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शुक्रवार, 24 सितंबर 2021
मुफ़्त के माल पर कई विभाग कर रहे हैं हाथ साफ, 4 की जगह 14 यूनिट… फर्जी राशन कार्ड… रबर के अंगूठे और डिजिटल हेराफेरी
महामारी के दौर में सरकार द्वारा गरीबों की भलाई के लिए शुरू की गई मुफ़्त राशन बांटने की योजना न केवल राशन माफिया के लिए वरदान साबित हो रही है बल्कि इससे कई विभागों की तो जैसे लॉटरी निकल पड़ी है और इन विभागों में बेठे भ्रष्टाचारियों के वारे-न्यारे हो चुके हैं।यही कारण है कि आए दिन मुफ़्त के इस माल का बीच सड़क पर बंटरबांट होने के बावजूद किसी के कानों पर जूं नहीं रेंग रही और सब-कुछ बड़े इत्मीनान से चल रहा है।
यूं तो सरकारी राशन में घपला और घोटाला किया जाना कोई नई बात नहीं है किंतु कोरोना काल में जब से सरकार ने मुफ़्त राशन बांटने की योजना शुरू की है, तब से राशन माफिया की चांदी ही चांदी हो रही है।
मुफ़्त के इस सरकारी माल पर हाथ साफ करने का कारनामा जाहिर है कि जिला आपूर्ति विभाग की मिलीभगत के बिना संभव नहीं हो सकता इसलिए राशन माफिया सर्वाधिक सक्रिय यहीं रहता है।
फर्जी राशन कार्ड से प्रारंभ होने वाला यह खेल यूनिट बढ़ाने तथा रबर के अंगूठे इस्तेमाल करने के कारनामे से होता हुआ डिजिटल हेराफेरी पर जाकर भ्रष्टाचार की ऐसी ठोस बुनियाद बनाता है जिसके जरिए पांचों उंगलियां घी में और सिर कड़ाही में का मुहावरा चरितार्थ होते देर नहीं लगती।
विभागीय सूत्र बताते हैं 4 यूनिट के राशन पर 14 यूनिट का माल हड़पने के लिए एक ओर जहां रबर के अगूंठों का इस्तेमाल किया जाता है वहीं दूसरी ओर कंप्यूटर के डेटा में भी हेराफेरी की जाती है।
इस पूरे खेल की तह में जाने पर मिली जानकारियां इतनी चौंकाने वाली हैं कि किसी को भी आसानी से भरोसा नहीं हो सकता।
चूंकि राशन हड़पने की सारी प्रक्रिया जिला आपूर्ति विभाग से शुरू होकर यहीं खत्म होती है इसलिए बात चाहे ‘मुखबिरी’ की हो या बंटवारे की, इस विभाग की संलिप्तता के बिना संभव नहीं।
जिला आपूर्ति कार्यालय से सर्वप्रथम कुछ खास तत्वों को ये सूचना लीक की जाती है कि किस गोदाम से कितना फर्जी राशन किस जिले पहुंचाया जा रहा है। फिर वो तत्व पुलिस के सहयोग से बीच सड़क पर घेराबंदी करके माल ले जाने वाले से सौदेबाजी करते हैं।
बताया जाता है कि हर महीने इस तरह लाखों रुपए की अतिरिक्त कमाई की जाती है और सारे ”मौसेरे भाई” अपना-अपना किरदार बड़ी चालाकी से निभाते हुए सरकार को बेखौफ होकर चूना लगा रहे हैं।
सूत्रों के मुताबिक इस पूरे भ्रष्टाचार का सबसे बड़ा हिस्सा जिला आपूर्ति कार्यालय हड़पता है। उसके बाद नंबर आता है माल की घेराबंदी करने वालों का और इलाका पुलिस का। कहीं-कहीं इस बंदरबांट में उच्च पुलिस एवं प्रशासनिक अधिकारी भी शामिल होते हैं क्योंकि पकड़े जाने पर लीपापोती करने में उनकी भूमिका अहम साबित होती है।
विभागीय सूत्र ही बताते हैं कि मुफ़्त के राशन में हो रहे भारी भ्रष्टाचार का आलम यह है कि इसे पकड़ने के लिए किसी ‘रॉकेट साइंस’ की जरूरत नहीं है। सरकार चाहे तो सिर्फ किसी भी राशन डीलर के क्षेत्र से कुल यूनिट्स और जिला आपूर्ति कार्यालय में दर्ज उसके टोटल यूनिट्स का मिलान करा ले।
सूत्रों का दावा है कि मात्र इतने भर से राशन माफिया का पूरा काला चिठ्ठा जांच एजेंसी के सामने होगा, और सामने होंगे वो सभी सफेदपोश अधिकारी जो यदा-कदा इसकी अवैध बिक्री में लिप्त प्यादों को पकड़कर वजीर को बचाने का काम करते हैं ताकि मुफ़्त के माल पर हाथ साफ करने की प्रक्रिया अनवरत जारी रहे।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
शनिवार, 4 सितंबर 2021
नामचीन खिलाड़ियों की पैसे और शोहरत के लिए “विराट भूख” आखिर कहां जाकर खत्म होगी?
आज ऐसे समय जबकि टोक्यो पैरालंपिक में हमारे खिलाड़ी अपने बेहतरीन प्रदर्शन से देश का नाम ऊंचा कर रहे हैं, ये सवाल एक ओर जहां दिलो-दिमाग में हलचल पैदा करता है वहीं दूसरी ओर मन को दुखी भी करता है किंतु सवाल लाज़िमी है।
सवाल यही है कि पैसे और शोहरत के लिए नामचीन खिलाड़ियों की “विराट भूख” आखिर कहां जाकर खत्म होगी?
