके लिए आसान नहीं होता। कारोबारी भी ऐसा, जिसकी सत्ताधारी पार्टी में ऊपर तक पहुंच हो। 
ये भी पता लगा है कि इस बीच पुलिस प्रशासन को इस आशय का संदेश भिजवाया गया है कि अग्निकांड की चपेट में आए होटल कर्मचारियों ने चूंकि शराब का सेवन कर रखा था इसलिए वो अपना बचाव नहीं कर सके। यानी आग का शिकार होने के लिए किसी हद तक वो भी जिम्‍मेदार थे। हालांकि जांच अधिकारी के गले यह बात कितनी उतरती है और क्या पोस्‍टमार्टम रिपोर्ट से ऐसी किसी बात की पुष्‍टि हुई है, इसका पता लगना बाकी है। 
बहरहाल, इतना तो साफ है कि लखनऊ के 'लेवाना' होटल में हुए अग्‍निकांड की तरह कृष्‍ण की नगरी में हुए इस अग्‍निकांड को न तो पुलिस उतनी गंभीरता से ले रही है और न प्रशासन अथवा राज्य सरकार। 
यही कारण है कि बिना एनओसी के चल रहे इस होटल में दो कर्मचारियों की मौत का करण बने अग्‍निकांड की बमुश्‍किल एफआईआर दर्ज किए जाने के अतिरिक्‍त अब तक कोई एक्शन नहीं लिया गया। न तो मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के किसी अधिकारी अथवा कर्मचारी से पूछताछ हुई और न किसी को बिना एनओसी होटल का नक्शा पास करने का जिम्‍मेदार ठहराया गया। 
बस यही फर्क है प्रदेश की राजधानी लखनऊ के एक होटल में हुए अग्निकांड में और मथुरा के वृंदावन स्‍थित होटल के अग्‍निकांड में। वहां न केवल 15 अधिकारी तत्‍काल निलंबित कर दिए गए बल्‍कि 19 अधिकारियों के ख़िलाफ़ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए जिनमें कुछ रिटायर अधिकारी भी शामिल हैं। 
सीएम योगी आदित्‍यनाथ ने लखनऊ मंडल के पुलिस आयुक्त से जांच कराई। इस जांच रिपोर्ट में फायर ब्रिगेड, ऊर्जा विभाग, नियुक्ति विभाग, आवास और शहरी विकास विभाग सहित आबकारी विभाग के कई अधिकारियों की अनियमितता व लापरवाही पाई गई। 
जांच में पाया गया कि होटल 'लेवाना' को अवैध रूप से बनाया गया था। जिसके लिए लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा 22 इंजीनियरों और जोनल अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की संस्‍तुति की गई लेकिन वृंदावन में दो मौतों के बाद भी किसी के कान पर जूं नहीं रेंग रही। आखिर लखनऊ, लखनऊ है। प्रदेश की राजधानी है। और मथुरा-वृंदावन एक अदना सा जिला। इसकी बराबरी प्रदेश की राजधानी से कैसे संभव है, चाहे मौत के मामले समान रूप से दुखदायी क्यों न माने जाते हों। 
-Legend News 

वृंदावन गार्डन अग्निकांड में FIR तो दर्ज हुई लेकिन आरोपियों के नाम नदारद, इसे कहते हैं प्रभाव


 उत्तर प्रदेश ही नहीं, देश की प्रमुख धार्मिक नगरी मथुरा के वृंदावन धाम स्‍थित जिस होटल 'वृंदावन गार्डन' में कल सुबह भयंकर अग्निकांड हुआ और जिसमें होटल के दो कर्मचारियों ने अपनी जान गंवा दी तथा एक गंभीर रूप से झुलस गया उस होटल के मालिक या प्रबंधक का नाम तक न तो FIR दर्ज कराने वाले अग्निशमन अधिकारी जानते हैं और न स्‍थानीय पुलिस को पता है जबकि वो एक नामचीन बिल्डर है, साथ ही उसके वृंदावन में ही तीन होटल हैं। 

