रविवार, 29 मार्च 2020

कोरोना वायरस से अधिक वायरल होते ‘दानवीर’ और ‘कर्मवीर’


चीन से ‘ग्लोबलाइज’ हुआ ‘कोरोना वायरस’ जितनी तेजी के साथ देश में ‘वायरल’ नहीं हो सका, उससे कहीं अधिक गति से अब हमारे ‘दानवीर’ और ‘कर्मवीर’ वायरल हो रहे हैं। सोशल मीडिया इस समय इन ‘दानवीरों’ और ‘कर्मवीरों’ से अटा पड़ा है।
हो भी क्‍यों नहीं, आखिर देश के प्रधानमंत्री ने कोरोना जैसी महामारी से मिलकर लड़ने का आह्वान जो किया था।
आह्वान को गंभीरता से लेते हुए करोड़ों-अरबों में खेलने वाले ‘दानवीर’ भीड़ एकत्र करके सब्‍जी-पूड़ी के पैकेट बांट रहे हैं और लखपतियों का ग्रुप आटा-दाल-तेल की पुड़िया देकर वाहवाही लूट रहा है।
इसी प्रकार ‘कर्मवीरों’ की फौज ‘सेनिटाइजर’ लेकर मोहल्‍ले-मोहल्‍ले और गली-गली घूम रही है। यह फौज ‘मास्‍क’ और ग्‍लव्‍स वितरण भी करती देखी जा सकती है।
चूंकि इस दौर में अलग से किसी फोटोग्राफर या वीडियो मेकर की आवश्‍यकता तो है नहीं, ये सारे काम स्‍मार्टफोन कर देता है इसलिए ‘दानवीरों’ और ‘कर्मवीरों’ को बड़ी राहत हो गई है।
घटना स्‍थल (मेरा मतलब है ‘मौके’) से ही इनके दूत वाट्सएप, फेसबुक, टि्वटर, इंस्‍टाग्राम आदि पर अपने ‘कारनामे’ तमाम ग्रुप में सेंड कर देते हैं जिससे देश-दुनिया उनके इस दुर्लभ गुण से बखूबी परिचित हो सके।
वैसे प्रिंट मीडिया भी इन्‍हें ‘तरजीह’ देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा। वह इन्‍हें चार-छ: कॉलम में न सही तो डबल कॉलम में तो ‘फोटो विद कैप्‍शन’ जगह दे ही देता है।
कुल मिलाकर इस तरह हमारे मौसमी दानवीर और कर्मवीर प्रिंट मीडिया एवं सोशल मीडिया से लेकर इलैक्‍‍‍‍‍‍ट्रॉनिक मीडिया, यहां तक कि वेब मीडिया में भी छाए हुए हैं।
मीडिया से याद आया कि प्रधानमंत्री जी ने राष्‍ट्र के नाम अपने संबोधन में इस वर्ग से भी अनुरोध किया था कि वह संकट की इस घड़ी में साथ दे।
मीडिया की महत्‍ता को रेखांकित करते हुए माननीय प्रधानमंत्री ने ‘जनता कर्फ्यू’ के दौरान जिन लोगों के प्रति घंटे-घड़ियाल, ताली-थाली आदि बजाकर आभार व्‍यक्‍त करने को कहा था, उनमें मीडिया भी शामिल था।
आभार के बोझ तले मीडिया के एक वर्ग यानि इलैक्‍ट्रॉनिक मीडिया ने अपनी जिम्‍मेदारी का परिचय देते हुए प्रवासी मजूदरों के पलायन को इस कदर हाईलाइट किया कि बाकी मजदूरों को उससे बड़ी प्रेरणा मिली, नतीजतन दिल्‍ली से शुरू हुआ यह सिलसिला देखते-देखते देशव्‍यापी हो गया।
प्रधानमंत्री ने संकट की घड़ी में साथ जो मांगा था। ये थोड़े ही कहा था कि साथ किस तरह देना है।
मीडिया में भी प्रिंट मीडिया को प्राथमिकता देनी होगी क्‍योंकि प्रधानमंत्री जी ने भी सबसे पहले प्रिंट मीडिया का जिक्र किया था कि वह फेक न्‍यूज़ को लेकर जनता को आगाह करे और भ्रम की स्‍थिति पैदा न होने दे।
अब समस्‍या यह है कि प्रिंट मीडिया बेचारा खुद भ्रम का शिकार हो गया। भ्रम की स्‍थिति यह हो गई कि लोगों ने अखबार लेना बंद कर दिया इसलिए फिलहाल प्रिंट मीडिया अपने लिए फैले भ्रम को दूर करने में जुटा है।
खुद के लिए खुद के अखबार में विज्ञापन देकर रिक्‍वेस्‍ट करनी पड़ रही है कि ‘कोरोना से दूर रहिए, अखबार से नहीं’।
कर्मवीरों में शुमार ‘मीडिया हाउस’ इसके अलावा एक काम और कर रहे हैं। उन्‍होंने अखबार को काफी ‘स्‍लिम’ कर दिया है। 18-20-22 और 24 पन्‍नों वाले नामचीन अखबार इन दिनों 12 तथा 14 पन्‍नों तक सिमट कर रह गए हैं।
‘राष्‍ट्रहित’ को मद्देनजर रखते हुए हालांकि इन अखबारों की कीमत उतनी ही कायम रखी गई है जितनी कि सामान्‍य दिनों में रहती है। कुल मिलाकर अखबार के पन्‍ने कम हुए हैं, मूल्‍य नहीं। राष्‍ट्रधर्म ऐसे ही निभाया जाता है।
डिस्‍क्‍लेमर: यहां ‘मीडिया’ से तात्‍पर्य मालिकानों से है, न कि पत्रकारों से इसलिए पत्रकारगण ‘मीडिया’ को लेकर कही गई बातें अपने दिल पर ने लें।
बहरहाल, प्रधानमंत्री ने दानवीरों के साथ-साथ जिन कर्मवीरों से सहयोग मांगा था, उनमें मीडिया के अलावा डॉक्‍टर्स और पुलिसकर्मी प्रमुख थे।
उनका जिक्र अगले दिनों में क्‍योंकि लॉकडाउन चालू आहे, आज तो सिर्फ ‘चौथा’ दिन है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

