2019 के लोकसभा चुनावों में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी करीब 120 सिटिंग सांसदों का पत्ता काटने वाली है। इनमें करीब डेढ़ दर्जन सांसद तो ऐसे हैं जो वर्तमान मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री बने बैठे हैं। पार्टी अब इन सांसदों को टिकट देने के ही मूड में नहीं है।
इस बावत पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा की गई मीटिंग में उपस्थित रहे सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार भाजपा अपने इस समय मौजूद कुल 273 लोकसभा सदस्यों में से लगभग 45 प्रतिशत सदस्यों का पत्ता काटने की तैयारी कर चुकी है जिनमें वो 19 सांसद भी शामिल हैं जो 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले 75 साल की उम्र पूरी करने वाले हैं।
75 साल और उससे अधिक की उम्र वाले ऐसे सांसदों में पार्टी के मार्गदर्शक मंडल से लालकृष्ण आडवाणी तथा मुरली मनोहर जोशी के अलावा करिया मुंडा, शांता कुमार, भुवनचंद्र खंडूरी, लीलाधरभाई वाघेला, कलराज मिश्र, रामटहल चौधरी, हुकुमदेव नारायण यादव के नाम प्रमुख हैं।
बताया जाता है कि 75 साल की उम्र पूरी करने वाले सांसदों के अलावा जिन सांसदों का टिकट 2019 में काटा जाना है, उनकी परफॉरमेंस के बारे में पार्टी ने विभिन्न स्तर पर अपने सोर्सेज से फीडबैक ले लिया है।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक फीडबैक देने वालों में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ यानि आरएसएस के अलावा चुनिंदा पार्टी कार्यकर्ता तो हैं ही, साथ ही कुछ प्राइवेट एजेंसीज तथा ”नमो एप” की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
इन सभी सोर्सेज ने सीधे प्रधानमंत्री मोदी को अपने-अपने सर्वे से अवगत कराया है और इसी आधार पर यह निर्णय लेने की तैयारी की गई है ताकि समय रहते 2019 के लिए लोकप्रिय व ईमानदार चेहरों को तलाश लिया जाए।
गत दिनों हरियाणा के सूरजकुंड में इस विषय पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व द्वारा की गई बैठक में राष्ट्रीय सचिव और महासचिव एवं आरएसएस के वरिष्ठ नेता भी मौजूद थे। इस बैठक में विस्तृत रूप से इस बात पर चर्चा के बाद सहमति बनी कि नाकाबिल सिटिंग सांसदों को टिकट न दिया जाए।
ऐसे सांसदों में सबसे अहम नाम विदेश मंत्री और मध्य प्रदेश के विदिशा से सांसद सुषमा स्वराज का है क्योंकि विदिशा की जनता सुषमा स्वराज से खासी नाराज बताई गई है। इसके अलावा नीति आयोग ने भी विदिशा की विकास संबंधी रिपोर्ट को बहुत खराब बताया है।
बताया जाता है कि संगठन के सचिव और महासचिवों ने अपनी रिपोर्ट में जिन सांसदों की जनता के बीच परफॉरमेंस और पॉपुलेरिटी पूअर बताई गई है, उनकी संख्या एक सैकड़ा से अधिक है।
ऐसे सभी सांसदों को पार्टी ने अंतिम रूप से अधिकतम 6 माह का समय इसलिए दिया है कि यदि वह इस दौरान अपनी परफॉरमेंस को पूअर से प्रॉपर बना पाते हैं तो उन्हें चुनाव लड़ाने के बावत विचार किया जा सकता है।
पार्टी ने ये समय भी इसलिए दिया है ताकि इसी वर्ष चार राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों के नतीजे भी सामने आ जाएं और वहां के सिटिंग भाजपा सांसदों की परफॉरमेंस का ठोस आकलन किया जा सके।
इन सब के अलावा पार्टी उन सांसदों को रीप्लेस करने का पूरा मन बना चुकी है जिन्होंने पार्टी के अंदर रहकर मोदी सरकार के काम-काज की न सिर्फ तीखी आलोचना की है बल्कि समय-समय पर पार्टी को नुकसान पहुंचाने का काम भी किया है।
पार्टी के अंदरुनी और अत्यंत भरोसमंद इन सूत्रों के अनुसार 2019 के लोकसभा चुनावों में जिन सांसदों का पत्ता काटा जाना है उनमें से करीब डेढ़ दर्जन ने उत्तर प्रदेश से जबकि 26 ने मध्यप्रदेश जीत हासिल की थी। बाकी का ताल्लुक राजस्थान, बिहार, मध्य प्रदेश, कर्नाटक व गुजरात से है।
इस सबके बीच पार्टी ने इस बात का भी पूरा ख्याल रखा है कि विपक्ष का संभावित गठबंधन कौन-कौन से और कहां-कहां के उम्मीदवारों को प्रभावित कर सकता है।
उल्लेखनीय है कि मथुरा भी ऐसा ही संसदीय क्षेत्र है जहां विपक्ष का संभावित गठबंधन भाजपा के सामने संकट खड़े कर सकता है।
मथुरा से 2014 में भी भाजपा ने बाहरी प्रत्याशी सिने अभिनेत्री हेमा मालिनी को चुनाव लड़वाया क्योंकि तब यहां पार्टी को कोई जिताऊ कद्दावर प्रत्याशी नहीं मिल सका था।
बाहरी प्रत्याशियों को लेकर मथुरा की जनता का जैसा कटु अनुभव पूर्व में रहा है, उसमें फिलहाल कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो सकी है। बात चाहे हरियाणा से आए मनीराम बागड़ी की हो अथवा फर्रुखाबाद से आए डॉ. सच्चिदानंद हरि साक्षी महाराज की। रालोद के युवराज जयंत चौधरी की हो अथवा मायानगरी से आईं स्वप्न सुंदरी हेमा मालिनी की।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
हिंदी साहित्य के पुरोधा महावीरप्रसाद द्विवेदी का पत्रकारिता के क्षेत्र में भी बहुत बड़ा योगदान है। हिंदी पत्रकारिता जगत में नींव के पत्थर ‘आज’ व ‘ प्रताप’ जैसे अखबारों के संपादक बाबूराव विष्णु पराड़कर व गणेश शंकर विद्यार्थी ने भी महावीर प्रसाद द्विवेदी से प्रेरणा पाकर पत्रकारिता जगत में प्रवेश किया था।