दरअसल 02 सितंबर को खबर आई कि भारतीय क्रिकेट कप्तान विराट कोहली ने अपने इंस्टाग्राम पर जो एक पोस्ट शेयर किया, उसे लेकर देश की विज्ञापन नियामक एडवरटाइजिंग स्टैंडर्ड काउंसिल ऑफ इंडिया (ASCI) की ओर से उन्हें नोटिस भेजा गया है। हालांकि ASCI का नोटिस मिलने के बाद कोहली ने अपनी इंस्टा पोस्ट एडिट कर दी थी।
यहां यह जान लें कि सोशल मीडिया साइट पर जिन सेलिब्रिटी के बहुत से फ़ॉलोअर होते हैं, वह अपने चाहने वालों को प्रभावित करने के लिए पोस्ट डालते हैं। इसे इनफ्लुएंसर मार्केटिंग कहते हैं। अपने प्रशंसकों तक इस तरह की एक मार्केटिंग पोस्ट पहुंचाने के लिए विराट कोहली को करीब “पांच करोड़” रुपये मिलते हैं।
इंस्टा पर यूनिवर्सिटी की तारीफ
विराट कोहली ने पिछले 27 जुलाई को अपने इंस्टाग्राम पर एक मार्केटिंग पोस्ट डाली। तीन फोटो की यह पोस्ट एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी के उन छात्रों के बारे में है जो टोक्यो ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। पहले फोटो में विराट ने लिखा, “टोक्यो ओलंपिक में भारत की ओर से भेजे गए कुल खिलाड़ियों में से 10 फ़ीसदी इसी यूनिवर्सिटी से हैं। यह एक रिकॉर्ड है। उम्मीद करता हूं कि इस यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट भारतीय क्रिकेट टीम का भी हिस्सा बनेंगे।”
ASCI का नोटिस
अगली दो फोटो में यूनिवर्सिटी का पोस्टर था। इनमें उन 11 खिलाड़ियों के नाम थे जो टोक्यो ओलंपिक के दौरान भारतीय दल का हिस्सा रहे। कोहली ने अपनी इस इंस्टा पोस्ट में यूनिवर्सिटी का नाम भी मेंशन किया। यह वास्तव में एक पेड पोस्ट थी, और इसे ही इनफ्लुएंसर मार्केटिंग कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि क्रिकेटर विराट कोहली ने इंस्टाग्राम पर इस पोस्ट को डालने के लिए यूनिवर्सिटी से पैसे लिए हैं। इसके बाद कोहली को ASCI ने नोटिस भेज दिया।
विज्ञापन की गाइडलाइन्स
ASCI की गाइडलाइन्स के मुताबिक सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर ने अगर कोई पेड पोस्ट डाली है, तो उन्हें अपने फ़ॉलोअर को यह बताना होगा कि यह पोस्ट विज्ञापन कैंपेन का हिस्सा है। विराट कोहली ने यूनिवर्सिटी वाली पोस्ट में कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं किया था। इसी वजह से कोहली को ASCI का नोटिस भेजा गया। ASCI के नोटिस के बाद कोहली ने इंस्टा पोस्ट को एडिट कर उसमें पार्टनरशिप का टैग लगा दिया।
विराट कोहली की वर्तमान कुल संपत्ति
जानकारी के अनुसार विराट कोहली की वर्तमान कुल संपत्ति एक हजार करोड़ रुपए से अधिक है और महज विज्ञापनों के जरिए वह लगभग 200 करोड़ रुपए सालाना अर्जित करते हैं।
इसके अलावा विराट कोहली चूंकि भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान हैं इसलिए उन्हें बीसीसीआई से ग्रेड A मिला हुआ है। यानी वो A ग्रेड के खिलाड़ी हैं। ऐसे में विराट को 7 करोड़ रुपये प्रति वर्ष सैलरी के रूप में प्राप्त होता है। उन्हें 1 टेस्ट मैच खेलने के लिए 15 लाख, 1 वनडे खेलने के लिए 6 लाख और एक टी20 मैच खेलने के लिए 3 लाख रुपयों की राशि दी जाती है। इस तरह विराट कोहली के वेतन आंकड़ा प्रति वर्ष लगभग 24 करोड़ रुपए बैठता है।
आईपीएल से भी करोड़ों कमाते हैं कोहली
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार विराट कोहली अब IPL में महेंद्र सिंह धोनी से भी ज्यादा फीस ले रहे हैं। रॉयल चैलेंजर्स बेंगलुरु के कप्तान विराट कोहली सैलरी के मामले में एमएस धोनी से आगे निकल गए हैं। कोहली को जहां साल में 15 करोड़ रुपए मिलते हैं, वहीं धोनी को 12.5 करोड़ ही मिल रहे हैं। ऐसे में विराट करोड़ों रुपए अतिरिक्त केवल आईपीएल से कमा लेते हैं।
इतना सब होने के बावजूद विराट कोहली द्वारा पंजाब की लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी के विज्ञापन वाली पोस्ट को ASCI की गाइडलाइन्स के खिलाफ जाकर पोस्ट करना, यह जाहिर करता है कि वो अपनी इस कमाई को छिपाना चाहते थे। सीधे अर्थों में कहें तो वो इस कमाई पर बनने वाले सरकारी टैक्स को चुराने की मंशा रखते थे। ये बात अलग है कि ASCI से नोटिस मिलने के बाद उन्होंने न सिर्फ अपनी पोस्ट डिलीट कर दी, बल्कि उसमें पार्टनरशिप का टैग भी लगा दिया।
भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान कोहली अकेले ऐसे खिलाड़ी नहीं है जिनकी “विराट भूख” चर्चा का विषय बनी हो। पूर्व कप्तान महेंन्द्र सिंह धोनी से लेकर भारत रत्न सचिन तेंदुलकर तक तमाम ऐसे क्रिकेटर हैं जो अन्य स्त्रोतों से अपनी कमाई के कारण विवादों में रहे हैं।
