रविवार, 25 नवंबर 2018

हिंदुओं को उन्‍मादी बना देने पर कौन आमादा है, कौन है राममंदिर निर्माण के लिए हो रही राजनीति का जिम्‍मेदार?

अयोध्‍या में राम मंदिर के निर्माण की पुरजोर मांग के बीच इस आशय का प्रचार भी किया जा रहा है कि देश का मुसलमान आशंकित है, वह भयभीत है और इसके लिए हिंदुओं की कथित उन्‍मादी सोच जिम्‍मेदार है।
अब सवाल यह उठता है कि मुसलमानों के आशंकित या भयभीत होने का प्रचार कर कौन रहा है ? 
यह प्रचार मुसलमानों के ही नुमाइंदे बनकर टीवी की नियमित बहसों में भाग लेने वाले वो लोग कर रहे हैं जो न सिर्फ प्रधानमंत्री तक के लिए खुलेआम अपशब्‍दों का इस्‍तेमाल करते हैं बल्‍कि बाबर को अपना पूर्वज बताते हुए बहुसंख्‍यकों को मंदिर बना लेने की चुनौती एक चेतावनी के रूप में देते हैं।
‘आज तक’ की एक ऐसी ही डिबेट में मशहूर टीवी एंकर रोहित सरदाना को मुसलमानों के नुमाइंदे और सुप्रीम कोर्ट के वकील महमूद पराचा से कहना पड़ा कि अधिकांश मुसलमान तो कहते हैं हमें बहुसंख्यकों से नहीं, उन मीडिया पैनेलिस्ट मुसलमानों से डर लगता है जो अपनी-अपनी दुकान चलाने के लिए राष्‍ट्रीय टीवी चैनल्‍स पर बैठकर वैमनस्‍यता फैलाने का काम करते हैं।
कौन था बाबर
बाबर के बारे में इतिहास जितनी जानकारी देता है उसके मुताबिक वह मध्य एशिया के समरकंद राज्य की एक बहुत छोटी सी जागीर फरगना में पैदा हुआ। 14 फरवरी 1483 ई. को जन्‍मे बाबर का ताल्‍लुक सीधे तौर पर तैमूर से था।
बाबर का पिता उमर शेख मिर्जा तैमूर का वंशज था जबकि उसकी मां मंगोल चंगेज़ ख़ां के वंशज ख़ान यूनस की पुत्री थी। यूं देखा जाए तो बाबर की नसों में तुर्कों के साथ मंगोलों का भी रक्त था किंतु उसने काबुल पर अधिकार कर स्वयं को मुग़ल घोषित कर दिया। और इस तरह वह भारत में एक मुगल शासक बतौर प्रचलित रहा।
बाबर को बाप से विरासत में मिली थी शराब की लत 
बाबर के पिता उमर शेख को शराब पीने का बड़ा शौक था। अक्सर वह बाबर को भी इसको चखने का न्यौता देता था। साथ ही उसे कबूतर पालने का भी बड़ा चाव था। माना जाता है कि कबूतरों को दाना देते हुए एक हौज में गिर जाने से उसकी मृत्यु हुई थी। पिता की मृत्यु के समय बाबर की आयु केवल बारह वर्ष की थी। शराब की लत और तैमूरवंश उसे अपने पिता से विरासत में मिले किंतु वह खुद को कभी तैमूरवंशी कहलाना पसंद नहीं करता था।
क्‍या कहती है बाबर की आत्‍मकथा
बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक ए बाबरी’ में लिखा कि उसका पहला शिक्षक शेख मजीद बेग एक बड़ा अय्याश था इसलिए बहुत गुलाम रखता था। उसने अपने दूसरे शिक्षक कुलीबेग के बारे में लिखा कि वह न नमाज पढ़ता था और न रोजा रखता था, वह बहुत कठोर भी था। तीसरे शिक्षक पीर अली दोस्तगोई के बारे में उसने लिखा कि वह बेहद हंसोड़- ठिठोलिया और बदकारी में माहिर था।
अय्याश था बाबर 
“बाबर बताता है कि वह अपने शिक्षकों की करतूतों को बिल्कुल पसंद नहीं करता था परन्तु असल में उसने उनके कई सारे अवगुणों को अपना लिया था। बाबर ने अपनी आत्‍मकथा में यहां तक लिखा है कि वह समलैंगिक था और जब महज 16-17 साल का था, तब उसको बाबुरी नामक एक किशोर के साथ प्रेम हो गया था।
बाबुरी के प्रति आसक्‍त बाबर ने आशिकी पर शेर भी लिखे थे। बाबर ने बाबुरी का जिक्र करते हुए बाबर ने बाबरनामा में लिखा है कि एक बार आगरा की गली में हमने उसे देखा परंतु हम उससे आंखें नहीं मिला पाये क्योंकि तब हम बादशाह बन चुके थे।
बाबर के यह किस्से साबित करते हैं कि वह कितना अय्याश किस्म का व्‍यक्‍ति था।
छल-कपट का आदी रहा बाबर
बाबर ने अपने जीवन में छल और कपट का भरपूर इस्‍तेमाल किया। उसने समरकंद को जीतने का प्रयास तीन बार किया पर वह कामयाब नहीं हो सका। जल्दी ही उसने कपट तथा चतुराई से 1504 में काबुल पर कब्जा कर लिया।
भारत पर नजर 
काबुल पर काबिज होने के बाद बाबर ने भारत की ओर ध्यान दिया, जो उसके जीवन की बड़े लंबे समय से लालसा थी। बाबर के भारत आक्रमण का मूल कारण भारत की राजनीतिक परिस्थितियों से भी अधिक स्वयं उसकी दयनीय तथा असहाय अवस्था थी। वह काबुल के उत्तर अथवा पश्चिम में संघर्ष करने की अवस्था में नहीं रहा था और इसलिए भारत की धन संपत्ति लूटना चाहता था। इसके लिए उसने अपने पूर्वजों महमूद गजनवी तथा मोहम्मद गौरी का हवाला देकर भारत को तैमूरिया वंश का क्षेत्र बताया था।
3000 से भी अधिक निर्दोषों को मारा
बाबर की कट्टरता और क्रूरता को इसी से समझा जा सकता है कि उसने अपने पहले आक्रमण में ही बाजौर के सीधे-सादे 3000 से भी अधिक निर्दोष लोगों की हत्या कर दी थी। वो भी सिर्फ इसलिए क्योंकि बाजौर वाले विद्रोही स्‍वभाव के थे। यहां तक कहा जाता है कि उसने इस युद्ध के दौरान एक पुश्ते पर आदमियों के सिरों को काटकर उसका स्तंभ बनवा दिया था। ऐसे ही नृशंस अत्याचार उसने ‘भेरा’ पर आक्रमण करके भी किये।
गुरुनानक ने देखे थे बाबर के अत्याचार
बाबर द्वारा किए गए तीसरे-चौथे व पांचवें आक्रमण जो सैयदपुर व लाहौर तथा पानीपत से जुड़े हैं, को गुरुनानक ने अपनी आंखों से देखा था। बाबर के इन वीभत्स अत्याचारों को गुरुनानक ने पाप की बारात और बाबर को यमराज की संज्ञा दी थी। इन आक्रमणों के वक्‍त बाबर ने किसी के बारे में नहीं सोचा। उसने रास्‍ते में मिले बूढ़े, बच्चे और औरतें का बड़ी बेरहमी से कत्‍ल किया। वह किसी भी कीमत पर भारत की धन-संपदा को लूटकर अपने साथ ले जाना चाहता था।
रामजन्म भूमि विवाद का जनक
बाबर ने मुसलमानों की हमदर्दी पाने के लिए हिन्दुओं का नरसंहार करने के साथ-साथ अनेक मंदिरों को नष्ट किया। इसी कड़ी में बाबर की आज्ञा से मीर बाकी ने अयोध्या स्‍थित राम जन्मभूमि पर निर्मित प्रसिद्ध मंदिर को नष्ट कर मस्जिद बनवाई थी। यही नहीं, ग्वालियर के निकट उरवा में अनेक जैन मंदिरों को भी बाबर ने नष्ट कराया था।
यह कहना गलत नहीं होगा कि क्रूर बाबर का भारत पर आक्रमण हर तरह से महमूद गजनवी या मोहम्मद गौरी जैसा ही था और उन्‍हीं की तरह उसने अपने हितों के खातिर हिन्‍दुओं का कत्‍लेआम व उनकी आस्‍था को नष्‍ट-भ्रष्‍ट करने का काम किया।
कुल मिलाकर निष्‍कर्ष यही निकलता है कि बाबर एक विदेशी आक्रांता था और उसका एकमात्र मकसद भारत के वैभव को समाप्‍त करना तथा उसकी धन-संपदा को लूटकर ले जाना रहा।
वर्तमान हालातों का जिम्‍मेदार कौन ?
ऐसे में यह प्रश्‍न उठना स्‍वाभाविक है कि राम मंदिर निर्माण के लिए आज जो स्‍थिति-परिस्‍थिति बनी है, उसका जिम्‍मेदार वाकई कौन है ?