आचार्य द्विवेदी से गणेश शंकर विद्यार्थी किस कदर प्रभावित थे, इसका अंदाज उनके द्वारा कानपुर में स्थापित किए गए अखबार ‘प्रताप’ के प्रथम पृष्ठ पर छापी जाने वाली कविता की दो शुरूआती लाइनों से मिलता है।
आचार्य द्विवेदी की यह कविता थी-
‘जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है,
वह नर नहीं नर पशु निरा है और मृतक समान है।’
आचार्य द्विवेदी यदि आज जिंदा होते तो उनके ऊपर दक्षिणपंथी विचारधारा को पोषित करने का आरोप लगाया जा चुका होता। हो सकता है कि आचार्य द्विवेदी को “छद्म राष्ट्रवादी” और यहां तक कि “मोदी भक्त” की उपमा भी दे दी जाती क्योंकि उनकी कविता ”राष्ट्रभक्ति” के लिए प्रेरित करती है।
2014 में प्रधानमंत्री के पद पर नरेन्द्र दामोदरदास मोदी का चुनाव एक वर्ग विशेष के लिए इतना बड़ा सदमा था जिससे वह हर हाल में उबरना चाहते हैं। फिर चाहे उसके लिए किसी भी हद तक गिरना पड़े।
याद कीजिए कांग्रेस के कद्दावर नेता और उस समय घोषित रूप से गांधी परिवार की नाक के बाल मणिशंकर अय्यर का वह वक्तव्य जिसमें उन्होंने एक प्रकार का ऐलान करते हुए कहा था कि एक चाय बेचने वाला कभी भारत का प्रधानमंत्री नहीं बन सकता। हां, चुनाव बाद यदि वह चाहे तो कांग्रेस मुख्यालय के बाहर चाय बेच सकता है।
ऐसे में जब एक चाय बेचने वाला प्रधानमंत्री बन गया तो सदमा लगना स्वाभाविक था।
यही कारण रहा कि 2014 से पहले पूरे दस साल तक पाकिस्तान के साथ बातचीत की ”वकालत” करने वाले कांग्रेसियों ने मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में तमाम देशों के साथ पाकिस्तान को भी निमंत्रण देने का विरोध किया।
दरअसल, यह तो शुरूआत थी। इसके बाद लगातार ऐसे-ऐसे मुद्दे उठाए जाते रहे जिनका आम जनता से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था। यहां तक कि नेशनल हेराल्ड केस में कोर्ट के आदेश को भी राजनीतिक विद्वेष बताकर कई दिनों तक संसद की कार्यवाही बाधित की गई।
इसके बाद ललित मोदी प्रकरण, विजय माल्या, सर्जीकल स्ट्राइक से लेकर आपराधिक घटनाओं तक के लिए मोदी को निशाना बनाया गया।
कभी सम्मान वापसी अभियान चलाया गया तो कभी जेएनयू के छुटभैये छात्र नेताओं का सहारा लिया गया। कभी हार्दिक की आड़ लेकर पटेल आंदोलन को हवा दिलाई गई तो कभी जिग्नेश मेवाणी और अल्पेश ठाकोर को मोहरा बनाया गया।
इस दौरान नोटबंदी और जीएसटी पर हंगामा खड़ा किया गया और देशभर में मोदी को खलनायक साबित करने का अथक प्रयास किया गया।
अब जबकि किसी भी तरह सदमे से उबरने में सफलता नहीं मिली तो पहले कुछ कथित ईसाई धर्मगुरुओं से चिठ्ठियां लिखवा दीं, और फिर एक लंबे अरसे से हाशिए पर पड़ी अरुंधति राय का इंटरव्यू ले आए।
अरुंधति राय ने एक सवाल के जवाब में कहा मोदी सरकार में जो चीज़ें घटित हो रही हैं वो डराने वाली हैं। उन्होंने यह नहीं बताया कि वह खुद कितनी डरी हुई हैं।
अरुंधति राय से पहले भी उंगलियों पर गिने जाने लायक कुछ लोगों ने कहा कि देश में डर का माहौल है।
अभिनेता आमिर खान ने इस माहौल का बयान करने के लिए अपनी बेगम को बलि का बकरा बनाया। हालांकि बाद में वह अपनी बेगम के डर का कारण बता पाने में असमर्थ रहे और मीडिया के सिर ठीकरा फोड़कर दबी जुबान में ”सॉरी” बोल दिया।
अरुंधति ने कहा, ”अगर भारत में आज के हालात देखें तो मुस्लिम समुदाय को अलग-थलग किया जा रहा है। सड़कों पर लोगों को घेर कर मार दिया जा रहा है। मुसलमानों को आर्थिक गतिविधियों से अलग किया जा रहा है। मांस के कारोबार, चमड़े के काम और हथकरघा उद्योग सब पर हमले किए गए हैं।” अरुंधति के अनुसार ”भारत में हिंसा की वारदातें डराने वाली हैं।
बेहतर होता कि अरुंधति यह सब बोलने से पहले कभी बांगलादेश की निष्कासित लेखिका तस्लीमा नसरीन से यह पूछ लेतीं कि उन्हें मोदीराज में डर क्यों नहीं लग रहा। वो तो अरुंधति की हमपेशा होने के साथ-साथ मुस्लिम भी हैं, और महिला भी।
आपराधिक वारदातें किसी के प्रति हों और कहीं भी हों, उनकी निंदा की जानी चाहिए किंतु उनका इस्तेमाल अपनी घटिया मानसिकता को पोषित करने तथा देश में जबरन भय का वातावरण तैयार करने के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
अरुंधति जैसी महिला को तो यह सब बोलने का इसलिए भी कोई अधिकार नहीं है क्योंकि वह तो कश्मीर को भारत से अलग करने की हिमायत कर ही चुकी हैं।
न्यायालय द्वारा सबक सिखाए जाने के बाद भी उनका अनर्गल प्रलाप करना यह साबित करता है कि वह आदतन देशद्रोही हैं और देश को किसी न किसी माध्यम से बदनाम करना उनकी मुहिम का हिस्सा है।
सच तो यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर देश की संवैधानिक संस्थाओं, लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं, सेना व सुरक्षाबलों सहित मोदी सरकार और यहां तक कि न्यायपालिकाओं के निर्णयों पर सवाल उठाकर देश को बदनाम करने का बाकायदा एजेंडा चलाया जा रहा है।
इसी एजेंडे के तहत कथित डरे हुए लोग मोदी को पानी पी-पीकर कोसते हैं और प्रधानमंत्री के प्रति अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हैं।
कैसा है आखिर ये डर, और कैसे हैं ये डरे हुए लोग जो खुद मुस्कुराते हुए टीवी चैनलों पर आते हैं, मीडिया को इंटरव्यू देते हैं, इंटरव्यू में देश के प्रधानमंत्री को नीच बताते हैं और सेना के खून की दलाली करने वाला कहते हैं।