जिन सचिन तेंदुलकर को तत्कालीन केंद्र सरकार ने नियम बदलकर ‘भारत रत्न’ जैसे देश के सर्वोच्च सम्मान से नवाजा, वो भी आज तक पैसों की खातिर किसी भी चैनल पर निजी विज्ञापन करते देखे जा सकते हैं। वो भी तब जबकि टीवी पर दिखाए जाने वाले अधिकांश विज्ञापन भ्रामक होते हैं और उनका बड़ी हस्तियों से प्रचार कराने के पीछे एकमात्र मकसद 135 करोड़ लोगों को गुमराह करके अपना उत्पाद बेचना होता है।
महेन्द्र सिंह धोनी तो कई विवादित कंपनियों का विज्ञापन करने, साथ ही उनमें अपना पैसा निवेश करने के लिए भी जाने जाते हैं। अपनी व्यावसायिक बुद्धि से वह इन कंपनियों से दोहरी कमाई करते हैं। यही कारण है कि उनके ऊपर इन कंपनियों को लेकर उंगलियां ही नहीं उठीं, केस तक दर्ज हुए।
पैसों के लिए हवस की हद तक जाने वाले ये खिलाड़ी शोहरत के भी उतने ही भूखे हैं और इसलिए वह ऐसा कोई मौका नहीं छोड़ते जिनसे उन्हें सस्ती लोकप्रियता हासिल होती हो।
हाल ही में हार्दिक पांड्या द्वारा अपनी 5 करोड़ रुपए मूल्य की कलाई घड़ी का फूहड़ प्रदर्शन भी यह दिखाता है कि सामान्य और अति सामान्य पृष्ठभूमि से आने वाले इन खिलाड़ियों की मानसिकता कितनी छोटी तथा पैसा कमाने की इनकी हवस कितनी बड़ी होती है।
आश्चर्य की बात यह भी है कि शिक्षा के नाम पर औपचारिकता पूरी करने वाले ये खिलाड़ी व्यावसायिकता के लिए इतने तीक्ष्ण बुद्धि साबित होते हैं कि बड़े से बड़े कारोबारी और उद्योगपति कहीं नहीं टिकते।
अन्य खिलाड़ियों को भी है पैसे और शोहरत की “विराट भूख”
क्रिकेटर्स के अतिरिक्त बात करें अन्य खेलों से जुड़े खिलाड़ियों की तो वो भी इस मामले में कम नहीं हैं। भारतीय बैडमिंटन खिलाड़ी साइना नेहवाल कुछ समय पहले तब चर्चा में आईं थीं जब उनके विदेश दौरे पर उनके साथ उनकी मां को सरकारी खर्चे से भेजने में आनाकानी की गई। साइना नेहवाल ने बाकायदा इसके लिए रोष जाहिर किया।
इसी प्रकार कुश्ती, टेनिस सहित अन्य खेलों से जुड़े खिलाड़ी भी समय-समय पर सुख-सुविधाओं को लेकर अपना रोना रोते देखे गए हैं। वह भी तब जबकि जीत हासिल करने के बाद केंद्र व राज्य सरकारें इनके ऊपर जहां पैसे की बारिश करती हैं वहीं इन्हें अच्छी-खासी नौकरियां भी मुहैया कराती हैं जिससे इनका भविष्य हमेशा हमेशा के लिए सुरक्षित हो जाता है।
इतना सब होने के बाद भी बहुत से खिलाड़ी तो अपने लिए पदक व सम्मान तक मांगने से नहीं हिचकते और उनकी अपने लिए मांग इतनी बेशर्मी के साथ करते हैं जैसे यह उनका हक हो या देश के लिए खेलकर अथवा कोई पदक अर्जित करके वह देश तथा देशवासियों पर अहसान कर रहे हों।
माना कि खिलाड़ी हर देश की शान होते हैं और उनकी उपलब्धियां देश के मान-सम्मान को बढ़ाने का काम करती हैं किंतु इसका यह मतलब तो नहीं कि दौलत, शोहरत और इज्जत की भूख इतनी बढ़ा ली जाए कि गैरकानूनी तरीके अख्तियार करने से भी परहेज न हो या वो लोगों की आखों में खटकने लगे।
कोरोना काल ने देश के एक बड़े तबके की रोजी-रोटी का जरिया छीन लिया। बहुत से लोगों के सामने अचानक आ खड़ी हुई भविष्य की चिंता उन्हें सोने नहीं दे रही। अभी तो यह भी नहीं पता कि इस महामारी की कितनी लहरें आना बाकी हैं और उन परिस्थितियों में लोग किस तरह अपना घर-परिवार चलाएंगे लेकिन लगता है अरबों रुपए हर साल कमाने वाले हमारे खिलाड़ी इतने संवेदनाहीन हो चुके हैं कि उन्हें अपने अलावा किसी और के बारे में सोचने की भी फुर्सत नहीं है।
सैकड़ों रुपए प्रति लीटर की कीमत का पानी पीने वाले विराट कोहली को क्या मालूम नहीं कि आज भी देश में लाखों गांव ऐसे हैं जहां पीने के लिए सामान्य पानी तक उपलब्ध नहीं है।
हो सकता है कि फ्रांस से आयातित बेशकीमती पानी पीना विराट कोहली की किसी “शारीरिक अथवा मानसिक” मजबूरी का हिस्सा हो लेकिन उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि वो जिस देश के वासी हैं, उस देश के लोगों की बहुत छोटी-छोटी जरूरतें भी ताजिंदगी पूरी नहीं होतीं।
फिर भी यदि वो उनके लिए कुछ नहीं कर सकते तो न करें किंतु अपनी बेजा हरकतों से न तो उनका दिल दुखाएं और न ऐसी हरकतों में लिप्त हों जिनसे साफ जाहिर होता हो कि वो टैक्स चोरी की कोशिश करके देश के साथ धोखा करने का मौका छोड़ना नहीं चाहते।
- सुरेन्द्र चतुर्वेदी
मंगलवार, 24 अगस्त 2021
इलाहाबाद HC के चौंकाने वाले आंकड़े, 1.8 लाख से ज्यादा आपराधिक अपीलें लंबित
इलाहाबाद हाई कोर्ट के ऐसे चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं जिनसे पता चला है कि HC में 1.8 लाख से ज्यादा आपराधिक अपीलें लंबित हैं।सुप्रीम कोर्ट में दिए गए डाटा के बाद ये आंकड़े सामने आए हैं। इनसे पता चला है कि हाई कोर्ट का डिस्पोजल रेट मात्र 18 फीसदी का है।
