रविवार, 21 जुलाई 2019

न्‍यायमूर्ति रंगनाथ पांडेय ने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में व्‍याप्‍त परिवारवाद, वंशवाद एवं जातिवाद पर उठाए गंभीर सवाल, पीएम को लिखा 3 पन्‍नों का पत्र

उच्‍च न्‍यायालय इलाहाबाद की लखनऊ खंडपीठ के न्‍यायमूर्ति रंगनाथ पांडेय ने प्रधानमंत्री को बाकायदा पत्र लिखकर उच्‍च न्‍यायालय और सर्वोच्‍च न्‍यायालय में व्‍याप्‍त विसंगतियों तथा कॉलेजियम समिति की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
कल 01 जुलाई 2019 को ही प्रेषित अपने पत्र में न्‍यायमूर्ति रंगनाथ पांडेय ने उच्‍च न्‍यायालय और सर्वोच्‍च न्‍यायालय को भी राजनीति की ही भांति जातिवाद एवं वंशवाद से बुरी तरह ग्रसित बताते हुए लिखा है कि यहां न्‍यायाधीशों के परिवार का सदस्‍य होना ही अगला न्‍यायाधीश होना सुनिश्‍चित करता है।
न्‍यायमूर्ति रंगनाथ पांडेय ने प्रधानमंत्री को लिखा है कि प्रत्‍येक प्रशासनिक अधिकारी को सेवा में आने के लिए प्रतियोगी परीक्षाओं की कसौटी पर खरा उतरना होता है और अधीनस्‍थ न्‍यायालयों के न्‍यायाधीशों को भी अपने चयन से पहले प्रतियोगी परीक्षाओं में योग्‍यता सिद्ध करनी होती है किंतु उच्‍च न्‍यायालयों एवं सर्वोच्‍च न्‍यायालय में नियुक्‍ति के लिए कोई निश्‍चित मापदंड नहीं है। यहां नियुक्‍ति पाने की एकमात्र प्रचलित कसौटी है परिवारवाद तथा जातिवाद।
न्‍यायमूर्ति रंगनाथ पांडेय ने अपने पत्र से प्रधानमंत्री को अवगत कराया है कि उन्‍होंने 34 वर्षों के सेवाकाल में कई ऐसे न्‍यायाधीश देखें हैं जिनके पास सामान्‍य विधिक ज्ञान का भी अभाव था और उनका अपने क्षेत्र में कोई अध्‍ययन तक नहीं था।
जस्‍टिस रंगनाथ पांडेय ने पीएम को लिखा है कि जिन्‍हें न्‍यायप्रक्रिया की सामान्‍य सी जानकारी भी नहीं होती परंतु वो यदि कॉलेजियम समिति के ‘निकट’ होते हैं तो उन्‍हें उनकी ‘मात्र इसी योग्‍यता’ के आधार पर न्‍यायाधीश नियुक्‍त करा दिया जाता है।
जस्‍टिस रंगनाथ ने पत्र में गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि न्‍यायाधीश की कुर्सी पर अयोग्‍य लोगों के रहते कार्य का निष्‍पादन निष्‍पक्ष तरीके से कैसे होता होगा, यह स्‍वयं में विचारणीय है।
न्‍यायमूर्ति रंगनाथ पांडेय ने देश को हिला देने वाली जानकारी देते हुए प्रधानमंत्री को लिखा है कि उच्‍च न्‍यायालय और सर्वोच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायाधीशों की चयन प्रक्रिया बंद कमरों में चाय की दावत पर वरिष्‍ठ न्‍यायाधीशों की पैरवी तथा पसंद के आधार पर की जाती है, न कि किसी योग्‍यता के आधार पर। यहां गोपनीयता की आड़ में पारदर्शिता को ताक पर रख दिया जाता है और नियुक्‍ति प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही नाम सार्वजनिक किए जाते हैं।
न्‍यायमूर्ति रंगनाथ पांडेय ने लिखा है कि न्‍यायिक चयन आयोग की स्‍थापना के प्रस्‍ताव से पूरे देश को न्‍यायपालिकाओं में पारदर्शिता के साथ नियुक्‍तियों की आशा जगी थी किंतु सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने इसे अपने अधिकार क्षेत्र में हस्‍तक्षेप बताकर असंवैधानिक घोषित कर दिया।
दरअसल, न्‍यायिक चयन आयोग की स्‍थापना से न्‍यायाधीशों को अपने पारिवारिक सदस्‍यों की नियुक्‍ति में बाधा आती और इसीलिए उन्‍होंने केंद्र सरकार के इस प्रस्‍ताव को खारिज करने में अति सक्रियता बरती।
जस्‍टिस रंगनाथ पांडेय ने पीएम को लिखा है कि चाहे सर्वोच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायाधीशों का विवाद मीडिया के सामने आने का प्रकरण हो अथवा हितों के टकराव का मुद्दा और सुनने के बजाय चुनने के अधिकार का विवाद, इस सबसे अंतत: न्‍यायपालिका की गुणवत्ता अथवा अक्षुण्‍णता लगातार संकट में पड़ रही है।
जस्‍टिस रंगनाथ पांडेय ने प्रधानमंत्री से अनुरोध किया है कि न्‍यायसंगत लेकिन कठोर निर्णय लेकर वह न्‍यायपालिका की गरिमा बचाने का प्रयास करें जिससे भविष्‍य में साधारण पृष्‍ठभूमि से आया हुआ कोई व्‍यक्‍ति भी अपनी योग्‍यता, परिश्रम एवं निष्‍ठा के बल पर भारत का चीफ जस्‍टिस बन सके।
न्‍यायमूर्ति रंगनाथ पांडेय द्वारा प्रधानमंत्री को लिखा गया यह पत्र यूं तो हर उस व्‍यक्‍ति की पीड़ा को प्रकट करता है जो सिस्‍टम के सामने किसी न किसी स्‍तर पर आकर हार जाता है परंतु इसके निहितार्थ बहुत गहरे हैं।
जस्‍टिस रंगनाथ पांडेय तो इसी 04 जुलाई को रिटायर होने जा रहे हैं परंतु उनके सवाल देश की चरमराती न्‍याय व्‍यवस्‍था का तब तक पीछा करेंगे जब तक योग्‍यता के आधार पर नियुक्‍तियों का मुकम्‍मल इंतजाम नहीं कर लिया जाता।
कौन नहीं जानता कि आज सर्वोच्‍च न्‍यायालय से लेकर उच्‍च न्‍यायालयों और जिला अदालतों में भी भ्रष्‍टाचार का बोलबाला है। न्‍यायपालिकाओं की चौखट पर न्‍याय की उम्‍मीद खत्‍म हो जाने के अनेक उदाहरण सामने आ रहे हैं।
शायद यही कारण है कि कोर्ट की अवमानना का भय समाप्‍त होता जा रहा है और सर्वोच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायाधीशों को भी अपनी बात रखने के लिए मीडिया का सहारा लेना पड़ रहा है।
न्‍यायपालिका तक पहुंचने से पहले मीडिया ट्रायल की परंपरा संभवत: न्‍याय से उठ चुकी उम्‍मीद का ही परिणाम है और मुख्‍य न्‍यायाधीश द्वारा न्यायपालिका में शीर्ष स्तर पर करप्शन को रोकने के लिए भ्रष्‍ट अधिकारियों को निकाल बाहर करने का पीएम से आग्रह करना इसी की परिणति।
मुख्‍य न्‍यायाधीश भी लिख चुके हैं प्रधानमंत्री को पत्र 
गत दिनों चीफ जस्‍टिस रंजन गागेई ने भी प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी को पत्र लिखकर आग्रह किया था कि न्यायपालिका में शीर्ष स्तर पर करप्शन रोकने के लिए भ्रष्ट लोगों को निकाल बाहर करना जरूरी है।
CJI ने अपने पत्र में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज एस. एन. शुक्ला को पद से हटाने के लिए संसद में प्रस्ताव लाने की मांग भी की है। जस्टिस शुक्ला को पद से हटाने के लिए 18 महीने पहले प्रस्ताव लाने की सिफारिश की गई थी। इन-हाउस पैनल ने अपनी जांच में जस्टिस शुक्ला को गंभीर न्यायिक अनियमितताओं का जिम्मेदार माना था।
CJI ने अपने खत में पीएम मोदी को लिखा, ‘आपसे आग्रह है कि इस मामले में आप आगे कार्यवाही करें।’
इससे पहले CJI ने शुक्ला की ओर से न्यायिक कार्यों के आवंटन की मांग को खारिज कर दिया था। पैनल की रिपोर्ट के बाद शुक्ला से 22 जनवरी 2018 को न्यायिक कार्य वापस ले लिया गया था।
CJI ने पीएम मोदी को पत्र में लिखा, ‘जस्टिस शुक्ला का एक पत्र मुझे 23 मई 2019 को मिला। यह पत्र इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस की ओर से फॉरवर्ड किया गया था। इस पत्र में शुक्ला ने खुद को न्यायिक कार्य करने देने की अनुमति मांगी थी।
CJI के अनुसार जस्टिस शुक्ला पर जो आरोप पाए गए हैं, वह गंभीर प्रकृति के हैं और इसलिए उन्हें न्यायिक कार्य की अनुमति नहीं दी जा सकती है। ऐसी परिस्थितियों में आप आगे की कार्यवाही के लिए फैसला लें।’
बता दें कि 2017 में यूपी के एडवोकेट जनरल राघवेंद्र सिंह ने जस्टिस शुक्ला पर अनियमितता के आरोप लगाए थे। इस पर तत्कालीन चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा ने मद्रास हाई कोर्ट की तत्कालीन चीफ इंदिरा बनर्जी, सिक्किम के चीफ जस्टिस एस. के. अग्निहोत्री और मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के जस्टिस पी के जायसवाल के नेतृत्व में पैनल का गठन किया था। इस पैनल ने शुक्ला को एक मामले में मेडिकल कॉलेजों का कथित तौर पर पक्ष लेने के लिए जिम्मेदार माना था।
ऐसे में यह सवाल उठना स्‍वाभाविक है कि जब चीफ जस्‍टिस ऑफ इंडिया तथा इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायमूर्ति भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर सिस्‍टम में गंभीर खामियां दूर करने का आग्रह कर रहे हैं और न्‍याय व्‍यवस्‍था में ऊपर से लेकर नीचे तक भ्रष्‍टाचार, वंशवाद, परिवारवाद एवं जातिवाद का जहर घुल जाने की बात कह रहे हैं तो न्‍याय मिलेगा कैसे, न्‍यायपालिकाओं में व्‍याप्‍त विसंगतियां दूर कैसे होंगी?
न्‍याय देने वालों को ही यदि न्‍याय की दरकार होगी तो जनसामान्‍य किससे और कैसे न्‍याय की उम्‍मीद रखेगा?
पहले तो चीफ जस्‍टिस का प्रधानमंत्री को पत्र लिखना और फिर अवकाश प्राप्‍त करने से मात्र 3 दिन पहले इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय के न्‍यायमूर्ति का पूरे सिस्‍टम पर गंभीर सवाल खड़े करना यह बताने के लिए काफी है कि यदि समय रहते इन खामियों को दूर नहीं किया गया तो देश का संवैधानिक ढांचा न सिर्फ पूरी तरह चरमरा जाएगा बल्‍कि अराजकता की स्‍थिति उत्‍पन्‍न होने का खतरा भी बढ़ जाएगा।
-Legend News