सोमवार, 23 मार्च 2020

कोरोना: लड़ाई को कमजोर करने में लगे हैं लापरवाह और अफवाह फैलाने वाले तत्‍व

देश में कोरोना वायरस के संक्रमण की गति तेज होने लगी है। इस बीच कुछ लोग तमाम अपीलों और सुझावों को नजरअंदाज करते हुए लापरवाही की खौफनाक मिसाल पेश कर रहे हैं। कुछ जगहों पर तो लोगों ने रविवार को जनता कर्फ्यू की अपील की भी धज्जियां उड़ा दीं। आज लॉकडाउन के बीच कई जगह भीड़भाड़ की तस्वीरें आने लगीं हैं। इससे खफा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ट्वीट कर अपनी नाराजगी जाहिर की। आज जब Cornavirus से होने वाली Covid-19 महामारी से एकजुट होकर मुकाबला करने का वक्त है तो कुछ संदिग्ध अस्पताल से भाग रहे हैं तो कुछ ट्रेनों से यात्रा कर रहे हैं। कोविड-19 महामारी का दुनियाभर में मच रहे तांडव को देखकर भी लोग संभल नहीं रहे हैं। दुख की बात यह है कि ऐसे लोगों में बॉलिवुड की मशहूर हस्ती से लेकर जाने-माने नेता तक शामिल हैं।
आइए जानते हैं, अब तक सामने आई कुछ ऐसी बातें जो वाकई निराशाजनक हैं…
यूपी के कानपुर में सब्जी मंडी में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी जबकि शहर में 25 मार्च तक लॉकडाउन घोषित है।
दिल्ली से सटे नोएडा की तरफ जाने वाली गाड़ियों की कतार लग गई। आखिर पुलिस वालों को इन्हें रोकने की कोशिश करनी पड़ी।
22 मार्च को जनता कर्फ्यू के बावजूद दिल्ली के आलमी मरकज बंगले वाली मस्जिद में मुसलमानों का हुजूम उमड़ा। लोग एक-दूसरे को गले लगाते दिखे।
खचाखच भरी बस तो ऊपर चढ़े लोग
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद लोगों से अपील कर रहे हैं कि जो जहां हैं वहीं रहें क्योंकि उनकी यात्रा से खुद उन पर और दूसरों पर भी कोरोना के संक्रमण का खतरा बढ़ेगा लेकिन लोग यात्रा करने से नहीं बच रहे। बिहार के दरभंगा जा रही बस जब अंदर से खचाखच भर गई तो लोग ऊपर चढ़कर भी यात्रा करने से बाज नहीं आए।
दरअसल, लॉकडाउन के चलते फैक्ट्रियां समेत तमाम कारोबारी संस्थान बंद है। ऐसे में लोगों के पास काम नहीं बचा और वो गांव लौटने को उतावले हो गए हैं।
मूर्खों ने #covididiots टॉप ट्रेंड करवा दिया
ट्विटर पर ऐसे ही लोगों के लिए गुस्से का इजहार हो रहा है। मूर्खता दिखा रहे लोगों की तस्वीरें और वीडियोज शेयर कर रहे लोगों ने #covididiots टॉप ट्रेंड करवा दिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ऐसे लोगों के प्रति नाराजगी का इजहार किया 



अस्पताल से भाग रहे संदिग्ध
दिल्ली के लोकनयाक जयप्रकाश नारायण (LNGP) अस्पताल से 19 मार्च को कोरोना के छह संदिग्ध भाग गए। उन्हें अगले दिन उनके घरों से ढूंढकर अस्पताल लाया गया। 14 मार्च को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के एक सरकारी अस्पताल से कोरोना वायरस के तीन संदिग्ध बिना सूचना दिए भाग गए। इनमें दो महिलाएं भी शामिल थीं।
ट्रेनों से बेखौफ यात्रा कर रहे कोरोना से संदिग्ध
रेलवे ने बताया कि पिछले दिनों कोरोना वायरस के 12 मरीजों ने रेल यात्रा की। इससे उनके संपर्क में आने वाले लोगों में वायरस फैलने का खतरा पैदा हो गया
रेलवे के मुताबिक ये यात्राएं 13 से 16 मार्च के बीच की गई हैं। रेलवे के मुताबिक आंध्र प्रदेश संपर्क क्रांति ट्रेन में 13 मार्च को यात्रा करने वाले 8 लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए हैं।
जर्मनी-इटली से घूमकर आए, सबको किया संक्रमित
पंजाब के नवांशहर जिला स्थित पठलवा गांव के निवासी बल्‍देव सिंह की लापरवाही ने न केवल उनकी जान ले ली बल्कि परिवार के चार सदस्यों की जान को भी खतरे में डाल दिया। बल्देव अपने साथियों के साथ जर्मनी और इटली गए थे। उन सभी ने देश लौटने के बाद न अपनी जांच करवाई और न ही किसी तरह की सतर्कता बरती। बल्देव का कोविड-19 से 18 मार्च को देहांत हो गया। बल्देव के साथ जर्मनी और इटली गए संत गुरबचन सिंह आनंदपुर साहिब में होला मोहल्ला समारोह में भी शामिल हुए। उनके तीसरे साथी दलजिंदर सिंह विदेश से लौटकर लोगों से खूब घुलते-मिलते रहे। नतीजा है कि गांव के सरपंच भी संक्रमित हो गए हैं।
​​SP नेता रामाकांत यादव
समाजवादी पार्टी के नेता रामाकांत यादव ने तो हद कर दी। उन्होंने कोरोना को केंद्र की मोदी सरकार और बीजेपी की तरफ से उड़ाया गया अफवाह बता दिया।
उन्होंने कहा कि केंद्र एनआरसी, सीएए, एनआरपी, महंगाई जैसे मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए कोरोना का शोशा छोड़ दिया। उन्होंने यहां तक कहा कि अगर किसी को कोरोना है तो वह उसे गले तक लगाने को तैयार हैं।
उन्होंने कहा, ‘बड़ी शर्म है लगती है कि कोरोना के लिए इमर्जेंसी लगाई जा रही है।’ रामाकांत यादव के खिलाफ उचित धाराएं लगाकर मुकदमा दर्ज कर लिया गया है।
गायिका कनिका कपूर
बॉलिवुड की पार्श्व गायिका कनिका कपूर की लापरवाही तो बेहद शर्मनाक है। कनिका 9 मार्च को लंदन से मुंबई लौटीं, फिर फ्लाइट से 11 मार्च को लखनऊ गईं। वहां से कानपुर में अपने रिश्तेदार के घर चली गईं। 13 मार्च को दोबारा लखनऊ आईं। वह तीन पार्टियों में गईं, जहां करीब 160 लोग उनके संपर्क में आए थे। सांसद दुष्यंत सिंह भी एक पार्टी में उनके साथ थे जो संसद और राष्ट्रपति भवन गए। कनिका की रिपोर्ट पॉजिटिव पाई गई तो अस्पताल में भर्ती कराया गया जहां उन्होंने खूब नखरे दिखाए। आखिरकार स्वास्थ्यकर्मियों को उन्हें कहना पड़ा कि वो अस्पताल में खुद को सिलेब्रिटी की तरह नहीं, एक मरीज के तौर पर पेश हों।
फोन पर शेखी बघारता शख्स
एक व्यक्ति ने यह दावा किया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने भारत सरकार से खतरनाक कोरोना वायरस के चलते 15 अप्रैल से 15 जून तक देश को पूरी तरह से बंद कर देने की सिफारिश की है। फोन पर शेखी बघारते उसका ऑडियो वॉट्सऐप वायरल हो गया।
आखिरकार, केंद्र सरकार के जनसंपर्क कार्यालय को स्थिति स्पष्ट करनी पड़ी। उसने ट्वीट कर इस दावे को झूठ और फर्जी बताया।
झूठ बोला कि एनएसए लगा
कुछ ऐसे भी लोग हैं जो इस भयावह परिस्थिति में खुद और अपने परिवार की चिंता किए बिना ड्यूटी पर तैनात हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो ऐसे ‘कोरोना कमांडर्स’ के प्रति आभार जताने की जगह झूठ फैलाने में जुटे हैं। इन्हीं में एक निकला गुजरात का अभिमन्यु आचार्य। वह 21 मार्च को टोरंटो से आबू धाबी होते हुए भारत लौटा था। उसने दावा किया अहमदाबाद के सरदार वल्लभभाई इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उसकी कोई थर्मल स्क्रीनिंग नहीं हुई थी और उसे सिर्फ एक सेल्फ डेक्लेरेशन फॉर्म भरने को कहा गया था। हालांकि, एयरपोर्ट अथॉरिटी द्वारा शेयर किए गए सीसीटीवी फुटेज में उसका आरोप गलत निकला। अब गुजरात पुलिस ने इस अभिमन्यु के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत मामला दर्ज कर लिया है।
शाहीन बाग की जिद्दी औरतें
कोरोनो वायरस पर दिल्ली में लॉकडनाउन के बावजूद शाहीन बाग की जिद्दी औरतें धरने पर अड़ी हुई हैं। हालांकि उनकी जिद के कारण प्रदर्शनकारियों में मतभेद भी सामने आने लगे हैं। रविवार को जनता कर्फ्यू के दौरान प्रदर्शनकारी दो गुटों में बंट गए थे और उनके बीच मारपीट भी हुई थी। हालांकि, अब वहां से शिफ्टों में धरना देने की खबर आई है।