इन आंकड़ों का मतलब यह है कि किसी को ट्रायल कोर्ट से सजा होती है और वह सजा के खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाता है, उसे अपने मामले का फैसला करने के लिए 35 साल इंतजार करना पड़ सकता है। इसके अलावा अगर वह जघन्य अपराधों में शामिल है, जहां जमानत मिलना वैसे भी मुश्किल है तो उसे न्याय की प्रतीक्षा में कई वर्षों तक जेल में रहना पड़ सकता है।
सुप्रीम कोर्ट कर रही सुनवाई
पीठ उन हजारों दोषियों को छुड़ाने के तरीकों की जांच कर रही है, जो अपनी अपील पर सुनवाई का इंतजार कर रहे यूपी की विभिन्न जेलों में बंद हैं। राज्य सरकार के हलफनामे के अनुसार वर्तमान में इलाहाबाद HC में 1990 के दशक की अपीलों की सुनवाई की जा रही है और उसके बाद दायर अपीलों पर सुनवाई की जा रही है।
2019 में निपटाई गई थीं 5,231 अपीलें
आंकड़ों के अनुसार मामलों के निपटान के मामले में सबसे अच्छा साल 2019 था। हाई कोर्ट ने तब रिकॉर्ड 5,231 आपराधिक अपीलों पर फैसला किया। इन आंकड़ों के आधार पर हाई कोर्ट को 1.8 लाख से अधिक मामलों को निपटाने में लगभग 35 साल लगेंगे और वह भी तब जब भविष्य में दायर की गई कोई नई अपील पर विचार नहीं किया जाएगा।
1990 की अपीलें भी पेडिंग
इलाहाबाद हाई कोर्ट का यह चौंकाने वाला डाटा जस्टिस संजय किशन कौल और हृषिकेश रॉय की बेंच के सामने रखा गया। आंकड़ों से पता चला कि कई अपीलें 1990 की भी पेडिंग हैं जिन पर फाइनल हियरिंग होनी है। बीते पांच वर्षों में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 16,279 आपराधिक अपीलों पर सुनवाई की तो इस दौरान 41,151 नई अपीलें दायर हुईं।
आधी सजा काट लेने वालों को मिल सकती है जमानत
यूपी की विभिन्न जेलों में बंद 7,214 दोषी ऐसे हैं जिन्होंने अपनी दस साल की सजा पूरी भी कर ली। कई मामलों में लोग 14 वर्षों से जेल में बंद हैं और जमानत मिलने का इंतजार कर रहे हैं। अपर महाधिवक्ता गरिमा प्रसाद ने कहा कि अगर किसी दोषी ने अपनी आधी सजा काट ली है तो उसे जमानत दी जा सकती है।
हालांकि आदतन अपराधियों पर यह लागू नहीं होता, क्योंकि वह जेल से बाहर आकर फिर से अपराध को अंजाम दे सकते हैं। इलाहाबाद हाई कोर्ट में अभी न्यायाधीशों के 160 पद स्वीकृत हैं जबकि 93 न्यायाधीश कार्यरत हैं।
सोमवार, 9 अगस्त 2021
बड़ा सवाल: यूपी में इस बार कौन बनेगा मुख्यमंत्री… बुआ, बबुआ, बबली या बाबा?
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में यूं तो अभी पूरे 6 महीने बाकी हैं लेकिन यह बड़ा सवाल उछलने लगा है कि इस बार मुख्यमंत्री बनेगा कौन?चार नाम मुक़ाबिल हैं। बुआ, बबुआ, बबली और बाबा। 2017 के चुनाव में बुआ और बबुआ साथ थे किंतु इस मर्तबा आमने-सामने होंगे।
बबली पहली बार सीएम की संभावित उम्मीदवार हैं। हालांकि अंत तक उनकी पार्टी का ऊंट किस करवट बैठेगा, कहना थोड़ा मुश्किल है।
शेष रहे बाबा… तो उनका कोई विकल्प नहीं है इसलिए अपनी पार्टी के वही सीएम कैंडिडेट होंगे, इसमें किसी को कोई शक-शुबहा नहीं होना चाहिए। ये अलग बात है कि शक पैदा करने का भरसक प्रयत्न किया गया परंतु समय रहते उसकी हवा निकाल दी गई।
हवा निकली तो कुछ चेहरों की हवाइयां उड़ना स्वाभाविक था लेकिन चुनाव की चर्चा हवा टाइट करने की इजाजत नहीं देती इसलिए सबसे पहला कार्ड खेला बुआ ने।
ऐसा लगा जैसे किसी ने उन्हें झिंझोड़ कर नींद से उठा दिया हो, लिहाजा कल तक बुझी-बुझी सी बुआ ने ब्राह्मणों पर दांव लगाते हुए अयोध्या से प्रबुद्ध सम्मेलनों के आयोजन की शुरूआत कर डाली।
उन्होंने इतना भी नहीं सोचा कि जिन सजातीय बंधु-बांधवों ने उन्हें अर्श से फर्श तक पहुंचाया, वो क्या सोचेंगे। जिन्होंने साइकिल के डंडे की सवारी से उतारकर हाथी की सवारी करवाई, उनके कलेजे पर क्या बीतेगी। तिलक, तराजू और तलवार जैसे नारे का क्या होगा।
परंपरागत रूप से ‘स्वर्गीय’ कहलाने के हकदार उन कांशीराम की आत्मा कितनी बेचैन होगी, जिन्होंने कभी IAS बनने का सपना संजोने वाली एक आम सी लड़की को देखकर कहा था कि एक दिन सैकड़ों IAS तुम्हारे ‘चाकर’ होंगे।
यही नहीं, प्रदेश के उन 17 फीसदी अल्पसंख्यकों का धनीधोरी कौन होगा, जो कल तक यही समझते रहे कि हाथी ही उनका एकमात्र साथी है और साइकिल पंक्चर होने के बाद हाथी में ही वो दम बाकी है जिसकी सूंड के सहारे वह कमल को सबक सिखा सकते हैं।
बहरहाल, ब्राह्मणों को लेकर खेले गए बुआ के इस धोबी पछाड़ दांव ने बबुआ की पेशानी पर बल डलवा दिए और वो भी तत्काल ‘ब्राह्मण मोड’ में आते हुए बोले कि हम न सिर्फ ब्राह्मण सम्मेलन करेंगे बल्कि सरकार बनते ही प्रदेश के हर जिले में भगवान परशुराम के मंदिर स्थापित कराएंगे।
सरकार बनाने को लेकर बबुआ के कॉन्फिडेंस का अंदाज इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 350 सीटें जीतने का दावा करते हुए यहां तक कह दिया कि उन्हें 400 सीटें भी मिल सकती हैं क्योंकि बाबा से लोग बहुतई नाराज हैं।