गुरुवार, 6 जून 2019

सरकारी रंगदारी: पहले एकमुश्‍त रोड TAX, फिर कदम-कदम पर टोल TAX, वो भी बदहाली-बदइंतजामी और बदतमीजी के साथ

रंगदारी TAX केवल सड़क छाप गुंडे-बदमाश और बाहुबली का खिताब प्राप्‍त कुख्‍यात माफिया डॉन ही नहीं वसूलते, सरकार भी वसूलती है।
फर्क सिर्फ इतना है कि गुंडे-बदमाश और माफिया डॉन के रंगदारी TAX की वसूली के खिलाफ किसी न किसी स्‍तर पर शिकायत की जा सकती है परंतु सरकार का रंगदारी TAX मुंह से एक शब्‍द निकाले बिना देना पड़ता है क्‍योंकि उसके खिलाफ बोलना तो दूर, उसे लेकर सवाल करना भी भारी पड़ सकता है।
जी हां, आप चाहे लाखों की गाड़ी के मालिक हों या करोड़-दो करोड़ की लग्‍जरी गाड़ी के, सरकारी रंगदारी वसूलने वालों की नजर में आपकी इज्‍जत दो कौड़ी के बराबर नहीं है।
यकीन न हो तो अपने निजी वाहन से कहीं बाहर निकलकर देख लीजिए, पता चल जाएगा।
सरकार के इस रंगदारी TAX का नाम है टोल TAX, जो न सिर्फ हर निजी वाहन पर भी एकमुश्‍त रोड TAX वसूल किए जाने के बावजूद लिया जाता है बल्‍कि बदहाली व बदइंतजामी के बीच बदतमीजी के साथ जेब से निकलवा लिया जाता है।
देश में जैसे-जैसे सड़कों का जाल और वाहनों की संख्‍या बढ़ती जा रही है, वैसे-वैसे सरकार का रंगदारी टैक्‍स भी बढ़ रहा है।
लोकतांत्रिक अधिकारों की दुहाई दें तो हर व्‍यक्‍ति को यह जानने का कानूनन अधिकार है कि जब प्रत्‍येक वाहन पर आरटीओ कार्यालय रजिस्‍ट्रेशन के साथ ही भारी-भरकम एकमुश्‍त रोड TAX ले लेता है तो फिर कदम-कदम पर टोल TAX की आड़ में रंगदारी TAX क्‍यों?
लेकिन यह अधिकार सिर्फ आपको आत्‍मसंतुष्‍टि दे सकता है, जवाब नहीं दिलवा सकता क्‍योंकि जवाबदेही के लिए देश में कोई नियम-कानून नहीं है।
यूं कहने के लिए आप जब अपने वाहन का रजिस्‍ट्रेशन कराते हैं और उसके साथ एकमुश्‍त रोड TAX देते हैं तो सरकार आपको 15 साल तक उस प्रदेश की सड़कों पर गाड़ी दौड़ाने की छूट देती है जहां से आपने वाहन का रजिस्‍ट्रेशन कराया है।
इसके अलावा देश के दूसरे राज्‍यों की सड़कों का भी 24 घंटे तक इस्‍तेमाल करने की इजाजत देती है।
इसे इस तरह भी समझ सकते हैं कि यदि आप अपने वाहन से दूसरे राज्‍यों की सड़क का इस्‍तेमाल करते हुए गंतव्‍य तक पहुंचते हैं तो भी आपको कोई अतिरिक्‍त कर नहीं देना होता परंतु हो ये रहा है कि लोग अपने जिले में ही डंडे के बल पर टोल TAX देने को बाध्‍य हैं।
उदाहरण के लिए मथुरा निवासी किसी व्‍यक्‍ति को जिले की सीमा के अंदर फरह कस्‍बे तक जाना है तो भी उसे इससे पहले पड़ने वाले महुअन टोल प्‍लाजा पर टैक्‍स देना होगा। न देने पर लेने के देने पड़ जाएंगे क्‍योंकि टोल टैक्‍स वसूलने का सरकारी लाइसेंस प्राप्‍त करने वालों को अघोषित गुंडागर्दी का भी लाइसेंस स्‍वत: मिल जाता है।
किसी भी टोल प्‍लाजा पर आप जरा कोई सवाल-जवाब करके तो देखिए, पलक झपकते ही दर्जनों टोलकर्मी आपको आपकी गाड़ी सहित घेर लेंगे और यदि फिर भी आप मौके की नजाकत भांपने में असफल रहे तो इज्‍जत तार-तार होते देर नहीं लगेगी। फिर आप चाहें अपने परिवार के साथ हों या रिश्‍तेदारों के साथ।
बच्‍चे भी यदि आपके साथ सफर कर रहे हों तब भी टोलकर्मी आप पर रहम नहीं करने वाले क्‍योंकि उन्‍हें टोल टैक्‍स को लेकर सवाल पूछना कतई गवारा नहीं।
यही कारण है कि टोल प्‍लाजा अब आए दिन होने वाले झगड़ों की वजह से भी पहचाने जाने लगे हैं।
अगर बात करें बदहाली-बदइंतजामी और बदतमीजी के साथ देशभर की सड़कों पर बैरियर लगाकर वसूले जा रहे इस रंगदारी टैक्‍स से आमदनी की तो पिछले करीब एक साल में ही इससे सरकार की आमदनी करीब चार गुना बढ़ चुकी है।
मनमोहन सिंह के अंतिम कार्यकाल में वर्ष 13-14 के दौरान सरकार ने टोल टैक्‍स के जरिए करीब 5300 करोड़ रुपए की कमाई की थी। नरेन्‍द्र मोदी के कार्यकाल में वर्ष 14-15 के दौरान टोल टैक्‍स से सरकार की कमाई बढ़कर 6 हजार करोड़ हो गई।
टोल टैक्‍स की कमाई ने पिछले वित्तीय वर्ष यानि 2017-18 में बेहिसाब छलांग लगाई और इस दौरान इससे सरकार को 22830 करोड़ रुपए की कमाई हुई।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में फिलहाल लगभग 390 टोल प्‍लाजा ऐसे हैं जिन पर अलग-अलग हिसाब से टैक्‍स की वसूली की जाती है।
कई रास्‍तों पर तो गाड़ी में फूंके जाने वाले तेल से अधिक टोल टैक्‍स देना पड़ जाता है वो भी टोल रोड पर दी जाने वाली सुविधाओं को धता बताकर खुलेआम रंगदारी व गुंडागर्दी के साथ।
आलम यह है कि सावधानी हटी और दुर्घटना घटी का स्‍लोगन कब किस टोल प्‍लाजा पर सटीक बैठ जाए, कहना मुश्‍किल है क्‍योंकि टोलकर्मियों को सरकार व सरकारी नुमाइंदों का पूर्ण आशीर्वाद प्राप्‍त रहता है।
क्‍या हैं नियम 
नियमों की बात करें तो किसी भी टोल प्‍लाजा के लिए सबसे पहला और महत्वपूर्ण नियम यह है कि वहां से टैक्‍स की पर्ची अधिकतम तीन मिनट के अंदर कट जानी चाहिए। यदि इससे अधिक समय टोल प्‍लाजा पर लगाया जाता है तो आप बिना टोल टैक्‍स चुकाए बैरियर से निकल जाने के अधिकारी हैं परंतु इस नियम का पालन कराएगा कौन, और कौन यह निर्धारित करेगा कि आपका टोल प्‍लाजा पर समय किस कारण जाया हुआ है।
सच तो यह है कि आज शायद ही कोई टोल प्‍लाजा देश में ऐसा हो जहां वाहन जाम में फंसे बिना आसानी के साथ निकल जाए जबकि टोल रोड बनाने का मकसद ही जाम से मुक्‍ति दिलाना था। संभवत: इसीलिए किसी टोल से गुजरने का अधिकतम समय तीन मिनट निर्धारित किया गया होगा लेकिन अब वह बेमानी हो चुका है।
इसी प्रकार टोल रोड व उसके रख-रखाव व निर्माण को लेकर भी तमाम कायदे-कानून हैं परंतु टोल का ठेका लेने वाली कंपनी टैक्‍स वसूलने के अतिरिक्‍त किसी कायदे-कानून का पालन नहीं करती और सिर्फ टैक्‍स वसूलने में ही लगी रहती है क्‍योंकि उसे इस काम में भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) के अधिकारियों का पूरा साथ मिलता है।