बसेरा ग्रुप के ये होटल 'बसेरा', 'बसेरा ब्रजभूमि' और होटल 'वृंदावन गार्डन' के नाम से संचालित हैं। इनमें से एक फोगला आश्रम के पास, दूसरा अटल्‍ला चुंगी पर तथा तीसरा रामकृष्‍ण मिशन हॉस्‍पिटल के सामने स्‍थित है। 
इसी प्रकार इन्‍होंने वृंदावन में ही कई कॉलोनियां डेवलप की हैं जिनमें से प्रमुख हैं 'बसेरा वैकुंठ', 'हरेकृष्‍णा धाम' और 'गौधूलि पुरम'। इसके अलावा इनके फॉर्म हाउस तथा कोल्ड स्‍टोरेज भी हैं, लेकिन इतना सब होने के बावजूद अग्निशमन विभाग और वृंदावन पुलिस के अधिकारी इनके मालिक का नाम नहीं जानते। है न भद्दा मजाक? 
सबकी आंखों में धूल झोंक कर दो लोगों की मौत के जिम्‍मेदारों को बचाने के इस शर्मनाक कृत्‍य का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि कल FIR दर्ज कराने वाले अग्निशमन विभाग ने ही 08 सितंबर 22 को 'अग्नि सुरक्षा' की दृष्‍टि से होटल 'वृंदावन गार्डन' का परीक्षण कर उसमें 6 खामियां पाई थीं और उन्‍हें 30 दिन के अंदर दूर करने का नोटिस दिया था लेकिन तब भी इन्‍होंने मालिक का नाम जानने की आवश्‍यकता तक नहीं समझी।     
जी हां, होटल वृंदावन गार्डन में कल सुबह हुए अग्निकांड की FIR तो कल देर शाम 7 बजकर 23 मिनट पर थाना कोतवाली वृंदावन में दर्ज कर ली गई किंतु इस FIR में आरोपियों की जगह 'स्‍वामी प्रबंधक' होटल 'वृंदावन गार्डन' लिखा गया है। मतलब जिस व्‍यक्ति को मथुरा-वृंदावन का बच्‍चा-बच्‍चा जानता है, उसे मथुरा के अग्निशमन अधिकारी और वृंदावन के कोतवाल नहीं जानते। 
आईपीसी की धारा 304 और 308 के तहत दर्ज इस अग्निकांड की जांच पुलिस इंस्‍पेक्‍टर ज्ञानेन्‍द्र सिंह सोलंकी को सौंपी गई है। 
आखिर क्यों दर्ज नहीं किए गए FIR में आरोपियों के नाम? 
ऐसे में हर व्‍यक्‍ति के मन में यह सवाल उठना स्‍वाभाविक है कि आखिर FIR में आरोपियों की नामजदगी क्यों नहीं की गई? 
इसका सीधा सा उत्तर है कि इसे ही "प्रभाव" कहते हैं। यही होता है अफसरों को समय-समय पर ऑब्‍लाइज करने का प्रतिफल। पुलिस से पूछिए तो कहेगी कि जांच के दौरान या जांच के बाद आरोपियों के नाम जोड़े जा सकते हैं, किंतु उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं हो सकता कि जिसके नाम और काम से सब परिचित हैं, उससे वह कैसे अनजान हैं। 
जाहिर है कि FIR दर्ज कराने वाले और करने वाले दोनों अधिकारियों की यह मासूमियत उच्‍च अधिकारियों के आदेश-नर्देश पर निर्भर है। अधिकारी चाहते तो यह संभव ही नहीं था कि आरोपियों के नाम इस तरह नदारद कर दिए जाते। पुलिस की एफआईआर से तो यह भी स्‍पष्‍ट नहीं है कि स्‍वामी और प्रबंधक अलग-अलग हैं या दोनों को एक ही मान लिया गया है। 
कानून के जानकारों की मानें तो यह सारा खेल एक गंभीर अपराध के जिम्‍मेदारों को अपने बचाव का पूरा मौका देने और जांच में लीपापोती करने की गुंजाइश रखने के लिए खेला गया है। 
कुछ भी कहें सीएम योगी, लेकिन हकीकत यही है 
प्रदेश के सीएम योगी कुछ भी कहें और कितनी ही सख्‍ती बरतने के आदेश-निर्देश देते रहें किंतु कड़वा सच यही है। तभी तो कहीं गैंगरेप के मामले में सीओ स्‍तर का  कोई अधिकारी 5 लाख रुपए की रिश्‍वत मांगता है और कहीं भ्रष्‍टाचार के पर्याय लोकनिर्माण विभाग के अधिकारी अपनी मनमानी करने से बाज नहीं आते। 
बेशक संज्ञान में आने पर शासन स्‍तर से ऐसे एक-दो लोगों के खिलाफ कभी-कभी कार्रवाई की जाती है परंतु उन अधिकारी एवं कर्मचारियों की संख्‍या काफी अधिक है जो साफ बच निकलते हैं। 
लखनऊ के होटल लेवाना में सरकार की नाक के नीचे आग लगती है तो उसके अवैध निर्माण का भी तुरंत पता लग जाता है और जिम्‍मेदारों के खिलाफ कार्रवाई भी तत्‍काल हो जाती है लेकिन वृंदावन के होटल में आग लगती है तो पुलिस होटल मालिक का नाम तक पता करना जरूरी नहीं समझती। 
इन हालातों में ऐसी कोई उम्‍मीद करना कि मथुरा-वृंदावन सहित प्रदेश भर के तमाम जिलों में बने अवैध होटल, गेस्‍ट हाउस, हॉस्‍पिटल या शॉपिंग कॉम्‍प्‍लेक्‍स के लिए सीधे-सीधे जिम्मेदार 'विकास प्राधिकरण' के अधिकारियों पर कभी कोई सख्‍त कार्रवाई होगी, हसीन सपने देखने जैसा है। 
यही कारण है कि प्रदेश का कोई जिला, कोई कस्‍बा, कोई तहसील ऐसी नहीं होगी जहां अवैध निर्माण न हो और जहां नियम-कानून को ताक पर रखकर खड़ी की गई इमारतें मौत के मंजर पेश करने की वजह न बनें। 
कल लखनऊ का लेवाना बना था, तो आज वृंदावन का वृंदावन गार्डन। लेकिन दावे के साथ कहा जा सकता है कि यह सिलसिला यहीं थमने वाला नहीं, क्‍योंकि जब लखनऊ में अवैध निर्माण संभव है तो मथुरा-वृंदावन जैसे जिलों की अहमियत ही कितनी है। 
बेनामी एफआईआर के आधार पर आरोपियों को गिरफ्तारी की आस लगाना, खुद को धोखे में रखने के अलावा कुछ नहीं। हो सकता है होटल वृंदावन गार्डन का मालिक किसी अधिकारी के पास बैठा दिखाई दे और अधिकारी कहे कि मैं तो उन्‍हें पहचानता ही नहीं था। यह होटल तो किसी और के नाम है, ग्रुप इनका है तो क्या? 
-Legend News 

गुरुवार, 3 नवंबर 2022

ये आग कब बुझेगी: 'लेवाना' के बाद अब मथुरा के होटल 'वृंदावन गार्डन' में लगी आग, 2 कर्मचारियों की मौत और 3 गंभीर रूप से झुलसे

 

अभी दो महीने ही बीते हैं जब प्रदेश की राजधानी लखनऊ के हजरतगंज स्‍थित 30 कमरों वाले होटल 'लेवाना' में आग लगने से 4 लोगों की मौत हो गई थी जबकि कई घायल हुए थे। उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ और लखनऊ से सांसद रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने इस अग्‍निकांड को गंभीरता से लिया था जिस कारण न केवल 15 अधिकारी तत्‍काल निलंबित कर दिए गए बल्‍कि 19 अधिकारियों के ख़िलाफ़ सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए जिनमें कुछ रिटायर अधिकारी भी शामिल हैं। 

सीएम योगी ने लखनऊ मंडल के पुलिस आयुक्त से जांच कराई। इस जांच रिपोर्ट में फायर ब्रिगेड, ऊर्जा विभाग, नियुक्ति विभाग, आवास और शहरी विकास विभाग सहित आबकारी विभाग के कई अधिकारियों की अनियमितता व लापरवाही पाई गई। 
इसके अलावा जांच में पाया गया कि होटल 'लेवाना' को अवैध रूप से बनाया गया था। जिसके लिए लखनऊ विकास प्राधिकरण द्वारा 22 इंजीनियरों और जोनल अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की संस्‍तुति की गई। 
एलडीए ने हजरतगंज थाने में बंसल कंस्ट्रक्शन के मुकेश जसनानी और उनके सहयोगियों के खिलाफ आवासीय भूखंड पर होटल चलाने के लिए एफआईआर भी दर्ज कराई। पुलिस ने भी इस मामले में अपनी तरफ से एक मुकद्दमा दर्ज किया। 
इतना सब-कुछ किए जाने के बावजूद सारा सिस्‍टम किस तरह उसी ढर्रे पर चल रहा है, इसका उदाहरण आज तब देखने को मिला जब कृष्‍ण की लीला स्‍थली वृंदावन (मथुरा) के होटल वृंदावन गार्डन में सुबह के समय आग लगने से दो कर्मचारियों उमेश तथा बीरी सिंह की मौत हो गई और तीन झुलस गए जिनमें से एक 45 वर्षीय बिजेन्द्र की हालत गंभीर बताई जाती है लिहाजा उसे आगरा रैफर किया गया है। 
क्या अवैध है होटल 'वृंदावन गार्डन'?
जिस तरह लखनऊ के होटल 'लेवाना' में अग्‍निकांड के बाद पता लगा कि उसका निर्माण ही अवैध था, उसी तरह अब पता लग रहा है कि मथुरा का यह होटल भी अवैध रूप से बना है और मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण से इसका नक्शा एक मैरिज होम के तौर पर पास है। हालांकि हमेशा की तरह फिलहाल इसकी पुष्‍टि करने वाला कोई नहीं है क्‍योंकि होटल मालिक रामकिशन अग्रवाल काफी प्रभावशाली व्‍यक्‍ति है और इसके अलावा भी वह कई होटलों का मालिक है जो बसेरा ग्रुप के तहत संचालित हैं। 

