मंगलवार, 12 जुलाई 2016

टेकमैन ग्रुप ने भ्रामक विज्ञापन देकर नए Real Estate Bill को दी खुली चुनौती

मथुरा बेस्‍ड रीअल एस्‍टेट कंपनी Techman Buildwell Pvt Ltd द्वारा हाल ही में बने रीअल एस्‍टेट बिल को खुली चुनौती दी गई है। Techman Buildwell ने नए रीअल एस्‍टेट बिल में शामिल कानूनी प्रावधानों को ताक पर रखकर लोगों से पैसा इकठ्ठा करने के लिए ऐसा भ्रामक विज्ञापन दिया है जो यह साबित करता है कि सरकार की मंशा चाहे कितनी ही अच्‍छी क्‍यों न हो और वह कैसा भी कठोर कानून क्‍यों न ले आए किंतु जिन्‍हें कानून से खिलवाड़ करने की आदत है, वह अपनी आदत से बाज नहीं आने वाले।
दरअसल, Techman Group ने आगरा से प्रकाशित दैनिक जागरण अखबार के 10 जुलाई वाले मथुरा संस्‍करण में पृष्‍ठ संख्‍या 4 पर एक क्‍वार्टर पेज कलर्ड विज्ञापन दिया है।
”उधर घर किया बुक, इधर इनकम शुरू” शीर्षक वाले इस विज्ञापन के तहत ”अब तो दोनों हाथों में लड्डू” होने का लालच देते हुए बताया गया है कि किस तरह बुकिंग कराने के साथ ही खरीदार की आमदनी शुरू हो जाएगी जबकि सच यह है कि इस विज्ञापन के झांसे में आने वाला खरीदार आमदनी तो दूर अपने फ्लैट को पाने के लिए भी बिल्‍डर के हाथ की कठपुतली बनकर रह जाएगा।
विज्ञापन कुछ इस प्रकार है- अब Techman लाए हैं Real Estate में Monthly Income Plan (MIP). सिर्फ रु. 1.80 में 2 BHK बुक कराएं और Possession तक Home Loan ब्‍याज समेत हर महीने 15840 रु. तक पाएं।
विज्ञापन के अनुसार Techman Group की यह स्‍कीम उनके प्रोजेक्‍ट नीलगिरी इंडिपेंडेट फ्लोर, हर्ष इंडिपेंडेट फ्लोर, हिमगिरी अपार्टमेंट एंड सिटी कॉम्‍पलेक्‍स में 2BHK सहित 1BHK तथा 3BHK के लिए भी है जो मथुरा में नेशनल हाईवे नंबर-2 पर Techman City के अंदर आते हैं।
विज्ञापन में नीचे लिखा है कि यही स्‍कीम उनके गाजियाबाद (दिल्‍ली एनसीआर) के प्रोजेक्‍ट्स मोती रेजीडेंसी राजनगर Extn. तथा मोती सिटी मोदीनगर पर भी लागू है।
इस संबंध में पूरी जानकारी के लिए जब ‘Legend News’ ने विज्ञापन के नीचे दिए गए एक मोबाइल नंबर 9555632609 पर जानकारी की तो फोन रिसीव करने वाले ने बताया कि प्रथम तो वह खरीदार से बुकिंग एमाउंट 20 प्रतिशत लेंगे न कि 10 प्रतिशत जैसा कि विज्ञापन में लिखा है। इसके अलावा जिस फ्लैट की कीमत विज्ञापन में 18 लाख रु. दर्शायी गई है, उसकी एक्‍चुअल कीमत 20 लाख रुपए होगी।
फ्लैट की शेष रकम के लिए ग्रुप द्वारा खरीदार के नाम स्‍टेट बैंक ऑफ इंडिया, आईसीआईसीआई बैंक तथा एचडीएफसी बैंक से होम लोन कराया जाएगा। विज्ञापन में उक्‍त बैंकों से होम लोन दिलाने की सुविधा का उल्‍लेख किया गया है।
फोन रिसीव करने वाले के मुताबिक ग्रुप की ओर से खरीदार को उसके द्वारा जमा कराए गए बुकिंग एमाउंट पर तो Possession न देने तक 15 प्रतिशत यानि सवा रुपया सैकड़ा के हिसाब से ब्‍याज दिया जाएगा, साथ ही होम लोन की ब्‍याज (न कि किश्‍त)का जो पैसा बनेगा, वह भी देगा।
इस हिसाब से देखें तो बिल्‍डर ने बड़ी चालाकी के साथ घर का सपना दिखाकर खरीदार के अपने पैसे तथा बैंक से उसे दिलाए गए कर्ज को भी तब तक इस्‍तेमाल करने का इंतजाम करने की कोशिश की है जब तक कि उसका प्रोजेक्‍ट तैयार नहीं हो जाता। इस दौरान बैंक का कर्ज रहेगा खरीदार के ऊपर और उसका इस्‍तेमाल बिना किसी जोखिम के बिल्‍डर द्वारा किया जाएगा।
फोन रिसीव करने वाले ने साफ-साफ कहा कि बैंक से होम लोन कराने की पूरी व्‍यवस्‍था उसके यानि ग्रुप के द्वारा की जाएगी, उसके लिए खरीदार को परेशान होने की जरूरत नहीं है।
इस पूरे विज्ञापन में कहीं भी यह नहीं लिखा है कि Techman Group के यह प्रोजेक्‍ट कब तक पूरे होंगे और कब तक खरीदार को उसके सपनों के घर का Possession मिल पाएगा।
अब जरा गौर करें कि केंद्र सरकार द्वारा रीअल एस्‍टेट के क्षेत्र में वर्षों से चली आ रही इसी प्रकार की धोखाधड़ी को रोकने के लिए रीअल एस्‍टेट बिल में किए गए बंदोबस्‍तों पर और जानें कि किस प्रकार Techman Group का यह विज्ञापन ऐसे गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है जिसके लिए अच्‍छा-खासा जुर्माना तथा जेल की सजा दोनों मुकर्रर हैं:
1-नए रीअल एस्‍टेट बिल में व्‍यवस्‍था की गई है कि बिल्डर जो पैसा खरीदार अर्थात् उपभोक्‍ता से लेते हैं, उस राशि का 70 प्रतिशत हिस्सा उन्हें अलग बैंक में रखना होगा और इस पैसे का इस्तेमाल सिर्फ उसी प्रोजेक्‍ट में करना होगा जिसके लिए पैसा लिया गया है।
2-नए बिल में यह सुनिश्‍चित किया गया है कि बिल्डर को प्रोजेक्ट संबंधी संपूर्ण जानकारी जैसे प्रोजेक्ट का ले-आउट क्या है, मंज़ूरी कब व कैसे मिली, ठेकेदार कौन है, इंजीनियर कितने व कौन-कौन हैं, प्रोजेक्ट की मियाद क्या है, काम कब तक पूरा होगा, आदि अनिवार्य तौर पर देनी होगी।
3-बिल्डर अगर पूर्व घोषित समय तक निर्माण कार्य पूरा नहीं करता तो उसे उसी दर पर ख़रीदार को ब्याज़ का भुगतान करना होगा जिस दर पर वो ख़रीदार से भुगतान में किसी चूक के बाद ब्याज़ वसूलता है।
4-कोई भी बिल्डर अपनी सम्पत्ति को ‘सुपर एरिया’ के आधार पर नहीं बेच सकेगा जिसमें फ्लैट के अंदर का हिस्सा और बाहर का साझा भाग जैसे लिफ्ट और कार पार्किंग वगैरह शामिल होते हैं। अब कार्पेट एरिया लिखना अनिवार्य होगा।
5-कोई बिल्डर अगर रियल एस्टेट रेग्यूलेटरी अथॉरिटी के आदेश की अवहेलना करता है तो उसे जेल की सजा हो सकती है और जुर्माना भी भरना पड़ सकता है।
6-इसके अलावा बिल्‍डर को ख़रीदारों के हाथ में फ्लैट आने के तीन महीने के भीतर रेज़ीडेंट वेलफेयर एसोसिएशन का गठन करना होगा ताकि वे सारी सुविधाओं की देखभाल कर सकें।
7-अथॉरिटी की वेबसाइट के माध्यम से प्रोजेक्ट संबंधी वो सभी जरूरी, सामान्‍य तथा महत्वूपर्ण जानकारियां खरीदार को देनी होंगी, जिनके लिए वह अब तक केवल प्रोजेक्ट निर्माता पर निर्भर था।
8-प्रोजेक्ट में तब तक कोई बदलाव नहीं किया जा सकता जब तक की खरीदार की अनुमति न हो। यह सभी व्‍यावसायिक और आवासीय रियल एस्‍टेट परियोजनाओं पर लागू होगा। यह नियम अंडर कंस्‍ट्रक्‍शन एवं 2016 में कंप्‍लीट प्रोजेक्‍ट पर भी लागू होगा।
9-नगर निकाय व अन्‍य प्रशासनिक कार्यालयों से मंजूरी लिये बगैर बिल्‍डर किसी प्रीलॉन्‍च प्रोजेक्‍ट के विज्ञापन नहीं दे सकेंगे। प्रोजेक्ट लॉन्च होते ही बिल्डर्स को प्रोजेक्ट से संबंध‍ित पूरी जानकारी अपनी वेबसाइट पर भी देनी होगी। इसके साथ ही प्रोजेक्ट में रोजाना होने वाले अपडेट के बारे में भी वेबसाइट पर सूचित करना जरूरी कर दिया गया है।
10-बिल्‍डर यदि प्रोजेक्‍ट के विज्ञापन में किए गए किसी वायदे को पूरा नहीं करता है तो उसे 3 से 5 साल तक की जेल और जुर्माना या दोनों एकसाथ भुगतनी पड़ सकती हैं।
नए रीअल एस्‍टेट बिल में की गई इन सभी व्‍यवस्‍थाओं के अनुसार Techman Group ने न तो अपने विज्ञापन में प्रोजेक्‍ट की किसी जानकारी का खुलासा किया है और न उसकी समय सीमा का जिक्र किया है।
ग्रुप ने अपनी वेबसाइट पर भी नए बिल के अनुसार जरूरी जानकारियां उपलब्‍ध नहीं कराई हैं। जिस हर्ष प्रोजेक्‍ट का विज्ञापन में उल्‍लेख है, उसके बारे में तो वेबसाइट पर COMING SOON का बोर्ड लटका है।
विज्ञापन में लिखा है कि MIP में HOME LOAN ब्‍याज के साथ Allottee की हर महीने इनकम भी। Allottee को यह इनकम कैसे होगी, यह समझ से परे है।
जब Allottee के ही बुकिंग एमाउंट पर सवा रुपया सैकड़ा के हिसाब से ब्‍याज दिया जाएगा और उसी को दिलाए गए होम लोन की ब्‍याजभर उसे दी जाएगी तो उसकी अपनी इनकम कैसे हुई ?
इस विज्ञापन का सबसे महत्‍वपूर्ण और ध्‍यान देने लायक पहलू यह है कि विज्ञापन में Allottee की मासिक आय बैंक की FD से दोगुनी होने का दावा किया गया है जो पूरी तरह भ्रामक और गुमराह करके लोगों को अपने जाल में फंसाने का प्रयास है।
ऐसा लगता है कि नए रीअल एस्‍टेट बिल और उसमें निहित नियम-कानून को ताक पर रखकर Techman Group द्वारा दिए गए इस भ्रामक विज्ञापन में उन बैंकों की भी पूरी सहमति है जिनके लोगो इस्‍तेमाल करते हुए ग्रुप ने इनसे लोन कराने की सुविधा का हवाला दिया है। अन्‍यथा यह कैसे संभव है कि जिस विज्ञापन में बैंक की एफडी से अधिक आमदनी कराने का दावा किया गया हो, उस विज्ञापन पर संबंधित बैंकों को कोई आपत्‍ति ही न हो।
सच तो यह है कि इस पूरे विज्ञापन का मकसद Techman Group द्वारा लोगों को अपने जाल में फंसाना और बैंक की एफडी से अधिक आमदनी का लालच देकर उनकी खुद की पूंजी को अपने प्रोजेक्‍ट में इस्‍तेमाल करना है।
यदि ग्रुप की नीयत साफ होती तो वह नए नियमों का पालन करते हुए विज्ञापन में सभी बातों का खुलासा करता तथा बताता कि कौन सा प्रोजेक्‍ट कब तक पूरा होगा, साथ ही यह भी साफ करता कि Allottee के अपने बुकिंग एमाउंट पर सवा रुपए सैकड़े की ब्‍याज तथा होम लोन की ब्‍याज का मासिक भुगतान किस तरह उसकी आमदनी हुई।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