शुक्रवार, 20 मार्च 2020

अंतत: दोषी फांसी पर लटका दिए गए, लेकिन यक्ष प्रश्‍न अब भी कायम

अंतत: आज सुबह साढ़े पांच बजे ‘निर्भया’ के चारों दोषियों को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया, बावजूद इसके यक्ष प्रश्‍न अब भी बना हुआ है। हो सकता है कि इस प्रश्‍न का उत्तर फिलहाल मिले भी नहीं किंतु मिलना है बहुत जरूरी। जरूरी इसलिए है क्‍योंकि इससे एक पेशे की प्रतिष्‍ठा दांव पर लग गई और उसे दांव पर लगाने वालों को कोई अफसोस तक नहीं हुआ। दोषियों को उनकी सजा बेशक मिल गई किंतु उन अपराधियों का क्‍या, जिन्‍होंने एक घिनौने अपराध को अंजाम देने वालों के लिए कानून का मजाक बनाकर रख दिया। अब वह प्रश्‍न भी जान लें जो दोषियों की फांसी के बाद भी अनुत्तरित है।
प्रश्‍न यह है कि एक अत्‍यंत जघन्‍य अपराध को अंजाम देने वाले इन दोषियों के वकीलों को उनकी फीस कौन दे रहा था?
सब जानते हैं कि अत्‍यंत मामूली पारवारिक पृष्‍ठभूमि से आने वाले इन दोषियों की आर्थिक स्‍थिति किसी एक सामान्‍य वकील को भी फीस देने की नहीं है, फिर ‘बाल की खाल’ निकालने वाले वकीलों की फौज इन्‍हें कैसे उपलब्‍ध होती रही, और कौन यह फौज मुहैया कराता रहा ?
सत्र न्‍यायालय से लेकर उच्‍च और उच्‍चतम न्‍यायालय तक जिस तरह वकील इन चारों दोषियों के लिए कानूनी लड़ाई लड़े, वो बहुत कुछ कहती है।
ये लड़ाई एक ओर जहां बताती है कि न्‍याय की देवी की आंखों पर पट्टी बांधने का आशय क्‍या रहा होगा, वहीं इतना भी स्‍पष्‍ट करती है कि जो दिखाई देता है वही अंतिम सत्‍य नहीं होता।
बहरहाल, यक्ष प्रश्‍न एकबार फिर वहीं आकर खड़ा हो जाता है कि निर्भया के दोषियों को फांसी के फंदे से लौटाने की जिद पर अड़े वकीलों को “हायर” किया किसने ?
जिस देश की अधिकांश जेलें भीड़ से सिर्फ इसलिए भरी पड़ी हैं क्‍योंकि तमाम लोगों के पास अपने लिए वकील करने की सामर्थ्‍य नहीं है, उस देश में एक वीभत्‍स अपराध के दोषियों की पैरवी करने के लिए कुछ वकील दिन-रात एक किए रहे तो कैसे ?
यदि कोई ये कहे कि वकील इतना सब-कुछ केवल मानवता के नाम पर, या फिर बिना फीस लिए करते रहे तो ऐसी बात शायद ही किसी के भी गले उतरे।
जाहिर है कि कोई तो है जो एक असहाय लड़की के बलात्‍कारी हत्‍यारों को बचाने की मुहिम चला रहा था, और इस मुहिम का मकसद मात्र इन्‍हें बचाने का प्रयास करना नहीं बल्‍कि कानून-व्‍यवस्‍था पर हमेशा हमेशा के लिए गहरा सवालिया निशान लगवाना था।
संभवत: इसी मकसद की पूर्ति के लिए इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्‍टिस यानी ICJ तक गुहार लगाई गई।
ऐसे में इस प्रश्‍न का उत्तर जरूर मिलना चाहिए कि वकालत के जिस पेशे में निजी संबंधों का भी तरजीह बहुत “रेअर” दी जाती है, उस पेशे से जुड़े एक से एक काबिल लोग एक घृणित अपराध को अंजाम देने वालों के साथ इतनी सिद्दत के साथ कैसे खड़े रहे ? कौन इनके लिए फंडिंग कर रहा था, और क्‍यों?
इन प्रश्‍नों के जवाब मिलना इसलिए भी जरूरी हैं कि यदि इनके सही-सही जवाब मिल जाते हैं, तो देश की बहुत सी समस्‍याओं के जवाब खुद-ब-खुद सामने आ जाएंगे।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

समस्‍याओं का रोना रोते रह गए ‘अशोका हाइट्स’ के निवासी, और बात ध्‍वस्‍तीकरण तक जा पहुंची