क्या कोई डरा हुआ आदमी देश के प्रधानमंत्री को मंच पर चढ़कर खुलेआम गालियां दे सकता है। क्या किसी डरी हुई कौम का कोई नुमाइंदा (अकबरुद्दीन औवेसी) 15 मिनट मिलने पर सार्वजनिक रूप से देश के बहुसंख्यकों को नेस्तनाबूद करने की धमकी दे सकता है।
यह कैसा डर है भाई, जो सबको डराता है सिवाय उनके जो देश में डर का माहौल होने की बात करते हैं और राष्ट्रीय टीवी चैनल्स पर देश के प्रधानमंत्री को खुलेआम गरियाते हैं।
चेहरे पर नकाब चढ़ाकर जोर-जोर से चीखने-चिल्लाने वाले जब कहते हैं कि देश में भय का वातावरण है तो उनका षडयंत्र हर किसी को समझ में आता है।
समझ में आता है कि क्यों कुछ दल लामबंद होकर मतपत्रों के जरिए मतदान करने की बात करते हैं। क्यों वो उस युग में लौट जाना चाहते हैं जब ”बूथ कैप्चरिंग” आम बात हुआ करती थी।
खूब समझ में आता है कि आधी-आधी रात को दोषसिद्ध आतंकवादी के लिए सुप्रीम कोर्ट खुलवाने वाले तत्व ही पांच न्यायाधीशों की व्यक्तिगत प्रॉब्लम को समूची न्यायव्यवस्था पर खतरा बताने का दुष्प्रचार करते हैं।
क्यों सेना की सर्जीकल स्ट्राइक पर संदेह उत्पन्न किया जाता है और क्यों बार-बार निर्वाचन आयोग पर उंगली उठाई जाती है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ये कैसे हिमायती हैं जो एक पूर्व राष्ट्रपति द्वारा आरएसएस का निमंत्रण स्वीकार कर लेने पर सिर्फ इसलिए छाती पीटने लगते हैं कि कभी वह कांग्रेस के हिस्से हुआ करते थे।
क्या इनमें से कोई बता सकता है कि पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मायने उन्होंने अलग गढ़ रखे हैं और अपने लिए अलग।
सच तो यह है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हक का जितना दुरुपयोग मोदी सरकार के रहते हो रहा है, उतना पहले कभी नहीं हुआ। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हक किसी को खुलेआम गाली देने, निराधार आरोपित करने अथवा देश में एक सुनियोजित साजिश के तहत भय का वातावरण बनाने के लिए नहीं मिला है। अपनी बात शालीनता के साथ कहने के लिए मिला है।
इस सबके बावजूद अरुंधति राय या उनके जैसे दूसरे लोगों को, संस्थाओं को अथवा वर्ग विशेष को यह लगता है कि मोदी सरकार में डर का माहौल है तो देशवासी होने के नाते पहले वह यह बताएं कि इस कथित डर को दूर करने के लिए उन्होंने क्या किया या वो क्या कर रहे हैं।
भारत ही क्या दुनिया के किसी भी देश में वहां के नागरिकों को कोई अधिकार सिर्फ इसलिए प्राप्त नहीं होता कि वह उस अधिकार का निजी हित में तो भरपूर इस्तेमाल करे किंतु जनता के बीच उसका जितना संभव हो दुरुपयोग करता रहे। वो भी इसलिए क्योंकि कुछ तत्व मोदी विरोधी बकवास को भी लपकने के लिए हमेशा तैयार बैठे रहते हैं।
करोड़ों रुपए कमाकर सभी सुख-सुविधाओं से लैस ये डराने वाले लोग जब देश में डर का माहौल होने की बात करते हैं तो ऐसा लगता है जैसे कोई रावण एकबार फिर लक्ष्मण रेखा लांघकर देश के सतीत्व का हरण करने की कोशिश कर रहा है।
इन रावणों को समय रहते यह समझ लेना चाहिए कि लक्ष्मण रेखा लांघना हर युग में आत्मघाती साबित हुआ है। फिर वह युग मोदी का ही क्यों न हो।
लोकतंत्र में सरकार को कठघरे के अंदर खड़ा करने का हक सबको है किंतु देश को बदनाम करने का हक किसी को नहीं।
महावीरप्रसाद द्विवेदी के अनुसार ऐसा करने वाले नर के रूप में पशु और मुर्दे के समान हैं। शायद अब ऐसे मुर्दों को उनकी उचित जगह दिखाने का समय आ गया है क्योंकि उनसे निज गौरव व निज देश पर अभिमान करने की उम्मीद लगाना व्यर्थ है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
आज हिंदी पत्रकारिता दिवस है। इस वर्ष के पत्रकारिता दिवस का महत्व इसलिए और बढ़ जाता है क्योंकि इन दिनों राजनीति के साथ-साथ पत्रकारिता भी विभिन्न कारणों से विमर्श के केंद्र में है। हाल ही में ”कोबरा पोस्ट” द्वारा किए गए एक स्टिंग ऑपरेशन ने इस विमर्श को ज्वलंत बना दिया है।
कोबरा पोस्ट के स्टिंग में कितना दम है, यह तो फिलहाल जांच का विषय है किंतु इतना तय है कि सबके ऊपर उंगली उठाने वाले मीडिया की अपनी तीन उंगलियां खुद उसके ऊपर उठी हुई हैं।
यहां बात केवल मीडिया के बिकाऊ होने की नहीं है, बात लोकतंत्र के उस अस्तित्व की है जिसका एक मजबूत पिलर मीडिया खुद को मानता है। अब इस मजबूत पिलर की बुनियाद हर स्तर पर खोखली होती दिखाई दे रही है।
खबरों के नाम पर सारे-सारे दिन बासी व उबाऊ कंटेन्ट परोसना और बेतुके विषयों पर बेहूदों लोगों को बैठाकर सातों दिन डिस्कशन कराने के अतिरिक्त मीडिया के पास जैसे कुछ रह ही नहीं गया।
आश्चर्य की बात तो यह है कि डिस्कशन का विषय चाहे कुछ भी हो, पैनल में चंद रटे-रटाये चेहरे प्रत्येक टीवी चैनल पर देखे जा सकते हैं। बहस का विषय भले ही बदलता रहता हो किंतु चेहरे नहीं बदलते।
क्या सवा सौ करोड़ की आबादी वाले इस देश में मात्र कुछ दर्जन लोगों को ही वो ज्ञान प्राप्त है जिसके बूते वह खेत से लेकर खलिहान तक और आकाश से लेकर पाताल तक के विषय पर चर्चा कर लेते हैं।
राजनीति, कूटनीति, रणनीति, विदेशनीति व अर्थनीति ही नहीं…धर्म, जाति और संप्रदाय जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी बहस के बीच वही चंद चेहरे बैठे मिलते हैं।