नि: संदेह राम मंदिर का मुद्दा राजनीति से प्रेरित रहा है किंतु राम को राजनीति के केंद्र में लाने का काम उन कठमुल्‍लाओं ने किया जो कौमपरस्‍ती की आड़ लेकर बाबर को अपना पूर्वज घोषित करने से नहीं सकुचाये। वो हर मंच से बड़ी बेशर्मी के साथ बाबर के ऐसे कुकृत्‍यों की हिमायत करने में लगे रहे जिन्‍हें उनका खुदा भी जायज नहीं ठहराता।
आज के दौर से यदि आकलन करें तो बाबर की मानसिकता सीधे तौर पर आईएसआईएस के सरगना बगदादी, अफगानिस्‍तान के तालिबान या लश्‍करे तैयबा के आतंकी सरगना ओसामा बिन लादेन से मेल खाती है।
बगदादी, लादेन और तालिबान ने भी अपनी कट्टर सोच के चलते एक ओर जहां लाखों निर्दोष लोगों का कत्‍ल किया वहीं दूसरी ओर तमाम ऐतिहासिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक विरासतों को नेस्‍तनाबूद कर डाला।
हो सकता है कि राम मंदिर के निर्माण की मांग या उसका विरोध करने के पीछे भाजपा, कांग्रेस, शिव सेना, सपा-बसपा या अन्‍य दलों के भी अपने-अपने राजनीतिक हित जुड़े हों परंतु इसमें कोई दो राय नहीं कि राम मंदिर को राजनीति के केंद्र में लाने का काम सीधे तौर पर बाबर परस्‍तों ने किया है।
जिस सुप्रीम कोर्ट का हवाला देकर बाबर परस्‍त आज कहते हैं कि मंदिर निर्माण की यह मांग नाजायज है, वह यह भूल जाते हैं सुप्रीम कोर्ट ही नमाज के लिए मस्‍जिद की अनिवार्यता का मुद्दा पूरी तरह खारिज कर चुका है।
अब जबकि नमाज के लिए न तो मस्‍जिद अनिवार्य है और न बाबर किसी भारतीय मुसलमानों का पूर्वज है, फिर उसकी हिमायत में खड़े होना और उसके द्वारा मंदिर तोड़कर बनाई गई मस्‍जिद की पैरवी करना किस तरह जायज है।
सच तो यह है कि कोई भी सच्‍चा मुसलमान यदि मात्र 1400 साल पूर्व हुए इस्‍लाम के प्रवर्तक पैगंबर साहब की जन्‍मस्‍थली पर सवाल खड़े करना बर्दाश्‍त नहीं कर सकता, उसी तरह हिंदू भी मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम की जन्‍मस्‍थली को लेकर लगातार उठाए जा रहे सवालों से आहत हैं।
जहां तक बात मंदिर के निर्माण में होने वाले विलंब और उस पर की जा रही राजनीति की है तो स्‍वामी रामदेव का यह कथन सही प्रतीत होता है कि सब्र का बांध अब टूटने लगा है।
कौन नहीं जानता कि चूल्‍हे पर रखा पानी भी एक समय बाद उबल कर बाहर आ जाता है, इसलिए यह प्रश्‍न मुनासिब नहीं कि सैकड़ों साल यदि इंतजार किया है तो अब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का इंतजार क्यों नहीं।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का इंतजार तो किया ही जा रहा था परंतु जब सुप्रीम कोर्ट ने ही यह कहते हुए बहुसंख्‍यकों के धैर्य की परीक्षा लेनी शुरू कर दी कि उसके लिए राम जन्‍मभूमि का मुद्दा कोई प्राथमिकता नहीं है तो अब सवाल कैसा।
न्‍यायपालिका हो या कार्यपालिका, विधायिका हो या कोई अन्‍य संस्‍था, आखिर ये सब लोगों के लिए बनाए गए तंत्र हैं न कि इन तंत्रों के लिए लोग बने हैं। इसीलिए लोकतंत्र में भी लोक पहले आता है और तंत्र बाद में।
बेशक आज राजनीतिक परिस्‍थितियां ऐसी हैं कि कांग्रेस सहित दूसरे विपक्षी दल भी राम मंदिर निर्माण का खुलकर विरोध करने की हिमाकत नहीं कर पा रहे परंतु सुप्रीम कोर्ट ने अपनी एक अदद टिप्‍पणी से बॉल राजनीतिज्ञों के खेमे में ही डाल दी है। आज यदि राम मंदिर निर्माण का मुद्दा फिर गर्मा रहा है तो उसके लिए अदालतों की तारीख पर तारीख देने की प्रवृत्ति भी कम जिम्‍मेदार नहीं।
राम जन्‍मभूमि को विवादित बनाए रखने में रुचि लेने वालों को समझना ही होगा कि जब उनके मात्र 1400 साल पुराने धर्म पर सवालिया निशान लगाना उन्‍हें आहत करता है तो हजारों साल पूर्व जन्‍म लेने वाले हिंदुओं के आराध्‍य पर प्रश्‍न खड़े करना कैसे सहन होगा और कब तक सहन होगा।
इतिहास गवाह है कि कोई हिंदू शासक कभी आक्रांता नहीं रहा, हिंदुओं से ज्‍यादा सहिष्‍णु कोई हुआ ही नहीं। फिर भी चूल्‍हे पर रखे हुए पानी के उबलकर बाहर आने का इंतजार करना किसी तरह अक्‍लमंदी नहीं।
गौर करने लायक है डॉ. सैयद रिजवान अहमद की यह टिप्‍पणी कि राम मंदिर अब तक इसलिए नहीं बना क्‍योंकि हिंदू जाग्रत नहीं हुआ, जिस दिन हिंदू जाग गया उस दिन राम मंदिर के निर्माण को कोई रोक नहीं पाएगा।
डॉ. रिजवान के शब्‍दों में कहें तो मुस्‍लिमों की बाबर परस्‍ती यदि अब भी नहीं छूटी तो ‘न खुदा ही मिला न विसाले सनम’ की कहावत चरितार्थ होकर रहेगी। उसके बाद मोहब्‍बत का पैगाम कटोरे में लेकर घूमने के अलावा कुछ हाथ नहीं रह जाएगा।
कौन नहीं जानता कि पूरी दुनिया में मुस्‍लिम यदि कहीं सबसे अधिक महफूज हैं तो वह भारत है। सर्व धर्म समभाव के पोषक समूची कायनात में कोई हैं तो वह हिंदू हैं। विश्‍व के मानवों को कुटुम्‍ब मानकर वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा में जीने वाले धर्म को यदि बार-बार चेतावनी दी जाएगी और उनके आराध्‍य के वजूद को चुनौती मिलेगी तो सब्र का बांध टूटना स्‍वाभाविक है।
कोर्ट का फैसला, कानून, अध्‍यादेश आदि सब तब तक अहमियत रखते हैं जब तक उनमें विश्‍वास कायम रहता है। जिस दिन इन व्‍यवस्‍थाओं पर से विश्‍वास टूटने लगता है, उस दिन बहुत कुछ टूटने और बिखरने की नौबत आ जाती है।
बेहतर होगा कि एक नया इतिहास कायम किया जाए, इतिहास दोहराया न जाए अन्‍यथा भगवान श्रीकृष्‍ण ने भी अंत तक महाभारत को रोकने के बहुत प्रयास किए थे। संपूर्ण राज-पाठ की जगह पांडवों के लिए मात्र पांच गांव देने की प्रार्थना की थी लेकिन दुर्योधन नहीं माना।
दुर्योधन द्वापर में ही नहीं हुआ था। वह हर युग में होता है, इसलिए आज के दुर्योधनों को पहचानना जरूरी है क्‍यों कि जरूरी है शांति और सद्भाव। यदि दुर्योधनों की चाल काम आ गई तो शांति की स्‍थापाना के लिए भी युद्ध आवश्‍यक हो जाता है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बुधवार, 24 अक्टूबर 2018

यदि आप इस फेस्टिव सीजन में मथुरा से Hyundai की कार खरीदना चाहते हैं तो पहले यह ख़बर पढ़ लें

जी हां! यदि आप इस फेस्‍टिव सीजन यानी में मथुरा से Hyundai की कोई कार खरीदना चाहते हैं तो यह ख़बर आपके लिए ही है।
कहीं ऐसा न हो कि आप बड़े उत्‍साह से अपने अरमानों की गाड़ी घर लेकर आएं और पता चले कि गाड़ी तो घर पहुंच गई किंतु एजेंसी ‘सड़क’ पर आ चुकी है।
दरअसल, मथुरा जनपद में Hyundai कारों के एकमात्र डीलर आगरा निवासी राजीव रतन और ऋषि रतन ने कार निर्माता कंपनी को धोखे में रखकर Shiel Hyundai का सौदा किसी अन्‍य व्‍यक्‍ति के नाम कर दिया है जो कंपनी की शर्तों के मुताबिक पूरी तरह अवैध है।
बताया जाता है कि फिलहाल डीलरशिप को छिपाए रखने की वजह भी यही है कि कंपनी की आंखों में धूल झोंककर फेस्‍टिव सीजन का भरपूर लाभ उठा लिया जाए।
यही कारण है कि Shiel Hyundai में कार्यरत स्‍टाफ को भी यह कहकर गुमराह किया जा रहा है कि कंपनी की सहमति से डीलरशिप का सौदा हुआ है जबकि कोई भी मल्‍टी नेशनल कार कंपनी अपने डीलर को ऐसा करने की इजाजत कभी नहीं देती।
गौरतलब है कि फेस्‍टिव सीजन में लगभग सभी कार कंपनियां अपने उत्‍पादों पर अच्‍छी-खासी छूट देती हैं और इसका लाभ ग्राहक के साथ-साथ डीलर को भी प्राप्‍त होता है।
डीलर को इन अवसरों पर कंपनी जो टारगेट देती है, उस टारगेट को अचीव करने का बोनस भी निर्धारित होता है, और यह बोनस डीलर के खाते में जाता है।
कंपनी द्वारा दी जाने वाली छूटों में नकद डिस्‍काउंट के अलावा फ्री सर्विस की संख्‍या, गारंटी अथवा वारंटी की मियाद बढ़ा देना आदि भी शामिल होता है।
