रविवार, 22 सितंबर 2024

योगी जी, एकबार देखिये तो सही कि भूमाफिया और अधिकारियों का गिरोह धार्मिक नगरी में आपके आदेश-निर्देशों की कैसे धज्जियां उड़ा रहा है...


 अभी दो दिन पहले फायरब्रांड मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने गोरखपुर प्रवास के दौरान अधिकारियों को निर्देशित किया था कि यूपी में भूमाफिया और दबंग बख्‍शे न जाएं। उनके खिलाफ कठोर से कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। 

गोरखनाथ मंदिर में जनसमस्‍याओं को सुनते हुए सीएम योगी ने अधिकारियों को दो टूक यह हिदायत दी कि भूमाफियाओं के खिलाफ सख्‍त कार्रवाई करना सरकार का संकल्प है इसलिए पेशेवर भूमाफियाओं को चिन्हित करके ऐसी कार्रवाई करें कि वो एक नजीर बन जाए। 
उधर योगी अपने मठ से प्रदेश की ब्‍यूरोक्रेसी को अपनी सरकार का संकल्प एवं अधिकारियों को उनका कर्तव्य याद दिला रहे थे और इधर गोरखुपर से करीब पौने सात सौ किलोमीटर दूर कृष्‍ण की क्रीड़ा स्‍थली वृंदावन में भूमाफिया एवं ब्‍यूरोक्रेसी का संगठित गिरोह उनके आदेश-निर्देशों की खुलेआम धज्जियां उड़ा रहा था। 
इस गिरोह ने सुनियोजित तरीके से वृंदावन की बेशकीमती जमीन पर खड़े लगभग 300 हरे पेड़ों को रातों-रात काट डाला और इसके मार्ग में बाधक विकास प्राधिकरण की रेलिंग भी उखाड़ दी। 
हालांकि इन दोनों ही मामलों में एक ओर वन विभाग तो दूसरी ओर मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने अपनी-अपनी तरफ से शिकायत दर्ज कराने की औपचारिकता पूरी कर दी है किंतु इसमें भी यह ध्‍यान रखा गया है उनके कॉकस का कोई साथी न फंसने पाए। 
बहरहाल, ये तो मात्र वो सतही जानकारी है जिसे स्‍थानीय मीडिया सामने लाने पर मजबूर हो गया अन्यथा सच्‍चाई इससे कहीं बहुत अधिक कड़वी है। 
जनसामान्य के होश उड़ा देने वाली है सच्‍चाई 
दरअसल, जनसामान्य के होश उड़ा देने वाली इस सच्‍ची कहानी का प्रारंभ वहां से होता है जहां से एक बड़े भूमाफिया की नजर इस बेशकीमती भूखंड पर पड़ती है। सैकड़ों एकड़ का यह भूखंड राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्ली से मथुरा और आगरा को जोड़ने वाले नेशनल हाईवे के किनारे वृंदावन में छटीकरा रोड पर स्‍थित है। 
डालमिया फॉर्म अथवा डालमिया बगीचे के नाम से मशहूर यह भूखंड चूंकि अपनी लोकेशन और वृंदावन जैसे पावन धाम में होने के कारण बहुत कीमती है इसलिए जिस भूमाफिया की नजर सबसे पहले इस पर पड़ी, उसने अपने दूसरे साथियों से इसका जिक्र किया। 
बताया जाता है कि पूरी तरह मन बना लेने तथा पर्याप्‍त पैसों का इंतजाम करने के बाद इन माफियाओं ने डालमिया परिवार से संपर्क साधा और करीब 300 करोड़ रुपए में समूचे भूखंड का सौदा कर डालमिया परिवार को टोकन के रूप में अच्‍छी-खासी रकम भी दे दी। 
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार वृंदावन की सर्वाधिक प्राइम लोकेशन पर स्‍थित डालमिया के बगीचे का सौदा तय हो जाने की भनक लगते ही दूसरे माफिया भी सक्रिय हो गए और उन्‍होंने इसमें अपनी घुसपैठ बनाने के प्रयास शुरू कर दिए। 
भूमाफियाओं से ही जुड़े लोगों की मानें तो अंतत: लगभग आठ लोग इस सौदे का हिस्‍सा बनकर डालमिया के बगीचे पर एक आलीशान रियल एस्‍टेट प्रोजेक्ट खड़ा करने के लिए सहमत हो गए। 
इसके लिए सबसे पहले बाकी लोगों से उनके हिस्‍से की रकम एकत्र कर डालमिया परिवार को सौंपी गई जिससे बगीचे पर आधिपत्य स्थापित किया जा सके। और हुआ भी ऐसा ही। 
अब बात शुरू हुई ब्‍यूरोक्रेट्स से सेटिंग और वृंदावन मानइर को कब्जाने की
बगीचे पर काबिज होने के बाद स्‍थानीय प्रशासन की मदद जरूरी थी इसलिए उस पर फोकस किया गया। बहुत कम लोगों की जानकारी में है  कि डालमिया फॉर्म से सटी हुई एक वृंदावन माइनर हुआ करती थी। एक अनुमान के अनुसार 20 फुट चौड़ी इस माइनर को माफिया ने सर्वप्रथम समाप्‍त किया। 
आज की तारीख में माइनर की जगह बमुश्‍किल दो फुट की पट्टी देखी जा सकती है। जमीन का कारोबार करने वाले और स्‍थानीय लोग समझ सकते हैं कि वृंदावन माइनर पर कब्जा कर लेने के क्या मायने हैं और उससे किसी प्रोजेक्ट की कीमत में कितना इजाफा हो सकता है। 
सफेदपोश भूमाफियाओं ने इसकी आड़ में जुटाए सैकड़ों करोड़ रुपए
इतना सब-कुछ कर लेने के बाद असली खेल शुरू हुआ, यानी डालमिया फॉर्म पर प्रोजेक्‍ट खड़ा करने की रूपरेखा तैयार की गई जिसके लिए प्रशासन अर्थात संबंधित विभागों के उच्‍च अधिकारियों का सहयोग चाहिए था।
मथुरा जनपद ही नहीं, इसके बाहर भी लोग जानते हैं कि डालमिया के बगीचे को रियल एस्‍टेट प्रोजेक्ट के तौर पर डेवलप करने की कोशिश में लगे सफेदपोश भूमाफिया कोई मामूली आदमी नहीं हैं। इनमें से सबकी अपनी विशिष्‍ट पहचान तो है ही, साथ ही सबका अपना बड़ा रसूख है। 
कोई सत्ता के शीर्ष तक पहुंच रखने का दावा करता है तो कोई संघ में अपनी तगड़ी पैठ बताता है। इसमें शाायद ही किसी को शक हो कि इस रियल एस्‍टेट प्रोजेक्ट में शामिल दूसरे कथित उद्योगपति एवं व्‍यापारी, ब्यूरोक्रेसी के अच्‍छे लाइजनर हैं और सचिवालय तक से काम कराकर लाने की क्षमता रखते हैं। कुछ तो न्‍यायपालिका तक में दखल रखने का दम भरते हैं। 
मथुरा के एक चर्चित हत्याकांड से भी जुड़ती है कड़ी 
बताते हैं कि पिछले साल मथुरा की एक पॉश कॉलोनी में हुए चर्चित हत्याकांड की कड़ियां भी कहीं न कहीं इस भूखंड के सौदे से जुड़ती हैं, बस जरूरत है तो उसकी तह तक पहुंचने की जो शायद ही संभव हो क्योंकि उसका बड़े तरीके से पटाक्षेप करके लीपापोती की जा चुकी है। यूं भी न तो अब किसी को पूरा सच जानने में रुचि है और न हिम्मत, चाहे सवाल बीसियों करोड़ का ही हो। यहां तो सैकड़ों करोड़ का खेल चल रहा है, फिर दस-बीस करोड़ की क्या अहमियत। 
वन विभाग के साथ-साथ विकास प्राधिकरण और बिजली विभाग की भूमिका भी संदिग्ध 
अगर गौर करें कि एक रात में 300 से अधिक हरे पेड़ कट कैसे गए तो तमाम सवाल खड़े होते हैं। इन सवालों के दायरे में वन विभाग के अलावा विकास प्राधिकरण तथा बिजली विभाग की भूमिका पूरी तरह संदिग्ध दिखाई देती है। 
सूत्र बताते हैं कि जिस रात डालिमया फॉर्म हाउस के सैकड़ों पेड़ काटे गए, उस रात दर्जनों उपकरणों को विकास प्राधिकरण की रेलिंग तोड़कर अंदर ले जाया गया। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि इस दौरान बिजली भी कई घंटे बाधित रही जिस कारण पेड़ों का कटान आसान हो गया। 
डेवलेपमेंट अथॉरिटी और रियल एस्‍टेट कारोबारियों के बीच का रिश्‍ता कितना प्रगाड़ होता है, यह किसी को बताने की शायद जरूरत भी नहीं है। और मथुरा के वन विभाग में व्‍याप्‍त भ्रष्‍टाचार की गूंज आगरा मंडल ही नहीं, लखनऊ तक सुनी जा सकती है किंतु योगी सरकार इस मामले में आज भी कुछ नहीं कर पा रही। 
शेष रहा बिजली विभाग तो उसके कर्मचारी चंद हरे नोटों में पेड़ों का कटान होने तक बत्ती गुल करने को तैयार हो गए होंगे। उन्‍हें करना ही क्या था, बस किसी बहाने शट डाउन लेना था। 
जब वन विभाग आंखों देखी मक्खी निगल सकता है, मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ''एक पेड़ मां के नाम'' जैसे अभियान को पलीता लगाकर सैकड़ों हरे पेड़ एक रात में कटवा सकता है तो बिजली विभाग क्या कुछ घंटों के लिए बत्ती गुल नहीं कर सकता। 
भ्रष्‍टाचार को लेकर योगी जी चलते रहें जीरो टॉलरेंस की नीति पर, मोदी जी चलाते रहें एक पेड़ मां के नाम का अभियान लेकिन सफेदपोश भूमाफिया और सरकारी अधिकारी एवं कर्मचारियों का गिरोह आज भी अपनी मनमानी से रत्तीभर नहीं चूक रहा। उसके मन में न योगी का कौई खौफ है न मोदी का। 
2027 में 2022 जैसी परफॉरमेंस दोहराने की चिंता योगी जी को हो तो हो, मोदी जी उससे प्रभावित हों तो हों, लेकिन इस माफिया और अफसरों के गठजोड़ को इससे कोई लेना-देना नहीं है। सारे आदेश-निर्देश ताक पर, क्योंकि इतना कुछ हो जाने के बावजूद मथुरा-वृंदावन के लोग यही कहते सुने जा सकते हैं कि इस गठजोड़ का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाएगा। 
अब देखना केवल यह है कि इस बार भी किसी के कानों पर जूं रेंगती है या फिर जनता के मन में घर कर चुकी धारणा फिर सच साबित होती है। 
-Legend News 