अग्‍निशमन विभाग ने दे रखा है नोटिस 
 विकास प्राधिकरण की चुप्‍पी के बीच इतनी जानकारी जरूर सामने आई है कि अग्‍निशमन विभाग कोसीकलां के प्रभारी जसराम सिंह ने ''होटल वृंदावन गार्डन'' वृंदावन का 8 सितंबर 2022 को सुरक्षा की दृष्‍टि से निरीक्षण किया था और इस दौरान उन्‍होंने होटल में तमाम खामियां पाईं। 
उन्‍होंने इसी दिन होटल के स्‍वामी/प्रबंधक को एक नोटिस जारी कर उत्तर प्रदेश फायर सर्विस अधिनियम 1944 की धारा 1 व 2 के अंतर्गत जनहित में सभी कमियां 30 दिन के अंदर दूर कराने को कहा था लेकिन होटल स्‍वामी/प्रबंधक के कानों पर जूं नहीं रेंगी, जिसके परिणाम स्‍वरूप दो कर्मचारियों को जान से हाथ धोना पड़ा और तीन अपनी जिंदगी के लिए लड़ रहे हैं। 
अग्‍निशमन विभाग कोसीकलां के प्रभारी द्वारा जारी नोटिस से स्‍पष्‍ट है कि होटल वृंदावन गार्डन में अग्‍निसुरक्षा के नाम पर कुछ नहीं था, बावजूद इसके वो नोटिस देने के अतिरिक्‍त कुछ और कर भी नहीं सकते थे। 
अग्‍निशमन विभाग की मानें तो उसके पास इससे अधिक कोई अधिकार हैं ही नहीं। वो नोटिस-नोटिस खेलने के बाद ज्‍यादा से ज्‍यादा 'कोर्ट' मूव कर सकते हैं किंतु सीधे कोई कार्रवाई नहीं कर सकते।  
सड़क पर कराई जाती है 'पार्किंग' 
मथुरा-वृंदावन रोड पर स्‍वामी रामकृष्‍ण मिशन हॉस्‍पिटल के सामने बने होटल वृंदावन गार्डन द्वारा भी मथुरा जनपद के अन्‍य अनेक होटलों की तरह पार्किंग के लिए सड़क को इस्‍तेमाल किया जाता है जबकि होटल में 5-7 नहीं करीब 25 कमरे हैं और प्रदेश ही नहीं, देश का प्रमुख धार्मिक स्‍थल होने के कारण यहां के सभी कमरे शायद ही कभी खाली रहते हों। 
आश्‍चर्य की बात यह है कि सीएम योगी समेत प्रदेश के अन्‍य बहुत से मंत्री तथा उच्‍च अधिकारियों का वृंदावन आना-जाना अक्‍सर लगा रहता है और उनकी यहां के विकास पर भी निगाहें केंद्रित हैं, बावजूद इसके सरकारी मशीनरी है कि सुधरने का नाम नहीं लेती। 
ऑब्‍लाइज रहते हैं अधिकांश अधिकारी 
होटल, मैरिज होम, गेस्‍ट हाउस, हॉस्‍पिटल, नर्सिंग होम तथा शॉपिंग कॉम्प्लेक्स आदि के अवैध निर्माण का एक बड़ा कारण अधिकांश अधिकारियों का इनके मालिकों से ऑब्‍लाइज रहना भी बताया जाता है। कहीं ये ऑब्लिगेशन 'कैश' के रूप में होता है तो कहीं 'काइंड' के रूप में। 
कुछ होटल और गेस्‍ट हाउस मालिकों ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उन्‍हें कई कमरे तो हमेशा अधिकारियों की 'बेगार' के लिए खाली रखने पड़ते हैं जिससे अधिकारी खुद या उनके मेहमान जब चाहें आकर रुक सकें। ऐसा न करने पर प्रताड़ित किया जाता है। 
इसी प्रकार हॉस्‍पिटल और नर्सिंग होम संचालकों का भी अधिकारी भरपूर 'दुर-उपयोग' करते देखे जा सकते हैं। राष्‍ट्रीय राजमार्ग पर बने हॉस्‍पिटल और नर्सिंग होम इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं जहां खुलेआम सर्विस रोड को घेरकर 'पार्किंग' बना दिया गया है और यहां तक कि अपने स्‍तर पर उसका निजी ठेका भी उठा दिया गया है लेकिन न कोई बोलने वाला है और न सुनने वाला। यही हाल शहर के शॉपिंग कॉम्प्लेक्स का है। 
बहरहाल, कृष्‍ण की नगरी कितनी ही महत्‍वपूर्ण क्यों न हो लेकिन यह प्रदेश की राजधानी लखनऊ नहीं है इसलिए यहां के होटल में अग्‍निकांड के जिम्‍मेदार लोगों पर तत्‍काल प्रभाव से किसी एक्शन की उम्‍मीद करना बेमानी है। होटल के दो कर्मचारी मर चुके हैं तथा तीन जिंदगी के लिए जूझ रहे हैं किंतु सरकारी सिस्‍टम कुछ दिनों बाद इसे भी ठीक वैसे ही भूल जाएगा जैसे लखनऊ के होटल लेवाना के हादसे को भूल गया। कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि सिस्‍टम की लगाई इस आग में कभी लखनऊ झुलसेगा तो कभी मथुरा, किंतु सिस्‍टम शायद ही कभी झुलस पाएगा। उसके हाथ में हमेशा तुरुप का पत्ता रहेगा क्योंकि जांच भी उसी को करनी है और रिपोर्ट भी उसी को सौंपनी है। 
होटल वृंदावन गार्डन में आग कैसे लगी, अभी तो यही पता नहीं लगा। फिर यह पता कैसे लगेगा कि इस 'आग' की भेंट चढ़े लोगों की मौत का जिम्‍मेदार कौन-कौन है। लखनऊ के लेवाना होटल की आग ठंडी पड़ चुकी है। वृंदावन गार्डन की भी आग जल्‍द ठंडी पड़ जाएगी, लेकिन सिस्‍टम का खेल बदस्‍तूर जारी रहेगा। 
-Legend News 

गुरुवार, 20 अक्टूबर 2022

खेल वाइफ स्वैपिंग का: दिल्‍ली का "कचरा" यमुना को और "कल्चर" मथुरा को कर रहा है प्रदूषित


 हाल ही में मध्‍यप्रदेश की एक 21 वर्षीय विवाहिता युवती ने अपने पति पर आरोप लगाए हैं कि वह उसे "वाइफ स्वैपिंग" (पत्नी की अदला-बदली) वाली पार्टी में शामिल होने के लिए मजबूर करता है। पीड़िता का पति चाहता है कि वह पार्टी में शामिल होकर गैर मर्दों के साथ शरीरिक संबंध बनाए। 