बबुआ के दावे पर प्रश्नचिन्ह लगाने का अधिकार पार्टी में किसी को है नहीं, इसलिए किसी ने लगाया भी नहीं। आखिर पिछले पांच साल से वो निठल्ला चिंतन कर रहे थे। Twitter-Twitter भी खेल रहे थे जिससे तत्काल साफ पता लग जाता है कि कितने करोड़ फॉलोअर हैं।
अब इतने विश्वसनीय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से मिल रहे इनपुट को अवॉइड तो नहीं किया जा सकता न। वहां सक्रिय लोग इतने नकारा नहीं हो सकते कि 350 से 400 का आंकड़ा बताकर 35-40 पर ला पटकें।
सरकारी एजेंसियों को तो बाबा ने ऐसी पट्टी पढ़ाई है कि वो अब बबुआ के भरोसे की रही नहीं। पुलिस तक अब खाकी की तरह नहीं, बाबा की तरह खांटी भाषा का इस्तेमाल करने लगी है। खैर… बबुआ की खुशी को ग्रहण क्यों लगाया जाए, और क्यों उनके सपने में खलल डाला जाए।
बबली की पार्टी के एक महाबली ने तो ब्राह्मणों की सियासत पर ऐसा ‘चौका’ लगाया कि कहने लगे… हमारी तो सीएम कैंडिडेट खुद ही ब्राह्मण है। उनके नाम के साथ दो सरनेम बेशक पहले से जुड़े हों लेकिन ‘छद्म’ सरनेम सदा से वही है जो आज ‘बेचारे’ कश्मीरी हिन्दुओं के साथ जुड़ गया है। वक्त जरूरत उसे उसी तरह कुर्ते के ऊपर धारण कर लिया जाता है जिस तरह ‘जनेऊ’ धारण किया जा सकता है। और इसमें हर्ज ही क्या है। राजनीति के लिए मुखौटे हमेशा मुफीद साबित हुए हैं, और यही कारण है कि राजनेता किस्म-किस्म के मुखौटों का प्रयोग करने में माहिर होते हैं। जो राजनेता मुखौटों का सही इस्तेमाल करना नहीं जानता, वो सही मायनों में राजनेता कहलाने का हकदार नहीं होता।
कुल मिलाकर पब्लिक माने या ना माने परंतु बबली की पार्टी मानती है कि वो उसी ब्राह्मण कुल की शाखा हैं जो कश्मीर से टूटकर ‘संगम’ घाट आ गिरी थी और फिर विभिन्न जाति-धर्म संप्रदायों से होकर भी एक ओर जहां ‘सनातनी’ हैं वहीं दूसरी ओर उनका सूक्ष्मजीवी ब्राह्मणत्व अमरत्व को प्राप्त है।
शेष रहे बाबा… जो गेरूआ त्यागे बिना वाया गोरखनाथ सत्ता पर तो काबिज हुए ही, नए-नए कीर्तिमान भी गढ़े। एक झटके में राजनीति की परिभाषा बदल दी। ‘ठीक’ न होने पर ‘ठोक’ देने के हिमायती बाबा ने ‘सबका साथ, सबका विकास और सबका विश्वास’ पर आगे बढ़ते हुए यह भी ऐलान कर दिया कि इसे मानना या ना मानना ‘उनकी’ मर्जी। जैसी जिसकी सोच।
बाबा ने बता दिया कि वो बिना रुके और बिना थके उस रास्ते पर चलते रहेंगे जिस पर चलकर प्रदेश को प्रगति के सोपान पर चढ़ाया जा सकता है।
बाबा बोलते हैं कि अभी बहुत कुछ करना बाकी है इसलिए एक बार की कसरत से प्रदेश की कमान सीधी नहीं की जा सकती। उसके लिए कम से कम दो पंचवर्षीय योजनाओं की और दरकार है। नहीं तो नौ दिन चले अढ़ाई कोस की कहावत चरितार्थ होते देर नहीं लगेगी।
बाबा बोलते हैं कि ये पब्लिक है, सब जानती है। सबको पहचानती है। फिर चाहे वह बुआ हो या बबुआ, बबली हो या बाबा। उसे पता है कि गोरखनाथ पीठ व गेरुआ वस्त्रधारी चाहे कहीं भी हों, न तो जाति और धर्म की राजनीति करते हैं और न ब्राह्मणों का इतना अपमान करते हैं कि मान-मनौवल के लिए या तो ब्राह्मण सम्मेलन करने पड़ जाएं या स्वयंभू ब्राह्मण की उपाधि हासिल करने की मजबूरी आ खड़ी हो जाए।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
UP विधानसभा चुनाव 2022: पेश है मनोरंजन से भरपूर ड्रामा… सियासी फील्ड की फुटबॉल “ब्राह्मण”
अब तक तो यही सुना था कि पब्लिक की मेमोरी बहुत वीक होती है। विशेष तौर पर चुनावी राजनीति के मामले में। वह बहुत जल्दी नेताओं के सारे ‘कु-कर्म’ भूलकर लोकतंत्र के महापर्व में ‘ढोलकी’ बन जाती है।फिर नेता जैसे चाहें, वैसे उसे बजाने लगते हैं। किंतु ये पहली बार पता लग रहा कि नेताओं की मेमोरी तो जनता से भी कमजोर है।
कभी कहते हैं कि अपराधी व आतंकवादी की न कोई जाति होती है और न धर्म। फिर जब कोई ऐसा ‘विशेष श्रेणी का अपराधी’ मारा जाता है जो राजनीति के लिए मुफीद हो तो उसकी जाति-धर्म सब ढूंढ लाते हैं।
पिछले साल 2 जुलाई की रात कानपुर के बिकरू गांव में एक दुर्दांत अपराधी ने हमला करके 8 पुलिसकर्मियों को मार डाला था। एकसाथ 8 पुलिसकर्मियों की शहादत पर चूंकि हल्ला मचना ही था, इसलिए मचा। नतीजतन बाबा की पुलिस ने इस अपराधी और उसके गुर्गों को चुन-चुन कर ठिकाने लगाना शुरू कर दिया।
राजनेताओं के सौभाग्य और ब्राह्मणों के दुर्भाग्य से बिकरू कांड को अंजाम देने वाले गैंग के सरगना का नाम विकास ‘दुबे’ निकला। यानी जाति से वह ब्राह्मण था, कर्म भले ही उसके कितने ही निकृष्ट क्यों न रहे हों। उसके गुर्गों में भी अधिकांश संख्या ऐसे तथाकथित ब्राह्मणों की ही थी लिहाजा नेताओं ने तत्काल प्रभाव से एक ‘माइंडसेट’ किया कि बाबा की पुलिस ब्राह्मणों को निशाना बना रही है और कुख्यात बदमाश नहीं, ‘ब्राह्मण’ मारे जा रहे हैं।