रविवार, 3 जुलाई 2016

राजनीति: सफलता की शत-प्रतिशत गारंटी वाला कारोबार

भारत में राजनीति ही एक ऐसा कारोबार है जो शत-प्रतिशत सफलता की गारंटी देता है। राजनीति के अलावा दूसरा कोई ऐसा कारोबार नहीं जो किसी को सीधे फर्श से अर्स पर बैठाने की गारंटी देता हो।
यकीन न हो तो गौर करें हाल ही में आई इस रिपोर्ट पर:
स्‍वतंत्रता मिलने के 68 सालों बाद तक जिस देश में करोड़ों लोग दो जून की रोटी कमाने के लिए हाड़तोड़ मेहनत करते हों और उसके लिए भी मनरेगा की दिहाड़ी पर निर्भर हों…जिस देश में रोटी, कपड़ा तथा मकान जैसी आवश्‍यक आवश्‍यकताओं की पूर्ति भी कुल जनसंख्‍या के एक बड़े हिस्‍से के लिए कोई बड़ा सपना साकार हो जाने के बराबर हो…जिस देश की आबादी के एक बड़े हिस्‍से को स्‍वच्‍छ पेयजल तक मुहैया कराने में सरकारें असमर्थ हों और जिस देश के लाखों गांव आज तक बिजली की रौशनी से महरूम हों, उस देश में किसी एक व्‍यक्‍ति के पास सैकड़ों करोड़ रुपए की संपत्‍ति होने का पता लगने पर कैसा महससूस होता है, यह वही बता सकता है जो सरकारी सस्‍ते गल्‍ले की दुकान से सस्‍ता राशन खरीदने के लिए उम्र के चौथे पड़ाव में कभी राज्‍य स्‍तरीय नेताओं के घर पर धरना देता है तो कभी केंद्रीय गृहमंत्री के दर पर जाकर बैठ जाता है क्‍योंकि उसका राशन कार्ड नहीं बना।
हाल ही में एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म द्वारा कराए गए एक सर्वे से पता लगा है कि गत दिनों राज्‍यसभा के लिए चुने गए लगभग सभी 57 सदस्‍य करोड़पति हैं। इनमें से 13 सदस्यों के खिलाफ आपराधिक केस चल रहे हैं।
करोड़पति सदस्‍यों की इस लिस्‍ट में ऐसे भी हैं जिनकी संपत्‍ति सैकड़ों करोड़ रुपए है। मसलन कांग्रेसी नेता प्रफुल्‍ल पटेल 252 करोड़ रुपए की संपत्‍ति के स्‍वामी हैं जबकि कांग्रेस के ही कपिल सिब्‍बल 212 करोड़ रुपए की संपत्‍ति के मालिक हैं। बहुजन समाज पार्टी के नेता सतीश मिश्रा के पास 193 करोड़ रुपए की संपत्‍ति है। सतीश मिश्रा के साथ एक और खासियत यह जुड़ी हुई है कि उनकी संपत्‍ति में 698 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। मिश्रा की संपत्ति पहले 24.18 करोड़ थी।
भाजपा के अनिल दवे की संपत्‍ति में रिकॉर्ड तोड़ इजाफा हुआ है। इनकी संपत्‍ति 2,111 प्रतिशत बढ़ी है, बावजूद इसके अनिल दवे सबसे गरीब सदस्‍य हैं। इनकी कुल संपत्‍ति 60.97 लाख है जो पूर्व में 2 लाख 75 हजार रुपए हुआ करती थी। शिवसेना के संजय राउत की संपत्ति में 841 प्रतिशत की बढ़ोत्‍तरी हुई है। राउत की संपत्‍ति 1.51 करोड़ से बढ़कर 14.22 करोड़ हो गई है।
इस सर्वेक्षण में सामने आया कि राज्यसभा के 13 सदस्यों के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज हैं। इनमें से सात लोगों के खिलाफ गंभीर अपराध जैसे मर्डर, धोखाधड़ी, प्रॉपर्टी से जुड़ी बेईमानी और चोरी जैसे केस दर्ज हैं। भाजपा के 3, सपा के 2, कांग्रेस, बीजेडी, बसपा, आरजेडी, डीएमके, शिवसेना और वाईएसआरसीपी के एक सदस्यों के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज हैं।
यूपी के 11 राज्यसभा सदस्यों में 4 के खिलाफ केस दर्ज हैं, बिहार के 5 सदस्यों में से 2, महाराष्ट्र के 6 सदस्यों में से 1, तमिलनाडु के 6 सदस्यों में से एक, कनार्टक के 4 सदस्यों में से 1, आंध्रप्रदेश के 4 सदस्यों में से 1, मध्यप्रदेश के 3 सदस्यों में से 1, उड़ीसा के 3 सदस्यों में से 1 और हरियाणा के 2 सदस्यों में से 1 के खिलाफ केस दर्ज हैं।
बताया जाता है कि पेशे से वकील और कांग्रेस के नेता पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्‍बल की देश में कई पशु वधशालाएं हैं। वह मांस का बड़े पैमाने पर निर्यात करते हैं। मांस का यह कारोबार खुद उनके नाम है अथवा पत्‍नी या बच्‍चों के नाम, इसका तो पता नहीं अलबत्‍ता 212 करोड़ रुपए की जो संपत्‍ति सामने आई है वह उनके अपने नाम है।
इसी प्रकार दूसरे कांग्रेसी नेता प्रफुल्‍ल पटेल का भी निश्‍चित ही कोई न कोई करोबार होगा और उन्‍होंने उस पार्ट टाइम कारोबार में राजनीति के फुल टाइम व्‍यापार से कमाया गया पैसा निवेश किया होगा। हालांकि यह मात्र अंदाज है क्‍योंकि सर्वेक्षण में इसका कहीं कोई जिक्र नहीं है कि इन माननीयों की संपत्‍ति का स्‍त्रोत आखिर क्‍या है। बसपा के जिन माननीय राज्‍यसभा सदस्‍य सतीश मिश्रा के संपत्‍ति में 698 प्रतिशत का इजाफा हुआ है और वह 24.18 करोड़ की संप्‍पति से छलांग लगाकर सीधे 193 करोड़ रुपए की संपत्‍ति के मालिक बन गए हैं, उनके बारे में प्राप्‍त जानकारी के अनुसार वह भी पेशेवर वकील हैं और बसपा की नाक के बाल बनने से पहले कानपुर में वकालत ही किया करते थे।
एक ओर देश में कालेधन को लेकर अकसर चर्चाएं होती रहती हैं और 2014 के उस चुनावी वायदे को मुद्दा बनाया जाता है जिसके तहत भाजपा नेताओं ने कालेधन को देश में लाकर प्रत्‍येक भारतीय के खाते में 15 लाख रुपए से ऊपर की रकम आने की बात कही थी लेकिन दूसरी ओर माननीयों की संपत्‍ति पर किसी स्‍तर से कोई टीका-टिप्‍पणी तक नहीं होती।
कालेधन पर शोर मचाने वालों में आज के विपक्षी नेताओं से लेकर सत्‍ताधारी भाजपा के वो नेता भी शामिल हैं जो कभी विपक्षी हुआ करते थे किंतु माननीयों की संपत्‍ति पर सवाल पूछने वाला कोई नहीं।
अगर यह मान भी लिया जाए कि माननीयों ने यह संपत्‍ति अपने फुल टाइम कारोबार राजनीति से पार्ट टाइम किसी उद्योग या व्‍यापार में निवेश करके कमाई है, तो भी बड़ा सवाल यह खड़ा होता है कि आखिर यह कौन सा ऐसा उद्योग-व्‍यापार करते हैं जो इनके लिए सोने की खान साबित होता है।
दिमाग में सवाल यह भी कौंधता है कि जहां विजय माल्‍या जैसे लिकर किंग को कारोबार में घाटे के चलते देश छोड़कर भागना पड़ता है, सुब्रत राय सहारा जैसों को पब्‍लिक का पैसा न लौटा पाने के कारण 2 साल से अधिक का समय तिहाड़ जेल में गुजारना पड़ता है, रिलायंस के मालिक अंबानियों से लेकर जेपी ग्रुप के स्‍वामियों तक का बाल-बाल कर्ज में डूबा हुआ है, वहां राजनीति के इन कारोबारियों का व्‍यापार इतनी तेजी से छलांग कैसे लगा रहा है कि किसी की संपत्‍ति 698 प्रतिशत बढ़ गई तो किसी की 2,111 प्रतिशत।
आश्‍चर्य की बात यह है कि सामान्‍य तौर पर जनता के सामने परस्‍पर कुत्‍ते-बिल्‍ली जैसे स्‍वाभाविक व प्राकृतिक वैर-भाव का प्रदर्शन करने वाले विभिन्‍न राजनीतिक दलों के नेता अपनी संपत्‍ति के मामले में चोर-चोर मौसेरे भाई की कहावत को चरितार्थ करते हैं।
यहां इनका प्रेम उसी तरह दिखाई देता है जिस तरह वेतन-भत्‍ते बढ़ाने के मामले में संसद अथवा विधानसभाओं के अंदर दिखाई देता रहा है। तब इनके बीच न कोई मतभेद होता है और न मनभेद। उस समय इनका आचार-व्‍यवहार उस सहोदर जैसा हो जाता है जिनके बीच उम्र व अनुभव का फासला भले ही हो किंतु जिन्‍होंने जन्‍म एक ही मां की कोख से लिया हो।
राज्‍यसभा के लिए नव निर्वाचित इन माननीयों की संपत्‍ति का ब्‍यौरा सामने आने पर यह पता जरूर लगता है कि क्‍यों कोई बड़ा वकील अपनी अच्‍छी-खासी प्रेक्‍टिस छोड़कर मौका मिलते ही फुलटाइमर राजनीतिज्ञ बन जाता है क्‍यों करोड़ों-अरबों का व्‍यापार करने वाले भी करोड़ों खर्च करके राजनीति का हिस्‍सा बनने को बेताब रहते हैं।
दरअसल, आज की राजनीति न केवल आर्थिक रुप से संपन्‍न होने की गारंटी देती है बल्‍कि तमाम ऐसे कार्यों से भी साफ बच निकलने का आश्‍वासन देती है जो गंभीर अपराध की श्रेणी में आते हैं।
तभी तो सामान्‍य तौर पर जहां 323, 504 या 506 की धाराओं का आरोपी भी तत्‍काल पुलिस की हिरासत का हकदार बन जाता है वहीं रॉबर्ट वाड्रा, ललित मोदी तथा विजय माल्‍या जैसे आर्थिक अपराधी तमाम जांचों का हिस्‍सा होने के बावजूद फेसबुक व टि्वटर के माध्‍यम से कानून के साथ खेलते रहते हैं और उन्‍हें छूने तक की हिमाकत कोई नहीं कर पाता।
देश का विदेशों में छिपा काला धन जब बाहर आयेगा, तब आयेगा किंतु यदि देश के अंदर छिपे काले धन का ही पता लगा लिया जाए और उसके उन स्‍त्रोतों की जानकारी सार्वजनिक कर दी जाए जिनसे किसी की संपत्‍ति में 698 प्रतिशत का इजाफा हो जाता है तो किसी की संप्‍पति 2,111 प्रतिशत के अनुपात से बढ़ जाती है, तो निश्‍चित ही जनसामान्‍य को कुछ न मिलकर भी बहुत कुछ मिल जायेगा।
यूं भी समय-समय पर यह चर्चा का विषय रहा है कि बाहर छिपे कालेधन से अधिक देश के अंदर ही कालाधान मौजूद है, बस जरूरत है तो उसे बाहर निकालने के लिए दृढ़ इच्‍छाशक्‍ति की और दलगत राजनीति से ऊपर उठकर ठोस कानूनी कार्यवाही करने की।
हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने एक चैनल को दिए गए इटरव्‍यू के दौरान कहा था कि देश के अंदर खुशहाली लाने तथा कानून-व्‍यवस्‍था को पूरी तरह चुस्‍त-दुरुस्‍त बनाने तक का मंत्र विकास में छिपा है। विकास होगा तो लोग सुखी व संपन्‍न होंगे…और लोग सुखी व संपन्‍न होंगे तो देश खुशहाल होगा।
हो सकता है प्रधानमंत्री का कथन कुछ हद तक सही हो लेकिन यह शत-प्रतिशत सफलता की गारंटी नहीं देता। यदि ऐसा होता तो पूर्ण विकसित कहलाने वाले देशों में कभी कोई अपराध होता ही नहीं और उनके सामने किसी किस्‍म की कोई समस्‍या भी कभी खड़ी नहीं होती।
देश को खुशहाल बनाने की गारंटी केवल ऐसी ही व्‍यवस्‍था दे सकती है जिसमें आय के स्‍त्रोत पूरी तरह पारदर्शी हों। लोगों के बीच की आय में जमीन-आसमान का अंतर न हो और यदि हो तो उसके कारण ज्ञात हों, सार्वजनिक हों। जनसामान्‍य को भी पता हो कि यदि किसी की आय में अप्रत्‍याशित वृद्धि हुई है तो कैसे हुई है। वह प्रति वर्ष सरकार को कितना राजस्‍व देता रहा है। उसकी आमदनी का जरिया गैरकानूनी तो नहीं है।
यदि ऐसा होता है तो निश्‍चित ही देश विकास के मार्ग पर दौड़ेगा और कानून-व्‍यवस्‍था की स्‍थिति में भी उल्‍लेखनीय सुधार होगा।
हाल ही में राज्‍यसभा के लिए चुने गए ये 57 माननीय तो फर्श से अर्स तक की द्रुतगति से यात्रा करने वालों की नजीर भर हैं, कड़वा सच तो यह है कि राजनीति आज देश के सबसे सुरक्षित व सफल कारोबार में तब्‍दील हो चुकी है। ऐसा न होता तो कल तक साइकिल या स्‍कूटर पर घूमने वाला कोई शख्‍स एक बार की विधायकी के बाद ही अचानक कैसे करोड़ों की संपत्‍ति का मालिक बन जाता है। कैसे बिना कोई वेतन भत्‍ता पाए किसी नगर पालिका का कोई अध्‍यक्ष और यहां तक कि मामूली सा उसका कोई सदस्‍य भी अपने कार्यकाल का एक टर्म पूरा करते ही करोड़ों में खेलने लगता है।
यही हाल नगर पंचायतों व जिला पंचायतों तक पहुंचने वाले माननीयों का है। कश्‍मीर से लेकर कन्‍या कुमारी तक फैले देश में बहुत सी विविधताएं देखने को मिल सकती हैं किंतु राजनीति से प्राप्‍त ऐसी सुव्‍यवस्‍था में कहीं कोई अंतर दिखाई नहीं देता।
मोदी जी को चाहिए कि यदि वास्‍तव में देश को खुशहाल देखना है और कानून का राज स्‍थापित करना है तो सबसे पहले ऐसी बड़ी मछलियों के खिलाफ कार्यवाही करने की ठोस व्‍यवस्‍था करें जो समाज के सामने अव्‍यवस्‍था का प्रत्‍यक्ष उदाहरण बनी हुई हैं। जिनकी संपत्‍ति के बारे में जानकर जनसामान्‍य का मुंह आश्‍चर्य से खुले का खुला रह जाता है।
लाख रुपया कभी अपनी आंखों से न देख पाने वाला देश का एक बड़ा तबका जब अपने ही माननीयों पर सैकड़ों करोड़ की संपत्‍ति का समाचार पढ़ता है और किसी की तरक्‍की का प्रतिशत 698 तो किसी का 2111 सुनता है तो उसके दिल में कहीं न कहीं टीस जरूर पैदा होती है। यही वो टीस है जिससे राजनेताओं के प्रति घृणा का भाव पैदा होता है और कानून सबके लिए बराबर है के रटे-रटाए जुमले पर से भरोसा उठना शुरू होता है।
विकास को ही सुख का एकमात्र मंत्र मानने वाले मोदी जी, विनाश का कारण बने इस आर्थिक भेद पर भी ध्‍यान दें तो संभवत: तरक्‍की का मार्ग तेजी से प्रशस्‍त होगा अन्‍यथा उनके सारे प्रयास पानी को तलवार से काटने की कोशिश बनकर रह जायेंगे क्‍योंकि समस्‍या पैसा नहीं, पैसे से पैदा होने वाला वह भेदभाव है जो अनेक विसंगतियों का वाहक है तथा जिसके कारण समाज का हर वर्ग येन-केन प्रकारेण सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाना चाहता है।