JSR ग्रुप द्वारा मथुरा में गणेशरा रोड पर बनाई गई जिस ‘अशोका हाइट्स’ नामक बहुमंजिला बिल्‍डिंग की शिकायत लेकर आज वहां के निवासी दर-दर भटक रहे हैं, वह सिर्फ घटिया निर्माण या सुरक्षा, पार्किंग, पानी, बिजली, लिफ्ट इत्‍यादि समस्‍याओं तक सीमित नहीं है।
सच तो यह है कि ‘अशोका हाइट्स’ भ्रष्‍टाचार की बुनियाद पर खड़ी उन तमाम इमारतों का एक अदद उदाहरण है जिनके निर्माण में बिल्‍डर के साथ-साथ विकास प्राधिकरण, बैंकें, बिजली विभाग, फायर ब्रिगेड, ग्राम पंचायतें, नगर पालिका तथा नगर निगम जैसे अनेक विभाग संलिप्‍त रहे हैं और सभी ने मिलकर लोगों को लूटा है।
समस्‍याओं का रोना लेकर कभी बिल्‍डर और कभी डीएम के चक्‍कर काटने वाले ‘अशोका हाइट्स’ के निवासियों को तो शायद यह इल्‍म ही नहीं है कि अब उनकी बिल्‍डिंग के एक बड़े हिस्‍से को ध्‍वस्‍त करने की प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है।
आज सिंचाई विभाग के अफसर भले ही इस बात को स्‍वीकार कर रहे हों कि ‘अशोका हाईट्स’ के निर्माण में आगरा कैनाल की मथुरा एस्‍केप का काफी हिस्‍सा दबा लिया गया है परंतु वर्षों पहले इसी विभाग के अधिकारी शिकवा-शिकायतों के बावजूद तमाशबीन बने रहे।
तब किसी अधिकारी ने न तो सरकारी जमीन हड़पे जाने का विरोध किया और न अवैध निर्माण रोकने की कोई कोशिश की गई।
बात तत्‍कालीन सिंचाई मंत्री शिवपाल यादव तक भी पुहंची किंतु नतीजा कुछ नहीं निकला। हालांकि शिवपाल यादव ने कहा था सिंचाई विभाग की जमीन कब्‍जाने वाले भूमाफिया बख्‍शे नहीं जायेंगे।
बाद में पता लगा कि उस स्‍तर तक भी JSR ग्रुप ने सेटिंग कर ली और मामला रफा-दफा कराने में सफल रहा जबकि ‘लीजेण्‍ड न्‍यूज़’ ने 26 अक्तूबर 2012 को ही ”ध्‍वस्‍त होंगे अशोका हाइट्स के 90 फ्लैट्स!” शीर्षक से लिखी अपनी खबर में ”भूमाफिया, बिल्‍डर एवं सरकारी मशीनरी के इस गठजोड़ को सामने ला दिया था।
‘लीजेण्‍ड न्‍यूज़’ ने 7 साल पहले ही उजागर किया था कि ‘अशोका हाइट्स’ के पिछले हिस्‍से में बनाये जा रहे करीब 90 फ्लैट्स पूरी तरह अवैध हैं और इनके निर्माण में एक ओर जहां सिंचाई विभाग की जमीन का दुरुपयोग किया गया है वहीं दूसरी ओर ग्राम समाज की जमीन भी घेरी गई है।
इस मामले में जब ”लीजेण्‍ड न्‍यूज़” ने अशोका हाइट्स बनाने वाले ग्रुप JSR हाउसिंग एण्‍ड डेवलेपर्स प्राइवेट लिमिटेड से सफाई मांगी तो ग्रुप के एक हिस्‍सेदार ने स्‍वीकार किया कि पार्टनर्स के बीच असहमति के बावजूद ग्रुप में शामिल कुछ लोगों ने अवैध निर्माण करा दिया।
अवैध निर्माण कराने वाले हिस्‍सेदारों का तर्क था कि एकबार घर की बुकिंग से पैसा हाथ में आ जाने के बाद उसी पैसे के बल पर अधिकारियों से सब-कुछ कराया जा सकता है।
अशोका हाइट्स के अवैध निर्माण को मिले सरकारी संरक्षण का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि फ्लोर एरिया रेशियो (FAR) की बात तो दूर, फ्लैट्स के बाहर भी इतनी जगह नहीं छोड़ी गई कि किसी हादसे की स्‍थिति में फायर ब्रिगेड की कोई गाड़ी मूव कर सके।
रहा सवाल भूकंपरोधी तकनीक के इस्‍तेमाल और दूसरी उन सुविधाओं का जिनका प्रचार करके लोगों को आकर्षित किया गया तो उनका खुलासा निर्माण के चलते ही हो गया था तब हो गया था जब पता लगा कि सीमेंट तक ”मेजर प्‍लांट” की जगह ”मिनी प्‍लांट” का इस्‍तेमाल किया गया है जिससे केवल रेत के महल ही खड़े किये जा सकते हैं और जिनकी हाइट यहां बसने वालों के लिए मौत की हाइट से कम साबित नहीं होती।
आश्‍चर्य इस बात पर भी है कि विकास प्राधिकरण ने कैसे जिंदा मक्‍खी निगल ली, बैंकें क्‍यों आंख बंद करके फाइनेंस करती रहीं, ग्राम पंचायत तथा फायर ब्रिगेड ने एनओसी किस आधार पर दे दी। लोगों को लूटने का एक सुनियोजित षड्यंत्र इन सभी विभागों की नाक के नीचे रचा गया लेकिन किसी के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी।
बेशक इस ‘वेल प्‍लांड’ लूट के लिए वो लोग भी कम जिम्‍मेदार नहीं हैं जो बिल्‍डर्स के झांसे में आकर बिना कुछ देखे उन्‍हें पैसा थमा देते हैं।
इस संदर्भ में भी ‘लीजेण्‍ड न्‍यूज़” ने 21 अक्‍टूबर 2012 को ही एक चेतावनी भरा समाचार इस शीर्षक से लिखा था कि ‘सावधान ! अशोका सिटी व अशोका हाइट्स में मकान तो नहीं ले रहे?’ लेकिन तब खरीदारों ने समाचार पर गौर करना शायद जरूरी नहीं समझा।
आज स्‍थित यह है कि JSR ग्रुप के बैनर तले डैपियर नगर में अशोका टावर, गणेशरा रोड पर अशोका हाइट्स और गोवर्धन चौराहे के निकट नेशनल हाईवे पर अशोका सिटी बनाने वाला ग्रुप पूरी तरह बिखर चुका है। उसके सारे हिस्‍सेदार अपना-अपना पैसा नए बिल्‍डर से लेकर निकल चुके हैं। उनके बीच जो झगड़े थे, वो भी उन्‍होंने आपस में मिल-बैठकर सुलझा लिए हैं।
जिन सरकारी अधिकारियों ने JSR ग्रुप को अवैध निर्माण की खुली छूट दी थी, वो भी कहां से कहां पहुंच चुके हैं।
रह गए हैं तो केवल जगह-जगह धक्‍के खाने पर मजबूर भ्रष्‍टाचार की नींव पर खड़ी की गईं इन इमारतों के वाशिंदे जिनकी आज सुनवाई तक करने को कोई तैयार नहीं है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