तथाकथित सभ्य समाज से ताल्लुक रखने वाले ये लोग जब बहस का हिस्सा बनते हैं तो यह पता लगते देर नहीं लगती कि कहीं न कहीं उनके डीएनए में खोट जरूर है।
पिछले कुछ समय से टीवी चैनल्स पर आने वाली डिबेट्स का स्तर देखकर कोई भी अंदाज लगा सकता है कि इन सो-कॉल्ड विशेषज्ञों की असलियत क्या होगी।
जाहिर है कि बहस कराने वाले एंकर्स इनसे अलग नहीं रह पाते और वह अब एंपायर या रैफरी की जगह अतिरिक्त खिलाड़ी बन जाते हैं। ऐसे में एंकर्स के ऊपर आरोप लगाना पैनल के विशेषज्ञों की आदत का हिस्सा बन चुका है। तथाकथित विशेषज्ञ उन्हें भी अपने साथ हमाम में नंगा देखना चाहते हैं।
रही बात प्रिंट मीडिया की, तो व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ में वह भी पतन के रास्ते पर चल पड़ा है। विज्ञापन के लिए अख़बार न सिर्फ समाचारों से समझौता करने को तत्पर रहते हैं बल्कि किसी भी हद तक गिरने को तैयार हैं।
बाकी कोई कसर रह जाती है तो उसे सोशल मीडिया पूरी कर देता है। पत्रकारिता की आड़ में सोशल मीडिया पर आवारा साड़ों का ऐसा झुण्ड चौबीसों घंटे विचरण करता है जिसकी नाक में नकेल डालना फिलहाल तो किसी के बस में दिखाई नहीं देता।
तिल का ताड़ और रस्सी का सांप बनाने में माहिर ये झुण्ड इस कदर बेलगाम है कि टीवी चैनल्स ने इनका ”वायरल टेस्ट” करने की दुकानें अलग से खोल ली हैं। अब लगभग हर टीवी चैनल पर ऐसी खबरों के ”वायरल टेस्ट” की भी खबरें आती हैं।
इन हालातों में सिर्फ पत्रकारिता दिवस मनाने और उसके आयोजन में नेताओं को बुलाकर उनके गले पड़ने से कुछ बदलने वाला नहीं है। सही मायनों में पत्रकारिता दिवस मनाना है तो उस सोच को बदलना होगा जिसने पत्रकारों के साथ-साथ पत्रकारिता को भी तेजी से कलंकित किया है और जिसके कारण आज पत्रकारिता तथा नेतागीरी एकसाथ आ खड़े हुए हैं। जिसके कारण समाज का आम आदमी पत्रकारों को भी उतनी ही हेय दृष्टि से देखने लगा है जितनी हेय दृष्टि से वह नेताओं को देखता है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
यदि आपने कभी कतई सड़क छाप लोगों को आपस में लड़ते-भिड़ते और गाली-गलौज करते नहीं देखा-सुना तो यह खबर आपके लिए नहीं है।
यदि आपने कभी किसी को नमक से नमक खाते हुए नहीं देखा, तो भी यह खबर आपके मतलब की नहीं है।
और अगर कभी आपने किसी आदतन अपराधी को कोर्ट में यह दलील देते हुए नहीं पाया कि तमाम लोग अपराध करते हैं इसलिए मैं भी अपराध करता हूं, तो फिर यह खबर आपके किसी काम की नहीं क्योंकि यह खबर ऐसे ही लोगों के बारे में है।
उन लोगों के बारे में जो टीवी पर बैठकर सड़क छाप लोगों से भी गई-गुजरी भाषा का इस्तेमाल करते हैं। उन्हीं लोगों की तरह हर वक्त अशिष्टता करने पर आमादा रहते हैं।
जो नमक से नमक खाने की कोशिश को जायज ठहराने के साथ-साथ ऐसा करने की लगातार कोशिश भी करते हैं।
जो हर सवाल का हमेशा एक ही जवाब देते हैं कि दूसरों ने ऐसा किया इसलिए हम भी कर रहे हैं, अथवा हमने जो किया वही दूसरे भी कर रहे हैं तो फिर गलत क्या किया।
दरअसल, इन दिनों ऐसे तत्वों को विभिन्न टीवी चैनल पैनल डिस्कशन के नाम पर अपना मंच प्रदान करा रहे हैं। जिन्ना की तस्वीर टांगने जैसा कोई घटिया सा मुद्दा हो या फिर संवैधानिक संस्थाओं पर उंगली उठाने जैसा गंभीर मामला ही क्यों न हो। घटिया से घटिया और गंभीर से गंभीर मुद्दे पर बहस के लिए टीवी चैनल्स के पास कुछ रटे-रटाए चेहरे हैं। यही चेहरे आप हर रोज चीखते-चिल्लाते और अपनी असलियत बताते देख सकते हैं। बहस का विषय बेशक हर दिन बदलता हो परंतु बहस में शामिल होने वाले चेहरे कभी नहीं बदलते।
टीवी चैनल्स पर कराई जाने वाली बहसों का स्तर ऐसा हो गया है कि बहुत से लोग तो टीवी से नफरत करने लगे हैं। जहां तक इनकी पत्रकारिता का सवाल है, तो शायद ही अब कोई ऐसा व्यक्ति मिले जो इन्हें देखते ही समूची पत्रकार बिरादरी को कोसने न लगता हो।
सोशल साइट्स गवाह हैं इस सच्चाई की कि लिपे-पुते चेहरे वाले मेल व फीमेल टीवी एंकर्स जो पत्रकार होने का मुगालता भी पाले रहते हैं, उनकी आम छवि कैसी बन चुकी है।
आश्चर्य तो यह है कि इनमें से कुछ टीवी एंकर्स खुद को सेलेब्रिटी समझने लगे हैं। उनकी मानें तो लोग उन्हें इसलिए ट्रोल करते हैं, पीछा करते हैं, फोटो खींचते हैं और गरियाते भी हैं क्योंकि वह बहुत प्रसिद्ध हैं।
इन टीवी एंकर्स की नजर में कुख्यात और प्रख्यात शायद एक ही शब्द है, न कि विरोधाभाषी।
बहरहाल, आप किसी भी मुद्दे पर किसी भी टीवी चैनल की बहस का स्तर देख लीजिए। आपको आत्मसंतुष्टि होगी कि जिस प्रकार नेताओं की कोई जाति नहीं होती या यूं कह लीजिए कि हर नेता की एक ही जाति होती है, उसी प्रकार हर टीवी चैनल की बहस का स्तर भी समान होता है।
बहस की बदबू दूर-दूर तक मारक हो इसलिए अब तमाम टीवी चैनल अपने कथित पैनल डिस्कशन में पाकिस्तानियों तथा कश्मीर के अलगाववादियों को भी शामिल करने लगे हैं।
भारतीय टीवी चैनल्स की कृपा से पाकिस्तानी और उनके सरपरस्त चंद कश्मीरी सफेदपोश न सिर्फ अपना एजेंडा पूरे विश्व को बता जाते हैं बल्कि यह भी देख लेते हैं कि हमारे नेता भाषा के स्तर पर किस कदर कुत्तों के भोंकने से भी नीचे जा पहुंचे हैं।
