शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

डॉ. सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने विनीत नारायण को बताया 21 वीं सदी का नटवर लाल, सीएम योगी आदित्‍यनाथ से की जांच की मांग, ब्रज फाउंडेशन ने दिया जवाब

वृंदावन निवासी विनीत नारायण को भाजपा के राज्‍यसभा सदस्‍य और तेजतर्रार नेता डॉ. सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने 21 वीं सदी का नटवर लाल बताते हुए उनके द्वारा संचालित संस्‍था ‘द ब्रज फाउंडेशन’ की जांच सीबीआई से कराने को कहा है।
डॉ. सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने इस सम्‍बन्‍ध में आठ पन्‍नों का एक पत्र उत्तर प्रदेश के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को सौंपा है और खुद ट्वीट करके इसकी जानकारी दी है।

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दूसरी ओर इस पत्र के बारे में पूछे जाने पर विनीत नारायण ने प्रेस रिलीज के माध्‍यम से कहा है कि ‘द ब्रज फाउंडेशन’ पर डॉ. सुब्रह्मण्यम् स्वामी द्वारा लगाए गए सभी सनसनीखेज आरोपों का जवाब प्रमाण सहित ‘द ब्रज फाउंडेशन’ सीबीआई को इस अनुरोध के साथ सौंपने जा रही है कि सीबीआई इन सभी आरोपों की तुरंत निष्पक्ष जांच करवाए।
दरअसल सोनिया गांधी, राहुल गांधी, पी चिदंबरम तथा स्‍वर्गीय जयललिता जैसे दिग्‍गज नेताओं को अदालत के कठघरे तक ले जाने वाले भाजपा के फायरब्रांड नेता सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने यूपी के मुख्‍यमंत्री योगी आदित्‍यनाथ को कल 28 जुलाई के दिन सौंपे अपने पत्र में विनीत नारायण तथा ‘द ब्रज फाउंडेशन’ पर अत्‍यंत गंभीर आरोप लगाए हैं।
सुब्रह्मण्यम् स्वामी के अनुसार मायावती सरकार में दो अन्‍य संस्‍थाओं के माध्‍यम से विनीत नारायण की संस्‍था ‘द ब्रज फाउंडेशन’ ने ब्रज क्षेत्र का मास्‍टर प्‍लान बनाने के नाम पर 57 लाख 65 हजार रुपए हड़प लिए।
सुब्रह्मण्यम् स्वामी का आरोप है कि ”धाम सेवा” की आड़ लेकर देश के बड़े उद्योगपतियों से पैसा उगाहने वाले विनीत नारायण और उनकी संस्‍था ‘द ब्रज फाउंडेशन’ एक्‍चुअली ”दाम सेवा” में लिप्‍त है।
यही कारण है कि मथुरा जनपद में ‘द ब्रज फाउंडेशन’ द्वारा कराये गए प्राचीन कुंडों एवं जलाशयों के जीर्णोद्धार को एनजीटी ने नियम विरुद्ध बताकर सख्‍त कार्यवाही करने के निर्देश जिला प्रशासन को दिए।
सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने विनीत नारायण पर तमाम गरीब किसानों को उनकी भूमि से बेदखल करने का भी आरोप लगाया है।
सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने यूपी के सीएम योगी आदित्‍यनाथ को लिखा है कि मथुरा के लिए बनाई गई ‘हृदय योजना’ में अपने राजनीतिक प्रभाव से ‘द ब्रज फाउंडेशन’ को ‘सिटी एंकर’ नामित कराकर विनीत नारायण ने पूरी योजना को ही पलीता लगा दिया है, बावजूद इसके अब तक उनके खिलाफ कोई कार्यवाही अमल में नहीं लाई गई है।
उन्‍होंने मथुरा की ‘हृदय योजना’ से विनीत नारायण और उनकी संस्‍था ‘द ब्रज फाउंडेशन’ को तत्‍काल बेदखल करने की भी मांग की है ताकि मथुरा के विनाश को रोका जा सके।
साथ ही ‘द ब्रज फाउंडेशन’ की समस्‍त गतिविधियों पर रोक लगाने तथा उसके आर्थिक लेनदेन को भी प्रतिबंधित करने की मांग सुब्रह्मण्यम् स्वामी ने अपने पत्र में की है।
पत्र में स्‍वामी ने इस बात का भी उल्‍लेख किया है कि मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण में उपाध्‍यक्ष के पद पर काबिज रहीं आईएएस अधिकारी यशु रुस्‍तगी ने हृदय योजना को गलत तौर-तरीकों से प्रभावित करने पर ‘द ब्रज फाउंडेशन’ से जुड़े राघव मित्तल के खिलाफ थाना सदर बाजार में आईपीसी की धारा 353, 183 व 186 और आपराधिक कानून (संसोधन) की धारा 7 के तहत केस दर्ज कराया था। सदर बाजार पुलिस 12 अप्रैल 2018 को इस केस में आरोप पत्र भी दायर कर चुकी है जिसका नंबर 253/18 है।
स्‍वामी ने ‘द ब्रज फाउंडेशन’ के पदाधिकारियों पर आपराधिक गतिविधियों में लिप्‍त रहने तथा सरकारी अफसरों को डरा-धमका कर उन्‍हें अपने कर्तव्‍य निर्वहन से रोकने जैसा गंभीर आरोप भी लगाया है।
स्‍वामी के आरोपों पर द ब्रज फाउंडेशन के सचिव व कालचक्र समाचार ब्यूरो के प्रबंधकीय संपादक रजनीश कपूर ने बाकायदा प्रेस-विज्ञप्ति जारी की है। इस विज्ञप्‍ति के माध्‍यम से कपूर ने सीबीआई को आश्वस्त किया है कि आरोपों के संदर्भ में जो भी जानकारी मांगी जाएगी, उसे द ब्रज फाउंडेशन सहर्ष उपलब्ध कराएगी।
विज्ञप्‍ति के अनुसार इससे पहले 19 जून 2018 को द ब्रज फाउंडेशन के अध्यक्ष विनीत नारायण ने संस्‍था का पिछले 13 वर्ष का आय-व्यय का संपूर्ण ब्यौरा भारत के नियंत्रक व महालेखाकार राजीव महर्षि को इस अनुरोध पत्र के साथ सौंपा था कि उनकी संस्था के विरूद्ध आय-व्यय के मामले में किसी भी तरह की जांच करवा ली जाए ताकि झूठे आरोप लगाने वाले बेनकाब हो सकें।
आज जारी विज्ञाप्ति में कपूर ने बताया है कि गत 4 जून 2018 को उन्होंने भारत सरकार के प्रवर्तन निदेशालय के एक ताकतवर अधिकारी राजेश्वर सिंह के विरूद्ध सर्वोच्च न्यायालय में आय से अधिक संपत्ति के मामले की जांच करवाने के लिए जनहित याचिका दायर की थी क्योंकि उन पर अपने पद का दुरुपयोग कर अकूत संपत्ति अर्जित करने के आरोप हैं।
उनके इस कदम से डा. स्वामी बुरी तरह विचलित हो गए और द ब्रज फाउंडेशन के विरुद्ध अनर्गल प्रलाप करने लगे।
कपूर ने आश्चर्य व्‍यक्‍त किया है कि भ्रष्टाचार के आरोपी एक जूनियर अधिकारी के खिलाफ जांच होने से डा. स्वामी इतना क्यों घबरा रहें हैं उनके इस अधिकारी से क्या सम्बन्ध हैं ?
कपूर के अनुसार डा. स्वामी ने इस केस में हस्तक्षेप करके तथा राजेश्वर सिंह ने रजनीश कपूर के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में अदालत की अवमानना का मुकद्दमा दायर करके उन्‍हें डराने-धमकाने की भी कोशिश की पर सर्वोच्च न्यायालय ने इनकी कोशिशों पर पानी फेर दिया और दोनों की याचिकाएं अस्वीकार कर रजनीश कपूर की याचिका पर 27 जून 2018 को राजेश्वर सिंह के विरूद्ध जांच की छूट दे दी, जिस पर पहले रोक लगी थी।
कपूर के अनुसार तभी से डॉ. स्वामी बुरी तरह बौखलाए हुए हैं और इसी क्रम में उन्होंने मुख्यमंत्री योगी को ये बेबुनियाद आरोप पत्र भेजकर सनसनी पैदा करने का प्रयास किया है।
इसी संदर्भ में द ब्रज फाउंडेशन के अध्‍यक्ष विनीत नारायण का कहना है कि, ‘पत्रकारिता और ब्रज में जो कुछ मैंने गत 40 वर्षों में किया है, वह पूरे देश के सामने खुली किताब की तरह है। मैं हर तरह की जांच का स्वागत करूंगा और यह अपेक्षा रखूंगा कि आरोप गलत सिद्ध होने पर आरोप लगाने वाले अपनी सजा अभी से स्वयं ही तय कर लें जिससे फिर मुझे नाहक उनके विरुद्ध मानहानि का मुकदमा दायर न करना पड़े।’
-Legend news

एक मिनट में ‘मैगी’ भले ही न बने, लेकिन ‘हेमा जी’ सीएम बन सकती हैं…कोई शक !