इन हालातों में अगर आपने किसी ऐसे डीलर से अपने सपनों की कार खरीदी होगी जिसके अपने भविष्‍य पर ही प्रश्‍नचिन्‍ह लगा हो तो आपको सर्विस से लेकर मेंटीनेंस तक में भारी असुविधा होने की पूरी संभवाना है।
वजह एकदम साफ है। प्रथम तो कंपनी कब और किसे डीलर बनाती है, यह उसका अपना निर्णय है। दूसरे जिसे भी वह डीलर बनाती है, जरूरी नहीं कि वह उस गाड़ी पर फेस्‍टिव सीजन में मिली छूट को गंभीरता से ले जिसे उसने अपने स्‍तर से बेचा ही नहीं है और जिसका लाभ उससे पहले वाला डीलर उठा चुका है।
हालांकि कंपनी की शर्तों के मुताबिक प्रत्‍येक डीलर पूर्व में कंपनी द्वारा ग्राहक को दी गई सुविधाएं पूरी करने के लिए बाध्‍य है किंतु हकीकत में ऐसा होता नहीं है। यहां तक कि एक शहर का डीलर दूसरे शहर से खरीदी गई अपनी ही कंपनी की गाड़ी के ग्राहक को सुविधाएं मुहैया कराने में विशेष रुचि नहीं लेता।
डीलर्स की इस हरकत से सभी कार मालिक भली-भांति परिचित होते हैं इसलिए अधिकांश लोग जहां रहते हैं वहीं से कार खरीदने को प्राथमिकता देते हैं।
सामान्‍य तौर पर मथुरा जैसे धार्मिक जनपद में लोग धनतेरस और दीवाली पर नई कार अपने घर लाना चाहते हैं और इसके लिए पहले से तैयारी भी करते हैं। जिन्‍हें फाइनेंस कराना होता है वह फाइनेंस कराकर रखते हैं और जिन्‍हें एक्‍सचेंज ऑफर के तहत शेष धनराशि नकद देकर कार लानी होती है, वह भी पूरी तैयारी रखते हैं।
मन पसंद कार के लिए लोग डीलर के पास एडवांस पैसा पहुंचा देते हैं ताकि उन्‍हें पूर्व निधारित समय पर गाड़ी की डिलीवरी मिल सके।
ऐसे में एक स्‍वाभाविक सवाल यह पैदा होता है कि एडवांस पेमेंट, अच्‍छा लाभ और आफ्टर सेल भी विभिन्‍न माध्‍यमों से कमाई का जरिया लगातार बने रहने के बावजूद मथुरा की डीलरशिप क्‍यों खतरे में पड़ गई।
इस संबंध में जानकारी की तो पता लगा कि ऑटोमोबाइल के क्षेत्र में किसी भी डीलर के सामने आर्थिक तंगी के हालात सिर्फ तब खड़े होते हैं जब वह उस डीलरशिप से हो रही आमदनी का पैसा दूसरे कारोबार में लगाने लगता है। जैसे कि दूसरी कंपनी की डीलरशिप में या फिर जमीनें आदि को खरीदने में।
उल्‍लेखनीय है कि मथुरा में Hyundai कारों के डीलर राजीव रतन व उनके पुत्र ऋषि रतन पर आगरा में एक अन्‍य कार कंपनी की भी डीलरशिप है और इन्‍होंने जमीन आदि में भी पैसा लगाया हुआ है। इसके अलावा पड़ोसी जनपद हाथरस में भी Hyundai की डीलरशिप इन्‍हीं के पास है।
इतना सब होते हुए मथुरा में Hyundai की डीलरशिप से किसी प्रकार का आर्थिक नुकसान मिलने की संभावना नहीं बनती लिहाजा यह अनुमान लगाना आसान है कि पैसा गया कहां होगा।
मथुरा में एक मशहूर दुपहिया वाहन के डीलर ने कुछ समय पूर्व ऐसा ही कारनामा किया था और अपने स्‍तर से सौदा करके करोड़ों रुपए ले लिए थे। कंपनी को जब डीलर के कारनामे का पता लगा तो उसने डीलरशिप टर्मिनेट करके नया डीलर बना लिया लेकिन जिसने पहली डीलरशिप में पैसे लगाए थे, वह फंस गया।
प्रत्‍येक व्‍यक्‍ति का पहला सपना भले ही अपना एक घर बनाना होता है परंतु उसका दूसरा सपना एक चार पहिया वाहन भी लेना होता है। चार पहिया वाहनों में मारुति और Hyundai ऐसी कंपनियां हैं जिनकी सर्वाधिक कारें सड़क पर दौड़ती देखी जा सकती हैं।
फेस्‍टिव सीजन में तो इन कंपनी की कारों के लिए लगभग मारामारी जैसी स्‍थिति पैदा हो जाती है क्‍योंकि सभी को अपनी पसंद का कलर और मॉडल एक निर्धारित तिथि या दिन चाहिए होता है।
अभी धनतेरस में 12 और दीपावली में 14 दिन शेष हैं। यदि आप मथुरा से Hyundai की गाड़ी लेने का मन बना रहे हों तो पहले अच्‍छी तरह यह पता कर लें कि कहीं आपको आफ्टर सेल सर्विस के लिए दूसरी जगहों पर भटकना न पड़े और आप अपनी गाड़ी का भरपूर लुत्‍फ उठा सकें।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2018

Shiel Hyundai में बड़ा घपला: Hyundai मथुरा की एकमात्र डीलरशिप खतरे में

Shiel Hyundai के नाम से मथुरा में Hyundai कारों के एकमात्र डीलर आगरा निवासी राजीव रतन और ऋषि रतन ने कंपनी की आंखों में धूल झोंकते हुए डीलरशिप का सौदा किसी दूसरे को कर दिया है जबकि नियमानुसार ऐसा करना पूरी तरह अवैध बताया जाता है।
यही नहीं, Shiel Hyundai ने अपने स्‍तर से डीलरशिप का सौदा करने की जानकारी उन बैंकों को भी देना जरूरी नहीं समझा जिनमें Shiel Hyundai के एकाउंट हैं और Shiel Hyundai ने वहां से काफी आर्थिक सुविधाएं ले रखी हैं।
बताया जाता है कि इस कारनामे को अंजाम देने के लिए Shiel Hyundai ने अपने कर्मचारियों तक को यह कहकर गुमराह किया है कि उन्‍होंने डीलरशिप का सौदा करने की इजाजत कंपनी से ले ली है।
गौरतलब है कि मूल रूप से दक्षिण कोरिया की कार निर्माता कंपनी Hyundai का भारत के कार बाजार में बड़ा दबदबा है और इसलिए मारुति के बाद Hyundai की ही सर्वाधिक कारें सड़क पर देखी जा सकती हैं।
क्‍या कंपनी ऐसी कोई इजाजत देती है ?
इस बारे में जानकारी की तो पता लगा कि कोई भी मल्‍टीनेशनल कंपनी या बड़ी कंपनी डीलर को ये अधिकार नहीं देती कि वह अपने स्‍तर से डीलरशिप किसी अन्‍य के नाम ट्रांसफर कर दे अथवा उसमें किसी को पार्टनर बना ले।
दिल्‍ली में ऑटोमोबाइल डीलर एसोसिएशन (फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन) के पदाधिकारी जितेन्‍द्र नंदा ने बताया कि डीलर द्वारा किया गया कोई भी ऐसा कृत्‍य कंपनी की शर्तों का उल्‍लंघन है और कंपनी इसके लिए न केवल डीलरशिप टर्मिनेट करती है बल्‍कि आपराधिक केस भी दायर करा सकती है।
उन्‍होंने बताया कि डीलर अगर अपनी डीलरशिप छोड़ना चाहता है तो ज्‍यादा से ज्‍यादा इतना कर सकता है कि इस क्षेत्र के किसी अनुभवी व्‍यक्‍ति का नाम कंपनी को रिकमेंड कर दे किंतु अंतिम निर्णय कंपनी का ही होता है।
कंपनी यदि अपनी सभी औपचारिकताएं पूरी करने के बाद उस व्‍यक्‍ति को उपयुक्‍त समझती है तो पहले वाली डीलरशिप को समाप्‍त कर नए सिरे से डीलरशिप अलॉट करेगी, न कि पुरानी डीलरशिप के साथ उसका कोई संबंध रखने की इजाजत देगी।
यूं भी Hyundai जैसी विश्‍व प्रसिद्ध कार निर्माता कंपनी की डीलरशिप पाने को हमेशा कई-कई लोग लाइन में लगे रहते हैं और कंपनी भी हर बार डीलरशिप के लिए पहले से उच्‍च मानदंड निर्धारित करती है। ऐसे में इस बात का सवाल ही खड़ा नहीं होता कि Hyundai अपने किसी डीलर को डीलरशिप ट्रांसफर करने अथवा उसमें पार्टनरशिप करने की इजाजत दे।
Shiel Hyundai से इस बारे में उनका पक्ष जानने की काफी कोशिश की गई किंतु उनकी ओर से कोई कुछ बताने को तैयार नहीं हुआ। Shiel Hyundai पर मौजूद स्‍टाफ ने बताया कि राजीव रतन और ऋषि रतन दोनों बाहर हैं। हालांकि उन्‍हें फोन पर सूचित कर दिया गया है।
विश्‍वस्‍त सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार Shiel Hyundai द्वारा किए जा रहे इस कारनामे में ऑटोमोबाइल क्षेत्र से ही जुड़े और दूसरी कार कंपनियों के उन डीलर्स का हाथ है जिनके नीचे फिलहाल किसी कारणवश राजीव रतन और ऋषि रतन दबे हुए हैं।
सूत्रों के मुताबिक मथुरा जैसी बड़ी आबादी वाले विश्‍व विख्‍यात धार्मिक जिले में Hyundai की एकमात्र डीलरशिप का सौदा करने की वजह राजीव रतन और ऋषी रतन के सामने अचानक आर्थिक तंगी खड़ी हो जाना है।
अब सवाल यह उठता है कि अच्‍छी-खासी संख्‍या में हर महीने Hyundai कारों के विक्रेता राजीव रतन और ऋषि रतन के सामने अचानक आर्थिक तंगी आ कैसे गई? 