बुधवार, 26 फ़रवरी 2020

अपहरण उद्योग के लिए ‘मथुरा’ में आपका स्‍वागत है, सफलता की गारंटी

महाभारत नायक योगीराज भगवान कृष्‍ण की पावन जन्‍मस्‍थली ‘मथुरा’ में अपहरण उद्योग संचालित करने के लिए आपका स्‍वागत है।
डॉ. निर्विकल्‍प अपहरण कांड की अपार सफलता के बाद यह विश्‍व प्रसिद्ध धार्मिक नगरी देशभर के पेशेवर, गैरपेशेवर अथवा अन्‍य सभी किस्‍म के सफेदपोश अपराधियों को अपने यहां आमंत्रित करती है।
पीपीपी (पुलिस, प्रेस, पॉलिटिशियन) मॉडल के तहत इस उद्योग में ‘सफलता’ की चिंता कतई न करें क्‍योंकि यहां ‘निर्विकल्‍प डॉक्‍टर्स’ की कोई कमी नहीं है।
यदि आप ‘निर्विकल्‍प’ के मायने न समझते हों तो पुलिस आपको समझा देगी। वैसे ‘निर्विकल्‍प’ एक विशेषण होता है जिसका शाब्‍दिक अर्थ है- ”सदा एक रस एवं एक रूप में रहने वाला”। निश्‍चल…स्‍थिर।
डॉ. निर्विकल्‍प ने अपहरण वाले दिन से लेकर अब तक अपने नाम को पूरी तरह सार्थक करते हुए मथुरा में अपहरण उद्योग का जो रास्‍ता दिखाया है, उसके लिए उनकी जितनी प्रशंसा की जाए वो कम है।
10 दिसंबर 2019 की रात 52 लाख रुपए की फिरौती देकर डॉ. निर्विकल्‍प जिस निश्‍चल एवं स्‍थिर भाव के साथ बिना विचलित हुए एकरसता पर कायम रहे, वह अपहृत तथा अपहरणकर्ताओं के लिए प्रेरणादायक है और आगे का मार्ग प्रशस्‍त करता है।
सर्वप्रथम तो उन्‍होंने एक ‘प्रशिक्षित अपहृत’ की तरह अपने चारों अपहरणकर्ताओं के हर आदेश-निर्देश का अनुपालन किया। फिर चंद घंटों में उन्‍हें बिना कोई तकलीफ पहुंचाए 52 लाख रुपए की ‘पोटली’ इस ‘कमिटमेंट’ सहित थमा दी कि शेष करीब 50 लाख रुपए वह तयशुदा समय पर पहुंचा देंगे।
कमिटमेंट के पक्‍के डॉ. निर्विकल्‍प बदमाशों का बकाया भी चुकता करने ही वाले थे कि किसी ने उनकी सुहृदयता का भांडा उच्‍च पुलिस अधिकारियों के सामने फोड़कर ‘पीपीपी प्रोजेक्‍ट’ को ‘अस्‍थायी ग्रहण’ लगा दिया।
इसके बावजूद देश के एक जिम्‍मेदार नागरिक का फर्ज निभाते हुए जब जरूरत पड़ी तब डॉ. निर्विकल्‍प ने पुलिस को सब-कुछ बताया किंतु साफ-साफ ये भी कह दिया कि वह इस ‘सौहार्दपूर्ण वारदात’ के संदर्भ में कोई कानूनी कार्यवाही अथवा एफआईआर लिखाने जैसी कवायद नहीं करेंगे।
यही नहीं, उनकी अपनी संस्‍था इंडियन मेडिकल एसोसिएशन IMA के स्‍थानीय पदाधिकारियों को भी उन्‍होंने दो टूक कहा कि वह अपने अपहरण कांड में संस्‍था की कोई मदद नहीं चाहते। हालांकि दूसरे कई अन्‍य डॉक्‍टर्स को उनका यह ‘निर्विकल्‍प व्‍यवहार’ नागवार गुजरा क्‍योंकि उन्‍हें अपनी फिक्र होने लगी।
उनकी फिक्र वो करें परंतु डॉ. निर्विकल्‍प मानते हैं कि भाग्‍यवान की कमाई में सबका हिस्‍सा होता है इसलिए उन्‍हें न बदमाशों से कोई परहेज है और न पुलिस से। जिस डॉक्‍टर को परहेज है, वो अपना इंतजाम करने के लिए स्‍वतंत्र है।
अब बात पहले ‘पी’ अर्थात पुलिस की
मथुरा पुलिस ने भी इस पूरे मामले में बिना किसी भय और द्वेष के स्‍थिर चित्त होकर अपने कर्म तथा धर्म का निर्वाह किया। इधर बदमाशों से पूरे 52 लाख रुपए जमा कराए और उधर डॉ. के सामने रख दिए। डॉ. ने जितने अपने समझकर उठा लिए, वह उठा लिए बाकी को पुलिस ने प्रसाद समझकर ग्रहण किया और फिर पद एवं गोपनीयता का मान रखते हुए बांटा।
प्रसाद से वंचित तबके द्वारा ‘रायता’ फैला देने पर अपनी ओर से पूरे दो महीने बाद एफआईआर लिखाई और प्रति बदमाश एक-एक लाख रुपए का इनाम भी घोषित किया।
कल इनमें से एक बदमाश को बुलाकर ‘प्रेस’ के सामने प्रस्‍तुत करते हुए बताया कि किस तरह वह पुलिस की झोली में 50 हजार रुपयों सहित आ टपका।
अधिकारियों ने पूरी हिम्‍मत के साथ पत्रकारों से यह भी कहा कि वह किसी किंतु-परंतु के फेर में नहीं पड़ेंगे और उनके किसी प्रश्‍न का उत्तर नहीं देंगे। जो बता रहे हैं, उसे ही अंतिम सत्‍य मान लिया जाए।
दस-दस हजार के इनामी बदमाशों को ठोकने के बाद गिरफ्त में लेने वाली पुलिस ने एक लाख के इस इनामी बदमाश को चार दिन पूरी मेहमान नवाजी से रखा और फिर बाइज्‍जत पेश कर दिया जिससे शेष तीन नामजद भी संदेश ग्रहण कर लें।
वो जान जाएं कि पुलिस को अपनी पीठ ठोकनी है, उन्‍हें नहीं ठोकना इसलिए बेझिझक जब चाहें तब और जहां चाहें वहां पुलिस की मदद ले सकते हैं।
रही बात थोड़ी बहुत रकम “बरामद” दिखाने की तो उसकी टेंशन न लें। वो भी आखिर में कोर्ट से रिलीज हो जानी है क्‍योंकि वहां बाजी पलटनी ही है।
दूसरे ‘पी’ यानी ‘प्रेस’ अथवा ‘मीडिया’ की भूमिका
कुछ मूर्ख टाइप के लोग इस पूरे प्रकरण में पत्रकारों की भूमिका पर सवाल खड़े कर रहे हैं। वो कह रहे हैं कि उन्‍हें कल प्रेस कांफ्रेस में कुछ तो सवाल दागने चाहिए थे। एक दिन पहले बिना कुछ पूछे-ताछे नवागत एसएसपी साहब की मेजबानी का लुत्फ उठा ही चुके थे, लिहाजा अब तो पूछ लेते कि ”रायता कैसे फैला” ?
इन लोगों को कौन समझाए कि पुलिस का चाय-नाश्‍ता हर किसी पत्रकार के नसीब में नहीं होता। जिनके नसीब में है, वो उसे क्‍यों छोड़ दें।
माना कि पुलिस को यदि बिना जवाब दिए ही समाचार छपवाना था तो वह विज्ञप्‍ति भेजकर भी छपवा सकती थी लेकिन समस्‍या यह है कि अब तक पुलिस ने विज्ञप्‍ति के साथ डिब्‍बा भेजने की रिवाज शुरू नहीं की है। ऐसे में पत्रकार प्रेस कांफ्रेंस अटेंड न करते तो चुहलबाजी करते हुए चाय-नाश्‍ते के आनंद से भी रह जाते।
तीसरे ‘पी’ पॉलिटिशियन
देखिए, इनके बारे में कुछ कहना या न कहना बराबर है। मथुरा में नेता नाम वाला जीव आपको चिराग लेकर ढूंढने से भी नहीं मिलेगा। जो हैं, वो या तो मंत्री हैं या फिर विधायक और सांसद।
आप अपनी गलतफहमी के लिए इन्‍हें जन-प्रतिनिधि मान सकते हैं किंतु सच तो यह है कि ये किसी के प्रतिनिधि नहीं हैं। हां, इनके अपने प्रतिनिधि जरूर हैं। मसलन सांसद प्रतिनिधि, विधायक प्रतिनिधि आदि-आदि।
ऐसे में इन्‍हें वही पता होता है जो इनके प्रतिनिधि बताते हैं, या फिर वो जो ये अपने प्रतिनिधि से जानना चाहते हैं।
यहां पक्ष-विपक्ष का सवाल मत उठाइएगा क्‍योंकि विपक्ष के लोगों का काम अगली सत्ता मिलने तक खुद को सुरक्षित रखना होता है। अपहरण जैसे ‘कामयाब उद्योग’ पर उंगली उठाना नहीं।
अपहरण उद्योग के फलने-फूलने में इनकी उतनी ही रुचि है जितनी डॉ. निर्विकल्‍प को फिरौती देकर छूट आने में, पुलिस को फिरौती की रकम का हिसाब रखने में और पत्रकारों को पन्‍ने काले करने में। इससे अधिक रुचि वह लें भी क्‍यों, उनकी भैंस किसी ने थोड़े ही खोल ली।
पुलिस ने लिखा-पढ़ी में एक पकड़ लिया है, तीन और भी ‘धीमे से’ इसी तरह पकड़ लेगी। फिर हिसाब बराबर करके दूसरी ओर देखेगी। मथुरा में ‘निर्विकल्‍पों’ की कोई कमी है क्‍या।
इंतजार करिए पुलिस की अगली प्रेस कांफ्रेंस का, हो सकता है तब तक ‘ठंडे पेय’ का मौसम आ जाए।


-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
http://legendnews.in/welcome-to-mathura-for-the-kidnapping-industry-success-is-guaranteed/

सोमवार, 24 फ़रवरी 2020

ये हैं डॉक्‍टर गौरव ग्रोवर IPS…नाम तो सुन ही लिया होगा ?