एनएचएआई और किसी नियम से बंधा हो या न हो किंतु पूरी निष्ठा से ठेकेदार को फायदा पहुंचाने के अपने नियम से जरूर बंधा है।
एनएचएआई और टोल ठेकेदारों के बीच चल रहा यह पूरा खेल भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट से उजागर हुआ।
रिपोर्ट में कहा गया कि अगर ठेकेदार कंपनी छह लेन का ठेका मिलने के बाद समय सीमा के भीतर काम नहीं निपटाती तो इस देरी के दौरान उसके द्वारा वसूला गया टोल टैक्स एक ‘लंबित राशि’ खाते में जमा करा लेना चाहिए। यह पैसा तब तक ठेकेदार को नहीं मिलना चाहिए, जब तक वह पहला माइल स्टोन पूरा नहीं कर लेता और अगला माइल स्टोन सही समय पर पूरा नहीं हो जाता। जितने समय तक यह रकम खाते में रहेगी उसका ब्याज भी एनएचएआई को दिए जाने का प्रावधान है।
इस सबके बावजूद दिल्‍ली से आगरा को जोड़ने वाले नेशनल हाईवे नंबर 2 को सिक्स लेन करने का काम पिछले कई वर्षों से प्रगति पर है।
इस रोड को सिक्स लेन करने का ठेका रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर की सहयोगी कंपनी डीए टोल रोड प्राइवेट लिमिटेड को मई 2010 में ही दे दिया गया था। मई में ठेका लेने के बाद 16 अक्तूबर 2012 से यहां सिक्स लेन के अनुसार टोल वसूली शुरू भी हो गई लेकिन सीएजी की रिपोर्ट के मुताबिक 27 जून 2013 तक इसके कार्य में कोई प्रगति नहीं हुई।
इस अंधेरगर्दी के चलते कंपनी ने अगस्त 2013 तक ही 120 करोड़ रु. टोल वसूल लिया और इस पैसे को सिक्स लेन रोड बनाने की बजाए दूसरे कामों में लगा दिया।
यही नहीं, जब लोग चौड़े रोड की आस में बेमन से टोल चुकाते निकल रहे थे उस समय कंपनी ने टोल से मिले 78 करोड़ रु. रिलायंस लिक्विड फंड्स में निवेश कर दिए। यानि टोल के नाम पर आम आदमी बेहतर रास्ते का ख्वाब ही देखता रहा गया और ठेकेदार ने पैसे से पैसा बनाना शुरू कर दिया।
2010 के मई माह में मिला इस रोड को फोर लेन से सिक्‍स लेन करने का काम 2019 का मई महीना बीत जाने के बाद तक अधूरा पड़ा है परंतु न कोई देखने वाला है और न सुनने वाला।
राहगीरों को लूटने वाला टोल का यह खेल कब तक?
इस बारे में देश के भूतल परिवहन मंत्री नितिन गडकरी का कहना है कि ”पूरी टोल नीति की समीक्षा की जा रही है, सरकार जल्द ही कई सकारात्मक बदलावों के साथ सामने आएगी।
”ट्रांसपोर्ट विभाग की ई बुक लॉन्चिग के कार्यक्रम में उन्होंने कहा, ”अपनी लागत निकाल चुके 75 में से 55 छोटे टोल बैरियर्स को खत्म कर दिया गया है और हाइवे के किनारे की जनसुविधाओं को लेकर सरकार तेजी से काम कर रही है।
”सीएजी की रिपोर्ट और लोगों से टोल रोड पर हो रही मनमानी के सवाल पर मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ”ठेका मिलते ही सिक्स लेन का टोल वसूलने का नियम बहुत ज्यादा विवादित है। इसकी भी समीक्षा की जा रही है लेकिन इसे तत्काल समाप्त नहीं किया जा सकता क्योंकि इस पर एनएचएआई और ठेकेदार, दोनों की सहमति है।
”अधिकारी ने बताया कि मंत्रालय संसद के अगले सत्र में नया सड़क परिवहन और सुरक्षा विधेयक लेकर आएगी। इसमें हाइवे और टोल बैरियर्स को लेकर कई बुनियादी बदलाव किए जाएंगे। खुले में शंका निवारण की समस्या से निपटले के लिए 2,000 स्थानों पर जन सुविधा केन्‍द्र बनाए जाएंगे।
अधिकारी स्पष्ट करते हैं कि जन सुविधाओं का अर्थ सिर्फ शौचालय नहीं हैं। इसमें सड़क किनारे रेस्त्रां, पेट्रोल पंप, वाहनों के लिए सर्विस स्टेशन और ट्रकर्स क्लब जैसी सुविधाएं भी शामिल होंगी।
दूसरी ओर इंस्टीट्यूट फॉर ट्रांसपोर्ट रिसर्च ऐंड ट्रेनिंग (आइएफटीआरटी) के सीनियर फेलो एस पी सिंह सवाल करते हैं, ”नियम बनाने से ज्यादा बड़ी चुनौती ठेका कंपनी, एनएचएआई और नेताओं के नेक्सस को तोड़ने की है।
टोल से की जा रही अतिरिक्त कमाई में बहुत से भ्रष्ट लोगों की हिस्सेदारी है। क्‍या केंद्र सरकार और भूतल परिवहन मंत्रालय इसे तोड़ पाएगा।”
अदालतों का भी ध्‍यान 
पिछले कुछ समय से विभिन्‍न अदालतों ने इसे गंभीर समस्‍या माना है और इस पर ध्‍यान देना शुरू किया है। जयपुर-दिल्ली हाइवे के मामले में बीते साल 10 सितंबर को राजस्थान हाइकोर्ट के जस्टिस एम. एन. भंडारी की पीठ ने टोल टैक्स बढ़ाने के फैसले को खारिज कर दिया। अदालत ने पूछा कि जब रोड की हालत ही खस्ता है तो टोल किस बात का बढ़ाया जा रहा है।
इसी तरह चेन्नै-बंगलुरू हाइवे के चेन्नै से वेल्लूर तक के टुकड़े पर वसूले जा रहे टोल को मद्रास हाइकोर्ट में चुनौती मिली। यहां भी यही आरोप था कि ब्रिज और अन्य बुनियादी ढांचा अभी बन ही रहा है लेकिन एनएचएआई ने टोल वसूलना शुरू कर दिया है। हाइकोर्ट ने इंडियन रोड कांग्रेस से सड़क का निरीक्षण करने के बाद अपनी रिपोर्ट देने के लिए कहा।
इन हालातों में परिवहन मंत्री को न सिर्फ एक बेहतर टोल नीति पेश करनी होगी, बल्कि यह भी तय करना होगा कि भारतीय सड़कों पर हर साल होने वाली पांच लाख दुर्घटनाएं और उसमें करीब एक लाख लोगों के जान गंवान को किस तरह रोका जाए।
इस सबके अलावा टोल कर्मियों का भी कोई ऐसा मुकम्‍मल इंतजाम करना होगा जिससे वो सड़कों की बदइंतजामी व बदहाली के बाद भी लोगों के साथ बदतमीजी करने से पहले चार बार साचें क्‍योंकि अंतत: टैक्‍स वही अदा करते हैं और उन्‍हीं के टैक्‍स से सड़कों का रख-रखाव संभव है।
और हां, इस सवाल का भी जवाब किसी न किसी को आज नहीं तो कल देना ही होगा कि जब वाहन के साथ रोड टैक्‍स लिया जाता है तो टोल टैक्‍स किसलिए ?
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 18 मई 2019