इस ‘कथानक’ का खूब प्रचार-प्रसार किया गया, बिना यह विचार किए कि विकास दुबे के हाथों मारे गए पुलिसकर्मियों में से भी कई ब्राह्मण थे। पूर्व में भी किसी को ठिकाने लगाने से पहले विकास दुबे ने उसकी जाति नहीं देखी।
बहरहाल, देखते-देखते एक वर्ष बीत गया और लोग समय के साथ विकास दुबे को भूलने लगे। लेकिन अब जबकि विधानसभा चुनावों की दुंदुभि बजने लगी तो मुद्दा विहीन विपक्ष को लगा कि गड़े मुर्दे उखाड़ने का इससे उपयुक्त समय फिर कब मिलेगा इसलिए उसने ब्राह्मणों को पत्ते फेंटना शुरू कर दिया।
इसकी पहल की उस पार्टी ने जो कभी ‘तिलक, तराजू और तलवार’ धारण करने वालों को जूते मारने की हिमायती थी। वह घड़े में पड़े अपने ब्राह्मण नेता को निकाल कर लाई और उन्हें मोहरा बनाकर ‘ब्राह्मण सम्मेलन’ आयोजित करने का बीड़ा उठाया।
इसी क्रम में बिकरू कांड की एक आरोपी के लिए कानूनी मदद मुहैया कराने का ऐलान भी कर दिया। शोर-शराबा हुआ तो ब्राह्मण सम्मेलनों का नाम बदलकर प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन रख दिया और उसकी शुरूआत की रामजन्मभूमि अयोध्या से।
बुआ को बाजी मारते देख बबुआ के पेट में मरोड़ उठना स्वाभाविक था इसलिए मरोड़ उठी, और ऐसी उठी कि उसने भी न सिर्फ ‘चुनावी’ ब्राह्मण सम्मेलन करने का बीड़ा उठाया बल्कि सरकार बनने पर यूपी के हर जिले में एक मंदिर नर्माण कराने की भी घोषणा कर डाली।
अब ये मंदिर किसी देवी-देवता के होंगे या समाजवादी नेताओं के, ये तो ”नौ मन तेल होने पर राधा के नाचने” वाली कहावत तय करेगी किंतु इतना तय हो चुका है कि ‘समाजवाद’ की कुंडली के केंद्र में अचानक ‘ब्राह्मण’ आ बैठा है। अन्यथा आतंकियों की पैरोकार पार्टी इस तरह ब्राह्मणों की रट कैसे लगाने लगती।
जाहिर है कि इन हालातों में कांग्रेस कहां पीछे रहने वाली थी। उसके ऐंचकताने प्रदेश अध्यक्ष की छठी इंद्री जागृत हुई और वो वाया गांधी-वाड्रा बाईपास बोले कि ब्राह्मण-ब्राह्मण खेलने वाली पार्टियां शायद भूल रही हैं कि हमारी तो नेता ही ब्राह्मण हैं। उन्हें ब्राह्मणों को रिझाने की क्या जरूरत। ब्राह्मण उन पर और उनकी पार्टी पर सत्तर सालों से रीझे हुए हैं। बस एक इशारे की जरूरत है, ब्राह्मण तो उनकी ओर खिंचे चले आएंगे। ब्राह्मण और दलित के जिस ‘कॉकटेल’ से उन्होंने कई दशकों तक राज्य किया है, उसकी पुनरावृत्ति होगी और बुआ, बबुआ सहित योगी बाबा भी चारों खाने चित्त पड़े दिखाई देंगे।
दो दिन पहले ही जिनकी पुण्यतिथि थी, वो भारत रत्न एपीजे अब्दुल कलाम कहा करते थे कि हर व्यक्ति को स्वप्नदृष्टा होना चाहिए। स्वप्नदृष्टा ही अपने लक्ष्य और मुकाम को हासिल कर सकते हैं। जो स्वप्न नहीं देखते, वो लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते।
बात भी सही है, लेकिन कलाम साहब ने मुंगेरी लाल अथवा शेखचिल्ली वाले वो हसीन सपने देखने की बात कभी नहीं की जिनके जरिए आदमी खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार बैठता है और हाथ रह जाता है सिर्फ पछतावा।
कांग्रेस की मूल समस्या फिलहाल यही है कि उसके -आदर्श’ पात्र हैं मुंगेरी लाल और शेखचिल्ली। ऐसे में उसके सपने पूरे होने की संभावना तो ना के बराबर है, अलबत्ता सपने देखने से उसे भी कोई कैसे रोक सकता है।
शेष रह जाते हैं योगी बाबा। कहते हैं… जाति ने पूछो साधु की, लेकिन साधु अगर राजनेता हो तो करेला और नीम चढ़ा। पार्टी को एक किनारे कर दो तब भी कपड़ों का गेरूआ रंग ही उकसाने के लिए काफी है। ऊपर से तेवर ऐसे कि भाई लोग कहने लगे कि बाबा तो ठाकुर हैं, इसलिए ब्राह्मणों से बैर रखते हैं।
राजनीति में ऐसी ओछी बातें अब ‘आम’ हो गई हैं इसलिए उन्हें ‘खासियत’ नहीं मिलती। लेकिन जो भी हो, ब्राह्मण तो ब्राह्मण हैं। बुद्धि के धनी। आचार्य विष्णुगुप्त चाणक्य से लेकर आज तक जब-जब जरूरत महसूस हुई है, ब्राह्मणों ने साबित किया है कि बुद्धि ही उनका सर्वश्रेष्ठ धन है।
उन्होंने एक ओर जहां बुद्धि के प्रयोग से बड़े-बड़े राज-पाठों का सफल संचालन किया है वहीं दूसरी ओर तमाम सत्ताधीशों को इतिहास बनाकर रख छोड़ा है।
बसपा हो या सपा… अथवा भाजपा ही क्यों न हो, बेहतर होगा कि वह ब्राह्मणों से खेलना बंद कर दें। उन्हें औरों की तरह वोट बैंक समझने की भूल की तो उनका भी वही हश्र होगा जो आज कांग्रेस का हो चुका है। देश के करोड़ों मतदाताओं की तरह ब्राह्मण ‘मतदाता’ जरूर है परंतु वह किसी के हाथ की ‘कठपुतली’ नहीं है।
किसी भी नाम अथवा टाइटिल से ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित करके ब्राह्मणों के मान-सम्मान का खेल खेलना महंगा सौदा साबित हो सकता है। उचित होगा कि सभी पार्टियां ब्राह्मणों को दिल से उचित सम्मान दें और उनके मत व मताधिकार का इस्तेमाल जनहित एवं राष्ट्रहित में करें जिससे न केवल संपूर्ण समाज का कल्याण हो बल्कि खुद को समाज से परे समझने वाले राजनेताओं की भी बुद्धि परिमार्जित हो सके।