रविवार, 1 सितंबर 2024

दुनियाभर के आतंकवादियो, उग्रवादियो, चरमपंथियो और उपद्रवियो... भारत में आपका स्वागत है!


 पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश में जिस दिन से शेख हसीना सरकार का तख्‍तापलट हुआ, उस दिन से भारत में कुछ तत्व अति उत्साहित हैं। उन्‍हें बांग्लादेश की आपदा में अपने लिए एक बड़ा अवसर दिखाई दे रहा है।

वर्ष 2014 में जब पहली बार देश की सत्ता पर नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी की सरकार काबिज हुई, तब उस सत्ता और कुर्सी को खुद के लिए आरक्षित समझने वाले इन तत्वों ने सोचा भी नहीं होगा कि मोदी अपनी सरकार की हैट्रिक लगा देंगे।

2024 के लोकसभा चुनावों में तो इन्‍हें पूरी उम्मीद थी कि मोदी सरकार की वापसी अब नहीं होनी क्योंकि उन्‍होंने यह पूरा चुनाव एक खास नैरेटिव गढ़कर लड़ा था। इस नैरेटिव को सेट करने के लिए इन धुर विरोधी तत्वों ने अपनी-अपनी आइडियोलॉजी तक को ताक पर रख दिया और मात्र एक मकसद बनाया कि किसी भी तरह इस बार मोदी को सत्ता से बाहर करना है।

बहरहाल, अपनी पार्टी के बूते न सही किंतु एनडीए को मिले बहुमत से नरेंद्र मोदी तीसरी बार पीएम की कुर्सी पर काबिज हो गए जिससे इन तत्वों को गहरा आघात लगा। इनकी स्थिति ऐसी हो गई कि न तो इनसे हंसा जा रहा था और न रो पा रहे थे।

बांग्लादेश की आपदा में देखा अवसर

अपने तीसरे कार्यकाल में मोदी सरकार को 2 महीने ही हुए थे कि पड़ोसी मुल्क बांग्लादेश से तख्तापलट होने की खबर मिली। आरक्षण की आड़ में देशी-विदेशी शक्तियों ने शेख हसीना को सरकार से बेदखल कर उन्‍हें देश निकाला दे दिया। हसीना तब से भारत में हैं।

बांग्लादेश में हुए हिंसक तख्‍तापलट को चंद घंटे ही हुए थे कि कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद कहने लगे- ''बांग्लादेश जैसे हिंसक विरोध प्रदर्शन भारत में भी हो सकते हैं। भले ही ऊपरी तौर पर सब-कुछ सामान्य दिखाई दे रहा हो लेकिन यहां भी तख्‍तापलट संभव है।''  

सलमान खुर्शीद की कांग्रेस में क्या हैसियत रही है और क्या है, इससे पूरा राजनीतिक जगत अच्‍छी तरह परिचित है। उन्होंने जो कुछ कहा, यूं ही नहीं कहा। इसके गहरे अर्थ तो हैं ही, साथ ही स्पष्ट संदेश भी है कि सत्ता की खातिर कांग्रेस किस हद तक जा सकती है।

कौन नहीं जानता कि सलमान खुर्शीद से बहुत पहले कांग्रेस के युवराज ने विदेशी धरती से कहा था कि भारत में लोकतंत्र नहीं बचा। अल्पसंख्‍यकों को प्रताड़ित किया जा रहा है और मोदी सरकार मुसलमानों की दुश्‍मन है। यहां तक कि उन्‍होंने पश्‍चिमी देशों से भारत में दखल देने का आह्वान किया था। अभी कुछ दिन पहले उन्‍होंने संसद में कहा कि हिंदू हिंसक है। विवाद होने पर वह कहने लगे कि मेरा मतलब भाजपा और संघ के हिंदुत्व से था। सलमान खुर्शीद या उनके जैसे दूसरे कांग्रेसी नेता राहुल गांधी से ऊर्जा पाकर अनर्गल प्रलाप करते हैं।         

छात्र आंदोलन नहीं था बांग्लादेश का हिंसक घटनाक्रम

शेख हसीना से सत्ता छीनने के बाद पूरे घटनाक्रम और दुनियाभर के मीडिया एवं सीक्रेट एजेंसियों ने साफ कर दिया है कि बांग्‍लादेश में जो कुछ हुआ तथा जो अब भी हो रहा है, उसके पीछे पाकिस्‍तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई से लेकर अमेरिका तक की साजिश है।

बांग्लादेश में नई सरकार बन जाने के बावजूद हिंसा के न रुकने तथा प्रदर्शन जारी रहने से इस बात की पुष्‍टि होती है कि विदेशी ताकतों ने आरक्षण को हथियार बनाकर और छात्र आंदोलन के बहाने सारा खेल खेला, नतीजतन अच्‍छी-खासी तरक्की कर रहा बांग्लादेश आज कई दशकों पीछे जा चुका है। अल्पसंख्‍यकों, विशेषकर हिंदू अल्पसंख्‍यकों पर अमानवीय अत्याचार बताते हैं कि बांग्लादेश कितनी गहरे षड्यंत्र का शिकार हुआ है।   

सूप के साथ छलनी भी बोली

कभी सामान्य पुलिसकर्मी रहे राकेश टिकैत तो कांग्रेस नेताओं के बेहूदे बयानों से भी कई कदम आगे निकल कर कहने लगे कि 2021 में हमसे गलती हो गई। गणतंत्र दिवस के दिन तब किसान अगर लालकिले की बजाय संसद पर चढ़ाई कर देते तो बांग्लादेश जैसा तख्‍तापलट भारत में तभी हो जाता।

किसान नेता का लबादा ओढ़कर देश विरोधी क्रिया-कलापों में बढ़-चढ़कर हिस्‍सा लेने वाले राकेश टिकैत यहीं नहीं रुके। उन्‍होंने तो यहां कह दिया कि अब तैयारी है जनता की। जनता इसके लिए तैयार बैठी है। हम भी तैयार हैं। बस इस सरकार को फिर से कुछ गड़बड़ करने दो। इस बार हम कोई चूक नहीं करेंगे। वह तो हमसे उस दौरान चूक हो गई कि संसद की ओर ट्रैक्टरों को नहीं घुमाया। कोई बात नहीं, आगे भी बहुत से ऐसे मौके आएंगे जब यहां बांग्लादेश जैसे हालात देखे जा सकते हैं। अराजक तत्वों और देश विरोधी ताकतों को इससे ज्यादा साफ संकेत और कोई दे भी क्या सकता है।

हालांकि विवाद होने पर टिकैत ने सफाई पेश करते हुए एक घाघ नेता की तरह रटे-रटाए अंदाज में सारा ठीकरा मीडिया के सिर फोड़ दिया और कहा कि उनके बयान को गलत ढंग से तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया है।

आरक्षण को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर बवाल

एससी-एसटी आरक्षण का लाभ लगातार क्रीमी लेयर को मिलते रहने पर टिप्‍पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पिछले दिनों अपना एक विचार इस मकसद से सामने रखा जिससे कि हाशिए पर खड़े उसी वर्ग के दूसरे लोग उससे लाभान्वित हो सकें किंतु उसे भी समूचे विपक्ष ने एक ओर जहां सुप्रीम कोर्ट का फैसला प्रचारित किया वहीं दूसरी ओर यह दुष्‍प्रचार भी किया कि क्रीमी लेयर की आड़ लेकर मोदी सरकार आरक्षण को समाप्‍त करना चाहती है।