मप्र की राजधानी भोपाल के कोहेफिजा इलाके की रहने वाली इस 21 वर्षीय युवती का निकाह मोहम्मद अम्मार के साथ हुआ था। मोहम्मद अम्मार बीकानेर के एक पांच सितारा होटल में मैनेजर है। निकाह के बाद से वह बीकानेर में अपने पति के साथ रह रही थी। 
पीड़िता का आरोप है कि निकाह के कुछ दिन बाद से ही उसका पति उस पर वाइफ स्वैपिंग पार्टी में शामिल होने और उसका हिस्सा बनने के लिए दबाव डालने लगा। बीमारी का बहाना बनाकर वह बमुश्‍किल अपने मायके भोपाल पहुंच सकी। 
पुलिस ने धारा 377, 498 A, 323, 506, 34, 3/4 के तहत उसके पति पर FIR दर्ज कर उसकी गिरफ्तारी के प्रयास शुरू कर दिए हैं। 
मध्‍यप्रदेश न तो अकेला ऐसा राज्य है और न बीकानेर एकमात्र ऐसी जगह जहां वाइफ स्‍वैपिंग का यह घिनौना खेल खेला जा रहा है। सच तो यह है कि मेट्रो सिटीज दिल्‍ली, मुंबई, कलकत्‍ता, चेन्‍नई सहित देश के तमाम दूसरे महानगरों सहित अनेक छोटे शहर भी अब इस खेल की गिरफ्त में आ चुके हैं। 
यूं तो अन्य शहरों के मुकाबले तरक्‍की की दौड़ में विश्‍व का नामचीन धार्मिक शहर मथुरा भी बेशक काफी पिछड़ा हुआ प्रतीत होता हो, बेशक यहां अभी तरक्‍की को परिभाषित करने वाली अनेक सुविधाओं का अभाव हो, बेशक देश-दुनिया के साथ तरक्‍की के लिए कदम ताल मिलाने में इसे लंबा समय लगे, लेकिन वाइफ स्‍वैपिंग के मामले में कृष्‍ण की यह नगरी अन्‍य दूसरे महानगरों एवं नगरों से किसी तरह पीछे नहीं है। सच तो यह है कि वह बहुत से नगरों एवं महानगरों से इस क्षेत्र में काफी आगे है।
जी हां! चाहे आपको आसानी से यकीन आये या ना आए, चाहे आपका मुंह आश्‍चर्य से एकबार को खुले का खुला रह जाए लेकिन सच्‍चाई यही है कि विश्‍व की धार्मिक, सांस्‍कृतिक, आध्‍यात्‍मिक एवं साहित्‍यिक विरासत को दरकिनार कर यह शहर उस दिशा में करवट ले चुका है जिसके बारे में सोचना तक आम आदमी के लिए किसी महापाप से कम नहीं है।
"वाइफ स्‍वैपिंग" या "कपल स्‍वैपिंग" कहलाने वाले इस खेल में अधिकांशत: पैसे वाले परिवारों से संबंध रखने वाले लोग कम से कम छ: कपल का एक ग्रुप बनाते हैं और यह ग्रुप फिर वाइफ स्‍वैपिंग करता है। वाइफ स्‍वैपिंग के तहत न्‍यूड एवं सेमी न्‍यूड ग्रुप डांस से लेकर ग्रुप सेक्‍स तक सब-कुछ शामिल होता है।
इसके लिए सबकी सहमति से शहर के किसी बाहरी हिस्‍से में अच्‍छे होटल का हॉल तथा कमरे बुक कराये जाते हैं, जहां ग्रुप के सदस्‍य कपल पूर्व निर्धारित दिन व समय पर अपनी-अपनी गाड़ियों से पहुंचते हैं। इस खेल में शामिल होने के लिए जितना जरूरी है एक अदद कपल का होना, उतना ही जरूरी है एक गाड़ी का होना। खेल की शुरूआत ड्रिंक या ड्रग्‍स से होती है, और उसके बाद जैसे-जैसे सुरूर चढ़ता जाता है, खेल शुरू होने लगता है।
खेल की शुरूआत के लिए ग्रुप के सभी सदस्‍य हॉल की बत्‍तियां बुझाकर एक टेबिल पर अपनी-अपनी गाड़ियों की चाभियां रख देते हैं और फिर अंधेरे में ही ग्रुप के पुरुष सदस्‍य किसी एक गाड़ी की चाभी उठाते हैं। जिसके हाथ में जिसकी गाड़ी की चाभी आ जाती है, वह उस सदस्‍य की बीबी के साथ खेल खेलने को अधिकृत हो जाता है। ठीक इसी प्रकार उसकी बीबी के साथ वह सदस्‍य खेल खेलने का अधिकारी हो जाता है जिसकी चाभी उसके हाथ लगी है।
चाभियों की अदला-बदली के साथ यह सदस्‍य अपने पार्टनर को होटल में ही पहले से बुक्‍ड कमरों में ले जाते हैं और फिर वहां स्‍वछंद सेक्‍स का यह खेल शुरू हो जाता है।
इससे भी आगे इस खेल में कुछ लोग हॉल के अंदर ही एक-दूसरे की पत्‍नियों को लेकर सब-कुछ करने को स्‍वतंत्र होते हैं जबकि कुछ लोग दो-दो और तीन-तीन की संख्‍या में ग्रुप सेक्‍स करते हैं।
जाहिर है कि इस सारे खेल का राजदार और हिस्‍सेदार वह होटल मालिक भी होता है जिसके यहां खेल खेला जाता है। उसे इसके लिए अच्‍छी-खासी रकम मिलती है, वो अलग।
बताया जाता है कि मथुरा के नवधनाढ्यों को इस खेल की लत उस क्‍लब कल्‍चर से लगी है जो कथित तौर पर समाज सेवा के कार्य करते हैं अथवा समाज सेवा करने का दावा करते हैं।
इनके अलावा कुछ लोगों ने पर्सनल क्‍लब या ग्रुप भी बना लिए हैं और उनकी आड़ में विभिन्‍न कार्यक्रमों का आयोजन करते रहते हैं। जिनका असल मकसद उनके बीच से छांटकर ‘वाइफ स्‍वैपिंग’ अथवा ‘कपल स्‍वैपिंग' के लिए एक अलग ग्रुप बनाना होता है।
विश्‍वस्‍त सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार पिछले कुछ समय के अंदर इस धार्मिक शहर के विशेष वर्ग में हुईं आकस्‍मिक युवा संदिग्‍ध मौंतों के पीछे यही खेल रहा है क्‍योंकि इसके आफ्टर इफेक्‍ट अंतत: ऐसे ही परिणाम निकालते हैं।
सूत्रों की मानें तो एक प्रसिद्ध होटल मालिक की शादी-शुदा बहिन इसी खेल में अपनी जान दे चुकी है। उसकी मौत को इसलिए आत्‍महत्‍या प्रचारित किया गया क्‍योंकि उसने अपने मायके में जान दी थी, परंतु बताया जाता है कि इसके पीछे का असली कारण वाइफ स्‍वैपिंग का खेल ही था।
इसके अलावा कुछ समय पहले एक बिल्‍डर के युवा पुत्र की संदिग्‍ध मौत हो या एक अन्‍य  बड़े व्‍यवसाई के अधेड़ उम्र पुत्र की होटल के कमरे में हुई मौत का मामला हो, सबके पीछे यही खेल बताया जाता है।
जिन परिवारों में यह मौतें हुई हैं, वह दबी जुबान से इतना तो स्‍वीकार करते हैं कि अवैध संबंध इन मौतों का कारण बने हैं लेकिन सीधे-सीधे वाइफ स्‍वैपिंग के खेल में संलिप्‍तता स्‍वीकार नहीं करते।
चूंकि इस खेल के परिणाम स्‍वरूप एचआईवी एड्स तथा आज के दौर की दूसरी संक्रामक बीमारियां भी तोहफे में मिलने की पूरी संभावना रहती है इसलिए इसके परिणाम तो किसी न किसी स्‍तर पर जाकर घातक होने ही होते हैं। ऐसी स्‍थिति में पति-पत्‍नी एक-दूसरे को दोषी ठहराने का प्रयास करते हैं और इसके फलस्‍वरूप गृहक्‍लेश बढ़ जाता है। रोज-रोज के गृहक्‍लेश का नतीजा फिर किसी अनहोनी के रूप में सामने आता है।
इस खेल से जुड़े लोगों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार धार्मिक शहर मथुरा में यूं तो इस खेल की शुरूआत हुए कई साल हो चुके हैं, लेकिन पिछले करीब पांच सालों से इसमें काफी तेजी आई है। पांच सालों में मथुरा के अंदर इस खेल के कई ग्रुप बने हैं और इसी कारण सो-कॉल्‍ड सभ्रांत परिवारों में कई जवान संदिग्‍ध मौतें भी हुई हैं।
आज तक ऐसी किसी मौत का मामला पुलिस के पास न पहुंचने की वजह से पुलिस ने उसमें कोई रुचि नहीं ली क्‍योंकि यूं भी मामला पैसे वालों से जुड़ा होता है।
यही कारण है वाइफ स्‍वैपिंग का यह खेल धर्म की इस नगरी में न केवल बदस्‍तूर जारी है बल्‍कि दिन-प्रतिदिन परवान चढ़ रहा है।
एक-दो नहीं, अनेक अपराधों का रास्‍ता बनाने वाला यह खेल यदि इसी प्रकार फलता-फूलता रहा और पुलिस व प्रशासन के बड़े अधिकारियों ने इस ओर अपनी निगाहें केंद्रित न कीं तो आने वाले समय में कृष्‍ण की नगरी के लिए यह ऐसा कलंक साबित होगा जिससे पीछा छुड़ाना मुश्‍किल हो जायेगा।
मुश्‍किल इसलिए कि मथुरा से दिल्‍ली बहुत दूर नहीं है। दिल्‍ली का कचरा अगर यमुना में बहकर आ रहा है तो दिल्‍ली का कल्‍चर भी सड़क के रास्‍ते मथुरा को प्रदूषित कर ही रहा है।आप अगर इस गलतफहमी में है कि 'बिहारी जी' सहित मथुरा के अन्‍य धार्मिक स्‍थानों पर धर्म के नाम पर तेजी के साथ बढ़ रही अनियंत्रित भीड़ का कारण अचानक उपजा भक्तिभाव है तो इस गलतफहमी को दूर कर लीजिए। 
-लीजेण्‍ड न्‍यूज़ 