कड़वा सच: “झूठ” बोले बिना एक दिन भी नहीं चल सकती ये दुनिया, बराक ओबामा ने कहा था…


सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम्।
 नासत्यं च प्रियं ब्रूयात्, एष धर्मः सनातनः॥

अर्थात् सत्य और प्रिय बोलना चाहिए; पर अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिए, और प्रिय असत्य भी नहीं बोलना, यही सनातन धर्म है ।
अब ज़़रा दूसरे पहलू पर गौर करें। अमेरिका के पूर्व राष्‍ट्रपति बराक ओबामा ने एकबार कहा था कि यदि सारे लोग सत्‍य बोलने लगें अर्थात् कोई झूठ न बोले तो ये दुनिया एक दिन भी नहीं चल सकती।
बराक ओबामा ने अपने कथन के पक्ष में तर्क दिए थे कि यदि कोई भी राष्‍ट्राध्‍यक्ष अपने देश की नीतियों का पूरा सच सामने ला दे, तो क्‍या होगा।
उदाहरण के लिए यदि पाकिस्‍तान सरकार का मुखिया आतंकवाद को लेकर अपने देश की रीति और नीति का खुलासा कर दे तो परिणाम का अंदाज लगाना मुश्‍किल नहीं है।
इसी प्रकार रूस, चीन, इजरायल, ईरान या अन्‍य दूसरे देशों की सत्ता पर काबिज़़ लोग सबकुछ सच-सच सामने ला दें तो विश्‍वयुद्ध छिड़ने में एक घंटा नहीं लगेगा।