मथुरा की सांसद और बॉलिवुड की स्‍वप्‍न सुंदरी हेमा मालिनी जी ने दो दिन पहले राजस्‍थान के बांसवाड़ा में दावा किया कि वह यदि चाहें तो एक मिनट के अंदर ‘मुख्‍यमंत्री’ बन सकती हैं।
सुन रहे हैं न योगी जी।
हालांकि कुछ लोग कहते हैं कि एक मिनट में तो ‘मैगी’ भी नहीं बन सकती जी…फिर हेमा जी ‘सीएम’ कैसे बन सकती हैं।
मेरा मानना है कि ऐसा कहने वाले विरोधी (भाजपा के नहीं, हेमा जी के) रहे होंगे अन्‍यथा हेमा जी तो हेमा जी हैं, क्‍या नहीं कर सकतीं। गनीमत है उन्‍होंने यह नहीं कहा कि मैं चाहूं तो एक मिनट में ‘पीएम’ बन सकती हूं।
हेमा जी यहीं नहीं रुकीं। उन्‍होंने कहा, लेकिन मैं ऐसा चाहती नहीं हूं क्‍योंकि इससे मेरा “फ्री मूवमेंट” रुक जायेगा। मैं “बंध” जाऊंगी।
यू नो…”बंधन” उन्‍हें पसंद नहीं है। उससे ”आजादी” छिन जाती है।
हेमा जी की बात में तो दम है। उन्‍होंने शादी बेशक की, किंतु शादी के ”बंधन” में कभी नहीं बंधी। ”मूवमेंट” उनका शादी के बाद भी उतना ही ‘फ्री’ रहा, जितना कि शोले में ‘बसंती’ बनकर रहा था।
मथुरा की जनता को भी अब यह बात भली-भंति समझ में आ गई होगी कि उन्‍हें ‘बंधन’ नहीं ‘फ्री मूवमेंट’ पसंद है इसीलिए वह मथुरा की जनता के चाहने से नहीं, अपनी मर्जी से अपने संसदीय क्षेत्र में ‘मूव’ करती हैं।
बहरहाल, मुझे तो योगी जी की चिंता हो रही है। सोच रहा हूं कि ‘गोरखनाथ मठ’ के इंतजामात दुरुस्‍त करवा दूं क्‍योंकि पता नहीं कब हेमा जी चाह बैठें और कब योगी जी की ‘मठ’ वापसी तय हो जाए।
पीएम पद 2019 से पहले वेेकेंट नहीं है और मोदी जी का उसे फिलहाल छोड़ने का इरादा भी नजर नहीं आता क्‍योंकि वह मठ से नहीं हठ से आए थे, इसलिए हेमा जी ने यदि चाह लिया तो योगी जी के पास ‘मठ’ लौटने के अलावा कोई विकल्‍प बचेगा नहीं।
मेरी तो योगी जी को यही सलाह है कि प्रदेश को सुधारने का ख्‍वाब देखना छोड़ो और जैसे भी हो लोकसभा चुनावों तक का समय निकाल लो।
चूंकि 2019 का लोकसभा चुनाव हेमा जी मथुरा से ही दोबारा लड़ने का मन बना चुकी हैं इसलिए हो सकता है कि 2019 में उनकी निगाहें पीएम पद पर जा टिकें। भाजपा की पूर्ण बहुमत वाली सरकार का पहला पीएम ‘बनारस’ से हो सकता है तो दूसरा ‘मथुरा’ से नहीं हो सकता है क्‍या। ऐसा हुआ तो योगी जी बाकी ढाई-तीन साल और यूपी के ‘मठाधीश’ बने रह सकते हैं।
हेमा जी ने बांसवाड़ा में यह भी बताया कि उन्‍होंने सांसद बनने से पहले भी पार्टी यानी भाजपा के लिए बहुत काम किया था।
जब सांसद बनने का मन किया तो एक मिनट में मथुरा की सांसद बन गईं। इसके बाद चार साल से अनवरत मथुरा का विकास करा रही हैं। मथुरा में यमुना तो वर्षों से बह रही थी किंतु ‘गंगा’…(विकास की) उन्‍होंने लाकर बहा दी।
मथुरा के लिए हेमा जी ‘भागीरथ’ बनकर आईं और भाजपा की जटाओं के माध्‍यम से विकास की गंगा उलझा कर मथुरा में बहा दी। दो दिन की बारिश में पूरे जिले ने देखी है वो विकास की गंगा।
यमुना पर याद आया। हेमा जी ने तो यमुना को प्रदूषण मुक्‍त कराने के भी बहुत प्रयास किए। अपने ‘फ्री मूवमेंट’ में से कुछ समय का ‘बंधन’ स्‍वीकार कर यमुना के किनारे अपने नृत्‍य का कार्यक्रम फिक्‍स किया लेकिन ‘यमुना पुत्रों’ ने एनजीटी से मिलकर उसमें रोड़ा अटका दिया।
‘यमुना पुत्र’ शायद तब नहीं जानते थे कि हेमा जी जिस काम की ठान लें, उसे रोक पाना किसी के बस में नहीं। उन्‍होंने मथुरा की वेटरनरी यूूनिवर्सिटी में न सिर्फ नृत्‍य का झक्‍कास कार्यक्रम किया बल्‍कि यह भी बताया कि यमुना को प्रदूषित करने और रखने में ऐसे ही ‘विघ्न संतोषियों’ का बड़ा हाथ है।
अब जबकि हेमा जी ने इस आशय का रहस्‍योद्घाटन किया है कि वह चाहें तो एक मिनट में मुख्‍यमंत्री बन सकती हैं, तब जाकर समझ में आया कि योगी जी क्‍यों उनके नृत्‍य कार्यक्रम में वेटरनरी यूूनिवर्सिटी दौड़े-दौड़े चले आए थे।
हमें भले ही अब जाकर पता लगा हो किंतु योगी जी तो जानते होंगे न कि हेमा जी जिस ‘मिनट’ चाह लेंगी, उस ‘मिनट’ उनकी ‘मठ’ वापसी हो जाएगी इसलिए बेचारे बरसाने से पहले वेटरनरी पहुंचे।
भाई! किसी को शक हो तो हो, मैगी चाहे दो मिनट से पहले न बनती हो, लेकिन मुझे पूरा विश्‍वास है कि हेमा जी चाह लेंगी तो एक मिनट में “सीएम” (अपने यूपी की) बन ही जायेंगी।
पीएम के काम की उन्‍होंने बांसवाड़ा में तारीफ की है जिससे साफ जाहिर है कि वह पीएम के काम से खुश हैं और पीएम की कुर्सी को 2018 में तो कोई खतरा नहीं है।
2019 की राम जानें। वह हेमा जी के मूड पर निर्भर करता है कि ‘सीएम’ बनना चाहती हैं या ‘पीएम’ बनना।
कुछ लोग यह कहते भी पाये गए हैं कि 2019 में यदि हेमा जी की ‘वन मिनट’ इच्‍छा ने जोर मारा तो संभव है ‘मोदी’ जी की जगह ‘योगी’ जी और योगी जी की जगह ‘हेमा’ जी दिखाई दें। सांसदी का क्‍या है, योगी जी ने भी त्‍यागी थी यूपी की खातिर 2017 में । 2019 में हेमा जी त्‍याग देंगी। वन मिनट…मैं अभी आता हूं। मेरी ‘मैगी’ उबल रही है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