-Surendra chaturvedi

गुरुवार, 30 जून 2016

BSP के सतीश मिश्रा की संपत्‍ति में 698 प्रतिशत का इजाफा

नई दिल्‍ली। Rajya Sabha के लिए चुने गए 57 नए सदस्यों में से यूं तो लगभग सभी करोड़पतियों की श्रेणी में हैं लेकिन BSP के सतीश मिश्रा की संपत्‍ति में 698 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। इनमें प्रफुल्ल पटेल, कपिल सिब्बल और सतीश चंद्र मिश्रा सबसे ऊपर हैं। इनमें से करीब 55 सदस्य यानि 96 प्रतिशत करोड़पति हैं। इनमें से 13 सदस्यों के खिलाफ आपराधिक केस चल रहे हैं।
इन सांसदों के पास सबसे ज्यादा संपत्ति
ये सर्वेक्षण एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म की ओर से किया गया। इसके अनुसार प्रफुल्ल पटेल के पास करीब 252 करोड़ रुपए की संपत्ति है, वहीं कपिल सिब्बल के पास 212 करोड़ और बीएसपी के सतीश चंद्र मिश्रा के पास 193 करोड़ रुपए की संपत्ति आंकी गई है। राज्यसभा के नवनिर्वाचित सभी सदस्यों के पास औसतन 35.84 करोड़ रुपए की संपत्ति है।
इनकी संपत्ति में सबसे ज्यादा हुई बढ़ोत्‍तरी
बीजेपी के अनिल दवे की आय सबसे ज्यादा बढ़ी है। इनकी संपत्ति करीब 2,111 प्रतिशत बढ़ी है। 2.75 लाख से ये 60.97 लाख हो गई है। शिवसेना के संजय राउत की संपत्ति में 841 प्रतिशत की बढ़ोत्‍तरी हुई है। ये 1.51 करोड़ से बढ़कर 14.22 करोड़ हो गई है। मिश्रा की संपत्ति करीब 698 प्रतिशत बढ़ी है। मिश्रा की संपत्ति पहले 24.18 करोड़ थी जो अब 193 करोड़ रुपए हो गई है।
13 सदस्यों के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज
इस सर्वेक्षण में सामने आया कि राज्यसभा के 13 सदस्यों के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज हैं। इनमें से सात लोगों के खिलाफ गंभीर अपराध जैसे मर्डर, धोखाधड़ी, प्रॉपर्टी से जुड़ी बेईमानी और चोरी जैसे केस दर्ज हैं। भाजपा के 3, सपा के 2, कांग्रेस, बीजेडी, बसपा, आरजेडी, डीएमके, शिवसेना और वाईएसआरसीपी के एक सदस्यों के खिलाफ आपराधिक केस दर्ज हैं।
यूपी के 11 राज्यसभा सदस्यों में 4 के खिलाफ केस दर्ज है, बिहार के 5 सदस्यों में से 2, महाराष्ट्र के 6 सदस्यों में से 1, तमिलनाडु के 6 सदस्यों में से एक, कनार्टक के 4 सदस्यों में 1, आंध्रप्रदेश के 4 सदस्यों में 1, मध्यप्रदेश के 3 सदस्यों में से 1, उड़ीसा के3 सदस्यों में से 1 और हरियाणा के 2 सदस्यों में से 1 के खिलाप केस दर्ज है। सबसे कम संपत्ति बीजेपी के अनिल माधव दवे के पास 60 लाख दर्ज हुई है।

सोमवार, 27 जून 2016

चुल्‍लू पर पानी में डूब कर मर क्‍यों नहीं जाते ये जन-प्रतिनिधि!