मथुरा। ये हैं डॉक्‍टर गौरव ग्रोवर… युवा IPS गौरव ग्रोवर…नाम तो सुन ही लिया होगा। डॉ. गौरव ग्रोवर को जिन परिस्‍थितियों में इस विश्‍वप्रसिद्ध धार्मिक जनपद के वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक का पदभार सौंपा गया है, न तो वह परिस्‍थितियां सामान्‍य हैं और न उनके पूर्ववर्ती पुलिस कप्‍तान शलभ माथुर का तबादला रूटीन ट्रांसफर-पोस्‍टिंग का हिस्‍सा था।
इन हालातों में गौरव ग्रोवर के सामने पूरे प्रदेश की न सही, लेकिन मथुरा जनपद की ‘खाकी’ पर लगे दागों का सच सामने लाने की चुनौती तो है ही।
एक ऐसी चुनौती जिस पर योगीराज श्रीकृष्‍ण की नगरी के लोगों का भरोसा भी टिका है।
माना कि मथुरा और आगरा से लेकर लखनऊ तक मचे हंगामे के बाद शलभ माथुर को यहां से रवाना कर दिया गया किंतु अभी वो तमाम पुलिस अधिकारी यहीं मौजूद हैं जिनके कारण पूरे महकमे को शर्मिंदगी उठानी पड़ रही है।
इसके अलावा अनेक ऐसे प्रश्‍न भी अपनी जगह खड़े हैं, जिनका उत्तर न मिला तो कानून-व्‍यवस्‍था से लोगों का विश्‍वास पूरी तरह उठ जाएगा।
डॉ. गौरव ग्रोवर कल पहली बार स्‍थानीय ‘मीडिया’ से मुख़ातिब हुए। इस अपनी पहली औपचारिक प्रेस वार्ता में उन्‍होंने जो कुछ कहा, वह सब-कुछ हर अधिकारी कहता है। लेकिन उन्‍होंने वो नहीं कहा, जिसे मथुरा की जनता सुनना चाहती थी। जिसकी उसे अपेक्षा थी।
नवागत वरिष्‍ठ पुलिस अधीक्षक ने उस सनसनीखेज वारदात का जिक्र तक नहीं किया, जिसमें मथुरा पुलिस पर न सिर्फ 40 लाख रुपए से अधिक की बड़ी रकम हड़प जाने का आरोप लगा है बल्‍कि चार अपहरणकर्ताओं को बिना कोई कानूनी कार्यवाही किए रिश्‍वत लेकर छोड़ देने का भी संगीन आरोप है।
आईजी ए. सतीश गणेश की जांच के बाद मशहूर ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. निर्विकल्‍प अग्रवाल के अपहरण और उनसे 52 लाख रुपए की फिरौती वसूलने का यह मामला भले ही थाना हाईवे पुलिस ने अपनी ओर से पूरे दो महीने बाद दर्ज कर लिया हो परंतु नतीजा अब तक शून्‍य है।
चारों नामजद बदमाशों के खिलाफ भारी-भरकम इनाम घोषित कर दिए जाने के बावजूद, वह फिलहाल पुलिस की पकड़ से दूर हैं।
विभागीय कार्यवाही के नाम पर हुआ है तो मात्र इतना कि थाना हाईवे के तत्‍कालीन प्रभारी और डॉ. निर्विकल्‍प अपहरण व फिरौती कांड के वादी इंस्‍पेक्‍टर जगदंबा सिंह को निलंबित कर दिया गया और सीओ रिफाइनरी को हटा दिया गया जबकि इस पूरे खेल में कई अन्‍य पुलिस अधिकारियों की भूमिका भी सामने आ चुकी है।
अपहरण और फिरौती के बाबत डॉ. निर्विकल्‍प की स्‍वीकारोक्‍ति के आधार पर लिखी गई एफआईआर बताती है कि पूरा खेल कितनी प्‍लानिंग के साथ किया गया।
इस प्‍लानिंग का पता लगाए बिना सच सामने आना मुश्‍किल होगा क्‍योंकि डॉ. निर्विकल्‍प ने बेशक 52 लाख रुपए की फिरौती देना स्‍वीकार किया है परंतु पुलिस ने कुछ स्‍वीकार नहीं किया।
आईजी की जांच रिपोर्ट बताती है कि मथुरा पुलिस ने अपने बयानों में सिर्फ दो बातें स्‍वीकार की हैं। पहली ये कि उसे डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण और उनसे फिरौती वसूलने की जानकारी थी तथा दूसरी ये कि अपहरणकर्ता चार बदमाशों में से एक बदमाश को वह मेरठ से पकड़ कर लाई थी, जिसे डॉ. द्वारा एफआईआर कराने से इंकार करने के कारण छोड़ दिया गया।
मथुरा पुलिस ने अपने उच्‍चाधिकारियों को न तो ये बताया कि पकड़े गए बदमाश से उसने क्‍या बरामद किया, और न यह जानकारी दी कि पूरे घटनाक्रम में किस-किस की कितनी तथा क्‍या भूमिका रही।
ऐसे में सबसे महत्‍वपूर्ण सवाल यह हो जाता है कि पुलिस की जांच चल भी रही है या नहीं, और चल रही है तो किस दिशा में चल रही है ?
दरअसल, पुलिस की जांच की ‘दिशा’ ही इस संगीन वारदात की ‘दशा’ तय करेगी क्‍योंकि बदमाशों को पकड़ लेने भर से इसका खुलासा होने वाला नहीं है। इसका पूरा खुलासा तभी हो पाएगा जब फिरौती की पूरी रकम बरामद करने के साथ-साथ खाकी की संलिप्‍तता का भी ईमानदारी से खुलासा किया जाए और बदमाशों के साथ-साथ अधिकारी भी जेल भेजे जा सकें।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी

गुरुवार, 20 फ़रवरी 2020

डॉ. निर्विकल्‍प अपहरण कांड: एक नहीं दो डॉक्‍टर का हुआ था अपहरण, दोनों से वसूली गई फिरौती, साथी डॉ. ही मास्‍टर माइंड