सरकारें तो बदलीं लेकिन नहीं बदली मथुरा की तस्‍वीर: नेता मस्‍त, अधिकारी ‘व्‍यस्‍त’, जनता त्रस्‍त

महाभारत नायक योगीराज श्रीकृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली में इस वक्‍त चारों ओर भाजपा का परचम लहरा रहा है। सांसद भाजपा की, पांच में से चार विधायक भाजपा के, जिला पंचायत अध्‍यक्ष भाजपा की और मेयर भी भाजपा के। चार में से दो विधायक कबीना मंत्री।
सोने पर सुहागा ये कि उत्तर प्रदेश से लेकर केंद्र तक भी भाजपा की ही सरकार।
लेकिन भगवा के इस स्‍वर्णिम काल में भी भगवान कृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली का गौरव प्राप्‍त मथुरा नगरी जस की तस है। जैसी माया और अखिलेश के राज में थी, वैसी ही आज भी है।
कांग्रेस के शासनकान में जवाहर लाल नेहरू नेशनल अरबन रिन्‍यूअल मिशन अर्थात ‘जे नर्म’ का जमकर ढिंढोरा पीटा गया और कहा गया कि उससे मथुरा की काया पलट जाएगी, किंतु नतीजा ढाक के तीन पात रहा।
सैकड़ों करोड़ रुपए भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था की भेंट चढ़ गए लेकिन मथुरा में नाले-नालियों एवं सीवर की गंदगी तक के निकास का मुकम्‍मल इंतजाम नहीं हो पाया। हुआ तो ये कि मथुरा की तत्‍कालीन नगर पालिका अध्‍यक्ष मनीषा गुप्‍ता करीब दो करोड़ रुपए के घोटाले में फंस गई जो आज भी न्‍यायालय में लंबित है।
2014 में मोदी सरकार बनने के बाद जब यूपी में योगी राज आया तो मथुरा के लोगों को उम्‍मीद बंधी की अब शायद मथुरा के दिन बहुरेंगे परंतु एकसाल बीत जाने पर भी मथुरा की दयनीय दशा बरकरार है।
बात चाहे साफ-सफाई की हो अथवा यातायात व्‍यवस्‍था की, अपराध की हो या व्‍यापार की। कहीं कुछ नहीं बदला।
योगी आदित्‍यनाथ के शपथ ग्रहण करने के साथ ही शहर के बीचोंबीच मयंक चेन नामक सर्राफा व्‍यवसाई के यहां दो व्‍यवसाइयों की हत्‍या करके करोड़ों के माल की डकैती डालकर बदमाशों ने जो चुनौती भाजपा सरकार को दी थी, वह आजतक कायम है। लूट, डकैती, चोरी, हत्‍या, राहजनी, बलात्‍कार और टटलुओं द्वारा किए जाने वाले विशेष अपराधों के ग्राफ में कोई कमी नहीं आई है।
चंद दिनों मथुरा के एसएसपी रहे प्रभाकर चौधरी ने यातायात व्‍यवस्‍था में अपनी इच्‍छाशक्‍ति के बल पर आमूल-चूल परिवर्तन करके जरूर दिखाया लेकिन उनका स्‍थानांतरण होते ही हर दिन जाम लगने का सिलसिला फिर शुरू हो चुका है।
गंदगी के मामले में तो मथुरा ने सबसे निचले पायदान तक भी न पहुंचकर सिद्ध कर दिया कि नगर पालिका को नगर निगम में तब्‍दील करके नगरीय क्षेत्र का नहीं, गंदगी के साम्राज्‍य का भी विस्‍तार किया है।
कहने को मथुरा सहित उससे जुडे विभिन्‍न धार्मिक स्‍थलों का कायाकल्‍प करने के लिए अरबों रुपए की योजनाएं बनाई गई हैं, कुछ पर काम भी चल रहा है किंतु सच्‍चाई यह है कि ऐसी योजनाएं मायावती के शासन में रहते भी बनी थीं और अखिलेश राज में भी। अब योगीराज उसी लकीर पर काम कर रहा है परंतु धरातल पर हालात बदलते दिखाई नहीं दे रहे। हर योजना किसी न किसी वजह से अटकी पड़ी है।
यहां तक कि करीब 180 एकड़ में फैले जिस सरकारी ‘जवाहर बाग’ को राजनीतिक संरक्षण प्राप्‍त माफिया रामवृक्ष यादव के चंगुल से मुक्‍त कराने में दो पुलिस अधिकारी शहीद हो गए, उसका स्‍वरूप बदलने के लिए बनाई गई योजना भी अभी रेंग रही है।
यह हाल तो तब है जबकि सरकार ने पूरे ब्रज क्षेत्र के विकास को ‘उत्तर प्रदेश ब्रजतीर्थ विकास परिषद’ का गठन कर उसकी कमान पूर्व प्रशासनिक अधिकारी नागेन्‍द्र प्रताप तथा पूर्व पुलिस अधिकारी शैलजाकांत मिश्र के अनुभवी हाथों में सौंप रखी है। यह दोनों अधिकारी अपने सेवाकाल में लंबे समय तक मथुरा में तैनात भी रह चुके हैं।
इनके अलावा सांसद हेमा मालिनी ने भी ‘ब्रजभूमि विकास ट्रस्‍ट’ के नाम से एक संस्‍था रजिस्‍टर्ड करा रखी है जिसमें न सिर्फ हेमा मालिनी बल्‍कि उनके समधी व भाई सहित करीब आधा दर्जन लोग ट्रस्‍टी हैं।
करोड़ों देशवासियों की आराध्‍य यमुना मैया तो निश्‍चित ही खून के आंसू रो रही होगी क्‍योंकि उसके साथ अनवरत छल किया जा रहा है। उसके साथ छल करने में कोई शासक पीछे नहीं रहा। यमुना जल हाथ में लेकर सौगंध खाने वाले और यमुना की पूजा करके चुनाव का पर्चा दाखिल करने वाले नेताओं ने यमुना को कहीं का नहीं छोड़ा। हरियाणा में हिंदूवादी सरकार बन जाने पर भी हथिनी कुंड से यमुना के लिए पानी उपलब्‍ध कराने का कोई रास्‍ता निकालना तो दूर, उसे लेकर चर्चा तक की आवश्‍यकता महसूस नहीं की जा रही। मथुरा-वृंदावन के अधिकांश नाले सीधे यमुना में गिर रहे हैं नतीजतन यमुना का जल स्‍नान अथवा पान करने लायक तक नहीं है।
जीवन दायिनी और मोक्ष प्रदायिनी यमुना का प्रदूषित जल आज क्षेत्रीय नागरिकों के जीवन पर संकट का कारण बन चुका है। अनेक लोग यमुना के प्रदूषित जल की वजह से गंभीर बीमारियों का शिकार हो चुके हैं।
यह बात अलग है कि यमुना को ‘मां’ का दर्जा देने के कारण बहुत से लोग आज भी यमुना को इसके लिए जिम्‍मेदार नहीं ठहराते किंतु नेताओं को जिम्‍मेदार मानने से पूरी तरह इत्तेफाक रखते हैं।
सच भी यही है कि यमुना मैली हुई है तो नेताओं की कथनी और करनी में चले आ रहे भेद के कारण, न कि उसके अपने कारण। यमुना को गंदगी का पर्याय बना देने में नेताओं की वादाखिलाफी ने बड़ी भूमिका अदा की है।
आश्‍चर्य की बात यह भी है कि मथुरा जैसे विश्‍वविख्‍यात धार्मिक स्‍थल की बदहाली बरकरार रखकर भाजपा 2019 के लोकसभा चुनावों में 2014 की अपनी कामयाबी दोहराने के सपने देख रही है।
माना कि यूपी की पूर्ववर्ती सरकारें भी कृष्‍ण की नगरी को उसका गौरवपूर्ण स्‍वरूप दिलाने में असफल रहीं किंतु योगीराज से नाराजगी की बड़ी वजह उसके द्वारा धार्मिक स्‍थानों के पूर्ण विकास का सपना दिखाना तथा उत्तर प्रदेश को भयमुक्‍त करके उत्तम प्रदेश के रूप में स्‍थापित करने का भरोसा दिलाना है।
बाकी बात रही स्‍थानीय भाजपा नेताओं की तो उनकी दयनीय दशा का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि 2009 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को रालोद के युवराज जयंत चौधरी का समर्थन करना पड़ा और 2014 में स्‍वप्‍न सुंदरी को मथुरा लाना पड़ा।
2019 के लिए भी फिलहाल तो कोई ऐसा चेहरा सामने दिखाई नहीं दे रहा जो हेमा मालिनी की जगह ले सके लिहाजा यदि हेमा मालिनी की जगह किसी और के बावत सोचा भी जाता है तो पार्टी एकबार फिर किसी बाहरी को नए रैपर में लपेटकर पेश कर सकती है किंतु मथुरा का भाग्‍य विधाता होगा तो बाहरी ही।
ऐसे में यह कह पाना बेहद मुश्‍किल है कि मथुरा को उसका गौरवशाली अतीत कब तक नसीब होगा और कब तक यमुना प्रदूषण मुक्‍त हो पाएगी।
कब तिराहे-चौराहों को जाम के झाम से और सड़कों को अतिक्रमण की मानसिकता से मुक्‍ति मिलेगी। कब मथुरावासियों सहित यहां आने वाले पर्यटक व तीर्थयात्री भयमुक्‍त होकर भ्रमण कर सकेंगे। कब जलभराव जैसी मामूली सी समस्‍या का समाधान होगा और कब टटलुओं के लूट का कारोबार ध्‍वस्‍त होगा।
कहने को एक साल काफी कम है और चार साल बाकी हैं, किंतु बताने को पंद्रह साल का कारनामा भी है जिसने मथुरा तथा मथुरावासियों एवं ब्रज और ब्रजवासियों सहित यमुना मैया को भी सिर्फ ठगा ही ठगा है।
अंत में कहने को मात्र यही शेष रह जाता है कि ”ठग जाने ठगही की माया और खग ही जाने खग की भाषा”।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