टीवी चैनल्स की मानें तो वह पाकिस्तानियों एवं सफेदपोश आतंकवादियों को बहस का हिस्सा इसलिए बनाते हैं ताकि देश व देशवासियों को उनकी सोच का पता लग सके और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी आंच न आए।
हो सकता है कि बहुत जल्द टीवी चैनल्स अपने इसी एजेंडे को आगे ले जाने के लिए उन सभी कुख्यात आतंकवादियों को भी बहस का हिस्सा बनाने लगें जो एक लंबे अरसे से भारत को तोड़ने की कोशिश में लगे हैं क्योंकि टीवी चैनल्स की नीति के अनुसार उनको भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उतना ही हक है जितना कि सैनिकों पर पत्थर बरसाने वाले कश्मीरियों का।
आगे आने वाले समय में अभिव्यक्ति की स्वछंदता के पक्षधर टीवी चैनल्स बलात्कारियों को भी बहस का हिस्सा बनाने लगें तो कोई आश्चर्य नहीं क्योंकि बलात्कारी भी तो दिखता इंसानों की तरह ही है। वह अंदर से भेड़िया हो तो हो।
किसी भी टीवी चैनल की बहस में शामिल पैनल को देख लीजिए। एक पार्टी का नेता कहेगा कि हमारे शासनकाल में इतने बलात्कार नहीं होते थे। आंकड़े गवाह हैं कि हमारे पिछले दस साल के कार्यकाल में बलात्कारों की संख्या इस शासनकाल में हो रहे बलात्कारों से काफी कम थी। इनके चार साला कार्यकाल में हुए बलात्कारों की संख्या से हमारे साठ साल के शासनकाल में हुए बलात्कारों की संख्या से तुलना करके देख लीजिए कि इनके बलात्कार कितने ऊपर जाएंगे और हमारे बलात्कार कितने नीचे थे। मुद्दा कोई भी हो, तुलनात्मक अध्ययन शुरू हो जाता है और फिर बहस, बहस न होकर तू-तू-मैं-मैं से होती हुई तू कुत्ता और तेरा बाप कुत्ता तक जा पहुंच जाती है।
कुल मिलाकर टीवी चैनल्स के सहयोग से सभी पार्टियां और उनके नेता देश की आंखों में धूल झोंक रहे हैं। टीवी चैनल्स से हटते ही ये कभी किसी रेस्तरां में तो कभी संसद अथवा विधानसभाओं के गलियारों में एक-दूसरे की पीठ खुजाते देखे जा सकते हैं। इसके लिए बहुत प्रयास नहीं करने पड़ते।
कोई टीवी चैनल हर दिन ताल ठोक रहा है तो कोई दंगल करा रहा है। कोई चक्रव्यूह में फंसा रहा है तो कोई मास्टर स्ट्रोक लगा रहा है। सबके अपने धंधे हैं और सबके अपने फंदे। देश तथा देशवासी जाएं भाड़ में। हम तो अपने धंधे और फंदे के लिए पाकिस्तानियों को भी मंच देंगे और उन कश्मीरियों को भी जो खाते यहां की हैं लेकिन बजाते पाकिस्तानियों की हैं।
हजारों बलात्कारियों में से सजा किसी एक आसाराम और एक राम रहीम को ही तो होती है, बाकी तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मजा लूट रहे हैं। टीआरपी के खेल में देश के साथ बलात्कार होता हो तो हो, हम तो सबको मंच देंगे क्योंकि हम मीडिया हैं। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहला हक हमारा है।
हम जानते हैं कि बलात्कार सिर्फ एक शरीर पर ही नहीं होता, आत्मा पर भी होता है। बलात किया गया हर कार्य बलात्कार की परिभाषा का हिस्सा है लेकिन यह ज्ञान दूसरों को बांटने के लिए है, खुद के लिए नहीं।
तीतर-बटेर लड़ाना हमारा पेशा है। ठीक उसी तरह जिस तरह वैश्यावृत्ति या देह व्यापार। शब्दों का फेर हो सकता है परंतु मूल में तो धंधा ही निहित है इसलिए कोई कुछ कहे, हम अपना धंधा जारी रखेंगे।
प्रेस से मीडिया और मीडिया से मीडिएटर का सफर ऐसे ही पूरा नहीं किया। उसके लिए बड़े पापड़ बेले हैं।
अब यदि हमारे प्लेटफार्म का उपयोग कोई लड़ने-भिड़ने, गाली-गलौज करने, अपने-अपने कुकर्मों का तुलनात्मक अध्ययन करने और नमक से नमक खाकर दिखाने की कलाकारी के लिए करता है तो हमें क्या।
तीतर-बटेर लड़ाकर, कुत्ते-बिल्लियों को भिड़ाकर और गुण्डे-मवालियों को बरगलाकर यदि अपना काम चलता है तो बुरा क्या है। आत्मा सुखी तो परमात्मा सुखी। चैनल की टीआरपी के लिए हमारा भी इतना नीचे गिरना तो बनता है।
-Legend News
मथुरा। भाजपा की टिकट पर दो बार विधायक रहे अजय कुमार पोइया अब अपनी ही सरकार से गुहार लगा रहे हैं कि सफेदपोश भूमाफियाओं ने भगवान श्रीकृष्ण की नगरी में अरबों रुपए मूल्य की सरकारी जमीन पर कब्जा कर रखा है, कुछ कीजिए।
भूमाफियाओं ने ग्राम सभा सराय आजमाबाद, तहसील व जिला मथुरा की बेशकीमती जमीन फर्जी पट्टों के जरिए बेच खाई है। सफेदपोश भूमाफियाओं ने वनखण्ड और चारागाह तक को नहीं छोड़ा और राजस्व विभाग की मिलीभगत से उनके भी बैनामे तथा रजिस्ट्री करा दीं।
लगभग 15 साल से एकतरफा कानूनी लड़ाई लड़ रहे पूर्व विधायक अजय कुमार पोइया को वर्ष 2009 में तब उम्मीद की किरण दिखाई दी थी जब राजस्व परिषद उत्तर प्रदेश के तत्कालीन आयुक्त व सचिव संजीव दुबे ने तत्कालीन प्रमुख सचिव उत्तर प्रदेश शैलेश कृष्ण को बाकायदा पत्र लिखकर यह जमीन सफेदपोश भूमाफियाओं के चंगुल से निकालने और अनियमित आवंटन में शामिल दोषी अधिकारियों व कर्मचारियों सहित लाभान्वित व्यक्तियों के खिलाफ वैधानिक कार्यवाही करने की संस्तुति की थी, किंतु नजीता कुछ नहीं निकला।
पूर्व विधायक अजय कुमार पोइया द्वारा इसी महीने में 11 मार्च 2018 को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए प्रेषित पत्र के अनुसार शासन के निर्देश पर गठित राजस्व परिषद के अधिकारियों की एक टीम ने उनकी शिकायत पर मथुरा में अरबों रुपए मूल्य की सरकारी जमीन का बंदरबांट करने की जांच की थी।