चुल्‍लू पर पानी में डूब कर मर क्‍यों नहीं जाते ये जन-प्रतिनिधि।!
माफ कीजिए…माननीयों के प्रति ये शब्‍द हमारे नहीं, उस जनता के हैं जिसे जनार्दन यानि भगवान का दर्जा प्राप्‍त है।
जनता का यह आक्रोश इसलिए और मायने रखता है कि यूपी में चुनाव होने जा रहे हैं और लगभग हर राजनीतिक दल मिशन 2017 को फतह करने की पूरी तैयारी में जुटा है।
ऐसे में सवाल यह उठता है कि जिन अपने जन-प्रतिनिधियों को सामान्‍यत: जनता जनार्दन सिर-आंखों पर बैठाए रहती है और उनके लिए पलक पांवड़े बिछाए रहती है, उनके प्रति उसके मन में इतना आक्रोश क्‍यों भर गया?
इस जनआक्रोश की वजह है विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक जनपद मथुरा में अघोषित विद्युत कटौती से उपजे वो हालात जिन्‍होंने लोगों की रातों की नींद तथा दिन का चैन, सब छीन लिया है। न लोग रात में चैन से सो पाते हैं और न दिन में अपना काम सुचारू रख पाते हैं लेकिन जन-प्रतिनिधि हैं कि विकराल होती इस जन समस्‍या के बावजूद पूरी तरह चुप्‍पी साधे बैठे हैं। किसी राजनीतिक दल के किसी जन-प्रतिनिधि ने इस इतनी बड़ी समस्‍या पर कोई आंदोलन, धरना या प्रदर्शन करना जरूरी नहीं समझा लिहाजा बिजली विभाग के अधिकारी पूरी तरह मनमानी पर उतरे हुए हैं।
गांव-देहात की बात तो दूर, जिला मुख्‍यालय में शहर के अंदर प्रतिदिन 10 से 12 घंटे की बिजली कटौती की जा रही है। बिजली का मिनीमन बिल तो हर कनैक्‍शन पर निर्धारित है किंतु मिनीमम सप्‍लाई निर्धारित नहीं है। सप्‍लाई पूरी तरह बिजली अधिकारी एवं कर्मचारियों के रहमो-करम पर निर्भर है।
घोर आश्‍चर्य की बात यह है कि बिजली चाहे आठ घंटे आए अथवा दस घंटे किंतु बिल हर महीने बढ़कर ही आता है। बिजली विभाग का यह कारनामा जनता के जले पर नमक छिड़कने का काम कर रहा है।
अब जरा गौर करें विकराल होती इस जनसमस्‍या को लेकर जन-प्रतिनिधियों के रवैये पर ।
इसमें सबसे पहला नंबर आता है जिले की जन-प्रतिनिधि सांसद हेमा मालिनी का। अभिनेत्री से भाजपा नेत्री बनी हेमा मालिनी अपने संसदीय क्षेत्र मथुरा के लोगों को टीवी पर आरओ सिस्‍टम अथवा बाबा रामदेव के बिस्‍किट बेचते ही नजर आती हैं।
हाल ही में हुए जवाहर बाग कांड का जायजा लेने भी वह तब मथुरा आईं जब उनकी अपनी पार्टी के बड़े नेताओं सहित देशभर से उन्‍हें लानत-मलानत भेजीं जाने लगीं, वर्ना वह तो टि्वटर पर अपनी फिल्‍मी शूटिंग के चित्र शेयर करने में मशगूल थीं।
2014 के लोकसभा चुनावों में भारी बहुमत से जीत दर्ज करने के बाद कभी याद नहीं आता कि बतौर सांसद हेमा मालिनी ने अपने संसदीय क्षेत्र की किसी जनसमस्‍या को लेकर कोई स्‍टैप उठाया हो। मथुरा के लिए सही मायनों में वह आज भी स्‍वप्‍न सुंदरी ही बनी हुई हैं।
इसके बाद नंबर आता है मथुरा-वृंदावन क्षेत्र के कांग्रेसी विधायक प्रदीप माथुर का। इन दिनों जब उनके क्षेत्र की जनता बिजली की किल्‍लत से त्राहि-त्राहि कर रही है, तब वह लखनऊ में मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव के साथ बैठकर इफ्तार पार्टी की दावत खाते तो दिखाई देते हैं लेकिन शहर में या शहर के लिए कुछ करते दिखाई नहीं देते।
कहने को प्रदीप माथुर के कांग्रेसी विधायक होने के बावजूद मुख्‍यमंत्री अखिलेश यादव से बहुत अच्‍छे संबंध हैं और उनके चाचा शिवपाल यादव से घनिष्‍ठता के चलते वह आए दिन कहीं न कहीं नारियल फोड़ते रहते हैं किंतु जब बात आती है विद्युत समस्‍या के समाधान की तो प्रदीप माथुर अचानक विपक्षी दल के विधायक हो जाते हैं।
इसी कड़ी में तीसरा नंबर आता है जिले की राजनीति में चाणक्‍य की उपमा प्राप्‍त पंडित श्‍यामसुंदर शर्मा का। 6 बार के विधायक तथा पूर्व कबीना मंत्री श्‍यामसुंदर शर्मा का चुनाव क्षेत्र भले ही मांट हो लेकिन रहते वो शहर में ही हैं। शहर में रहते हुए शहर की विस्‍फोटक होती बिजली समस्‍या को उन्‍होंने भी कभी गंभीरता से नहीं लिया। ऐसे में यह अंदाज लगाना कोई बहुत मुश्‍किल नहीं कि अपने क्षेत्र मांट की इस समस्‍या को वह कितनी गंभीरता से लेते होंगे। संभवत: यही कारण है कि मांट विधानसभा क्षेत्र में अजेय समझे जाने वाले श्‍यामसुंदर शर्मा को पिछली बार हार का मुंह देखना पड़ा। श्‍याम को शिकस्‍त देने वाले रालोद युवराज जयंत चौधरी ने यदि लोकसभा की सदस्‍यता बनाए रखने के लिए विधानसभा की सदस्‍यता से त्‍यागपत्र न दिया होता और जयंत के इस कदम से नाराजगी के चलते श्‍यामसुंदर शर्मा को उप चुनाव में जीत हासिल न हुई होती आज वह पूर्व विधायक बने बैठे होते। श्‍यामसुंदर शर्मा ने हाल ही में एकबार फिर बसपा ज्‍वाइन की है ताकि 2017 के आगामी चुनावों में कोई ऊंच-नीच न हो जाए किंतु यदि जनसमस्‍याओं के प्रति उनकी उदासीनता इसी प्रकार बनी रही तो चौंकाने वाला निर्णय भी सामने आ सकता है।
चौथा नंबर है राष्‍ट्रीय लोकदल के अब एकमात्र शेष विधायक पूरन प्रकाश का। जनपद की सुरक्षित गोकुल सीट से विधायक पूरन प्रकाश यूं तो काफी अनुभवी व सभ्रांत राजनीतिज्ञ माने जाते हैं लेकिन बिजली जैसी समस्‍या के समाधान हेतु उनका भी कोई योगदान आजतक सामने नहीं आया। अन्‍य विधायकों की तरह रहते वह भी शहर के सबसे महंगे इलाके कृष्‍णा नगर में हैं लेकिन शहर या कृष्‍णा नगर के लिए भी उन्‍होंने ऐसा कुछ नहीं किया जिसका उल्‍लेख किया जा सके। ऐसा लगता है जैसे विरासत में मिली राजनीति का तो पूरन प्रकाश पूरा मजा ले रहे हैं किंतु अपने स्‍वर्गीय पिता मास्‍टर कन्‍हैया लाल की इस सीख पर अमल नहीं कर रहे कि जनसेवा का ही दूसरा नाम राजनीति है। यही कारण है कि पूरन प्रकाश जनता के बीच उतना मान-सम्‍मान कभी हासिल नहीं कर पाए जितना उनके पिता ने बतौर विधायक ताजिंदगी हासिल किया।
पूरन प्रकाश पर भी वही बात लागू होती है कि जब वो अपने निवास वाले क्षेत्र की विद्युत समस्‍या के समाधान को कुछ नहीं कर रहे तो अपने चुनाव क्षेत्र के लिए क्‍या कर रहे होंगे। जाहिर है उनके भी चुनाव क्षेत्र की बिजली के मामले में स्‍थिति दूसरे देहाती इलाकों से अलग कुछ नहीं होगी।
जनपद के पांचवें जनप्रतिनिधि हैं ठाकुर तेजपाल सिंह। कई बार की विधायकी और मंत्री पद पर भी रह लेने का अनुभव प्राप्‍त छाता क्षेत्र के ये विधायक शहर के दूसरे पॉश इलाके मयूर बिहार स्‍थित अपनी आलीशान कोठी में रहते हैं। ठाकुर तेजपाल सिंह ने आगामी चुनावों में अपनी विधायकी बरकरार रखने के लिए तो काफी समय पहले से ही राजनीतिक गुणा-भाग के तहत रालोद छोड़ बसपा का दामन थाम लिया और उससे भी पहले अपने पुत्र को बसपा ज्‍वाइन करा दी किंतु जन समस्‍याओं से उनका भी सरोकार दूसरे विधायकों की तरह ही है। बिजली की समस्‍या के समाधान को आजतक उन्‍होंने कुछ ऐसा नहीं किया जिसका जिक्र किया जा सके। शहर में रहते हुए वह शहर की इस भीषण समस्‍या से कोई वास्‍ता नहीं रखते। सर्वविदित है कि जनपद के औद्योगिक क्षेत्र से सटा होने के बावजूद उनका अपना छाता चुनाव क्षेत्र आजतक बिजली की समस्‍या से मुक्‍त नहीं हो पाया। तब भी नहीं जब ठाकुर तेजपाल सिंह प्रदेश के कद्दावर मंत्रियों में शुमार किए जाते थे।
जन-प्रतिनिधियों की श्रृंखला में आखिरी नाम आता है गोवर्धन क्षेत्र से बसपा के विधायक राजकुमार रावत का। दो बार के विधायक राजकुमार रावत कहने को तो जिले के सबसे युवा रानीतिज्ञ हैं और इसलिए काफी सक्रिय माने जाते हैं लेकिन यदि बात करें बिजली समस्‍या के समाधान में उनके अपने किसी योगदान की तो बताने को कुछ नहीं है। वह अकेले ऐसे विधायक हैं जो मथुरा के यमुना पार क्षेत्र में रहते हैं लेकिन न तो यमुना पार क्षेत्र की विद्युत समस्‍या आज तक ठीक करा पाए और न अपने चुनाव क्षेत्र गोवर्धन की, जबकि गोवर्धन की गिनती विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक क्षेत्रों में होती है। लक्‍खी मेले का खिताब प्राप्‍त मुड़िया पूर्णिमा के अलावा गोवर्धन को शायद ही कभी अबाध विद्युत आपुर्ति की गई हो अथवा कभी राजकुमार रावत ने वहां की इस समस्‍या के समाधान का कोई गंभीर प्रयास किया हो।
सत्‍ताधारी दल समाजवादी पार्टी चूंकि आजतक कभी मथुरा में अपना खाता ही नहीं खोल पाई इसलिए उसका कोई जन-प्रतिनिधि यहां नहीं हैं अलबत्‍ता नेताओं की कोई कमी भी नहीं है।
समाजवादी पार्टी के जिलाध्‍यक्ष पद पर काबिज तुलसीराम शर्मा का हाल कुछ ऐसा है जैसा चुनावों के दौरान किसी डमी प्रत्‍याशी का होता है।
वह लिखा-पढ़ी में तो सत्‍ताधारी दल के जिलाध्‍यक्ष पद को सुशोभित कर रहे हैं किंतु जन समस्‍याओं से उनका दूर-दूर तक कोई वास्‍ता कभी रहा नहीं। अलबत्‍ता उनकी कार्यप्रणाली किसी कबीना मंत्री सरीखी है जिनका मोबाइल फोन तक उनके शागिर्द लेकर चलते हैं, और जिससे बात कराना चाहते हैं उससे कराते हैं और जिससे बात नहीं कराना चाहते वह चाहे पूरे दिन कोशिश करता रहे, कराते ही नहीं हैं।
ऐसा लगता है जैसे वह ठान बैठे हों कि मथुरा में समाजवादी पार्टी का खाता इस बार भी खुलने नहीं देंगे। ऐसे में उनसे बिजली की भीषण होती समस्‍या के समाधान हेतु कुछ करने की उम्‍मीद लगाना, अपनी अक्‍ल पर सवालिया निशान लगाने जैसा है।
समाजवादी पार्टी में दूसरे अहम् पद को सुशोभित कर रहे डॉ. अशोक अग्रवाल जरूर हाथ-पैर मारते दिखाई देते हैं किंतु उनके प्रयास फलीभूत होंगे, इसकी संभावना काफी कम है।
सपा के महानगर अध्‍यक्ष पद पर काबिज डॉ. अशोक अग्रवाल चूंकि मथुरा-वृंदावन क्षेत्र से समाजवादी पार्टी के प्रत्‍याशी भी हैं इसलिए वह शहरी जनता को साधने की कोशिश में बिजली की समस्‍या पर भी अधिकारियों से वार्तालाप करते रहते हैं लेकिन उनके वार्तालाप करने का अंदाज यह बताता है कि नतीजा ढाक के तीन पात ही रहना है। अधिकारी उन्‍हें भी इस आशय की मीठी गोली देने से नहीं चूकते कि आप ही की तो सरकार है, आप मथुरा को विद्युत कटौती से मुक्‍त क्‍यों नहीं कराते।
अधिकारियों की मानें तो वह पूरी तरह निर्दोष हैं और जितनी भी बिजली कट रही है, वह लखनऊ से या यूं कहें कि लखनऊ के निर्देश पर कट रही है। वह बेचारे तो आदेश-निर्देशों का बस पालने करते हैं। बात चाहे सख्‍ती से बिल का भुगतान वसूलने की हो अथवा उतनी ही सख्‍ती व बेरहमी से एक बार में लगातार पांच-पांच घंटे बिजली काटने की, वह शासन के निर्देशों का ही अक्षरश: पालने करते हैं।
उधर सूबे के मुखिया अखिलेश यादव की बात पर भरोसा करें तो प्रदेश में बिजली की कोई किल्‍लत नहीं है। उनके आदेश-निर्देशों पर गौर करें तो वह यह भी कहते हैं कि रात के समय शहर को बिजली की कटौती से पूरी तरह मुक्‍त रखा जाए जिससे लोग चैन की नींद ले सकें लेकिन अधिकारी कहते हैं कि हर बार वह लखनऊ के आदेश पर ही बिजली काटते हैं।
बीती रात भी मथुरा शहर में रात 12 बजे काटी गई लाइट सुबह 4 बजे सुचारु हो सकी। शहर की बिजली व्‍यवस्‍था का यही हाल पिछले एक हफ्ते से है लेकिन किसी के कानों पर जूं तक नहीं रैंग रही। जूं इसलिए नहीं रैंग रही क्‍योंकि मथुरा में बिजली की सप्‍लाई सीधे राजधानी लखनऊ की मोहताज है और मथुरा में सत्‍ताधारी दल का प्रतिनिधित्‍व कोई करता नहीं।
इन हालातों में यदि जनता यह कहे कि चुल्‍लू पर पानी में डूब कर मर क्‍यों नहीं जाते ये जन-प्रतिनिधि…तो और क्‍या कहे। जनता के पास जनप्रतिनिधियों को कोसने के अलावा रह क्‍या जाता है। हालांकि अच्‍छी बात एक यही है कि चुनाव लगभग सिर पर आ चुके हैं और जनता अपने इसी अमोघ अस्‍त्र को इस्‍तेमाल करने का इंतजार कर रही है।
वैसे भी उसके पास इंतजार करने अथवा कोसने के अलावा है ही क्‍या। कभी वोट देने का इंतजार तो कभी वोट देने के बाद होने वाले पछतावे को अगला वोट देकर दूर करने का इंतजार। एकमुश्‍त पांच-पांच घंटे तथा बीच में दो-दो, तीन-तीन घंटे की विद्युत कटौती झेलते हुए हर पांच साल में एकबार सरकार चुनने के अधिकार का इंतजार और उसके बाद सरकार के रहमो-करम का इंतजार।
चुल्‍लूभर पानी में डूब मरने जैसी प्रतिक्रिया क्‍या अब उस खीझ की ओर इशारा कर रही है जहां से कानून हाथ में लेने की प्रक्रिया शुरू होने लगती है। समय रहते इस खीज में छिपे आक्रोश को जन-प्रतिनिधि भांप लें तो बेहतर वर्ना नतीजा भगवान भरोसे तो है ही।
एक छोटी सी कहानी इस स्‍थिति को समझने में शायद कुछ मदद कर सके।
कहानी यूं है कि किसी अदालत में एक व्‍यक्‍ति पर हत्‍या का केस चल रहा था। न्‍यायाधीश ने जब उससे पूछा कि क्‍या उसने यह हत्‍या की है, तो उसने बड़े सहज भाव से अपना जुर्म कबूल कर लिया। जज को उसकी स्‍वीकारोक्‍ति पर काफी आश्‍चर्य हुआ लिहाजा उसने कुछ सहानुभूति दिखाते हुए आरोपी से पूछा कि आखिर उसने हत्‍या की क्‍यों ?
आरोपी का इस पर जवाब था कि क्‍या बताऊं हुजूर, मौसम ही कुछ ऐसा था कि मुझसे कत्‍ल हो गया।
जज को आरोपी के इस उत्‍तर ने और आश्‍यर्च में डाल दिया। जज की उत्‍सुकता पहले से कहीं अधिक बढ़ चुकी थी इसलिए उसने कहा कि मौसम की वजह से तुमने कत्‍ल कर दिया, बात कुछ हजम नहीं हुई। विस्‍तार से पूरी बात बताओ।
आरोपी कहने लगा- माई-बाप, आप तो विद्वान न्‍यायाधीश हैं। मैं इतना पढ़ा-लिखा कहां। बताने को कुछ और नहीं है मेरे पास। क्‍या आप इतना भी नहीं समझ सकते कि जब कोई इंसान मौसम के कारण रोमांटिक हो सकता है, मौसम की वजह से खिन्‍न, चिढ़चिढ़ा और उदास हो सकता है, मौसम के चलते कविता, कहानियां तथा चित्रों की रचना कर सकता है, तो क्‍या मौसम के प्रभाव से हत्‍या नहीं कर सकता।
अब जज की समझ में भी कातिल की बात भली-भांति आ चुकी थी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 25 जून 2016