इसके बारे में उनसे ही जुडे हुए लोग यह बताते हैं कि इसका प्रथम कारण तो पारिवारिक विवाद रहा और दूसरा कारण रहा Shiel Hyundai के पैसे को दूसरे कार्यों में लगा देना। अब ये कार्य कैसे थे और उनमें Shiel Hyundai का पैसा क्‍यों लगाया गया, इस पर भी कोई मुंह खोलने को तैयार नहीं है।
हां, ये लोग दबी जुबान से इतना जरूर बताते हैं कि जिन लोगों ने एक अच्‍छी-खासी डीलरशिप का सौदा कराया है, उनका मकसद राजीव और ऋषि रतन से किसी भी तरह अपना पैसा निकाल लेना है ताकि सांप मर जाए और लाठी भी न टूटे।
रही बात डीलरशिप के सौदे का अधिकार रखने या न रखने की, तो उसके बाद लेने व देने वाले भुगतते रहेंगे। इससे उनके ऊपर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है।
Shiel Hyundai के शोरूम का नक्‍शा भी विवादों में 
दूसरी ओर इस बीच यह जानकारी भी मिल रही है कि नेशनल हाईवे नंबर-2 पर नवादा क्षेत्र में जहां Shiel Hyundai का शोरूम बना है, वह Residential area है। किसी भी Residential area में कानूनन कार के किसी शोरूम का निर्माण नहीं कराया जा सकता।
मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण ने भी इसकी पुष्‍टि करते हुए बताया कि कब और किन परिस्‍थितियों में नवादा के Residential area में कार के शोरूम बना लिए गए, कहना मुश्‍किल है।
विकास प्राधिकरण से इस बारे में एक चौंकाने वाली जानकारी यह मिली कि जिस प्‍लॉट पर Shiel Hyundai का शोरूम आज खड़ा है, उस पर तो रेस्‍टोरेंट के लिए नक्‍शा पास किया गया था।
प्राधिकरण के अधिकारियों ने इस बारे में जांच के उपरांत कार्यवाही करने का भरोसा दिया है।
गौरतलब है कि राष्‍ट्रीय राजधानी दिल्‍ली से ताजनगरी आगरा को जोड़ने वाले नेशनल हाईवे नंबर दो पर स्‍थानीय डेवलपमेंट अथॉरिटी की सांठगांठ से Residential area में ऐसे और भी कई शोरूम स्‍थापित हो चुके हैं जो नियम विरुद्ध हैं किंतु आजतक उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई।
सच तो यह है कि अथॉरिटी से पास नक्‍शे के इतर मामूली सा भी फेरबदल दिखाई देने पर पहुंच जाने वाले विप्रा अधिकारी ऐसे शोरूम्‍स को लेकर अब तक आंखें व कान बंद किए बैठे रहे।
यही कारण है कि राजीव और ऋषि रतन ने Hyundai की अपनी डीलरशिप का सौदा शोरूम सहित किया है क्‍योंकि वह उसकी असलियत जानते हैं, और उन्‍हें मालूम है कि रेस्‍टोरेंट में पास शोरूम कभी भी उनके गले की हड्डी बन सकता है।
बहरहाल, करोड़ों रुपए के इस खेल से फिलहाल तो Hyundai कंपनी के साथ-साथ बैंकें और एजेंसी पर कार्यरत स्‍टाफ भी अनभिज्ञ है। कंपनी और बैंकों को तो जब सच्‍चाई पता लगेगी तब वो देख लेंगे किंतु स्‍टाफ को अपना भविष्‍य अंधकारमय दिखाई देने लगा है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बुधवार, 10 अक्टूबर 2018

#MeToo को समर्पित टीवी, फिल्‍म और मीडिया जगत की नवरात्रियां

डिसक्लेमर: इस लेख का संबंध किसी जीवित या मृत स्‍त्री-पुरुष से नहीं है, और न इसका उद्देश्‍य किसी की भाव-नाओं को आ-हत करना है। यह विशुद्ध रूप से जनहित में #MeToo को समर्पित है लिहाजा इसके समर्पण पर जाएं, समानता पर नहीं। 
अचानक दीवाली सेल पर कुछ खास हाथ लगने की लालसा में कल दोपहर घर से निकला ही था कि एक कुषाणकालीन मित्र के हत्‍थे चढ़ गया। पहले तो वह मुझे देखकर पहचानने का प्रयास करते हुए थोड़ा सकुचाया और फिर मेरे होने की पुष्‍टि करके मुस्‍कुराया। उसके बाद दहाड़ मारकर चिल्‍लाते हुए बोला- मैं यहां कोई दीवाली की छूट के लिए नहीं आया, मैं तो तुझे ही तलाशने आया था क्‍योंकि मुझे पूरा यकीन था कि तू यहीं कहीं पाया जाएगा।
भरी जवानी से मैं जानता हूं कि तू दो ही किस्‍म के मेलों में पाया जा सकता है। पहला दीवाली मेला और दूसरा कुंभ का मेला। कुंभ का मेला 2019 में है इसलिए 2018 में तेरी तलाश पूरी हुई।
मुझे एक शब्‍द बोलने का मौका दिए बिना उसने पूछना शुरू किया- चुंगी के कॉन्वेंट स्‍कूल में को-एजुकेशन लेते वक्‍त अपने साथ जो सबसे गोल-मटोल लड़की पढ़ती थी, वह याद है ?
मैंने बमुश्‍किल 40 साल पहले की स्‍मृतियों को संजोने की कोशिश प्रारंभ की ही थी कि वह फिर शुरू हो गया- याद कर 40 साल पहले 60 किलो की वह सहपाठी पैर फिसल जाने के कारण स्‍कूल के पास वाले गंदे नाले में गिर गई थी और तूने अपने धवल वस्‍त्रों की परवाह किए बिना, जान हथेली पर रखकर उस लड़की को नाले से निकाला था। सारे साथी तमाशा देख रहे थे लेकिन तूने उस भारी-भरकम काया को निकालने के लिए नाले में यह सोचे-समझे बिना छलांग लगा दी थी कि उसका वजन तुझे भी साथ लेकर डूब सकता है।
कुषाणकालीन मित्र द्वारा इतना कुछ याद दिलाने के बाद मैं स्‍मृतियों को ठीक से सहेज भी नहीं पाया था कि वह एकबार फिर कंटीन्‍यू हुआ और बोला- 60 किलो से 200 किलों में बदल चुकी वह काया तुझे जल्‍द ही Twitter पर #MeToo के तहत लपेटने वाली है।
उसका कहना है कि नाले में से उसे निकालने का तूने जो उपक्रम किया था, वह दरअसल तेरी बदनीयती का हिस्‍सा था। तूने 40 साल पहले उसका यौन उत्‍पीड़न किया था। तूने तब उसके पूरे बदन को अपने हाथों से छुआ जबकि वह काम किसी क्रेन को बुलाकर भी कराया जा सकता था।
40 साल पहले के कथित पुण्‍यकार्य को यौन उत्‍पीड़न में कन्वर्ट होते देख एकबार तो मेरी सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो गई, फिर जैसे-तैसे खुद को संभाला और अपने मित्र से पूछा- भाई, पहले तू मुझे उसका नाम तो बता दे। मोदी सरकार से भी अधिक ग्रोथ रेट को प्राप्‍त उस भारी भरकम काया को मैं Twitter पर भी पहचानूंगा कैसे।
मेरी दशा और दिशा का अनुमान लगाकर मित्र कहने लगा- ज्‍यादा बनने की कोशिश मत कर, उसे अपने साथ हुए यौन अपराध का एक-एक पल याद है और तू कहता है कि तुझे उसका नाम तक याद नहीं। बेटा, राष्‍ट्रीय महिला आयोग का Twitter या whatsapp के थ्रू नोटिस मिलेगा तो सब याद आ जाएगा। उसकी सूरत भी और अपनी सीरत भी।
मित्र से यह शॉकिंग समाचार सुनकर मैं सुन्‍न अवस्‍था में वहीं से उलटे पैर लौट आया। अभी घर की लॉबी में प्रवेश किया ही था कि पत्‍नी चहक कर बोली- सुना, वो अपने टीवी वाले संस्‍कारी बाबूजी भी #MeToo के लपेटे में आ गए हैं। किसी महिला लेखक ने 20 साल पहले उन पर बलात्‍कार करने का आरोप लगाया है। ऐसा लगता है कि संस्‍कारी बाबूजी इस झटके को सह नहीं पाए, क्‍योंकि जवाब में बहकी-बहकी सी बातें कर रहे थे। कुछ-कुछ ऐसे बड़बड़ा रहे थे…हुआ होगा बलात्‍कार, लेकिन मैंने नहीं किया। मैं न इंकार कर सकता हूं और न इकरार कर रहा हूं।
मुझे तो इस उम्र में बाबूजी के इस हाल पर दया आ रही है लेकिन उन्‍हें #MeToo में लपेटने वाली लेखिका का कहना है कि 20 साल बाद तक उसे ‘मदहोशी’ में हुआ दुष्‍कर्म जब ‘पूरी तरह याद’ है तो पूरे होशो हवास में उसके साथ दुष्‍कर्म करने वाले बाबूजी कैसे भूल सकते हैं।