जांच कमेटी ने अपनी विस्तृत आख्या में इस बात की पुष्टि की कि बहुमूल्य सरकारी जमीन को सफेदपोश भूमाफियाओं ने औने-पौने दाम में बेच दिया है अत: सभी दोषी और लाभान्वित व्यक्तियों को चिन्हित कराकर उनके विरुद्ध कानूनी कार्यवाही की जानी चाहिए।
पूर्व विधायक अजय कुमार पोइया ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर अवगत कराया है कि करीब 15 वर्ष पूर्व उन्होंने नेशनल हाईवे नंबर 2 पर स्थित गोकुल रेस्टोरेंट से लेकर मसानी क्षेत्र तक की इस सरकारी जमीन को मुक्त कराने के लिए संघर्ष शुरू किया था किंतु शासन स्तर से गठित जांच कमेटी की संस्तुति एवं सरकारी निर्देशों के बावजूद जिला प्रशासन ने आज तक कोई कार्यवाही नहीं की है लिहाजा मजबूरीवश उन्होंने एक ओर जहां धारा 133 के तहत कार्यवाही प्रारंभ की है वहीं दूसरी ओर इलाहाबाद उच्च न्यायालय की शरण भी ली है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय में जनहित याचिका संख्या 11824/2010 के रूप में यह लंबित है।
पूर्व विधायक ने मुख्यमंत्री को अवगत कराया है कि आपकी सरकार द्वारा भी राजस्व विभाग की इस जमीन को मुक्त कराने के लिए सूचीबद्ध किया गया है किंतु सफेदपोश भूमाफियाओं के प्रभाव में जिला प्रशासन चुप्पी साधे बैठा है।
भाजपा नेता और पूर्व विधायक पोइया के अनुसार पहले नगर पालिका और अब नगर निगम क्षेत्र की इस अति मूल्यवान जमीन के फर्जी पट्टे बनाकर श्याम पुत्र बदले निवासी सराय आजमाबाद ने स्वयं अपने परिजनों तथा दूसरे लोगों के नाम बैनामे करा दिए तथा वनखण्ड, चारागाह एवं वृक्षारोपण की जमीन पर भूमाफियाओं का कब्जा करा दिया, जो एक राष्ट्रद्रोही कृत्य है।
इस पूरे प्रकरण का एक आश्चर्यजनक पहलू यह है कि भाजपा नेता और पूर्व विधायक अजय कुमार पोइया ने अरबों रुपए मूल्य की सरकारी जमीन को अवैध रूप से खुर्द-बुर्द करने का मास्टर माइंड जिस श्याम पुत्र बदले को बताया है, वह भी भाजपा नेता और पूर्व विधायक श्याम अहेरिया हैं। हालांकि श्याम अहेरिया पूर्व में समाजवादी पार्टी ज्वाइन करके अपने पुत्र को दर्जा प्राप्त मंत्री का सुख दिलवा चुके हैं।
अजय पोइया की शिकायत और राजस्व विभाग की जांच कमेटी के अनुसार विभागीय अधिकारियों एवं कर्मचारियों की मिलीभगत से कौड़ियों के दाम बेची गई इस बहुमूल्य सरकारी जमीन पर फिलहाल होटल ड्यूक पैलेस, होटल विंग्सटन के साथ-साथ डॉ. शीला शर्मा मैमोरियल चैरिटेबल ट्रस्ट द्वारा संचालित कैंसर हॉस्पीटल खड़ा है।
इनके अलावा एक टाट फैक्ट्री, मकान, दुकानें, प्लॉट्स, अन्य फैक्ट्रियां, मैरिज होम्स, गैस्ट हाउसेज तथा दूसरे कई ऐसे प्रमुख होटल भी इन जमीनों पर बन चुके हैं जिनकी रजिस्ट्रियां विभिन्न नामों से कराई गई थीं।
भूमाफियाओं ने स्थानीय सरकारी कर्मचारियों को अपने कारनामे में शामिल करने के लिए मथुरा कलेक्ट्रेट कर्मचारी सहकारी गृह निर्माण समिति बनाकर उसके नाम से भी जमीन आवंटित कर दी जबकि इस नाम की कोई समिति लिखा-पढ़ी में है ही नहीं।
यूं भी इस सरकारी जमीन के कई हिस्से तो कई-कई बार बिक चुके हैं और उन पर अब मूल खरीदारों की जगह दूसरे लोग काबिज हैं तथा उनके द्वारा स्थापित उद्योग व व्यापार चल रहे हैं।
अजय कुमार पोइया ने मुख्यमंत्री को प्रेषित पत्र के तहत लिखा है कि ऐसे में जबकि प्रदेश एवं केंद्र सरकार की तमाम योजनाओं के लिए भूमि की अत्यधिक आवश्यकता है और भूमि उपलब्ध न होने के कारण इन योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं हो पा रहा, तब शासन अपनी जमीन को सफेदपोश भूमाफियाओं के कब्जे से मुक्त कराकर जनहितकारी योजनाएं प्रारंभ कर सकता है अन्यथा की स्थिति में न्यायालय का निर्णय ही अंतिम विकल्प रह जाएगा किंतु तब इसका श्रेय सरकार नहीं ले सकेगी।
गौरतलब है कि गोकुल रेस्टोरेंट से मसानी तक की यह जमीन आज शहर के पॉश इलाकों में शुमार है क्योंकि इस क्षेत्र में न केवल कई अच्छे होटल, गेटबंद कॉलोनियां, उद्योग व व्यापारिक प्रतिष्ठान, मैरिज होम्स, हॉस्पीटल्स, गेस्ट हाउस बन चुके हैं।
आज यहां जमीन का सर्किल रेट भी इतना अधिक है कि जनसामान्य तो खरीदने का स्वप्न भी नहीं देख सकता।
मजे की बात यह है कि ग्राम सभा सराय आजमाबाद की अवैध रूप से आवंटित अरबों रुपए मूल्य की जमीन पर दुकानों से लेकर मकान और होटलों व अस्पतालों से लेकर फैक्ट्रियों एवं मैरिज होम्स तथा कॉलोनियों तक के निर्माण का नक्शा मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण के अधिकारी आंखें बंद करके पास करते रहे जबकि राजस्व विभाग की टीम वर्ष 2008 में ही अपनी जांच आख्या प्रस्तुत कर दोषियों एवं लाभार्थियों के खिलाफ कानूनी कार्यवाही कर जमीन को अवैध कब्जे से मुक्त कराने की संस्तुति कर चुकी थी।
अब देखना यह है कि भूमाफियाओं के खिलाफ सख्त कदम उठाने का ढिंढोरा पीटने वाली योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार अपनी ही पार्टी के नेता व पूर्व विधायक अजय पोइया की शिकायत के आधार पर और शासन द्वारा गठित जांच कमेटी की संस्तुति के मद्देनजर अपनी ही पार्टी के आरोपी नेता व पूर्व विधायक श्याम अहेरिया द्वारा किए गए कारनामे को लेकर क्या कदम उठाती है ?