खौफ के साये में खाकी: पुलिस ही पुलिस की सबसे बड़ी दुश्‍मन

मथुरा में 2 जून को जवाहर बाग खाली कराते वक्‍त एसपी सिटी तथा एसओ की शहादत के बाद भी दो उप निरीक्षकों को मौत के घाट उतारा जा चुका है
ड्यूटी के लिए खाक में मिल जाने की प्रेरणा देने वाली खाकी इस समय खुद खतरे में है। यूपी में खाकी पर मंडरा रहे खतरे का आलम यह है कि हर रोज Police मजामत व शहादत की खबरें अखबारों की सुर्खियां बन रही हैं। मथुरा में 2 जून को जवाहर बाग खाली कराते वक्‍त एसपी सिटी तथा एसओ की शहादत के बाद भी दो उप निरीक्षकों को मौत के घाट उतारा जा चुका है। एक को बदमाशों ने बदायूं में मार डाला तो दूसरे को हापुड़ में।
2 जून से पहले भी पुलिस पर हमलावर होने की घटनाएं लगातार मिलती रही हैं।
कल यानि शुक्रवार को आगरा के आंवलखेड़ा में खनन माफिया ने पुलिस को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा।
इससे पहले मथुरा में नेशनल हाईवे पर लावारिस खड़े ट्रक के अंदर गौवंश की बेरहमी से हुई मौत के बाद लोगों के आक्रोश ने कानून-व्‍यवस्‍था की पोल खोलकर रख दी थी। पूरे दो दिन नेशनल हाईवे पर गौवंश से भरा ट्रक खड़ा रहा और इलाका पुलिस ने यह तक जानने की जहमत नहीं उठाई कि आखिर यह ट्रक इस तरह खड़ा क्‍यों हैं तथा उसके अंदर है क्‍या ?
काफी उपद्रव हो जाने के बाद कोतवाल वृंदावन तथा रिपोर्टिंग चौकी प्रभारी जैत को निलंबित करके लोगों का आक्रोश शांत करने की कोशिश की गई है।
ऐसे में इस तरह के सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर क्‍यों बदमाशों के अंदर पुलिस का भय पूरी तरह खत्‍म होता जा रहा है ?
क्‍यों खाकी से सिर्फ शरीफ लोग खौफ खाते हैं और बदमाश उन्‍हें कहीं अपना सहयोगी तो कहीं अपना प्रतिद्वंदी मानकर चलते हैं ?
खाकी की इमेज क्‍यों सिर्फ और सिर्फ वर्दीधारी अपराधियों की बनकर रह गई है और कैसे उसका इकबाल पूरी तरह खत्‍म होता जा रहा है ?
क्‍यों सामाजिक लोग भी अब पुलिस के खिलाफ एकजुट होने लगे हैं और आपराधिक तत्‍व उस पर हमला करने से नहीं चूकते ?
इसमें कोई दोराय नहीं कि खाकी पर खादी के आधिपत्‍य ने पुलिस के इकबाल को खत्‍म करने में बड़ी भूमिका अदा की है, किंतु खाकी की वर्तमान दुर्दशा के लिए पुलिस खुद भी कम जिम्‍मेदार नहीं है।
पुलिस की इस दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण है, उसके द्वारा की जाने वाली वो अवैध कमाई जो उनके वेतन-भत्‍तों से भी कई गुना अधिक होती है।
इस अवैध कमाई ने पुलिस की छवि एक ऐसे सड़क छाप गुंडे की बनाकर रख दी है जो लोगों को लूटने खसोटने के लिए किसी भी स्‍तर तक जा सकता है और जिसका एकमात्र धर्म तथा कर्म आमजन में भय व्‍याप्‍त कर अपना उद्देश्‍य पूरा करना होता है।
बेशक दूसरे तमाम सरकारी महकमे अवैध कमाई के मामले में पुलिस से कहीं पीछे नहीं हैं किंतु पुलिसिया कार्यप्रणाली ने जितनी बदनामी हासिल की है, उतनी किसी दूसरे विभाग ने नहीं की।
पुलिस की अवैध कमाई और उसकी बदनामी के कुछ महत्‍वपर्णू कारणों को चंद उदाहरणों से समझा जा सकता है।
उदाहरण के तौर पर एक अनुमान के अनुसार विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक स्‍थल मथुरा जनपद के शहरी क्षेत्र में ही पर्चा सट्टे की करीब 80 गद्दियां संचालित होती हैं। प्रत्‍येक गद्दी से पुलिस 90 हजार रुपया हर महीना लेती है। इस तरह शहरी पुलिस के पास हर माह सट्टे के अवैध करोबार से 72 लाख रुपया महीना आता है।
एमसीएक्‍स का गोरखधंधा भी इस जिले में खूब फल-फूल रहा है और क्रिकेट के सट्टे में मथुरा अपनी एक अलग पहचान बना चुका है। एमसीएक्‍स का अवैध धंधा तो अब तक दर्जनों लोगों की जान ले चुका है लेकिन पुलिस के लिए वह भी अवैध कमाई का अच्‍छा स्‍त्रोत है। एमसीएक्‍स का संचालन चूंकि पुलिस के सहयोग बिना संभव ही नहीं है इसलिए एमसीएक्‍स संचालकों को एक ओर जहां पुलिस के संरक्षण की जरूरत रहती है वहीं दूसरी ओर वसूली के लिए भी पुलिस का सहयोग जरूरी है।
इसी प्रकार डग्‍गेमार वाहनों में थ्री व्‍हीलर पुलिस की अतिरिक्‍त आमदनी का बड़ा जरिया हैं। जनपदभर में चलने वाले छोटे और बड़े टेम्‍पो से हर थाने-चौकी के लिए अवैध वसूली की जाती है। अनुमानत: जिले में लगभग 1500 टेम्‍पो चलते हैं और इन टेम्‍पो से वसूली का एवरेज 250 रुपया प्रति टेम्‍पो प्रतिमाह निकलता है। इस तरह पुलिस पौने चार लाख रुपए हर महीने टेम्‍पो चालकों से वसूलती है। इस काम को पुलिस ने जिन गुर्गों को लगा रखा है, उन्‍हें ठेकेदार कहते हैं। पुलिस इन टेम्‍पो चालकों से बेगार भी लेती है जिसमें चौकी-थानों के लिए पानी लेकर आने से लेकर इधर-उधर घुमाने, गश्‍त के लिए ले जाने तथा नाते-रिश्‍तेदारों को ब्रजदर्शन कराना तक शामिल है।
इसके अलावा जिलेभर में दूसरे बड़े अवैध डग्‍गेमार वाहन दौड़ते हैं जिनमें बसें तो हैं ही, ट्रक तथा बड़ी संख्‍या में जुगाड़ भी हैं। इन सभी वाहनों से पुलिस की महीनेदारी बंधी हुई है। पुलिस की मेहरबानी के बिना जिलेभर में किसी मार्ग पर कोई वाहन न तो सवारी ढो सकता है और न माल।
जुगाड़ तथा ट्रैक्‍टर तो चूंकि सबसे अधिक ईंट ढोने के काम में प्रयोग होते हैं और इसलिए वह पुलिस की कमाई का बड़ा जरिया हैं।
यहां यह जान लेना जरूरी है कि ताज ट्रपेजियम जोन में आने के कारण मथुरा की सीमा के अंदर ईंट भट्टा संचालित करना एक बड़ा अपराध है, बावजूद इसके न केवल यहां खुलेआम ईंटभट्टे चलते हैं बल्‍कि राष्‍ट्रीय राजमार्ग पर नियम-कानूनों को धता बताते हुए ईंट मंडी भी लगती है। सुबह से ही पूरे राजमार्ग पर सैकड़ों की संख्‍या में जगह-जगह ईंटों के ट्रैक्‍टर व जुगाड़ खड़े देखे जा सकते हैं। सड़क को घेरकर अवैध ईंट मंडी बना देने वाले इन वाहनों की वजह से आए दिन दुर्घटनाएं होती हैं लेकिन न कोई बोलने वाला है और न सुनने वाला।
यमुना से निकलने वाली बालू और जिले भर में हो रहा मिट्टी का अवैध खनन भी पुलिस के लिए किसी वरदान से कम नहीं।
राजस्‍थान सीमा से लगे मथुरा के गोवर्धन व बरसाना आदि में अरावली पर्वत श्रृंखला का अवैध खनन और यमुना से मछली व कछुओं की तस्‍करी में भी पुलिस की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता।
नशीले पदार्थों की तस्‍करी जिसमें शराब भी शामिल है, के लिए मथुरा अच्‍छी-खासी शौहरत रखता है। एक ओर हरियाणा तथा दूसरी ओर राजस्‍थान की सीमा से सटे होने तथा राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली से उसकी बहुत कम दूरी इस काम में मददगार है।
सर्वविदित है कि मथुरा में हेरोइन, चरस व गांजे के अतिरिक्‍त शराब, स्‍मैक तथा ब्राउन शुगर जैसे महंगे नशीले पदार्थों की भी अच्‍छी खपत है और इसलिए इन्‍हें बेचने वालों का यहां बड़ा नेटवर्क है।
वृंदावन, गोवर्धन तथा बरसाना में मौजूद तथाकथित विदेशी ”भक्‍त” इन नशीले पदार्थों का सेवन हर रोज करते देखे जा सकते हैं। ऐसे में यह अंदाज लगाना कोई मुश्‍किल काम नहीं कि उन्‍हें वह पदार्थ कहां से व कैसे मिलता होगा।
जाहिर है कि पुलिस की मदद के बिना किसी देसी या विदेशी नशीले पदार्थ की बिक्री के बारे में सोचा तक नहीं जा सकता। ड्रग्‍स के यह तस्‍कर पुलिस के पास अच्‍छा-खासा पैसा पहुंचाते हैं।