लोकसभा चुनाव 2019: 120 सांसदों का पत्ता काटने की तैयारी में भाजपा, डेढ़ दर्जन मंत्री भी शामिल

2019 के लोकसभा चुनावों में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी करीब 120 सिटिंग सांसदों का पत्ता काटने वाली है। इनमें करीब डेढ़ दर्जन सांसद तो ऐसे हैं जो वर्तमान मोदी सरकार में केंद्रीय मंत्री बने बैठे हैं। पार्टी अब इन सांसदों को टिकट देने के ही मूड में नहीं है।
इस बावत पार्टी के शीर्ष नेतृत्‍व द्वारा की गई मीटिंग में उपस्‍थित रहे सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार भाजपा अपने इस समय मौजूद कुल 273 लोकसभा सदस्‍यों में से लगभग 45 प्रतिशत सदस्‍यों का पत्ता काटने की तैयारी कर चुकी है जिनमें वो 19 सांसद भी शामिल हैं जो 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले 75 साल की उम्र पूरी करने वाले हैं।
75 साल और उससे अधिक की उम्र वाले ऐसे सांसदों में पार्टी के मार्गदर्शक मंडल से लालकृष्‍ण आडवाणी तथा मुरली मनोहर जोशी के अलावा करिया मुंडा, शांता कुमार, भुवनचंद्र खंडूरी, लीलाधरभाई वाघेला, कलराज मिश्र, रामटहल चौधरी, हुकुमदेव नारायण यादव के नाम प्रमुख हैं।
बताया जाता है कि 75 साल की उम्र पूरी करने वाले सांसदों के अलावा जिन सांसदों का टिकट 2019 में काटा जाना है, उनकी परफॉरमेंस के बारे में पार्टी ने विभिन्‍न स्‍तर पर अपने सोर्सेज से फीडबैक ले लिया है।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक फीडबैक देने वालों में राष्‍ट्रीय स्‍वयं सेवक संघ यानि आरएसएस के अलावा चुनिंदा पार्टी कार्यकर्ता तो हैं ही, साथ ही कुछ प्राइवेट एजेंसीज तथा ”नमो एप” की भी महत्‍वपूर्ण भूमिका रही है।
इन सभी सोर्सेज ने सीधे प्रधानमंत्री मोदी को अपने-अपने सर्वे से अवगत कराया है और इसी आधार पर यह निर्णय लेने की तैयारी की गई है ताकि समय रहते 2019 के लिए लोकप्रिय व ईमानदार चेहरों को तलाश लिया जाए।
गत दिनों हरियाणा के सूरजकुंड में इस विषय पर पार्टी के शीर्ष नेतृत्‍व द्वारा की गई बैठक में राष्‍ट्रीय सचिव और महासचिव एवं आरएसएस के वरिष्‍ठ नेता भी मौजूद थे। इस बैठक में विस्‍तृत रूप से इस बात पर चर्चा के बाद सहमति बनी कि नाकाबिल सिटिंग सांसदों को टिकट न दिया जाए।
ऐसे सांसदों में सबसे अहम नाम विदेश मंत्री और मध्‍य प्रदेश के विदिशा से सांसद सुषमा स्‍वराज का है क्‍योंकि विदिशा की जनता सुषमा स्‍वराज से खासी नाराज बताई गई है। इसके अलावा नीति आयोग ने भी विदिशा की विकास संबंधी रिपोर्ट को बहुत खराब बताया है।
बताया जाता है कि संगठन के सचिव और महासचिवों ने अपनी रिपोर्ट में जिन सांसदों की जनता के बीच परफॉरमेंस और पॉपुलेरिटी पूअर बताई गई है, उनकी संख्‍या एक सैकड़ा से अधिक है।
ऐसे सभी सांसदों को पार्टी ने अंतिम रूप से अधिकतम 6 माह का समय इसलिए दिया है कि यदि वह इस दौरान अपनी परफॉरमेंस को पूअर से प्रॉपर बना पाते हैं तो उन्‍हें चुनाव लड़ाने के बावत विचार किया जा सकता है।
पार्टी ने ये समय भी इसलिए दिया है ताकि इसी वर्ष चार राज्‍यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों के नतीजे भी सामने आ जाएं और वहां के सिटिंग भाजपा सांसदों की परफॉरमेंस का ठोस आकलन किया जा सके।
इन सब के अलावा पार्टी उन सांसदों को रीप्‍लेस करने का पूरा मन बना चुकी है जिन्‍होंने पार्टी के अंदर रहकर मोदी सरकार के काम-काज की न सिर्फ तीखी आलोचना की है बल्‍कि समय-समय पर पार्टी को नुकसान पहुंचाने का काम भी किया है।
पार्टी के अंदरुनी और अत्‍यंत भरोसमंद इन सूत्रों के अनुसार 2019 के लोकसभा चुनावों में जिन सांसदों का पत्ता काटा जाना है उनमें से करीब डेढ़ दर्जन ने उत्तर प्रदेश से जबकि 26 ने मध्‍यप्रदेश जीत हासिल की थी। बाकी का ताल्‍लुक राजस्‍थान, बिहार, मध्‍य प्रदेश, कर्नाटक व गुजरात से है।
इस सबके बीच पार्टी ने इस बात का भी पूरा ख्‍याल रखा है कि विपक्ष का संभावित गठबंधन कौन-कौन से और कहां-कहां के उम्‍मीदवारों को प्रभावित कर सकता है।
उल्‍लेखनीय है कि मथुरा भी ऐसा ही संसदीय क्षेत्र है जहां विपक्ष का संभावित गठबंधन भाजपा के सामने संकट खड़े कर सकता है।
मथुरा से 2014 में भी भाजपा ने बाहरी प्रत्‍याशी सिने अभिनेत्री हेमा मालिनी को चुनाव लड़वाया क्‍योंकि तब यहां पार्टी को कोई जिताऊ कद्दावर प्रत्‍याशी नहीं मिल सका था।
बाहरी प्रत्‍याशियों को लेकर मथुरा की जनता का जैसा कटु अनुभव पूर्व में रहा है, उसमें फिलहाल कोई उल्‍लेखनीय प्रगति नहीं हो सकी है। बात चाहे हरियाणा से आए मनीराम बागड़ी की हो अथवा फर्रुखाबाद से आए डॉ. सच्‍चिदानंद हरि साक्षी महाराज की। रालोद के युवराज जयंत चौधरी की हो अथवा मायानगरी से आईं स्‍वप्‍न सुंदरी हेमा मालिनी की।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