मथुरा। शहर के मशहूर ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. निर्विकल्‍प अग्रवाल के अपहरण से जुड़े सनसनीखेज खुलासे ने लोगों के होश उड़ा दिए हैं।
दरअसल, डॉ. निर्विकल्‍प का अपहरण करने से कुछ दिन पहले इन्‍हीं बदमाशों ने एक अन्‍य प्रसिद्ध डॉक्‍टर को अगवा कर उनसे एक करोड़ रुपए की फिरौती वसूली थी।
चौंकाने वाली बात यह है कि दोनों डॉक्‍टर के अपहरण में इनके ही साथी एक ऐसे डॉक्‍टर का नाम सामने आया है, जो न केवल पूरे घटनाक्रम का सूत्रधार है बल्‍कि रहनुमा भी बना हुआ है।
बताया जाता है कि डॉ. निर्विकल्‍प के चारों नामजद अपहरणकर्ता पूरे समय जिस पांचवें शख्‍स से फोन पर संपर्क में थे, वह पांचवां शख्‍स ही मास्‍टरमाइंड डॉक्‍टर है जिसने एक-एक करके दोनों डॉक्‍टर के अपहरण का प्‍लॉट तैयार किया था।
चूंकि फिलहाल चारों नामजद आरोपी पुलिस की पकड़ से दूर हैं इसलिए पूरी सच्‍चाई सामने आना मुश्‍किल है, लेकिन पुलिस यदि उनकी पुरानी ‘कॉल डिटेल’ पर भी काम कर ले तो उसे बड़ी उपलब्‍धि हासिल हो सकती है।
इस केस का एक सर्वाधिक रोचक पहलू यह है कि अपहृत किए गए दोनों डॉक्‍टर तथा अपहरण के सूत्रधार डॉक्‍टर सहित एक नामजद बदमाश का संबंध भी गेटबंद पॉश कॉलोनी ‘राधापुरम एस्‍टेट’ से ही जुड़ रहा है।
गौरतलब है कि डॉ. निर्विकल्‍प अपने परिवार सहित राधापुरम एस्‍टेट में रहते हैं जबकि इनसे पूर्व जिस डॉक्‍टर को अगवा कर बदमाश एक करोड़ रुपए की फिरौती वसूलने में सफल रहे थे, वो भी राधापुरम एस्‍टेट के ही निवासी हैं।
इसके अलावा इन दोनों डॉक्‍टरों को अगवा कराने वाले डॉक्‍टर साहब भी राधापुरम एस्‍टेट में ही रह रहे हैं।
इसमें एक इत्तेफाक यह भी जुड़ रहा है कि तीनों डॉक्‍टर नेशनल हाईवे अथवा उसके लिंक रोड पर प्रेक्‍टिस करते हैं। यानी इनके चिकित्‍सा संस्‍थान भी उसी एक दायरे में हैं, जहां घटना स्‍थल है।
कुल मिलाकर इन डॉक्‍टर्स के घर ही नहीं, व्‍यावसायिक ठिकाने भी हाईवे थाना क्षेत्र में आते हैं।
उल्‍लेखनीय है कि डॉ. निर्विकल्‍प की फिरौती जिस स्‍थान पर वसूली गई और जिसका पुलिस ने बाकायदा अपनी एफआईआर में जिक्र भी किया है, वह ”सिटी हॉस्‍पीटल” भी नेशनल हाईवे की सर्विस रोड पर है तथा हाईवे थाना क्षेत्र में पड़ता है।
अब यदि बात करें नामजद बदमाशों की तो 11 फरवरी 2020 की रात हाईवे थाना पुलिस द्वारा लिखाए गए डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण मामले का एक नामजद अभियुक्‍त अनूप पुत्र जगदीश निवासी ग्राम कौलाहार थाना नौहझील मथुरा, काफी समय तक राधापुरम एस्‍टेट में किराए पर रहा था। यहां रहकर उसने कॉलोनी के कई लोगों से अपने अच्‍छे ताल्लुकात बना लिए थे।
यहां से निकलने के बाद भी अनूप गणेशरा रोड स्‍थित एक अन्‍य कॉलोनी में रहने लगा, जिससे उसका राधापुरम एस्‍टेट तक आना-जाना लगा रहता था।
अपहरण कराने के पीछे की कहानी
कुछ दिनों के अंतराल पर दो नामचीन डॉक्‍टरों का उनके ही किसी साथी डॉक्‍टर द्वारा अपहरण कराकर मोटी फिरौती वसूलने की कहानी भी किसी फिल्‍मी पटकथा जैसी है।
इस कहानी के अनुसार डॉ. निर्विकल्‍प का अपहरण कराने से पहले जिस डॉक्‍टर का अपहरण कराकर फिरौती वसूली गई थी, उन डॉक्‍टर और मास्‍टरमाइंड डॉक्‍टर के बीच पूर्व में व्‍यावसायिक रिश्‍ते थे।
इन रिश्‍तों में दरार आई तो कुछ हिसाब-किताब बाकी रह गया। पहले राजी-खुशी हिसाब करने के प्रयास हुए लेकिन जब बात नहीं बनी तो टेढ़ी उंगली से चार गुना घी निकाल लिया गया।
बताया जाता है कि इस मामले में बड़े आराम से फिरौती हजम हो गई इसलिए बदमाशों के मुंह भी खून लग चुका था।
बदमाशों ने अपनी आदत के मुताबिक अब अपहरण कराने वाले डॉक्‍टर से कोई दूसरा मुर्गा बताने को दबाव बनाना शुरू कर दिया।
मास्‍टरमाइंड डॉक्‍टर को डॉ. निर्विकल्‍प की कमजोरी पता थी, और वह यह भी जानता था डॉ. निर्विकल्‍प दूसरे डॉक्‍टर्स की अपेक्षा काफी सज्‍जन व्‍यक्‍ति हैं।
डॉ. निर्विकल्‍प की इसी कमजोरी का लाभ उठाकर उनके साथी डॉक्‍टर ने उन्‍हें टारगेट बनवाया और इसमें भी सफलता हाथ लगी।
पुलिस तक बात पहुंची कैसे
दो डॉक्‍टर्स का अपहरण कर इत्‍मीनान से मोटी रकम हड़पने वाले बदमाशों के हाथ तो जैसे कोई खजाना लग गया था। उन्‍होंने अपना इस्‍तेमाल करने वाले डॉक्‍टर साहब का पीछा इसके बाद भी नहीं छोड़ा।
व्‍यावसायिक रिश्‍तों का हिसाब बदमाशों के जरिए कराने वाले डॉक्‍टर के लिए अब ये बदमाश ही मुसीबत बन चुके थे लिहाजा डॉक्‍टर साहब ने इसका भी रास्‍ता निकाला।
काम आए पुलिस और मास्‍टरमाइंड डॉक्‍टर के गहरे संबंध
पुलिस के ही सूत्र बताते हैं कि दो डॉक्‍टरों का अपहरण कराकर अच्‍छी-खासी फिरौती दिलवाने वाले डॉक्‍टर के पुलिस, और विशेषकर इलाका पुलिस से बहुत मधुर संबंध रहते हैं।
इसे यूं भी समझ सकते हैं कि पुलिस से गहरी पैठ बनाकर रखने वालों में टॉप पर इस डॉक्‍टर का नाम शामिल है क्‍योंकि दोनों के हित एक-दूसरे से जुड़े हैं।
बस, इन्‍हीं संबंधों को फायदा उठाकर डॉक्‍टर ने इलाका पुलिस के जरिए ही आगरा में बैठे अधिकारियों तक डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण और फिरौती की बात पहुंचवाई।