ब्राह्मण कभी सत्ता का भूखा नहीं रहा, हां… उसने त्याग के बल से अनेक सत्ताधीशों को अपने इशानों पर नाचने को मजबूर अवश्य किया है। नए दौर के राजनेताओं और उनके हाई कमानों से भी यही अपेक्षा है कि वह ब्राह्मणों की मूल प्रवृत्ति को विस्मृत करने की कोशिश न करें क्योंकि यह सोच उनके राजनीतिक ताबूत की आखिरी कील भी साबित हो सकती है।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी
सोमवार, 19 जुलाई 2021
मुकुट मुखारविंद मंदिर घोटाला: रिसीवर रमाकांत की याचिका हाईकोर्ट से खारिज़
गोवर्धन के प्रसिद्ध मंदिर मुकुट मुखारविंद में हुए करोड़ों रुपए के घोटाले की जांच और उसके उपरांत दर्ज हुई FIR पर सवाल उठाने वाली याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज़ कर दी है।घोटाले के मुख्य आरोपी और कोर्ट से नियुक्त मंदिर के रिसीवर रमाकांत गोस्वामी ने यह याचिका इसी साल फरवरी में दायर की थी।
आरोपी के अनुसार चूंकि उसे कोर्ट से रिसीवर नियुक्त किया गया था लिहाजा न तो गोवर्धन के एसडीएम को मंदिर में हुए किसी घोटाले की जांच करने का अधिकार था और न ही उस जांच के आधार पर SIT कोई FIR दर्ज करा सकती थी।
रमाकांत गोस्वामी ने अपनी याचिका में उत्तर प्रदेश सरकार के प्रमुख सचिव (गृह) सहित जिलाधिकारी मथुरा तथा उपजिलाधिकारी (एसडीएम) गोवर्धन को पार्टी बनाते हुए 05 फरवरी 2021 को यह याचिका दायर की थी जिसे 10 फरवरी 2021 को कोर्ट ने रजिस्टर्ड किया।
उल्लेखनीय है कि करीब 3 वर्ष पूर्व इंपीरियल पब्लिक फाउंडेशन नामक एनजीओ ने गोवर्धन स्थित विश्व प्रसिद्ध मंदिर मुकुट मुखारविंद में करोड़ों रुपए का घोटाला किए जाने की शिकायत तहसील दिवस पर प्रार्थना प्रत्र देकर की थी।
इस शिकायत के बाद तत्कालीन जिलाधिकारी सर्वज्ञराम मिश्रा द्वारा मामले की जांच गोवर्धन के तत्कालीन एसडीएम नागेन्द्र कुमार सिंह को सौंप दी गई।
एसडीएम नागेन्द्र कुमार सिंह ने अपनी जांच में प्रथम दृष्ट्या रिसीवर रमांकत पर लगाए गए सभी आरोपों को सही पाया, बावजूद इसके यूपी SIT ने अपने स्तर से फिर इस मामले की जांच की।
जांच पूरी करने के बाद यूपी SIT के निरीक्षक कुंवर ब्रह्मप्रकाश ने अपने यहां क्राइम नंबर 0010/20120 पर यह मामला 11 सितंबर 2020 की शाम 6 बजकर 46 मिनट पर दर्ज करा दिया।
तब से यह मामला पता नहीं किन कारणोंवश लटका रहा लिहाजा इसमें मुख्य आरोपी रमाकांत गोस्वामी या किसी अन्य आरोपी की भी गिरफ्तारी नहीं हुई जबकि SIT ने इसमें करीब डेढ़ दर्जन लोगों के खिलाफ FIR दर्ज की है।
SIT की इसी ढील का फायदा उठाकर मुख्य आरोपी रमाकांत गोस्वामी अपने बचाव में कोई न कोई नया हथकंडा इस्तेमाल करते रहते हैं।
बहरहाल, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने गत 13 जुलाई को रमाकांत गोस्वामी की याचिका का निस्तारण करते हुए अपने आदेश में लिखा है कि एसडीएम गोवर्धन की जांच और SIT द्वारा दर्ज कराई गई FIR से याचिकाकर्ता के किसी अधिकार का हनन होता प्रतीत नहीं हुआ इसलिए याचिका खारिज़ की जाती है।
इस बारे में मंदिर घोटाले की सर्वप्रथम शिकायत करने वाले एनजीओ इंपीरियल पब्लिक फाउंडेशन के अध्यक्ष रजत नारायण का कहना है कि रमाकंत गोस्वामी को अपर सिविल जज प्रथम मथुरा के आदेश से गोवर्धन स्थित मुकुट मुखारविंद मंदिर का रिसीवर नियुक्त किया गया था न कि वो स्वयं में कोई न्यायिक अधिकारी हैं।
हालांकि उनका व्यवहार यही दर्शाता है कि वह खुद को सबसे ऊपर समझ रहे हैं और इसलिए न केवल एसडीएम की जांच तथा SIT की FIR पर प्रश्नचिन्ह लगाने का प्रयास कर रहे हैं बल्कि उन्हें कानूनन गलत साबित करने की कोशिश में लगे हैं।
अब देखना यह होगा कि एसडीएम की जांच और SIT की FIR को चुनौती देने वाली मुख्य आरोपी रमाकांत की याचिका इलाहाबाद हाईकोर्ट से खारिज़ कर दिए जाने के बाद भी SIT हाथ पर हाथ रखे बैठी रहती है या करोड़ों लोगों की आस्था एवं विश्वास से खिलवाड़ करने वाले घोटालेबाजों की धरपकड़ शुरू कर कानून पर भरोसा कायम रहने का काम करती है।
– सुरेन्द्र चतुर्वेदी
बुधवार, 14 जुलाई 2021
बबुआ! ऐसा लगता है कि पुलिस का खून सफेद हो गया है… वो पुराने हुक्मरानों से बेवफा हो गई है, समझ लो
सुनो…सुनो…सुनो। यूपी के वाशिंदो सुनो। बुआ एंड बबुआ पार्टी प्रदेश की पुलिस का कायापलट करने जैसा पावन विचार रखती है, बशर्ते आप उसे एक मौका और दें।बुआ एंड बबुआ, या बुआ अथवा बबुआ में से किसी को भी यदि आप 2022 के विधानसभा चुनावों में सत्ता की कमान सौंप देते हैं तो आपके प्रदेश की पुलिस कम से कम दोरंगी और अधिक से अधिक तिरंगी हो जाएगी।