बुधवार, 7 सितंबर 2022

बहुत कन्फ्यूजन है भाई: कौन सा भारत जोड़ने निकले हैं राहुल बाबा, अंबानी-अडानी वाला या अपने वाला?


कथित तौर पर पार्टी को तोड़ने के जिम्मेदार कांग्रेस के 'चिर कुंवर' राहुल बाबा अब 'भारत जोड़ने' निकल पड़े हैं। अपने जीवन के करीब 150 बहुमूल्‍य दिन वह भारत जोड़ने में जाया करने वाले हैं। हालांकि उन्‍होंने फिलहाल यह नहीं बताया कि वह किस भारत को जोड़ने पर आमादा हैं। 

राहुल बाबा वर्षों से लोगों को बता रहे हैं कि भारत एक नहीं, दो हैं। एक अमीरों का भारत जिसे वो अडानी-अंबानी का भारत बताते हैं और दूसरा गरीबों का भारत जिसे वो अपना मानकर चलते हैं। जाहिर है कि वो अपने वाले भारत को ही जोड़ने निकले होंगे क्योंकि अंबानी-अडानी वाला भारत मोदी जी का भारत है। उसे वो क्यों जोड़ने लगे। 

बहरहाल, मुंह में चांदी की चम्मच लेकर पैदा हुए अरबपति परिवार के उत्तराधिकारी राहुल बाबा को लगता है कि भारत एक खिलौना है जो उनके हाथ से छीन लिया गया है, और जिन्‍होंने छीना है वो इस खिलौने से खेलने लायक नहीं हैं। वह इसे खंडित कर रहे हैं। 

राहुल की सोच वाला एक और तबका है, और वो भी भारत जोड़ने निकला हुआ है। यह तबका है विपक्ष। इस तबके में शामिल लोगों के अनुसार विपक्ष ही असल भारत है, लिहाजा विपक्ष एकजुट हो गया तो समझो भारत जुड़ गया। लेकिन परेशानी यह है कि इस तबके के लोग सिर्फ 'दल' जोड़ने  की बात कर रहे हैं, 'दिल' जोड़ने की नहीं। उनके दिलों के बीच 'पीएम पद' आड़े आ रहा है।  

जिस प्रकार उच्‍चकोटि के मनुष्‍य जीवन पर्यन्‍त मात्र मोक्ष की कामना में लगे रहते हैं, उसी प्रकार हर नेता की कामना होती है कि येन-केन-प्रकारेण वह एकबार पीएम पद प्राप्‍त कर ले तो 'इहिलोक' के साथ-साथ शायद 'परलोक' भी सुधर जाएगा। 'पूर्व प्रधानमंत्री' के तमगे वाली कुर्सी वहां भी साथ ले जा सकेंगे। 'चित्रगुप्त' फिर जनसामान्य की तरह व्‍यवहार नहीं कर पाएंगे। विशिष्‍टता साथ चिपकी होगी।  

यही कारण है कि विपक्ष के भारत जोड़ो अभियान की सफलता में 'नायकों' की संख्‍या आड़े आ रही है। प्रधानमंत्री का पद एक है किंतु उस पर दावा करने वाले विपक्षी अनेक हैं। 

ओलम का पहला अक्षर होने के नाते 'अरविंद' (केजरीवाल) से शुरू करें तो अखिलेश यादव कहते हैं कि मेरा नाम भी 'अ' से प्रारंभ होता है। केसीआर की मानें तो हिंदी वर्णमाला के व्‍यंजन जहां से शुरू होते हैं वो उनके नाम का पहला अक्षर है। इसलिए वही उचित होगा। ममता बनर्जी कहती हैं कि उनके नाम में पहले आदरणीय आता है, उसके बाद बनर्जी, और फिर अंत में ममता। 'अल्फाबेट' के अनुसार उनका नाम में A के साथ B जुड़ा है इसलिए वही पीएम पद की मौलिक हकदार हैं। उनके सामने न तो 'अरविंद' का 'केजरीवाल' टिकता है और न कल्वाकुंतला चंद्रशेखर राव यानी केसीआर के हिज्‍जे K C R कहीं मुकाबला कर सकते हैं। 

सुशासन बाबू का 'सु' त्‍यागकर शासन पर काबिज रहने वाले नीतीश कुमार कह तो ये रहे हैं कि उनके मन में पीएम पद की कोई अभिलाषा नहीं है किंतु उनकी यह बात कोई मान नहीं रहा। लोग कह रहे हैं कि पलटी मारने में उनका कोई सानी नहीं है, यह वो बार-बार सिद्ध कर चुके हैं इसलिए जो वो कह रहे हैं, उसका 'पलट' अभी से मानकर चलने में ही भलाई है। 