संभवत: इसीलिए ”सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम्… का उपदेश देने वाले हमारे धर्मग्रंथों ने भी ”अपवाद स्‍वरूप” विषम परिस्‍थितयों में झूठ बोलने का मार्ग छोड़ रखा था।
इसी मार्ग का अनुसरण कर धर्मयुद्ध कहलाने वाले ”महाभारत” में विषम परिस्‍थितियों को देखते हुए कई बार असत्‍य या अर्धसत्‍य का सहारा लिया गया।
इन सबके अलावा एक कथन यह भी है कि वक्‍त और परिस्‍थितयों के अनुसार सत्‍य एवं असत्‍य के मायने बदल जाते हैं।
किसी अवसर पर बोला गया सत्‍य भी साबित करना पड़ता है और कभी किसी मौके पर झूठ भी ग्राह्य होता है।
सत्‍य स्‍वयं सिद्ध होता है, यह बात किसी दौर में सार्थक रही होगी लेकिन आज सत्‍य को सिद्ध करने के लिए ही सर्वाधिक प्रयास करना पड़ता है।
बहरहाल, सांतवें चरण की वोटिंग के साथ कल शाम 2019 के लोकसभा चुनावों का समापन हो जाएगा और 23 मई की सुबह से पता चलने लगेगा कि लोकतंत्र के बाजार में किसका कितना ”सत्‍य” बिक सका या किसका कितना ”झूठ” कारगर हुआ।
ऐसा माना जाता है कि सत्‍य के साथ झूठ का मिश्रण उसी अनुपात में स्‍वीकार है, जिस अनुपात में भोजन के साथ नमक, किंतु इन लोकसभा चुनावों में तो झूठ का बाजार अधिक गर्म रहा और सत्‍य बार-बार सफाई देता दिखाई दिया।
अगर बात करें, उस जनता की जिसे जनार्दन (ईश्‍वर) की संज्ञा प्राप्‍त है तो सत्‍य और असत्‍य को परिभाषित करने का उसका अपना तरीका है क्‍योंकि एक व्‍यक्‍ति का सत्‍य आवश्‍यक नहीं कि दूसरे व्‍यक्‍ति के लिए भी सत्‍य हो।
ठीक इसी प्रकार किसी व्‍यक्‍ति का झूठ, किसी अन्‍य व्‍यक्‍ति के लिए सत्‍य भी हो सकता है।
सत्‍य और झूठ के बीच का यह भ्रम भी नया नहीं है। हर युग में यह भ्रम बना रहा और आज भी बना हुआ है क्‍योंकि सवाल दृष्‍टिकोण का है, न कि दृष्‍टि का। दृष्‍टि समान हो सकती है परंतु दृष्‍टिकोण समान हो, यह जरूरी नहीं। जिसका जैसा दृष्‍टिकोण होता है, उसकी वैसी ही दृष्‍टि हो जाती है। इसे यूं भी कह सकते हैं कि वो वैसी ही दृष्‍टि बना लेता है। उसके लिए चीजों को देखने और दिखाने का ढंग बदल जाता है।
लिखा-पढ़ी में सवा अरब की आबादी वाला यह देश आज हकीकत में करीब डेढ़ अरब की जनसंख्‍या का बोझ भले ही ढो रहा हो परंतु सत्‍य और असत्‍य को जांचने व परखने वालों की संख्‍या कितनी होगी, कभी इस पर विचार करके देखिए…बहुत मजा आएगा।
ऐसा लगता है एक भीड़ है जो मुठ्ठीभर लोगों से संचालित होती है। ये मुठ्ठीभर लोग हैं नेता और नौकरशाह। लोकतंत्र की परिभाषा में कहें तो विधायिका, कार्यपालिका और न्‍यायपालिका में उच्‍च पदों पर बैठे हुए लोग।
सुना है भीड़ के दिमाग नहीं होता। यदि ये कहावत सही है तो फिर कैसा लोकतंत्र और कैसे चुनाव। एक भीड़ है जो मुठ्ठीभर लोगों के इशारे पर संचालित है और इस भ्रम में जी रही है कि वही भाग्‍य विधाता है। यदि वही भाग्‍य विधाता है तो चुनावों के बाद उसका अपना भाग्‍य ”लोकतंत्र के तीन पायों” से बंधा क्‍यों नजर आता है।
यही वो असलियत है जो सत्‍य और असत्‍य अथवा झूठ और सत्‍य की पोल खोलती है।
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात् न ब्रूयात् सत्यम् अप्रियम्… का ज्ञान देने वाला सनातन धर्म यहां आकर बराक ओबामा के इस कथन से हारने क्‍यों लगता है कि कि यदि सारे लोग सत्‍य बोलने लगें तो ये दुनिया एक दिन भी नहीं चल सकती।
19 मई और 23 मई के बीच सिर्फ 3 दिन रह जाएंगे, यह जानने के लिए कि देश और देशवासियों का भाग्‍य किस ओर करवट लेगा।
फिर एक शपथ ग्रहण समारोह होगा और फिर अगले कुछ सालों के लिए जनता ”जनार्दन” न होकर ”रिआया” बन जाएगी। यानी प्रजा, आम जनता। व्‍यंगात्‍मक भाषा में कहें तो मेंगो पीपुल।
अगले लोकसभा चुनावों में सत्‍य और असत्‍य के बीच झूलने को अभिशप्‍त अथवा सनातन धर्म और परिस्‍थितिजन्‍य धर्म के बीच पिसने को बाध्‍य।
जो भी हो, लेकिन अंतिम सत्‍य यही है कि राजा और प्रजा का यह रिश्‍ता ऐसे ही कायम रहेगा। सूरतें बदल सकती हैं लेकिन सीरतें जस की तस रहेंगी। कोई अपने सत्‍य को साबित करने की कवायद में जुटता दिखाई देगा तो कोई अपने असत्‍य को परवान चढ़ाने में ऐड़ी से चोटी तक का जोर लगा देगा क्‍योंकि सत्‍य का वजूद असत्‍य पर टिका है और असत्‍य का सत्‍य पर। इसलिए अस्‍तित्‍व में दोनों सदा से रहे हैं और आगे भी रहेंगे।
बस देखना यह है कि 23 मई के नतीजे आटे में नमक को तरजीह देते दिखाई देते हैं या बदलते वक्‍त में नमक भी आटे के साथ मिलाकर खिलाने की कला नेता जान चुके हैं। दोनों ही परिस्‍थितियों में जनता को अगले चुनावों तक इंतजार करना होगा, उससे अगले चुनावों तक ”अपनी सरकार” बनाने के धोखे में।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

मंगलवार, 14 मई 2019

नेताओं की बदजुबानी का यह दौर आखिर कहां तक जाएगा, क्‍या इस पर विचार किया?