विपक्ष के इस दुष्‍प्रचार का नतीजा एक दिवसीय भारत बंद के रूप में सामने आया। वो भी तब जबकि केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के तत्काल बाद यह साफ कर दिया कि आरक्षण की पुरानी व्‍यवस्‍था जारी रहेगी और उसमें किसी प्रकार के फेर-बदल का सरकार का कोई इरादा नहीं है।

केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन मेघवाल ने भी कहा कि एससी-एसटी के आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट ने कोई आदेश या निर्देश नहीं दिया है, यह उसका ऑब्जर्वेशन है और आदेश-निर्देश एवं ऑब्जर्वेशन में बहुत फर्क होता है। लेकिन विपक्ष इस समय हर मुद्दे पर खास नैरेटिव गढ़ने में लगा रहता है इसलिए उसने वही किया। ये बात अलग है कि उनका ये नैरेटिव बहुत काम नहीं आया लिहाजा भारत बंद सफल नहीं हुआ।

पश्‍चिम बंगाल में ट्रेनी महिला डॉक्टर की रेप के बाद हत्या को भी बनाया हथियार

अराजक तत्वों को उकसाने का कोई भी मौका विपक्ष अपने हाथ से फिसलने नहीं देता। इसका ताजा उदाहरण पश्‍चिम बंगाल में ट्रेनी महिला डॉक्टर की रेप के बाद हत्या से मिलता है। वहां ममता सरकार ने इस जघन्य और पाशविक कृत्य पर पहले तो किस तरह पर्दा डालने की कोशिश की, यह सबको पता है। कथित इंडी गठबंधन की जुबान एक नृशंस अपराध पर किस तरह तालू से चिपक गई, ये भी सबने देखा और जब मामले ने तूल पकड़ा तो उसका रहा-सहा बेशर्म रवैया भी सामने आ गया।

पश्‍चिम बंगाल सरकार की सुप्रीम कोर्ट में पैरवी कर रहे पूर्व कांग्रेस नेता और वर्तमान में समाजवादी पार्टी से राज्यसभा सदस्‍य वकील कपिल सिब्बल ने तो ट्रेनी डॉक्‍टर के रेप और वीभत्स हत्या को देश में होने वाली रेप की तमाम वारदातों से तुलना करके सामान्य बताने की भी कोशिश की।

मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी ने तोड़े सारे रिकॉर्ड

उधर विपक्ष की हौसला अफजाई से पश्‍चिम बंगाल की मुख्‍यमंत्री ममता बनर्जी ने अमानवीय आचरण के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। रेप के बाद हत्या को आत्महत्या बताने से लेकर आरजी कर कॉलेज के घटना स्‍थल से सबूत मिटाने और फिर हजारों लोगों को कॉलेज में प्रवेश करने से रोकने में असफल रहने के बाद भी वह खुद को क्लीनचिट देती रहीं। इतने से भी काम चलता दिखाई नहीं दिया तो अपनी ही उस सरकार के खिलाफ सड़क पर उतर गईं जिसका गृह मंत्रालय व स्‍वास्‍थ्‍य मंत्रालय उन्‍हीं के पास है तथा जिसकी पूरी जिम्मेदारी सिर्फ और सिर्फ उन्‍हीं की बनती है।

देश के दूसरे राज्यों में खून बहा देने की चेतावनी

ममता बनर्जी की निरंकुशता का अंदाज इस बात से अच्‍छी तरह लगाया जा सकता है कि छात्रों के प्रदर्शन को रोकने में असफल रहने पर उन्‍होंने सार्वजनिक रूप से केंद्र सरकार को चेतावनी दे डाली कि यदि मेरे राज्य में खून बहा तो देश के दूसरे भाजपा शासित राज्यों में भी खून बहेगा। एक मुख्‍यमंत्री और पार्टी की मुखिया का इस कथन ने उसके समर्थकों तथा अराजक तत्वों को क्या संदेश दिया होगा, इसे समझने के लिए बहुत ज्‍यादा बुद्धि इस्‍तेमाल करने की जरूरत नहीं है। वह देश को दंगों की आग में झोंक देने को  कितनी उतावली हैं, इसे सामान्य विवेक वाला व्‍यक्ति भी समझ सकता है।  

उधर, छात्रों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर लाठीचार्ज व आंसू गैस के गोले तथा वाटर कैनन का उपयोग भी जब कारगर नहीं हुआ तो ममता बनर्जी ने एफआईआर का डर दिखाकर प्रदर्शनकारी डॉक्‍टर्स को मंच से खुली धमकी दी और कहा कि यदि वो जिद पर अड़े रहे तो उनका करियर चौपट हो जाएगा।

इस दौरान ममता बनर्जी की बॉडी लैंग्वेज तथा हाव-भाव साफ बताता रहा है कि वह एक हारी हुई लड़ाई लड़ रही हैं और उनकी जन्म कुंडली में लिखे राजयोग का समय अब समाप्‍त हो चुका है। जो भी हो, फिलहाल वह चूंकि चीफ मिनिस्‍टर हैं और विपक्षी गठबंधन की महत्वपूर्ण गांठ भी, तो सब चल रहा है।

जम्मू-कश्‍मीर विधानसभा चुनाव की आड़ में

जम्मू-कश्‍मीर में विधानसभा चुनावों की घोषणा हो चुकी है। तारीखें तय हैं और कांग्रेस तथा नेशनल कॉन्‍फ्रेंस के बीच तो गठबंधन के साथ सीटों का बंटवारा भी हो गया है। अनुच्‍छेद 370 की विदाई के बाद से अलगाववाद अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है, और यही कांग्रेस तथा नेशनल कॉन्‍फ्रेंस के साथ-साथ समूचे विपक्ष की तकलीफ है।

जम्मू-कश्‍मीर के विधानसभा चुनावों में विपक्ष ने अनुच्‍छेद 370 की बहाली को बाकायदा अपने लिए न केवल एक चुनावी मुद्दा, बल्‍कि जीत का हथियार बनाया है। कांग्रेस के कई प्रमुख नेता और नेशनल कॉन्‍फ्रेंस पहले से ही जम्मू-कश्‍मीर पर पाकिस्तान एवं अलगाववादियों से बातचीत के पक्षधर रहे हैं। उन्‍हें जम्मू-कश्‍मीर में शांति से कोई लेना-देना नहीं है। उन्‍हें लेना-देना है अपने उन पुराने दिनों की किसी तरह वापसी से जब वो इस पहाड़ी राज्य को निजी जागीर समझते थे और भारत को अपना दुश्‍मन। वह इसी मानसिकता से वहां अब तक शासन करते रहे। अलगाववादियों का वह एक ऐसा स्‍वर्णिम काल था जब आम कश्‍मीरी के हाथ में पत्थर थे और अलगाववादियों के बच्‍चों के पास विदेशी डिग्रियां तथा अच्‍छी सरकारी नौकरियां हुआ करती थीं। अब वह अपने उसी स्‍वर्णिम काल की वापसी को छटपटा रहे हैं।

पिछले कुछ दिनों से जम्मू-कश्‍मीर में पाक प्रायोजित आतंकवाद की घटनाएं ऐसे तत्वों की छटपटाहट का जीता-जागता प्रमाण है।

कुल मिलाकर विपक्ष इन दिनों दुनियाभर के आतंकवादियों, उग्रवादियों, चरमपंथियों,  अलगाववादियों और उपद्रवियों का बहाने-बहाने से आह्वान करने में लगा है और बता रहा है कि वह भारत में उनका स्वागत करने को आतुर हैं। वह भारत में किसी भी तरह श्रीलंका और बांग्लादेश जैसी हिंसक अराजकता देखना चाहते हैं जिससे दुनिया का यह सबसे बड़ा लोकतंत्र कलंकित हो सके तथा आंखों की किरकिरी बनी हुई मोदी सरकार अपना शेष कार्यकाल पूरा न कर पाए।

विपक्ष संभवत: यह जान और समझ चुका है कि 2024 में बेशक वह झूठ के सहारे भाजपा को बहुमत से दूर करने में सफल रहा किंतु 2029 तक उनके बहुत से झूठ सामने आ चुके होंगे। झूठ, अफवाह तथा दुष्‍प्रचार के माध्‍यम से गढ़ा गया नैरेटिव भी तब तक नहीं चल पाएगा इसलिए जितनी जल्‍दी हो सके देश को अराजकता की आग में झोंक दिया जाए और मोदी को कुर्सी से बेदखल कर अपनी ''राजशाही'' कायम कर  ली जाए।

विपक्ष को इस बात का भी अहसास है कि काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ाई जा सकती इसलिए कहीं ऐसा न हो कि सत्ता के सपने हमेशा-हमेशा के लिए चकनाचूर होकर रह जाएं और पहले से चले आ रहे अनेक घपले-घोटाले उनके गले का फंदा बनकर बाकी जीवन जेल की सलाखों में बिताने पर बाध्‍य कर दें।

-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

 

रविवार, 21 जुलाई 2024

यूपी में बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल के बीच सीएम योगी को खुला खत: मूल समस्या के कारण और निवारण...