यूं भी राबड़ी पुत्र पहले दिन से माला फेर रहे हैं कि 'चचा नीतेशे बाबू' की नजर दूर की कुर्सी पर अटकी रहे तो वो पास की कुर्सी खिसका लें और देश-दुनिया को बता दें कि 'पलटूराम' के खिताब पर किसी एक का अधिकार नहीं ना है। 

कन्याकुमारी से भारत जोड़ने निकले राहुल बाबा का दावा है कि पीएम पद के एकमात्र स्‍वाभाविक एवं योग्य प्रत्‍याशी सिर्फ और सिर्फ वही हैं। नेहरू से चलकर गांधी तक के सरनेम देखेंगे तो सबकुछ साफ हो जाएगा। वाड्रा को बाद में देख लीजिएगा। 

नेहरू-गांधी ने 3 पीएम देश को दिए हैं। राहुल बाबा पहले भी कई बार पूछ चुके हैं कि मेरे पास तीन-तीन पीएम की विरासत है, तुम्‍हारे पास क्या है....हैं ?     

जो भी हो... कुल मिलाकर पीएम की कुर्सी को खंड-खंड करने में व्‍यस्‍त भारत को अखंड कैसे करेंगे, इसका तो पता नहीं किंतु इतना जरूर पता है कि भारत हो या पीएम की कुर्सी, उसका विभाजन जिन्‍होंने किया है वही अब उसे जोड़ने निकले हैं। 

यहां 1947 वाले 'विभाजन' की बात नहीं की जा रही, अमीर-गरीब वाले भारत की बात की जा रही है। वैसे कोई कुछ भी समझने को स्‍वतंत्र है। परतंत्र हैं तो बस हम और आप जैसे लोग जिन्‍हें यही नहीं पता कि भारत को तोड़ने और जोड़ने की परिभाषा अलग-अलग क्यों है, और हर दिन लोकतंत्र की हत्या होने के बावजूद वह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र कैसे बना हुआ है। 

-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

 

मंगलवार, 23 अगस्त 2022

अन्ना के चेलों ने बहुत जल्द पूरा कर लिया "राजनीति" से "शराबनीति" तक का सफर


 बाबूराव हजारे यानी अन्ना हजारे। ये वो शख्सियत है जिसने कई दशक पहले शराब निषेध अभियान की शुरूआत महाराष्‍ट्र के रालेगण सिद्धि से की थी। हजारे और उनके युवा समूह ने सुधार की प्रक्रिया जारी रखने के लिए शराब के मुद्दे को उठाने का फैसला किया। गांव के मंदिर में आयोजित एक बैठक के तहत ग्रामीणों ने शराब के ठेके बंद करने और शराब पर प्रतिबंध लगाने का संकल्प लिया। चूंकि ये संकल्प मंदिर में किए गए थे इसलिए वे एक तरह से धार्मिक प्रतिबद्धता बन गए। तीस से अधिक शराब बनाने वाली इकाइयों ने स्वेच्छा से अपने प्रतिष्ठान बंद कर दिए। जो लोग सामाजिक दबाव के आगे नहीं झुके उन्हें अपने व्यवसाय बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि हजारे के युवा समूह ने उनके परिसर को तोड़ दिया। 