इन तमाम अवैध धंधों से ऊपर मथुरा में तेल से होने वाला वह खेल है जिसकी धार मथुरा रिफाइनरी से निकलती है। तेल के इस खेल ने मथुरा के कई लोगों को देखते-देखते रंक से राजा बना दिया। कल तक जिनकी हैसियत हजारों की नहीं थी, आज वह करोड़ों के मालिक हैं। तेल के इस खेल को पुलिस के साथ-साथ प्रशासन व स्‍थानीय नेताओं का भी पूरा वरदहस्‍त प्राप्‍त है। जिले में शायद ही कोई ऐसा बड़ा नेता हो, जो तेल के खेल में परोक्ष या अपरोक्ष भूमिका न निभाता रहा हो। तेल की बहती गंगा में अधिकांश नेता हाथ धोते हैं। रहा सवाल पुलिस का, तो पुलिस की मर्जी के बिना न तो तेल का कोई टैंकर जिले की सीमा से बाहर जा सकता है और न सड़क पर खड़ा हो सकता है। करोड़ों रुपए के इस खेल में पुलिस की भी अच्‍छी-खासी हिस्‍सेदारी रहती है।
कहने का तात्‍पर्य यह है कि यूपी के एक सी ग्रेड जिले मथुरा का जब यह हाल है तो बाकी उन जिलों का क्‍या होगा जो ए तथा बी ग्रेड जिले कहलाते हैं।
पुलिस की प्रति जिला अवैध कमाई को यदि जोड़ा जाए तो वह सरकारी खजाने से प्रति माह आने वाले उसके वेतन से भी अधिक बैठेगी।
संभवत: यही कारण है कि पेशेवर अपराधियों व अवैध काम करने वालों के मन से खाकी का खौफ दिन-प्रतिदिन खत्‍म होता जा रहा है और इसीलिए वह पुलिस पर हमलावर होने में रत्‍तीभर भी नहीं हिचकिचाते।
टेम्‍पो चालक इसके सबसे बड़े प्रतीक हैं। तिराहे-चौराहों पर बेतरतीब खड़े रहने वाले किसी टेम्‍पो चालक में पुलिस का लेशमात्र भी भय दिखाई नहीं देता। आश्‍चर्य की बात तो यह है कि यातायात व्‍यवस्‍था को सर्वाधिक बाधित करने का काम टेम्‍पो चालक पुलिस की नाक के नीचे और चौकी-थानों के सामने करते हैं। वहां करते हैं जहां पुलिस पिकेट हर वक्‍त मौजूद रहती है क्‍योंकि वह जानते हैं कि उनसे हर महीने मोटी कमाई करने वाली पुलिस उन्‍हें गीदड़ भभकी तो दे सकती है लेकिन ठोस कार्यवाही नहीं कर सकती। आखिर वह उसके लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी जो हैं।
टेम्‍पो चालक तो मात्र एक उदाहरणभर हैं अन्‍यथा किसी भी धंधे को नियम-कानून से इतर जाकर सुविधाएं देने अथवा पूरी तरह अवैध धंधे को संचालित कराने में पुलिस जब खुद शामिल रहेगी तो उस धंधे को करने वाला पुलिस से डरने भी क्‍यों लगा। पुलिस उसके लिए उस स्‍थिति में सिर्फ और सिर्फ उसकी ऐसी हिस्‍सेदार बनकर रह जाती है जिसने वर्दी के रूप में कानून का जामा पहन रखा है वर्ना उसमें तथा पुलिस में फर्क ही कहां है। पुलिस के प्रति अवैध कारोबारियों तथा अपराधियों में बन रही यही छवि अब उसकी जान की दुश्‍मन बनने लगी है।
इन स्‍थिति तथा परिस्‍थितियों के बीच पुलिस की कांटे से कांटा निकालने की चिर-परिचित कार्यशैली भी अब पुलिस पर भारी पड़ने लगी है। जिस थ्‍यौरी को कभी पुलिस बदमाशों के ऊपर लागू करती थी, वह अब पुलिस ही पुलिस के ऊपर लागू करने लगी है।
पुलिस मजामत के अधिकांश मामलों की तह तक यदि जाया जाए तो पता लगेगा कि उसकी भी जड़ में कहीं न कहीं पुलिस ही है। जातिगत भेदभाव, वर्ण व्‍यवस्‍था, आरक्षण, आउट ऑफ टर्म प्रमोशन आदि के मामले तथा उससे उपजे द्वेषभाव अब पुलिस बल में इस कदर समा चुका है कि पुलिस अब संगठित बल नहीं रह गया। द्वेषभाव के दंश से कोई थाना-चौकी आज की तारीख में अछूता नहीं है। ऐसे में परस्‍पर दुश्‍मनी का भाव अंदर ही अंदर पनपने लगता है और मौका मिलने पर सबक सिखाने की मंशा मन में समा जाती है। दबिश, गश्‍त तथा अपराधियों की धर-पकड़ के मौकों पर पुलिस मजामत के मामले ऐसे ही द्वेषभाव की उपज होते हैं लेकिन पुलिस अधिकारी कभी इनकी तह में जाने का प्रयास नहीं करते। प्रथमद्ष्‍टया जिसका दोष परिलक्षित होता है, उसे लाइन भेजकर या अधिक से अधिक निलंबित करके अपने कर्तव्‍य की इतिश्री कर लेते हैं।
यही सब कारण हैं कि भले ही हर वर्ष पुलिस स्मृति दिवस (इक्कीस अक्तूबर) पर विभिन्न पुलिसबलों के सैकड़ों शहीद याद किए जाते हैं और कर्तव्य-वेदी पर प्राणों की आहुति की वार्षिक रस्म-अदायगी देश की तमाम पुलिस यूनिटों में हो रही होती है लेकिन पुलिस की छवि को लेकर भारतीय समाज में मिश्रित कुंठाएं ज्यों की त्यों बनी रहती हैं।
इस संबंध में स्वयं सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी वाली प्रकाश सिंह कमेटी द्वारा प्रस्‍तुत ‘पुलिस सुधार’ की कवायद भी मददगार सिद्ध नहीं हो सकी क्‍योंकि तमाम राज्‍य सरकारों की इन्‍हें लागू करने में कोई रुचि नहीं है जबकि औपनिवेशिक काल वर्ष 1861 के अधिनियम पर काम करने एवं नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों की उपेक्षा करने वाली पुलिस की साख सामान्य अपराध के आंकड़ों में हेराफेरी करके ही अपनी कुशलता दिखाने और शातिर अपराधियों से मिलीभगत करने की बनकर रह गई है।
राज्‍य सरकारें जानती हैं कि पुलिस को स्वायत्तता देने का मतलब समूची राजनीतिक बिरादरी के पैरों पर कुल्‍हाड़ी मारने के समान है।
गौरतलब है कि सर्वोच्च न्यायालय का पुलिस सुधार मुख्यत: स्वायत्तता, जवाबदेही और लोकोन्मुखता जैसे पांच बिंदुओं पर केंद्रित है।
इसमें डीजीपी, आईजीपी, एसपी, एसएचओ की दो वर्ष की निश्चित तैनाती और डीजीपी और चार अन्य वरिष्ठतम पुलिस अधिकारियों के (एस्टैब्लिशमेंट) बोर्ड को उप पुलिस अधीक्षक स्तर तक के तबादलों का अधिकार देने तथा पुलिस की स्वायत्तता को मजबूत कर उसे बाह्य दबावों से मुक्त रखने की सिफारिश की गई है।
इसमें पुलिस को भी कानूनी दायरे में रखने के लिए राज्य पुलिस आयोग और पुलिस शिकायत प्राधिकरण की व्‍यवस्‍था है लेकिन राज्‍यों की रुचि लोकोन्मुख पुलिस बनाने में है ही नहीं। राज्‍य सरकारें तो यही चाहती हैं कि पुलिस उनके हाथ की कठपुतली बनी रहे और वो उसे जैसे चाहें वैसे नचाती रहें।
इन हालातों में पुलिस को खुद हवा के बदलते रुख का भली-भांति अध्‍ययन करना होगा, और समझना होगा कि यदि समय रहते उसने पैसे के पीछे अंधी दौड़ की प्रवृत्‍ति को नहीं त्‍यागा तथा ट्रांसफर-पोस्‍टिंग आदि के लिए राजनेताओं की हर जायज-नाजायज बात सिर झुकार मान लेने की आदत नहीं बदली तो आगे आने वाला समय उसके लिए कितना घातक हो सकता है।
पुलिस को यह भी समझना होगा कि कम से कम कानून-व्‍यवस्‍था के अनुपालन में उसे जाति, धर्म व संप्रदाय से ऊपर उठकर काम करना होगा तथा अपराध व अपराधियों के उन्‍मूलन में कंधे से कंधा मिलाकर चलना होगा अन्‍यथा अपराधियों के उसके ऊपर हमलावर होने का सिलसिला दिन-प्रतिदिन बढ़ेगा ही। कम होने का तो सवाल ही पैदा नहीं होता क्‍योंकि अब अपराधी, राजनेताओं से संपर्क साधने तक सीमित नहीं रहे। वह अब राजनीतिक दलों तथा राजनीतिज्ञों के हमराह हो चुके हैं।
खाकी को बदमाशों के मन में पहले जैसा खौफ पैदा करने तथा भद्रजनों के प्रति सद्भाव प्रदर्शित करने के लिए अपने सूत्रवाक्‍य ‘परित्राणाय साधुनाम विनाशाय च दुष्कृताम’ को सार्थक करना होगा, उस पर अमल करना होगा क्‍योंकि यही सूत्रवाक्‍य उसका अपना इकबाल पुनर्स्‍थापित करने की क्षमता रखता है। यही सूत्रवाक्‍य उसे बिना किसी बड़े फेर-बदल के सही मायनों में नागरिक पुलिस बनाने का माद्दा रखता है।
राजनीतिज्ञों का क्‍या है, उसके लिए पुलिस बल मात्र एक ऐसा संख्‍या बल है जिसकी शहादत भी आंकड़ों की बाजीगरी में दबा दी जायेगी और खाकी इसी प्रकार कभी नेताओं को बचाने तथा कभी आत्‍मरक्षा में खाक होती रहेगी।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 23 जून 2016