 लोकसभा चुनाव 2024 में अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाने के बाद से यूपी की राजनीति एक गंभीर उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। कोई इसके लिए गोरखनाथ पीठ के महंत और प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्यनाथ की कार्यशैली पर उंगली उठा रहा है तो कोई भाजपा के अंदरूनी कलह को इसके लिए जिम्मेदार ठहरा रहा है। कुछ लोगों का यह भी कहना है कि पार्टी ने उम्मीदवारों के चयन में चूक कर दी। 

लखनऊ से लेकर दिल्‍ली तक चुनाव परिणामों की समीक्षा बैठकों के साथ कयासों का दौर भी जारी है। फिलहाल, पार्टी का फोकस उपचुनावों पर है और ऐसा माना जा रहा है कि इन चुनावों के नतीजे स्‍थिति को कहीं ज्यादा स्‍पष्ट कर देंगे लिहाजा अनुमान है कि उसके उपरांत हाईकमान कोई बड़ा तथा ठोस निर्णय ले। 
बहरहाल, राजनीति की उलटबांसियां अपनी जगह किंतु जन आकांक्षाएं और जनभावनाएं अपनी जगह। राजनेताओं के लिए जनता ही अंतत: जनार्दन साबित होती है क्योंकि उसी के मत से सरकारें बनती और बिगड़ती हैं। नेता चाहे जितनी चालें चल लें परंतु वोट की चोट उसे अहसास करा ही देती है कि तुरुप का इक्का किसके हाथ है। 
ऐसे में जनअपेक्षाओं तथा जनभावनाओं का जानना बहुत जरूरी होता है। जो पार्टी या नेता इससे अनभिज्ञ रहता है, उसके लिए अपेक्षित परिणाम मिलना मुश्‍किल होता है। यूपी की जनता भी कुछ यही इशारे कर रही है। समय रहते समझ में आ जाएं तो ठीक अन्यथा 2027 बहुत दूर नहीं है। 
2024 के लोकसभा चुनाव परिणामों को लेकर यूपी के लोगों की भावनाएं और उनकी अपेक्षाएं क्या हैं, उसे लेकर पेश है सीएम योगी के सामने एक खुला खत- 
माननीय मुख्‍यमंत्री उत्तर प्रदेश सरकार योगी आदित्यनाथ जी! आपकी निष्‍ठा, कर्तव्‍यपरायणता, ईमानदारी, नैतिकता, मेहनत तथा लगन को लेकर शायद ही किसी को कोई शक हो किंतु इसमें भी दोराय नहीं है कि भ्रष्‍टाचार के बाबत जिस जीरो टॉलरेंस की नीति का ढिंढोरा आपकी सरकार द्वारा 2017 में पीटा गया वह आज सात साल की सत्ता के बावजूद निरर्थक साबित हो रहा है। 
माननीय मुख्‍यमंत्री जी, क्या आपको ज्ञात है कि आपकी भ्रष्‍टाचार को लेकर अपनाई गई जीरो टॉलरेंस की नीति प्रदेश के अधिकारी एवं कर्मचारियों के लिए बेहद मुफीद साबित हुई है क्योंकि उसे नौकरशाही ने अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है। 
आज स्‍थिति यह है कि उसी जीरो टॉलरेंस नीति के बहाने अधिकारी एवं कर्मचारी पहले से अधिक रिश्‍वत यह कहकर वसूल करते हैं कि सरकार सख्‍त है इसलिए रिस्क भी अधिक है। 
योगी जी! क्या आपको पता है कि रिश्‍वत के लिए सर्वाधिक बदनाम पुलिस महकमे की बात छोड़ भी दें तो आवास-विकास, विकास प्राधिकरण, बिजली विभाग, उद्योग, लोक निर्माण विभाग से लेकर परिवहन, तहसील, सिंचाई और शिक्षा तक में भ्रष्‍टाचार का बोलबाला है। 
बेशक ये विभाग सदा से भ्रष्‍ट थे, और पूर्ववर्ती सरकारों में इनके अधिकारी एवं कर्मचारियों का आमजन के प्रति रवैया खासा खराब था परंतु कड़वा सच यह है कि आज भी स्‍थित जस की तस है। इसमें कोई अंतर कहीं दिखाई नहीं देता। दिखाई देता है तो केवल इतना कि नौकरशाह अब 'जीरो टॉलरेंस' की आड़ में जमकर टॉर्चर कर रहे हैं। यकीन न हो तो किसी भी एक विभाग को आप स्‍वयं चुन लीजिए, और उसकी सच्‍चाई जानिए। शर्त यह है कि किसी भी तरह आपके अभियान की भनक न लगे। गोपनीयता इसके लिए बेहद जरूरी है। 
प्रदेश भर के सभी सरकारी विभागों में चल रहे भ्रष्‍टाचार के बड़े खेल का सिलसिलेवार ब्‍यौरा बाद में लेकिन उससे पहले वो सवाल जो जनता के मन में बैठे हैं और जिन्हें लेकर जनता आपसे बहुत उम्मीद लगाए बैठी थी परंतु नतीजा आज तक शून्य नजर आता है। 
सबसे पहले बात लखनऊ के गोमती रिवर फ्रंट घोटाले की 
माननीय मुख्‍यमंत्री जी! सर्वविदित है कि समाजवादी पार्टी के शासनकाल में अखिलेश यादव के मुख्‍यमंत्री रहते हजारों करोड़ रुपए का गोमती रिवर फ्रंट घोटाला हुआ। आपने अपनी पहली पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनने के साथ ये ऐलान किया था कि गोमती रिवर फ्रंट घोटाले का कोई अपराधी बच नहीं सकेगा और जल्‍द से जल्‍द सारे घोटालेबाज जेल के अंदर होंगे। 
सीबीआई ने इस मामले में कुल 189 लोगों को आरोपी बनाया लेकिन आज तक सतही कार्रवाई के अलावा कुछ नहीं हुआ। अगर पकड़े भी गए तो वो लोग जिन्‍हें गुर्गे कहा जा सकता है। कोई भी सरगना या मास्‍टर माइंड आज तक गिरफ्त में नहीं आया। सच कहें तो आज वही आप पर और आपकी सरकार पर हमलावर हैं, लेकिन आप कुछ नहीं कर पा रहे। जनता जानना चाहती है कि ऐसा क्यों। 
हजारों करोड़ रुपए का घोटाले करने वाले अब तक सरकार की पकड़ से दूर क्यों हैं और सरकार इसमें क्या कर रही है। 
माननीय योगी जी! आप भली भांति जानते हैं कि कोई भी बड़ा घोटाला सत्ता का संरक्षण पाए बिना संभव ही नहीं है। सत्ता का संरक्षण किसी भी घोटाले को तब मिलता है जब सरकार पर काबिज लोगों के निजी स्‍वार्थ उससे पूरे होते हों, तो फिर आज तक गोमती रिवर फ्रंट घोटाले के संरक्षणदाताओं का क्यों कुछ नहीं बिगड़ा। 
मायावती के कार्यकाल का नोएडा पार्क घोटाला 
अखिलेश यादव के कार्यकाल से पहले मायावती के शासनकाल में नोएडा का पार्क घोटाला सामने आया। हजारों करोड़ रुपए के इस घोटाले में भी बड़े-बड़े लोगों की संलिप्‍तता सामने आई। इस पार्क में लगाए गए पत्थरों के हाथी और बहनजी की मूर्तियों पर किसी आम आदमी की सोच से भी परे जाकर पैसा खर्च किया गया। पहले अखिलेश यादव ने कहा कि इस घोटाले का कोई आरोपी बच नहीं सकेगा। फिर आपकी सरकार ने उम्मीद जगाई किंतु राजनीति के बियाबान में इस घोटाले की सच्‍चाई कहां खो गई, कुछ पता नहीं लगा। 
आज बहिन जी राजनीतिक हैसियत भले ही पहले जितनी न रह गई हो लेकिन उनके ठाठ-बाट और शानो-शौकत में कोई कमी नहीं है। पत्थरों के बने बुत बोल पाते तो बताते कि घोटालेबाज आज भी मौज कर रहे हैं। सत्ता का संरक्षण उन्‍हें भी प्राप्‍त था, और क्यों प्राप्‍त था इसे अब दोहराने की दरकार नहीं रह गई। 
आय से अधिक संपत्ति के मामले भी ठंडे बस्‍ते में 
माननीय मुख्‍यमंत्री जी! इसी प्रकार कुछ कद्दावर नेताओं पर आय से अधिक संपत्ति के मामले दर्ज हुए थे। ये मामले कोर्ट-कचहरी तक भी पहुंचे किंतु नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। आपकी सरकार कह सकती है कि कुछ को न्‍यायालय से राहत मिल गई और कुछ लंबित हैं, लेकिन सवाल यह भी है कि न्‍यायालय से राहत कैसे मिल गई। मामले अब तक लंबित क्यों है। इन मामलों में पर्याप्‍त पैरोकारी क्यों नहीं की जा रही, और की जा रही है तो उसकी स्‍थिति क्या है। 
योगी जी! आप ही बताइए कि क्या ये सब जानने का जनता को कोई अधिकार नहीं है। क्या जनता को आपसे जो अपेक्षाएं थीं, वो गलत थीं। यदि वो सही थीं तो हजारों-हजार करोड़ रुपया डकार जाने वाले आज तक बेनकाब क्यों नहीं हुए। उल्‍टा क्यों आज तक वो आपको, आपकी नीतियों को, आपके काम को तथा आपकी पार्टी को कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। 
शायद इसलिए कि उन्‍हें इसके लिए भरपूर मौका मिल रहा है। अब विचारणीय प्रश्‍न यह है कि ये मौका कौन दे रहा है और क्यों दे रहा है। 
पहले पत्र में इतना ही। बाकी ये सिलसिला जारी रहेगा ताकि सनद रहे और वक्त जरूरत काम आए क्‍योंकि यूपी को 2027 के लिए भी आपसे बहुत उम्‍मीदें हैं। दरअसल, सवाल चुनावों में जीत-हार का नहीं उस भरोसे का है जो आपने दिया है और जो अभी टूटा नहीं है। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