संस्‍कारी बाबूजी की कथित करतूत सुनाते-सुनाते पत्‍नी जी ने तुरंत यू टर्न लिया और मेरी ओर मुखातिब होकर कहने लगीं- मुझे तो लगता है कि करीब-करीब 25 साल पहले आपने जो घुटनों पर आकर मुझे प्रपोज किया था, उसमें भी आपकी नीयत ठीक नहीं थी। अगले 24 घंटों में दिमाग पर जोर डालकर सोचती हूं कि प्रपोज करने के पीछे आपकी कौन सी कुत्‍सित चाल थी। उसके बात #MeToo कैंपेन में भाग लेने पर विचार करूंगी।
अब मेरा ध्‍यान पत्‍नी द्वारा चटखारे ले-लेकर सुनाई जा रही टीवी वाले संस्‍कारी बाबूजी की कथा या व्‍यथा पर न होकर अपने मित्र द्वारा सुनाई गई कालातीत दुर-घटना तथा पत्‍नी द्वारा 25 साल पूर्व की घटना को लेकर दी गई ताजा-ताजा धमकी पर केंद्रित हो गया जिसका बम कभी भी मेरे सिर फूट सकता था।
जैसे-तैसे मैंने मंगलवार का मौनव्रत घोषित कर पूरा दिन तो काट लिया किंतु रात में बिस्‍तर पर #MeToo मेरे सामने पूरी भयावहता के साथ आ खड़ा हुआ। मैंने अपने दिमाग पर बहुत जोर डाला और यह सोचने की कोशिश की कि आखिर इंसानियत के नाते किसी सहपाठी को नाले में से निकालना यौन उत्‍पीड़न कैसे हो सकता है, किंतु मेरी अंतरात्‍मा कुछ बताती कि इससे पहले #MeToo बोल पड़ा। कहने लगा- बरखुरदार, नाले में से निकालना यौन उत्‍पीड़न की वजह नहीं बन सकता यह साबित अब तुम्‍हें करना है। तुम्‍हारी सहपाठी तो कह ही रही है कि नाले में से उसे निकालने में तुम्‍हारी नीयत ठीक नहीं थी। यह बात अलग है कि तब वह तुम्‍हारी बदनीयत को नहीं समझ पायी किंतु अब उसे सबकुछ साफ-साफ समझ में आ चुका है। उसके नाती-पोतों ने भी इस बात की पुष्‍टि कर दी है कि वह सही दिशा में जा रही है।
#MeToo के भय का साया सुबह अपने मन से झटकने की कोशिश में नित्‍य की भांति टहलने निकल पड़ा। थोड़ी दूर ही पहुंचा था कि साइकिलिंग कर रहीं पड़ोसी महिला डॉक्‍टर को जर्मन शेफर्ड डॉग से घिरा देखा। किसी सभ्‍य व सुसंस्‍कृत गृहस्‍वामी का वह इल्‍लिट्रेट कुत्ता अपने पूरे जबड़े खोलकर महिला डॉक्‍टर पर भौंक रहा था।
महिला डॉक्‍टर का चूंकि डर के मारे बुरा हाल था लिहाजा वो चिल्‍ला-चिल्‍लाकर मुझसे मदद मांगने लगीं। एकबार को मैं पिछले चौबीस घंटों से आ रहे #MeToo के भयानक स्‍वप्‍नों को भूलकर महिला डॉक्‍टर की मदद के लिए आगे बढ़ने लगा किंतु तभी दिल ने दिमाग से काम लेने को कहा। कहीं अंदर से आवाज आई, बेटा पहले 40 साल पहले कमाए गए पुण्‍य से तो निपट ले जो किसी भी समय #MeToo बोलने वाला है, उसके बाद और पुण्‍य कमा लेना। इस उम्र में यह नया पुण्‍य कमाने का प्रयास कब्र तक पीछा नहीं छोड़ेगा। बच्‍चों से श्राद्ध करवाने की बजाय यदि गंगा में प्रवाहित की गई अस्‍थियों को ‘सम्‍मन’ का सामना कराना है तो पचड़े में पड़, वरना चुपचाप खिसक ले।
दिमाग ने दिल की दहशत को समझा और यह सोचकर किनारा कर लिया कि डॉक्‍टर साहिबा को दो-चार इंजेक्‍शन ही तो लगेंगे, लेकिन मेरे पीछे जो #MeToo लग गया तो समाज इतने इंजेक्‍शन लगाएगा कि सब सुन्न कर देगा। दिल, दिमाग और शरीर सब। न निगलते बनेगा, और न उगलते।
40 साल पहले वाली क्‍लासमेट की तरह कुछ सालों बाद इन डॉक्‍टर साहिबा को भी कहीं याद आ गया कि उन्‍हें जर्मन शेफर्ड से बचाने में मेरी नीयत ठीक नहीं थी तो लेने के देने पड़ जाएंगे। यहां तो गवाह भी मैडम ही हैं और सबूत भी वही हैं।
देश में राष्‍ट्रीय महिला आयोग है, पुरुष आयोग नहीं। पुरुषों के लिए राष्‍ट्रीय तो क्‍या, कोई क्षेत्रीय आयोग भी नहीं है। पुरुषों की सुनवाई के लिए बाबा साहब ने संविधान में कोई व्‍यवस्‍था नहीं की।
क्‍या पुरुषों के लिए किसी #MeToo की कोई संभावना है, या मी लॉर्ड के सामने खड़े होना ही एकमात्र विकल्‍प है।
जो भी हो, फिलहाल तो पूरे देश में #MeToo का जोर है। टीवी, फिल्‍म और मीडिया से जुड़े लोग जितना जल्‍दी हो सके पुराने पुण्‍यों या यूं कहें कि मन, वचन और कर्म से किए गए पापों का लेखा-जोखा अपने लेखाकार से लगवा लें अन्‍यथा #MeToo तो सारे हिसाब लगवा ही लेगा। खुदा हाफिज़। जय हिंद। जय भारत।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

MY Lord, जनसामान्‍य के लिए भी बनवा दीजिए कोई ‘लेन’, उसकी भी सुन लीजिए हुजूर

बीते बुधवार को मद्रास हाई कोर्ट ने NHAI (नेशनल हाइवे अथॉरिटी ऑफ इंडिया) को सख्‍त आदेश देते हुए कहा कि वह अपने सभी टोल प्लाजा पर वीआईपी और मौजूदा जजों के लिए एक अलग से एक्सक्लूसिव लेन बनाए या Contempt of court की कार्यवाही के लिए तैयार रहे।
जस्टिस हुलुवाडी जी रमेश और जस्टिस एमवी मुरलीधरन की डिवीजन बेंच ने कहा, ये वीआईपी और जजों के लिए बहुत शर्म की बात है कि वे टोल प्लाजा पर इंतजार करें और अपने आइडेंटिटी कार्ड दिखाएं। बेंच ने केंद्र सरकार और एनएचएआई से कहा कि वे इस मामले में प्रत्‍येक टोल प्‍लाजा के लिए सर्कुलर जारी करें।
कोर्ट ने यह भी कहा: टोल कलेक्टर की जिम्मेदारी होगी कि वह उस लेन से वीआईपी और जज के अलावा किसी और को गुजरने न दे, और जो भी इस नियम का उल्लंघन करे, टोल कलेक्टर उसके खिलाफ सख्त कार्यवाही करे।
कोर्ट ने कहा, ‘अलग लेन न होने से हर टोल प्लाजा पर सिटिंग जज और वीआईपी लोगों को ‘अनावश्यक शर्मिंदगी’ का सामना करना पड़ता है। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है। टोल प्लाजा पर सिटिंग जज को 10 से 15 मिनट तक इंतजार करना पड़ता है।
MY Lord, आपका आदेश तो सिर माथे, लेकिन उन लोगों का क्‍या जो पूरा पैसा देकर भी हर टोल पर इंतजार करने को मजबूर हैं। हुजूर, क्‍या उनका समय कोई मायने नहीं रखता।
लगे हाथ उनके लिए भी कोई आदेश-निर्देश NHAI को दे दिया होता। वो तो कई बार घंटों-घंटों फंसे रहते हैं।
वहां से जैसे-तैसे निकल भी आएं तो आपकी अदालतें रहम नहीं करतीं क्‍योंकि आम आदमी के लिए वहां भी कोई लेन नहीं है।
कोई वादी अथवा प्रतिवादी, और यहां तक कि वकील साहिब भी यदि टोल प्‍लाजा पर अटक जाने के कारण अदालत में समय से उपस्‍थित नहीं होते तो उन्‍हें ‘अदम मौजूदगी’ या ‘अदम पैरवी’ का कितना बड़ा खामियाजा भुगतना पड़ जाता है, इसे कौन नहीं जानता जबकि आपकी देरी पर कहां कौन सवाल खड़ा कर सकता है।
आप अदालत में बैठें या न बैठें, मालिक का मालिक कौन।
Your Honor, आपने अपने इस आदेश में अपने साथ-साथ ‘वीआईपी’ का जिक्र क्‍यों किया यह तो आप जानें, अलबत्ता आम आदमी यह जरूर जानता है कि वीआईपी किसी टोल पर कहां रुकते हैं। वो तो यूं भी लाल-नीली बत्तियों वाली गाड़ियों के बीच बिना टोल दिए ‘हूटर’ बजाते तेजी के साथ निकल लेते हैं। उनके काफिले को किसी टोल पर कोई रोकने या टोकने की हिमाकत कर बैठे तो वहीं के वहीं फैसला करके जाते हैं वो। न तहरीर, न तारीख…सीधे फैसला।
क्‍या आप इस कड़वे सच से वाकई परिचित नहीं हैं MY Lord, अथवा आपने सहारे के लिए वीआईपी को जोड़ दिया अपने आदेश में।
एक विधायिका है MY Lord जो अपने वेतन-भत्ते खुद तय कर लेती है और उसमें कहीं कोई पक्ष-विपक्ष आड़े नहीं आता क्‍योंकि तब सवाल समूची नेता बिरादरी के ‘लाभ’ का होता है। दूसरी न्‍यायपालिका है जो आज तक तो अपनी नियुक्‍ति ही खुद करती रही है लेकिन अब वह अपने लिए ‘टोल नाकों’ पर अलग से लेन बनाने का आदेश भी दे रही है।