सच तो यह है कि मास्‍टरमाइंड डॉक्‍टर को मालूम था कि डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण और लाखों रुपए की फिरौती के बंदरबांट में कुछ पुलिसकर्मी खाली हाथ रह गए हैं इसलिए वह उच्‍च अधिकारियों तक बात पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ने वाले।
बताते हैं कि डॉ. और इन पुलिसकर्मियों को इस बात का भी इल्‍म था कि मथुरा पुलिस के अधिकारियों एवं आगरा में बैठे उच्‍च पुलिस अधिकारियों की बन नहीं रही इसलिए आगरा में बैठे अधिकारी मामले की गंभीरता को समझने में पूरी रुचि लेंगे।
डॉ. निर्विकल्‍प ने किसी को नहीं बताई अपने अपहरण की बात
पुलिस के ही सूत्र बताते हैं कि डॉ. निर्विकल्‍प ने अपने किसी साथी या आईएमए के पदाधिकारी को भी अपने अपहरण की बात नहीं बताई क्‍योंकि वह तो किसी भी तरह इसे भूल जाना चाहते थे। तब भी नहीं जब बदमाशों ने उन्‍हें फिर से फोन करना शुरू कर दिया था।
डॉक्‍टर निर्विकल्‍प यदि इतनी हिम्‍मत कर लेते तो सबसे पहले पुलिस को ही बताते क्‍योंकि उन्‍हें अपहरण कराने वाले अपने साथी डॉक्‍टर तथा पुलिस के बीच की ट्यूनिंग का कुछ पता नहीं था।
आईएमए के किसी पदाधिकारी डॉक्‍टर के माध्‍यम से डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण की बात पुलिस तक पहुंचने की कहानी में इसलिए दम नहीं है क्‍योंकि जब डॉक्‍टर निर्विकल्‍प ही अपने साथ हुई घटना के बारे में पुलिस को नहीं बताना चाहते थे तो उनकी मर्जी के बिना आईएमए का कोई पदाधिकारी पुलिस को उनके साथ हुई घटना की जानकारी क्‍यों देगा।
अगर ये मान भी लिया जाए कि डॉ. निर्विकल्‍प ने दोस्‍ती या निजी संबंधों की खातिर आईएमए के किसी पदाधिकारी को जानकारी दी तो एसोसिएशन का जिम्‍मेदार पदाधिकारी होने के नाते वह पहले यह बात आईएमए के ही प्लेटफार्म पर रखते। फिर आईएमए जो भी निर्णय लेती, सभी के हित में ही लेती।
पहले भी खेल करते रहे हैं मथुरा के कुछ डॉक्‍टर
अपनी जान छुड़ाने को साथी डॉक्‍टरों से चौथ वसूली कराने का मथुरा के कुछ डॉक्‍टर्स का खेल पुराना है।
मशहूर फिजीशियन डॉ. उमेश माहेश्‍वरी के अपहरण का किस्‍सा जिन्‍हें मालूम है, वो भली-भांति जानते हैं कि उसमें मथुरा के दो पुलिस अधिकारी दिल्‍ली में बंद एक कुख्‍यात बदमाश से पूछताछ करने गए थे।
उस बदमाश ने तब स्‍पष्‍ट कहा था कि डॉ. उमेश माहेश्‍वरी के अपहरण से तो उसका कोई लेना-देना नहीं है अलबत्ता वो मथुरा के अन्‍य कई डॉक्‍टर्स से बराबर चौथ वसूली करता रहता है। बाहर होता है तो खुद वसूली करने जाता है, और अंदर होने पर अपने किसी गुर्गे को भेजता है।
उस बदमाश ने मथुरा पुलिस को बाकायदा कैमरे के सामने बताया कि वह कृष्‍णा नगर के एक नर्सिंगहोम संचालक डॉक्‍टर से नियमति तौर पर वसूली करता है।
उसने यह भी बताया कि इस नर्सिंग होम संचालक ने कई बार उसे दूसरे डॉक्‍टर्स को भी निशाना बनवाया है, और खुद मध्‍यस्‍थता करके अच्‍छे पैसे दिलवाए हैं।
इस कुख्‍यात गैंगेस्‍टर ने तब इस बात का भी खुलासा किया था कि कोड वर्ड्स के रूप में वह उधार की रकम चुकाने को कहता है जिससे किसी को कोई शक न हो।
तब उस बदमाश के गैंग ने इस नर्सिंग होम संचालक डॉक्‍टर के माध्‍यम से करीब एक दर्जन डॉक्‍टरों को निशाना बनाया था।
इस बदमाश की हत्‍या हो जाने के बाद कुछ समय के लिए यह सिलसिला थमा किंतु अब लगता है कि उसके गैंग को पुराना घर दिखा दिया गया है।
जहां तक सवाल है डॉ. निर्विकल्‍प के अपहरण और फिरौती के केस को पुलिस द्वारा अपनी ओर से दर्ज कर लेने का, तो उसमें कुछ होता दिखाई नहीं दे रहा।
एफआईआर दर्ज हुए एक सप्‍ताह से ऊपर का समय बीत गया लेकिन पुलिस किसी स्‍थानीय नामजद तक भी नहीं पहुंच सकी है जबकि यही पुलिस पूर्व में मेरठ निवासी एक बदमाश को तत्‍काल उठा लाई थी।
पुलिस ने अब तक किया है तो सिर्फ इतना कि चारों नामजद आरोपियों पर पचास-पचास हजार का ईनाम घोषित कर दिया है।
कल को यदि इनमें से कोई पुलिस के हत्‍थे चढ़ भी जाता है तो कौन गवाही देगा और कहां से सबूत मिलेंगे। थोड़े-बहुत रुपए बरामद दिखाकर किसी को जेल भेजा गया तो उसे जमानत मिलने में कोई असुविधा नहीं होगी।
डॉ. निर्विकल्‍प कुछ बोलने से रहे, क्‍योंकि उन्‍हें कुछ बोलना ही नहीं है। जिन डॉक्‍टर साहब को पुलिस तक बात पहुंचाने का श्रेय दिया जा रहा है, वह बोलने क्‍यों लगे।
पुलिस की इसे खोलने में पहले ही कोई रुचि नहीं है। बदमाश अपना जुर्म कबूल कर लें, यह हो नहीं सकता।
ऐसे में होगा तो केवल इतना कि इस तरह की कहानियां आगे भी दोहराई जाती रहेंगी। कुछ अंतराल के बाद कोई तीसरा डॉक्‍टर बदमाशों का, या यूं कहें कि अपने ही हमपेशा का शिकार बनेगा। और यह सिलसिला तब तक नहीं थमेगा, जब तक खुद डॉक्‍टर आगे आकर इसे रोकने का प्रयास नहीं करते।
जब तक वो अपने बीच मौजूद ऐसे तत्‍वों को चिन्‍हित कर उनके खिलाफ कठोर कदम नहीं उठाते।
आईएमए हो या नर्सिंग होम ऐसोसिएशन, अथवा डॉक्‍टरों की कोई अन्‍य संस्‍था हो, सबको सोचना होगा कि कोई भी संस्‍था मात्र जिंदाबाद-मुर्दाबाद करने के लिए नहीं होती।
उसे खड़ा करने के पीछे जो उद्देश्‍य होते हैं, उनमें ऐसे डॉक्‍टर्स पर भी कार्यवाही करने का मकसद निहित होता है जो किसी भी तरह इस पवित्र पेशे को अपनी आपराधिक प्रवृत्ति से कलंकित करने का काम करते हैं।
– सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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