बताते हैं कि एक बार अन्‍ना के युवा समूह ने 3 शराबी ग्रामीणों को खंभों से बांध दिया और फिर हजारे ने खुद सेना की अपनी बेल्ट से उन्‍हें पीटा। उन्होंने इस सजा को यह कहते हुए उचित भी ठहराया कि "एक माँ अपने बीमार बच्चे को इसलिए कड़वी दवाएँ पिलाती है क्योंकि उसे पता होता है कि वह दवा उसके बच्चे को ठीक कर सकती है। हो सकता है कि बच्चे को दवा पसंद न आए, लेकिन माँ ऐसा इसलिए करती है क्योंकि वह बच्चे की परवाह करती है। शराबियों को दंडित किया गया ताकि उनके परिवारों को नष्ट होने से बचाया जा सके।"  
अन्‍ना ने महाराष्ट्र सरकार से एक कानून पारित करने की अपील की, जिसके तहत 25 फीसदी महिलाओं की मांग पर गांव में शराबबंदी लागू कर दी जाए। 2009 में राज्य सरकार ने इसे दर्शाने के लिए बॉम्बे प्रोहिबिशन एक्ट 1949 में संशोधन किया। 
"राजनीति" से "शराबनीति" पहुंचे अन्‍ना के चेले
एक दशक पूर्व 2011 में अन्ना के ही आंदोलन से उपजे उनके चेले आज 'हर घर तक' पहुंच बनाने वाली अपनी "शराबनीति" को न सिर्फ जायज ठहरा रहे हैं बल्‍कि उसके लिए किए गए सैकड़ों करोड़ रुपए के घोटाले को राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता से जोड़ रहे हैं। 
भ्रष्‍टाचार के खिलाफ खड़े किए गए एक जनआंदोलन की कोख से पैदा हुई आम आदमी पार्टी के नेता अब कहते हैं- वह चूंकि "कट्टर ईमानदार" हैं इसलिए जब तक उनके ऊपर लगे भ्रष्‍टाचार के आरोप साबित न हो जाएं, तब तक कार्रवाई किया जाना राजनीतिक प्रतिशोध है। 
वो इस शब्‍द को गढ़ने से पहले इतना भी विचार नहीं करते कि 'कट्टरवाद' किसी किस्‍म का हो, अच्‍छा नहीं माना जाता। पूरा विश्‍व आज किसी न किसी किस्‍म के 'कट्टरवाद' का शिकार है। फिर वह कट्टरवादिता धर्म से जुड़ी हो या समाज से। कट्टरवादिता अपने आप में मिलावटी तथा दिखावटी होने का संदेश देती है। कोई व्‍यक्‍ति ईमानदार है तो उसका ईमानदार होना ही काफी है, उसके लिए 'कट्टर' नहीं होना पड़ता। आंशिक भ्रष्‍ट या कट्टर ईमानदार जैसे शब्‍द खुद एक धोखा हैं। 
मजे की बात यह है कि कल तक स्‍वयं को 'आम आदमी' मानने वाले सड़क से सत्ता तक पहुंचे ये लोग अब अघोषित रूप से यह बताना चाहते हैं कि वो कानून से ऊपर हैं और इसलिए उनके साथ कानून भी विशिष्‍ट व्‍यवहार करे। 
यही नहीं, इनकी मानें तो इन्‍हें लेकर होने वाली हर कार्रवाई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सीधा हाथ होता है। मोदी इनसे इतने डरे हुए हैं कि इन्‍हें नष्‍ट करना चाहते हैं। इनके दावे पर यकीन किया जाए तो इनका कद इतना बढ़ चुका है जिससे प्रधानमंत्री परेशान हैं और वो दिन-रात इनका ही स्‍मरण करते हैं। 
आश्‍चर्य भी होता है और हंसी भी आती है जब ये खेत की बात को खलिहान तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। शराब घोटाले को लेकर सीबीआई ने छापामारी शुरू की तो कहा जाने लगा कि हमारी शिक्षा नीति समूचे विश्‍व में सराही जा रही है इसलिए ये छापामारी की गई है। देखिए न्यूयॉर्क टाइम्‍स के फ्रंट पेज पर मनीष सिसोदिया की शिक्षा नीति को जगह मिली है इसलिए मोदी सरकार डर गई है। मनीष सिसोदिया की शिक्षा नीति विश्‍व में सर्वोत्तम है। 
भ्रष्‍टाचार की बात पर ये दूसरे दलों का भ्रष्‍टाचार गिनाने लगते हैं। बेशक दूध का धुला कोई नहीं लेकिन जिस तरह नमक से नमक नहीं खाया जा सकता, उसी तरह दूसरे को भ्रष्‍ट बताकर अपना भ्रष्‍टाचार उचित नहीं ठहराया जा सकता। 
जिस पार्टी को अभी राष्‍ट्रीय पार्टी तक का दर्जा हासिल नहीं है, उसके कर्ता-धर्ता ढिंढोरा पीट रहे हैं कि 2024 में प्रधानमंत्री पद के लिए अरविंद केजरीवाल सीधे नरेंद्र मोदी मुकाबले में आ खड़े हुए हैं इसलिए मोदी सरकार सीबीआई के छापे पड़वा रही है। 
अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और राघव चड्ढा जैसे आम आदमी पार्टी के नेता संभवत: यह मान बैठे हैं कि न्यूयॉर्क टाइम्‍स में खबरें छपवाकर वह एक ओर जहां विपक्ष की ओर से प्रधानमंत्री पद की उम्‍मीवारी हासिल कर लेंगे, वहीं दूसरी ओर केंद्र की सत्ता उतनी ही आसानी से प्राप्‍त कर पाएंगे जितनी कि पंजाब की प्राप्‍त कर ली थी। 
राजनीति में आए हैं तो सत्ता के ख्‍वाब देखने में कोई बुराई नहीं है लेकिन सूरज की ओर ऊपर मुंह करके थूकने से सूरज तक नहीं पहुंचा जा सकता। वो थूक खुद के थोबड़े पर ही आकर गिरता है, यह सर्वविदित है। चेहरे पर कालिख लगी हो तो शीशा साफ करने से काम नहीं चलता।
राजनीति में कोई व्‍यक्‍ति या कोई दल अजेय नहीं होता। उत्‍थान और अवसान एक सतत प्रक्रिया है और उससे हर एक को गुजरना होता है, किंतु आम आदमी पार्टी के नेताओं की प्रॉब्‍लम यह है कि वो कुएं को तालाब नहीं, समुद्र समझ बैठे हैं। 
दिल्‍ली और पंजाब जीतकर वो समझ रहे हैं कि वो देश ही नहीं, दुनिया के ऐसे नायाब हीरे हैं जिनकी चमक ने सबको चौंधिया दिया है। रसोली अपनी आंखों में हैं और दोष दूसरे में ढूंढ रहे हैं। 
तमाम बुध्‍दिजीवी समय-समय पर ये सलाह देते रहे हैं कि यदि किसी को जरूरत से ज्‍यादा अभिमान हो जाए तो उसे अपनी जड़ों की ओर देख लेना चाहिए। इससे भ्रम दूर होने में मदद मिल सकती है। 
बेहतर होगा कि अन्‍ना के आंदोलन की उपज आम आदमी पार्टी के नेता एकबार फिर अन्‍ना की शरण में जाकर बैठें और उनसे पूछें कि क्या वो हर किस्‍म के आरोप-प्रत्‍यारोपों से परे हैं, क्या वो भ्रष्‍टाचार प्रूफ हैं, क्या वो कानून से ऊपर हैं। उम्‍मीद ही नहीं पूरा विश्‍वास है कि अन्‍ना उनके इस मुगालते को दूर कर देंगे। 
हो सकता है कि अन्‍ना अपने मंदिर के किसी कोने में ले जाकर इन्‍हें उनकी खोई हुई वो सूरत और सीरत भी दिखा दें जिसे सामने रखकर इन्‍होंने अन्‍ना को धोखा दिया और कभी राजनीति में न आने का वायदा करके राजनीति को ही पेशा बना लिया। 
रही बात दिल्‍ली की तो वो अभी बहुत दूर है। दिल्‍ली के अधीन होने में और दिल्ली हासिल करने में बहुत फर्क होता है। अलबत्ता 'तिहाड़' बहुत नजदीक नजर आ रही है। इसे जितनी जल्‍दी समझ लें, उतना अच्‍छा है। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बुधवार, 20 जुलाई 2022

योगी जी... देखिए तो कि भ्रष्‍टाचार पर आपकी जीरो टॉलरेंस नीति का मथुरा पुलिस ने कैसा मजाक बनाया है?

ऐसा लगता है कि भ्रष्‍टाचार के मामले में योगी सरकार द्वारा अपनाई जा रही 'जीरो टॉलरेंस' की नीति को तमाम सरकारी विभागों की तरह बहुत से पुलिसकर्मी भी अपने लिए एक 'स्‍वर्णिम अवसर' मान कर चल रहे हैं, और इसलिए भ्रष्‍टाचार पर सख्‍ती के संदेश का भरपूर लाभ उठाने में लगे हैं। 