नीरा राडिया के ”नयति” की ”नीयत” में ही खोट लगता है

नीरा राडिया के ”नयति” की ”नीयत” में ही खोट लगता है। अत्‍याधुनिक सुख-सुविधाओं से लैस ”नयति” उस हॉस्‍पील का नाम है जिसे ”2G स्‍पैक्‍ट्रम” घोटाला फेम और ”पनामा लीक्‍स” चर्चित महिला लाइजनर ”नीरा राडिया” ने मथुरा में राष्‍ट्रीय राजमार्ग नंबर- 2 के किनारे बनाया है।
बताया जाता है कि इस हॉस्‍पीटल के प्रमोटर्स में रिलायंस ग्रुप ऑफ कंपनीज के फायनेंशियल एडवाइजर दीनानाथ चतुर्वेदी के पुत्र राजेश चतुर्वेदी का नाम भी शामिल है। चार्टर्ड एकाउंटेंट दीनानाथ चतुर्वेदी मूल रूप से मथुरा के ही निवासी हैं और नीरा राडिया को हॉस्‍पीटल के लिए सारे संसाधन जुटाकर देने में दीनानाथ चतुर्वेदी अथवा उनके पुत्र राजेश की बड़ी भूमिका रही है।
चाहे बात रालोद नेता कुवंर नरेन्‍द्र सिंह से हॉस्‍पीटल के लिए जमीन किराए पर दिलाने की हो, या फिर स्‍थानीय बैंकों से हॉस्‍पीटल के लिए कर्ज मुहैया कराने की। दरअसल, कुंवर नरेन्‍द्र सिंह का निवास अवागढ़ हाउस तथा दीनानाथ चतुर्वेदी का आवास ”तुलसी विला” डैंपियर नगर में लगभग बराबर-बराबर हैं यानि दीनानाथ चतुर्वेदी मथुरा में कुंवर नरेन्‍द्र सिंह के पड़ोसी हैं इसलिए दीनानाथ चतुर्वेदी के लिए कुंवर नरेन्‍द्र सिंह से ”नयति” की खातिर संपर्क साधना बहुत आसान था।
यूं दीनानाथ चतुर्वेदी की छवि मथुरा में एक सुहृदय व्‍यक्‍ति की रही है इसलिए आम लोगों के बीच यह उत्‍सुकता भी है कि आखिर दीनानाथ चतुर्वेदी ने नयति हॉस्‍पीटल के लिए नीरा राडिया जैसी 2G तथा पनामा लीक्‍स फेम महिला का साथ क्‍यों दिया।
बताया जाता है कि लोगों की इस उत्‍सुकता का पता तब आसानी के साथ लग सकता है जब कोई दीनानाथ चतुर्वेदी की तरक्‍की के पीछे की उन कहानियों को सुन ले जो मुंबई जाकर बस गए दूसरे चतुर्वेदी परिवारों की जुबान पर हैं।
बताया जाता है कि मथुरा में भले ही दीनानाथ चतुर्वेदी एक ऐसे सुहृदय व्‍यक्‍ति की छवि रखते हों जिसने मुंबई जाकर अप्रत्‍याशित तरक्‍की हासिल की तथा मथुरा के तमाम लोगों के लिए रोजगार मुहैया कराया किंतु मुंबई में इन्‍हें लेकर चर्चित कहानियां कुछ और ही कहती हैं।
जिन्‍होंने इन कहानियों को बनते देखा है, उनकी मानें तो पता लगता है कि नीरा राडिया जैसी महिला के साथ दीनानाथ चतुर्वेदी का साथ आना, कोई चौंकाने वाली बात नहीं है।
बहरहाल, भारी-भरकम किराए की जमीन पर खड़ा किया गया यह होटलनुमा हॉस्‍पीटल पहले दिन से ही इसलिए चर्चित हो गया कि इसका उद्घाटन देश के मशहूर उद्योगपति रतन टाटा के कर कमलों से हुआ। नीरा राडिया की पहचान रतन टाटा की कंपनियों के लिए ही लाइजनिंग करने वाली हाईप्रोफाइल महिला के रूप में रही है।
इसके बाद नीरा राडिया के इस हॉस्‍पीटल की चर्चा तब शुरू हुई जब वहां मथुरा-आगरा के विभिन्‍न अस्‍पतालों में कार्यरत डॉक्‍टर्स को तोड़कर लाया गया। सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार इन डॉक्‍टर्स को उनके तत्‍कालीन वेतन से कई गुना अधिक वेतन पर नयति में नियुक्‍त किया गया जिससे मथुरा-आगरा के चिकित्‍सा जगत में एक प्रकार की भगदड़ का माहौल पैदा हुआ।
फिर नयति द्वारा विधिवत् काम शुरू कर देने के बाद पता लगा कि मथुरा के लोगों की सेवा करने तथा उन्‍हें अत्‍याधुनिक सुविधाएं मुहैया कराने के प्रचार सहित खोले गए इस हॉस्‍पीटल में चिकित्‍सा काफी महंगी है और जनसामान्‍य के लिए तो वहां उपचार कराना संभव ही नहीं है।
देखते-देखते नयति से ऐसी खबरें भी बाहर आने लगीं कि वहां भी लोगों से पैसे वसूलने के लिए वो सारे हथकंडे अपनाए जा रहे हैं, जिनके लिए दूसरे मशहूर अस्‍पताल पहले से बदनाम हैं। मसलन मरीज की नाजुक स्‍थिति का हवाला देकर मोटी रकम जमा करा लेना, विशेषज्ञ चिकित्‍सकों की आड़ में मनमानी फीस वसूलना, पैसा जमा करने में जरा सी भी देरी हो जाने पर मरीज व उसके परिजनों के साथ अभद्र भाषा का प्रयोग करना तथा कैजुअलिटी हो जाने पर पूरा बिल वसूल किए बिना लाश न देना आदि।
हाल ही में एक ऐसे ही मामले को लेकर हॉस्‍पीटल में काफी हंगामा हुआ और बमुश्‍किल पुलिस के हस्‍तक्षेप से विवाद का पटाक्षेप हो पाया।
बताया जाता है कि मथुरा-भरतपुर रोड पर गत रविवार की रात अज्ञात वाहन की टक्‍कर से बाइक सवार तेजवीर सिंह गंभीर घायल हो गया। तेजवीर को जिला अस्‍पताल से रैफर करने पर नयति हॉस्‍पीटल ले जाया गया, जहां उपचार के दौरान सोमवार को उसकी मौत हो गई।
तेजवीर के परिजन हॉस्‍पीटल के कर्मचारियों द्वारा अभद्र व्‍यवहार करने तथा उपचार के बिल का पूरा पैसा वसूल कर ही शव देने की जिद पर अड़े होने जैसी शिकायत कर रहे थे। हॉस्‍पीटल में हंगामे की सूचना पाकर पहुंचे पुलिस अधिकारियों ने जैसे-तैसे मृतक के परिजनों को शांत कराया, और शव उनके सुपुर्द किया अन्‍यथा बड़ी घटना होने का अंदेशा पैदा हो चुका था।
इससे पहले भी एक बच्‍चे के पेट में कील घुस जाने पर जब उसके परिजन नयति में उपचार कराने पहुंचे तो पहले उन्‍हें भयभीत करके 60 हजार रुपए जमा करा लिए और फिर इकठ्ठे आठ लाख रुपए का बिल थमा दिया। बच्‍चे के परिजनों द्वारा हिसाब मांगे जाने पर उनके साथ हॉस्‍पीटल के कर्मचारी अभद्र व्‍यवहार करने लगे।
इस मामले हॉस्‍पीटल की पदाधिकारी शिवानी शर्मा ने मीडिया को बताया कि बच्‍चे के परिजनों से अभद्र व्‍यवहार करने वाले कर्मचारी राजीव शर्मा को हटा दिया गया है और जांच बैठा दी गई है। राजीव शर्मा को भले ही हटा दिया गया हो लेकिन शिवानी शर्मा के कथन से इस बात की तो पुष्‍टि होती ही है कि बच्‍चे के परिजनों से हॉस्‍पीटल में अभद्र व्‍यवहार किया गया।
इन सब बातों के अलावा यह भी पता लगा है कि नयति हॉस्‍पीटल में कार्यरत कर्मचारियों तथा वहां ठेके आदि पर काम करने व कराने वाले दूसरे लोगों को पैसा देने में बहुत परेशान किया जा रहा है।
ऐसे ही एक इमरान नामक युवक ने बताया कि उसे नयति हॉस्‍पीटल में काम करने के नाम पर ले जाया गया और तीन महीने काम कराने के बाद अचानक घर जाने को कह दिया गया। वेतन का पैसा मांगने पर पता लगा कि इमरान व उसके जैसे दूसरे अन्‍य युवकों को नयति के नाम पर ठेकेदार के अंडर में रखा गया था लिहाजा वेतन का भुगतान भी ठेकेदार से लेने की बात कह दी गई।
अब इमरान व उसके जैसे अनेक युवक अपना तीन महीने का वेतन पाने के लिए कभी ठेकेदार बताए गए व्‍यक्‍ति के तो कभी नयति हॉस्‍पीटल के चक्‍कर लगाने पर मजबूर हैं किंतु उन्‍हें अब तक एक भी पैसा नहीं मिला।
दूसरी ओर जब इस संबंध में नयति के लिए ठेके पर काम करने वाले लोगों से बात की तो उनका कहना था कि हमें खुद हॉस्‍पीटल प्रशासन ने महीनों से पेमेंट नहीं किया है। किसी का 15 लाख रुपया बकाया है तो किसी का 20 लाख। अधिकांश लोग पेमेंट के लिए हॉस्‍पीटल के चक्‍कर लगाते देखे जा सकते हैं लेकिन जवाब देने वाला कोई नहीं है।
इन हालातों को देखकर तो यही लगता है कि नयति के मालिकानों की नीयत ठीक नहीं है और उनका मथुरा जैसे विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक स्‍थान पर अत्‍याधुनिक सुविधाओं से युक्‍त हॉस्‍पीटल खोलने का मकसद चाहे जो भी हो, कम से कम जनसेवा तो नहीं था।
मथुरा की जनता अब नयति की नीयत को देखकर खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है और उसे समझ में आने लगा है कि नीरा राडिया व दीनानाथ चतुर्वेदी के इस हॉस्‍पीटल का असली मकसद कुछ और ही है। जनता को दुख है तो इस बात का कि जिसे वह पीड़ित मानवता के सेवा के लिए मथुरा में एक वरदान समझ रहे थे, वह बहुत कम समय में अभिशाप साबित होने लगा है।
अब लोगों को ”नयति” की ”नियति” का भी आभास होने लगा है और वो कहने लगे हैं कि इस तरह तो नयति के संचालक बहुत दिनों तक जनता को मूर्ख नहीं बना पायेंगे।
बेहतर होगा कि वो समय रहते अपना छद्म मकसद त्‍यागकर हॉस्‍पीटल की मान्‍यताओं को पूरा करने लगें अन्‍यथा किसी दिन नयति न केवल मथुरा में किसी बड़े उपद्रव का कारण बनेगा बल्‍कि जितने शोर-शराबे के साथ शुरू हुआ था, उससे अधिक शोर-शराबे के साथ बंद भी हो जायेगा।
-लीजेंड न्‍यूज़