वाह योगी जी वाह….यही है तबादला नीति…जो छिनरे, वो ही डोली के संग

ब्रज में एक कहावत है। कहावत कुछ ऐसे है- जो छिनरे, वो ही डोली के संग। समझने वाले समझ गए होंगे, और न समझे वो अनाड़ी हैं।
फिलहाल यह कहावत याद आई है मथुरा में एसएसपी के पद पर कार्यरत युवा आईपीएस अधिकारी प्रभाकर चौधरी के स्‍थानांतरण से। बात निकली है तो दूर तक जायेगी ही। प्रभाकर चौधरी के स्‍थानांतरण से याद आया कि कुछ और भी स्‍थानांतरण योगीराज में ऐसे हुए हैं जिन पर यह कहावत सटीक सिद्ध होती है, लेकिन पहले बात प्रभाकर चौधरी की।
पुलिस की आम छवि के विपरीत प्रभाकर चौधरी ने बहुत कम समय में मथुरा की जनता को अपनी कार्यशैली से प्रभावित किया। प्रभाकर चौधरी ने मथुरा की यातायात व्‍यवस्‍था में आमूल-चूल परिवर्तन करके यह साबित कर दिया कि इच्‍छाशक्‍ति हो तो लाइलाज रोग भी दुरुस्‍त किया जा सकता है। जिन-तिराहों चौराहों पर तिपहिया वाहन चालकों का पूरी तरह कब्‍जा रहता था और थाना-चौकियों की पुलिस के संरक्षण में वह खुलेआम गुण्‍डागर्दी करते थे, प्रभाकर चौधरी ने उन्‍हें पूरी तरह हद में रहना सिखा दिया। होलीगेट और भरतपुर के अंदर चाहे जब माल उतरवाने वालों को समझा दिया कि अधिकारी कड़क हो तो नोटों की खनक भी काम नहीं आती।
आम जनता को सुकून और महकमे में बेचैनी से प्रभाकर चौधरी की कार्यप्रणाली का अंदाज लगाया जा सकता है। हालांकि इंस्‍पेक्‍टर से ऊपर के अधिकारियों ने उनके रहते भी थाने-चौकियों से निर्धारित महीनेदारी वसूलने में कोताही नहीं बरती जिसे थाना-चौकी प्रभारी ”मरे पर मार” की संज्ञा दिया करते थे किंतु फिर भी प्रभाकर चौधरी की ईमानदारी के कायल थे।
बेशक प्रभाकर चौधरी के कार्यकाल में अपराधों पर बहुत प्रभावी अंकुश नहीं लग पाया किंतु उसके लिए उनके प्रयास निश्‍चित ही सार्थक रहे।
शुरू-शुरू में तो प्रभाकर चौधरी पर सत्ताधारी पार्टी के नेता भी फख्र किया करते थे किंतु धीरे-धीरे वह कुछ नेताओं की आंखों में खटकने लगे। ऐसे नेताओं को उस दिन मौका मिल गया जिस दिन उप मुख्‍यमंत्री दिनेश शर्मा के मथुरा आगमन पर प्रभाकर चौधरी ने कुछ नेताओं को प्रोटोकॉल तोड़कर मुलाकात करने से रोका। इन नेताओं की एसएसपी से झड़प हुई और उन्‍होंने पार्टी को हाजिर-नाजिर जानकर शपथ उठा ली कि जब तक प्रभाकर चौधरी का मथुरा से बिस्‍तर नहीं बंधवा देंगे तब तक ”जय श्रीराम” नहीं बोलेंगे।
नेताओं की शपथ रंग लाई और प्रभाकर चौधरी का तबादला कर दिया गया। अभी प्रभाकर चौधरी ने चार्ज छोड़ा भी नहीं था कि चौराहों-तिराहों पर यातायात की दुर्व्‍यवस्‍था और तिपहिया वाहन चालकों की रंगदारी दिखाई देने लगी। हर दिन हजार पांच सौ के नोट घर ले जाने वालों ने चैन की सांस ली और उनकी तिपहिया चालकों से जुगलबंदी फिर दिखाई देने लगी। अब एकबार जिला नए सिरे से बबलू कुमार के हवाले है। देखना यह है कि बबलू कुमार यहां अपनी दूसरी पारी में कितने कारगर साबित होते हैं।
वैसे बबलू कुमार मथुरा के लिए और मथुरा बबलू कुमार के लिए अपरिचित नहीं है। पूरे देश में सपा शासन का ”डंका” बजवाने वाले उस ”जवाहर बाग कांड” के बाद बबलू कुमार को मथुरा का एसएसपी बनाकर भेजा गया था जिसमें दो जांबाज पुलिस अफसरों की शहादत हुई थी। इन अधिकारियों की हत्‍या का केस अब भले ही सीबीआई के हवाले हो लेकिन न्‍याय की दरकार के लिए अब भी बहुत कुछ पुलिस के हाथ में है। शायद बबलू कुमार कुछ काम आ जाएं।
अब बात करते हैं आगरा की। आगरा में योगी सरकार ने दो दिन पहले जिलाधिकारी के पद पर एनजी रविकुमार को भेजा है। एनजी रविकुमार मथुरा में काफी वक्‍त तक इस पद को सुशोभित कर चुके हैं। बहिन मायावती के कार्यकाल में उन्‍होंने मथुरा की शोभा बढ़ाई थी।
डीएम के रूप में एनजी रविकुमार ने यहां कितनी शोहरत हासिल की थी, इसे हर जिम्‍मेदार नागरिक बता सकता है। वह अपनी दक्षिण भारतीय शैली वाली हिंदी में और कुछ भले ही ठीक से न समझा पाते हों किंतु ”मतलब की बात” भली-भांति समझा देते थे, नतीजतन उनके रहते एसएसपी सिर्फ ”अंगूठे” का प्रयोग कर पाए क्‍योंकि पुलिस का भी सारा काम डीएम एनजी रवि कुमार निपटा दिया करते थे।
संभवत: यही कारण है कि एनजी रविकुमार को आगरा जैसे महानगर का जिलाधिकारी बनाना लोगों को हजम नहीं हो रहा। हजम इसलिए भी नहीं हो रहा क्‍योंकि बुआ-भतीजे की सरकारों को पानी पी-पीकर कोसने वाले योगी जी और उनके मंत्रिमण्‍डलीय सहयोगी अब उनके मुंहलगे अधिकारियों को ही अपनी नाक का बाल कैसे बना सकते हैं।
याद रहे कि बबलू कुमार भी अखिलेश यादव की गुड बुक में सबसे ऊपर थे और इसीलिए उन्‍हें मथुरा की कमान बेहद विपरीत परिस्‍थितियों में सौंपी गई थी। बबलू कुमार पर तब कानून-व्‍यवस्‍था के साथ-साथ जवाहर बाग कांड से डेमेज हुई सपा की इमेज को भी संभालने की जिम्‍‍‍‍‍‍‍‍मेदारी थी।