लोकतंत्र के तीन प्रमुख स्‍तंभों में से शेष रह जाती है कार्यपालिका, तो उसे टोल नाकों पर किसी के आदेश-निर्देशों की दरकार नहीं है। टोल वालों का उनसे और उनका टोल वालों से रोज वास्‍ता पड़ता है। वो उनकी अहमियत बिना आदेश-निर्देश के समझते हैं इसलिए दूर से ही उनके लिए बैरियर खड़ा कर देते हैं। एक सिपाही भी टोल कर्मियों के लिए कितना विशिष्‍ट है, इसे किसी भी टोल पर देखा जा सकता है।
वैसे लोकतंत्र का एक ‘तथाकथित’ चौथा स्‍तंभ भी है जिसे इस दौर में ‘मीडिया’ कहा जाने लगा है, लेकिन उसकी यहां चर्चा करने का कोई अर्थ नहीं क्‍योंकि उसकी अब कोई अहमियत नहीं रह गई।
टोल प्‍लाजा पर तो मीडियाकर्मियों को कोई दो कौड़ी का नहीं पूछता क्‍योंकि उसे अपने लिए आदेश-निर्देश देने का हक प्राप्‍त नहीं है।
और हां हुजूर, वीआईपी से याद आया कि वीआईपी तो हर जगह वीआईपी ही होते हैं। उनके लिए देश की सर्वोच्‍च अदालत भी आधी रात को खुल जाती है और सुबह होते-होते फैसला सुना देती है किंतु आम आदमी अपनी जिंदगी का आधा हिस्‍सा जाया करके भी फैसला सुनने को तरसता रहता है।
जब यमराज सामने खड़े होते हैं तब उसे याद आता है कि उसने अपने हिस्‍से की काफी उम्र तरह-तरह के टोल नाकों पर लाइन में लगकर गुजार दी।
अब देखिए हुजूर, दो दिन पहले की ही बात है। भीमा-कोरेगांव हिंसा मामले में देश के तथाकथित पांच बुद्धिजीवियों को पुलिस ने क्‍या पकड़ा, कोहराम मच गया। सड़क से लेकर संसद तक और मानवाधिकार आयोग से लेकर अदालत तक सब खड़े हो गए।
अगली सुबह तो आदेश हो गया कि जिन्‍हें पकड़ा है, उन्‍हें उनके घर पर नजरबंद रखें। पुलिस कस्‍टडी में उन्‍हें नहीं रखा जा सकता, तकलीफ होती है। बाकी 06 सितंबर को देखेंगे कि करना क्‍या है।
MY Lord, आम आदमी की मंशा आपके आदेश-निर्देश पर सवालिया निशान लगाने की नहीं है। वह तो सिर्फ इतना जानना चाहता है कि जनसामान्‍य के लिए अदालतें इसी प्रकार सक्रिय क्‍यों नहीं होतीं। क्‍यों उनके प्रति कोई संवेदनशील नहीं होता। मानवाधिकार आयोग उनकी गिरफ्तारी पर संज्ञान क्‍यों नहीं लेता। कोई बुद्धिजीवी गैंग उसकी खातिर सड़क पर उतरकर क्‍यों हंगामा नहीं काटता।
वो पुलिस के डंडे खाता है, अधिकारियों के यहां दुत्‍कारा जाता है, न्‍यायालयों में फटकारा जाता है लेकिन तब कोई नहीं कहता कि लोकतंत्र खतरे में है, या यह कैसा लोकतंत्र है।
हां, अगर एक आतंकवादी पूरी प्रक्रिया के बाद फांसी पर चढ़ाया जाता है अथवा किसी राज्‍य सरकार के गठन में गतिरोध उत्‍पन्‍न होता है और यहां तक कि सवा सौ करोड़ की आबादी में से पांच खास लोग गिरफ्तार कर लिए जाते हैं तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है। आपातकाल से भी बदतर हालात बताए जाते हैं।
तब तमाम लिस्‍टेड मुकद्दमों को दरकिनार कर उनकी गिरफ्तारी पर सुनवाई होती है और उसी दिन राहत भी दे दी जाती है, ऐसा क्‍यों है हुजूर।
दूसरी ओर जनसामान्‍य के लिए टोल प्‍लाजा का बैरियर और Court का Hammer दोनों बराबर हैं। दोनों उसका रास्‍ता तय करते हैं। दोनों के उठे बिना, उसका निकल पाना मुश्‍किल ही नहीं, नामुमकिन है। लेकिन फिर भी वह लगा है ‘कॉमन लेन’ में, भीड़ के बीच इस उम्‍मीद के साथ कि कभी तो वह भी निकल पाएगा।
हुजूर, नहीं पता कि मॉब लिंचिंग गायों के कारण हो रही है या सांप्रदायिकता के कारण। असहिष्‍णुता इसके पीछे की वजह है अथवा राजनीतिक विद्वेष। लेकिन एक बात पता है, और वह यह कि मॉब लिंचिंग करने वालों में किसी न किसी स्‍तर पर अपने अंदर विशिष्‍टता का भाव अवश्‍य भरा होता है। वह कानून हाथ में लेने की हिमाकत ही तब कर पाते हैं जब वह यह समझने लगते हैं कि पुलिस भी वहीं हैं और अदालत भी वही।
इसलिए हुजूर ये विशिष्‍टता का भाव बहुत खतरनाक है। इसी भाव ने स्‍वतंत्रता के सात दशक बीत जाने के बाद भी ‘लोक’ से ‘तंत्र’ को काट रखा है। अगर यह ‘तंत्र’ ही ‘लोक’ के लिए नहीं है तो कैसा लोकतंत्र। यह तो राजतंत्र हुआ न हुजूर। वही राजे-रजवाड़ों वाला या शासक और शोषित वाला।
बा-अदब…बा-मुलाहिजा…होशियार! महाराज की सवारी पधार रही है।
आखिर में हुजूर याद दिलाना चाहूंगा सर्वोच्‍च न्‍यायालय की ताजा टिप्‍पणी जिसमें कहा गया है कि असहमति जताना लोकतंत्र के लिए ‘सेफ़्टी वॉल्व’ है। अगर आप इस सेफ़्टी वॉल्व को नहीं रहने देंगे तो प्रेशर कुकर फट जाएग।.’
यकीन मानिए MY Lord, आम आदमी भी विशिष्‍ट लोगों द्वारा विशिष्‍ट लोगों के लिए दिए जाने वाले आदेश-निर्देशों से पूरी तरह असहमत है। उसका सेफ़्टी वॉल्व काफी हद तक चोक हो चुका है। यदि वह फट गया तो सच में लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। लोकतंत्र को बचा लीजिए हुजूर। ये विशिष्‍टता का भाव त्‍याग दीजिए। आम बने रहिए ताकि जनता आपको खास समझती रहे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

1984 बनाम 2002: तेरा दंगा मेरे दंगे से सफेद कैसे

आज बीबीसी की वेब साइट पर ‘वरिष्‍ठ पत्रकार’ उर्मिलेश जी का लेख पढ़ा। इस लेख के तहत उन्‍होंने बड़ी सफाई से इंदिरा गांधी की हत्‍या के बाद 1984 में हुए सिखों के कत्‍लेआम की तुलना उसी प्रकार 2002 के गुजरात दंगों से की है जिस प्रकार कांग्रेस के प्रवक्‍ता टीवी चैनल्‍स की डिबेट में करते रहे हैं।
‘नज़रिया’ नाम से प्रकाशित बीबीसी के इस कॉलम में उर्मिलेश जी ने कांग्रेस अध्‍यक्ष राहुल गांधी के कथन पर भारतीय न्‍यूज़ चैनल्‍स के रवैये को सरकारी चमचागीरी बताया है और विदेशी मीडिया की इस बात के लिए तारीफ की है कि उसने राहुल की बातों में वैचारिक ताज़गी देखी।
उर्मिलेश जी ने आगे लिखा है-
शुक्रवार की रात लंदन में वहां के सांसदों और अन्य गणमान्य लोगों की एक संगोष्ठी में राहुल गांधी ने जिस तरह सन् 1984 के सिख विरोधी “दंगे या कत्लेआम” पर टिप्पणी की, उससे उन पर गंभीर सवाल भी उठे हैं. राहुल ने माना कि सन् 1984 एक भीषण त्रासदी थी. अनेक निर्दोष लोगों की जानें गईं. इसके बावजूद उन्होंने अपनी पार्टी का जमकर बचाव किया.
उर्मिलेश जी ने इसी के साथ यह सवाल भी उछाला है-
इस बात पर कौन यक़ीन करेगा कि सन् 84 के दंगे में कांग्रेस या उसके स्थानीय नेताओं की कोई संलिप्तता नहीं थी ?
सवाल के जवाब में भी उर्मिलेश जी ने एक और सवाल किया है- 
ये तो कुछ वैसा ही है जैसे कोई भाजपाई कहे कि गुजरात के दंगे में भाजपाइयों का कोई हाथ ही नहीं था. ऐसे दावों और दलीलों को लोग गंभीरता से नहीं लेते. आख़िर ये दंगे क्या हवा, पानी, पेड़-पौधे या बादलों ने कराए थे?
उर्मिलेश जी अपने ही दोनों सवालों के जवाब में लिखते हैं- हां, ये बात सच है कि उस सिख-विरोधी दंगे में सिर्फ़ कांग्रेसी ही नहीं, स्थानीय स्तर के कथित हिंदुत्ववादी और तरह-तरह के असामाजिक तत्व भी शामिल हो गए थे.
ग़रीब तबके के लंपट युवाओं को दंगे में लूट-पाट के लिए गोलबंद किया गया. मुझे लगता है इसके लिए किसी को ज़्यादा कोशिश भी नहीं करनी पड़ी होगी. संकेत मिलते ही बहुत सारे लंपट तत्व लूटमार के लिए तैयार हो गए.