सात चरणों में संपन्‍न होने जा रहे 2019 के लोकसभा चुनाव नेताओं की बदजुबानी के लिए भी जाने जाएंगे, हालांकि फिलहाल यह कहना मुश्‍किल है कि बदजुबानी का ऐसा सिलसिला आगे भी जारी रहेगा या इसे रोकने के कोई इंतजाम किए जाएंगे।
यूं देखा जाए तो अबकी बार चुनावी रैलियों में बेशक हर नेता ने अपनी बदजुबानी को नई धार दी परंतु इसकी शुरूआत काफी पहले ही हो चुकी थी।
सबसे पहले कब और किसने अपनी जुबान को बेलगाम तरीके से इस्‍तेमाल किया और कौन इसके लिए जिम्‍मेदार है, यह प्रश्‍न उसी प्रकार बेमानी हो जाता है जिस प्रकार यह जानने की कोशिश करना कि पहले अंडा आया या पहले मुर्गी।
बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि नेताओं की बदजुबानी ने समाज में वैमनस्‍यता को बढ़ावा दिया है। दलगत राजनीति इस कदर समाज पर हावी हो चुकी है कि अपने नेताओं की बदजुबानी को भी उनके समर्थक हर हाल में जायज ठहराने पर तुले रहते हैं।
आश्‍चर्य की बात यह है कि सार्वजनिक मंचों से एक-दूसरे को गरियाने वाले नेता तो आपस में मिलने पर परस्‍पर सहोदरों सा व्‍यवहार करते हैं परंतु समर्थकों के बीच एक अघोषित पाला खिंच जाता है।
कौन नहीं जानता कि इन दिनों भाजपा और मोदी को पानी पी-पीकर कोसने वाली मायावती एक-दो नहीं तीन-तीन बार भाजपा की मदद से ही मुख्‍यमंत्री बनी थीं। किसे नहीं पता कि आज मायावती को दौलत की बेटी बताने वाली भाजपा को किसी समय मायावती में एक ‘श्रेष्‍ठ नेता’ के तमाम गुण दिखाई देते थे। मायावती के सर्वाधिक राखीबंध भाई भााजपा में ही हुआ करते थे।
दूसरी ओर जिस समाजवादी पार्टी ने, बकौल मायावती उन्‍हें जान से मारने की कोशिश की, वही मायावती आज अपना समूचा प्‍यार अखिलेश पर उड़ेल रही हैं।
इसी प्रकार कल तक भाजपा और उसके नेतृत्‍व के लिए बिछ जाने वाले नवजोत सिंह सिद्धू आज उसके खिलाफ अनर्गल प्रलाप कर रहे हैं।
जो प्रियंका चतुर्वेदी चंद रोज पहले तक कांग्रेस के पक्ष में टीवी पर इतनी आक्रोशित हो जाती थीं कि जैसे अभी मारने-मरने पर आमादा हो जाएंगी, उन्‍होंने निजी भावनाएं या कहें कि ”महत्‍वाकांक्षा” पूरी होते न देख शत-प्रतिशत दक्षिणपंथी शिवसेना से हाथ मिलाने में देर नहीं की और ठीकरा यह कहकर फोड़ा कि कांग्रेस में गुंडों को तरजीह दी जा रही है।
जिन दलित नेता उदित राज ने पूरे पांच साल मोदी सरकार में मलाई मारी, वही टिकट न मिलने पर भाजपा के दुश्‍मन खेमे में जा खड़े हुए।
उत्तर प्रदेश में मात्र तीन सीटें पाने को सपा और बसपा नेतृत्‍व के सामने शीर्षासन करने वाले राष्‍ट्रीय लोकदल के मुखिया अजीत सिंह की चर्चा के बिना राजनीति के गिरते स्‍तर की कहानी पूरी नहीं हो सकती। रालोद मुखिया अजीत सिंह हाशिए पर जा पहुंचे लेकिन अपनी फितरत नहीं बदली।
उनकी इस फितरत से वाकिफ लोग संभवत: इसीलिए अब भी यह कहते सुने जा सकते हैं कि 23 मई का इंतजार कीजिए। पता नहीं 23 मई के बाद अजीत सिंह गठबंधन की गांठ तोड़कर भागने का श्रेय लेने में भी विलंब न करें।
आम आदमी पार्टी के खास नेताओं ने भी बदजुबानी की राजनीति में तो अपना उल्‍लेखनीय स्‍थान बनाया ही है, साथ ही सत्ता की भूख पूरी करने के लिए किसी भी स्‍तर तक गिर जाने का भी रिकॉर्ड जिस तेजी से कायम किया है, उसकी मिसाल मिलना मुश्‍किल है।
जिस कांग्रेस के खिलाफ अन्‍ना हजारे के कंधों का सहारा लेकर अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी ने राजनीति के गलियारों में प्रवेश किया, उसी कांग्रेस के साथ ”पैक्‍ट” करने के लिए ”साष्‍टांग दंडवत” हो जाने का ऐसा ‘बेशर्म अंदाज’ शायद ही पहले कभी सामने आया होगा।
मात्र पांच साल पहले कांग्रेसी नेताओं और विशेषकर शीला दीक्षित के लिए अपशब्‍दों का नित नया पिटारा खोलने वाले अरविंद केजरीवाल को इन चुनावों में उन्‍हीं से ”दे दाता के नाम, तुझको अल्‍ला रखे” की तर्ज पर झोली फैलाकर सीटों की भीख मांगते हुए किसने नहीं देखा।
उत्तर से दक्षिण तक और पूरब से पश्‍चिम तक आज ऐसे राजनीतिक दलों, नेताओं और प्रत्‍याशियों की पूरी फौज मिल जाएगी जिनके शब्‍दकोश में दीन-ईमान जैसा कुछ होता ही नहीं। जो एक मुंह से जिनके लिए गालियां निकालते हैं, दूसरे मुंह से उनकी ‘विरुदावली’ गाने का काम करते हैं।
सच कहा जाए तो मनुष्‍य के रूप में रेंगते दिखाई देने वाले ये ऐसे जीव हैं जिनकी फितरत के सामने गिरगिट के रंग बदलने की कहावत बेमानी हो चुकी है।
सांप जितनी जल्‍दी अपनी केंचुली नहीं बदल सकता, उतनी जल्‍दी यह अपना खोल बदल लेते हैं।
बदजुबानी इनकी इसी फितरत का हिस्‍सा और करवट लेती उस राजनीति का संकेत है जिसमें अंतत: पिसना उस जनता को ही होगा जो अपने मां-बाप से अधिक तरजीह इनके मान-सम्‍मान को देने लगी है।
किसी के भी विचारों से सहमत या असहमत होना हर व्‍यक्‍ति का विशेषाधिकार है लेकिन उन विचारों को थोपने के लिए असभ्‍य आचरण करना, किसी का अधिकार नहीं हो सकता।
अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता का आशय यह नहीं कि जो मुंह में आए वही बकने लगें और किसी के लिए कुछ भी कह दें। हर स्‍वतंत्रता एक जिम्‍मेदारी का बोध कराने के लिए होती है, निरंकुश व्‍यवहार करने के लिए नहीं।
लोगों द्वारा, लोगों के लिए, लोगों की सरकार चुनना भी स्‍वतंत्रता की जिम्‍मेदारी का अहसास बनाए रखने और लोकतांत्रिक व्‍यवस्‍था को जीवित रखने का दायित्‍वबोध है। नेता यदि आज इसे नहीं समझ रहे तो हमें समझना होगा।
नहीं समझे तो बदजुबानी का जहर और दलबदुओं की फितरत का प्रभाव हमें कहीं का नहीं छोड़ेगा।
सत्ता की खातिर नेता हमें भी उस गर्त में ले जाएंगे जहां से निकल पाना हमारे लिए मुश्‍किल होगा, और हमारी यही मुश्‍किल उनके घृणित उद्देश्‍यों को पूरा करने का हथियार बनती रहेगी।
बेहतर होगा कि समय रहते गंभीरता से इस स्‍थित पर विचार करें ताकि आने वाले चुनावों में मुंह खोलने से पहले नेता यह सोचने के लिए मजबूर हो जाएं कि उनकी बदजुबानी उनका राजनीतिक भविष्‍य चौपट कर सकती है। उनकी दिशा ही नहीं, दशा भी निर्धारित कर सकती है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शुरू होने के साथ ही छाता का “Delhi Public School” विवादों में, पेरेंट्स ने की 3 पन्‍नों की शिकायत