ये अलग बात है कि उसके बाद हुए चुनावों ने बता दिया कि जवाहर बाग कांड का असर मथुरा तक सीमित नहीं रहा, वह प्रदेशव्‍यापी हो चुका था लिहाजा बबलू कुमार जैसे अधिकारी कितनी थेगड़ी लगाते और कहां तक लगाते।
समाजवादियों की बेहद करीबी एक ऐसी ही महिला आईपीएस अधिकारी का नाम है मंजिल सैनी। तमाम उपाधियों से विभूषित मंजिल सैनी भी अखिलेश राज में लंबे समय तक मथुरा की एसएसपी रहीं। मथुरा में उन्‍होंने अपने व्‍यक्‍तिगत रिश्‍ते भी खूब निभाए और राजनीतिक रिश्‍ते भी परवान चढ़ाए। पूजा-पाठों में बढ़-चढ़कर हिस्‍सा लिया और जमकर अपनी भी पूजा कराई।
अखिलेश के चचा उन दिनों जब मथुरा का दौरा करने आते थे तो मंजिल सैनी पर उनकी कृपा ऐसे बरसती थी जैसे वह सपा परिवार का ही हिस्‍सा हों।
सपा के शासनकाल में किसी के भी मुंह से यह चर्चा सुनाई देना आम था कि मंजिल सैनी के पति की अखिलेश के एक मित्र और पार्टी पदाधिकारी से गहरी छनती थी। यहां तक कि कारोबार में भागीदारी भी थी।
यही मंजिल सैनी योगीराज में मेरठ की एसएसपी बनाई गईं और दबंग महिला अधिकारी के ”मौखिक खिताब” से भी नवाजी गईं। वो भी तब जबकि मंजिल सैनी के रहते मेरठ में अपराध और अपराधी नित नई मंजिल चढ़ते चले गए।
कुछ समय पहले मंजिल सैनी मेरठ से तब रुखसत हुईं जब खुद उन्‍होंने व्‍यक्‍तिगत कारणों से हटना चाहा अन्‍यथा योगीराज में उन पर पूरी कृपा बरस रही थी।
ये तो मात्र तीन उदाहरण हैं वरना प्रदेश ऐसे अनेक उदाहरणों से भरा पड़ा है। जाहिर है कि सवाल तो उठेंगे।
सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं कि योगी जी की भाषा में बहुत से अपराधियों को ‘ठोकने’ के बावजूद यूपी के अपराध का ग्राफ है कि नीचे आने का नाम नहीं ले रहा। गिनती गिनने के लिए निश्‍चित ही बहुत से इनामी अपराधी पुलिस की गोलियों के काम आ गए परंतु अमन कायम फिर भी नहीं हो पा रहा।
लोग कह रहे हैं कि ठोका-ठाकी तो योगीराज से पहले भी चलती रही है और पुलिस के अधिकारियों को ”शतकवीर” जैसी ”नाजायज उपाधियों” से नवाजा जाता रहा है इसलिए ठोकने-ठाकना बहुत प्रभाव नहीं छोड़ता। प्रभाव तो तभी पड़ता है जब नतीजा धरातल पर दिखाई दे।
बात यहीं आकर अटक जाती है क्‍योंकि धरातल पर तो वही अधिकारी हैं जिनके लिए सब धान बाईस पसेरी रहता है। बुआ रहें या बबुआ और योगी रहें या भोगी, उनकी चवन्‍नी तब भी चल रही थी और अब भी चल रही है। न अतीत का आकलन न भविष्‍य की चिंता।
योगी जी सोच रहे होंगे कि अभी साल ही तो पूरा हुआ है। चार साल बाकी हैं। वह शायद भूल रहे हैं राजनीति में प्‍याज के बढ़ते दाम भी खून के आंसू रुला देते हैं, फिर ये तो चलती हुई चवन्‍नियां हैं।
आप पहली बार मुख्‍यमंत्री की कुर्सी पर काबिज हुए हो, और ये लोग हर शासन में पद पर काबिज रहे हैं। विश्‍वास करना ठीक है किंतु अंधविश्‍वास आत्‍मघाती होता है। भरोसे का खून तभी किया जा सकता है जब जरूरत से ज्‍यादा भरोसा होता है।
प्रदेश में मेहनती और ईमानदार अधिकारियों की कमी न कभी थी और न होगी, लेकिन दृष्‍टिभ्रम पहले भी था और अब भी है। नहीं होता तो घुटे हुए महात्‍माओं को बार-बार आजमाने की जरूरत नहीं पड़ती।
ये दृष्‍टिभ्रम ही रहा होगा जब अखिलेश को मुख्‍यमंत्री का पद गंवाने के बाद यह कहना पड़ा कि कल तक जो अधिकारी मेरे जूठे कप-प्‍लेट उठाते थे, वही आज साजिश रचकर सरकारी बंगले में तोड़-फोड़ का आरोप मेरे मत्‍थे मढ़ रहे हैं।
योगी जी…उत्तर प्रदेश न तो गुरू गोरखनाथ का मठ है और न समूचे प्रदेश की जनता उस मठ की अनुयायी है।
आपको मठ से निकालकार देश के इस सबसे बड़े प्रदेश की कमान यदि सौंपी गई है तो उसका खास मकसद भी है। उस मकसद को घुटे हुए महात्‍माओं पर आंख बंद करके भरोसा करने में जाया न किया जाए तो अच्‍छा है।
चले हुए कारतूसों को चलाने की कोशिश अक्‍लमंदी नहीं। आजमाए हुओं को आजमाना भी तर्कसंगत नहीं। पार्टी के किसी एक वर्ग की शिकायतों को आधार बनाकर अच्‍छे अधिकारियों का तीन-तीन महीने में तबादला होता रहा तो न घर के रहेंगे न घाट के। कुछ आम जनता की भी सुन लें, वक्‍त जरूरत काम आएगी।
कहते हैं- राजा, योगी, अग्‍नि, जल…इनकी उल्‍टी रीत…बचते रहिओ परशुराम, थोड़ी रखियो प्रीत।
आप तो ”राजा” और ”योगी” का दुर्लभ कॉम्‍बीनेशन हैं। हमें जितनी प्रीति दिखानी थी, उतनी दिखा दी। अब आप जानें और आपकी रीति।
मानो तो देवता वरना पत्‍थर। 2019 में सिर्फ कुछ महीने शेष हैं। फिर परीक्षा अधिकारियों की नहीं, आपकी और आपके फैसलों की होगी।
जय श्रीराम, जय भारत, जय हिंद।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुक्रवार, 20 जुलाई 2018