यदि बुआ एंड बबुआ पार्टी को सत्ता मिलती है तो पुलिस की ‘खाकी को खाक’ में मिलाने का काम प्राथमिकता के आधार पर किया जाएगा और उसकी जगह पुलिस के सिर पर नीली टोपी, लाल कमीज और हरा पैंट सजेगा।
यदि सिर्फ बबुआ को यूपी का भाग्य विधाता बनाया जाता है तो पुलिस की कैप लाल, शर्ट हरी और उसके नीचे पैंट फिर लाल कलर का होगा।
ठीक इसी तरह अगर बुआ को ये जिम्मेदारी मिलती है तो प्रदेश पुलिस नीली वर्दी में सजी-संवरी नजर आएगा। दोनों ही परिस्थितियों में उसके क्रिया-कलाप वैसे नहीं होंगे जैसे आज दिखाई दे रहे हैं।
माना कि बुआ और बबुआ को एक मर्तबा किए गए गठबंधन का अनुभव कुछ अच्छा नहीं रहा और इसलिए फिलहाल वह अलग-अलग से दिखाई देते हैं परंतु सत्ता की खातिर चुनाव पूर्व नहीं तो चुनाव बाद पुन: एकसाथ प्रेस वार्ता कर सकते हैं।
हाल ही में ‘दोमुंह’ से एक ही बात निकलना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि बुआ और बबुआ के बीच कभी ‘मतभेद’ बेशक पनपे हों किंतु ‘मनभेद’ नहीं हैं लिहाजा वो समय पड़ने पर रिश्ता निभा सकते हैं।
बहरहाल, इतना जान लें कि यदि किसी तरह इनके मंसूबे पूरे हो गए तो पुलिस तब तक किसी आतंकी या आतंकियों के मॉड्यूल पर हाथ नहीं डालेगी जब तक कि उन्हें कोर्ट से आतंकी करार नहीं दे दिया जाता। और ये भी जान लें कि ऐसा ये होने नहीं देंगे। आखिर वोट बैंक भी कोई चीज है, उसे ऐसे कैसे सींखचों के अंदर जाने दिया जा सकता है।
किसी अपराध की प्लानिंग करना होता होगा कानून की नजर में अपराध, लेकिन बुआ और बबुआ की पुलिस इस तरह की किसी प्लानिंग को अपराध नहीं मानेगी। आतंकियों को उनकी योजना सफलता पूर्वक संपन्न करने का सुअवर अवश्य दिया जाएगा ताकि वो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के हनन का आरोप चस्पा न कर सकें तथा सभी चुनावों में एकमत व एकजुट होकर मतदान करने निकलें।
ये दोरंगी या तिरंगी पुलिस ऐसे हर प्लान को पूरा करने का मौका इसलिए भी देगी जिससे बुआ-बबुआ की सरकार को कोई नया जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने की जहमत न उठानी पड़े और बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के बम विस्फोटों के जरिए ये कार्य बखूबी होता रहे।
2022 के चुनाव घोषणा पत्र में बुआ-बबुआ दोनों इस बात का स्पष्ट उल्लेख कर सकते हैं कि आतंकवाद बहुत संवेदनशील मामला है इसलिए ”हमारी पुलिस” तब तक किसी संदिग्ध आतंकवादी पर हाथ डालने की हिमाकत नहीं करेगी जब तक कि वह अपने मकसद में सफल होकर इस बात को साबित न कर दे कि वह आतंकवादी ही है और उसके जेहन में आतंकवाद के अतिरिक्त कुछ नहीं रहता।
खालिस नीली अथवा लाल-नीली-हरी या फिर सिर्फ लाल और हरी वर्दी में सजी यह पुलिस जाति-धर्म-संप्रदाय का पुख्ता पता लगाने के बाद ही किसी पर हाथ डालेगी अन्यथा पहले पार्टी के डंडे में लगे झंडे को निहारेगी।
दोनों बात की पुष्टि होने के बाद ही तय करेगी कि आतंकवाद का कोई धर्म होता है या नहीं। अगर झंडे के रंगों से मेल मिलता है तो आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होगा और यदि नहीं मिलता तो तय जानिए कि धर्म निर्धारित होगा। ठीक उसी तरह जिस तरह आज पुलिस और उसकी वर्दी का रंग निर्धारित किया जा रहा है।
ऐसा लगता है कि पुलिस का खून सफेद हो गया है, वो बेवफा हो गई है और अपने पुराने हुक्मरानों की मंशा के विपरीत संदिग्ध आतंकियों पर चुनाव से ठीक पहले हाथ डालने का दुस्साहस कर रही है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि खाकी पर ये असर उस खास पार्टी की वैक्सीन कर रही हो जिसे लगवाने से बबुबा ने साफ मना कर दिया था और बुआ चुप्पी साधे बैठी हुई है कि कहीं कोई वैक्सीनेशन के लिए पकड़ कर न ले जाए।
खतरों का भांपना कोई बुआ और बबुआ से सीखे। कोई पार्टी अपनी “पारदर्शी वैक्सीन” के डोज से आतंकवादियों का तथा उनका डीएनए बदलने की कोशिश करे इससे पहले ही भेड़िया आया-भेड़िया आया चिल्लाना शुरू कर दो। बाकी जब भेड़िया आएगा, तब देखा जाएगा।
14 करोड़ से अधिक मतदाताओं वाले इस प्रदेश में तमाम ऐसे निकल आएंगे जो बुआ-बबुआ की भेड़िया चाल के शिकार में फंसेंगे। फंसे तो ठीक, और नहीं फंसे तो अगले चुनावों तक फिर ऐसे ही मुद्दे खड़े करते रहेंगे। अभी ये तैयारी 2022 की है।
2022 में किसी तरह एकबार काठ की हड़िया चढ़ जाए फिर देखना…पुलिस की वर्दी ही नहीं, वैक्सीन भी रंगीन न बनवा दी तो नाम बदल देना।
रहा सवाल जनसंख्या का तो उस पर कैसी रोक, वो तो ऊपर वाले की देन हैं। नीचे वाले कौन होते हैं दखल देने वाले। किसी की विरासत संभालने वाला कोई नहीं होता तो किसी के तीन-तीन हो जाते हैं। और कोई इस बात पर भी रोता है कि जिसे अपने हाथों से कच्ची उम्र में प्रदेश का ताज सौंप दिया, आज वही आखिरी मुगल होने पर आमादा है। जैसी जिसकी सोच। ईश्वर सबका भला करे।
-सुरेन्द्र चतुर्वेदी