शनिवार, 13 जुलाई 2024

हरि अनंत हरि कथा अनंता: मान गए गुज्जू भाई आपको, जूता भी उनका... चांद भी उनकी... वो भी सरेआम


 मान गए गुज्जू भाई आपको! वाकई कमाल की खोपड़ी पाई है ऊपर वाले से आपने। कल तक जो पानी-पी पीकर भरी सभाओं में आपको कोसा करते थे, वही आज पूरे टब्बर के साथ शिरकत करने जा पहुंचे। यहां तक कि जो बुढ़ऊ कोर्ट से कहते रहते हैं कि माई-बाप, तमाम बीमारियों ने घेर रखा है। हाथ-पैर काम नहीं करते। शरीर से लाचार हूं। व्‍हीलचेयर के सहारे जिंदगी सरक रही है, वह भी दोनों पैरों पर सरपट चलते दिखाई दिए। 

राजनीतिक कुनबे के दूसरे सदस्यों का हाल कुछ अलग नहीं रहा। कोई दरवाजे पर दांत निपोरते नजर आया तो कोई लाइन में लगा हुआ था। मीडिया से मुंह छिपाना आसान न रहा तो नजर चुराते हुए किसी ने कहा, हम तो आशीर्वाद देने आए हैं। कोई बोला, निमंत्रण था... बहुत इसरार किया इसलिए आना पड़ा। 
पिता-पुत्र की एक जोड़ी तो दरवाजे पर खड़ी होकर ऐसे दांत निपोर रही थी जैसे ढोल-नगाड़े वाले न्‍योछावर पाने की फिराक में निपोरते हैं। शेर की खाल वाले ये गीदड़ कतई नमूने नजर आ रहे थे, लेकिन उन्‍हें इस बात का रत्तीभर घमंड नहीं था।   
खप्पर हाथ में लेकर हर वक्त खून की प्यासी सी रहने वाली एक नेत्री भी जा पहुंचीं। दुश्मन दल के 'दोस्त' की मेहमान नवाजी ही कुछ ऐसी थी कि खुद के पहुंचने के बहाने भी खुद ही गढ़ लिए। 
बिना टोपी के जिन्हें रात में नींद नहीं आती, उनकी टोपी नदारद नजर आई। अलबत्ता बाकी लिबास वही था, जो उनकी पहचान बन गया है। बीबी-बच्चे बेशक आयोजन की नजाकत समझ रहे थे इसीलिए मौके और दस्तूर के मुताबिक सज-संवर कर आए लेकिन भैया ने समारोह को भी सम्मेलन समझ लिया। शायद ये डर भी रहा होगा कि पार्टी के ड्रेस कोड से इतर कुछ पहन-ओढ़ लिया तो कहीं लोग पहचानने से ही इंकार न कर दें। कल को इतने भव्य आयोजन में गैर हाजिरी लग गई तो लोग पूछने लगेंगे कि भैया कहां रास्‍ता भटक गए। भाभी-बच्‍चे तो चहकते दिखाई दिए लेकिन आपका वो सिर, सिरे से गायब क्यों रहा जिस पर दिन-रात खास रंग की टोपी सुशोभित होती रहती है। 
हाल ही में जीवन के 54 बसंत देख चुके चिर युवा नेता जी तो गुज्जू भैया की शान में इतने कसीदे पढ़ चुके हैं कि निमंत्रण मिलने पर उनकी स्‍थिति दयनीय सी हो गई। उनके और उनकी अम्मा के गले में अटक गया ये न्योता। समझ में ही नहीं आया कि उसे निगलें कि उगलें। आखिर एक उपाय सूझा कि फिलहाल पतली गली से विदेश यात्रा पर निकल लो। बाद की बाद में देखा जाएगा। अम्मा का क्या है, बुढ़िया भी है और बीमार भी। कोई न कोई बहाना बना ही देगी। रिटर्न गिफ्ट नहीं मिल सकेगा तो न सही। वैसे संभव है कि सोने-चांदी के वर्क लगे लड्डुओं का डिब्बा, मय रिटर्न गिफ्ट घर पर ही आ जाए। यूं तो अभी दो आयोजन और बाकी हैं, क्या पता अम्मा देर-सवेर हाजिरी लगा ही दे। 
जनता का क्या है, अगले इलेक्शन तक सब भूल जाती है। फिर हमारी जात की बेशर्मी का कोई तोड़ है क्या किसी के पास। शैतान भी हमारे सामने पानी मांग जाता है। गुज्जू भाइयों को गरियाने का कोई नया बहाना तब तक ढूंढ लेंगे। और इस बात का भी कि हम देश को लूटने वाले कारोबारियों के यहां क्यों गए थे। कह देंगे कि हम तो अपनी हिस्‍सेदारी तय करने गए थे। जिसकी जितनी संख्‍या भारी... उतनी उसकी हिस्‍सेदारी। हर बार 99 के फेर में थोड़े ही फंसना है। किनारे से लग गए हैं तो कभी लहर भी आ ही जाएगी। हां, अफसोस इस बात का जरूर रहेगा कि शादी-ब्‍याह रचाया होता, बाल-बच्‍चे खेल-कूद रहे होते तो हर बात के लिए अम्मा का मुंह न ताकना पड़ता। बिना पूछे भी जाना हो सकता था। मीडिया वालों से मुंह छिपाकर निकलने में तो महारत हासिल है। जैसे बाकी बातों के लिए टरका देते हैं, वैसे ही इस मामले में भी टरका देते। वैसे हैं अब भी बड़ी उलझन में, इसलिए विदेश यात्रा बीच में छोड़कर आशीर्वाद देने जा पहुंचें तो कोई आश्‍चर्य नहीं। 
अधेड़ उम्र वाले युवराज की सिपहसालारी करने वाले एक पूर्व मंत्री अपनी ओवरवेट बेगम के जा पहुंचे तो वायरल वीडियो के लिए कुख्‍यात कानूनविद ने भी मौका हाथ से नहीं निकलने दिया।  
बहरहाल, अब सुनिए मुद्दे की बात। और मुद्दे की बात यह है कि गुज्जू भाइयों ने इस मौके पर सबकी लंका लगाने का प्लान लोकतंत्र के महापर्व की मझधार में ही बना लिया था। उन्होंने कानाफूसी करके उसी दौरान तय कर लिया था कि न्‍योते को लालायित इन सारे चिल्‍लरों को सपरिवार आमंत्रित करना है। गुज्‍जू भाइयों को अपनी अक्ल और इनकी बेअक्ली पर पूरा भरोसा था। उन्‍हें पता था कि न्‍योता मिलते ही ये सब लार टपकाते आ पहुंचेंगे क्योंकि बुनियादी रूप से तो सबकी जात एक ही है और इसी लिए एक ही हमाम में बैठे हैं। 
गुज्जू भाइयों को बखूबी पता था कि इनका थूका हुआ इन्‍हीं की जीभ से चटवाने का इससे बेहतर अवसर दूसरा नहीं मिलेगा। चूंकि इन्‍होंने थूका भी था भरी सभाओं में तो चाटने के लिए भी इससे अच्‍छा मंच कौन सा होगा जहां देशी ही नहीं, विदेशी मेहमान भी इकठ्ठे हों। 
अब वो मेहमान देश-दुनिया को बता सकेंगे कि गुज्जू भाइयों को दिन-रात गरियाने वालों की असली औकात है क्या। वो दिखा सकेंगे कि कभी किसी तरह पद या कुर्सी पा जाने से कूकुर की फितरत नहीं बदल जाती। नस्ल कोई भी क्यों न रही हो, मूल प्रवृत्ति तो वही रहती है। 
गुज्‍जू भाई जानते हैं भोंकने के आदी ये लोग बेशक भोंकने से बाज अब भी नहीं आऐंगे, लेकिन अब अपने बचाव में भोंकेंगे। गौर कीजिएगा कि अब ये जब कभी भोंकना शुरू करेंगे तो इनकी दुम दबी होगी क्योंकि वही इस प्रजाति की कड़वी सच्‍चाई है जिसे गुज्‍जू भाई एक झटके में सामने ले आए। जय हिंद। जय भारत। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी 

शनिवार, 29 जून 2024

24 फरवरी 2015 को Legend News में लिखा गया था ये लेख: कुमार स्वामी... साधु या शैतान?