राधापुरम एस्‍टेट: जहां परिवार सहित “अकाल मौत” का मुकम्‍मल इंतजाम कर रहे हैं लोग

मथुरा। नेशनल हाईवे नंबर 2 के सहारे गनेशरा रोड पर बसी हुई गेटबंद कॉलोनी राधापुरम एस्‍टेट, जिले की ही नहीं संभवत: आगरा मंडल की सबसे पॉश कॉलोनी मानी जाती है ।
कॉलोनी की ख्‍याति के अनुरूप यहां एक ओर जनपद का ‘समृद्ध’ तबका निवास करता है तो दूसरी ओर अधिकारियों की भी कोई कमी नहीं है।
समृद्धि का सीधा संबंध बुद्धि से है लिहाजा यह कहना भी मुनासिब होगा कि राधापुरम एस्‍टेट में ‘बुद्धि के पुतलों’ की भरमार है। बुद्धि से धनबल और धनबल से बाहुबल पैदा होना स्‍वाभाविक है इसलिए राधापुरम एस्‍टेट में एक से बढ़कर एक ‘बाहुबलियों’ की खासी तादाद है।
यहां तक तो सब ठीक है किंतु ‘गांठ के पूरे लेकिन आंखों से सूरदास’ राधापुरम एस्‍टेट के अधिकांश निवासियों में अचानक अपनी, और यहां तक कि अपने परिजनों की “अकाल मौत” का मुकम्‍मल इंतजाम करने की होड़ लग गई है।
आश्‍चर्यजनक रूप से इस मामले में कोई अपनी बुद्धि का इस्‍तेमाल नहीं कर रहा और सब के सब एक अंधी दौड़ का हिस्‍सा बनते जा रहे हैं। बिना यह सोचे-समझे कि इस दौड़ का नतीजा क्‍या निकलेगा।
जी हां, यह प्रतिस्‍पर्धा है घर के बाहर सबमर्सिबल लगवाने की। अपने ही मकान की नींव को खोखला कर देने की।
ऐसा नहीं है कि कॉलोनी में पानी की सप्‍लाई न होती हो। पानी की सप्‍लाई के लिए कॉलोनी में बाकायदा टंकी बनी है और सुबह करीब 5 बजे से लेकर दोपहर साढ़े बारह बजे तक तथा शाम 4 बजे से लेकर रात्रि 10 बजे तक वहां से हर घर को पानी मुहैया कराया जाता है।
हालांकि कॉलोनाइजर ने घर बेचते वक्‍त 24X7 पानी की आपूर्ति का दावा किया था किंतु धीरे-धीरे उसमें कमी आने लगी, फिर भी अब सुबह करीब साढ़े सात घंटे और शाम को 6 घंटे पानी दिया जा रहा है जो किसी भी परिवार के लिए पर्याप्‍त है।
चूंकि कॉलोनाइजर ने करीब चार साल पहले अपना आधिपत्‍य छोड़कर कॉलोनी सोसायटी के हवाले कर दी है इसलिए अब पानी-बिजली, सुरक्षा, सफाई आदि की सारी जिम्‍मेदारियां सोसायटी के ऊपर हैं।
बहरहाल, पानी की समस्‍या सबसे पहले तब शुरू हुई जब लोगों ने अपनी सुविधा और मनमर्जी से दूसरी, तीसरी और यहां तक कि चार-चार मंजिलें खड़ी करना शुरू कर दिया। फिर इतनी ऊंचाई पर पानी पहुंचाने के लिए टुल्‍लू पंप लगवाए। टुल्‍लू पंपों की संख्‍या में इजाफा होने का परिणाम यह हुआ कि पहली मंजिल पर रखी टंकियों तक भी पानी पहुंचने में असुविधा होने लगी। ऐसे में हर घर के अंदर टुल्‍लू पंप लग गए।
अब जबकि टुल्‍लू पंपों से पानी खींचे जाना भी समस्‍या बन गया तो लोगों ने निजी बोरिंग कराना शुरू कर दिया है। आज आलम यह है कि कॉलोनी में किसी न किसी घर के सामने बोरिंग होती देखी जा सकती है। बिना यह सोचे-समझे कि धरती की कोख को अंधाधुंध तरीके से खोखला करने का परिणाम आखिर होगा क्‍या। अपने ही मकान की जड़ (नींव) में ‘मठ्ठा’ डालकर क्‍या हासिल करना चाहते हैं लोग।
हाल ही में भूगर्भीय हलचल और इसके प्रभावों का विश्लेषण करने वाले देश के चार बड़े संस्थानों ने एक अध्ययन में दावा किया है कि भविष्य में आने वाले बड़े भूकंप की तीव्रता रिक्टर पैमाने पर 8 से भी ज्यादा हो सकती है और तब जान-माल की भीषण तबाही होगी।
उल्‍लेखनीय है कि दिल्‍ली और उससे सटे हुए सारे इलाके जिनमें मथुरा व आगरा भी शामिल है, इस संभावित खतरे की जद में हैं लिहाजा यह अनुमान लगाना बहुत कठिन नहीं कि यदि कभी धरती डोलती है तो परिणाम कितने भयावह हो सकते हैं।
गौरतलब है कि राधापुरम एस्‍टेट सहित आसपास की सभी कॉलोनियां ‘भर्त’ की जमीन पर खड़ी की गई हैं इसलिए इनका धरातल पहले से ही बहुत मजबूत नहीं है। भू विज्ञानियों की मानें तो ऐसी जमीन पर कई-कई मंजिला इमारत खड़ी करना खतरे से खाली नहीं होता। ऊपर से यदि इस जमीन का सीना बेहिसाब बोरिंगों से छलनी कर दिया जाएगा तो उसके दुष्‍परिणाम झेलने ही पड़ेंगे।
ऐसे में यह कहना अतिशयोक्‍ति नहीं हो सकती कि राधापुरम एस्‍टेट के निवासी न सिर्फ अपने लिए बल्‍कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी किसी अकाल मौत का मुकम्‍मल इंतजाम कर रहे हैं।
यूं भी विश्‍व के बुद्धिजीवी जब यह मान रहे हैं कि भविष्‍य का विश्‍वयुद्ध किसी और चीज के लिए नहीं, पानी के लिए ही लड़ा जाएगा तो पानी की यह बर्बादी और उसका बेइंतहा दोहन कितना उचित है, इसे बताने की जरूरत नहीं रह जाती।
बेशक पानी के बिना जिंदगी की कल्‍पना तक करना मुश्‍किल है लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं कि हम एक लीटर पानी के लिए सैकड़ों लीटर पानी का दोहन सिर्फ इसलिए करें क्‍योंकि ईश्‍वर ने हमें चार पैसे दे दिए हैं।
राधापुरम एस्‍टेट के निवासी भली-भांति जानते हैं कि उनका ही कोई पड़ोसी हर दिन अपनी ‘गाड़ी’ पानी से धुलवाने का आदी है तो कोई सुबह से घर धोने में अकूत पानी बर्बाद कर देता है। किसी के यहां ऊपर रखी पानी की टंकी से घंटों पानी बहता रहता है तो किसी के नल में टोंटी ही नहीं लगी है।
एक ओर पानी का इतना दुरुपयोग और दूसरी ओर चार-पांच लोगों वाले परिवार के लिए मशीन से जमीन का सीना चीरकर लगाए जा रहे सबमर्सिबल। आखिर यह कैसी आत्‍मघाती सोच है, और क्‍यों कोई इसके बारे में चिंतित नहीं है।
किसी को रोकने या टोकने से बेहतर है कि क्‍यों न खुद भी अपने घर के सामने बोरिंग करा ली जाए। एक बोरिंग फेल हुई तो दूसरी, और दूसरी फेल हुई तो तीसरी। यह सिलसिला थमने वाला नहीं है क्‍योंकि सवाल पानी की जरूरत से कहीं अधिक ‘नाक’ का है। नाक नीची कैसे रख सकते हैं।
यह हाल तो तब है कि भूगर्भीय जल का स्‍तर काफी नीचे जा चुका है, पानी के स्‍त्रोत सूख चुके हैं। जल का अक्षय स्‍त्रोत ‘यमुना’ जैसी नदी अपने अस्‍तित्‍व की लड़ाई लड़ रही है। नदी किनारे के कुएं तक पानी को तरस रहे हैं। कुंण्‍ड और तालाबों को बचाने के प्रयास भी काम नहीं आ रहे। बारिश होने का नाम नहीं लेती, जिस कारण समूचा ब्रज क्षेत्र धीरे-धीरे रेगिस्‍तान में तब्‍दील होने लगा है। डार्क जोन लगातार बढ़ रहा है।
आज कराई जा रही डेढ़-दो सौ फीट गहरी बोरिंग भी कितने महीने या साल पानी देगी, इसका पता नहीं लेकिन यह पता है कि उससे हुआ जमीन के सीने का जख्‍म कभी नहीं भरने वाला।
जहां तक सवाल शासन या प्रशासन का है तो वह जब बिना इजाजत तीन-तीन, चार-चार मंजिला इमारत खड़ी करने पर आंखें मूंदे बैठा है तो सबमर्सिबल लगवाने पर क्‍यों कोई कार्यवाही करेगा। 
बहुत दिन नहीं हुए जब सुविधा के लिए शुरू की गई पॉलीथिन आज न सिर्फ पर्यावरण के लिए बल्‍कि जीवन के लिए भी खतरा बन चुकी है। कैंसर जैसी बीमारी तक इसकी देन है। नदी-नाले ही नहीं, समुद्र और पहाड़ तक आज पॉलीथिन से अटे पड़े हैं। किसी की समझ में नहीं आ रहा कि पॉलीथिन रूपी दैत्‍य से पूरी तरह निजात कैसे पाई जाए। सुविधा किसी दिन इतनी बड़ी समस्‍या बनकर सामने खड़ी होगी, शायद ही किसी ने सोचा हो।
इसी तरह सुविधा के लिए धरती का सीना चीरकर अपने ही नींव को खोखला करने की होड़ हमें जिंदगीभर पानी दे पाएगी या नहीं, इसकी तो गारंटी कोई नहीं दे सकता किंतु इस बात की गारंटी जरूर है कि एक दिन यह होड़ जिंदगी पर भारी पड़ने वाली है। यह ऐसा आत्‍मघाती कदम है जिसका खामियाजा भविष्‍य में भुगतना ही पड़ेगा।
बूंद-बूंद से समुद्र बनता है। अब भी समय है कि सख्‍त कदम उठाकर इस अंधानुकरण पर लगाम लगा दी जाए। राधापुरम एस्‍टेट कोई छोटी कॉलोनी नहीं है। सात सौ से अधिक मकान वाली इस कॉलोनी के हर घर में यदि बोरिंग हो गई तो इसे मौत का कुआं बनने से कोई नहीं रोक पाएगा। अपनी और अपने परिवार की अकाल मौत का मुकम्‍मल इंतजाम करने से ज्‍यादा बेहतर होगा पानी का कोई दूसरा किंतु सार्वजनिक इंतजाम कर लेना। कहीं ऐसा न हो कि देर हो जाए और जब तक बात समझ में आ पाए तब तक करने के लिए हाथ में कुछ बचे ही नहीं। कॉलोनी ही नहीं, जिंदगी भी आपकी है। जिंदगी है तो सारे सुख भोग पाओगे अन्‍यथा राम-नाम सत्‍य तो है ही।
-Legend News