मथुरा को राष्‍ट्रीय राजधानी से जोड़ने वाले नेशनल हाईवे नंबर 2 पर छाता क्षेत्र में अपना पहला शिक्षा सत्र शुरू करने वाला Delhi Public School संभवत: पहला ऐसा हाई प्रोफाइल स्‍कूल होगा, जिसकी शिकायतें इतनी जल्‍दी आने लगीं।
समस्‍या है कहां
दरअसल, शिक्षा व्‍यवसाइयों से पेरेंट्स को होने वाली ऐसी समस्‍याएं न तो नई हैं और न अकेले Delhi Public School से जुड़ी हैं।
सच तो यह है कि ये सभी समस्‍याएं उस व्‍यवस्‍थागत खामियों का हिस्‍सा हैं जिनका भरपूर लाभ शिक्षा व्‍यवसाई उठाते हैं और पेरेंट्स को अपनी उंगलियों पर नचाते हैं।
वो भी तब जबकि अधिकांश स्‍कूल उन जरूरतों को भी पूरा नहीं करते जो किसी स्‍कूल को चलाने के लिए अत्यंत आवश्‍यक होती हैं।
‘सेटेलाइट’ और ‘कोर’ स्‍कूल 
अगर बात करें DPS Society के अधीन चलने वाले Delhi Public School’s की तो उसके दो स्‍तर हैं।
पहला स्‍तर ‘सेटेलाइट’ स्‍कूल्स का होता है जिसकी कमान DPS Society खुद अपने हाथ में रखती है और उनके लिए शिक्षा के सभी अपने मानक लागू करती है। इस स्‍तर का मथुरा में ‘मथुरा रिफाइनरी’ द्वारा संचलित DPS है।
दूसरे स्‍तर में वो स्‍कूल आते हैं जिन्‍हें DPS Society कुछ शर्तों के साथ स्‍कूल चलाने का अधिकार देती है। ये DPS के ‘कोर’ स्‍कूल कहलाते हैं। अकबरपुर (छाता) में शुरू किया गया DPS ऐसे ही ‘कोर’ स्‍कूलों में से एक है। इन स्‍कूलों का नियंत्रण उसकी प्रबंध कमेटी के हाथ में होता है।
छाता क्षेत्र के अकबरपुर में शुरू किया गया Delhi Public School शायद ऐसा भी पहला ही स्‍कूल होगा जिसका उद्घाटन स्‍कूल कैंपस में न कराकर मथुरा की सांसद और प्रसिद्ध सिने अभिनेत्री हेमा मालिनी से एक होटल में करा लिया गया।
अन्‍यथा इस स्‍कूल के संचालकों को ऐसी क्‍या जल्‍दी थी कि उन्‍होंने न सिर्फ आनन-फानन में उद्घाटन कराकर स्‍कूल का पहला सत्र शुरू कर दिया बल्‍कि सत्र शुरू करने से पहले उन सुविधाओं तक का इंतजाम नहीं किया जिनका जोर-शोर से प्रचार कराया गया था और जिनका बच्‍चों के पेरेंट्स को कमिटमेंट भी किया।
सामान्‍य तौर पर चूंकि लोग ‘सेटेलाइट’ और ‘कोर’ स्‍कूल के अंतर को नहीं जानते इसलिए मात्र “Delhi Public School” लिखा होने के कारण झांसे में आकर जाने-अनजाने बच्‍चों के भविष्‍य से खिलवाड़ करने लगते हैं।
आश्‍चर्य की बात यह है कि इन सुविधाओं में कोई अनोखी सुविधा शामिल नहीं थी। ये सभी वो सुविधाएं थीं जो इस स्‍तर के किसी भी स्‍कूल में आजकल सामान्‍यत: पाई जाती हैं। बावजूद इसके चंद दिनों के अंदर ही इस Delhi Public School की शिकायतों का अंबार लगने लगा है।
केडी मेडिकल कॉलेज के डॉक्‍टर्स ने की तीन पन्‍नों की लिखित शिकायत
सबसे ताजा मामला स्‍कूल के अत्‍यंत निकट स्‍थित केडी मेडिकल कॉलेज के उन डॉक्‍टर्स का है जिन्‍होंने नजदीक होने के कारण और स्‍कूल की मैनेजमेंट कमेटी पर भरोसा करके अपने बच्‍चों का यहां एडमिशन करा दिया।
कॉलेज के ऐसे डॉक्‍टर्स ने एक लिखित जनरल कंपलेंट करते हुए स्‍कूल की मैनेजमेंट कमेटी पर बच्‍चों को सुविधाएं मुहैया न कराने और पेरेंट्स से किए गए कमिटमेंट को पूरा न करने का आरोप लगाया है।
मेडिकल जैसे पेशे से जुड़े स्‍कूली बच्‍चों के इन पेरेंट्स का आरोप है कि Delhi Public School के मैनेजमेंट ने उनसे एडमिशन कराने से पूर्व जो वायदे किए थे, अब उनमें से किसी को पूरा नहीं किया जा रहा।
जैसे स्‍कूल प्रबंधन ने DPS के स्‍तर वाली सभी ट्रांसपोर्ट संबंधी सुविधाएं बच्‍चों को उपलब्‍ध कराने का वादा किया था लेकिन पहले दिन से लेकर आज तक कभी मेडिकल कॉलेज कैंपस में स्‍कूल बस टाइम से नहीं पहुंची। बस अक्‍सर एक से डेढ़ घंटे देर करती है, जिसके कारण बच्‍चों की शुरू की क्‍लासेस छूट जाती हैं।
शिकायत के अनुसार बच्‍चों के लिए स्‍कूल में एक फीमेल केयरटेकर उपलब्‍ध कराने का कमिटमेंट किया गया था, लेकिन वो भी पूरा नहीं किया जा रहा।
इसके अलावा स्‍कूल बस के अंदर क्षमता से अधिक बच्‍चे भरकर ले जाए जाते हैं जिस कारण भीषण गर्मी के इस दौर में बच्‍चों की तबियत खराब होने का खतरा बना रहता है। साथ ही सुरक्षा के लिहाज से भी बस सुरक्षित नहीं रहती।
पेरेंट्स का कहना है कि इस बारे में शिकायत करने पर स्‍कूल के मैनेजमेंट ने जल्‍द ही समस्‍याएं दूर करने का आश्‍वासन दिया लिहाजा वो निजी वाहनों से बच्‍चों को स्‍कूल छोड़ने जाने लगे किंतु समस्‍याओं का समाधान अब तक नहीं किया गया। इसके विपरीत बच्‍चों को स्‍कूल छोड़ने जाने वाले पेरेंट्स को गेट पर ही रोक दिया जाता है जबकि मेन गेट से स्‍कूल की बिल्‍डिंग काफी दूर है।
पेरेंट्स की एक शिकायत यह भी है कि एडमिशन से पहले उन्‍हें कहा गया था कि केडी मेडिकल कॉलेज से Delhi Public School की दूरी अधिकतम दो किलोमीटर होने के कारण वह इस कैंपस से आने वालों बच्‍चों की स्‍कूल बस फीस सामान्‍य फीस से आधी लेंगे किंतु अब पूअर बस सुविधा के बावजूद पूरी 1500 रुपए फीस वसूली जा रही है जो पूरी तरह नाजायज है।
पेरेंट्स की इन सभी शिकायतों के बारे में Delhi Public School को फोन करके मैनेजमेंट  का पक्ष जानना चाहा तो उधर से कुछ देर बाद जवाब देने की बात कही गई किंतु समाचार लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं आया।
क्‍यों नहीं आया जवाब ? 
स्‍कूल प्रबंधन से जवाब न आने की सबसे बड़ी वजह स्‍कूल के संचालन में बेहिसाब खामियां होना तो है ही, साथ ही वो नियम व शर्तें भी अब तक पूरी न किया जाना है जो किसी भी स्‍कूल की मान्‍यता के लिए जरूरी होती हैं।
बताया जाता है कि मात्र कक्षा 7 तक के लिए शुरू किए गए इस Delhi Public School ने जिला स्‍तर पर बेसिक शिक्षा अधिकारी के यहां से जरूरी नियम व शर्तें भी फिलहाल पूरी नहीं की हैं जबकि उन नियम व शर्तों को पूरा किए बिना न तो मान्‍यता मिलना संभव है और न स्‍कूल के संचालन का अधिकार प्राप्‍त होता है।
ऐसे में यह माना जा सकता है कि शत-प्रतिशत सफलता की गारंटी वाले शिक्षा व्‍यवसाय को लोगों ने पेरेंट्स से सिर्फ और सिर्फ पैसा वसूलने का ज़रिया तो बना लिया है किंतु सुविधा और नियम-कानून ताक पर रख दिए हैं।
यदि ऐसा नहीं होता तो कैसे किसी नामचीन संस्‍था से जुड़ा स्‍कूल अपने पहले ही शिक्षा सत्र में पेरेंट्स को शिकायत करने का अवसर देता और कैसे शिकायत सुनने के बाद भी अपना पक्ष रखने की बजाय चुप्‍पी साध लेता।
-Legend News

भाजपा में शामिल होना चाहती थीं प्रियंका चतुर्वेदी, एक गाना बन गया रोड़ा

कल तक विभिन्न समाचार चैनलों पर कांग्रेस के लिए किसी से भी भिड़ जाने वाली तेजतर्रार नेता प्रियंका चतुर्वेदी शिवसेना में शामिल तो हो गईं, लेकिन असल में वे भाजपा में शामिल होना चाहती थीं।
बताया जाता है कि भाजपा में शामिल होने की उनकी ‘महत्वाकांक्षी’ योजना में रोड़ा उनका ही एक गाना बन गया।
एक रिपोर्ट के मुताबिक कांग्रेस छोड़ने के बाद प्रियंका की पहली पसंद भाजपा ही थी लेकिन प्रियंका चतुर्वेदी की राह में उनके द्वारा स्मृति ईरानी पर तंज कसता हुआ वह गाना बड़ी बाधा बन गया जो उन्‍होंने स्‍मृति ईरानी के अमेठी से नामांकन दाखिल करने के बाद उनकी शिक्षा को लेकर गाया था।
दरअसल, कुछ समय पहले प्रियंका ने स्मृति की डिग्री को लेकर कटाक्ष करते हुए टीवी चैनल पर एक गीत गुनगुनाया था, जिसका शीर्षक था ‘मंत्री भी कभी ग्रेजुएट थीं…’।
प्रियंका ने कुछ इस अंदाज में गुनगुनाया था- क्वालिफिकेशन के भी रूप बदलते हैं, नए-नए सांचे में ढलते हैं, एक डिग्री आती है एक डिग्री जाती है, बनते एफिडेविट नए-नए हैं’।
इसके माध्यम से प्रियंका चतुर्वेदी ने स्मृति पर खुलकर निशाना साधा था। यही कारण रहा कि ऐन वक्त पर उनकी भाजपा में एंट्री नहीं हो सकी।
गौरतलब है कि प्रियंका चतुर्वेदी मथुरा से टिकट चाहती थीं, लेकिन पार्टी ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। उन्होंने कहा भी था कि उन्होंने 10 साल पार्टी की नि:स्वार्थ सेवा की थी।
टिकट न मिलने से उनका असंतोष और बढ़ गया था। ऐसे में उन्होंने कांग्रेस छोड़ने का मन बना लिया था। इसके लिए उन्‍होंने आड़ ली मथुरा में अपने साथ हुई उस कथित बदतमीजी की जो एक प्रेस कांफ्रेंस में मथुरा के एक कांग्रेसी गुट ने की थी।
हालांकि उन्होंने कांग्रेस छोड़ने की वजह टिकट न मिलने को नहीं बताया और कहा कि पार्टी में अब गुंडों को तरजीह दी जा रही है इसलिए मैं बहुत दुखी मन से यह निर्णय ले रही हूं।
चूंकि उन्होंने कांग्रेस छोड़ने का मन बना ही लिया था और भाजपा में एंट्री नहीं हो पा रही थी, ऐसे में उन्होंने ऐसी पार्टी को चुना जो सत्ता केंद्र के निकट हो। अब देखना यह होगा कि शिवसेना में उनका कद कहां तक बढ़ता है।
-Legend News