देखना यह भी होगा कि ताकतवर से ताकतवर माफियाओं पर कानून सम्मत कार्यवाही करने की बात करने वाली योगी सरकार क्या उन लाभार्थियों के खिलाफ कार्यवाही कर अरबों रुपए मूल्य की सरकारी जमीन को मुक्त करा पाती है जो किसी न किसी स्तर पर हर सरकार की नाक के बाल बने रहते हैं और जिनके खिलाफ कार्यवाही करने की हिमाकत करने वाले अधिकारियों को या तो तबादला झेलना पड़ता है या अपनी जान गंवाकर ”जवाहरबाग कांड” का हिस्सा बनना पड़ता है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
बैंक ऑफिशियल्स की सांठगांठ से देश तथा देशवासियों को हजारों करोड़ रुपयों का चूना लगाने वाले नीरव मोदी और मेहुल चौकसी जैसे सफेदपोश फ्रॉड सिर्फ महानगरों में ही नहीं है, ऐसे कई फ्रॉड मथुरा जैसी विश्व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी में भी हैं।
विश्वस्त सूत्रों और विभिन्न बैंकों से प्राप्त जानकारी के अनुसार मथुरा जनपद में करीब एक दर्जन ऐसे फ्रॉड हैं जिन्होंने हजारों करोड़ रुपया लेकर अब तक लौटाने का न तो नाम लिया है और ना ही उनकी इस रकम को लौटाने की कोई मंशा है।
सूत्रों के मुताबिक बैंकों को चूना लगाने वाले स्थानीय कारोबारियों में एक ओर जहां रीयल एस्टेट से जुड़े कुछ लोग हैं वहीं दूसरी ओर शिक्षा व्यवसायी भी शामिल हैं।
इसके अलावा टोंटी कारोबारी, एक नामचीन हॉस्पीटल तथा ब्रांडेड आभूषणों के व्यापारी ने भी बैंक से लिया हुआ कर्ज नहीं लौटाया है। कई होटल व्यवसायी भी बैंकों का पैसा हड़पे बैठे हैं और अब तक संबंधित बैंक ऑफिशियल्स को ऑब्लाइज करके काम चलाने में सफल रहे हैं।
बताया जाता है कि मथुरा की एक यूनिवर्सिटी पर ही अकेले सैकड़ों करोड़ का बैंक कर्ज है किंतु उसे कर्ज देने वाली बैंकों के अधिकारी फिलहाल मुंह सिलकर बैठे हैं।
गौरतलब है कि फिलहाल मथुरा जनपद और विशेष तौर पर मथुरा की सीमा में आने वाला नेशनल हाईवे नंबर दो, शिक्षा के क्षेत्र का एक हब बना हुआ है।
इसके अलावा भी मथुरा-भरतपुर रोड, मथुरा-हाथरस-अलीगढ़ रोड, मथुरा-गोवर्धन रोड तथा मथुरा-वृंदावन रोड पर तमाम शिक्षण संस्थाएं संचालित हैं।
शिक्षा के व्यवसाय में भारी प्रतिस्पर्धा के देखते हुए इससे जुड़े लोगों ने अपने संस्थानों को आधुनिक बनाने के नाम पर बैंकों से भारी-भरकम कर्ज ले रखा है किंतु उसे लौटाने की कोई नीयत नजर नहीं आती।
सूत्रों की मानें तो इन लोगों ने बैंकों की रकम का भारी दुरुपयोग किया है। यानि जिस काम के लिए कर्ज लिया गया था, वहां न लगाकर मोटा मुनाफा कमाने के लिए रीयल एस्टेट में निवेश कर दिया गया क्योंकि शिक्षा के क्षेत्र में अवैध वसूली करना आसान नहीं रहा।
रही-सही कसर 2016 में हुई नोटबंदी और फिर 2017 में आए जीएसटी ने पूरी कर दी। इन दोनों बड़े सरकारी कदमों ने काफी हद तक नंबर दो के लेन-देन को प्रभावित किया लिहाजा दोनों ही जगह कर्ज की रकम फंस कर रह गई।
इसी प्रकार रीयल एस्टेट के कई बड़े कारोबारियों पर न केवल बैंकों का भारी कर्ज फंसा हुआ है बल्कि ये लोग तमाम दूसरे लोगों और निवेशकों का भी मोटा पैसा हड़पे बैठे हैं। पूर्व में एक रीयल एस्टेट कारोबारी के यहां तो देनदारों ने काफी हंगामा काटा था और तब जैसे-तैसे इसने कुछ समय की मोहलत देकर अपना पीछा छुड़ाया।
रीयल एस्टेट का कारोबार हमेशा से नंबर दो की रकम खपाने में सबसे ऊपर रहा है और इसमें पैसा लगाकर कई लोगों ने बुलंदियों को छुआ भी है, किंतु जब से यह कारोबार सरकार की टेढ़ी नज़र का शिकार हुआ है तब से इसके कारोबारियों की असलियत छन-छन कर सामने आने लगी है।
देश के नामचीन रीयल एस्टेट कारोबारियों पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा कसा गया शिकंजा यह जानने के लिए पर्याप्त है कि किस तरह इन लोगों ने सारी हवा सरकारी पैसों से ही बना रखी थी।
बैंकों से जुड़े सूत्रों के मुताबिक बहुत से #NPA (Non-Performing Asset) मात्र इसलिए खड़े हुए क्योंकि कर्ज लेने वालों ने एक बहुत बड़ी रकम कारोबार पर खर्च न करके अपने शौक-मौज पर खर्च की।
यही कारण है कि जिस शहर में कभी कारों की संख्या उंगलियों पर गिनी जा सकती थी, आज वहां ऑडी तथा बीएमडब्ल्यू और मर्सडीज कारों की कोई कमी नहीं है।
बैंकों का पैसा हड़प कर बैठे लोगों की शानो-शौकत का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि ये और इनकी औलादें शॉपिंग के लिए भी अब्रॉड जाती हैं। पारिवारिक काय्रक्रमों में ही नहीं, निजी पार्टियों में भी पानी की तरह पैसा बहाते इन्हें आसानी से देखा जा सकता है।
ऋण लेकर घी पीने की मानसिकता वाले ये लोग देश के महानगरों में जाकर तो अय्याशी करते ही हैं, साथ ही अपना उद्देश्य पूरा करने के लिए एक-एक लाख रुपए प्रति नाइट वसूलने वाली ‘कॉलगर्ल्स’ को भी यहां बुलाते हैं। ये ‘कॉलगर्ल्स’ फिर उन लोगों को मुहैया कराई जाती हैं, जिनसे ‘आउट ऑफ द वे’ जाकर काम कराना होता है।