पुलिस में ऐसे ही एक सुनियोजित भ्रष्‍टाचार का मामला तब सामने आया जब साइबर क्राइम करने वाले पूरे गिरोह के डेढ़ दर्जन से अधिक सदस्‍यों को लाखों रुपए लेकर थाने से ही छोड़ दिया गया। 
हालांकि इसकी भनक लगते ही एक ओर जहां एसएसपी मथुरा अभिषेक यादव ने विभागीय जांच के आदेश देते हुए संबंधित थाना प्रभारी इंस्‍पेक्‍टर अजय कौशल और चौकी प्रभारी सतोहा योगेश नागर को निलंबित कर दिया वहीं दूसरी ओर आईजी आगरा जोन नचिकेता झा ने भी जिले में तैनात आईपीएस अधिकारी (एएसपी) संदीप मीणा को जांच सौंपी है, लेकिन यहां सवाल यह पैदा होता है कि किसी इतने गंभीर मामले में क्या केवल विभागीय जांच कराया जाना पर्याप्‍त है? 
पूरे पुलिस विभाग को शर्मिंदा करने और योगी सरकार के आदेश-निर्देशों को बेखौफ होकर ताक पर रखने के इस मामले में प्रथम दृष्‍ट्या संलिप्‍त दिखाई दे रहे पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की जानी चाहिए? 
बताया जाता है भ्रष्‍टाचार के इस पूरे नायाब खेल की सूचना लखनऊ में बैठे बड़े अधिकारियों को भी लग चुकी है, और वो आगरा तथा मथुरा के बड़े अधिकारियों की कार्रवाई पर पूरी नजर बनाए हुए हैं। 
क्‍या है पूरा मामला 
घटनाक्रम के अनुसार मथुरा जनपद के मलाईदार थानों में शुमार हाईवे थाना पुलिस ने विगत 11 जुलाई को साइबर क्राइम करने वाले गिरोह के 19 सदस्‍यों को मुखबिर की सूचना पर एकसाथ धर-दबोचा। 
पुलिस के लिए सिरदर्द बना हुआ है साइबर क्राइम 
यहां यह जान लेना जरूरी है कि सोशल मीडिया के इस दौर में साइबर क्राइम पुलिस के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है और इसीलिए हर जनपद में पुलिस का एक साइबर सेल काम भी कर रहा है। 
ये बात अलग है कि अपराधियों के हमेशा पुलिस से दो कदम आगे चलने तथा पुलिस के पास उनकी तुलना में संसाधनों के अभाव की वजह से पुलिस को साइबर अपराधियों से निपटने में दिक्‍कतें पेश आती हैं। 
यही कारण है कि हर दिन कोई न कोई व्‍यक्‍ति कहीं न कहीं साइबर अपराधियों का शिकार होता है। 
पैसे लेकर छोड़ दिए सभी 19 अपराधी 
पुलिस भी इस बात से भली-भांति परिचित है और उच्‍च अधिकारी इनकी धर-पकड़ के लिए परेशान भी रहते हैं, बावजूद इसके मथुरा के थाना हाईवे की पुलिस ने साइबर अपराधियों के इस पूरे गिरोह को लाखों रुपए लेकर छोड़ दिया और अपने अधिकारियों को इसकी भनक तक नहीं लगने दी। 
विभागीय सूत्र बताते हैं कि हाईवे थाना पुलिस ने गिरोह के सभी 19 सदस्‍यों को छोड़ने की एवज में दलालों के माध्‍यम से प्रति सदस्‍य करीब डेढ़ लाख रुपया वसूला। दलालों को क्या मिला, इसकी जानकारी होना बाकी है। 
थाना पुलिस के इस योजनाबद्ध भ्रष्‍टाचार का अंदाज लगाने के लिए यह जान लेना काफी है कि थाने में कुछ देर रखने के बाद इन सभी 19 अपराधियों को थाना परिसर में पीछे की ओर बने कमरों में रखा गया, जिससे मामला चुपचाप निपटाने में आसानी हो।
छोड़े गए अपराधियों के नाम
रविकांत पुत्र श्रीचंद निवासी गांव नवादा थाना हाईवे, जितेन्‍द्र पुत्र राजकुमार निवासी अलीगढ़, गिर्राज पुत्र रवीन्द्र निवासी एटा, विनोद पुत्र नवी निवासी असम, सैकुल पुत्र रेशम, साहिल पुत्र अब्‍दुल, तस्‍लीम पुत्र नसरू, रॉबिन पुत्र रेशम, हमीद पुत्र आशू, मकसूद पुत्र कमरुद्दीन, साहिल पुत्र आयन, भाकिल पुत्र मोहन्‍दा, सुहैल पुत्र याकतअली, साबिर पुत्र अनवर, ताहिर पुत्र जाकिर, सकलम पुत्र मोहन्‍दा, इरशाद पुत्र महमूदा और राशिद।     
सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार जांच अधिकारी आईपीएस संदीप मीणा ने इस मामले में एक बड़ी उपलब्‍धि हासिल करते हुए थाने के सीसीटीवी कैमरे की फुटेज हासिल कर ली है और उसमें ये अपराधी आते व जाते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसके अलावा जांच अधिकारी को एक साक्ष्‍य सतोहा चौकी के रजिस्‍टर से प्राप्‍त हुआ है। 
दरअसल, चौकी प्रभारी सतोहा ने किसी आंशका के चलते इन सभी 19 आरोपियों का नाम चौकी के रजिस्‍टर में दर्ज कर लिया था क्‍योंकि अपराधियों की धरपकड़ में वह भी शामिल थे। संभवत: इसीलिए चौकी प्रभारी सतोहा योगेश नागर अब खुद को पूरी तरह निर्दोष बता रहे हैं और कह रहे हैं कि मैं अधिकारियों के सामने पूरा सच लेकर आऊंगा। 
ऐसे में एक सवाल यह और उठता है कि बिना ठोस कार्रवाई हुए और लाखों रुपए हड़प कर एकसाथ 19 साइबर अपराधियों को छोड़ देने जैसे संगीन मामले में एफआईआर दर्ज किए बिना क्या पूरा सच सामने आ पाएगा। या मथुरा के ही डॉ. निर्विकल्‍प अपहरण काण्‍ड की तरह ये भी फाइलों में दब कर रह जाएगा।
क्या है डॉ. निर्विकल्‍प का अपहरण काण्‍ड 
10 दिसंबर 2019 को रात करीब 8 बजे हाईवे थाना क्षेत्र में ही गोवर्धन चौराहे के फ्लाई ओवर पर मथुरा के मशहूर ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. निर्विकल्‍प का अपहरण कर उनसे वसूली गई 52 लाख रुपयों की फिरौती को इलाका पुलिस हड़प गई और बदमाश छोड़ दिए गए। 
जब इस मामले में शोर-शराबा हुआ तो पूरे दो महीने बाद 11 फरवरी 2020 की रात 10 बजकर 53 मिनट पर हाईवे थाना पुलिस ने अपनी ओर से IPC की धारा 364 A के तहत एक एफआईआर दर्ज की। 
हाईवे थाने के तत्‍कालीन प्रभारी इंस्‍पेक्‍टर जगदंबा सिंह की ओर से दर्ज कराई गई इस एफआईआर में सनी मलिक पुत्र देवेन्‍द्र मलिक निवासी न्‍यू सैनिक विहार कॉलोनी थाना कंकरखेड़ा मेरठ, महेश पुत्र रघुनाथ निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा, अनूप पुत्र जगदीश निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा तथा नीतेश उर्फ रीगल पुत्र नामालूम निवासी भोपाल मध्‍यप्रदेश (हाल निवासी दिल्‍ली एनसीआर) को नामजद किया गया।
इस पूरे प्रकरण का एक दिलचस्‍प पहलू यह भी रहा कि डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण की अपनी ओर से FIR दर्ज कराने वाले इंस्‍पेक्‍टर जगदंबा सिंह को उसी दिन तत्‍काल प्रभाव से तत्‍कालीन एसएसपी शलभ माथुर ने निलंबित कर दिया। जिन्‍हें बाद में इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय के आदेश पर बहाल भी कर दिया गया। 
नामजद अपराधियों को पुलिस ने पकड़ा भी, लेकिन उन 52 लाख रुपए का कुछ पता नहीं लगा जिन्हें अपराधियों को फिरौती के रूप में देने की पुष्‍टि खुद डॉ निर्विकल्‍प कर चुके थे। 
बहरहाल, अब देखना यह होगा कि लाखों रुपए लेकर साइबर क्राइम के गिरोह से जुड़े डेढ़ दर्जन अपराधियों को छोड़ने का यह संगीन मामला भी डॉ. निर्विकल्‍प अपहरण काण्‍ड की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा या फिर ईमानदार पुलिस अफसरों के रहते किसी ऐसे अंजाम तक पहुंचेगा, जिसके बाद कोई थाना या चौकी प्रभारी इतना बड़ा दुस्‍साहर न कर सके और योगी सरकार की भ्रष्‍टाचार के मामले में अपनाई गई जीरो टॉलरेंस की नीति का इस तरह मजाक न उड़ा पाए। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी   
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