प्रियंका चतुर्वेदी के कांग्रेस छोड़ने की बड़ी वजह महेश पाठक की “उम्‍मीदवारी” भी

नई दिल्‍ली। कांग्रेस की राष्‍ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका चतुर्वेदी की पार्टी से नाराजगी की खबरों के बीच अब उनके पार्टी छोड़ने की खबर आ रही है। सूत्रों के हवाले से ऐसी खबर आ रही है कि मथुरा में हुई घटना के विरोध में प्रियंका ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। ट्विटर पर भी उन्होंने मथुरा घटना को लेकर खुलकर अपनी नाखुशी जाहिर की थी।
प्रियंका चतुर्वेदी ने अपने ट्विटर हैंडल के बायो इंट्रो में कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता पद का परिचय हटा लिया है।
प्रियंका चतुर्वेदी ने अपने ट्विटर हैंडल के बायो इंट्रो से कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता पद का परिचय हटा लिया है।
बता दें कि मथुरा में कांग्रेस पार्टी के ही कुछ कार्यकर्ताओं ने प्रियंका चतुर्वेदी से दुर्व्यवहार किया था। हालांकि, उन्हें अपने व्यवहार पर खेद जताने के बाद पार्टी में वापस ले लिया गया।
प्रियंका ने इस पर नाराजगी जताते हुए ट्वीट किया था कि कांग्रेस के लिए अपना खून-पसीना एक करने वालों के स्थान पर कुछ लंपट आचरण करने वालों को तरजीह मिल रही है।
मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी दावा किया जा रहा है कि मथुरा की घटना के कारण पार्टी छोड़ने से पहले ही कुछ अन्‍य कारणोंवश प्रियंका पार्टी से नाराज चल रही थीं। मीडिया रिपोर्ट्स का कहना है कि प्रियंका मुखरता से पार्टी का पक्ष लेती थीं और उन्हें इस चुनाव में टिकट मिलने की उम्मीद थी। टिकट नहीं मिलने के कारण ही उन्होंने नाराजगी में पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया।
कांग्रेस की मुखर प्रवक्ता के तौर पर प्रियंका ने बनाई पहचान 
मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से कांग्रेस प्रवक्ता के तौर पर प्रियंका चतुर्वेदी ने अलग पहचान बनाई। वह मीडिया चैनल्‍स और सार्वजनिक मंचों पर बीजेपी और मोदी सरकार के खिलाफ पार्टी का मुखर चेहरा बनकर उभरी थीं। कांग्रेस में उन्हें राष्ट्रीय प्रवक्ता का पद भी दिया गया। कई बार उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के साथ भी मंच साझा किया। हाल ही में उन्‍होंंने स्‍मृृति ईरानी के हलफनामे में डिग्री विवाद पर ताना कसते हुए स्‍मृति के ही लोकप्रिय सीरियल का गाना गाया था, जिसकी सोशल मीडिया पर काफी चर्चा हुई।
प्रियंका की नाराजगी के पीछे ”मथुरा” से महेश पाठक की उम्‍मीदवारी भी 
बहुत कम लोग जानते हैं कि प्रियंका चतुर्वेदी की जड़ें उत्तर प्रदेश के मथुरा से जुड़ी हैं। प्रियंका के पिता और पेशे से चार्टर्ड अकाउंटेंट पुरुषोत्तम चतुर्वेदी मथुरा के चौबच्‍चा मौहल्ला निवासी हैं। 
मथुरा और चतुर्वेदी समुदाय में ”लाला” के नाम से मशहूर प्रियंका चतुर्वेदी के पिता कुछ समय पहले तक चतुर्वेदी समाज की पत्रिका के संपादक भी हुआ करते थे। 
किन्‍हीं कारणोंवश उनका विवाद माथुर चतुर्वेद परिषद के संरक्षक महेश चतुर्वेदी यानि महेश पाठक से हुआ। 
ये वही उद्योगपति महेश पाठक हैं जिन्‍हें कांग्रेस ने इस बार मथुरा लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़वाया है। इस विवाद के बाद प्रियंका के पिता को समाज की पत्रिका के संपादक पद से मुक्‍त कर दिया गया। 
गौरतलब है कि महेश पाठक का नाम मथुरा से कांग्रेस प्रत्‍याशी के रूप में घोषित होने तक प्रियंका चतुर्वेदी का नाम काफी आगे चल रहा था और माना जा रहा था कि पार्टी उन्‍हें यहां से चुनाव मैदान में उतारने जा रही है किंतु ऐन वक्‍त पर महेश पाठक को टिकट दे दिया गया।
मथुरा कांग्रेस की गुटबाजी भी बड़ा कारण
इधर मथुरा कांग्रेस भी काफी लंबे समय से गुटबाजी का शिकार है। मथुरा में एकगुट पूर्व विधायक प्रदीप माथुर का है और दूसरा उन्‍हें पसंद न करने वाले कांग्रेसियों का। इस गुट में महेश पाठक भी बताए जाते हैं।
जाहिर है ऐसे में प्रदीप माथुर गुट को तरजीह देने वाली प्रियंका चतुर्वेदी को महेश पाठक की उम्‍मीदवारी रास नहीं आई।
प्रियंका चतुर्वेदी जिस विवाद का हवाला देकर कांग्रेस में गुंडों को महत्‍‍‍व देने की बात कर रही हैं, वो उस प्रेस कांफ्रेंस से ताल्‍लुक रखता है जिसे उन्‍होंने प्रदीप माथुर के साथ स्‍थानीय एक होटल में बुलाया था। यहीं गुटबाजी के चलते प्रियंका चतुर्वेदी से कथित तौर पर अभद्रता की गई।
अभद्रता की घटना पुरानी, फिर रिएक्‍शन अब क्‍यों 
प्रियंका चतुर्वेदी को महेश पाठक की उम्‍मीदवारी भले ही रास न आ रही हो किंतु उन्‍हें मौका तब मिला जब अभद्रता करने वालों का मथुरा में मतदान से ठीक तीन दिन पहले निलंबन वापस ले लिया गया।
पार्टी महासचिव ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया के स्‍तर से वापस लिए गए इस निलंबन के पीछे भी महेश पाठक की उनसे नजदीकियां मानी जा रही हैं। ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया इससे ठीक पहले मथुरा में महेश पाठक के लिए रैलियां करके गए थे।
ऐसे में यह अनुमान लगाया जा रहा है कि प्रियंका चतुर्वेदी के धुर विरोधी महेश पाठक के कहने पर ही उन सभी लोगों का निलंबन रद्द किया गया जिनकी शिकायत प्रियंका चतुर्वेदी ने की थी।
मथुरा में अब हालांकि मतदान हो चुका है किंतु महेश पाठक की उम्‍मीदवारी ने यहां की गुटबाजी को राष्‍ट्रीय स्‍तर पर हवा दे दी और उसी का परिणाम रहा प्रियंका का कांग्रेस को छोड़ना। अब देखना यह है कि पांच चरणों के शेष मतदान में प्रियंका की नाराजगी क्‍या गुल खिलाती है क्‍योंकि मुंबई में उनकी सक्रियता भी कांग्रेस के प्रत्‍याशियों को प्रभावित कर सकती है।
-Legend News
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