 सुना है पहले बड़े ही सुनियोजित तरीके से ठगों के गिरोह ठगाई का अपना धंधा किया करते थे। मसलन जैसे कोई व्‍यक्‍ति पशु पैंठ से गाय खरीद कर लाया। रास्‍ते में थोड़ी-थोड़ी दूरी पर मौजूद गिरोह का एक सदस्‍य उससे पूछता था- अरे भाई, यह गधा कितने का खरीदा?

गाय को गधा बताये जाने पर पहले तो वह आदमी चौंककर कहता है कि क्‍या अंधे हो भाई... यह गधा नहीं गाय है, लेकिन रास्‍ते में जब तमाम लोग यही सवाल करते मिलते तो गाय लाने वाले को अपने ऊपर ही शक हो जाता था और वह सोचने लगता कि हो न हो मैं ही मूर्ख बन आया हूं। गांव पहुंचूंगा इसे लेकर तो बड़ी बदनामी होगी, साथ ही मजाक भी उड़ेगा लिहाजा वह खुद भी गाय को गधा मानकर रास्‍ते में ही कहीं चुपचाप छोड़कर चल देता था और पीछे से ठग उस गाय को ले उड़ते थे।

समय के साथ ठगाई का तरीका भले ही बदल गया हो लेकिन धंधा आज भी जारी है। यकीन न हो तो 'स्‍वयंभू ब्रह्मर्षि' कुमार स्‍वामी' के संदर्भ में छपा अखबार का एक विज्ञापन देख लो।

एक अखबार में जैकेट पेज विज्ञापन छपा है। यह विज्ञापन मथुरा के वृंदावन में कुमार स्‍वामी द्वारा 12 व 13 जुलाई को आयोजित 'प्रभु कृपा दुख निवारण समागम' का है। 'स्‍वयंभू ब्रह्मर्षि' कुमार स्‍वामी के इस विज्ञापन में नेशनल हाईवे नंबर दो के पास वृंदावन के ही चौमुहां क्षेत्र अंतर्गत श्री राधा-कृष्‍ण का एक विशाल मंदिर बनाये जाने की घोषणा की गई है। 108 एकड़ भूमि पर प्रस्‍तावित इस मंदिर के निर्माण में दो हजार किलो सोना इस्‍तेमाल करने की बात लिखी है।

इस मंदिर के उद्देश्‍य और इसके ऊपर होने वाले खर्च पर चर्चा बाद में, पहले इसी विज्ञापन में किए गये दूसरे दावों की बात

विज्ञापन में 'दिव्‍य पाठ से आई जीवन में खुशहाली' शीर्षक से करीब डेढ़ दर्जन लोगों के अनुभव प्रकाशित कराये गये हैं। इन लोगों में युवक-युवतियों एवं महिला-पुरुषों के अलावा दो बच्‍चों के भी फोटो लगे हैं।

इन तथाकथित निजी अनुभवों के माध्‍यम से दावा किया गया है कि ब्रह्मर्षि कुमार स्‍वामी द्वारा उपलब्‍ध कराये गये दिव्‍य पाठ से, उनके समागम में शामिल होने से तथा उनके द्वारा बताये गये अन्‍य उपायों से किस प्रकार उनके सारे कष्‍ट दूर हो गए।

इन कष्‍टों में एमबीबीएस करने के लिए एडमीशन से लेकर गोल्‍डमेडल हासिल होने तथा मनमाफिक नौकरी पाने से लेकर हार्ट की ब्‍लॉकेज समाप्‍त हो जाने तक का जिक्र है।

इतना ही नहीं, अखबार में छपे विज्ञापन के जरिए दावा किया गया है कि कुमार स्‍वामी की कृपा और उनके द्वारा बताये गये उपायों से किसी का लाइलाज ब्रेस्‍ट कैंसर पूरी तरह ठीक हो गया तो किसी की बच्‍चेदानी का कैंसर ठीक हो गया। ब्‍लड शुगर, ब्‍लड प्रेशर व थॉयराइड जैसी बीमारियां कुमार स्‍वामी की कृपा से खत्‍म होने का दावा विज्ञापन में दर्शाये गए लोगों के द्वारा कथित तौर पर किया गया है।

इसी विज्ञापन में 'मेडिकल साइंस हतप्रभ' शीर्षक से दावा किया गया है कि कुमार स्‍वामी द्वारा उपलब्‍ध कराये गये दिव्‍य पाठ के बाद जन्‍म से गूंगा व बहरा एक बच्‍चा बोलने व सुनने लगा तथा किसी कारण पूरी तरह आंखों की रोशनी गंवा चुके एक अन्‍य बच्‍चे की आंखें पूरी तरह ठीक हो गईं और वह साफ-साफ देखने लगा। विज्ञापन के अनुसार गूंगे व बहरे बच्‍चे का इलाज पूर्व में पीजीआई चण्‍डीगढ़ से चल रहा था लेकिन वहां कोई लाभ नहीं हुआ।

विज्ञापन की मानें तो जहां मेडीकल साइंस असमर्थ हो गई, वहां कुमार स्‍वामी से उपलब्‍ध दिव्‍य पाठ ने चमत्‍कार कर दिखाया। यहां तक कि अनेक असाध्‍य रोगों का इलाज मात्र ईमेल के जरिए कर दिया।

लोगों को प्रभावित करने के लिए विज्ञापन में एक ओर जहां आज देश के प्रधानमंत्री व गुजरात के पूर्व मुख्‍यमंत्री नरेन्‍द्र मोदी तथा मथुरा की सांसद एवं सुविख्‍यात अभिनेत्री हेमा मालिनी का कुमार स्‍वामी को लेकर तथाकथित संदेश भी छापा गया है वहीं दूसरी ओर अमेरिका के सीनेटरों से प्राप्‍त अंबेसेडर ऑफ पीस अवार्ड, न्‍यूयॉर्क स्‍टेट सीनेट से प्राप्‍त सम्‍मान, मॉरीशस के पीएम से प्राप्‍त एंजल ऑफ ह्यूमेनिटी अवार्ड  तथा ब्रिटेन की संसद से प्राप्‍त अंबेसेडर ऑफ पीस अवार्ड के फोटो प्रकाशित किये गये हैं। यह बात अलग है कि इन फोटोग्राफ्स की सत्‍यता को भी प्रमाण की जरूरत पड़ सकती है। जैसे नरेन्‍द्र मोदी और हेमा मालिनी का संदेश कब और किस संदर्भ में दिया गया था, दिया गया था भी या नहीं।

इन फोटोग्राफ्स को विज्ञापन में प्रकाशित करने के पीछे लोगों को प्रभावित करने के अलावा भी कोई दूसरा मकसद हो सकता है, यह समझ से परे है। हां, यह बात जरूर समझ में आती है कि प्रभावित क्‍यों और किसलिए किया जा रहा है।

स्‍पष्‍ट है कि पूर्व में कभी जिस तरह ठगों का सरगना गाय को गधा साबित करने के लिए एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत गिरोह के सदस्‍यों का इस्‍तेमाल किया करता था, ठीक उसी तरह आज के कुमार स्‍वामी अपने तथाकथित भक्‍तों का इस्‍तेमाल कर रहे हैं जो वास्‍तव में उनके गिरोह का ही हिस्‍सा हैं अन्‍यथा क्‍या ऐसा संभव है कि जन्‍म से गूंगा-बहरा कोई ऐसा बच्‍चा जिसे ठीक करने में मेडीकल साइंस भी असमर्थ हो, उसे कुमार स्‍वामी ने ठीक कर दें। क्‍या ऐसा संभव है कि लाइलाज कैंसर का इलाज और ब्‍लड शुगर व ब्‍लड प्रेशर को कुमार स्‍वामी हमेशा के लिए ठीक कर सकें। मनमाफिक नौकरी पाने की बात हो या परीक्षा में मनमाफिक अंक प्राप्‍त करने की, सबकुछ कुमार स्‍वामी करवा सकते हों।

सूरदास के भक्‍तिपदों में एक पद है-

चरण-कमल बंदौ हरि राई।

जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अंधे को सब कुछ दरसाई।।

बहिरौ सुनै मूक पुनि बोलै, रंक चलै सिर छत्र धराई।

'सूरदास' स्वामी करूणामय, बार-बार बन्दौं तेहि पाई।।

सूरदास ने अपने भक्‍ति पदों की रचना भगवान कृष्‍ण के संदर्भ में की है जबकि सूरदास प्रत्‍यक्षत: स्‍वयं मृत्‍युपर्यन्‍त दृष्‍टिहीन ही रहे और सूरदास नाम भी जन्‍मांध लोगों का पर्याय बन गया। लेकिन यहां तो सब-कुछ ब्रह्मर्षि कुमार स्‍वामी की कृपा से संभव बताया जा रहा है।