राहुल गांधी के ‘कथन या कथानक’ पर भारतीय मीडिया के रवैये को ‘सरकारी’ घोषित करने वाले उर्मिलेश जी कत्‍लेआम कराने वाले उन कांग्रेसियों और कथित हिंदुत्‍ववादियों का नाम अपने लेख में लिखना भूल गए जबकि खुद उनके शब्‍दों में-
“सन् 1984 के उस भयानक दौर में मैं दिल्ली में रहता था. हमने अपनी आंखों से न केवल सब-कुछ देखा बल्कि उस पर लिखा भी. उस वक्त मैं किसी अख़बार से जुड़ा नहीं था. लेकिन पत्रकारिता शुरू कर चुका था.
उस वक्त मैं दिल्ली के विकासपुरी मोहल्ले के ए-ब्लाक में किराए के वन-रूम सेट में रहता था.
ये बात तो साफ़ है कि वह भीड़ यूं ही नहीं आ गई थी. उसके पीछे किसी न किसी की योजना ज़रूर रही होगी. वह भीड़ ‘ख़ून का बदला ख़ून से लेंगे’ के नारे लगा रही थी. ये नारे कहां से आए? इस बीच जो भी तांडव होता रहा, उसे रोकने के लिए पुलिस या अर्धसैनिक बल के जवान भी नहीं दिखे.
मेरे कमरे में बैठी सरदार जी की पत्नी की आंखों से टप-टप आंसू गिरते रहे. हम कुछ नहीं कर सकते थे. ठीक वैसे ही जैसे गुजरात के कुख्यात दंगों में असंख्य परिजन या पड़ोस के लोग अपने जाने-पहचाने लोगों का मारा जाना या उनकी संपत्तियों का विध्वंस होता देखते रह गए.
उर्मिलेश ने लिखा है, राहुल गांधी ने जब लंदन में कहा कि सन 84 के दंगों में कांग्रेस की कोई भूमिका नहीं थी तो मुझे गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के वे बयान याद आने लगे जिनमें वह अक्सर कहा करते थे कि दंगों में उनकी सरकार या पार्टी की कोई भूमिका नहीं है.
मैं यहां उर्मिलेश जी से यह पूछना चाहूंगा कि किन्‍हीं भी परिस्‍थितियों में किसी एक दंगे (1984) की तुलना किसी दूसरे ऐसे दंगे (2002) से कैसे की जा सकती है, जो उस समय हुआ ही नहीं था। सिखों के कत्‍लेआम और गुजरात दंगों के बीच पूरे 18 साल का फासला रहा है। इन 18 सालों में कांंग्रेस ने क्‍या किया। क्‍या 18 साल कांग्रेस ने किसी मौके की ताक में गुजार दिए।
यदि एकबार को यह मान भी लिया जाए कि 84 के कत्‍लेआम और 2002 के दंगों की पृष्‍ठभूमि में कोई आंशिक समानता रही भी तो उर्मिलेश जी यह लिखने का साहस क्‍यों नहीं कर पाये कि कांग्रेस को बचाने के लिए अब राहुल गांधी 2002 के गुजरात दंगों का सहारा ले रहे हैं।
उर्मिलेश जी, क्‍या यह बता पायेंगे कि दुनिया की किसी भी अदालत में कोई अपराधी यह कहकर बच सकता है कि बहुत सारे लोगों ने उसके जैसा अपराध किया है इसलिए उसने कर दिया तो क्‍या गलत कर दिया।
राहुल के कथन पर भारतीय मीडिया के नज़रिए को सरकारी खुशामद बताने वाले उर्मिलेश क्‍या यह स्‍पष्‍ट करेंगे कि वह बड़ी चालाकी के साथ राहुल गांधी और कांग्रेस के साथ खड़े होने की कोशिश क्‍यों कर रहे हैं।
राहुल गांधी यदि कांग्रेस की विरासत के हकदार हैं तो वह अतीत में किए गए कांग्रेस के पापों से किनारा कैसे कर सकते हैं। कांग्रेस किसी व्‍यक्‍ति विशेष का नाम नहीं है, कांग्रेस एक राजनीतिक संगठन है और उसी राजनीतिक संगठन के लोगों ने अपनी नेता इंदिरा गांधी की हत्‍या के प्रतिशोध में खुलेआम सिखों का कत्‍लेआम किया और करवाया। आज उसी कांग्रेस का उत्तराधिकार राहुल गांधी के पास है। फिर कांग्रेस और राहुल गांधी भी निर्दोष कैसे हुए।
रही बात 84 के सिख दंगों के लिए मनमोहन सिंह द्वारा माफी मांगे जाने की अथवा गुजरात दंगों के लिए मोदी द्वारा माफी न मांगे जाने की, तो हजारों निर्दोष लोगों के कत्‍ल का अपराध किसी माफीनामे के खेल से खत्‍म नहीं हो जाता।
गुजरात दंगों के लिए जिम्‍मेदार गोधरा के नरसंहार में भी और उसके बाद हुए दंगों पर भी कोर्ट ने फैसला सुनाया है लेकिन सिख समुदाय आज भी न्‍याय के लिए दर-दर भटक रहा है जबकि इस बीच माफी मांगने वाले सरदार मनमोहन सिंह पूरे दस साल देश के प्रधानमंत्री रहे।
84 और सन् 2002 के दंगों में अद्भुत साम्य देखने वाले उर्मिलेश अचानक राहुल गांधी के इस व्‍यवहार को बाबरी ध्‍वंस के बाद उपजे भाजपा नेताओं के व्‍यवहार से जोड़ने लगते हैं।
वो लिखते हैं- कहीं ऐसा तो नहीं कि राहुल गांधी, भाजपा नेताओं की तरह अपनी पार्टी की हर ग़लती और हर गुनाह पर पर्दा डालने की भौंडी शैली अख्तियार कर रहे हैं.
उर्मिलेश यह तो लिखते हैं कि दोनों पार्टियां दंगे के लिए दोषी ठहराए जाने पर अक्सर एक-दूसरे को कोसती हैं. गुजरात का मामला उठाए जाने पर भाजपा द्वारा सिख विरोधी दंगे का सवाल उठाकर कांग्रेस का मुंह बंद करने की कोशिश की जाती है.
लेकिन उर्मिलेश यह नहीं लिखते कि 1984 में हुए सिखों के कत्‍लेआम को उसके 18 साल बाद हुए गुजरात दंगों से कैसे तोला जा सकता है।
वह छद्म निरपेक्षता की आड़ लेकर दादरी के अख़लाक का और मॉब लिचिंग का जिक्र करना नहीं भूले परंतु केरल और पश्‍चिम बंगाल में हुई बेरहम हत्‍याओं का जिक्र करना जरूरी नहीं समझा।
दरअसल, कोई भी टीवी डिबेट देख लीजिए। हर डिबेट में बेशर्मों का ऐसा पैनल बैठा मिलेगा जो एक अपराध की तुलना दूसरे अपराध से करके अपनी पार्टी अथवा अपनी विचारधारा वाले नेताओं के कुकर्मों को जायज ठहरा रहा होगा।
रटे-रटाए चेहरों वाले पैनल में शामिल लोग मूल मुद्दे से ध्‍यान भटकाने के लिए बहस को किसी भी तरफ मोड़ने में उसी प्रकार माहिर होते हैं जिस प्रकार कोई पेशेवर शातिर अपराधी माहिर होता है।
उर्मिलेश जी, यहां सवाल यह नहीं है कि राहुल गांधी कितने ज्ञानी हैं या विदेशी मीडिया ने उनके विचारों की ताज़गी को समझा, सवाल सिर्फ इतना सा है कि क्‍या किसी अपराध या अपराधी का अनुसरण करके अपने अपराध को जायज ठहराया जा सकता है।
भारतीय मीडिया अगर खुशामद करने में लगा है तो आप क्‍या कर रहे हैं। आप भी तो वही कर रहे हैं। सरकार को न सही, किसी को खुश करने का प्रयास तो आपके द्वारा भी किया जा रहा है।
आपने खुद लिखा है कि 84 का कत्‍लेआम आपके सामने हुआ, और इसीलिए आप यह चिन्‍हित कर पाए कि सिखों का कत्‍लेआम करने वाले भेड़ियों में कांग्रेसियों के साथ-साथ कथित हिंदुत्‍ववादी तथा असामाजिक तत्‍व भी शामिल थे।
तो प्‍लीज, एक जिम्‍मेदार पत्रकार न सही किंतु एक जिम्‍मेदार नागरिक होने के नाते अदालत के सामने पेश होकर बताइए कि सिखों का कत्‍लेआम आपकी आंखों के सामने हुआ और आप विक्‍टिम न होते हुए न्‍याय के लिए उनका नाम बताना चाहते हैं।
आप बताइए कि कांग्रेसियों के साथ कौन-कौन हिंदुत्‍ववादी और असामाजिक तत्‍व सिखों का कत्‍लेआम करने में शामिल थे।
सिखों के कत्‍लेआम पर राजीव गांधी ने क्‍या कहा, गुजरात दंगों के बाद मोदी जी क्‍या बोले, अटल बिहारी वाजपेयी ने मोदी जी से क्‍या कहा और राहुल गांधी अब किसके नक्‍शे कदम पर चल रहे हैं, इन राजनीतिक पचड़ों में पड़ने की बजाय आप तो अपना धर्म निभा दीजिए। यकीन मानिए 34 वर्षों से न्‍याय की आस में टकटकी लगाकर देख रही आंखों के लिए आप किसी दीपक से कम साबित नहीं होंगे।
तुलना करने का काम भारतीय मीडिया और राजनीतिक प्रवक्‍ताओं पर छोड़ दीजिए और राहुल गांधी के ज्ञान को परिभाषित करने का जिम्‍मा विदेशी मीडिया पर जाने दीजिए। आप अपना काम ही कर लीजिए। यकीन मानिए, बहुत सुकून मिलेगा।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बिना विद्योत्तमा के कोई “कालिदास” कभी “महाकवि” बना है क्‍या, फिर आप कैसे ?