सोमवार, 9 जुलाई 2018

पहले भी हुई हैं जेल के अंदर गैंगवार: अखिलेश राज में मथुरा जिला जेल के अंदर शुरू हुई गैंगवार चली थी 2 दिन

मुन्‍ना बजरंगी की हत्‍या में तो अब तक मिली जानकारी के अनुसार सिर्फ एक असलाह का इस्‍तेमाल हुआ किंतु मथुरा जिला जेल में हुई गैंगवार के दौरान दोनों पक्षों ने आधुनिक हथियार चलाए।

उत्तर प्रदेश में जेल के अंदर गैंगवार की यह पहली घटना नहीं है जिसमें कुख्‍यात माफिया डॉन मुन्‍ना बजरंगी को गोलियों से भून डाला गया। इससे पहले भी जेल के अंदर गैंगवार हुई हैं और उसमें बदमाश भी मारे गए हैं।
17 जनवरी 2015 की दोपहर मथुरा जिला जेल में हुई गोलीबारी में एक गैंग से अक्षय सोलंकी को मौत के घाट उतार दिया गया जबकि दूसरे गैंग से राजकुमार शर्मा, दीपक वर्मा और राजेश ऊर्फ टोंटा घायल हुए थे।
मुन्‍ना बजरंगी की हत्‍या में तो अब तक मिली जानकारी के अनुसार सिर्फ एक असलाह का इस्‍तेमाल हुआ किंतु मथुरा जिला जेल में हुई गैंगवार के दौरान दोनों पक्षों ने आधुनिक हथियार चलाए। पुलिस की कहानी के अनुसार इस गैंगवार में इस्‍तेमाल किए गए नाइन एमएम हथियार बंदी रक्षक कैलाश गुप्‍ता ने पहुंचाए थे। इस गैंगवार के बाद मथुरा जिला जेल से बरामद दोनों हथियार नाइन एमएम (प्रतिबंधित बोर) के थे।
इत्‍तेफाक देखिए कि मुन्‍ना बजरंगी की हत्‍या में भी इसी बोर के हथियार को इस्‍तेमाल किए जाने की बात सामने आ रही है।
दरअसल, मथुरा जिला जेल के अंदर गैंगवार का आगाज़ हाथरस में राजेश टोंटा के घर से शुरू हुआ। जेल के अंदर गैंगवार से कुछ दिन पहले राजेश टोंटा ने अपने घर की तीसरी मंजिल पर पश्‍चिमी उत्तर प्रदेश के कुख्‍यात अपराधी ब्रजेश मावी का धोखे से कत्‍ल करके उसकी लाश को ठिकाने लगा दिया था। राजेश टोंटा और ब्रजेश मावी यूं तो गहरे दोस्‍त थे किंतु बताया जाता है कि उनके बीच किसी जमीन को लेकर रंजिश पनपी और उसी रंजिश के चलते टोंटा ने मावी की बेरहमी से हत्‍या कर दी।
इसी हत्‍या के केस के तहत पुलिस ने राजेश टोंटा को हाथरस से गिरफ्तार किया था और सुरक्षा के मद्देनजर मथुरा कारागार में शिफ्ट किया।
बागपत जिला जेल में हुई मुन्‍ना बजरंगी की हत्‍या से कहीं बहुत आगे मथुरा में तो 17 जनवरी 2015 को जेल के अंदर 1 हत्‍या हो जाने और राजेश टोंटा सहित तीन बदमाशों के घायल हो जाने के बाद दूसरे ही दिन 18 जनवरी को टोंटा को तब गोलियों से भून डाला गया जब उसे इलाज के लिए एंबुलेंस में भारी पुलिस फोर्स के साथ मथुरा की एसएसपी मंजिल सैनी आगरा ले जा रही थीं।
मथुरा के फरह थाना क्षेत्र में नेशनल हाईवे नंबर 2 पर मथुरा-आगरा के बीच पचासों पुलिसकर्मियों के रहते एंबुलेंस के अंदर राजेश टोंटा को गोलियों से भून डाला गया और न तो पुलिस एक भी बदमाश को मौके से पकड़ सकी और न टोंटा के साथ एंबुलेंस में मौजूद कोई पुलिसकर्मी घायल हुआ।
अपराध जगत में राजेश टोंटा के नाम से कुख्‍यात रहे हाथरस निवासी राजेश शर्मा की पत्‍नी कनक शर्मा ने अपने पति की हत्‍या का आरोप मथुरा की महिला एसएसपी मंजिल सैनी पर लगाया। कनक शर्मा ने इस मामले में बाकायदा मथुरा के थाना फरह को इस आशय की तहरीर दी। तहरीर के मुताबिक राजेश टोंटा की हत्‍या का सौदा एसएसपी मंजिल सैनी ने 3 करोड़ की मोटी रकम लेकर किया था।
कनक शर्मा द्वारा इस मामले में ब्रजेश मावी के अवकाश प्राप्‍त पुलिस ऑफीसर पिता राजेन्‍द्र सिंह, मावी की पत्‍नी सीमा, विनोद चौधरी एवं प्रमोद चौधरी पुत्रगण पुरुषोत्तम सिंह निवासीगण सी-18 हरीनगर कृष्णानगर मथुरा और एसएसपी मंजिल सैनी शामिल बताए गए।
कुल मिलाकर यदि ये कहा जाए कि उत्तर प्रदेश की जेलें हर दौर में कुख्‍यात अपराधियों के लिए सजा का ठिकाना न होकर संरक्षण के केंद्र रही हैं तो कुछ गलत नहीं होगा। राज चाहे आज योगी का हो अथवा अखिलेश, मुलायम या मायावती का।
भाजपा के सहयोग से सरकार चला रहीं मायावती के शासनकाल में 1995 के दौरान भी मथुरा जिला कारागार के अंदर वाले गेट पर हुई गोलीबारी में किशन पुटरो के साथ जेल के एक सफाईकर्मी की भी हत्‍या गोलियां बरसाकर कर दी गई थी।
कहने का आशय यह है कि उत्तर प्रदेश की कानून-व्‍यवस्‍था एक लंबे समय से बदहाल है। यह बात अलग है कि जिस तरह आज योगी आदित्‍यनाथ पहले से बेहतर कानून-व्‍यवस्‍था होने का दावा करते हैं, उसी तरह मायावती और अखिलेश भी अपने-अपने समय में कानून का राज होने का दावा करते रहे थे किंतु सच्‍चाई यही है जो मुन्‍ना बजरंगी की हत्‍या से सामने आई है या राजेश टोंटा एवं अक्षय सोलंकी की हत्‍या से सामने आई थी।
अखिलेश राज में हुआ जवाहर बाग कांड भी इसी बदहाल कानून-व्‍यवस्‍था का उदाहरण बना था। तब मथुरा के सरकारी जवाहर बाग को राजनीतिक संरक्षणप्राप्‍त माफिया रामवृक्ष यादव से खाली कराने गए एसपी सिटी और एसओ को भारी पुलिसबल की मौजूदगी में मार दिया गया।
सच तो यह है कि सरकारें आती जाती रहती हैं लेकिन कानून-व्‍यवस्‍था जस की तस रहती है। निश्‍चित ही इसके लिए वो व्‍यवस्‍था दोषी है जिसके कारण पुलिस-प्रशासन का पूरी तरह राजनीतिकरण हो चुका है। जाहिर है कि जब तक पुलिस-प्रशासन के इस राजनीतिकरण को खत्‍म नहीं किया जाता तब तक न सड़क पर अपराध कम होंगे और न जेल के अंदर।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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