रविवार, 19 जून 2016

ऐसे तो कभी सामने नहीं आयेगा जवाहर बाग कांड का सच

मथुरा। 2 जून को हुए जवाहर बाग कांड का सच कभी सामने आ पायेगा, इस बात की संभावना समय के साथ क्षीण होती जा रही है। अब तक इस मामले में की गई पुलिसिया कार्यवाही से तो यही लगता है।
सबसे पहले गौर करें प्रदेश ही नहीं, पूरे देश को हिला देने वाले इस कांड की पहली महत्‍वपूर्ण गिरफ्तारी पर। यह गिरफ्तारी हुई चंदन बोस नामक उस व्‍यक्‍ति की जिसे रामवृक्ष यादव का दाहिना हाथ कहा जा रहा है। चंदन बोस की गिरफ्तारी जनपद बस्‍ती के परशुरामपुर थाना क्षेत्र अंतर्गत गांव कैथेलिया से बस्‍ती जिले की ही क्राइम ब्रांच (स्‍वाट टीम) करती है। पुलिस के अनुसार यह गांव चंदन बोस की ससुराल है और जवाहर बाग कांड को अंजाम देने के बाद से वह अपनी पत्‍नी सहित यहीं रह रहा था।
पुलिस के अनुसार चंदन बोस की पत्‍नी भी उसकी हर आपराधिक गतिविधि में समान रूप से साझीदार थी और रामवृक्ष के गैंग में महिला विंग की कमांडर थी। इस तरह देखा जाए तो बस्‍ती पुलिस ने एक नहीं, दो बड़े अपराधियों को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की। ऐसे दो बड़े अपराधी जो रामवृक्ष की पल-पल की जानकारी रखते थे और जवाहर बाग के पूरे सच से भली प्रकार वाकिफ थे।
अब देखिए कितने आश्‍चर्य की बात है कि जिस जवाहर बाग कांड पर न सिर्फ प्रदेश सरकार की नजर गढ़ी थी बल्‍कि विपक्षी दल भी पूरी तरह सक्रिय हो चुके थे और अपराधियों की धर-पकड़ के लिए मथुरा पुलिस ने कई टीमें गठित कर दी थीं, उस कांड के सरगना का दाहिना हाथ अपनी अपराधी पत्‍नी सहित पकड़ा जाता है मथुरा से करीब 650 किलोमीटर दूर बस्‍ती जिले के एक गांव में।
यही नहीं, बस्‍ती के पुलिस अधीक्षक चंदन बोस की गिरफ्तारी पर बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस करते हैं, और पूरी जानकारी मीडिया को देते हैं।
जाहिर है कि इसके बाद मथुरा पुलिस की भूमिका शुरू होती है और वो चंदन बोस व उसकी पत्‍नी को लेने के लिए जनपद बस्‍ती पहुंचती है।
जब बस्‍ती पुलिस ने चंदन बोस और उसकी पत्‍नी पूनम की अपने यहां कानूनन गिरफ्तारी प्रेस कांफ्रेंस करके दिखा दी तो मथुरा पुलिस के हाथ में रह क्‍या जाता है, सिवाय लकीर पीटने के।
मथुरा पुलिस चूंकि सारी कानूनी औपचारिकता पूरी करके चंदन और उसकी पत्‍नी को मथुरा लाई थी इसलिए न तो वह उन पर अपने चिर-परिचित हथकंडे इस्‍तेमाल कर सकती थी और न उनसे कोई बड़ा राज उगलवा सकती थी।
ऐसे में चंदन बोस ने वही सब बताया जो कई दिन पहले से अखबारों में छपता रहा था। उसने न तो रामवृक्ष को लेकर कोई जानकारी दी और न यह बताकर दिया कि आखिर रामवृक्ष रूपी विषबेल को दो साल तक खाद-पानी कहां से मिलता रहा। किसके इशारे पर वह 280 एकड़ में फैले सरकारी जवाहर बाग को कब्‍जाने का ख्‍वाब देख रहा था। क्‍यों पुलिस प्रशासन उनकी गालियां खाकर और जलील होकर भी उनके सामने असहाय बना रहा।
चंदन बोस और उसकी पत्‍नी पूनम की गिरफ्तारी के बाद फोटो सहित छपे समाचारों में देखा गया कि चंदन बोस को दो पुलिस वाले अपने कंधों का सहारा देकर ले जा रहे हैं। इसका तात्‍पर्य यह है कि चंदन बोस अपने बूते चलने-फिरने की स्‍थिति में भी नहीं था।
यहां एक सीधा सवाल यह खड़ा होता है कि जब चंदन बोस की घटना वाले दिन ही जवाहर बाग में टांग टूट गई थी और वह चलने फिरने लायक भी नहीं रह गया था तो कैसे वह मथुरा से 650 किलोमीटर दूर अपनी ससुराल जा पहुंचा। उसने अपनी टांग पर प्‍लास्‍टर ससुराल पहुंचने के बाद करवाया या कहीं बीच में इलाज कराकर ससुराल तक जा सका।
क्‍या इस सब काम में उसकी किसी ने मदद की, और की तो वह मददगार कौन था।
घटना के तुरंत बाद जब पूरे प्रदेश की पुलिस में एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी तथा एसओ संतोष यादव की जान लेने वालों के प्रति भारी उबाल था और मथुरा के लोग तो जवाहर बाग के कथित सत्‍याग्रहियों को ढूंढ-ढूंढ कर पीट रहे थे तब कैसे चंदन बोस अपनी पत्‍नी व बच्‍चों सहित टूटी हुई टांग से सैकड़ों किलोमीटर दूर पहुंचने में कामयाब हो गया। क्‍या इस बीच उसे कहीं भी किसी जिले की पुलिस ने नहीं देखा।
अब जरा गौर करें जवाहर बाग कांड की दूसरी सबसे बड़ी गिरफ्तारी पर। यह गिरफ्तारी बदायूं पुलिस ने शुक्रवार 17 जून को की। गिरफ्तार किया गया शख्‍स राकेश गुप्‍ता बदायूं के ही थाना हजरतपुर अंतर्गत गांव शहापुर का निवासी है।
रामवृक्ष को लाखों रुपए खुद देने से लेकर जवाहर बाग में मौजूद हजारों लोगों के लिए रसद की व्‍यवस्‍था तथा पुलिस प्रशासन से मुकाबले के लिए हथियारों तक का बंदोबस्‍त करने वाला राकेश गुप्‍ता भी घटना वाले दिन जवाहर बाग में मौजूद था लेकिन पुलिस कार्यवाही के बाद बड़े इत्‍मीनान से सपरिवार मथुरा पुलिस लाइन होकर रेलवे स्‍टेशन जा पहुंचा तथा वहां से कासगंज, बरेली व फर्रुखाबाद होकर बदायूं पहुंच गया।
गौरतलब है कि कासगंज, बरेली तथा फर्रुखाबाद व बदायूं आदि सब उसी प्रदेश के हिस्‍से हैं जिस प्रदेश में दो पुलिस अफसरों को निर्ममता के साथ अवैध कब्‍जाधारियों ने हजारों लोगों के सामने मार डाला और जिस प्रदेश की पुलिस कथित तौर पर इन अफसरों की हत्‍या करने वालों को पूरी शिद्दत के साथ तलाश रही थी। जिनकी गिरफ्तारी के लिए कई टीमें सक्रिय थीं और शासन स्‍तर से हर पल जवाब तलब किया जा रहा था क्‍योंकि उस पर राजनीति शुरू हो चुकी थी।
पुलिस की अब तक की पूरी कार्यवाही तथा चंदन बोस, उसकी पत्‍नी पूनम एवं रामवृक्ष के फायनेंसर राकेश गुप्‍ता की गिरफ्तारियों को देखकर तो लगता है कि जवाहर बाग कांड की लीपापोती का खेल शुरू हो चुका है और पुलिस बड़े सुनियोजित तरीके से इसका पटाक्षेप करने में लगी है।
टूटी टांग लेकर चंदन बोस का पत्‍नी सहित जवाहर बाग से निकल भागना, दोनों की गिरफ्तारी पूनम के घर यानि चंदन के सुसराल बस्‍ती जिले के एक गांव से होना। बस्‍ती पुलिस द्वारा सारी लिखा-पढ़ी करने व मीडिया से रूबरू होने के बाद चंदन व पूनम को मथुरा पुलिस के हवाले करना। दो दिन बाद राकेश गुप्‍ता की गिरफ्तारी भी उसके गृह जनपद बदायूं से होना। उसे भी बदायूं की पुलिस द्वारा पूरी लिखा-पढ़ी व कानूनी प्रक्रिया के तहत मथुरा पुलिस के सुपुर्द करना, क्‍या सब-कुछ एक इत्‍तेफाकभर है।
क्‍या शासन-प्रशासन नहीं जानता कि कानूनी प्रक्रिया पूरी करके किसी अपराधी को दूसरे जिले की पुलिस के सुपुर्द करने पर उससे पूछताछ के कितने ”हथियार” शेष रह जाते हैं।
दो पुलिस अधिकारियों को घेरकर मार डालने जैसे गंभीर अपराध के आरोपियों को यदि दूसरे जनपद में पकड़ा भी गया था तो क्‍या सारी कानूनी प्रक्रिया पूरी करके ही उन्‍हें उस जिले की पुलिस के सुपुर्द करना जरूरी था, जिस जिले की पुलिस उनसे बहुत कुछ उगलवा सकती थी। या यूं कहें कि जिनसे बहुत कुछ उगलवाना बेहद जरूरी था।
चंदन बोस, उसकी पत्‍नी पूनम तथा राकेश गुप्‍ता की गिरफ्तारी को देखें तो ऐसा लगता है कि जैसे इनकी गिरफ्तारी के लिए स्‍क्रिप्‍ट पहले तैयार कर ली गई तथा गिरफ्तारी उसके बाद दिखाई गई जिससे सांप मर जाए और लाठी भी न टूटे।
यही कारण है कि दो-दो पुलिस अधिकारियों की नृशंस हत्‍या के जिम्‍मेदार दोनों शातिर अपराधियों से पुलिस ऐसा कुछ नहीं उगलवा सकी जिससे यह पता लग सके कि आखिर किसके संरक्षण में रामवृक्ष पूरे दो साल तक शासन, प्रशासन व अदालतों तक को खुली चुनौती देने में कामयाब रहा। कैसे वह पूरी प्‍लानिंग के साथ हथियार जमा करके पुलिस-प्रशासन पर बेखौफ हमला करने का दुस्‍साहस कर पाया।
पुलिस यह तक पता नहीं लगा सकी कि रामवृक्ष कैसे मारा गया। उसे किसने मारा और कहां मारा।
आगरा से प्रकाशित आज के ”दैनिक हिंदुस्‍तान” का समाचार सच मानें तो राकेश गुप्‍ता ने रामवृक्ष के बारे में पुलिस को जो जानकारी दी है उसके मुताबिक रामवृक्ष को घटना के तुरंत बाद जवाहर बाग की चारदीवारी के बाहर महिला-पुरुषों की भीड़ ने पत्‍थर आदि से तभी मार डाला जब वह भागने की कोशिश कर रहा था। राकेश गुप्‍ता का कहना है कि खुद को घिरा देख वह भी कपड़े उतारकर भीड़ का हिस्‍सा बन गया और भीड़ के साथ रामवृक्ष पर पथराव करने लगा। उसने खुद रामवृक्ष को अपनी आंखों से मरते हुए देखा।
राकेश के दावे से ठीक विपरीत उत्‍तर प्रदेश पुलिस के मुखिया जाविद अहमद ने रामवृक्ष यादव की मौत का कारण जवाहर बाग में उसकी खुद की लगाई गई आग के अंदर जल जाना बताया।
डीजीपी जाविद अहमद ने जिस दिन रामवृक्ष के मारे जाने की पुष्‍टि पहले ट्वीट करके और फिर मीडिया को दी, उस दिन बताया कि मथुरा के एसएसपी राकेश सिंह ने उन्‍हें सारी जानकारी उपलब्‍ध कराई है तथा रामवृक्ष के शव की शिनाख्‍त जेल में बंद उसके एक साथी से करा ली है।
डीजीपी साहब ओर मथुरा के तत्‍कालीन एसएसपी राकेश सिंह क्‍या अब यह बतायेंगे कि यदि रामवृक्ष की मौत जवाहर बाग के अंदर उसकी खुद की लगाई गई आग से हुई थी तो राकेश गुप्‍ता के सामने भीड़ ने जिसे मारा वह कौन था।
उल्‍लेखनीय है कि रामवृक्ष यादव की मौत के इस पुलिसिया दावे को मथुरा में एडीजे-9 की कोर्ट ने भी तब खारिज कर दिया जब वह उसके खिलाफ एक अन्‍य मामले में जारी गैर जमानती वारंट की तामील न करा पाने का कारण उसकी मौत बताकर अपना पीछा छुड़ाना चाहती थी।
कोर्ट ने पुलिस की कहानी पर सवालिया निशान लगाते हुए उसे आदेशित किया है कि वह रामवृक्ष का डीएनए कराकर पूरे तथ्‍यों सहित कोर्ट के समक्ष हाजिर हो।
जहां तक सवाल चंदन बोस और उसकी पत्‍नी का है, तो पुलिस की पूछताछ में उन्‍होंने रामवृक्ष के बावत कोई जानकारी नहीं दी।
आगरा से ही प्रकाशित आज का दैनिक जागरण भी यही कहता है कि चंदन बोस से पुलिस रामवृक्ष के बारे में कुछ नहीं उगलवा सकी। सिवाय इसके के रामवृक्ष मारा जा चुका है।
ऐसा लगता है कि पुलिस भी अपने ही दो अधिकारियों की शहादत को जैसे भूलने लगी है और शहीदों के परिजनों को आर्थिक मदद करके ही अपने कर्तव्‍य की इतिश्री मान बैठी है।
यदि ऐसा नहीं होता तो यह कैसे संभव था कि जहां इतना बड़ा कांड हुआ, जहां के दो बड़े अफसरान डीएम व एसएसपी को घटना के लिए जिम्‍मेदार ठहराते हुए उनका तबादला कर दिया गया, उस जिले की पुलिस रामवृक्ष के दाहिने व बाएं किसी हाथ को नहीं पकड़ सकी और मात्र खाना-पूरी करने तक सिमट कर रह गई।
जिन तेज-तर्रार एसएसपी बबलू कुमार और अनुभवी डीएम निखिल चंद्र शुक्‍ला को हवाई मार्ग के जरिए मथुरा भेजा गया, वो देखते रह गए और चंदन बोस तथा राकेश गुप्‍ता की गिरफ्तारी का श्रेय बस्‍ती व बदायूं की पुलिस ले गई।
क्‍या वाकई यह सब इत्‍तेफाक ही है अथवा इस सबके पीछे भी वही राजनीतिक ताकत काम कर रही है जो रामवृक्ष को दो साल तक संरक्षण देने में काम करती रही थी।
कहीं दो जांबाज अफसरों की हत्‍या के आरोपी चंदन बोस तथा रामवृक्ष के फायनेंसर राकेश गुप्‍ता सहित रामवृक्ष के पूरे गैंग और उसके संरक्षणदाताओं को बचाने के लिए ही तो यह ”सारे इत्‍तेफाक” नहीं हो रहे।
लगता तो ऐसा ही है क्‍योंकि अब तक पुलिस न तो उस असलाह को बरामद कर सकी है जिस असलाह से एसओ फरह संतोष यादव की हत्‍या हुई, न यह बता सकी है जब उसकी ओर से 200 राउंड फायर किए गए तो एक भी गोली किसी उपद्रवी को क्‍यों नहीं लगी जबकि राकेश गुप्‍ता की लाइसेंसी रायफल पुलिस को जवाहर बाग से मिल गई लेकिन रिवॉल्‍वर अब तक नहीं मिली।
नए एसएसपी बबलू कुमार ने यह तो मीडिया के समक्ष स्‍वीकार किया कि पुलिस की ओर 200 राउंड फायर किए गए लेकिन यह नहीं बताया कि फायर कहां तथा किसलिए किए गए।
मथुरा पुलिस ने तो घटना के 17 दिन बाद अब तक उन पुलिसकर्मियों के खिलाफ भी कोई कार्यवाही नहीं की है जो सत्‍याग्रह के नाम पर एकजुट हुए भेड़ियों के बीच मुकुल द्विवेदी को अकेला छोड़कर भाग खड़े हुए थे।
पुलिस के पास इस बात का भी शायद ही कोई जवाब हो कि जवाहर बाग में आगजनी करने वाले यदि कथित सत्‍याग्रही ही थे तो वह अपनी ही लगाई आग में कैसे जल गए और चंदन बोस, पूनम, राकेश यादव, रामवृक्ष का लड़का विवेक स्‍वाधीन यादव, वीरेश यादव व इनके जैसे अनेक दूसरे शातिर अपराधी कैसे बच निकलने में सफल रहे।
अब तक की पूछताछ से जो सामने आया है, उसके अनुसार जवाहर बाग की हिंसा के आरोपियों में से एकमात्र रामवृक्ष ही कथित तौर पर मारा गया है, बाकी सभी शातिर अपराधी बड़े इत्‍मीनान के साथ निकल गए।
अब जो पकड़े भी जा रहे हैं, वह भी अपने प्रभाव वाले दूसरे जनपदों में पकड़े जा रहे हैं ताकि मथुरा पुलिस सिर्फ खानापूरी करती रहे और कार्यवाही होती दिखाई तो दे किंतु नतीजा ढाक के तीन पात ही रहे।
अगर अब भी शहीद पुलिस अफसरों के परिजन अथवा मथुरा की जनता ऐसी कोई गलतफहमी पाले बैठी हो कि जवाहर बाग कांड का पूरा सच सामने आ पायेगा, तो उसे अपनी गलतफहमी दूर कर लेनी चाहिए क्‍योंकि उत्‍तर प्रदेश पुलिस इस इतने गंभीर व संगीन केस में भी उसी ढर्रे पर चल पड़ी है जिसके लिए वह पहचानी जाती है और जिसके कारण मुकुल द्विवेदी व संतोष यादव जैसे अफसरों को अपनी जान गंवानी पड़ती है।
सच तो यह है कि ”कोई शक्‍ति” लगातार इस पूरे कांड पर बारीकी से नजर रख रही है और पुलिस को हिदायत दे रही है कि उसे क्‍या करना है तथा कैसे करना है ताकि जवाहर बाग कांड के असली दोषियों को साफ बचाया जा सके।
विपक्षी दलों ने भी जवाहर बाग कांड पर एकसाथ चुप्‍पी साध ली है क्‍योंकि उनके हाथ अब राजनीति के लिए ”कैराना का सांप्रदायिक मुद्दा” लग चुका है। सांप्रदायिकता निश्‍चित ही हमेशा से राजनीतिज्ञों का पसंदीदा विषय रही है क्‍योंकि उससे जितना उबाल लाया जा सकता है, उतना दो पुलिस अफसरों की शहादत से संभव नहीं हो सकता। इस मामले में सारे राजनीतिक दल एक जैसे हैं। यूं भी यूपी में चुनावों की दुंदुभि बज चुकी है। चुनावों में ध्रुवीकरण के लिए आखिर जाति, धर्म, संप्रदाय की राजनीति ही काम आयेगी। जवाहर बाग में जो कुछ हुआ उसे किसी जाति, धर्म या संप्रदाय से जोड़ पाना संभव नहीं है। संभव होता तो पुलिस-प्रशासन इस तरह उसकी लीपापोती नहीं कर पाता जैसी कि अब की जा रही है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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