बेशक धर्म की आड़ में लोगों को ठगने का धंधा करने वाले आज हर धर्म में सक्रिय हैं और कोई धर्म इस प्रकार के धंधेबाजों से अछूता नहीं रह गया है लेकिन कुमार स्‍वामी के विज्ञापन की चर्चा इसलिए जरूरी है क्‍योंकि यह कुछ समय पूर्व इसी तरह यमुना को शुद्ध करने का बीड़ा मथुरा में उठा चुके हैं। तब इन्‍होंने एक बड़ी धनराशि अपनी ओर से यमुना शुद्धीकरण के लिए दान देने का ऐलान यमुना पर संकल्‍प के साथ किया था लेकिन आज न उस धनराशि का कोई पता है और ना ही यमुना शुद्धीकरण के लिए उठाये गये संकल्‍प का। हां, उसके साथ ही कुमार स्‍वामी के संस्‍थान की वेबसाइट पर यमुना शुद्धीकरण के लिए यथासंभव दान देने की अपील जरूर शुरू कर दी गई थी। उसके माध्‍यम से कितना दान मिला, और कुमार स्‍वामी द्वारा यमुना के लिए दान की गई भारी-भरकम रकम का क्‍या हुआ, कुछ नहीं पता।

अब कुमार स्‍वामी ने 108 एकड़ में दो हजार किलो सोने से जड़ा राधाकृष्‍ण का मंदिर बनाने की घोषणा की है।

यदि 25 हजार रुपया प्रति दस ग्राम सोने की कीमत से दो हजार किलो सोने का भाव कैलकुलेट किया जाए तो यह रकम बैठती है पांच सौ करोड़ रुपया। पांच सौ करोड़ रुपए का सोना और उसके अलावा 108 एकड़ नेशनल हाईवे से सटी हुई जगह की कीमत, फिर इतने बड़े मंदिर के निर्माण पर आने वाला खर्च आदि सब जोड़ा जाए तो यह रकम हजारों करोड़ बैठेगी।

यहां सवाल यह पैदा होता होता है कि कुमार स्‍वामी के पास इतनी रकम पहले से है या यह उगाही जानी है। यदि पहले से है तो आई कहां से।

नहीं है तो क्‍या मंदिर के निर्माण की घोषणा और उसके लिए अखबार में दिये गये लाखों रुपये कीमत के विज्ञापन का मकसद उसी प्रकार धन की उगाही करना है जिस प्रकार यमुना शुद्धीकरण के नाम पर कुछ समय पूर्व शुरू किया था।

एक अन्‍य सवाल यहां यह भी है कि 12-13 जुलाई को वृंदावन क्षेत्र में आयोजित प्रभु कृपा दुख निवारण समागम या अन्‍य स्‍थानों पर होते आ रहे ऐसे ही दूसरे समागम क्‍या नि:शुल्‍क होते हैं अथवा इनमें शामिल होने की कोई फीस वसूली जाती है। विज्ञापन के अनुसार उत्‍तर प्रदेश में कुमार स्‍वामी का यह 396वां समागम है। 395 इससे पहले विभिन्‍न स्‍थानों पर किये जा चुके हैं।

यदि यह समागम नि:शुल्‍क होते हैं तो इनके आयोजन के लिए भारी-भरकम खर्च कहां से आता है, कौन यह खर्च उठाता है और उसका इसके पीछे मकसद क्‍या है।

जाहिर है कि इन सभी प्रश्‍नों का जवाब कुमार स्‍वामी के दो पेज वाले 'जेकेट एड' से मिल जाता है परंतु धर्म की आड़ लेकर चल रहे ठगी के इस धंधे पर रोक लगाना आसान नहीं। हाल ही मैं साईं बाबा को लेकर उपजा विवाद इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

चूंकि धर्म ही सभी पापकर्मों के लिए सबसे बड़ी आड़ का काम कर सकता है इसलिए कुमार स्‍वामी जैसे लोग न केवल धर्म को धंधा बनाकर ऐश कर रहे हैं बल्‍कि देश व विदेश में मौजूद उस कालेधन को सफेद करने में लगे हैं जिनको बाहर निकालने में अब तक सरकारें भी असफल रही हैं।

पता नहीं क्‍यों सरकारों का ध्‍यान इस ओर नहीं जाता। यदि जाने लगे तो एक बड़ी मात्रा में कालेधन का पता और उसकी आड़ बने पूरे खेल का पर्दाफाश होते ज्‍यादा वक्‍त नहीं लगेगा। 

-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी            

बुधवार, 12 जून 2024

नयति की नियति को प्राप्‍त होने जा रहा है मथुरा का एक मशहूर हॉस्पिटल, चेयरमैन की विदेशी डिग्री भी चर्चा का विषय


 कॉर्पोरेट लॉबिस्ट नीरा राडिया ने कृष्ण की पावन स्थली मथुरा से 28 फरवरी 2016 को एक सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल का संचालन शुरू किया था। 'नयति' के नाम से खोले गए इस हॉस्पिटल का उद्घाटन देश के दिग्गज उद्योगपति रतन टाटा के हाथों कराया गया। नेशनल हाईवे से सटी एक जमीन को लीज पर लेकर शुरू किए गए इस हॉस्पिटल ने बहुत कम समय में अच्‍छी खासी शोहरत हासिल कर ली लेकिन हॉस्पिटल की चेयरपर्सन नीरा राडिया का मकसद संभवत: कुछ और था, लिहाजा हॉस्पिटल के चर्चे इलाज से अधिक विवादों के कारण होने लगे। नीरा राडिया ने इन विवादों पर ध्‍यान देने की बजाय उन्‍हें दबाने में अधिक रुचि ली जिसके परिणाम स्‍वरूप मात्र चार साल में 'नयति' अपनी 'नियति' को प्राप्‍त हो गया। आज इस हॉस्‍पिटल पर ताला लटका है। 