आम आदमी को शायद यह जानकर आश्चर्य होगा कि शहर के कुछ सफेदपोश लोग तो सुरा एवं सुंदरी के जरिए मुश्किल से मुश्किल टास्क पूरा करने के विशेषज्ञ बन चुके हैं और ये लोग उस वर्ग की नाक के बाल बने हुए हैं जिसे कथित रूप से शहर की शान माना जाता है। जिनकी तरक्की के उदाहरण प्रस्तुत किए जाते हैं।
जहां तक सवाल उन बैंकों का है जिनका पैसा ये सफेदपोश फ्रॉड दबाए बैठे हैं तो उनमें स्टेट बैंक ऑफ इंडिया, पंजाब नेशनल बैंक, सिंडीकेट बैंक, बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ बड़ोदा, इंडियन ओवरसीज बैंक, इलाहाबाद बैंक, यूनियन बैंक, ओरियंटल बैंक ऑफ कॉमर्स सहित आईसीआईसीआई, एचडीएफसी तथा एक्सिस बैंक शामिल हैं।
इन बैंक के अधिकारियों की सफेदपोश बेईमानों से सांठगांठ इस कदर है कि बैंक अधिकारी इनके बारे में कोई जानकारी नहीं देते और न यह बताकर देते हैं कि उनका इस जनपद में कुल NPA आखिर है कितना।
अब देखना यह है कि विजय माल्या और ललित मोदी के बाद नीरव मोदी, मेहुल चौकसी तथा कोठारी पिता-पुत्रों की कारगुजारियां सामने आने पर भी बैंकें मथुरा के धोखेबाजों पर कब व कितना शिकंजा कसती हैं। कसती भी हैं या उनके भाग जाने का इंतजार करती हैं।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
मथुरा। केंद्र की राजग सरकार के मुखिया और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तथा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भ्रष्टाचार को लेकर बेशक ‘जीरो टॉलरेंस’ का दम भरते हों, किंतु सच्चाई कुछ और ही है।सच्चाई यह है कि ‘भ्रष्टतंत्र’ आज भी एक सांठगांठ के तहत पूरी तरह अपनी मनमानी कर रहा है और यह मनमानी हर क्षेत्र में व्याप्त है। फिर चाहे यह क्षेत्र सबके ऊपर उंगली उठाने वाले ‘मीडिया’ का क्षेत्र ही क्यों न हो।मीडिया और सरकारी विभागों की सांठगांठ से सरकारी खजाने को चूना लगाने का एक उदाहरण तब सामने आया, जब बीते कल 24 फरवरी को संपन्न हो चुकी बरसाना की लठामार होली का एक फुल पेज रंगीन विज्ञापन आगरा से प्रकाशित प्रसिद्ध अखबार अमर उजाला में आज देखा गया।मतलब कि कल बरसाना की होली संपन्न हो जाने के एक दिन बाद 25 फरवरी को ‘बरसाना की होली 24 फरवरी के दिन’ मनाए जाने का यह फुल पेज विज्ञापन ‘अमर उजाला’ में आज 19वेंं पेज पर प्रकाशित हुआ है।यह विज्ञापन उत्तर प्रदेश के पर्यटन विभाग द्वारा प्रकाशित कराया गया है और इसमें कल संपन्न हो चुके सभी कार्यक्रमों की उसी प्रकार सूचना दी गई है जिस प्रकार पूर्व में प्रकाशित इसी प्रकार के दूसरे विज्ञापनों में दी जा चुकी थी।आगरा परिक्षेत्र में सर्वाधिक प्रसार वाले ‘अमर उजाला’ के इस फुल पेज रंगीन विज्ञापन की कीमत का अंदाज अमर उजाला के विज्ञापन टैरिफ से लगाया जा सकता है।जाहिर है कि यह विज्ञापन लाखों रुपए का होगा और चूंकि यह ‘डीएवीपी’ की ओर से नहीं दिया गया है लिहाजा इसके पैसे भी कॉमर्शियल एड टैरिफ के मुताबिक ही वसूले गए होंगे।गौरतलब है कि विज्ञापनों के जरिए मनमाने तरीके से प्रचार प्रसार करने पर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी की सरकार अब तक सवालों के घेरे में है क्योंकि सरकारी विज्ञापनों पर आने वाले भारी-भरकम खर्च का भुगतान भी सरकारें जनता की गाढ़ी कमाई के पैसों से करती हैं।ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि एक दिन पहले संपन्न हो चुकी बरसाना की विश्व प्रसिद्ध लठामार होली का फुल पेज रंगीन विज्ञापन आज क्या पर्यटन विभाग से ‘सांठगांठ’ के बिना छप पाना संभव है।वैसे यह तो एक उदाहरण भर है, क्योंकि सरकारी मुलाजिमों की मिली भगत से अखबारों के मालिकान सरकारी खजाने को भरपूर चूना पहले भी लगाते रहे हैं।देखने की बात बस इतनी है कि क्या योगी राज में भी अखबार मालिकों और सरकारी विभागों की बड़े-बड़े विज्ञापनों के लिए चल रही सांठगांठ जारी रहेगी और क्या सरकारी पैसे का दुरुपयोग होता रहेगा।कोई भी सामान्य व्यक्ति इस बात से भली-भांति वाकिफ होगा कि सरकारी खजाने से एक रुपया तक निकलवाना कितना दुरूह काम है, फिर चाहे वह पैसा उस व्यक्ति का अपना ही क्यों न हो, लेकिन यदि सांठगांठ कर रखी हो तो लाखों रुपए भी हड़पे जा सकते हैं।कुल मिलाकर यह कहना मुनासिब होगा कि केवल नीरव मोदी, मेहुल चौकसी, विक्रम कोठारी और राहुल कोठारी जैसे उद्योगपति और व्यापारी ही सरकारों को खोखला नहीं कर रहे, उनकी दिन-रात खबरें दिखाने वाले मीडिया समूह भी सरकारी खजाने को चट कर रहे हैं।आश्चर्य की बात यह भी है कि ईमानदार सरकारों को मीडिया में व्याप्त इस तरह का भ्रष्टाचार क्यों दिखाई नहीं देता जबकि मीडिया द्वारा किया जाने वाला भ्रष्टाचार इसलिए कहीं अधिक गंभीर हो जाता है क्योंकि उसके ऊपर सबका ‘छिद्रान्वेषण’ करने की जिम्मेदारी है और वह लोकतंत्र का कथित रूप से ही सही, लेकिन चौथा स्तंभ तो है ही।-सुरेन्द्र चतुर्वेदी