ऐसी तमाम औरतें मिल जाएंगी जिनकी तरक्‍की में किसी भी पुरुष का हाथ नहीं रहा, किंतु कोई पुरुष शायद ही ऐसा मिले जिसने औरत के सहयोग बिना तरक्‍की हासिल की हो। शायद इसीलिए कहा जाता है कि हर पुरुष की तरक्‍की में किसी न किसी महिला का अपरोक्ष या परोक्ष हाथ जरूर होता है।
दुनियाभर को छोड़कर यदि सिर्फ भारतीय महिलाओं की बात करें तो माया, ममता, जया (जयललिता) जैसी देवियां इसकी उदाहरण हैं। पुरुषों में अटल बिहारी वाजपेयी (अब स्‍वर्गीय) का नाम अपवाद स्‍वरूप लिया जा सकता है। हालांंकि उनके खुद के शब्‍दों में वो अविवाहित जरूर थे किंतु कुंवारे नहीं। इसका सीधा-सीधा अर्थ यही निकलता है कि उनकी जिंदगी में भी कोई न कोई औरत रही जरूर थी। मोदी जी ने अपने पिछले नामांकन पत्र से स्‍पष्‍ट कर ही दिया था कि वह विवाहित हैं।
कहने का तात्‍पर्य यह है कि आदिकाल से किसी महिला को कभी कालिदास की आवश्‍यकता महसूस नहीं हुई परंतु हर युग में कालिदासों को विद्योत्तमा की सख्‍त जरूरत रही है। एक भी उदाहरण ऐसा देखने या सुनने में नहीं मिलता कि कोई कालिदास किसी विद्योत्तमा के हड़काए बिना ‘महाकवि कालिदास’ बना हो।
यह अलग बात है कि कोई कालिदास विवाहित जीवन के प्रथम चरण में विद्योत्तमा से ज्ञान प्राप्‍त कर बुद्धिमानों की जमात का हिस्‍सा बन जाता है और किसी-किसी के ज्ञान चक्षु अंतिम चरण में जाकर खुलते हैं। जैसे हमारे मोदी जी ने प्रथम चरण में ज्ञान प्राप्‍त कर लिया लिहाजा आज कितनों के कलेजे पर मूंग दल रहे हैं।
खैर, मुझे तो चिंता हो रही है अपने राहुल ‘बाबा’ की। मेरी समझ में नहीं आ रहा कि आधी सदी बीत गई जीवन की, लेकिन उनके नाम से चिपका हुआ ”बाबा” उनका पीछा नहीं छोड़ रहा।
अभी पिछले दिनों संसद में उन्‍होंने सार्वजनिक रूप से स्‍वीकार किया कि लोग उन्‍हें प्‍यार से ”पप्‍पू” भी कहते हैं। अब ”पप्‍पू” का शाब्‍दिक अर्थ क्‍या है, इसकी जानकारी या तो कहने वालों को होगी या सुनने वालों को। राहुल बाबा भी इस नाम में छिपे रहस्‍य से अवश्‍य वाकिफ होंगे अन्‍यथा इतने गर्व के साथ एक्‍सेप्‍ट नहीं करते। इतने गर्व से तो वह खुद को हिंदू तक नहीं कहते, फिर पप्‍पू क्‍यों कहने लगे। जाहिर है कि वह हिंदू और पप्‍पू दोनों का गूढ़ार्थ समझते हैं। हिंदू होना भी वह यदा-कदा इसी तरह स्‍वीकार कर लेते हैं जैसे पप्‍पू होना।
कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि हमारे राहुल बाबा की जिंदगी में अब तक कोई महिला नहीं आई है। दस्‍तावेज तो यही बताते हैं, वैसे राहुल बाबा अपने लिए किसी विद्योत्तमा की तलाश करने को कब के अधिकृत हो चुके हैं। राहुल बाबा की जिंदगी में किसी महिला की कमी अक्‍सर तब खटकती है जब वो सार्वजनिक भाषण देते हैं।
अब देखिए…जर्मनी के हैम्बर्ग में वह कह बैठे कि भारत में मॉब लिंचिंग होने की वजह नोटबंदी, GST तथा बेरोजगारी है, और अंतर्राष्‍ट्रीय स्‍तर पर आईएसआईएस जैसे कुख्‍यात आतंकवादी गिरोह का उदय भी बेरोजगारी के कारण हुआ था।
लोगों का दावा है कि यदि राहुल बाबा के जीवन में लिखा-पढ़ी के तहत कोई विद्योत्तमा होती तो वो ऐसा कतई नहीं बोलते।
उन्‍होंने इस दौरान पुरुषों को भी यह कहकर अच्‍छा-खासा लैक्‍चर पिलाया कि भारतीय पुरुष महिलाओं को लेकर समानता व सम्‍मान का भाव नहीं रखते। पता नहीं राहुल बाबा को यह ज्ञान कहां से प्राप्‍त हुआ।
जहां तक उनकी परवरिश का सवाल है तो उनके यहां महिलाओं को बराबर से ऊपर का दर्जा भी मिला और सम्‍मान भी भरपूर प्राप्‍त हुआ। उनकी दादी इसका प्रमाण हैं। फिर मम्‍मी सोनिया जी सामने हैं। यह बात अलग है कि बहन प्रियंका को वो सम्‍मान अब तक नहीं मिला जिसकी वो हकदार बताई जाती हैं। पता नहीं राहुल बाबा, मम्‍मी जी से बहन प्रियंका के बारे में कब बात करेंगे।
देश के अधिकांश जिम्‍मेदार नागरिकों को ऐसा महसूस होता है कि राहुल बाबा को एक अदद विद्योत्तमा की अत्‍यंत आवश्‍यकता है और यह आवश्‍यकता उन्‍हें 2019 के चुनाव का बिगुल बजने से पहले पूरी कर लेनी चाहिए।
कालिदास के जीवन में जो कुछ घटा, वह बताता है कि बुद्धि की कमी उनमें कभी नहीं रही होगी। होती तो वह किसी भी सूरत में कालिदास से महाकवि कालिदास नहीं बन सकते थे। बुद्धि उनमें भरपूर थी परंतु उसका उदय तब हुआ जब विद्योत्तमा ने उनके जीवन में पदार्पण किया।
गुजरे जमाने में जगद्गुरू शंकराचार्य को भी ऐसी मुसीबत झेलनी पड़ी थी। गए थे मंडन मिश्र नामक विद्वान से शास्त्रार्थ करने, उन्‍हें आसानी से हरा भी दिया लेकिन उनकी पत्‍नी गले पड़ गईं। कहने लगीं कि मैं इनकी आर्धांगनी हूं इसलिए मुझे हराए बिना इनकी हार मुकम्‍मल नहीं मानी जा सकती। बेचारे शंकराचार्य थे अविवाहित। गृहस्‍थाश्रम के ज्ञान से शून्‍य। चुनौती मिली तो लौटना पड़ा उल्‍टे पांव। बाद में किसी जतन से गृहस्‍थाश्रम में प्रवेश किया और मंडन मिश्र की पत्‍नी के सवालों का जवाब खोज पाए। कहने का मतलब यह है कि शंकराचार्य जैसे धर्मधुरंधर को भी मंडन मिश्र की विद्योत्तमा ने दौड़ा लिया।
यूं भी देखा जाए तो किसी भी भाषण का स्‍क्रिप्‍ट राइटर घर का होने के कई फायदे हैं। बात दबी रहती है। पता नहीं चलता कि घर-घर में कालिदास बैठे हैं। हिंदुस्‍तान तो कालिदासों से भरा पड़ा है। बात घर की चारदीवारी से निकली नहीं कि पोल खुल जाती है। फिर जर्मनी तो बहुत दूर है। स्‍क्रिप्‍ट राइटर कहां-कहां साथ जा सकता है। सामने से कब कौन सवाल उछाल दे।
आपको पता होगा कि जर्मनी जैसे ही एक हिंदुस्‍तानी कार्यक्रम में राहुल बाबा पर किसी लड़की ने एनसीसी के बावत सवाल दे मारा। बेचारे बमुश्‍किल यह कहकर पीछा छुड़ा पाए कि मुझे एनसीसी का कोई ज्ञान नहीं है।
राहुल बाबा को समझना चाहिए कि हर जगह पीछा छुड़ाना आसान नहीं होता क्‍योंकि हर जगह एनसीसी से जुड़े सवाल नहीं पूछे जाते।
भारत वापसी पर कोई यह भी पूछ सकता है कि अपने निष्‍कर्ष से आप देश में आईएसआईएस को न्‍योता दे रहे हैं या ये बता रहे हैं कि बेरोजगारी के चलते भारत में आईएसआईएस के लिए बहुत स्‍कोप है।
जो भी हो राहुल बाबा, 2019 का चुनाव सामने हैं। आपके पास तो वैसे ही मणिशंकर जैसी मणि, दिग्‍विजय जैसे दिग्‍गज और संजय निरुपम जैसे निराले व्‍यक्‍तित्‍वों की भरमार है। बेहतर होगा कि आप उनसे खुद को अलग बनाए रखें।
ऐसा न हो सके तो एक अदद विद्योत्तमा समय रहते तलाश लें वरना लेने के देने पड़ जाएंगे। चुनाव बेशक कुंभ का मेला न सही, लेकिन चुनाव तो है। पांच साल बाद मौका मिलता है। और हां, बोल चाहे जहां लें। दुनिया के किसी कोने में भाषण दे आएं परंतु आपके लिए चुनाव भारत में होने हैं।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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