मथुरा का एक अन्य हॉस्‍पिटल भी अब उसी राह पर 
नयति की तरह ही नेशनल हाईवे के किनारे लीज की जमीन पर शुरू किया गया एक अन्य हॉस्‍पिटल भी अब उसी राह पर चल पड़ा है। बहुत कम समय में इस हॉस्‍पिटल ने भी प्रसिद्धि के साथ-साथ विवादों को जन्म देना प्रारंभ कर दिया है। इसे इत्तेफाक कहें या कुछ और कि नयति की तरह ही इस हॉस्‍पिटल में भी एक ओर जहां मरीजों के परिजनों से रूखा व्‍यवहार करना, मनमाने पैसे वसूलना तथा गोपनीयता की आड़ लेकर इलाज की कोई जानकारी न देना एवं मरीज की स्‍थिति न बताने जैसी बातें काफी आम हो चुकी हैं। वहीं दूसरी ओर नयति की तरह ही इस हॉस्‍पिटल में सेवारत डॉक्‍टर्स समय पर अपना वेतन पाने के लिए तरसने लगे हैं जिससे हॉस्‍पिटल के भविष्य का अनुमान लगाना कोई बड़ी बात नहीं रह गई। 
बताया जाता है हॉस्‍पिटल के लिए बैंक से प्राप्‍त कर्ज की किस्‍तें भी अब समय पर अदा नहीं की जा रही हैं।   
हॉस्‍पिटल के सूत्रों की मानें तो इस सबका एक बड़ा कारण संचालक द्वारा हॉस्‍पिटल से होने वाली आमदनी का बड़ा हिस्‍सा जमीनों की खरीद-फरोख्‍त में निवेश करना है ताकि एकमुश्‍त मोटी कमाई की जा सके। 
नयति सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल की चेयरपर्सन नीरा राडिया और इस हॉस्‍पिटल के चेयरमैन में एक और बड़ी समानता है। सब जानते हैं कि नीरा राडिया शासन-प्रशासन में बने अपने रसूख का इस्‍तेमाल नयति या खुद के ऊपर लगे आरोपों को दबाने में करती रहीं, इसलिए नीरा राडिया के खिलाफ तमाम लोग मुंह खोलने को आसानी से तैयार नहीं होते थे। 
ठीक इसी तरह इस हॉस्‍पिटल के चेयरमैन भी पुलिस-प्रशासन के साथ-साथ सत्ता के गलियारों तक उठने-बैठने में रुचि रखते हैं, और उससे बने अपने प्रभाव का प्रयोग अपने अथवा हॉस्‍पिटल के खिलाफ उठने वाली आवाजों को दबाने में कर रहे हैं। 
फर्क सिर्फ इतना है कि नीरा राडिया चिकित्सकीय पेशे से ताल्‍लुक नहीं रखती थीं जबकि ये महोदय इसी पेशे से ताल्लुक रखते हैं। हालांकि विदेश से प्राप्‍त इनकी डिग्री अच्‍छी-खासी चर्चा का विषय बनी हुई है। 
चेयरमैन की डिग्री को लेकर चर्चा क्यों? 
बताया जाता है चिकित्सकीय पेशे से जुड़े लोगों और इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA) की मथुरा इकाई में भी इस हॉस्‍पिटल के 'चेयरमैन डॉक्‍टर' की डिग्री चर्चा का विषय बनी हुई है क्योंकि उन्‍होंने अपनी पढ़ाई भारत से न करके ऐसे देश से की है जो दुनिया में सबसे सस्‍ती चिकित्सकीय एजुकेशन देने के लिए पहचाना जाता है। 
यूं भी किसी दूसरे देश से डॉक्‍टरी की पढ़ाई पूरी करके आने वालों के लिए भारत में प्रेक्टिस शुरू करने से पहले फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट्स एग्जामिनेशन (FMGE) की परीक्षा पास करनी होती है। 
क्या कहते हैं भारत के नियम-कानून 
भारत सरकार के नियमानुसार विदेश से MBBS की पढ़ाई पूरी करने के बाद भारत लौटने वाले डॉक्टर को पहले यहां फॉरेन मेडिकल ग्रेजुएट्स एग्जामिनेशन (FMGE) की परीक्षा पास करनी पड़ती है और तभी वह यहां प्रेक्टिस करने के लिए अधिकृत माने जाते हैं। इस परीक्षा को पास किए बिना वे भारत में मेडिकल प्रैक्टिस नहीं कर सकते। उन्हें लाइसेंस ही नहीं मिलेगा, किंतु विदेश से पढ़कर आने वाले अधिकांश  डॉक्‍टर ऐसा नहीं करते क्योंकि इस परीक्षा को पास करने वालों की संख्या 15 फीसदी से भी कम है। 
ये आंकड़े कुछ समय पहले नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस (NBE) द्वारा जारी किए गए हैं। NBE ही FMGE का आयोजन करती है। 
विदेश से मेडिकल की पढ़ाई के लिए भी अब NEET अनिवार्य 
विदेश से मेडिकल की पढ़ाई करने वालों की योग्यता पर लगते रहे सवालिया निशानों से निजात पाने के लिए सरकार ने नियमों में बदलाव भी किया है। अब विदेश जाकर मेडिकल की पढ़ाई  करने के इच्‍छुक छात्रों को भारत में NEET की परीक्षा पास करना अनिवार्य कर दिया गया है। इसके बाद भी केवल वही छात्र स्वदेश लौटकर मेडिकल प्रैक्टिस करने के लिए पात्र होंगे, जिन्होंने ऐसे देश से पढ़ाई की हो जहां भारत के समकक्ष मेडिकल की पढ़ाई होती हो। 
दरअसल, कई देश ऐसे हैं जहां डॉक्‍टर को दी जाने वाली डिग्री वहां भी मान्य नहीं होती, या सीमित चिकित्सकीय कार्य के लिए मान्य होती है। 
IMA मथुरा का क्या कहना है? 
IMA मथुरा के अध्‍यक्ष डॉक्‍टर मनोज गुप्‍ता से Legend News ने जब ये जानकारी चाही कि मथुरा में ऐसे कितने डॉक्‍टर प्रेक्टिस कर रहे हैं जिन्‍होंने देश के बाहर से डिग्री ली है, तो उनका कहना था कि IMA मथुरा के पास ऐसी कोई सूची नहीं है। सीएमओ ऑफिस में रजिस्‍टर्ड डॉक्‍टर्स को IMA की सदस्यता दे दी जाती है। 
अलबत्ता डॉक्‍टर मनोज गुप्‍ता ने इतना जरूर माना कि समय-समय पर ये मुद्दा IMA की बैठकों में उठाया जाता रहा है किंतु किसी नतीजे तक नहीं पहुंचा। इसका कारण IMA में होने वाले वार्षिक चुनाव बताए जाते हैं। चूंकि IMA के पदाधिकारियों को अल्‍प अवधि के लिए चुना जाता है इसलिए कोई पदाधिकारी इस गंभीर मुद्दे पर ठोस निर्णय नहीं ले पाता। ये भी कह सकते हैं कि वो किसी विवाद में पड़ कर अपने लिए मुसीबत मोल नहीं लेना चाहता। 
इस संबध में और जानकारी करने पर इतना पता जरूर लगा कि IMA मथुरा के ही एक पूर्व पदाधिकारी ने कुछ समय पहले मुख्‍यमंत्री के पोर्टल पर शिकायत कर विदेश से डिग्री लेकर आए डॉक्‍टर्स द्वारा गैर कानूनी तरीके से प्रेक्‍टिस किए जाने का मुद्दा उठाया था, जिसे सीएमओ मथुरा को रेफर भी किया गया लेकिन तत्कालीन सीएमओ मथुरा ने उसे भी 'भुना' लिया और कोई कार्रवाई नहीं की। 
वर्तमान सीएमओ मथुरा क्या बताते हैं? 
मथुरा के वर्तमान सीएमओ से जब इस मुतल्लिक बात की गई तो उनका कहना था कि विदेश से डॉक्‍टर की डिग्री लेकर आने वालों द्वारा भारत में कहीं भी प्रेक्‍टिस किए जाने की जानकारी मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया या मेडिकल एजुकेशन से जुड़े विभागों को ही होती है। हमारे पास तो वही लिस्ट होती है जो IMA के पास रहती है। 
IMA मथुरा में कुल कितने डॉक्‍टर पंजीकृत हैं? 
एक अनुमान के अनुसार IMA मथुरा के सदस्‍य डॉक्‍टरों की संख्‍या लगभग चार सौ के करीब है। इसमें वो डॉक्‍टर भी शामिल हैं जो विदेश से डिग्री लेकर आए हैं और वो भी जो विभिन्न कारणों से प्रेक्टिस करने के पात्र नहीं हैं। 
ऐसे डॉक्‍टर खुद भी इस बात से भली-भांति परिचित हैं कि वो प्रेक्टिस करने के लिए अधिकृत नहीं हैं इसलिए कहीं वो संचालक का चोला ओढ़कर काम कर रहे हैं तो कहीं चेयरमैन या चेयरपर्सन बनकर। 
लीज की जमीन पर हॉस्‍पिटल का संचालन कर रहे उसके चेयरमैन चिकित्सक को भी कभी किसी का उपचार करते नहीं देखा गया जबकि वो सर्जन बताए जाते हैं।  
विदेश से डिग्री लेकर आने वाले इन डॉक्‍टर्स और गैरकानूनी तरीके से प्रेक्टिस कर रहे डॉक्‍टर्स की जानकारी देने को कोई इसलिए भी तैयार नहीं है क्‍योंकि IMA मथुरा के कुछ सदस्‍य ऐसे भी हैं जिनका संरक्षण गैरकानूनी तरीके से प्रेक्टिस कर रहे इन डॉक्‍टर्स को प्राप्‍त है और वो निजी स्‍वार्थवश उनके खिलाफ कोई एक्शन नहीं होने देना चाहते। 
बेशक काबिल डॉक्‍टर्स का एक बड़ा वर्ग चाहता है कि इन तत्वों के खिलाफ ठोस एक्शन हो जिससे वो उस जमात में अलग से पहचाने जा सकें किंतु फिलहाल ऐसा होता नजर नहीं आ रहा। 
चिकित्‍सकीय पेशे के लिए कलंक बना कॉर्पोरेट कल्चर 
कोई भी डॉक्‍टर जिसने अपनी मेहनत एवं लगन और मरीजों के प्रति अपने प्रोफेशनल एथिक्स के बूते समाज में जगह बनाई है, वह कभी नहीं चाहता कि उसका कोई मरीज या उसके परिजन उसकी सेवा से असंतुष्ट होकर जाएं, लेकिन इसके उलट जिन्‍होंने इस पेशे को कार्पोरेट कल्चर में ढाल रखा है उनके लिए अधिक से अधिक कमाई ही उनका एकमात्र ध्‍येय होता है। 
यही कारण है कि मथुरा जैसे छोटे से शहर में आए दिन किसी न किसी हॉस्‍पिटल से कोई न कोई विवाद सामने आता रहता है, और इस स्‍थिति से जनसामान्‍य के साथ-साथ काफी बड़ी संख्‍या में स्‍थानीय डॉक्‍टर्स भी परेशान हैं। लेकिन सवाल यह खड़ा होता है कि बिल्‍ली के गले में घंटी बांधे कौन? 
और यदि कोई ये घंटी बांधने का दुस्साहस कर भी ले तो क्या गारंटी है कि उसके बाद कार्रवाई होगी। जैसे कि मुख्‍यमंत्री पोर्टल पर शिकायत करने के बाद भी नहीं हो सकी। 
जैसे कि IMA से लेकर CMO तक, ये तो स्वीकार कर रहे हैं कि गैरकानूनी तरीके से प्रेक्‍टिस और कॉर्पोरेट कल्चर से हॉस्‍पिटल चलाने वालों की संख्‍या अच्‍छी-खासी है किंतु वो उनका नाम सार्वजनिक करने को तैयार नहीं। 
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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